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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 30/6/ 2022 को दिए गए ***चित्र"*** पर रचनाकारों की रचनाएं पढ़ें ****डॉ अलका पांडे मुंबई



वनवासी 


हम वनवासी पति पत्नी ,रहते है वन में ।
काम करते शहर में हमे प्रकृति से  प्रेम बहुत है ।।
शहर वाले अजीब नजरो से देखे हमे ।
हम पति-पत्नी हर सुख दुख मिलकर सहते हैं ।।

कंदमूल फल खाकर जीवन यापन करते हैं।
हाथों में लेकर झाड़ू  हम सफाई करते हैं।।
पत्तों से ही  प्यारी सी छतरी बनाई है ।
 धूप वर्षा में हमारी करती वो सुरक्षा है ।।

हम वनवासी है , प्रकृति से जीवन पाते है।
प्रकृति हमारा पेट भर्ती , अपनी गोद में सुलाती है।।
पेड़ो की डाली से , सूखे पत्तो से झोपड़ा बनाते है ।
पत्तो से ही हम ना ना प्रकार परिधान बना तन ढकते है। 

कलियों और फूलों के  जेवर बना कर श्रृंगार करते है।
प्रकृति के ही उत्पादन से ही व्यापार करते है। 
दिन भर परिश्रम करना
और वसुंधरा की गोद में विश्राम करना ।।
ठंडी ठंडी हवा के झोका में सो जाना ।
सपनों की दुनिया में फिर खो जाना। ।

अलका पाण्डेय मुम्बई

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[30/06, 8:57 am] रामेश्वर गुप्ता के के: अग्नि शिखा मंच। 
चित्र आधारित कविता। 
दिनांक 29-06-2022 
   । वन्य रस। 
आदिवासियों का जीवन,
कितना सरल वन्य रस है।
पत्तो का पहनावा बढिया,
पत्तो का ये छाता सरस है।।
आदिवासियों.............. 1
पति पत्नी का सुन्दर जोडा, 
साथ कर्म का सुअवसर है।
जो मिल जाता इस जंगल में,
वही प्रेम का सब साधन है।। 
आदिवासियों.................2
फूलों की माला दोनों पहने,
क्या जोड़ा यहां बन में है।
इस जीवन से दोनों खुश है.
हराभरा का छाया ये बन है।। 
आदिवासियों................ 3
जंगल में दोनों मंगल करते,
नहीं चाहिये शहर फीका है।
इन सबकी अलग है दुनिया,
नहीं यहाँ कोई आडम्बर है।।
आदिवासियों.................4
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[30/06, 10:18 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: गुरुवार//30//6/2022
विषय- चित्र पर कविता
हर चित्र कुछ कहता है 

वनवासी

पहनने को कपड़े न होते, 
ज़रा मलाल न करते हैं।
पत्तों वाले वस्त्र पहन कर, 
अपना तन वो ढकते हैं

शिकार कंद मूल बीज खाकर, 
वो यहाँ जिया करते हैं।
झरने से निकला पानी वो, 
प्यार से पिया करते हैं।।

रोग का भय नहीं है उनको, 
सुख से जीवन जीते हैं।
नाच गाना प्यार से रहना, 
क़ुदरत रस वो पीते हैं।

पत्तों वाले वस्त्र पहन कर, 
रेशम लुफ्त उठाते हैं।
प्यारा छोटा गेह बनाकर, 
देवता को बिठाते हैं।

वैष्णोखत्रीवेदिका
जबलपुरमध्यप्रदेश
[30/06, 11:13 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *चित्र पर आधारित कविता*
शीर्षक:-- *आदिवासी जोड़ी*

झारखंड वासियों का जीवन
संसार के आडंबर से रहता है दूर,
प्रकृति के संग में रसे- बसे रहते,
इतना सरल की पत्तों के पहनावे
में लिप्त रहते हैं युगल, 
पत्तों का छाता के छाया में फुलों के माला पहनकर 
जीवन सुखमय बनाते यह
पति-पत्नी का सुंदर जोड़ा 
साथ कर्म का शुभ अवसर है।
 इस जीवन से दोनों खुश है
दोनों मंगल करते।
 नहीं चाहत शहर के वातावरण हम इस में ही खुश हैं।

विजयेन्द्र मोहन।
[30/06, 11:36 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺गुरुवार//30//6/2022

🌺विषय- चित्र पर कविता
हर चित्र कुछ कहता है 

हम वनवासी प्रकृति हमारी साथी है।
हमको निशि दिन अपनी गोद खिलाती है।
हम वनवासी …….।

पत्तों की कुटिया में रहते, पत्तों से तन ढंकते हैं।
कंद मूल फल भोजन करते जंगल में मंगल करते हैं।।
फूलों के आभूषण अपनी शोभा खूब बढ़ाते हैं।
पशु पक्षी वन विटप प्रेम से हमको गले लगाते हैं।

दिनभर करते काम शाम को पवन हमें सहलाती है।
हम वनवासी …….।

दिन में सूरज गरमी देता, चांद रात में शीतलता।
कल कल नदियां, झर झर झरने हमें सिखाते चंचलता। 
कोयल हमें गीत सिखलाती, मोर सिखाते नाचना।
अनुभव हमें सिखाता है, मौसम की पुस्तक बांचना।

कंकड़ पत्थर की कठोरता, लड़ना हमें सिखाती है। 
हम वनवासी …….।

हमें नहीं अच्छे लगते हैं, ईंट पत्थरों के जंगल। 
तथाकथित मानव बस्ती में होते रहते नित दंगल।
उठा पटक चलती रहती है, चलती रहे उखाड़ पछाड़।
शेर जहां गुमसुम रहते हैं और भेड़िए करें दहाड़।

राजनीति की चलती चक्की हमको नहीं सुहाती है।
हम वनवासी …….।

© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तंड, कोलकाता 
[30/06, 12:13 pm] Nirja 🌺🌺Takur: 
अग्नि शिखा मंच
तिथि -३०-६-२०२२ं
विषय -चित्र पर कविता 

फैंसी ड्रेस में पार्ट लिया है 
 आदिवासी का स्वांग रचा है
पत्तों की पोशाक है,लिए झाड़ू हाथ है
हाथ में फूलों का कंगन 
गले में फूलों की ही माला है
पैर में चप्पल है सुनहरी सी
पत्तों का ही छाता है। 
आदिवासियों की ज़िंदगी,
 है रहती मुश्किल बहुत 
जो मिलता वही पहनते खाते हैं 
और वनवासी कहलाते हैं
सुविधाओं से रहित जीवन है उनका
जो मिल पाता, उसमें ही 
  मन खुश हो जाता उनका
 हमें उनका ध्यान रखना चाहिए
उन्हें उनके हिस्से की 
खुशी मिलनी ही चाहिए। 

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[30/06, 2:04 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: आदिवासी जोड़ा
*********************
आदिवासी जोड़ा आये शहर में
सभी देख रहे अचरज में
पत्तों के कपड़े इन्हें हैं भाते
इनके चेहरे पर है ग़ज़ब की मुस्कान
नहीं चाहिए शहर की शान
ये पति-पत्नी का जोड़ा
लग रहा है कितना प्यारा
अरे ये क्या..?
एक झाड़ू लिये हाथ में
दूजे छतरी लिये हाथ में
पहने हुए हैं फूलों का हार
नहीं चाहिए इन्हें कोई आडम्बर
हाथों में सजी फूल का कंगन
देखो कितने हैं एक दूजे में मगन
ना ही शहरों की शोरगुल
नहीं चाहिए शहर की झूठी शान
आदिवासी जीवन शैली से हैं खुश
ये दोनों मिल खूब मेहनत करते
मिल कर एक दूजे संग मंगल गान करते
इस जोड़े की अजब है शान
आदिवासी शैली है महान

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[30/06, 2:30 pm] शोभा रानी तिवारी इंदौर: चित्र पर आधारित कविता

 चकाचौंध से दूर,हम सादगी से रहते हैं,
 पति-पत्नी है सुख-दुख मिलकर सहते हैं ,
 जीवन के पथ पर एक दूजे का हाथ पकड़े,
 झाड़ू को हाथों में लेकर हम शान से चलते हैं।

हम सब वनवासी हैं,प्रकृति की गोद में रहते हैं, पत्तियों के छाते, पत्तियों के कपड़े ही पहनते हैं,
 गले में फूलों की माला , और पैरों में चप्पल है,
 चाहे जैसा भी मौसम हो,हम सब खुश रहते हैं।

  मुस्कुराता चेहरा इनका, सरल सत्य व्यवहार है,
   इनको अपनी प्रकृति से और लोगों से प्यार है,
   हर परिस्थिति में अपने आपको ये ढाल लेते हैं,
   उनके कारण धरती पर हरियाली और बहार है।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी इन्दौर
[30/06, 2:33 pm] रवि शंकर कोलते क: आदिवासी जोड़ा आया क्यायहां करने ।
पत्तोंके वस्त्र बनाकर है दोनो ने पहने ।
झाडु छतरी लिए दोनों खड़े सड़क पे ।
पहने हैं फूलों के बनाए सुंदर in गहने ।।१

हंसते चेहरों पर कितना हर्ष उल्लास है ।
शहर में आई शायद कामकी तलाश है ।।
किसी ने बुलाया होगा काम के बहाने ।
आएगा शहरी बाबू उन्हें उम्मीद आस है ।।२

शहरका हसीं नजा़रा ये देखने आए होंगे ।
अपना वन ही मस्त है यही कहते होंगै ।।
प्रदूषण है बहुत नहीं है शुद्ध चीज कोई ।
चलो लोटके यही वो मंत्रणा करते होंगे ।।३

खुश है आदिवासी अपने वन जीवनसे ।
कंदमूल खाते मस्त रहते प्यार है वनसे ।।
शहरसे नहीं है लेना देना वन्य जीवोंको ।
सादा हैजीवन खुश रहते सदातन मनसे ।।४

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपूर
[30/06, 2:34 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: चित्र आधारित रचना

शीर्षक _ प्रगति का पथ

हम अफ्रीकन वासी, नीग्रो जाति 
       घने जंगल के निवासी
सरकार हमे सुविधाएं देकर जोड़ 
        रही मुख्य धारा से 
हम भी बढ़ रहे , जुड़ रहे है शहरी
        प्रगति के पथ पर अग्रसर 
पहनावा हमारा हरे पत्तों वाला 
        कंद फल फूल खाने वाले 
सफाई का संदेश देते हाथ में झाडू        
       विभिन्न फूलों फलों के बीज
से निर्मित पहने गहना 
पैरो में सजावटी चप्पल पहनकर
       मुख पर मोहनी मुस्कान लिए 
सर पर सुंदर पत्तों से निर्मित छाता    
         पकड़े
दोनों बुन रहे भविष्य के सपने ।


सुनीता अग्रवाल इन्दौर स्वरचित 🙏🏻🌹
[30/06, 3:18 pm] रानी अग्रवाल: चित्रपर कविता।
३०_६_२०२२,गुरुवार।
शीर्षक_आदिवासी जोड़ा___
[Image 790.jpg]
आदिवासी जोड़ा____
ये सुंदर आदिवासी जोड़ा,
खूबसूरत बहुत,नहीं थोड़ा।
फूल_ पत्तों से किया श्रृंगार,
नयनों में इनके झलकता प्यार।
जैसे फूल_ पत्ते हरे भरे हैं,
ऐसे ही इनके मन खुशी से भरे हैं।
गजरा, हार,कंगन सब फूल का,
है इन्हें संज्ञान अपने मूल का।
मस्ती में रहते प्रकृति संग,
इन्हें प्यारे अपने अनोखे रंग।
न करते दखलंदाजी कहीं,
न चाहते कोई करे यहीं।
कंद,मूल,फल इनका भोजन,
फूल_ पत्ते, छाल ही वसन।
इनमें ही खुश इनका मन,
सादा,सरल,संतोषी जीवन।
हम भी सीख लें इनसे सबक,
मिलजुलकर रहें सब होकर एक।
स्वरचित मौलिक चित्र पर कविता_
रानी अग्रवाल,मुंबई।३०_६_२२.
[30/06, 3:29 pm] Anita 👅झा: चित्र आधारित रचना 
वन्य वाँनक़ी 
वन्य वाँनिकी नाम हमारा 
हरियाली का सुन्दर
किया नख शिख शृंगार है 
आँखो में शीतलता है 

मुस्कान लिये सर पर छतरी 
गले में पहना श्वेत पुष्प हार 
कर्मठ हाथों से देते परिचय 
नही किसी के आधीन हम 

हरियाली धरा का रूप धरा
मन से आज़ाद पंछी 
छवि देख सबका मन 
भाव विभोर करते 
वन्य धरा के प्राणी है 
अनिता शरद झा
[30/06, 3:56 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *चित्रपर आधारित रचना*

जंगल से आए है ये शहर में
दोनों पति-पत्नी हैं आदिवासी
कंद मूल खाना निरोगी रहना
खुश दिखाई देते तो हैं बनवासी ।।१

पति के हाथ में झाड़ू हैं
पत्नी पहने हैं फूलों के गहने 
तन ढका पत्तोंसे पत्तों की ही छत्री
सुंदर वेषभूषा क्या इनके कहने ।।२

शायद शहर ये देखने आए होंगे
पर यहा इन्हें कुछभी नहीं भाया है 
किसी ने उनको बुलाया होगा यहां
सोचते होंगे शहरीने झांसा दिया है।।३

कवि *सुरेंद्र हरडे*
नागपुर
दिनांक ३०/०६/२०२२
[30/06, 4:42 pm] Dravinasi🏆🏆: 9335594320 Dr avinasi अग्नि शिखा मंच दिनांक 30 जून 2022 दिन गुरुवार विषय चित्र पर आधारित कविता। वस्त्र आभूषण सब बृक्षो के ही देखे उपयोग करें। पूर्ण रूप से प्रकृतिमय होके,संग वैसे व्यवहार करें। रंच प्रदूषण भी ना होये, खुशियों से बीतेजीवन। पास खड़े वाहन हो सुशोभित , द्रश्य दिखे बस हरे हरे।। वस्त्र आभूषण सबबृक्षो के,ही देखे उपयोग करें । डॉ अविनाशी।
[30/06, 4:42 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: चित्र पर रचना

बस्तर के दोनों सुंदर नवदम्पत्ति ,
प्रकृति ही इनकी असली सम्पत्ति।
प्रर्यावरण का करते ये संरक्षण,
संदेश दे रहे पहन के ये आभूषण ।

श्वेत मोंगरे पुष्प के पहने दोनों हार,
इक दूजे के डाल गले करें प्रेम इज़हार।
वृक्ष लगाकर रखें तो मिलेंगे ऐसे फूल ,
कानों के कुंडल बनकर झूले सुंदर झूल।

हरे पत्तों से ढककर रखते अपनी काया ,
बन जाती मोहक छतरी भी देने को छाया।
बांस छीन की सुंदर कृति से पहने चरण पादुका,
हर परिस्थिति में करती प्रकृति हमारी कैसे रक्षा।

तो आओ हम सब मिलकर पेड़ लगायें,
हरे-भरे पत्तों फूलों से वसुधा को सजायें।
हवा भोजन पानी सब इनसे फिर पायें
इनका जीवन बचाकर हम इनसे जीवन पायें।

पल्लवी झा (रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
[30/06, 5:00 pm] श्रीवल्लभ अम्बर: नमन मंच,
विषय चित्र आधारित रचना

ये जोड़ी बड़ी निराली है,,
  पहन रखी हरियाली है,,
  शहर घूमने आए है,,
   अपने लिबाज पे इतराए है।

मस्त मलंग अंदाज है,,
 जीवन पे इनका राज है,,
   निर्मल निश्चल अंदाज है,,
    पत्तो से बना लिबाज है,,,

प्रूकृति इनका गहना है,,
  प्रेम प्यार से रहना है,,
   जीवन का यही संदेश है,,,
    हर दिन फैंसी ड्रेस है,,,

🙏 श्रीवल्लभ अम्बर🙏
[30/06, 5:02 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्नि शिखा मंच
विषय-;चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक;/30/6/2022

कितना सहज सरल यह जोड़ा
आडम्बर से दूर ये दिखता
प्रकृति की गोद मे पलकर
अपना जीवन यापन करता
पत्तों के है वस्त्र बनाये 
वनस्पति का है श्रृंगार
अपने दशा में खुश यह दिखता
घूमने आया शहर बाज़ार।
एक हाथ मे झाड़ू इनके
दूजे में छाता पत्तों का
मौसम की मार से लड़ने।
दिखता है मुस्तैद अपार
इनकी निश्छल भोली छबि पर 
निसार हुआ यह संसार।।
निहारिका झा।।
खैरागढ़ राज.(36 गढ़)
[30/06, 5:06 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: 🌿हरियाली🌿
********************
आई बरखा बहार, लेकर सोलह सिंगार , छाई हरियाली चारों ओर ।
                       हरीतिमा की चादर ओढ़े, ढकी है पृथ्वी की ओर छोर । 

है हमने भी ओढ़ी, हरीतिमा की चादर , पत्तों से बनाई छतरी , और पत्तों के पहने वस्त्र।

 हमारे मन में भी छाई है हरियाली, बिखरी है हरीतिमा चारों ओर।
                               हम भी हो गए हरे हरे, प्रकृति के रंग में रंग गए, छाईं हैं खुशियां अपार ,
डूबा है खुशियों में सारा संसार।
*******************
डॉ.आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र.
********************
[30/06, 5:23 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय चित्र पर आधारित

हरे हरे पत्तों का वस्त्र धारण कर
हरियाली का संदेश दे रहे

सिर पर छतरी है पत्तों का
प्रकृति की सुंदर अनुपम उपहार है
सभ्यता के विकास का दे रही संदेश
आदिवासी जनजीवन का यह एक पहलू
स्वस्थ जीवन का निरोग शरीर
होठों पे खुशियां बिखरी है
गले में सुंदर माला पहनी हुई
दिल को लुभाने वाली यह जुगल जोड़ी है
कंदमूल खाना है वन में रहना है
प्रकृति के छत के नीचे जीवन अपना है

कुमकुम वेद सेन
[30/06, 5:56 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: आ फिर जंगल की ओर लोट चलें ( चित्र पर आधारित कविता) --- ओमप्रकाश पाण्डेय
जंगल से हम आये थे कभी
जंगल ही जीवन था कभी
पशु पक्षी क्षरने व झीलें
ये सब तो जीवन के ही अंग थे......... 1
प्रगति की लालसा में हमने
इन सभी को एक एक करके 
कर दिया नष्ट हम सभी ने
आज दूषित है पूरा वातावरण........ 2
सूख गई सारी नदियाँ प्यारी
काट दिए जंगल भी हमने
पशु पक्षी भी अब कहाँ दिखते
बन्द हो गया अब चिड़ियों का चहचहाना........ 3
अगर संसार को बचाना चाहते हो
अगर पर्यावरण को बचाना चाहते हो
पशु पक्षी भी रहें साथ साथ हमारे
तो हमें जंगल बचाना ही पड़ेगा...... ..... 4
खिलवाड़ करना प्रकृति से छोड़ दो
अधांधुधं प्रकृति का शोषण छोड़ दो
नदियों को कलकल करते बहने दो
तो फिर आओ जंगल की ओर लौट चलें........ . 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ------ ओमप्रकाश पाण्डेय) 
30.06.2022
[30/06, 6:45 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय- चित्र देखकर रचना 

आदिवासी जोड़ी 

दिख रही आदिवासी जोड़ी 
हरियाली से सजी-धजी 
हरे हरे पत्तों से ढ़के तन 
हरे पत्तों का छाता सिर पर।

वन उपवन में घूमते हम 
हरी छांव में सांस लेते हम 
आज आएं हैं शहर घूमने 
गाड़ियों का काफिला देख हैरान हम।

हाथों में झाड़ू, पैरों में चप्पल 
गले में सफेद फूलों की माला 
हरे पत्तों का, लिबास शरीर पर 
हंसते मुस्कुराते, जीवन काटे हम।

आदिवासी हैं, करते श्रम परिश्रम 
वनवासी हैं,नहीं चाहें भौतिक साधन 
अपनी दुनिया में मस्त,सदा रहे मुस्कान
देखी शहर की रौनक,देखी यहां की शान। 

डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
30-6-22
[30/06, 7:24 pm] Chandrika Vyash Kavi: नमन मंच 🙏
दिनांक 30/6/2022
विषय -: चित्राधारित

पृथ्वी लोक पर आया यह जोडा़
हरीतिमा की छतरी को ओढा़ 
खुश हो रहे हम हरियाली काट  
दिखा हरित सौंदर्य का महत्व हमें
वन देवी देवता ने शहरीजनों का घमंड तोड़ा !

रुप आदिवासी का ले पत्तों से तन को ढाँका
सम्मान की छतरी ओढ़े उसनेशहर का मूल्य आंँका
देख शहर की बंजरता को मानो कह रहा हो
पत्थर की ऊँची अट्टालिकाओं और
 विषाक्त वायु संग 
जोड़ पाएंगे हम अपना ताँका! 

पुष्पों का आभूषण तन पर 
झाडू लिए खड़ी प्रियतम का संगधर 
मांग रही है मानों हरियाली पृथ्वी पर
नीली छतरी वाले बुद्धि की वर्षा कर 
पृथ्वी के मानस जन पर ! 

चंद्रिका व्यास 
खारघर नवी मुंबई
[30/06, 8:39 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
  विषय:चित्र आधारित रचना 
दिनांक:30/6/22
****************************
वन्य कुसुम से खिले-खिले हम
पत्तों के पहने परिधान ,
लगती तपती धूप भले ही
होठों पर मधुरिम मुस्कान ।
       है हाथों में महुए का कंगन
       गले में महुए की माला ,
       मन मे मस्ती बदन में चुस्ती
       हमदोनों का रूप निराला ।
साथ है मेरा सजन सलोना
सिर पर पत्तों की छतरी ,
आओ मिलकर प्यार बाँट लें
मन में है आशा गहरी ।
       बीच सड़क पर झाडू लेकर
       खड़ा है प्रियतम मेरा ,
       मिहनत कश इन्सान हैं हमसब
       पर्ण कुटी है बसेरा ।
लू की लपटें तेज है चलती
पैरों में है चप्पल डाले ,
नहीं किसी से गिला व शिकवा
संग - संग प्रीत निभाले ।

*************************
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
डाॅ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर 
बिहार 🌹🙏

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