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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 8/8/2022 को बाल गीत विषय ****पंखा पर**** रचनाकारों की रचनाएं पढ़ें ******"""""""""""***डॉ अलका पांडे मुंबई



पंखा

पंखे की कहानी बड़ी है निराली। नाना प्रकार के पंखे हैं ।।
जैसा चाहो पा लो तुम ।
शहरों में रहने वाले बिजली के पंखे चलाते हैं ।।
 गर्मी को दूर भगाते हैं
 गांव में रहने वाले हाथ का पंखा झलते हैं ।।
 कितने प्रकार के पंखे कुछ छत पर लटकते हैं ।
कुछ हाथ से चलते हैं ।।
कुछ कोने में खड़े रहते हैं।
दूर-दूर तक हवा फेंक देते है।।
 सब को राहत देते हैं तन मन की गर्मी को शांत करते हैं
 लोग पंखे की हवा का आनंद लेते हैं।।
गर्मी के मौसम में बहुत राहत देता है ।
दादी नानी पंखे को हाथों से झलती थी ।।
फर फर फर फर करके चलता है
बिजली का पंखा शोर मचाता है।।
  हाथों के पंखे तो सुंदर-सुंदर बनते हैं ।
नाना प्रकार के चित्र भी उन पर रहते हैं ।।
बच्चों को यह बहुत लुभाते हैं। बिजली जाने पर यही काम में आते हैं। ।
अलका पाण्डेय e

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[08/08, 8:34 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺सोमवार /8/8/2022
🌺समय - सुबह ८ से शाम ७ बजे तक 
🌺 आज का /पंखा 
🌺 बाल गीत 

पंखा

फर फर फर फर चलता पंखा
हवा सभी पर झलता पंखा।

जब गर्मी का मौसम आए
घर घर चलने लगता पंखा।

दादी नानी यह बतलाती
हाथों में था रहता पंखा।

खजूर पत्ती औ' सिरकी से
गत्ते से था बनता पंखा।

कूलर में पानी पड़ता है
पर उसमें भी लगता पंखा।

जब घर में ऐ.सी. लग जाता
तब फीका पड़ जाता पंखा।

टेबल पंखा सीलिंग पंखा
दीवारों पर लगता पंखा।

कमरे में तूफान चला दे
फर्राटा कहलाता पंखा।

जो हो गर्मी के मौसम में
शीतलता पहुंचाता पंखा।  000
© डा.कुंवर वीर सिंह मार्तंड,कोलकाता 
——————————
[08/08, 9:30 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺सोमवार /8/8/2022
🌺समय - सुबह ८ से शाम ७ बजे तक 
🌺 आज का /पंखा 
🌺 बाल गीत 

पंखा

फर फर फर फर चलता पंखा
हवा सभी पर झलता पंखा।

जब गर्मी का मौसम आए
घर घर चलने लगता पंखा।

दादी नानी यह बतलाती
हाथों में था रहता पंखा।

खजूर पत्ती औ' सिरकी से
गत्ते से था बनता पंखा।

कूलर में पानी पड़ता है
पर उसमें भी लगता पंखा।

जब घर में ऐ.सी. लग जाता
तब फीका पड़ जाता पंखा।

टेबल पंखा सीलिंग पंखा
दीवारों पर लगता पंखा।

कमरे में तूफान चला दे
फर्राटा कहलाता पंखा।

जो हो गर्मी के मौसम में
शीतलता पहुंचाता पंखा।  000
© डा.कुंवर वीर सिंह मार्तंड,कोलकाता 
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[08/08, 9:34 am] 👑मीना त्रिपाठी: *पंखा ( बालगीत )*

पहली बार टिल्लू के गांव में
आई बिजली और चला था पंखा
कभी डोलता धीरे - धीरे , तो
कभी हवा सा चलता पंखा!

दादी कहा करती थी टिल्लू से
लोग शहरों में खरीदते हैं हवा
और हमें ईश्वर ने दिया है देखो
कितना विस्तृत पंखे का हवा!

एक दिन टिल्लू के पंखे में गौरैया ने
तिनका-तिनका कर बनाया घोसला
अब तो टिल्लू बड़ा था परेशान
कैसे हवा सा अब चलेगा पंखा!

बड़ी उमस थी, बड़ी थी गरमी
मगर कोई चलाये न तब भी पंखा!
एक दिन उंड गई बच्चों केसंग चिड़िया
छोड़ गई टिल्लू का पंखा!

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
[08/08, 10:42 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *बालगीत*
शीर्षक:-- *पंखा*

गरमी आया-गरमी आया
चलो दादी संग सोने उनके
हाथों में है खजूर पत्ते के पंखा
दादी हवा लेती है पंखे को हाथ
से हीला-हीला कर हमलोग भी दादी संग के सोने जा रहे सुनो मम्मी-पापा।
पापा मम्मी जी बोले जाओ इस वर्ष गांव में बिजली आ रहा है अपना घर में बिजली आएंगे
बिजली का पंखा लाएंगे मेरा राज दुलारा और मेरी परी के
कमरे में बिजली के पंखे लगे गए गर्मी में ठंडक ठंडक हवा आएगा आराम से सोएंगे
सुनकर बेटी बेटा खुश हो
कर नाचने लगे।

विजयेन्द्र मोहन।
[08/08, 11:19 am] रवि शंकर कोलते क: सोमवार दिनांक ८/८/२२
विधा****** बाल गीत
विषय******#*** पंखा***#
                       °°°°°°°°°°°

बहुत गर्मी हो रही मां चलाव पंखा ।
नींद नहीं आए क्यों बंद है पंखा ।।
इस बिजलीको भी अभी जाना था ।
क्या करूं घरमें भी नहीं हाथ पंखा ।।१

ऐसा हो पंखा जो बिजली बिन चले ।
दिन हो छोटाऔर जल्दी सांझ ढले ।।
सुनो दोस्तों अब ऐसा लगता है कि हम ।
अब तुरंत कश्मीर या शिमला चले ।।२

भीषण गर्मी में पंखे भी काम न करें ।
सूरज की तेज गर्मीसे पशु पक्षी मरे ।।
बेचारे पंखे भी थकते हैं चल चल के ।
ना हिल डोल रहे ये वृक्ष भी हरे हरे ।।३

चलो दोस्तों हम झाड़ के नीचे बैठेंगे ।
हम पत्थर सेतोड़कर हरे आम खाएंगे ।।
शाम ढलने तक खेलेंगे कुदेंगे हम सब ।
रात को नदीकी ठंडी रेतपर हम सोएंगे ।।४

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[08/08, 11:24 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: 8 aug 2022
पंखा (बालगीत)

गर्मी आई गर्मी आई।
पंखे से है दूर भगाई।
पंखे कई किस्म के होते। 
सफेद नीले पीले होते।।

बचपन से हम इसे बनाते।
रंगीन पंखे हैं लहराते।
पंखा ठंडी हवा खिलाता।
यह है सबके मन को भाता।।

पंखे हम बचपन से बनाते।
कागज़ व पत्तों को झूलाते।
ये सब ठंडी हवा है देते।
ये सुकून से हमें भर देते।।

अब बिजली से पंखे चलते।
इसमें सबके सपने पलते।
अब घरों में ए सी लगाते।
फिर भी लोग चैन नहीं पाते।।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुरमध्यप्रदेश
[08/08, 11:38 am] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: पंखा ( बालगीत) - ओमप्रकाश पाण्डेय
देखो आया गर्मी का मौसम 
सूरज ने बढ़ाई अपनी गर्मी 
चारों ओर है गर्मी ही गर्मी
बस पंखे से ही मिलता राहत ........ 1
बिजली से चलता है पंखा
खूब हवा सबको देता है पंखा
मन चाहे तो तेज चलाओ पंखा
 मन चाहे तो चलाओ धीरे धीरे पंखा......... 2
पर गाँव में मेरे बिजली नहीं 
दादी हाथों से ही चलाती पंखा 
वहाँ ताड़ के पत्तों का होता पंखा 
हाथों से धीरे धीरे चलाती पंखा ......... 3
जो छत से लटके सीलिंग पंखा
टेबल के ऊपर रखा टेबल पंखा
कूलर में भी होता बड़ा पंखा
तरह तरह का होता है पंखा........ 4
पंखा से तो भागता गर्मी
पंखा से ही तो मिलता हवा ठंडी 
सन सन जब भी पंखा चलता
तब सारा जग आराम से सोता....... 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[08/08, 11:41 am] शोभा रानी तिवारी इंदौर: पंखा

 यह पंखा बड़े काम का गर्मी से राहत देता है, इसकी हवाअच्छी लगती सबके मन को भाता है जब हम बाहर से आते हैं पंखे से राहत पाते हैं जब लाइट चली जाती है हम व्याकुल हो जाते हैं।

 पहले बांस का पंखा होता हाथसे पंखा करते थे बड़े जब खाना खाते थे हाथ से उसको झलते थे धूप में नखेलो चुन्नू मुन्नू आओ पंखे के नीचे बैठेंगे घर में हम मस्ती करेंगे लस्सी और शरबत पिएंगे।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर
[08/08, 11:57 am] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 8अगस्त 2022 दिन सोमवार विषय पंखा बाल गीत। गर्मी में लगते प्यारे। काम करें सबसे न्यारे ।। जब हमको गर्मी लगती। पंखें की चाहत जगती।।खुशी मनाते जब चलतें। मनमें वे तनु ना खलते।। बिजली के चले जाने से। हिलते नहीं हिलाने से ।। गुस्सा लगे तोड डारे। चलते हो तब लगे प्यारे।। ‌‌ डॉ देवीदीन अविनाशी हमीरपुर उप्र
[08/08, 1:38 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (बाल गीत)
            पंखा
🎡🎡🎡🎡🎡🎡

गर्मी से, राहत देता है पंखा, गर्मी के मौसम में , घर-घर चलता है पंखा , घर के हर कमरे में, रहता है पंखा ।

बच्चे खेल के आते, पंखे के सामने बैठ 
राहत पाते ,
पंखे बिन चैन नहीं, गर्मी से मुक्ति नहीं ।

बिजली से, चलता है पंखा , न हो बिजली तो , हाथ पंखा , देता है राहत ।

पंनचक्की में , चलते हैं पंखे , जिससे बनती है, , बिजली बच्चों । खेतों में भी, धान उड़ाने में , काम आता है पंखा ।

कूलर में भी, लगता है पंखा , ठंडी हवा , देता है पंखा , जब ए सी, लग जाता घर में , फीका पड़ जाता पंखा।

पार्टियों में , बहुत काम आता पंखा
उमस से ,
मुक्ति दिलाता पंखा ।

बच्चे कागज का
पंखा बनाते,
पंखा बना कर, खुश हो जाते,
दादा दादी को, अपने पंखे से ,
पंखा झलते,
दादा दादी भी, खुश हो जाते।
******************
डॉ .आशालता नायडू.
मुंबई.महाराष्ट्र.
*******************
[08/08, 2:05 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि -८-८-२०२२
विषय - पंखा बाल गीत

सुंदर पंखे तुम हो दोस्त मेरे 
जब गर्मी हो मेरा साथ देते 
ठंडी ठंडी हवा हो झलते
सुंदर पंखे मेरे हाथ में सजते
पर एक शिक़ायत मुझे पापा और दादा से भी है। 
जब जब बिजली चली जाती है
तुमको मेरे हाथ में थमा दिया जाता है
और जल्दी जल्दी हवा झलने कहते हैं। 
जब जब गर्मी जोर से पड़ती 
 पेड़ के पत्ते तेज हवा में करते मस्ती 
हम बच्चे जोर चिल्लाते 
देखो भगवान भी पंखा झलते। 

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[08/08, 2:08 pm] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: १९शदी में सन् ६०तक सहर
 में भी सबके पास बिजली नही थी पर बड़ा परिवार था।
     बिषय -ताड़ का पंखा
   विधा। -कविता 

हम जब छोटे थे तब ताड़ के
पंखे होते थे।
गर्मी का जब सिजन आये सबके हाथो में ताड़ के पंखा दिखते थे।
गर्मी मे नानी दादी के हाथो में पंखा हमेसा रहते थे।
हम सब जाकर दादी के पास सुखद हवा मे सोते थे।

 तरह तरह की ज्ञान की बाते दादी हमे बताती थी।
हम बच्चे जब आपस में लड़ते दादी ही सुलह कराती
 थी।
 दोपहरी में बाहर से खेल के जब हम आते माँ के मार से दादी हमे बचाती थी।

अब तो आया बिजली का पंखा दूर कर दिया अपनो से।
दादी मेरी अकेले ही बतियाती अपने आप से।
मै सोचती बचपन अपना कितना सच्चा कितना प्यारा था।
बडे़ बुढो़ को भी अपना जीना बहुत सुहाया था।
पंखे तो बने थे ताड़ के पर दादी के हाथ की हवा हम बच्चो को बहुत प्यारा था।
ए ,सी में बैठे बैठे मैने बचपन अपना जी लिया।
दादी नानी के प्यार को मन ही मन महसुस किया।

 बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ
 भानुजा गोरखपुर यू.पी
[08/08, 4:09 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: बालगीत -पंखा 

जब भी हमें गर्मी सताये,
हम पंखे के नीचे आयें।
गोल-गोल जब पंखा घूमे,
मजा हवा का हम भी ले-लें।

बिजली से मेरा पंखा चलता,
मित्र के घर बैटरी से चलता ।
बिजली ,पंखा जिनके घर नहीं होते,
हाथ के पंखे हिलाकर हवा करते।

जब मेरी मां रसोई में खाना पकाती,
पसीने से भीग कर लथपथ हो जाती।
झट आकर वह फिर पंखा चलाती ,
ठंडी हवा से खुश हो राहत पाती ।

पल्लवी झा 
रायपुर छत्तीसगढ़
[08/08, 4:18 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच 
विषय: पंखा
बालगीत 
दिनांक :8/8/22
=========================
यह है ताड़ का पंखा
हवा बहुत देता है ।
अब आया है पंखा ऐसा
जो बिजली पर चलता है।

याद आती तब उस पंखे की 
जब बिजली गुल हो जाती
फिर से वही पंखे की हवा
हम सबको बहुत है भाती ।
 
बहुत अधिक गरमी पड़ने पर
पंखा ही है त्राण दिलाता ।
तन से बहुत छूट रहे पसीने ,
को सूखा -सूखा है जाता ।
========================
 स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर 
बिहार
[08/08, 4:26 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: पंखा (बाल कविता)
*******************
जी हां , मैं पंखा हूं
मैं हूं तीन , चार पंखों वाला 
चाहे जितनी हो गर्मी
बटन दबाओ मैं फर-फर चलने लगता हूं
हवा सुहानी कमरों में फैलाता हूं कभी सुस्ती नहीं दिखाता हूं
मीठी ठंडी हवा से बच्चों को सुलाता हूं
अब इन्द्रधनुषी रंगों में बाजार में मिल जाता हूं
मुझे चलते देख बच्चे और बूढ़े
खुश हो जाते हैं
जब मैं चलने लगता हूं
गर्मी से राहत पहुंचाता हूं
कितनी भी हो गर्मी बाहर
झट से कमरा ठंडा कर देता हूं
मैं हूं अद्भुत पक्षी के जैसा
तीन , चार पंखों वाला
घर में सुहानी हवा भर देता हूं
जी हां मैं अद्भुत पंखा हूं

डॉ मीना कुमारी परिहार
[08/08, 4:30 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-पंखा
विधा;--बालगीत
दिनाँक-8/8/2022
  🎡पँखा
पंखे के होते कई रूप
पत्ते वाला ,हाथ वाला
और ये होता बिजली वाला
हर रूपों में होता है यह 
ठंडी हवा को देने वाला
गर्मी हो चाहे वर्षा
पंखे बिन हम न रह पाते
एक मिनट जो लाइट गोल हो
बिन पंखे बेबस हो जाते।
इस पंखे की हवा को पाने 
कितने जतन हम आजमाते।।
 कभी घूमते कभी घुमाते
पंखे सँग हम खुश हो जाते।।
पंखे.....।।।।
निहारिका झा
खैरागढ़ राज .(36 गढ़)
[08/08, 4:40 pm] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: नमन मंच🙏🙏
विषय - पंखा
विधा - बाल गीत

आया गर्मी का महीना,
बिन पंखा मुश्किल हो जीना।
चाहे कितनी बार नहा लो,
हरदम आता रहे पसीना।

जब कहीं बाहर से आते,
जल्दी से इसका बटन दबाते।
फर फर फर फर पंखा चलता,
तन मन दोनों शीतल होता।

कमरा ठंडा हो जाता है,
गर्मी से पंगा हो जाता है।
जब तक हम पंखे में बैठें,.
 गर्मी नानी से मुँह ऐंठे।

पर जैसे ही बिजली जाती,
गर्मी नानी सिर चढ़ जाती।
कहती बनते बहुत सयाने,
अब कैसे भागोगे जानें।

सचमुच गर्मी दुखदायी है,
साथ पंखे का सुखदायी है।
ये है प्यारा मित्र हमारा,
गर्मी भर ये बने सहारा।

पंखा कई दौर से गुजरा,
पत्ते से बिजली तक पहुँचा।
बिजली जाने पर हाथ का पँखा,
झलती रहती दादी अम्मा।

हम भी उनके पास सो जाते,
ठंडी हवा का सुख पा जाते।
पंखा झलने से बच जाते,
मीठी निद्रा में खो जाते।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
[08/08, 5:11 pm] रानी अग्रवाल: बालगीत_ मेरा प्यारा पंखा।
८_८_२०२२,सोमवार।

बढ़ती गर्मी की दवा,
देता ठंडी_ ठंडी हवा।
बहे जब गर्मी से पसीना,
जरा प्यारा पंखा चला देना।
कर दिया सारी थकान दूर,
जब थकावट से हों मजबूर।
हाथ के पंखे का गया ज़माना,
बिजली पंखे का आया जमाना।
जमीन पे खड़ा होता स्टैंड वाला
छतवाला होता ,होता मेज वाला
इसकी हवा से मिलती राहत,
वरना गर्मी बनती आफत।
जब बिजली गुल हो जाए,
सारा घर परेशान हो जाए।
फिर खट_ खट देती सुनाई,
चिल्लाते हम" बिजली आई"।
ठंडी_ ठंडी हवा फिर खाते,
पंखे नीचे बैठ खून बतियाते।
इसका हम पर बड़ा उपकार,
अपने पंखे से मुझे बड़ा प्यार।
स्वरचित मौलिक बालगीत____
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[08/08, 5:14 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय पंखा बाल गीत

गांव हो या शहर पंखा चले घर घर
आई गर्मी निकला पसीना
याद आया सबको अपना पंखा

पंखे ने भी मुस्कुराया और कहा
बिजली का पंखा चाहिए
बैटरी का पंखा चाहिए
तार का पंखा चाहिए

कुछ कुछ घरों में तार का पंखा
से झलते रहते हैं हवा
बिजली हो गई गुल
बिजली के पंखे हो गए बंद
याद आया तार के पंखे
चलो इन्हीं पंखों से काम चलाएं

पंखे की हवा लगती है प्यारी
क्योंकि तन मन की गर्मी दूर भगाएं
चैन की सांस लेकर खुशियां मनाई
आओ पंखे तुम्हें घरों में सजा दूं

कुमकुम वेद सेन
[08/08, 5:59 pm] Anita झा /रायपुर: बाल गीत 
विषय -पँखा
शीर्षक -पँखा

मेरी प्यारी सुहानी बिटिया 
रंग बिरंगे पँख लगायें 
गर्मी से राहत पहुँचाने 
परी बन उड़ आई है 

नित्य गीत संग मन मोहती 
घर ,मूँढेर छत पर बैठती 
संग साथ सहेलियों लाती ।
मौसम की फुहार लाती 

कोयल राग गीत सुनाती है 
पँख लगायें झल झल राहत देती
देख देख हम ख़ुश हो जाते 
बूढ़ों का मन बहलाती है 

नव रूप रंग देख सबके मनभाती है 
ख़ुश देख हमें बिटिया रानी 
फुर्र फुर्र उड़ आती जाती

 मेरी प्यारी सुहानी बिटिया 
रंग बिरंगे पँख लगायें 
गर्मी से राहत पहुँचाने 
परी बन उड़ आई है 

अनिता शरद झा
[08/08, 6:59 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय -पंखा (बाल कविता)

गांव में झलते पंखा 
शहर में चलता पंखा 
गर्मी में बहता पसीना 
पंखा सुखाता चलता।

दादी बुआ झलती पंखा 
गीत, लोक- गीत सुनाती 
दादी गाती मेरा प्यारा पंखा 
जल्दी से मेरी गर्मी भगा जा।

गांव में पंखे का है सहारा 
रंग बिरंगा लगता मनभावना 
पंखे ये पंखे तू आजा मेरे पास 
मैं झलती रहूं तू है मेरा खास।

शहर में कूलर देते राहत
साथ में ए सी भी देते साथ 
बिजली से चलते हैं यह सब 
बिजली गई यह पड़ते ठंडे सब।

गर्मी बहाती पसीना झर झर 
पंखा घूम घूम चलता फर फर 
आओ बच्चों, बैठो पंखे के नीचे 
छत से बातें करो,ऊपर देख कर।
 
डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
8-8-22
[08/08, 7:18 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *बालगीत पंखा*

गर्मी का मौसम नहीं है
सावन का महिना है।
फिर भी गर्मी हो रही है 
चिंटू बोला मम्मी पंखा लगाओ।

बिजली के खोज ने बडा 
काम किया बटन दबाओ
फिर पंखे की ठंडी हवा लो
नहीं होता पंखा आफत आती।२।

चिंटू बडा खुश हुआ 
मम्मी ने कहा जब नहीं
पंखे की जरूरत जल्दी
बंद कर देना उर्जा बचाओ।३।

चिंटू ने मम्मी की बात सुनी
सुबह उठा तो पंखा बंद
करके देश की उर्जा बचाई।
पापा ने चिंटू मेरा बड़ा सयाना।।४।

सुरेंद्र हरडे
नागपुर 
दिनांक ०८/०८/२०२२

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