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अखिल भारतीय अग्निशीखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक १०/८/२०२२ को लेख***** जनेऊ पहने के क्या महत्त्व है *****अलका पाण्डेय मुम्बई



जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता है?

भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है।

यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और  यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है।यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

वैदिक धर्म में प्रत्येक  आर्य का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। प्रत्येक  आर्य को जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए।

चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ के नियम :
1.यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

2.यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

4.यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें ।

5.मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है।

 जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।
अलका पाण्डेय मुम्बई 
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[10/08, 8:03 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺 बुधवार 10/8/ 2022
🌺 विषय/    जनेऊ क्या है और इसका क्या महत्त्व है ।

*जनेऊ क्या है और इसका क्या महत्त्व है ।*

जनेऊ क्या है : 
जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। यह तीन धागों वाला सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात् इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। 
जनेऊ में तीन सूत्र –  त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक, देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक, सत्, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के प्रतीक भी। 
जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। अत: कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वार मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है – हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।
जनेऊ की लंबाई : 
जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है क्यूंकि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।
जनेऊ धारण के समय बालक के हाथ में एक दंड होता है। इस दौरान वो बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है और उसके गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन के बाद शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला, कोपीन, दंड : कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड रूप में लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।
बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारक अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए जनेऊ को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसे गुरु दीक्षा के बाद ही धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर इसे बदल लिया जाता है।
गायत्री मंत्र से शुरू होता है ये संस्कार : यज्ञोपवीत संस्कार गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं,
जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व 
1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
2. जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
3. जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
4. जनेऊ को दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
5. दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
6. कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
7. कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
8. जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहती है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
9. जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है।
10. जनेऊ से कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रेन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
© कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता 
[10/08, 8:25 am] 👑मीना त्रिपाठी: *विषय--जनेऊ क्या है और उसका क्या महत्त्व है?*

*जनेऊ क्या है*---जनेऊ तीन धागों के सूत से बना एक पवित्र धागा है। जो हिन्दू धर्म में ब्राह्मणों के लिए एक अनिवार्य संस्कार रहा है।
*जनेऊ का महत्व-*-जनेऊ हमारे सनातन धर्म की पहचान है। हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से सबसे महत्वपूर्ण संस्कार यह माना गया है। यह संस्कार विवाह आदि संस्कारों की तरह ही पूरी विधिविधान के साथ सम्पन्न कराया जाता है। जनेऊ संस्कार को उपनयन संस्कार या व्रतबंध भी कहा जाता है।
    पूर्वकाल में यह विधि मुख्यतः 7 से 9 वर्ष की आयु में कराना ज्यादा उचित माना जाता था। क्योंकि उसके बाद ही बालक गुरु शिक्षा के योग्य माना जाता था। और यही वह आयु होती थी जब बालक को सही गलत, स्वच्छता आदि के बारे में बताने पर वह उस पर अमल कर सकता था। क्योंकि कच्ची मिट्टी को तो मनचाहा आकार दिया जा सकता है पर मिट्टी पकने के बाद लाख चाहने पर भी उसे कोई आकार नही दिया जा सकता। शायद इसी वजह से बाल्यकाल में ही उपनयन संस्कार का विधान तय किया गया होगा। और बालक प्रारंभ से ही स्वच्छता सीख जाता है और वह किसी भी ज्ञान को अर्जित करने के लिए पूर्ण माना जाता है।
      परन्तु, आज हमारे सनातन धर्म की यह परंपरा भी महज़ खानापूर्ति ही रह गई है। और क्योंकि विवाह आदि कोई भी शुभकार्य बिना जनेऊ के पूरे नही हो सकते हैं इसलिए इसे आनन फानन में अब किसी भी उम्र या किसी भी अवसर में इसे अपनी सुविधानुसार कराया जाने लगा है। जो कि सर्वथा गलत है। 
    अतः जनेऊ संस्कार का महत्व प्राचीन काल में भी था और आज भी इसके अनेक वैज्ञानिक कारणों के कारण महत्वपूर्ण बताया गया है।

      *मीना गोपाल त्रिपाठी*
      *10 / 8 / 2022*
[10/08, 8:48 am] Anita झा /रायपुर: विषय - जनेऊ क्या है संस्कृत भाषा में यज्ञोपवीत , व्रतबँध कहा जाता है कपास कच्चे धागे से लम्बाई माप के अनुसार बनाई जाती है पीले ,गुलाबी केशर रंग से 
सभी प्रांतो में अपने रीति रिवाज के साथ धारण शुभ मुहूर्त सूक्ष्म दीर्घ रूप रूप धारण कर ६४ कलाओं 
गले करवाया जाता है ये वृहत आयोजन में ६४ कलाओं ललाओं
और इसका महत्व वेदों .ब्रह्मा विष्णु ,महेश ,सभी रूपों दिखाई देते है पाँच गुरु का अभिमान ज्ञान गुरुजी दे बाटते ब्रह्मचर्य का पालन अपने लक्ष्य तक पहुँच नही जाते जनेऊ के माध्यम से गुरुकुल की शिक्षा गुरुओं द्वारा दी जाती है 
सभी जाति धर्म में जनेऊ की अलग अलग परिभाषाएँ है जो जनेऊ के माध्यम से दी जाती है वेद गायत्री मंत्र दिए जाते है आस्था विश्वास के साथ पिरोया जाता ही । 
आने वाली पीढ़ियों को सबक़ के साथ सिखाया ! 
 अनिता शरद झा
[10/08, 10:18 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: बुधवार 10/8/ 2022
विषय/ जनेऊ क्या है और इसका क्या महत्त्व है ।


जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है जिसे 
हिंदू धर्म के पुरूषों द्वारा धारण जाने वाला तीन धागों वाला सूत्र जनेऊ कहलाता है। हिंदू धर्म में यज्ञोपवीत संस्कार को प्रमुख संस्कारों में से एक है। जनेऊ को पुरुष अपने बाएँ कँधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहनते हैं। इसे बेहद पवित्र माना गया है। इसके लिए कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है।

कुछ लोग जनेऊ संस्‍कार बचपन में और कुछ लोग इसे विवाह से पहले संपन्न कराते हैं। जनेऊ धारण करने के बाद ही बालक को यज्ञ व स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। हालांकि आज की नई पीढ़ी को जनेऊ को आउट ऑफ़ फैशन मानती है लेकिन वास्तव में इसे पहनने के तमाम फायदे हैं।

जनेऊ के तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतीक माना जाता है। साथ ही यह सत्व, रज और तम का भी प्रतीक भी है। यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह जनेऊ नौ तारों से निर्मित होता है। ये नौ तार शरीर के नौ द्वार एक मुख, दो नासिका, दो आँख, दो कान, मल और मूत्र माने गए हैं। इसमें लगी पाँच गाँठें ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक मानी गई हैं। इसलिए जनेऊ को हिन्दू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है और इसकी शुद्धता को बनाए रखने के लिए लिए इसके नियमों का पालन करना जरूरी बताया गया है।
 इसके नियम:-

1. मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व यज्ञोपवीत को
के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ाते हैं और हाथों को साफ़ करने के बाद ही इसे कान से उतारते हैं।

2. यज्ञोपवीत का तार टूटने या 6 माह के बाद इसे बदल देना चाहिए।

3. इससे पहनने के बाद तभी उतारा जाता है, जब आप नया यज्ञोपवीत धारण करना हो।

4. इसके नियमों को पूरी तरह पालन करने में सक्षम व्यक्ति को ही जनेऊ धारण करना चाहिए।

इसके स्वास्थ्य लाभ-
मल-मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक आधार है। इसे कान पर लपेटने से कान के पास से से गुज़रने वाली आंतों से संबंधित नसों पर प्रभाव पड़ता है, जिससे पेट की बीमारियों में लाभ मिलता है। नियमों का पालन करने से बुरे सपने नहीं आते और शरीर में रक्त प्रवाह अच्छी तरह होने के कारण हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की समस्या नहीं होती। व्यक्ति की स्मरण शक्ति बेहतर होती है और विचारों में शुद्धता आती है।

वैष्णोखत्रीवेदिका
जबलपुरमध्यप्रदेश
[10/08, 2:15 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: जनेऊ क्यों पहनते हैं ( परिचर्चा ) -- ओमप्रकाश पाण्डेय
प्राचीन काल में जब बालक गुरु के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाता था, तो उसी समय उसका यज्ञोपवीत संस्कार होता था. जिसमें उसे जनेऊ, जो कि तीन धागों, जो कि हाथ से काते जाते थे, पहनाये जाते थे. इसके साथ ही उसे अपने जीवन में कैसा आचरण करना है, यह बताया जाता था. यज्ञोपवीत कराने का जो निर्धारित आयु है वह सात से नौ वर्ष के बीच का आयु आदर्श आयु है.
ऐसी मान्यता है कि ये तीन धागे तीन ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण व ऋषि ऋण के प्रतीक हैं. तीन गुण सत्, रज व तम के प्रतीक हैं. इनमें पांच गांठे भी होती हैं, जो अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष व ब्रह्म के प्रतीक हैं. 
जनेऊ बांये कंधे ऊपर से लेकर दाहिने भुजा के नीचे से पहनते हैं. शौच इत्यादि करते समय दाहिने कान के ऊपर से इसे हल्के से बांध लेते हैं. पहले यह केवल ब्राहमणों को ही पहनाया जाता था, परन्तु बाद में राजकुमारों का भी यज्ञोपवीत संस्कार होने लगे.
जनेऊ के हर धागे में तीन धागे मिले होते हैं, इस प्रकार जनेऊ में कुल नौ धागे होतें हैं जो शरीर के नौ द्वार के प्रतीक हैं. इसी प्रकार जनेऊ का हमारे वेदों तथा अन्य धार्मिक मान्यताओं से गहरा सम्बन्ध है. वेदों में यज्ञोपवीत संस्कार को जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. जनेऊ का धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है और यह बहुत ही पवित्र धागा है.
[10/08, 3:39 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि -१०-८-२०२२
विषय -जनेऊ क्यों पहनते हैं,इसका क्या महत्व है
जनेऊ बहुत पवित्र धागा माना जाता है। जनेऊ को यज्ञोपवीत , व्रतबंध, ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इस संस्कार को उपनयन संस्कार कहा जाता है। उपनयन का अर्थ है ईश्वर , ज्ञान के पास ले जाना। 
इसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है। इस संस्कार के अंतर्गत ही जनेऊ पहना जाता है। इस संस्कार में पवित्र जल से स्नान और मुंडन भी होता है। 
        यज्ञोपवीत धारण करने वाले को नियम का पालन करना पड़ता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद इसे उतारा नही जा सकता। मैला होने पर इसे उतारकर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। 

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[10/08, 3:49 pm] रवि शंकर कोलते क: बुधवार दिनांक १०/८/२२
विधा*** लेख 
विषय *# जनेऊ क्या है 
             इसका क्या महत्व है*#
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        जनेऊ एक त्रीसुत्री पवित्र धागा है जिसे अधिकारी व्यक्ति ही पहन सकता है, और वह 8/९ वर्ष के बालक को एक धार्मिक विधि जिसे मुंज कहते हैं, करा कर पहनाया जाता है । इस जनेऊ को संस्कृत भाषा में #* यज्ञोपवीत*# कहां जाता है । यह जनेऊ 3 सूत वाले धागे से बनाया जाता है ।
     इस धागे का ऊपर वाला हिस्सा बाएं कंधे में और नीचे वाला हिस्सा दाई कमर तक लटकता हुआ पहना जाता है ।
         यह केवल त्री सूत्री धागाही नहीं है बल्कि एक पवित्र बंधन भी है ।और वह प्रतीक है, ब्रह्मा विष्णु महेश का । यह तीन रुण का प्रतीक है देवगण, पित्रुगण ,ऋषि गण , यह सत रज तमका प्रतीक है , इतना ही नहीं यह जनेऊ गायत्री मंत्र के 3 चरणों का प्रतीक है और तीन आश्रमों का प्रतिक भी ।
     थोड़ा विस्तार से देखा जाए तो जनेऊ के एक एक तार मे तीन तीन तार होते हैं जिनकी कुल संख्या नौ होती है । अर्थात यह नौ संख्या हमारे शरीर के नौ छिद्रों को दर्शाती है जैसे कि मुख ,दो कान ,दो आंखें, दो नासिकाएं , और मल मूत्र के दो छिद्र ।
        जनेऊ धारकने अपने नो छिद्रों द्वारा हमेशा अपने शरीर को स्वच्छ रखना चाहिए ।
      जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है । क्योंकि जनेऊ धारक को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखना चाहिए ।
      64 कलाओं में वास्तु निर्माण व्यंजन कला ,चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण ,सिलाई कढ़ाई बुनाई आभूषण निर्माण ,और कृषि ज्ञान इत्यादि का ज्ञान होना चाहिए ।
       और 32 विद्याआओं मे चार वेद ,चार उपनिषद ,छह अंग छह दर्शन ,तीन सूत्रग्रंथ, और नौ अरण्यक का समावेश है । 
        इसे पहनने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है । कारण इस पवित्र जनेऊ का शरीर के जिन अंगों को स्पर्श होता है वह महत्वपूर्ण अंग स्वस्थ और अबाधित रहते हैं । जैसे कान ह्रदय और गुप्तेंद्रिय स्वस्थ रहती है क्योंकि जनेऊ कान में रखे जाने से कान के पास की महत्वपूर्ण नस गुप्तेंद्रिय तक जाती है ।
        यह जनेऊ हर प्रकार से धारक की रक्षा करता है। स्वस्थ मन स्वस्थ शरीर को रखने में इसकी प्रमुख भूमिका होती है ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[10/08, 4:49 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
*मां शारदे को नमन*
विधा:-- *लेख*
विषय:-- *जनेऊ क्या है, और* *इसकी क्या महत्वता* *है?*

प्राचीन काल में जब बालक गुरु के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाता था, तो उसी समय उसका यज्ञोपवीत संस्कार होता था. जिसमें उसे जनेऊ, जो कि तीन धागों, जो कि हाथ से काते जाते थे, पहनाये जाते थे. इसके साथ ही उसे अपने जीवन में कैसा आचरण करना है, यह बताया जाता था. यज्ञोपवीत कराने का जो निर्धारित आयु है वह सात से नौ वर्ष के बीच का आयु आदर्श आयु है.
ऐसी मान्यता है कि ये तीन धागे तीन ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण व ऋषि ऋण के प्रतीक हैं. तीन गुण सत्, रज व तम के प्रतीक हैं. इनमें पांच गांठे भी होती हैं, जो अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष व ब्रह्म के प्रतीक हैं. 
जनेऊ बांये कंधे ऊपर से लेकर दाहिने भुजा के नीचे से पहनते हैं. शौच इत्यादि करते समय दाहिने कान के ऊपर से इसे हल्के से बांध लेते हैं. पहले यह केवल ब्राहमणों को ही पहनाया जाता था, परन्तु बाद में राजकुमारों का भी यज्ञोपवीत संस्कार होने लगे.
जनेऊ के हर धागे में तीन धागे मिले होते हैं, इस प्रकार जनेऊ में कुल नौ धागे होतें हैं जो शरीर के नौ द्वार के प्रतीक हैं. इसी प्रकार जनेऊ का हमारे वेदों तथा अन्य धार्मिक मान्यताओं से गहरा सम्बन्ध है. वेदों में यज्ञोपवीत संस्कार को जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. जनेऊ का धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है और यह बहुत ही पवित्र धागा है.

विजयेन्द्र मोहन।
[10/08, 4:59 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लेख)
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🌹जनेऊ क्या है और इसका क्या महत्व है? 🌹
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        हमारा भारत देश संस्कारों का देश है ।हमारे देश की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ संस्कृति मानी जाती है ।अगर यह कहा जाए, कि समस्त संसार में हमारी संस्कृति से ही ज्ञानोदय हुआ है ,तो यह अतिशयोक्ति न होगी। क्योंकि विदेशों में आज भी हमारे संस्कारों को सीखा जा रहा है ।वे अपने बच्चों को हमारे संस्कार सिखा रहे हैं।
     ‌ सोलह संस्कारों में जनेऊ भी एक प्रमुख व महत्वपूर्ण संस्कार है, जो ब्राह्मणों में अधिक प्रचलित है। इसे यज्ञोपवीत भी कहा जाता है। ये हाथ से बने धागे से बनता है ,जिसे हल्दी या केसर से पीले रंग में रंगा जाता है ।यह तीन भागों से बनता है ,जिसकी लंबाई 96 उंगली मानी जाती है ।इन तीन धागों में, तीन- तीन धागे होते हैं। कुल नौ धागों से जनेऊ बनाया जाता है। 
जिसे यज्ञोपचार, पूजा-पाठ व मंत्र उच्चारण द्वारा बालक को धारण कराया जाता है। उसके बाएं कंधे से दाहिने हाथ की और नीचे तक पहनाते हैं ।यह जनेऊ बहुत पवित्र माना जाता है, क्योंकि यह तीन धागे ब्रह्मा ,विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं और तीन धागे देव, पितृ, एवं ऋषि के ऋण के धागे होते हैं ।शेष तीन धागे सत, रज व तम के प्रतीक माने जाते हैं। इसमें पांच गठाने होती हैं, जो हमारे पंच इंद्रियों का प्रतीक है। इसे उपनयन संस्कार भी कहा जाता है।
        जनेऊ हम भारतीयों का एक महत्वपूर्ण संस्कार है। प्राचीन काल में इसे बहुत महत्व दिया जाता था। वर्तमान की आधुनिकता में यह महज एक औपचारिकता के रूप में रह गया है।यह 7 से 9 साल के बच्चों को करवाया जाता था।इस संस्कार से बच्चों में स्वच्छता, नियमबध्दता, धार्मिकता ,सच्चाई, ईमानदारी आदि गुणों का सहज निर्माण होता है। इससे वह संस्कारी व सदाचारी बनते हैं। अलावा इसके कई वैज्ञानिक कारण भी हैं, जिससे अनेक लाभ प्राप्त होते हैं ।जनेऊ कान में लपेटने से रक्तचाप व अतडियों की समस्याओं से बचाता है। यह कब्ज एसीडीटी ,हृदय रोग संक्रामक आदि रोगों से भी बचाता है ।इसे धारण करने से धार्मिकता के साथ पवित्रता के भाव का एहसास भी होता है। अतः यह बालकों के जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण व आवश्यक है।
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डॉ.आशालता नायडू.
मुंबई .महाराष्ट्र .
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[10/08, 5:47 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय जनेऊ क्या है जनेऊ का महत्व क्या है

सनातन धर्म में संस्कार की प्रधानता होती है जीवन के 16 संस्कार हैं जिसमें यगोपवित संस्कार एक है।
इस संस्कार में मुंडन के साथ जनेऊ धारण करने की यज्ञ के रूप में बृहद रूप से आयोजन किया जाता है पर अब शहर में यह बात बिल्कुल ही खत्म हो गई है हां गांव वगैरा या कुछ ऐसे जगह या धर्म के लोग हैं जो यगोपवित अवश्य करते हैं और उसकी मान सम्मान की रक्षा करते हैं।
जनेऊ का धार्मिक महत्व यह है कि ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप में तीन धागों से बना हुआ यह जनेऊ रहता है जिसको की एक खास उम्र में संस्कार के रूप में धारण करवाया जाता है धारण करने के बाद दो-तीन बात बहुत महत्वपूर्ण रहती है पहली यह बात होती है कि लघु शंका के समय उसको कान पर चढ़ा लीजिए इसका कुछ वैज्ञानिक महत्व भी है शारीरिक दृष्टिकोण से भी बायोलॉजिकल दृष्टिकोण से भी इसका महत्व है और साथ ही साथ जो लोग जनेऊ धारण किए रहते हैं वह शाकाहारी ज्यादा माने जाते हैं।
जनेऊ पवित्रता का प्रतीक है विशेषकर ब्राह्मण जाति में जनेऊ का धारण करना अत्यंत आवश्यक है जनेऊ देखकर ही लोग कहते हैं आपकी जाति ब्राह्मण है अभी भी वह उनके लिए प्रथा चल रही है पर अन्य लोग इस प्रथा को धीरे-धीरे छोड़ते जा रहे हैं इसके वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए अब लोगों में यह एहसास हो रहा है कि यह धारण करना उचित है। मेडिकल साइंस के अनुसार यगोपवित में जो जनेऊ का धारण किया जाता है उस धागे के माध्यम से शारीरिक ग्रंथियों में संतुलन बना रहता है।
जिन लोगों को कभी हल्दी में कभी के सर में कभी पीले रंग में रंग कर धारण किया जाता है लेकिन जब कोई मृत्यु घर में हो जाती है और उसके बाद जनेऊ बदला जाता है तब वह रंगों में रंगा नहीं रहता है। इस प्रकार वैज्ञानिक धार्मिक और संस्कार के दृष्टिकोण से जनेऊ का जीवन में अत्यधिक महत्व है

कुमकुम वेद सेन
[10/08, 5:53 pm] रानी अग्रवाल: विधा_ लेख _जनेऊ और इसकी महत्वत्ता क्या है?
        "राम,राम,राम"यही शब्द कहे जाते हैं जब _ जब जनेऊ को छूते हैं।इतना तो हम सभी जानते हैं कि जनेऊ कच्चे सूती धागों की पवित्र माला है जो बाएं कंधे की ओर से दाईं ओर कमर तक पानी जाती है।जिसे मातृ, पितृ,गुरु ऋण का, सत, तम,राजस गुणों आदि का प्रतिक माना जाता है ।इसे यज्ञोपवित भी कहा जाता है।यह सनातन धर्म की पुनीत निशानी है।
     जनेऊ का अध्यात्म के साथ_ साथ स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध है।इसे पहनने से बहुत से रोग दूर होते हैं।इससे पाचन क्रिया,रक्त बहाव,श्वसन क्रिया आदि सभी दुरुस्त रहते हैं।
     परंतु इसे पहनने के ,स्वच्छ रखने के कई नियम होते हैं उनका पालन बहुत जरूरी है।बिना नियमों का पालन किए इसका फल प्राप्त नहीं हो सकता।
    जब जनेऊ पहना जाता है तब बड़ी पूजा पाठ के साथ जनेऊ यज्ञोपवित हवन वगैरह किया जाता है।अब बस यही कहना है कि यदि जनेऊ धारण करे तो पूरी श्रद्धा के साथ करें वरना रहने दें।अपने सनातनी,वैदिक परंपराओं में श्रद्धा रखनी चाहिए।
स्वरचित मौलिक लेख___
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[10/08, 5:57 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: जनेऊ क्यों पहनते हैं,इसका क्या महत्व है..?
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   भारतीय संस्कृति में यज्ञोपवित यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है।"उपनयन संस्कार"
की गिनती सोलह संस्कारों में होती है। बहुत से पुरुष बाएं कंधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं।
      हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का अपना ही एक अलग महत्व है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 तरह के अनिवार्य कर्म किए जाते हैं जिसे सनातन धर्म में संस्कार की संज्ञा दी जाती है।
         जनेऊ संस्कार का बहुत ही महत्व है। सनातन धर्म और हिंदू धर्म जनेऊ संस्कार का अपना ही एक महत्व है। हिंदू धर्म में जनेऊ संस्कार का सीधा संबंध ब्रह्मा, विष्णु महेश से है। इसके तीन सूत्र त्रिदेव का प्रतीक माना जाता है।
जनेऊ को ब्रह्मसूत्र माना जाता है।
यदि यह अपवित्र हो जाए तो इसे बदल देना चाहिए।
       वैज्ञानिकों के अनुसार जिन लोगों को बुरे स्वप्न आने की दिक्कत होती है ।वे जनेऊ धारण करके इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।
      जनेऊ धारण करने से कब्ज की दिक्कत कम होती है। स्मरण शक्ति तीव्र होती है और स्मृति को कोष बढ़ता रहता है।
    एक शोध में पाया गया है कि जनेऊ धारी लोगों को दिल संबंधी और ब्लड प्रेशर की बीमारी आम लोगों की तुलना में कम होती है।
     जनेऊ संस्कार का अपना एक वैज्ञानिक महत्व है। चिकित्सीय विज्ञान के अनुसार ,जनेऊ धारी लोग मल -मूत्र के दौरान मुंह बंद करके ही रखते हैं ।जिसके वजह से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणु और कीटाणु के प्रकोप से आसानी से बचा जा सकता है।


डॉ मीना कुमारी परिहार
[10/08, 6:59 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय- जनेऊ क्यों पहनते हैं? इसका क्या महत्व है?

      जनेऊ को उपवीत यज्ञसूत्र व्रतबंध बल बंध मोनीबंध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परंपरा बहुत प्राचीन है। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। वेदों में जनेऊ धारण करने का प्रावधान है।     
     उपनयन का अर्थ है पास या सन्निकट ले जाना। ब्रह्म ईश्वर और ज्ञान के पास ले जाना। यज्ञोपवीत संस्कार भी कहते हैं। मुंडन और पवित्रजल में स्नान भी इस संस्कार के अंग हैं।
       एक बार जनेऊ धारण करने के बाद उतारा नहीं जाता है। मैला होने के बाद उतारने पर तुरंत धारण करते हैं। धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के साथ स्वास्थ्य लाभ भी है।
    जनेऊ में मुख्य रूप से तीन धागे होते हैं- प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय में तीन सूत्र देवऋण पित्रऋण ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं। चतुर्थ में गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। सन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
     धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्ध और पवित्र होता है। कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जागरण होता है।

डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
10-8-22
[10/08, 6:59 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: विधा-लेख
जनेऊ क्या है और इसका महत्व क्या है?

जनेऊ पवित्र धागों से बुना होता है जिसे कंधे से पहना जाता है ये ब्रम्हा विष्णु महेश का प्रतीक होता है ।
        हमारे सोलह संस्कारों में जनेऊ संस्कार का बहुत महत्व है। बालक के आठ वर्ष से बारह वर्ष तक होने के बीच का समय ही सही समय माना जाता है । यह संस्कार बहुत विधि विधान के साथ कार्य संपन्न होते हैं या यूँ कहें एक विवाह की तरह ही इसमें भी हल्दी ,चंदन ,हवन और बारात आदि रश्मों का समावेश होता है केवल दुल्हन की कमी होती है जनेऊ में देवता पितरों एवं अग्नि देवों सभी के समक्ष आशीर्वाद के साथ कार्य होता है इसलिए यह तीन दिनों तक चलता है जनेऊ पहनने के बाद बालक वास्तविक रूप से ब्राम्हण कहलाता है और उसे ब्राम्हण के रूप में गिना जाता है । जनेऊ के समय गुरु मंत्र भी लिया जाता है जिसका सर्वदा पालन किया जाता है । जनेऊ में मुंडन संस्कार भी होते हैं जो किश्तों में होते हैं साथ ही चुटइया भी रखी जाती है जो उसके पांडित्य का परिचायक होती है। 

महत्त्व -जनेऊ पहनने वाले बालक को नियमों में बंधना होता है शाकाहारी रहना होता।गायत्री मंत्र का जाप करना होता और गुरू के प्रति आदर भावना जागृत होती है तो बालक में इतने सारे सद्गुणों का विकास होता है । गायत्री मंत्र में बहुत शक्ति होती है जिससे डर मत नहीं होता तथा सकारात्मक विकास होता है शारीरिक वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टि से जनेऊ ब्राम्हणों के लिए एक पवित्र शक्तशाली माला के जैसा है ।

पल्लवी झा (रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
[10/08, 7:11 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

विधा *लेख*

विषय:-जनेऊ क्या है 
           इसका महत्व क्या है

     हिन्दू धर्म में अनेक संस्कार है
जन्म से लेकर अंतिम संस्कार उसमें से एक यज्ञोपवीत संस्कार जब रामायण महाभारत काल से परंपरागत संस्कारित जब बालक आठ नऊ साल का हो जाता है तब जनेऊ पहनाए जाता एक त्रीसुत्री पवित्र पावन धागा है जब ब्रम्हा विष्णु महेश का लेकिन ऋण का प्रतीक है देवगण पितृगण ऋषि गण यह सत तमका प्रतिक है। जब तब यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हो जाता तब तक विवाह नहीं होता है ऐसा ब्राह्मण समाज में प्रचलन है
      यज्ञोपवीत धारण करने वाले को नियम का कडा पालन करना पड़ता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद उसे उतारा नहीं जा सकता मैला होने पर इसे उतारकर नया यज्ञोपवीत संस्कार करते हैं । जब शौच और पेशाब करने जाते तब इसका कान पर लपेट कर रखा जाता है। 

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक 10/08/2022
[10/08, 7:11 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच 
विषय:" जनेऊ क्यों पहनते हैं "
आलेख 
दिनांक:10/8/22
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   हिन्दु धर्म में जनेऊ पहनने की रीति
है , जिसे यज्ञोपवीत कहा जाता है ।
इसे उपनयन संस्कार के बाद धारण किया जाता है ।
    हिन्दु धर्म में संस्कारों का विशेष महत्व है ,,,,, यह अनुष्ठान एक बड़े समारोह के रूप मे विधि,विधान से संपन्न 
होता है ।पाँच से बारह वर्ष की आयु तक
हर हाल मे बालकों का यज्ञोपवीत संस्कार 
करा दिया जाता है ।
          इसे मंत्रोच्चारित के द्वारा शुद्ध कर 
बालक को आचार्य और पंडित जी के द्वारा पहनाया जाता है,,,बहुत हिदायत भी
दी जाती है,,, ।
 इसे पहनने के बाद बालक भी संस्कारित 
हो जाता है ,,,,जिससे उसके ज्ञान मे अभि
बृद्धि होती है ,,,क्योंकि इससे स्मरण शक्ति और मेधा मे भी इजाफा होता है ।
इस ,यज्ञ को करके परिवार वालों में भी
एक तरह की मजबूती आती है ।यह हिन्दू 
धर्म की खास पहचान भी है ।
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डाॅ पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर
 बिहार 
🌹🙏

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