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Friday, 4 June 2021

हाइकु 4/6/201 अग्निशिखा मंच कवि सम्मलेन_alka



नमस्ते में ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु में मैं रहे को प्रस्तुत करती हूं।
सावन


आया सावन 
दिल याद करता
पिया का प्यार।

आया सावन 
मन  झुमकर उठा 
चारों ओर से।

आया सावन
बरसती यु बुंदे 
भाते मन को।

सावन आया
टिप टिप की धुन
सुनता मन।

सावन आया
भीगी में तन मन
भीगी धरती।

आया सावन
सभी रंग बिरंग
छाता निकले।

धन्यवाद
पुणे



पर्यावरण ःहाइकु

पेड़ लगाओ
 सुन्दरता बढ़ाओ
सुकून पाओ

 झुकता पेड़ 
जिसपे होते फल
 सहनशील


 मौन से खड़े
 गरमी में तपते
 छाया भी देते

 लाल कमल
तालाब में खिलते
खुशियाँ देते

वृक्ष लगाओ
 हरियाली  बढ़ाओ
 जीवन पाओ

पेड़ों की छाँव
 देती मन को सुख
 विश्राम पाँव

बहे बयार
पेडों के झुनझुने
 लगे बजने

 पेड़ों से हमें
आक्सीजन  मिलेगी
चिंता मिटेगी

वनों की शोभा
लाल - लाल पलाश
रक्तिम आभा

पेड़ हमारे 
जीवन के रक्षक
 उन्हें संवारें


आशा जाकड
9754969496

पर्यावरण ःहाइकु

पेड़ लगाओ
 सुन्दरता बढ़ाओ
सुकून पाओ

 झुकता पेड़ 
जिसपे होते फल
 सहनशील


 मौन से खड़े
 गरमी में तपते
 छाया भी देते

 लाल कमल
तालाब में खिलते
खुशियाँ देते

वृक्ष लगाओ
 हरियाली  बढ़ाओ
 जीवन पाओ

पेड़ों की छाँव
 देती मन को सुख
 विश्राम पाँव

बहे बयार
पेडों के झुनझुने
 लगे बजने

 पेड़ों से हमें
आक्सीजन  मिलेगी
चिंता मिटेगी

वनों की शोभा
लाल - लाल पलाश
रक्तिम आभा

पेड़ हमारे 
जीवन के रक्षक
 उन्हें संवारें


आशा जाकड
9754969496


🌹🙏अग्नि शिखा मंच को नमन 🙏🌹
       🌴🌿विषय : सावन🌿🌴
         🌴🌹विधा: हाइकू 🌹🌴
           🌿दिनांक:4-6-2021🌿रचनाकार-~डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार~
🌹
सावन आया,
झूला झूले राधिका
मन को भाया ।
🌹
सघन घन ,
नाचे वन में मोर -
मगन मन ।
🌹
आया सावन ,
साथ करत केलि -
राधा- मोहन ।
🌹
भींजत पट ,
बरसत सावन -  
यमुना- तट ।
🌹
साजन मेरे,
घन श्याम सलोने-
दर्शन तेरे ।
🌹
**************************************स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार*****




अग्नि शिखा
नमन मंच
विषय --: सावन
विधा--हाइकु
दिनांक--: 4/6/2021

देख लगे है 
खेतों की हरियाली 
सावन आया !

  मेघ बनते
किसान खुश होवे 
  सावन आया !

 सावन आया
 बोले कोयल कुहु 
  गीत सुनाए !

 सावन तेरे
आने से ऋंगारित 
 धरा भी होती !

 श्रृंगार कर 
दुल्हन बनी धरा 
बादल चूमें! 

बिन प्रेयसी
भिगोता तन मन 
सावन आया !

प्रेयसी बन
आलिंगन करते 
 मेघ-तणित !

 भरी जवानी
 देखे प्रियतम की
 राह नवेली !

  कर ऋंगार 
पति के आवन की
  राह निहारे !

  भीगे है गोरी
साजन के आने से
   रंगीन अदा !

  मेघा बरसे 
गोरी सकुचाती 
 भीगे वस्त्र में !

   सावन झूला
साजन झूलावे है
   मीत झूले है !

  सावन आया
हर त्योहार लाया
 खुशीयां आई !

  ताप गिरता
दे पानी की बौछारें
 जीवन देता !

  बरखा रानी
हर जीव खुश है
  तेरे आने से !

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई



आदरणीय साधना जी आपके मार्गदर्शन को पढ़कर पुनः लिखने का प्रयास किये है। कृपया ध्यान देंगें।

हाइकु विषय:-- *सावन*

१) रग रग में
    सजन की जूठन
    चले सावन
२) वर्षा की बूंद
    खलिहान में रुकी
      पिघली माटी
३) एक सरीखी
   रिमझिम बौछारें
   मत जाना रे
४) कहां से आई
  फूलों पर ये ओस
  धरती रो ई

विजयेन्द्र मोहन।



हायकू ( सावन )

रूठा सावन
अबकी बरस भी
भूला पीहर


काली घटाएं
घनघोर आवाजें
गूंजा कानन

गाएं कजरी
झूमकर बरसीं
सावनी घटा

मीना गोपाल त्रिपाठी
4 / 6 / 2021





🌹अग्निशिखा मंच🌹

      🌹🌹हाइकू🌹🌹

      🌹विषय -सावन 🌹

सावन आया
संग यादें लाया
मन हर्षाया

बारिश लाई 
सौंधी महक आई 
खुशियाँ लाई

भुट्टा खीरा 
संग अपने लाई
मौसम प्यारा

संग प्रीत के 
झूले भी याद आये
संग प्रीतम

हरा भरा है
प्रकृति का मौसम
ख़ुशी भरा है

हेमा जैन (स्वरचित )


विषयानुसार ः-

विधा-हाईकु 

*सृजन शब्द-सावन*

1.सावन आया
 झूला झूलते कान्हा
 राधा के संग

2.राधा रानीजी
   सजधज के बैठी
    सखियाँ संग

3.रूठे साजन
  मुकुट शीश धरे
   मोर सुहाये

4.कैसे मनांऊ
 सखी प्रियतम को
  रूठो कान्हा री

5.प्रीतम प्यारो
  नंद को दुलारो  री
   रुठो कान्हा री ।।

स्वरचित..
योगिता चौरसिया "प्रेमा"
मंडला म.प्र.



अ. भा. अग्निशिखा मंच
शुक्रवार -4/6/ 2021
विषय - हांइकु-सावन - पर 


संयोगीजन
प्रसन्न हो जाते
हर सावन।

वियोगीजन
पीड़ित हो जाते
हर सावन।

विरहिणी में
विरह वेदना हो
हर सावन।

प्रियतम से
मिलन को आतुर
हर सावन।

आँसू बरसे
ना लौटा प्रियतम
इस सावन।

फूल खिले,
कोयलिया बताए
आया सावन।

कदली बूँदें
मोतियों सी उछले
आया सावन।

हरित धरा
नव्य सुन्दर सृष्टि
शोभा सावन।

मस्ती में शाखें
कली पर भंवरे 
डोलें सावन।

मन यौवन
सुमन सा खिलता
मन सावन।

मिला सहारा
पलकें थीं बोझिल
हर सावन

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश








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हाइकु


अग्निशिखा मॉच 
४/६/२०२१

हाइकु -अलका पाण्डेय 


सावनआया 
मोहक दृश्य बने
तस्विर सजे 

सावन आया 
हलचल मचाये 
गरीब त्रस्त 

वर्षा का जल 
भिगोय तन मन 
कटुता धुले 

दादा की काठी 
वर्षा  में सहारा है 
काई ही काई 

धरा हर्षाये 
गंदगी बह जाये 
मेघ बरसे 

रवि छुट्टी पे 
कजरारी बदली 
बरस रही 

मन का मैल 
सावन में धुले 
स्वच्छता हुई 

बंसत आया 
महका घर सारा 
बच्चो सी खुशी 

बरसा पानी 
टूट गया छप्परा 
 बुढा बेहाल 

पावस माह 
जल कुंभी ले कर 
धरा पे आया

वर्षा का जल 
आकाश से गिरे 
धरा पे बहे 

मेघ की बेटी 
विरहनी बन के 
धरा पे आई

नभ की बेटी
बाबूल की दहली
दहला गई 

बर्षा होती है 
हिलोरे उठती है 
शांत मन में 

बारिस आई
झिगुर हँसते है 
रहते मस्त 

बरसात में 
जन जन मे हर्ष
मुग्ध झींगुर 

गिरती बुंदे 
मन का ताप हरे 
हर्ष समाये 

ढोल बजाती 
झिंगुर की टोली  है 
वर्षा आई है 

झीगुर नाचे 
बाँध पग घुँघरु
जश्न मनाते 

गीत गाते है 
मिल कर झिगुर 
सावन आया 

वर्षा का मज़ा 
सब को ही आता है 
झिगुर सोचे 

अलका पाण्डेय - मुम्बई अग्निशिखा



अग्निशिखा मंच
तिथि- 4-6-2021
विषय- हायकु सावन पर

1,,,आया सावन
चमके बिजुरिया
डरता मन 

2,,, चूडियाँ हरी 
सावन झूले पड़े 
झूले है गोरी 


3,,, कजरी गाये
सावन में सजनी 
पिया है आये

4,,,माँग सजाया 
पायल छनकाई 
सावन आया

हाइकू

1मेरे सपने
अब होंगे साकार
संग बूंदों के

2 बादल छाए
तेज हवाएं चली
बारिश होगी

3 श्रृंगार किया
उपवन महका
सुकून मिला

4 वर्षा फुहार
भिगोया तन-मन
सुखी जीवन

5, बरखा आई
मन मयूर हुआ
गाएं पपीहा


शोभा रानी तिवारी इन्दौर
नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबीवली 
महाराष्ट्र


हाइकू

1मेरे सपने
अब होंगे साकार
संग बूंदों के

2 बादल छाए
तेज हवाएं चली
बारिश होगी

3 श्रृंगार किया
उपवन महका
सुकून मिला

4 वर्षा फुहार
भिगोया तन-मन
सुखी जीवन

5, बरखा आई
मन मयूर हुआ
गाएं पपीहा

शोभा रानी तिवारी इन्दौर




वीना अचतानी, 
अग्निशिखा मंच को नमन, 
विषय**सावन  ** हाइकू ****
1)  सावन आया 
      वसुधा का ह्रदय 
      खिलखिलाया   ।

2)   है रिमझिम 
       सावन की बारिश 
       शायद तू है  ।

3)    हमें  लगता
        रोया करती शाख
       सावन बिना    ।

3)    पात पात में 
        तरू तरू बोलता
        प्रीत के बोल   ।

4)    वसंती वय
        मंडराते भ्रमर 
       अतृप्त चाह   ।

5)     फूलों  फूलों की 
          खुशबु  से चमन
          झोली भर दे  ।

6)      कटे जब से
          हरे भरे जंगल
          उदास  है सावन   ।

7)       पेड़ों के पते
          झूम झूम डोलते
           हवा से बोलते ।

 8)      वर्षा उदास 
           झूमती झालर सी
            बिन बरसे ।।

9)        नहीं  मनता
            कोई  उत्सव
            सावन के बिना  ।

10)      आया  सावन
            बुलबुल  गाती है
             शायद तू है ।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर (राजस्थान)....

सावन आया
*
सावन आया 
गोरी ने बगिया में
झूला लगाया 
*
सावन आया 
गोरी ने चुनर में 
गोटा सजाया 
*
सावन आया 
गोरी ने हथेली में 
लाली लगाया 
*
सावन आया 
गोरी ने प्रीतम को 
पास बुलाया  
*
सावन आया 
गोरी संग मीत ने 
कजरी गाया

- नागेंद्र कुमार दुबे


माँ शारदे को प्रणाम 
मंच को नमन 
विधा - हाइकु 
विषय - सावन 
 
ऋतु सावन 
अति मनभावन 
हर्षित मन 

उमड़ी घटा 
बादल की र्गजन 
बोले पपीहा 

विरहा मन 
आकुल -व्याकूल सा 
झूमां सावन 

घिरती घटाऐं 
चमकती बिजली 
डरी कामिनी 

नव योवना
का पहला सावन 
मधुर गान 

रमणीं भीगी 
रात हुई नशीली 
बहका मन 

घरती भीगी
सावन भी बरसा 
भीगा अंतस 

सरोज दुगड़
खारूपेटिया , गुवाहटी
असम 
🙏🙏🙏









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हाइकु बाकी 4/6/

WhatsApp

4/6/2021 हाइकु/

हायकु
विषय:-

हायकु
विषय:-
*सावन*
1
सावन आया
उमड़ घुमड़ के
बारिश हुई।
2
जग प्रसन्न
छटा रंगबिरंगी
नाचे मयूर।
3
दादुर गाये
उछल उछल के
बहता पानी।
4
बही बस्तियाँ
टूटे किनारे सभी
मचली नदी।
5
आँगन भरा
कमर तक पानी
छोरी शर्माती ।

@श्रीराम रॉय www.palolife.com


अग्नि शिखा मंच
   .बिषय सावन पर हायकु।
    १
   आई वरषा 
रिमझिम सावन
   वरषा रहा
   .२
दादुर बोले
कूद कूद कर
शोर मचाये
    . ३
धरती हरी
पेड़ मुस्कराये
नाचता मोर
     ४
   जानवर डूबे
   नदी में बाढ़ आई
     तट सब टुटे
          ५
    गाँव डूबा गया
  खेत मे भी पानी
     भरा कमर तक
          ६
   .  बोली नानी
    अनाज भीग गया
     बच्चे मागे रोटी
बृजकिशोरी त्रिपाठी 



*सावन*

सावन ऋतु
भर आया उमंग,
रोमांच धरा।

सावन मास,
कन्या बनी अवनी,
कलियाँ खिली।

हर्षित नेत्र,
फूल अनेक खिले,
मन बहला।

सावन रात
मैना मैनी मिलाप,
जन्नत हर्ष।

दौडे़ कन्याएँ,
तरु लता में झूले,
मुस्काते हुए।

इंतजार में ,
साजन तेरे लिए,
सावन आया।

डाॅ़ सरोजा मेटी लोडाय।


अग्नि. शिखा मंच
दिनांक 4.6.2021
वार शुक्रवार
विषय हायकू

1 नाचन आवे।
केवे आंगन टेड़ा।
बात बनावे।
2 दुख अपना।
में बताऊ किसको।
कोई न सुने।
3 मुहं मे राम।
बगल मे छुरीयां।
कैसे हो भलाः
4 अब उठ जा।
सुबह होने वाली।
आलसी हटा।

दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाईल9425350174


 नमन मंच 

हाइकु 
आया सावन 
साजन याद आये 
नयन भीगे 

भीगे सावन 
दुल्हन शरमाये 
साजन आये 

धरती पर 
उगी  नई फसल 
सावन झड़ी 


उठे उमंग 
मन को  हरषाये 
सावन आये 


स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड



----------------
मेरी चाहत
मिले तुम्हें राहत
दुख दर्द से
**
गंगा की धार
कहती बार-बार
ले लो बहार
**
गांव का घर
भरी बरसात में
देता है डर
**
बड़ा शहर
गांव को लील रहा
बोता जहर
**
मास्क लगाओ
यदि जीना चाहते
दूरी बनाओ
-------+-++
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी 9450186712



सावन ( हाईकू) ओमप्रकाश पाण्डेय
1.सावन आयो
छाये काले बादल
मेघा बरसे

2.कोयल बोले
पपीहा बोले कूं कूं
मनवा झूमे

3.नाचन लागे
आज नर व नारी
गावे कजरी

4.ओढ़ के आज
धरा धानी चुनरी
मचल रही

5.आसमान से
आज बरस रही
मानो अमृत

6.खोल लो दिल
भिंगा लो तन मन
खुशी में आज
( यह मेरी मौलिक रचना है.... ओमप्रकाश पाण्डेय)



नमन मंच 
दिनाँक 4/6/2021
विषय ;-सावन पर  हाइकू
 सावन आया
हर दिल पे छाया।
 झूमे है मन।।1।।
        🌹
मस्ती है छाई 
सावन ऋतु आयी।
मन को भायी।।2।।
        🌹
बरसे मेघा
प्यास बुझी धरा की
 सावन आया।।3।।
       🌹
उठे उमंग 
मन हुआ है चंग 
सावन रंग।।4।।
निहारिका झा🙏🙏🌹🌹


नमन मंच🙏🙏
आज की विधा -हाइक
विषय--सावन
🙏🙏
सवन आया~~
बह चली हवाएँ
मन चंचल

मन मयूर ~~
थिरक रहा झूम
सावनी छटा

विदेशी पिया~~
सावन में गोरिया
विरही बनी

कर श्रृंगार~~
रही दर्पण ताक
कोई न देखे

मन हर्षित~~
आये पी विदेश से
निरखे दृग 

सावन झूला~~
पेंग बढ़ाती तेज़
गोरी चंचल

मेहंदी रची ~~
हांथों को सजाकर 
मुस्करा रही

साजन आये~~
रंध्र रंध्र स्पन्दित
दिल धड़के

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'✍️✍️
नई दिल्लीव



नमन अग्निशेखर मंच
जय माँ शारदे 

मेरा प्रथम प्रयास 

हायकु

सावन आया 
अब तो आजा पिया
 अब तो आजा।

बादल आया 
रिमझिम फुहार 
लाया साथ में। 

तरस रहा
मन में मेरा पिया
अब तो आजा।

दूरी न सही
जाये मन मचला
 मचला जाये।

आंगन लगा
 पिया मन हर्षा जा
 याद दिला जा।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार



।शुक्रवार दिनांक ****४/६/२१
विधा ****हाइकु=( त्रिवली )
विषय****  
          #***सावन***#
               ^^^^^^^^
        
   रुत    सावन  ।।
झुमके आ  गई  रे ।
    मन   भावन  ।। १

    सुमन  खिलें ।।
गले  कलियन  के  ।
    भंवरे    मिले ।।२

     झूले  सखियां ।।
कर   रही   हैैं   सब ।
      प्रेम    बतियां ।।३

      जिया    तरसे ।।
पी  की   याद   आ  रही ।
      नैना      बरसे ।।४

        रंग      बिरंगे ।।
बाग   में    फूल   खिले ।।
         गा  रहे  भृंगे ।।‌५

        बरखा   रानी ।।
   चमके       बिजुरिया ।
        बरसा   पानी ।।६

         दादुर    बोले ।                    
    छेड़े    तान   कोयल ।
          मयूरा   डोले ।।७

         बादल   छाए ।।
     नीले   नभ  से  देखो ।
          जल   बर्साए ।।८

         ओ  घन  कारे ।
जी  न   लगे   पी  बिना ।
          चिट्ठी ले जा रे ।।९

          आया  सावन ।।
     सब  आए   पर  ना ।
          आया  साजन ।।१०

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर 
        महाराष्ट्र ।



*अग्नि शिखा मंच*
            *जय अम्बे, ४/६/२१*
             *हाइकु*
     
            सावन आयो, 
          रिमझिम  बरसे 
             नैना तरसे,

सप्त रंगों से,
इन्द्रधनुष छाए, 
मन को भाए, 

              रंग बिखेरे,
           बादल सुनहरे, 
              मन हर्षाए, 
अंबर पर, 
बिजुरिया चमके, 
दिल धडके, 

            बच्चे तरसे,
         करते मनमानी,
             दौडे घर से, 

पांव डुबोया, 
पानी में छब छब, 
तन भिगोया, 

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏
🌹फिर से लिखा है, जी, 🌹


विषय सावन
विधा हाइकु

सावन आया
ओ मोरे सांवरिया
तू घर आ जा


बैरन रातें
सताए सारी रात
तू घर आ जा

वर्षा की बूंदे
खेतों में हरियाली
छाई बहार

करे इंतजार
दिल है बेकरार
तू घर आ जा

सूनी गलियां
देख दिल तड़पे
तू घर आ जा


कुमकुम वेदसेन




जय मां शारदे
***********
 अग्निशिखा मंच 
**************
दिन- शुक्रवार
 दिनांक -4/6/ 2021 
विषय- सावन 
विधा- *हाइकु* में प्रस्तुत रचना 

आ गए मीत।
मन मेरा गा रहा ।
सावनी गीत। 

घटा है घोर ।
सावन में यौवन।
नाचता मोर ।

सखी सुन री।
पुरवाई है आई ।
ओढ़ें चुनरी ।

दरख़्त कम। 
हरियाली खतम।
सूखा सावन ।

बरखा आई ।
रिमझिम फुहारे ।
मन को भाई ।

रागिनी मित्तल 
कटनी ,मध्य प्रदेश




मंच को नमन🙏

दिनांक 6/ 5/21
दिन शुक्रवार

 हाइकु,

सावन आया
मनभावन छाया
ऐसा लुभाया

गोरी का मन
मन में  है मुस्काती 
झूमती गाती

प्रेमिल जोड़े
चहुँ और बिखरे
सब  हैं झूले

राधा मुरारी
गिरिवर  धारी है
प्रेम पुजारी

स्वरचित,
 सुषमा शुक्ला,
 इंदौर

🌹आया सावन 🌹      
********************

       ओ रे साजन
      आ रे मन भावन
       आया सावन ।
      
        आया सावन 
         झूम झूम झूमें रे
         आजा साजन ।

        तडपत है
        जियरा तुझ बिन
        आश बंधी है ।

         तकत रहूं 
         क्षण क्षण तडपूं 
         पाश बंधा जा ।

         आया रे आया
         सावन झूम कर
          तृष्णा बुझा जा ।

          गले लगा जा 
    ‌‌    तन की प्यास बुझा
        आनंद दे जा ।

        ओ रे साजन 
        आ रे मन भावन
         आया सावन ।
********************
डाॅ. आशालता नायडू.
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
********************



*हाइकु*
होटो पे तेरे 🌹
सदा मेरा नाम हो 🌹
सुबह शाम 🌹

दुर न होना,
कभी मुझसे तुम,
जो राधा श्याम 🌹
मनपसंद 🌹
मुरली कि धुन पे
हो तेरा नाम,

बिछड़े ना यूँ 🌹
 कभी जीवन में 
सदा हो साथ,
बस यही है 🌹
प्रीत जीवन कि
अमरप्रेम🌹
कि धारा बहे🌹
दुनिया याद रखे,
हमारा नाम 🌹
*जनार्दन शर्मा*(आशुकवि लेखक हास्य व्यंग्य ) 
अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर
         
अग्नि शिखा मंच 
विषय -हाइकु 
दिनांक -४-६-२०२१

सावन गीत 
सखियों संग बाजे 
पैंजनिया रे 

पहने धानी
चुनरियाँ गोरियाँ
संग नाचे रे 

मैना खोई
आम्र कुँज कोयल 
मनुहार रे 

मधु यामनी
रात सुहानी आई 
मनमीत रे 

सावन पड़े 
झूले नाचें सखियाँ 
नाचे मोर रे
अनिता शरद झा मुंबई
        🌺शुक्रवार -4/6/ 2021


🌺विषय - हांइकु-सावन -

सावन आए
रिमझिम बरसे
जल की धारा।

दादुर बोलें
तन मन हरसे
नचे मयूरा।।

खुशी कृषक
अब हल जोतेंगे
फसलें बोएं।

वक पंक्तियां
उड़े जल ऊपर
भोजन खोजें।।

नदियां भरी
चली इठला कर
प्लावन आया।

जैसे पतली
युवती तन पर
यौवन छाया।।

घन घमंड
में गरजे तरजे
गज के जैसे।

प्रिय के बिन
बिरही का मन तो
समझे कैसे।।

रात अंधेरी
निशिकर घन में
झांके चपला।

एक अकेली
कोई न घर पर
ताके अबला।।

पपिहा बोले
तरसे बिरहन 
पिया कहां रे।

गरजे घन
ठंडी पुरवा मत। 
जिया जला रे।।
सावन आए
रिमझिम बरसे
अखियां जैसे।

प्रिया अकेली
प्रियतम बाहर
धीरज कैसे।

निमिया पर
झूले भी पड़ गए
बिटिया झूले

राखी हाथों में
बंधवाकर भैया
मन में फूले

सारंग सुन
सारंग की सारंग
सारंग बोल्यो।

सारंग चली
ओट करि सारंग
सारंग निभो।


*************
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता


अग्निशिखा मंच 
4/6/21
हाइकु 

श्याम बोले
 सुनो प्यारी राधा 
सावन आया 

ओ राधा रानी 
हठ  ना कर आजा
  मत तरसा 

 घन  उर में
बिजली है चमके
मन सिहरे

ये नन्हीं बूंदे 
छम छम बरसे 
मन हर्षाए

नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश



*अग्निशिखा मंच*
दिन : *शुक्रवार* 
दिनांक : *4/ 6/21* 
विधा : *हाइकु*

1. दरस दिखा 
जा तू अब तो पिया 
प्यासे हैं नैन।

2. ना देखूँ जो मैं 
तुझे पिया ह्रदय 
  रहे बेचैन।

3. देख के तेरी 
सूरत आता दिल 
को मेरे चैन ।

4. साथ तेरा जो 
पाया मैंने पाया ये
 भी अधिकार।

5. तुझ से प्रीत 
लगाऊँ हरदम 
तू मेरा प्यार।।


*पूनम शर्मा 




सावन पर 
हाइकु बारीश
**********

बारीश आती
हरयाली है छाती
क्या यह भाती।।

बारीश उफ्फ्
हर ओर कीचड़
बिमारी होती।

पेड़ो पे खूब
हरियाली आ नई
कोपलें खिलीं।।

मोर नाचता
बारिश मे पंख को
फैलाता हुआ।।

इन्द्रधनुष
की अनुपम छटा
बहती हवा।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************


शीर्षक-"सावन पर हाईकु"

1.कैसे बीता रे
मेरा यह सावन
मैं हूं  उदास.

आजा सांवरे
देखूं तेरी राह रे
चित्र लिखित .

3. नदिया भी तो
उछले कूदे है रे
 धन बरसे .

4. छले गए हैं
मेरे सपने सारे 
प्रीत के मारे.

5. कैसी अगन
तन मन  झुलसे
बूंदे बरसें .

6. मन के हारे
हार ही गये सब
जीते को जीत .

7. सावन ऋतु  
बड़ी सुहानी लागे

 जागी है  प्रीत .

 स्वरचित हाइकु 
रजनी अग्रवाल जोधपुर

र्मा स्नेहिल*
*सुधार के बाद पुनः प्रस्तुत*


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सावन पर4/6/2021


🦚।हरियाली। 🦚☘️🦋

सावन मे शोभे हरियाली बलम हाथ मेंहदी रचाई दा हो।🧍🏻
मेहंदी लगा द, महावर लगा द🌳🌴🌹☘️☘️🦚🌲
     सावन में   शोभ   हरियाल
रिमझिम बरसे सावन में बदरिया।💦💦💦
धरती ओढे जइसे धानी चुनरिया।।
     अंगे अंगे  सगरो शोभे ना
      बलम - - - -
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
झुलुआ झुलल जाई, सखियां सहेलियां।☔☔🧚🏽‍♂️🧚🏽‍♂️
मीठी मीठी गीतियां, सुनावे कोयलिया।।🦜🦜
     झिरिर झिरिर पुरूवा बहे ना।    
    बलम- - - - -
🦋🦚🌴🌲🌿☘️🍀
अलका दीदी के अपना, झुलुआ झुलाईब।
हरि हरि कजरी पिया, गितीया के गाइब ।।
🦚🦚🦜🐇🦩🌴🎋
     तलवा तलैया शोभे ना
       बलम - - - - -
🌿🌴🌿🦋🌿☘️🦋
उपेन्द्र अजनबी 
सेवराई गाजीपुर उ प्र 
मो - 7985797683



विधा                 कविता
       रचना            नरेन्द्र कुमार शर्मा 
                            भाषा अध्यापक 
        दूरभाष         9418002790


        विषय             सावन


सावन आया मन को भाया 
           बादल आए,रिमझिम बरसे
चारों दिशाओं में अंधेरा छाया।


प्रकृति संवरी हरित रंग में 
            मोर नाचे बादल संग में 
प्रकृति का ये दृश्य मन को भाया।


गर्मी से आतुर धरती नहाई
             झाग से बरसाती सुगंध भाई 
हुई देह धरा की ऐसी कीचड़ छाया।


पृथ्वी का हर कोना भीगा 
             वन में खुलकर सियार चिंगा 
वर्ष में एक बार ये मौसम आया।


                      (अप्रकाशित रचना)




मंच को नमन
विषय:-- *सावन पर हाइकु*

१) अज हूं ना आए बालमा
    सावन बीता जाए हाय।

२) सावन आए या ना आए
   जिया जब झूमे सावन है।

३) गरजत बरसत सावन आयो रे लायो ना अपने संग हमारे बिछड़े बलम को।

४) रिमझिम गिरे सावन,
    सुलग सुलग जाए मन
   भीगे आज इस मौसम में,
   लगी कैसे  ये अगन।
५) रिमझिम के तराने लेके आई बरसात
  याद आए किसी से वो यह ली मुलाकात

विजयेन्द्र मोहन।
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Thursday, 3 June 2021

दोहे कविता चित्र पर लेखन। अग्निशिखा मंच ३/६/२०२१ चित्र पर दोहे_DR ALKA



अग्निशिखा मंच 
३/६/२०२१
चित्र पर दोहे 

अम्मा तौल कर दे रही 
भाजी का बाज़ार । 
बेटा घर मौज  करता 
माँ बेचती अचार ।।

तन मन थक कर चूर है 
बच्चे रहे सब मस्त ।।
हर दिन  बस काम करती 
जीवन होता अस्त ।।

झोला भर कर ला रही 
खेतों से है बीन 
 साथ देती कचोरियाँ 
पैसे लेती गीन  ।।

जीवन के कुछ दिन बचे 
फिर भी करती काम 
दिन भर मेहनत करती 
कभी नहीं आराम 
अलका पाण्डेय मुम्बई

कचरिया वाली अम्मा
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय_चित्र पर कविता
[Image 380.jpg]
पहचाना क्या इन्हें क्या हैं?
मैं बेचूं कचरिया ।
वन _फल है एक ये,
राम_लखन हैं चखिया ।
कान्हा जब धेनु चरावत,
खाए संग राधा_सखियां।१।
भोर भए खेतों में जाऊं,
चुन_चुन कचरिया लाऊं।
कसकर इन्हें पोटली बांधूं,
संग बाट_तराजू लाऊं।२।
यही करत बचपन बित्यो,
बीत गई जवानी,
बुढ़ापे की दहलीज पे आई,
ये परिश्रम की "रानी"।३।
मोहे देख दुखी मत होईयों,
मैं हूं बड़ी स्वाभिमानी,
अपने मन की रानी हूं मैं,
कर सकती हूं मनमानी।४।
बेटा_बहू पे शक ना करियों,
मैं तो रही सदा कंवारी,
पहले बहना,फिर मौसी,
अब अम्मा सबकी प्यारी।५।
अपने काम में बड़ी चतुर हूं,
ना करती बेइमानी,
आत्म_निर्भर रहती मैं,
गलत बात न मानी।६।
चूल्हे की मोटी भाकर खाऊं,
पियूं घड़े का ठंडा पानी,
कुटिया आगे खाट बिछाऊं,
झट आ जाए निंदिया रानी।७।
हर घड़ी जपूं नाम राम का,
उसका एक भरोसा,
जो वो दे दे,माथे से लगा,
खाऊं वो परोसा(थाली)।८।
ना चिंता कुछ खोवे की,
ना लालच कुछ पावे का,
ना मोह धन_दौलत से,
ना डर दुनिया छोड़ जावे का।९।
कोई नाही जगत में अपनो,
यही पुरानी रीति,
ले सको तो ले लियो,
मेरे जीवन से सीख।१०।
बहुत गई, थोड़ी रही,
ये भी बीत जाएगी,
मैं न रहूंगी पर......
तुम्हें याद बहुत आऊंगी।११।
 हैं न?
स्वरचित मौलिक रचना_
रानी अग्रवाल,मुंबई ३_६_२१.

अंग्निशिखा मंच
वर दे माँ वीणा वादनी
     ३/०६/२०
बिषय  चित्र आधारित
बुढी़ माई के बच्चे दिये जब माँ को छोड़।
 बुढी़ माई का दुःख से भीगने
  लगे नयन के कोर।
 माँ बैठी सोचन लगी ये कैसे मेरे बच्चे है।
इनके लिए मै अपना सब सुख  त्यागा है।
पढा़ लिखा कर बडा़ किया है।
 चार पैसा जब हाथ मे आया है।
तब इन्होंने हमको छोड़ कर नया घर बनाया है।
भूल गये दुलार हमारे  भूल गये मेरे कोख के जाये है।
 अब मै क्या करू फिर माँ  .
गई ठाकुर के खेत।
वहा से परवर लेके आई सिर पर धूप बहुत थी तेज।
मै सब्जी बजार मे बेच कर
मेहनत की रोटी खाऊँगी।
बच्चें क्या हमको छोडेगें
मै बच्चों को छोड़ जाऊँगी।
स्वरचित
   बृजकिशोरी त्रिपाठी

मैं अम्मा को समझाती
******************

वृद्धावस्था मे सूझे ना कुछ
बच्चों सी प्रवृत्ति हो जाती
जानता हर कोई ये बात
पर अम्मा बाजार चली आती।।

वो तो मूल्य से अधिक प्यार लुटाती
अम्मा को कहां पता दुनिया
लूट जाती
कहती अम्मा किस्मत ना लूट 
कोई पाऐगा
ये तो खाद्य पदार्थ है सच 
दो दिन तो कोई खाऐगा।

कोरोना के चलते गवाऐ अपने
कैसे भी कर बस पेट पालती
मानवता दुनिया दिखाऐ अम्मा संग
जो इंसानियत को ही पहचानती।।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************

बेबसी

कमर  है मेरी  झुकी  हुई ये, 
फिर भी काम  मैं  करती हूँ। 
सब्जियों  को   बेच-बेचकर, 
अपना यह पेट मैं भरती  हूँ। 

अपना दूध  पिला पिलाकर, 
जिनको  है मैंने बड़ा किया। 
निवाला निज मुंह का देकर, 
जिनको है मैंने खड़ा किया। 

आज  उनके  ही जीवन  में, 
 मैं   भार  बनकर जीती  हूँ। 
अमृत के बदले में  विष की, 
प्याली  आज   मैं  पीती  हूँ। 

कलयुग की  महिमा  कैसी, 
मात-पिता ही अब भार  है। 
जिसके  दो  दो  बेटे वे  भी, 
बेबसी   में    जार-जार   है। 

मात-पिता दस को है पाले, 
एक   पेट  नहीं   पलता  है। 
जिनको  दी जीवन-ज्योति, 
उनको  ही  वह  खलता  है। 

डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश

मंच को नमन 🙏चित्र पर आधारित रचना 🙏
दिन गुरुवार दिनांक ३/६/२१


जर्जर काया स्वाभिमानी,
 कर्म करती निरंतर, सुख-दुख इसके लिए,
 ना रखता कोई अंतर।

आत्मनिर्भरता जवाबदारी है,
 इसी में समझदारी है ,
हर कार्य में वफादारी है,
 करती इसमें इमानदारी हैl

धूप शीत का ना असर है,
 मेहनत जिसकी प्रखर है,
 हर दुख को विसारी है ,
आगे बढ़ती माई न्यारी है🙏
 
कर्म में लीन  है,
 ना यह दीन है,
 नयन में अश्रु भरे हैं, प्रभु को प्यारी है ,
यह माई निराली है

संदेश,,,


 हे नाथ ना कर अनाथ,
 कर्मठता से जूझते रहे ,
दुर्दिन के लिए मुद्रा बचा के रखे,
 हर पल स्वाभिमान से जीते रहे।🙏
 हे नाथ ना कर अनाथ ,।
🌹✒️✒️✒️✒️✒️🌹🌹🌹🌹
सुषमा शुक्ला इंदौर स्वरचित


मंच को नमन
विषय:-- *चित्र पर आधारित कविता*

कोरोना काल में, गांव में बाजार से
खरीददार नहीं जाते।
रास्ते में ही गांव की औरतें
टोकरी में लेकर या घूम घूम कर
सब्जी बेचती है।

एक अम्मा मेरे घर आती है,
मम्मी, अम्मा को निराश नहीं करती
जो भी लेकर आती है पूरा ले लेती है
पैसा लेने से पहले बहुत दुआ देती है।
सब्जी से ज्यादा आशीर्वाद देती है।

मेरी रानी बिटिया के लिए एक केला
अपने आंचल में बांध कर लाती है।
प्यार से  उसे खिलाती है।
पैसा नहीं मांगती।
 कहती हैं,मैं जो,
 मेहनत करती हूं 2 जून की रोटी के लिए
मम्मी 3 जून की रोटी के भरोसा देती है।
तब सब्जी से ज्यादा आशीर्वाद देती है।

मम्मी बोलती है जरूरतमंद को मदद करने से पुन ही पुन होता है।
हमें नहीं जाना है मोल ।

विजयेन्द्र मोहन।

नमन मंच,🙏🙏
आज की विधा-चित्र आधारित कविता

स्वाभिमान से तनी हुई 
आंखों में दृढ़ता बनी हुई,
 मैंने बूढ़ी माँ  को देखा ,
टोकरी ले सब्जी ले बैठी हुई।

घंटो बैठी  कपड़े सिलती।
सब से खुश होकर मिलती,
मैंने बूढ़ी मां को को देखा,
दुःख में भी मुस्कराते हुए।

 प्रभु चरणों में लीन हुई,
उनकी अनन्य सेविका हुईं।
  मैंने बूढ़ी माँ को देखा ,
प्रभु से कुछ बतियाते हुए।

चश्मा आँखों में लगाती हैं,
थोड़ा चलते थक जाती हैं।
कमर है इनकी झुकी हुई,
सब काम स्वयं ही करती हैं।

बेटे बहू के लिए बोझ हुई,
दो रोटी की मोहताज़ हुई।
अपना राह स्वयं निकाला।
आत्मसम्मान से जी रहीं।

रिश्ते कई स्वतः बन गए,
जब अपनों ने ठुकरा दिया।
मैंने बूढ़ी माँ  को देखा ,
लोगों को आशीष देते हुए।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
नई दिल्ली✍️✍️

छवि विचार 


कर्म ही जीवन है ,
 यह सन्देश दे रही अम्मा ,
खुद्दारी और स्वाभिमान की मिशाल है अम्मा ,
सबका रखती  है मान है अम्मा ,
खुद जीती है सम्मान से अम्मा ,
नहीं किसी पर बोझ है अम्मा ,
बुढ़ापे का ग़ौरव है अम्मा ,
उम्र ग़ालिब क्या चीज है ,
 मन का हौसला  और तन की फुर्ती ,
, सब संभव है ,
 ये बता रही  है अम्मा ,
मजबूत है जब मन ,
 तो उम्र बढ़ने का क्या गम , 
कह रही है अम्मा |

स्मिता धिरासरिया  बरपेटा रोड

$$ आत्मनिर्भर $$

हाँ मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
उम्र जरूर हो गई अस्सी 
चेहरे पर अभी भी है हंसी 
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
 सड़क पर बैठी हूँ
लेकर आई खेतों से काचरी 
ले जाओ मैं दे दुंगी सस्ती 
मुँह मे दांत नही पेट मे आंत नही
किसी की मुझे आस नहीं
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
हाथ मे जान नहीं
उठता मुझसे कांटा नही
फिर भी बेच रही  सब्जी हूँ
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
दिखे रास्ते मे कोई मेरे जैसी 
खरीद लेना तुम उससे कुछ भी
मान रह जायेगा उसका
तोड़ नही पायेगा कोई उसको
आत्मनिर्भर बनाना किसी को
होता है बड़ा पुण्य का काम
मत करो अनदेखा कहीं भी
सड़क किनारे बैठे किसी को

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

वीना अचतानी, 
चित्र पर आधारित  कविता ****
 मेरे पड़ौस में, 
रहती है एक बूढ़ी  अम्मा 
चान्दी से बालों वाली 
चान्द पे चरखा 
कातती सी लगती है अम्मा 
करोना में सब अपने गंवाए
फिर भी जीवन से 
न हारी अम्मा 
ओढ़े बूढ़े तन की चदरिया 
सिर पर गठरी लादे
घर घर तरकारी
बेचती अम्मा 
नहीं  करती कोई
मोल भाव
काँपते हाथों  से दे आशीष
सब्जी  तोल देती अम्मा 
हम बच्चों  पर प्यार  लुटाती
शाम होते ही फलों 
पर नमक लगा हमें  खिलाती 
माँ  ने कहा  तरकारी मत बेचो
हम करेंगे तुम्हारी रखवाली 
चेहरे पर गर्व  भरी मुस्कान से
मना करती रही  अम्मा 
हम सबकी कुछ भी नहीँ लगती
पर हमारे लिये  सब कुछ है अम्मा 
काँपते दिये की लौ सी 
आत्मविश्वास से 
भरपूर लगती है अम्मा  ।।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपर (राजस्थान)....

अ. भा. अग्निशिखा मंच
गुरुवार -3/6/ 2021

विषय- चित्र पर कविता


माँ की दुआ न जाती खाली।


सब्जी ले लो कोई भाई, 
मैया ने आवाज लगाई।
पहले सुख से सब थे रहते।
दो बच्चों का पालन करते।।

पति को रोग ले गया भाई।
रोते रहे बच्चे व माई।
कठिनाई से बेटे पाले।
रहते थे खाने के लाले।।

बाद में बन गए अधिकारी।
दिन बदले जब आए नारी।
शादी होकर बहु घर आई।
कठिनाई में हो गई माई।।

अलग हो गए दोनों बच्चे।
अपनी जगह दोनों थे सच्चे।
रह गई थी अकेली माई।
कैसे गुज़रे न थी कमाई।।

बूढ़ी अम्मा कभी न हारी।
विपदा से हारी कब नारी।
वह थोड़े से परवल लाई।
अल्प उठा सकती थी माई।।

धरती पर थी शाक बिछाई।
स्वाभिमानी बड़ी थी माई।
सालन इनसे खरीद ही लेना।
इनको कभी भी दुख न देना।।

माँ बच्चों का पालन करती।
बच्चों को माँ भारी पड़ती।
माँ की दुआ न जाती खाली।
कृपा प्रभु की होती आली।।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश

🌹चित्र पर आधारित🌹     (कविता)

जीवन चलता 
सांसों के बल
जीवन पलता 
पैसों के बल ।
इसलिए ये 
बूढ़ी अम्मा
तौल रही है
परवल की सब्जी।
पाकर पैसे चार
जो हैं उसके                      जीने का आधार ।
जला कर चूल्हा 
बुझाएगी पेट की आग।
जब तक सांस है 
तब तक आस है।
न पूछे बेटा 
न दे बहू खाना 
फिर कैसे जीना ?
ईश्वर उन्हें सुखी रखे 
न आए उनके          जीवन में कभीआंच 
ये है ,मेरे अंतर्मन का
आशीर्वाद ।
क्यों किसी के आगे 
हाथ फैलाऊं  ?
झुकी कमर है
ताकत भी कम है
पर हिम्मत की
कभी नहीं है ।
मान सम्मान से
जीने की शक्ति
अब भी है बाकी। 
इसलिए तो 
बैठ बाजार में 
बेच रही हूं सब्जी।
ये जमाना ऐसा ही है
नहीं पूछता सयानों को कोई ।
बोझ हैं ,समझे जाते 
दुत्कारे व घर से 
निकालें जाते ।
कल जब उनका
बुढापा आएगा 
तब अपनी भूल
समझ पाएगा ।
तब पछताए 
कुछ न हो पाएगा ।
********************
स्वरचित व मौलिक
डाॅ .आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
*******************

नमन  अग्निशिखा मंच 
आयोजन ---चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक --3/6/2021
    🌹आत्मबल🌹
जज्बा तेरा अपरम्पार
नहीं थके तू नहीं रुके तू
मेहनत करती  तू हर बार।
स्वाभिमान है तेरी थाती
आत्मबल तेरा  गहना
इस वय में भी करती श्रम 
तेरी क्षमता अपरम्पार।।
तेरी मेहनत दे हौसला 
जीवन मे कुछ करने का 
पर जैसी संतान जो 
भूल गयी उपकार तेरा।
तू तो माँ है सब सह लेती
बच्चे भी अब सोचें  इक़ पल 
जिस माँ ने था  पाला पोसा 
रखें उसका भी ध्यान जरा।।
निहारिका झा।।🙏🙏🌹🌹

नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
प्रतियोगिता हेतु
दिनाँक-3/6 /2021
चित्र आधारित रचना

सब्जी ले लो, सब्जी ले लो बूढ़ी माँ ने बोला।
मैंने कहा मुझे दे दो काचरी 1 किलो तोला।।

कितने पैसे लोगी अम्मा मुझको यह बतला दो।
जितना तुम दे सकती हो मुझको तुम पकड़ा दो।।

स्वाभिमान से जीती बेटा नहीं हाथ फैलाती।
दूर-दूर खेतों में जाकर काचरी  तोड़ लाती।।

राजस्थानी सब्जी है, ज्वार बाजरे मैं उगती।
थोड़ी कड़वी थोड़ी खट्टी -मीठी स्वाद में यह होती।।

तुम  जो दोगी मैं ले लूंगी मेहनत की मेरी कमाई।
तोड़ते हुए हाथ दुखते चलते हुए पैर दुखाई।।

फिर भी पेट में भूख लगती घरवालों ने निकाला।
कम पैसे देकर चले जाते है मेरा निकालें दिवाला।।

रेखा स्नेहा' कहती सभी से मत कर ओछी हरकत।
दो पैसे तुम बचा लेते हो तो क्या होती उस से बकरक्त।।

किसी गरीब का हक मारी मत करना तुम भैया।
बहुत सारी भूखी रह जाती हमारे घर की मैया।।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

बच्चों के मां बाप  मर गये
कोरोना की भेंट चढ़ गये
उनके पेट की आग बुझाने
अम्मा बीच बाजार है बैठी
भेज रही है हरी सब्जियां ताकि लोग लेकर दे पैसे
उससे चावल दाल आटा ले
टीवी देखो लाल की जाती
दिन भर काम करके यह बूढ़ी अम्मा है थक जाती।
ममता नहीं मानती उसकी
नमस्ते जी है नहीं चुराती। भूख लगे आप पानी बरसे
रोज रोज बाजार है आतीअपने खेत की उगी सब्जियां विक्री 
करके काम चलाती।
इतनी बड़ी उम्र में भी वह दुनिया को है यही सिखाती।
साहस कभी न छोड़ो भैया
अपने जीवन से समझाती।
*******
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी

अग्निशिखा मंच 
विषय---चित्र पर आधारित 
शीर्षक---बूढ़ी अम्मा 
दिनांक---3-6-2021 

ना जाने कैसा यह वक्त है आया 
संगी साथी का साथ जो छूटा 
तो हर कोई हो गया पराया 
जिन बच्चों को जन्म दिया 
उन बच्चों को भी बोझ लगे 
अब मां की जर्जर बूढी़ काया ।

निकल पड़ी खुद धंधा करने 
स्वाभिमान जो मन को भाया
 जब तक सांसे हैं अपनी 
तब तक पेट तो भरना है
खेतों से ले आती सब्जी 
हर मौसम में मेहनत करती ।

 सर्दी गर्मी की परवाह इसे ना 
बारिश में भी कभी ना थकती 
शांत भाव से सदा है रहती
चेहरे पर मुस्कान है रखती
 लेने आता जो भी सब्जी 
इमानदारी से तौल है करती ।
फिर साथ-साथ दिल से जो
 बन आए ग्राहक उसके 
आशीषों से है झोली भरती ।

 हिम्मत और हौंसले से 
वक्त की मार को सहती
नालायक औलादों के लिए भी
हरदम दुआ मन से करती।
वक्त की पुकार,अपनी करो सम्हाल,
आश्रित रहना,आश्रय लेना दुष्कर काम 

 बस मन के अंदर एक दीया 
आस का रोशन करती और
 प्रभु से यही विनती करती 
हाथ पाँव में यूँ ही ताकत देते रहना
 बस जब तक साँसे हैं मेरी 
मोहताज किसी का ना बनने देना
 तेरी ही कृपा दृष्टि से यह 
जीवन गुजर जाएगा 
जीवन की अंतिम बेला में 'रानी'
 हे प्रभु तेरा सिमरन ही साथ निभाएगा ।

                       रानी नारंग

अग्निशिखा मंच
तिथि- 3-6-2021
विषय- चित्र पर कविता


एक दिन देखा मैने, बूढ़ी माँ बैठी सड़क किनारे
थकी सी वह दिखती, चेहरा उतरा भूख के मारे।


थोडे से तो परवल हैं और वो भी पीले पीले 
कौन लेगा इससे सब्जी ,सब उससे कहते।

कोई पास न रूकता ,सब्जी लेने जो जाते।
जिसके मुँह जो भी आता उससे कहते।

बूढ़ी माँ किससे कहे दु:ख अपना
बेटा बहू मरे कोविड से ,छोटा बच्चा रोता उनका।


मैने सारे परवल उससे तुलवाये।
और कोई ना खाये ,मेरी गाय को ये मन भाये।

मैने कहा कल फिर आना और सब्जी लाना।
अपने और अपनी गाय के लिये मुझे है सब्जी ले जाना।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबीवली 
महाराष्ट्र

अग्नि शिखा मंच
दिनांक 3.6.2021
वार गुरुवार
चित्र पर आधारित
सबसे पहले बूढी अम्मा जी कोप्रणाम करता हूं।
सिर पर उठाकर टोकनी,
सब्जी भाजी बेचने के ,
जस्बे को नमन करता हूं।
उम्र आराम करने की,
पर काम कर औरो का जस्बा भी बड़ा रही है।
काचरे को बेचकर,
रोजी रोटी कमा रही है।
बच्चे भले ही लायक ही,
लायक होगें
पर उन्हेभी कुछ सीखा रही है।
किसी के भरोसे जिंदगी न जीना,
यह सारे मानव समाज को सीख दे रही है।
कर्म की महत्ता बड़ा रही है।
मेहनत इस उम्र भी कर ,
स्वयं को बीमारी से दुर रख रही है।
सबसे बड़ी बात अपना स्वाभिमान कायम रख जिंदगी जी रही है।

दिनेश. शर्मा इंदौर
मोबाइल9425350174

स्वाभिमान ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
( चित्र पर आधारित कविता) 
माना आज मैं हूँ अकेला
उम्र मेरी अब ढल चुकी है
कुछ भी नहीं है पास मेरे
पर अपने हाथों के ले सहारा
जिन्दगी जीऊंगां मैं अपने ही बल पर....... 1
हांथ न फैलाया किसी के सामने 
न किसी के सामने सर ही झुकाया
नजरें न मैंने कभी झुकने दिया
न झूठ बोल कर कभी पैसा कमाया
जिन्दगी जिऊंगा मैं अपने ही बल पर........ 2
जब भी अपना हांथ है मैंने बढ़ाया
कुछ न कुछ देने के  लिए ही बढ़ाया
कभी सहारा तो दिखाया रास्ता कभी 
रोका है अन्याय को भी होते हुए
जिन्दगी जिऊंगा मै अपने ही बल पर...... ... 3
काम कोई भी हो छोटा होता नहीं
खुद के बल से जो भी है कमाया
केवल उसी पर होता अपना हक़ है 
सहारा दूसरों का मुझको  तो लेना नहीं
जिन्दगी जिऊंगा मैं अपने ही बल पर.......... 4
( यह मेरी मौलिक रचना है --- ओमप्रकाश पाण्डेय)

कविता

शीर्षक .चित्र आधारित

जिंदगी में हैं तोल के ही मोल है ,
बहुत ही अनमोल , मीरा ने कृष्ण को
" लियो तराजू तोल" यह जीवन है अनमोल, स्त्री पुरुष से प्रकृति दीखे , 
 कहां अजर है बेमोल, जीवन ज्ञापन करने भर को , 
तोले  है कचकोल, स्वर्ण कंगन हाथों में बाजे,
  खरीदे हैं भाव तोल, बूढ़ी लाचार तोलती, किस्मत के तराजू तोल,
 विघ्न हरण सुफल करण ,
दीजो भाव सुमोल,  जिससे  जी उठे यह चोल  , 
खुशहाली छाये चहुं ओर  , 
आए नहीं कभी भूडोल, 
 जीवन का सफल करो भूगोल , 
 छल कपट की खुल जाए पोल , 
दुनिया लाख हो गोलम-गोल , 
वचन भी बोलो तोल के मोल , 
जिंदगी में है तोल के ही मोल.

स्वरचित कविता रजनी अग्रवाल जोधपुर

गुरुवार दिनांक*** ३/६/२१
विधा***** कविता
विषय*** चित्राधारित रचना
                 ^^^^^^^^^^

ऐ  जिंदगी  कितना  तूने ।
       शर्मनाक काम किया ।।
एक   बूढ़ी  मां  का  तूने ।
       आराम  हराम  किया ।।१

जिंदा  रहने   के   लिए  वो ।
        बाजार सब्जी बेच रही ।। 
जीवन गाड़ी को  एक वृद्धा ।
         अकेले  ही  खेंच  रही ।।२

ऐ जिंदगी  वृद्ध तन पर तूने ।
  ज़रासा भी लिहाज़ न किया ।।
शुक्र मान उसका कि उसने ।
  तुझसे ज़िद जि़हाद न किया ।।३

जीवनमें कभी  किसीका भी ।
    ऐसी  दशा  बेहाल ना  हो ।।
ऐसाभी जीना क्या किसीका।
   जीते  जी  इंतकाल ना हो ।।४

अपने भी आज स्वार्थी हो गए ।
    चले गए सब साथ छोड़ के ।।
मोह  माया  में ऐसे फंसे सभी ।
     दूर  हुए सगे  मुंह  मोड़ के ।।५

मेहनत करती भीख नहीं मांगे ।   
  आज भी मां काम  कर रही ।।
देख दुनिया उसकी खुद्दारीको ।
  झुकके दुआ सलाम कर रही।।६


प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर 
        महाराष्ट्र ।

*अग्निशिखा मंच को नमन*
विषय ===
चित्र पर आधारित रचना

        °°°°°°°°°°

  मैं एक असहाय बूढ़ी मां ।
  नहीं काम करने मेरी  उमर।।
  पति बेटेकी जानली कोरोना ने।
  कर दिया  मेरा जीना दूभर ।।१

पेट भरने के लिए ।
  सब्जियां बेचती हूं मैं ।।
   किसी की कृपापर ।
    जीना नहीं मुझे।
      थरथराट हाथोंसे ।
        वजन तोलती हूं मैं ।।२

बूढ़ी जरूर हूं में मगर ।
 अपना पेट भरना जानती हूं ।।
भीख नहीं मांगती किसी से ।
स्वाभिमानसे जीना चाहती हूं।।३

 हां  मैं आज मजबूर  हूं ।
  अपनों से भी बहुत दूर हूं ।।
किस्मत ने भी साथ छोड़ा ।
  दुख दर्दसे  चकनाचूर हूं ।।‌४

आज भी हाथ मेरे सलामत है ।
और कितनी आनी कयामत है ।।        
मैं भी देखूं जरा उसकी जिद को ।
मुझमें आजभी लड़नेकी हिम्मत है।।५।।

कवि ==सुरेंद्र हरडे
                नागपुर महाराष्ट्र
दिनांक:-03/06/2021
दिन:-    गुरुवार

जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच 
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दिन -गुरुवार 
दिनांक -3/6 /2021
चित्र आधारित रचना

लग रही है किसी की दादी,नानी ।
अवस्था कह रही है लाचार कहानी।
उम्र से भी अधिक तराजू का भार है ।
तौलना शौक नहीं पेट की दरकार है। 
कोरोना में खो दिया सारे अपनों को ।
विधाता ने तोड़ा इनके सुनहरे सपनों को ।
दो छोटे-छोटे पोता पोती को जिलाना है। 
इसलिए मुझे तराजू उठाना है ।
सुबह से शाम तक वजन ढोती हूं भारी ।
बाल सफेद हो गए पर छूटी नहीं खुद्दारी ।

रागिनी मित्तल 
कटनी मध्य प्रदेश

नारी शक्ति स्वाभिमान की
दर्द ‌सहती उफ़ तक नहीं करती
अपने स्वाभिमान को छूकने नहीं देती
जिन्दगी भर जिन हाथों ने मेहनत की है
ओ हाथ अब आखिरी पड़ाव ‌मे  कैसे रूकती
परिवार को अपने भरोसे 
अपने जिम्मेदारी में पाला है
 जिन्दगी की हर परीक्षा को पार किया है
 हर परिस्थितियो का डटकर मुकाबला किया है
अपने परिवार को अपने दम पर सींच कर  काबिल बनाया है सबकी जिम्मेदारी जिसने पूरी उम्र उठाई है
सिर्फ कुछ लम्हों के लिए अपनी जिम्मेदारी दूसरे को कैसे उठाने अशक्त दिखती हूं पर अशक्त हूं नहीं
अभी भी मेरे शरीर में शक्ति है
फिर मैं शक्ति हीन नारी कैसे बन बैठू
इसलिए अपनी जिम्मेदारी खुद से उठा रही‌ हूं 
स्वाभिमान से जिन्दगी शुरू की थी ।
 स्वाभिमान से ही जाऊंगी
दो वक्त की रोटी खाकर क्यों अपमान सहूगी
इसलिए अपनी हिस्से की मेहनत खुद कर रही हूं
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।

चित्र पर आधारित
यह हाथ मेरी आन बान और शान है
अपने जीवन का स्वाभिमान हैं
बूढ़ी अम्मा के हाथों है तराजू
हरी-भरी सब्जी को तौल रही है

अपना हाथ है जगन्नाथ
समाज को दे रही है संदेश
आश्रिता कभी ना बनना
कुछ ना कुछ करते रहना
हाथों में जब तक है दम
समाज परिवार में है मान

कभी लगता है परिस्थिति की विवशता
कभी लगता है आत्मनिर्भरता
कारण चाहे जो भी हो
दया भाव करुणा की नहीं है देवी
सम्मान के साथ जीने का हौसला
शारीरिक क्षमता हो जाए कम
हिम्मत साहस से है जीने का दम

कुमकुम वेद सेन

*चित्र आधारित*

लिए हाथ तराजू बूढ़ी मां
तौल रही थी स्वयं को आज
संस्कारों में कमी हुई कहां थी
जो संतानों के रहते है निःसंतान आज!

कितनी रातें जगकर बिताई थीं
कितने सपनो संग पाला था उनको
छोड़ गए आख़िर क्यूं वो एकाकी
हर दुखों से बचाकर रखा था जिनको

मां फिर भी मां है हार नही मानती
इज्जत की रोटी से पेट अपना भरती
तपती है वह दोपहरी के धूप में भले
पर सर ऊंचा कर वह तब भी रहती।

*मीना गोपाल त्रिपाठी*

नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु में मेरी कविता प्रस्तुत करती हूं।
चित्र पर आधारित रचना

विषय-  मा का साया

मैं जीते जी खुद को राजा समझता रहा
पर पता चला मैं राजा की तरह जीता इसलिए क्योंकि 
मुझपर मा का साया रहा।

मैं खुद को ही धनवान समझने लगा पर पता चला 
मैं धनवान इसलिए हू क्योंकि, 
मुझपर मा का हमेशा के
 लिए साया रहा।

मैं खुद को ही अच्छे इन्सान बनने का श्रेय देने लगा 
पर पता चला मैं अच्छा हू, इसलिए क्योंकि, मुझपर मेरे 
मां के संस्कार और 
हमेशा के लिए साया रहा।

मैंने यूही खुद में 
मा को संभालने की भावना 
मन में बिठा कर रखी 
पर पता चला 
मा नहीं बल्कि मैं ही
 उस पर बोझ 
बनकर जीता रहा क्योंकि, 
हमेशा के लिए मेरी मा का 
मुझपर साया रहा।

मा तो उसके
बूढ़ी उम्र में भी कुछ 
चंद पैसे मिलाकर मुझे आर्थिक और मानसिक आधार देती रही और हमेशा के लिए 
मुझपर उसका साया रखती रही।

धन्यवाद
पुणे
अग्निशिखा मंच 
विषय- चित्र आधारित रचना 
शीर्षक- आत्मनिर्भरता है मेरी पूंजी 

भरी दुपहरिया 
उमस है गहरी 
अम्मा बेच रही
सब्जी तरकारी।

एक दिन मैंने 
पूछा अम्मां से 
क्यों बेच रही सब्जी?
क्या घर में नहीं कोई 
कमाने वाला।

वह हंसकर बोली
क्या बताऊं बिटिया-
घर भरा पूरा है 
चार छः नाती पोते हैं 
पर अब कोराना से 
बीमार पड़े हैं।

मैंने कमाकर 
बेटों को रहने को 
घर बना दिए हैं।
आदमी शराबी 
उसे भी शाम को 
देती हूँ दमड़ी 
वह पीकर मस्त रहता। 
मैं जी रही हूं 
आत्मनिर्भरता से, 
जब तक सांस है 
तब तक आस है।
चाहती हूँ-- 
ठीक हो जाएँ पोते- पोती  
यही है मेरी आत्मनिर्भरता 
की मनचाही पूंजी।

डा अँजुल कँसल"कनुप्रिया"
3-6-21

वह बूढी थीगली अंगेछी में ,
व्यस्त थी सब्जी तोलने में।

व्यस्त है मगर स्वस्थ तन से,
बेचती तरकारी खुले मन से।

भूख मिटाने पाई कमाती हे
ईमान से प्रेम वह करती है ।

जरुर वह गरीब माँ होगी, ममता की कमी न होगी।

बोलती हैं अपने पोते से ,
सदा करो कर्म खुशी से।

दो रोटी की कमी न होती,
नेक कमाई तू कर पोती।

 हैं हरी ताजा अनेक सब्जी,
कहती सब को खाओ सब्जी।

खाओ भींडी करती निरोगी,
खिरा से बनोगी सुयोगी।

कहती, आओ भाई खरीदो,
जोश से बुलारही सब को।

वह स्वमभिमान की मूर्ति
बूढी माँ युवाओं की स्फूर्ति।

डाॅ० सरोजा मेटी लोडाय।

अग्निशिखा मंच की प्रस्तुति
 चित्र पर आधारित रचना 🙏🙏
    एक बूढ़ी मां

चार बेटों की अम्मा प्यारी ।
बेच रही घूमकर तरकारी ।।
सब्जी ले लो सब्जी ले लो ।
गलियों गलियों घूम रही है ।।

मेरा ऐसा समय आ गया ।
एक के जी कचरी तोल रही है।।
खेतों से चुन-चुन ले आती ।
ताज़ी ताज़ी मन को भाती ।। 

नहीं कोई है घर में इनके।
बेच रही सब्जी अम्मा है।। 
चार बेटे हैं पर इनके तो। 
सभी के सभी हैं एक निकम्मा।।

अपने बल पर अपने दम पर।
दो पैसों की करती जुगाड़ ।।
कमर झुकी की है बल हीन है।।
साल ओढ़ी है  लगता जाड़।

किसी तरह आत्मनिर्भर बनकर। बेच रही  सब्जी  बाजार।।
ले लो सब्जी ले लो ।
कोई नहीं  मिलता खरीदार। 

अच्छा मोल भाव नहीं मिल पाता। क्या करूं कुछ समझ आता आता।। 
मुश्किल से अपना पेट भरती।
अपनो का याद आ जाता ।।

उपेन्द्र अजनबी 
गाजीपुर उत्तर प्रदेश

चित्र आधारित रचना 
माई 
माई के तराज़ू जीवन धरा है 
न्याय गठरी कचकोल भरा है 
प्रकृति ने सुंदर उपहार दिया है 
अमीरी थाल संग साज सजा है 

माई के तराज़ू न्याय सजा है 
बेंटो के हिस्सों पे प्यार बटा है 
जीवन के पल अनमोल घड़ी है 
वक्त ने कैसा दिन ये दिखाया 

माई की खेती किसानी है   
करती घर रखवाली है 
रेघ में चलती जिंदगानी है 
कर्म ही पूजा धर्म बना है 

माई के हुनर से घर चल रहा है 
देखत नैनो से नीर बहे है 
संगी साथी सब छोड़ गये है 
माई की कुटिया जर्जर पड़ी है 

साग बेच कर घर चल रहा है 
जीवन ने अद्भुत खेल दिखाया 
अनिता शरद झा

🌹🙏अग्नि शिखा मंच को नमन🙏🌹
        🌹चित्र- आधारित  रचना🌹
           🌿दिनांक 3- 6-2021🌿
रचनाकार--डाॅ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार -
🌹
सब्ज़ी  वाली  आई   है-
देखो  क्या-क्या  लाई है!
सुबह सुहानी,आनी- जानी 
बुढ़िया है यह सबकी नानी।
      रोज  सबेरे  मंडी  जाती,
      हरी सब्जियां लेकर आती
      द्वार-द्वार पर घूम-घूमकर- 
      सब्जी की आवाज लगाती।
लाॅकडाउन के कठिन  समय में 
हम  सब  तो  बैठे  हैं  घर  में --
घर  बैठे  सब्जी  मिल  जाती ,
बदले  में  वह --- पैसे   पाती।
       हम सबको कितना सुख देती,
       कभी-कभी वह फल भी लाती
       आम, आँवला,  केले , लीची --
        सस्ते   दामो   में  मिल  जाती।
इसकी  तो  है  बूढ़ी  काया, 
घर  बैठना  नहीं   है  भाया,
देखो,कितना श्रम करती है-
दो  पैसा  अर्जन  करती है ।
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷स्वरचित एवं मौलिक रचना 
       रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार

अग्निशिखा मंच 
नमन मंच
विषय -- चित्र भी चित्र आधारित दिनांक-- 3/6/2021

चार बेटों की माता अम्मा
 बच्चों को कहती है खम्मा
 नाती पोतों के संग वह रहती
  बहुओं की मनमानी सहती !

 अपना दुख किसी से ना कहती  
 सदा खिलखिला कर हंसती रहती 
 कोरोना में सब मंद हो गए 
काम धंधे सब बंद हो गए!
 
अम्मा का परिवार बड़ा था
पापी पेट का सवाल खड़ा था
   बेटों ने अम्मा को खंगाला
कितना जमा किया है दल्ला कह डाला 
अपना-अपना दाना पानी 
तुम्हें भी उठाना होगा अम्मा !

स्वाभिमानी से उम्र गुजारी
 संकट आन पड़ा है भारी
सब्जी बेचकर पेट भरुंगी
दो पैसे दे बेटों की मदद करूंगी !

सुबह सबेरे सब्जी लेकर
स्वाभिमान को तौल रही थी 
यही पूंजी थी मेरी अपनी
कितना मोल है उसका देखूं !

स्वेद का पलड़ा था भारी 
तरकारी बिक गई  सारी
आज का धंधा अच्छा था
कोरोना तो बच्चा था! 

चंद्रिका व्यास
 खारघर नवी मुंबई

यहाँ कोई मुझे कोई माजी कहता कोई अम्मा,
बहु,बेटों ने घरसे निकाला,कहे लाचार निकम्मा,
बुढ़ी हो गई है उमर मेरी,पर हाथ,पैरों में दम है, सब्जी बेचकर दिखलाती नहीं हूं किसी से कम,

जिन बच्चों को पाला,पोसा,उन्हें बेसहारा किया,
मान के कमजोर इस बुढ़िया को ये इनाम दिया, 
मेहनत कश थी,मेहनत करने से,नहीं मै डरुगीं, 
नहीं फैलाउंगी हाथ सामने,मरते दम तक लडुंगी

ईश्वर से मै करुँ प्रार्थना,बस साथ सदा तुम रहना
मां हूं हर दुख सहलूंगी,मेरे बच्चोंको सुखीरखना   
*जनार्दन शर्मा*(आशुकवि लेखक हास्य व्यंग्य ) *अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर*
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