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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 28/ 6/ 2022 को प्रदत्त विषय***** उंगलियों पर नचाना ********पर रचनाकारों की लघु कथाएं पढ़ें **************** डॉ अलका पांडे मुंबई


लघु कथा 
विषय/ उंगलियों पर नचाना

शीर्षक/धन्यवाद

पार्टी चल रही थी ,सब नाचने गाने मस्ती में झूमने में व्यस्त ...
नीरज ने बेटे के पास होने की खुशी में दावत दी थी ।।
अपने खास रिश्तेदार और दोस्तो को ।
खुशी अपनी सहेली को लेकर हाल में आती है ओर नीरज से परिचय कराती है। 
नीरज मेरी सहेली कोमल नीरज हाय कोमल कैसी हो एंजॉय करो... और खुशी को कहता है मेरे लिए दूसरी टीशर्ट के आओ पसीना बहुत बहाया है नाच कर ....
खुशी अंदर जाती हैं तो नीरज दोस्तो से देखा मैं कैसे अपनी पत्नि को *उगलियों पर नाचता हूं...*
मैं यह काम नौकर को बोल सकता था पर नही पत्नी को अपनी *उगलियो पर नचाना जनता हू ....*
वह आगे कुछ और कहता की कोमल ने तालियां बजाकर कहा वाह वाह क्या मर्दानगी है.....
पत्नि की सराफत और सेवा भावना , उसके प्यार , समर्पण,घर की व्यवस्था,आपका हर काम अपनी जवाबदारी से करना पूरा घर एक सूत्र में बांध कर रखती है ।और आप मर्द लोग उसके प्यार को उगलियों पर नचाना कह कर उपहास उड़ाते हो ....!..
शर्म आनी चाहिए आप को ।
अगर आप को खुशी ना कह देती और नौकर को काम करने को कह देती तो ....आप का ही अपमान होता नीरज जी ,खुशी  आप को जो मान  देती हैं उसका अपमान न करे ...
सब लोग चुप खुशी जो शर्ट लेकर आई थी नौकर को आवाज देकर कहती  है ,अपने साहब को दे दो , आज से सारा काम तुम ही देखना 
कल से मैं शीतल का बिजनेस ज्वाइन कर  रही हूं।
और शीतल को कहती है चलो कुछ पेट पूजा करते है ।
मेरी आंखे खोलने के लिए धन्यवाद

अलका पाण्डेय मुम्बई

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[28/06, 8:21 am] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि -२८-६-२०२२
विषय-लघुकथा -उंगलियों पर नचाना

       उंगलियों पर नचाना 

       अजय और रमेश अच्छे दोस्त हैं। 
एक ही ऑफिस में काम भी करते हैं। अजय पहले से इस ऑफिस में काम करता था। वहाॅं वेकेंसी निकली तो अजय ने रमेश को अपने ऑफिस में आवेदन पत्र डालने कहा और साक्षात्कार के बाद रमेश की नौकरी भी यहीं लग गई। दोनों दोस्त बहुत खुश हैं। 
     रमेश बहुत दिनों से महसूस कर रहा है कि उसका ऑफिस में अन्य सहकर्मियों से घुलना मिलना अजय को पसंद नहीं आ रहा है। अजय चाहता है जिस जिससे उससे बनती है। रमेश उन्हीं लोगों से बात करें। रमेश ने अजय का मान रखते हुए कई लोगों से बातचीत कम कर दी। 
         ऑफिस में एक नया प्रोजेक्ट आया जिसको करने वालों की लिस्ट में रमेश का भी नाम है। अजय का नाम नहीं होने से उसे गुस्सा आया। उसने जाकर उच्च अधिकारी से कहा-
अजय - "सर प्रोजेक्ट में आपने मेरा नाम नहीं डाला है इसलिए इस प्रोजेक्ट पर रमेश भी काम नहीं करेगा।"
   अधिकारी - " रमेश की इसी विषय दक्षता देख कर मैंने प्रोजेक्ट में उसका नाम दिया था । अगर रमेश मुझसे कह दे कि वह इस प्रोजेक्ट में काम नहीं करना चाहता, मैं मान जाऊंगा। "
अजय रमेश से -" रमेश बड़ा बेकार सा प्रोजेक्ट है ये इस पर काम करने से तुम मना कर दो। "
    रमेश को समझ में आ गया कि चूंकि अजय का नाम इस प्रोजेक्ट में नहीं है इसलिए वह उसे भी इस पर काम नहीं करने देना चाहता। 
रमेश ने अजय से कहा- "देख भाई मैं तुम्हारा एहसानमंद हूॅं कि तुमने मुझे अपने ऑफिस में कर्मचारियों की भर्ती की सूचना दी लेकिन इतना तो मानोगे कि मेरी नियुक्ति मेरी काबिलियत के बल पर हुई है। तुमने मुझे कहा इससे बात कर, इससे ना कर,मैंने तुम्हारा मान रखा। अब तुम मुझे प्रोजेक्ट पर काम ना करने की बात कर रहे हो। तुम तो मुझे उंगलियों पर नचा रहे हो। मुझे प्रोजेक्ट पर काम ना करने के लिए बोल रहे हो यह बात ग़लत है। मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता। अजय अपना छोटा सा मुंह ले कर रह गया।  

नीरजा ठाकुर नीर
 पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[28/06, 8:44 am] रामेश्वर गुप्ता के के: अग्नि शिखा मंच।
दिनांक 28-06-2022
।उंगली पर नचाना-लघुकथा।
गगन की नयी शादी हुई है। उसकी बीबी रिया, सुन्दर, सुशील, पढी लिखी तथा गृह कार्य में निपुण है। ससुराल में आते ही उसने घर के सभी लोगों का दिल जीत लिया। 
समय को देखकर उसने अपनी नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र देना शुरू कर दिया। 
एक दिन उसका पति गगन एक लिफाफा लेकर भागते हुए रिया के पास आया और बोला :
रिया तुमको अच्छी नौकरी मिल गयी है, दस दिन में तुम्हें अपनी सहमति देना है, यह सुनते ही लिया खुश हो गयी। 
समय बीतने लगा, धीरे-धीरे सभी कार्य रिया की देखरेख में होने लगे। गगन भी उसकी इच्छा अनुसार सभी कार्य करता है। 
एक दिन घर में रिया के सास एवं ससुर कुछ दिनों के लिए आये। कुछ दिन सब ठीक चलता रहा। 
गगन के मम्मी पापा को एक बात समझ में आ गई, गगन बिना पत्नी के हां कहे, कोई कार्य नहीं करता है. यह बात धीरे धीरे उसके मम्मी पापा को अखरने लगी। 
एक दिन गगन की मम्मी बोली, बेटा गगन मिठाई वाले के यहां से
दही लेकर आ जाओ। तुरंत रिया ने मना कर दिया और कह दिया घर के लिए सब्जी ले आओ। 
गगन की मम्मी ने देखा :
गगन घर के लिए सब्जी लेकर आ रहा है। उसकी मम्मी मन ही मन बोली :
यह अपनी बीबी की अंगुली पर नाच रहा है, भगवान इसे समझ दे। 
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[28/06, 8:59 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: मंगल वार - /28//6/2022
विषय/उँगली पर नचाना-/संकेत पर कार्य कराना।
विधा - लघुकथा 

दोपहर के समय सब आराम कर रहे थे। उसी समय दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो अचानक बहन चीनू को अकेले देखकर भाई हैरान रह गए।
श्रुति भाई के गले लग गई जार-जार रोने लगी। भैया में उस घर नहीं जाऊँगी। 
चीनू को रोते अपने भाई ने पूछा बोलो क्या हुआ? लेकिन चीनू रोती ही जा रही थी। भाई को कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर भाभी श्रुति ने उसे बड़े प्यार से बिठाया तब मोना शांत हुई।

भाई विजय सोच रहा था कि पिछले महीने आज के दिन बड़ी खुशी से बहन की डोली विदा की थी। घर-परिवार और लड़का बहुत ही अच्छा था। सब देखभाल कर ही अपनी इकलौती प्यारी बहन की शादी वहाँ की थी। दिल्ली में उनके बड़े-बड़े होटल थे काफी संपन्न परिवार था। किसी चीज़ की कमी नहीं थी, फिर भी बहन वापस क्यों आ गई वो भी अकेले मैले-कुचैले कपड़ों में बदहवास सी। कुछ समझ नहीं आ रहा था।

अमीर घर की लड़की चीनू। भाइयों की लाडली। भाई उसे बड़ा प्यार करते थे। चार भाइयों की इकलौती बहन। उसकी उन्होंने बड़ी धूमधाम से शादी की।

वहाँ का माहौल आम घरों से बिल्कुल उलट था। रात को रोज़ महफ़िल जमती नाच गाना होता, शराब चलती। चीनू को भी शराब पीने और पिलाने के लिए मजबूर करते। जब चीनू मना करती तो सबके सामने बाल पकड़कर मारा जाता था। उसे पूरा परिवार उँगली पर नचाता था।

वहाँ परिवार वाले ही नहीं बाहर के दोस्त और उनकी पत्नियाँ भी आया करती थीं। जब शराब का दौर चलता तो किसी को होश ही नहीं रहता कि कौन, किसके साथ, किस प्रकार नाच रहा है। ससुर को बहु के साथ किसी की पत्नी को किसी के साथ नाचने में कोई बुराई नहीं थी। सब एडवांस बनने की राह पर लगे हुए थे।

लेकिन चीनू के घर में तो ऐसा माहौल नहीं था इसलिए उसको बड़ा अटपटा लगता था। एतराज़ पर रोज़ पूरे परिवार से पिटती थी। बोलते हमारे यहाँ ऐसे ही चलता है। तुम्हें ऐसे ही रोज़ पिटते हर रहना पड़ेगा। 
चीनू ने कहा कि मुझे मायके पहुँचा दो तो उन्होंने मना कर दिया।

एक दिन मौका देख कर घर से भाग गई। रास्ते में कोई  
सरदार ट्रक वाला मिल गया। जब चीनू ने अपने घर का पता बताया तो वह समझ गया कि यह किसकी बेटी है। उसके मायके वाले भी जाने पहचाने थे। इस कारण उसने कहा-"बेटा चिंता की मत करो। तुम्हारे भाइयों को मैं पहचानता हूँ। तुम मेरी बेटी जैसी हो। मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा दूँगा। मुझे भी सामान लेकर वहीं जाना है।"

उन्होंने हर जगह ढूंढना चालू क्या होगा किया होगा लेकिन वह सरदार अंकल की मेहरबानी से घर पहुँच गई। 

सारी बातें पता लगते ही भाइयों ने उसे वहाँ नहीं जाने दिया और तलाक ले लिया। चीनू बी.एड करके स्कूल में शिक्षिका के पद पर आसीन हो गई। बढ़िया जीवन व्यतीत कर रही है।

वैष्णोखत्रीवेदिका
जबलपुरमध्यप्रदेश
[28/06, 9:04 am] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 28 2022 दिन मंगलवार विषय उंगलियों पर नचाना विधा लघुकथा। एक आफिस में बडे बाबू शुरू से ही काम करता रहा था।जिसके कारण उसको अनुभव भी हो गया था। एक दिन एक साधारण व्यक्ति अपने कार्य से आफिस गया।वो बाबू से मिला उसने कहा आफिस में अधिकारी नहीं है।कल आना तभी वहां से घर चला गया। दूसरे दिन फिर बाबू मिला आज भी अधिकरी नहीं है। तब व्यक्ति ने कहा मेरा काम कैसे बनेगा।मै क्या करूं।तभी पास में खड़ी एक व्यक्ति ने उनकी बातें सुनकर कहने लगा कि क्या बात है।रोज परेशान होते हो।तब उसने कहा बावू ने आज बुलाया था।तब उस व्यक्ति ने कहा ये बावू सभी को ऐसे ही कह देता है। सभी परेशान होते रहते हैं। आप लोगों की क्या गिनती है।ये बावू अधिकारी तक को उंगलियों पर नचाता है।उसका कोई कुछ नहीं कर पाते। चाहे जो बात हो इसमें जिम्मेदार अधिकारियों की ही कमी है। डॉ देवीदीन अविनाशी हमीरपुर उप्र
[28/06, 10:10 am] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: लघु कथा
बिषय -उंंगलियो पर नचाना

सरिता अपने बेटे को पढा़ने
मे अपना जीवन लगा दी। सरिता प्राइमरी स्कूल की टीचर थी वह और बच्चों को
कोचिंग भी देती थी कडी़ मेहनत करके अपने बेटे को डाक्टरी पढा़ई थी उसके बेटे
का नाम आकाश था।
आकाश की शादी एक डाक्टर की लड़की से हुई थी आकाश अपनी माँ को
 अपने साथ बडे़ मान सम्मान प्यार से रखता था ।
एक दिन सरिता की बहूँ ने
कीटी पार्टी रंखी थीऔर सास से कही माँ जरा किचेन में आप देख लिजिएगा। नास्ता
में रामू कुछ गड़बड़ न करे सरिता बोली ठीक है।
सरिता ने अपने अनुभव और
सूझबूझ से अच्छी तैयारी की
रामु के साथ नास्ता सर्व कर रही थी उसकी सहेली पूछी
ये कौन है सरिता बडे़ घमडं
से बोली मेरी सास है सब कहने लगी अरे यह तो काम
करही है मेरी सास तो काम नही करती है। *सरिता बोली*
*मै तो इन्हें उंंगलियों पर नचाती हुँ*
बगल के बेड रूम से आकाश
निकल कर आया बोला देखो
रूमा माँ को कोई नचा नही सकता माँ अपने बेटे के प्रेम मे सब करती है। और मेरी माँ
शिक्षिका थी तुम्हारे जैसे हजारो को नचाती थी माँ से
माफी मांगो अभी सबके सामने जीतने लोग कीटी पार्टी मे थी सब लोग माँ से
माफी मांगी। और आकाश माँ को अंक मे सजल नैन से
भर कर बोला माँ मुझे माफ कर देना।

बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ
भानुजा गोरखपुर यू.पी
[28/06, 11:18 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *लेख*
विषय:-- *उंगलियों पर नचाना।।*

इन दिनों भारतिय समाज में नई पीढ़ी पश्चिमी देश की नकल कर रहे है की शिक्षित युवक जब तक विवाह बंधन में नहीं बंधते तब तक माता-पिता के आज्ञा के अनुसार उनकी दिन चर्चा रहती है। जब विवाह होने के बाद प्रेम से अपनी पत्नी के *अंगुलियों पर नाचना शुरू कर देते हैं।* उनके हमसफर का एक ही मकसद रहता है हम दो और हमारे बच्चे।यह हमारी भारतीय संस्कृति के अनुकूल नहीं है। भारतीय संस्कृति में:-- माता- पिता, गुरु का सर्वोपरि स्थान दिया गया है। लेकिन आजकल पश्चिमी देश के हवाओं के चलते हैं एकल परिवार के इच्छा जागृत हो रहे हैं। इस परिवर्तन से हमारे देश के बुजुर्ग लोग अपने ही संतानों से उपेक्षित हो रहे हैं। जिसके कारण वृद्धा आश्रम की जरूरत हर शहर में पड़ गई है। मैं अपने मित्र के बारे में सुन कर आश्चर्यचकित होते हैं। मेरा मित्र विधुर हो गयें है। शुरुआती दौर में अपने बच्चों के साथ चले गए लेकिन वहां जो सम्मान मिलना चाहिए नहीं मिल पाया। अतः अपने निवास स्थान लौटकर एकाकी पन जीवन जी रहे हैं। उनके पुत्र, पत्नी के प्रेमवश में *उसकी उंगलियों पर नाच रहे हैं।*
 
विजयेन्द्र मोहन।
[28/06, 11:47 am] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
*********
 अग्निशिखा मंच
दिन- मंगलवार 
दिनांक -28/6 /2022 लघु कथा 
प्रदत्त विषय - *उंगली पर नचाना*

 सीमा अपनी सहेली राधा के यहां आई है।उसका इस बात पर ध्यान गया कि सभी राधा की इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं ।
                  दूसरे दिन सीमा ने राधा के लड़के से कहा बेटा मुझे थोड़ा बाज़ार जाना है। चलेगा क्या ?उसने कहा- मम्मी से पूछ कर आता हूं। सीमा ने कहा ठीक है। शाम को सभी बैठे थे ।राधा रसोई में कुछ काम कर रही थी। तभी सीमा ने राधा के पति से कहीं बाहर चलने के लिए कार्यक्रम बनाया। जिसमें दोनों परिवारों को साथ में घूमने जाना था ।तब राधा के पति ने कहा ठीक है,राधा से बात करके बताता हूं ।सीमा चुप हो गई। थोड़ी देर बाद उसने राधा की बिटिया से बोला- कल तुम मेरे साथ मेरी सहेली के यहां चलना। तब राधा की बेटी बोली--मम्मी से पूछूंगी फिर चलूंगी ।थोड़ी देर बाद राधा सीमा के पास आई और दोनों एक ही साथ सोने के लिए गई तो सीमा बोली- क्या बात है तूने पूरे घर के लोगों को अपनी *उंगली में नचा* रखा है।तुझसे पूछे बिना तो कोई कुछ करना ही नहीं चाहता।

रागिनी मित्तल
 कटनी ,मध्य प्रदेश
[28/06, 2:23 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
विषय**** लघुकथा ****
****उंगलियों पर नचाना ****
सौम्या तैयार होकर पर्स हिलाती हुई जैसे ही बाहर जाने लगी दादी जी ने टोक दिया, उसकी फटी जीन्स, बिना आस्तीन वाली शर्ट देख कर बोली, हे भगवान् ये कैसा फैशन आ गया है ।
महल जैसे घर में रहकर फटे कपड़े पहनने लगी है, और तेरी कमीज़ की आस्तीन कहाँ गई। ये रूखे बाल चिड़िया का घोंसला बना रखा है। सौम्या गुस्से में पैर पटकती हुई बोली, जाते जाते टोक दिया न, ये आजकल का फैशन है, और हाँ दादी जी मैं पुराने ज़माने की आपकी बहू नहीं हूँ, जिसे आप उंगलियों पर नचाती रहोगी,आप अपना काम करो माला जपो भजन करो।यह कह कर सौम्या तेज़ी से बाहर निकल गई।सौम्या के व्यवहार से उनके आँसू आ गए।पास बैठे दादा जी बोले क्यों खुद को परेशान करती हो।यह नई पीढ़ी उंगलियों पर नाचने वाली नहीँ हैं ।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।
[28/06, 2:25 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ( लघुकथा ) 🌷उॅंगलियों पर नचाना🌷
********************
           माॅं को बाहर जाना था। सबको भूख लगी थी ।माॅं ने बच्चों को भोजन परोसा । माॅं ने भी फटाफट भोजन किया। किचन का काम निपटाया और चली गईं। जाते समय बच्चों से कहा "खाना खा लेना, खा लोगे तो टीवी बंद कर देना और प्लेट धोने के लिए किचन में रख देना ,दोपहर को सो कर उठना ।"
        खाने में टमाटर की चटनी, आलू गोभी फ्राई, करेला ,सादी दाल ,रोटी, चावल और पापड़ थे। बच्चे टीवी देखते देखते खा रहे थे ।भाई बड़ा था, बहन छोटी थी ।उसने देखा ,भाई खाने की प्लेट लेकर किचन में क्या कर रहा है ।देखने गई ,तो उसने देखा, भाई ने करेले की सब्जी ,जो उसे बिल्कुल पसंद न थी ।धीरे से डस्टबिन में डाल दिया। बहन ने देख लिया ,तो भाई ने कहा ,"तो माॅं को मत बताना ,वरना माॅं नाराज होगी और मुझे डांटे डटेगी।"
‌ उस दिन से छोटी बहन भाई को अपनी उंगलियों पर नचाने लगी। भाई से अपनी हर बात मनवा लेती या काम करवा लेती ।अगर वह न कहता ,तो कहती "मैं माॅं को बता दूंगी, कि तुमने करेला खाया नहीं फेंक दिया था।" बेचारा भाई बहुत दिनों तक उसके इशारों पर नाश्ता रहा।   
********************
डॉ .आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र .  
********************
[28/06, 2:38 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय ;-उंगलियों पर नाचना/नचाना
दिनाँक-28/6/2022
रमा अपने माता पिता की इकलौती संतान थी।बचपन में एक दुर्घटना के तहत उसकी एक आंख के पास चोट लगने के कारण निशान पड़ गया व दृष्टि कुछ कम हो गयी जिसके कारण समाज मे उसके विवाह में दिक्कत आ रही थी।।शिक्षित होने के बावजूद भी ।।मम्मी पापा की फिक्र बढ़ती ही जा रही थी आखिर में एक जगह बात बन गयी ।धूम धाम से विवाह हुआ।।रमा अपने माता पिता के संस्कार लेकर पराए घर नयी दुनिया बसाने आ गयी।।शुरू शुरू में तो वह सभी की इच्छानुसार काम करती रही सब अच्छा चल रहा था।।चूंकि उसने कम्प्यूटर कोर्स किया था अतः छुट्टियों में जब मायके गयी थी तभी एक वैकेंसी देख फॉर्म ऑनलाइन ही भर दिया इंटरव्यू हो गया था परिणाम आने में समय अतः ससुराल वापस आ गयी।।आने के एक सप्ताह बाद उसके नामनियुक्ति पत्र आ गया।देखते ही घर मे कोहराम मच गया माँ जी पिताजी व पति तीनों एक सुर में विरोध करने लगे।कि नौकरी की क्या जरूरत है?घर कौन संभालेगा आदि आदि।जब बात बढ़ने लगी तब रमा ने सख्त व सपाट लहजे में कहा इतने दिनों तक आपकी उंगलियों के इशारों पर नाचती रही तो सब अच्छा था।और आज जब कुछ करने का अवसर आया तो आप सभी इस तरह विरोध कर रहे हैं आप ये न भूलें मैं भी दिल दिमाग रखती हूँ कठपुतली नहीं कि आपकी उंगलियों के इशारों पर नाचती रहूँ।
सबकी आंखें खुली की खुली रह गयीं।पति व ससुराल वालों ने माफी मांगते हुए कहा कि हम गलत थे।।रमा ने कहा मेरा उद्देश्य आपको गलत साबित करना नहीं वरन एक स्वस्थ सोच को जागृत करना था।।आप सब मुझे माफ़ कीजिये ।मेरे इस सख्त वक्तव्य के लिये।।उसकी मासूमियत पर सारे एक साथ खिलखिला कर हँस पड़े।।
निहारिका झा
खैरागढ राज.(36 गढ़)
[28/06, 3:02 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक २८/६/२२ थे
विधा*****लघु कथा
विषय**
#**उंगलियों पे नचाना**#

         मित्रों ,जिसके पास सत्ता पैसा अधिकार आ जाता है वह व्यक्ति अहंकारी बन जाता है और इसी अहंकार के नशे में दूसरों पर अत्याचार करते हैं ।
           राजेश नाइक जो बड़े पद पर होने के कारण अपने अस्थाई कर्माचारी को अपनी उंगलियों पे नचाते थे । गणेश और मोती ये दो अस्थाई कर्मचारी जो शेड्यूल्ड कास्ट होने के कारण राजेश के ऑफिस में काम करते थे । दोनों कर्मचारी को लगता था की डेढ़ दो साल में पक्के/ परमनंट एम्पलाई बन जाएंगे । अधिकारी राजेश नाईक के हाथों में उन्हें परमनेंट करने के अधिकार होने के कारण वह उस राजेश साहब की मनमानी के शिकार हो रहे थे । कभी-कभी वह अपने घर के कामकाज के लिए भी बुलाया करते थे । क्योंकि वह उन दोनों को पक्के करने के सपने दिखा रहे थे ।
       अब दोनों अस्थाई कर्मचारी कर भी क्या सकते थे । बेचारे मजबूरी में पढ़े लिखे होने के कारण सब कुछ रहते थे, इसलिए वह जो बोलते थे वह करते थे । घर के बगीचे की साफ सफाई ,कभी-कभी बच्चों को स्कूल से लाना, घर में सब्जी पहुंचाना यह सब वे करते थे ।
           2 साल उस राजेश अधिकारी ने उन दोनों को अच्छा रगड़ा मगर 2 साल के बाद राजेश नाईक ने उन दोनों को पक्के कर्मचारी के रूप में आदेश निकाल कर पक्का कर लिया ।
         ऐसा बहुत जगह देखने में आता है कि किस तरह से सत्ता का दुरुपयोग कर कमजोरों को उंगलियों पर नचाया जाता है ।
          इसी का एक ताजा उदाहरण है। आप सबके सामने हैं महाराष्ट्र सरकार के सिंदे गटके आमदारों को बीजेपी के सत्ताधारी द्वारा E D को पीछे लगा कर महाराष्ट्र के सरकार में फूट डाल कर सरकार गिराई जा रही है ।
    ये सत्ता का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है ?, अभी BJP और शिंदे गट बागी विधायक मिलकर नई सरकार बनाने जा रहे हैं ।
      शिंदे गटके कई विधायकोने भ्रष्टाचार से अपार अवैध संपत्ति हासिल की है उनकी जांच होने वाली थी । इस ईडी के राक्षस से बचने के लिए यह सब सरकार से निकलकर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं ताकि Ed से उनकी संपत्ति की जांच ना हो । 
       बीजेपी इडी के जरिए बागी विधायकों को अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं । ताकि उनका सरकार स्थापन करने का उल्लू सीधा हो जाए ।

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर
[28/06, 3:15 pm] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: विषय/उँगली पर नचाना-/संकेत पर कार्य कराना।

बड़ी बड़ी मूंछें। गठीला बदन। धोती कुर्ता टोपी। गले में मोटी सोने की चैन। पीने पिलाने के शौकीन हैं। पाउडर छिड़क कर सेंट लगागर निकलते हैं तो परिवेश मह मह करता है। सुंदरियां उन पर जान निछावर करती हैं। उनकी एक झलक पाने झरोखों पर आंखें टिकाए रहती है। कौन नहीं जानता उन्हें। मुहल्ले से लेकर दूर दूर तक चर्चे हैं। धमक देते हैं तो लोगों की पेंटें गीली हो जाती है। जहां से गुजरते हैं लोग झुक झुक कर प्रणाम करते है। कुछ तो दौड़कर पैरों भी पड़ जाते हैं। बड़ी ठसक से चलते हैं। आगे पीछे गुर्गे सीना तानकर चलते हैं।
लोग कहते हैं कि ये *बड़े बड़ों को अंगुलियों पर नचाते हैं।* लोग उन्हें दादा कहते हैं। 
दादा जब शाम को घर लौटते हैं और उनकी पत्नी जब सामने आती है तो भीगी बिल्ली बन जाते हैं। वह एक ही सांस में पचासों इल्जाम ठोक देती हैं। 
घर में जितनी समस्याएं हैं सब की जड़ में वही होते हैं। राशन, पानी, बिजली का बिल, गैस बुकिंग, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल की फीस और न जाने क्या क्या। 
बाहर में मूंछों पर ताव देने वाले की मूंछ नीचे लटक जाती है। सबको अपनी उंगली पर नचाने वाले उस दादा को पत्नी जी अब *अपनी उंगलियों पर नचाती है।*

© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तंड, कोलकाता 
[28/06, 3:30 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: ऊंगलियों पर नाचना ( किसी के इशारे पर काम करना) ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
देखो अविनाश बाबू यह एक गम्भीर समस्या है. ठीक से सोच विचार कर लो, जल्दी नहीं है. यह वार्तालाप सुपरिन्टेन्डेन्टिंग इन्जिनियर कौल साहब अपने आफिस के ही एक अधिकारी अविनाश से कर रहे थे.
परन्तु अविनाश बाबू यह बहुत अच्छी तरह से जान रहे थे कि जिसको कौल साहब गम्भीर समस्या कह रहे थे, वह वास्तव में कोई गम्भीर समस्या नहीं थी. लेकिन कौल साहब के बारे में यह सर्वविदित था कि वे विभाग के मंत्री त्रिपाठी जी के ऊंगलियों पर नाचने वाले अधिकारियों में से एक थे. वास्तव में कौल साहब मंत्री जी के इशारे पर अविनाश को निर्णय लेने से रोक रहे थे.
लेकिन अविनाश बाबू भी कम नहीं थे. वे अपने नाक के नीचे भ्रष्टाचार होते बिल्कुल सहन नहीं कर सकते थे. उन्होंने जांच अधिकारी से ठीक से जांच करने के लिए कहा. एक माह में जांच अधिकारी ने अपने जांच का पूरा विवरण दे दिया और जांच के आधार पर अविनाश बाबू ने दोषी अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही का आदेश दे दिया.
( यह मेरी मौलिक रचना है ----+ ओमप्रकाश पाण्डेय)
[28/06, 3:44 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय- उंगली पर नचाना/ संकेत से कार्य करना 

         मिसेज प्रसाद अपनी सहेलियों को अक्सर चाय पर बुला लेती थीं। उनके पास उनके जेठ की लड़की मंजू रहती थी। वह मंजू को अपनी उंगली में नचाती रहती थीं।      
        मंजू बहुत सीधी थी, कुछ विरोध नहीं करती थी।एक दिन मंजू ने मिसेज प्रसाद की सहेलियों के आगे जवाब दे दिया और कहा- "चाची बहुत हुआ, अब मैं आपकी उंगली पर नाचूंगी नहीं।"
      मिसेज प्रसाद हक्की बक्की रह गईं, मंजू का जवाब सुनकर। फिर उन्होंने स्वयं चाय बनाई और सहेलियों को विदा किया।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
28-6-22
[28/06, 4:36 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय _लघु कथा 
             ऊंगली पर नचाना 

शीर्षक__ जवाब देना 

      नीरू ने हमेशा की तरह शालू को आवाज लगाई शालू ," इधर आना , मेरे लिए चाय बना देना " ।
शालू ने कहा जी मासी, झटपट चाय बना लाई , थोड़ी देर बाद फिर आवाज लगाई , शालू पढ़ाई कर रही थी, पढ़ाई करते करते बोली आई मासी अरे, "सुन में किटी पार्टी में जा रही हूं रात हों जाएगी तू कपड़े घड़ी कर देना , सब्जी सुधार देना , शालू बोली ठीक है मासी ।
        इसी तरह हर थोड़ी थोड़ी देर में कोई न कोई काम बोलकर उठा देता था । मासी की लड़की सारा दिन टीवी देखती मोबाईल पर गेम खेलती रहती शालू पर हुक्म चलाती रहती , शालू कुछ न बोलती मन मसोस कर रह जाती।
        एक दिन बड़ी लड़की ने पुकारा अरे शालू,"मुझे पानी तो पीला दे , शालू ने सुनकर भी ना सुना दूसरी बार फिर आवाज दी , नही सुना तीसरी बार जोर से आवाज लगाई शालू ने पढ़ते हुए जवाब दिया दी , उठकर पी लो 
मैं पढ़ाई कर रही हूं , मुझे ऊंगली पर नचाना बंद कीजिए" नीता जवाब सुनकर विस्मित सी शालू को देखती रह गई। उठकर पानी पी लिया।


सुनीता अग्रवाल इन्दौर स्वरचित 🙏🏻🌹
[28/06, 4:55 pm] Anita 👅झा: मंच को नमन 
विषय -ऊँगली पर नाचना 
लघुकथा 
ख़ुशी 
   ख़ुशी बच्चे को गोद में लिये आधी रात निकल सोच रही ,सौरभ की रोज़ रोज़ जली कटी बातें सुन ,कलेजा छलनी छलनी हो गया था ।
किसे सुनायें अपनी दासता एक माँ से ही उम्मीद है अगर वो भी मेरे निर्णय से मुँह मोड़ लिया तो क्या होगा ?
अंतिम प्रयास कह ख़ुशी ने कहा 
ये क्या किया ? सौरभ तुमने क्रोध, आवेश में बच्चे वाली गाड़ी में सारा सामान डाल मुझे बच्चे के साथ घर से बाहर कर रहे हो । 
सौरभ कहता -कुछ दिनो के लिय मुझे अकेला छोड़ दो ।
ख़ुशी कहती - दोस्तों के द्वारा कही बातों से तुम ग़लतफ़हमी के शिकार हो गये हो । ठंडे दिमाग़ से सोच कर देखना मै तो तुम्हारे बेटे सूरज के साथ तुम्हारी परछाई बन चलना चाह रही हूँ । 
सौरभ कहता - देखो -ख़ुशी तुम ओहदे में बड़ी हों।सूरज के पैदा होने के बाद तुम्हारा स्वाभिमान और बढ़ गया ! मै तुम्हारी बातों का अक्षरंसह पालन करते आया , पर अब बर्दाश्त नही होती , दोस्त रिश्तेदार कहते है ,जोरू के ग़ुलाम बन ख़ुशी की उँगलियो पर नाचता हूँ ।
तुम मेरी हर बात काटती हो ।जीना दूभर कर दिया है 
ख़ुशी ने कहा -तुम्हें मेर व्यवहार दुराचार नजर आने लगा ! तुम मेरी 
आख़री बात पर गौर करना ,ख़ुशी तब मिलेगी जब आप सोचते है 
जो सोचते वही करते है और जो आप कर रहे बुद्धिहीन हैं ?  
क्या कहा ? सौरभ बच्चे गाड़ी में सामान डाल घर से बहार कर दिया , 
ख़ुशी ने कहा -सामंजस्य ही जीवन है ! ख़ुशी तब मिलेगी जब आप में सामर्थ हो ? 
एक अंतराल के बाद सौरभ सोचने लगा । आवेश में आ भुल कर बैठा ख़ुशी को लेने निकल पड़ा ।,
अनिता शरद झा अटलांटा 
अनिता शरद झा रायपुर
[28/06, 5:15 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय उंगली पर नचाना

घड़ी की तरह दीक्षा अपने घरों में नाचती रहती थी कभी यह काम करती तभी वह काम करती हर व्यक्ति के जुबान पर दीक्षा का नाम रहता सभी पुकार कर करते रहते यह कर दो वह कर दो।
उसे अपने पढ़ाई के लिए समय नहीं मिल पाता वह कभी कभी अपने लिए बहुत रोया करती थी उसे लगता था कि काश मेरे माता-पिता होते तो शायद वह मुझे इस तरह से काम के पीछे नहीं लगाते और मैं पढ़ाई करती।
जब भी मैं पढ़ने बैठती कोई न कोई उसे काम के लिए पुकार लेता।
दीक्षा के माता पिता का देहांत हो चुका था और अपने मामा मामी के पास रहती थी बाहर वाले को तो ऐसा लगता था दीक्षा बड़ी दुलारी लड़की है चुकी मामा मामी को घर में कोई लड़की नहीं थी और बड़ी अच्छी देखरेख कर रहे हैं पर अगर दीक्षा से पूछिए तो उसके आंखों में आंसू भरा रहता था एक तो माता-पिता का गम और दूसरा मामा मामी के इशारों पर नाचते रहना।
किसी काम के लिए ना कह देती तो मामी बहुत डरती थी और मामा भी साथ देते थे बिचारी नानी चुपचाप सारी बातों को देखती रहती भगवान से यही प्रार्थना करती ईश्वर इसे ससुराल में सब सुख देना जो सुख से यहां हम लोग नहीं दे पाए भगवान उसे सब सुख देना सिर्फ नानी ही थी जो उसे प्यार करती थी बाकी सभी तो उसे एक नौकरानी की तरह रखते थे उसके बिना एक भी काम नहीं होता काम भी करती थी और डांट भी खाती रहती थी इसी का उसे सबसे ज्यादा दुख था मुझे लोग प्यार भी नहीं करता मुझसे काम भी करवाता।
नानी की प्रार्थना भगवान ने सुन ली अच्छे घर में उसकी शादी हो गई शुरु-शुरु तो वह उस घर की लाडली रही लेकिन समय बीतने के साथ फिर उसके साथ पुराने जैसा रवैया शुरू हो गया क्योंकि छोटी देवरानी ज्यादा पढ़ी लिखी और नौकरी करने वाली थी अब तो उसे पूरे घर की जिम्मेदारी उठानी थी और काम करते रहना था उसे अपनी किस्मत पर बहुत रोना आता था उसका पति भी बहुत कम आने वाला नहीं था साधारण नौकरी करता था हिम्मत नहीं करता था कि वह अपनी पत्नी को इस माहौल से अलग रख सके।

कुमकुम वेद सेन
[28/06, 5:40 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *लघुकथा*

विषय *उंगली पर नचाना*

अर्थ *संकेत से कार्य करना*

         बद्रीनाथ केदारनाथ त्रासदी कौन भुल सकता है? सभी घर वाले रिश्तेदार बड़े परेशान थे मेरे मित्र बिल्डर नरेश गुप्ता एवं संतोष वर्मा बद्रीनाथ की यात्रा पर गए नरेश गुप्ता मेरे छोटे भाई के साथ बिल्डर के साथ सांजा कारोबार करते थे।
       आखिर समाचार आ गया दोनों परिवारों काल के गाल में समा गये सभी परिवार के लोग बहुत दुखी थे।एक बेटा कृष्णा एवं नरेश गुप्ता एवंम पत्नी यमुना ना कोई अता पता लगा। अकेली बेटी अमिषा बच गयी थी कारण दसवीं के निजी कक्षा कोचिंग चलने वह यात्रा पर नहीं गयी। होनी को कौन? टाल सकता है। घर में दादा दादी अमिषा के चाचा चाची रहते थे।सब कुछ ठीक था। नरेश का छोटा भाई शंकर मेरे भैय्या के व्यवसाय में पार्टनर समझ बैठा था। देरी से आना खुद ही मालिक बन बैठा अक्ल कवडी की नहीं और झुठी शान मेरे भाई को उन्होंने ",*उंगली पर नचाने बहुत कोशिश की* किन्तु मेरे भाई ने कोर्ट का एक नोटिस देकर आपका भाई पार्टनर था। आप नहीं! और तू डाल डाल तो मैं पात पात और कहा समझे शंकर अब मेरा भाई तिरूपति बिल्डर नाम का फर्म का अकेला मालिक है। इसको बोलते साप भी मरे और लाठी भी न टुटे। 

सुरेंद्र हरडे 
नागपुर
दिनांक २८/०६/२०२२
[28/06, 5:45 pm] रानी अग्रवाल: लघुकथा
२८_६_२०२२ मंगलवार।
विषय_ उंगलियों पर नचाना।
    "उंगलियों पर नचाना "इस मुहावरे को सुनते ही पति_ पत्नी की याद आ जाती है क्योंकि उन्हीं के लिए इस मुहावरे का सबसे ज्यादा प्रयोग होता है।कहा तो यही जाता है कि हर पत्नी अपने पति को उंगलियों पर नचाती है पर हकीकत में क्या होता है वो केवल वो ही जानती है।इस मुहावरे को सच साबित करने में पति भी बड़े माहिर होते हैं वो दूसरों के सामने ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वो सचमुच अपनी पत्नी की उंगलियों पर नाचते हों।जब कि अकेले में पत्नी के साथ उनका व्यवहार बिल्कुल भिन्न होता है।
     चलो फिर हम भी और कहीं क्यों जाएं? ऐसे ही एक रमेश भाई की कथा बताते हैं।रमेश भाई की पत्नी का नाम रमाबेन है,एकदम जाड़ी पाडी, रईस घर से,खूब सारा दहेज लेकर आई थी।रमेश भाई अपने दुबले_ पतले सी ए की नौकरी करते हैं,अच्छी खासी पगार मिलती है पर पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती।जो वो कह दे वही पत्थर की लकीर हो जाती है।क्या खाना बनेगा,कब बाहर खाने जायेंगे,कहां घूमने जायेंगे आदि सबकुछ उनकी मर्जी से ही निश्चित होता है।रमेश भाई को सिर्फ हां कहना होता है।
    एक बार साहस करके उन्होंने अपनी पसंद के स्थल पर घूमने जाने की बात कह दी थी तो रामाबेन ने बहुत कलेश किया,मायके जाने की धमकी दे डाली,ये तो कोई पति नहीं चाहता न? तब से बिचारे रमेश भाई इसी में अपना भला समझते हैं कि इज्जत बचानी है तो चुपचाप पत्नी की " उंगलियों पर नाचते रहो"।
     सुखी घर गृहस्थी के लिए आवश्यक शर्त यही है कि पत्नी की उंगलियों पर नाचते रहो।
स्वरचित मौलिक लघुकथा___
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[28/06, 6:41 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: विधा -लघुकथा 
विषय-उँगली पर नचाना 
तिथि -२८जून२०२२

दोपहर को सब को खिलाकर सारे घर के काम के बाद अचला स्वयं खाना खाने बैठी सोच रही थी आज बहुत मन से मैंने जीमीकंद की सब्जी बनाई है और जिस तरह सभी सदस्य चाव से खाये तो जरूर अच्छी ही बनी होगी और जैसे ही पहला निवाला मुंह तक पहुंचने को था सासू माँ ने टोका " रूक खाना बाद में खा लेना एक दिन नहीं खायेगी तो मर नही जायेगी मुझे अभी भजन में जाना है ये साड़ी थोड़ा प्रेस कर दे और हां पहले एक कप चाय भी बनाकर पिला दे फिर खाना खाते रहना ।" अचला सर नीचे कर जल्दी अपनी खाने की थाली को दूसरी थाली से ढककर साड़ी प्रेस करने जाने लगी तभी उसके ससुर जी बहू को रोकते हुए अधिकार से ऊंची आवाज में कहते हैं "बहू जाओ सबसे पहले खाना खाओ फिर कुछ काम करना और पत्नी को दूसरे कमरे में बुलाकर कहते हैं "अरे भाग्यवान तुम्हें कब अकल आयेगी सुबह से बहू भूखे प्यासे सबकी सेवा में लगी रहती है उसे ढंग से दोनों वक्त समय पर खाना खाने दिया करो और तुम इस तरह उसे भूखे रखकर भजन करने जा रही हो तुम्हारी आत्मा नहीं धिक्कारती बहुत हो गया उसका फायदा उठाकर उंगली पर नचाना छोड़ो नहीं तो एक दिन ऐसा आयेगा जब वह तुम्हारी इज्जत करना भूल जायेगी ।" सासू माँ सकपकाते हुए बहू से कहती हैं "जा पहले खाना खा ले थोड़ा रूककर जाऊंगी अभी कोई आया भी नहीं होगा और हां चाय भी थोड़ा आराम करके बना लेना ।"

पल्लवी झा(रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
[28/06, 9:37 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: लघुकथा--अपनी ऊंगली पर नचाना ।
अनिल बचपन से बहुत सीधा और शर्मीला था । वह और बच्चों की तरह शरारती नहीं था । स्कूल से आकर वह सीधा बैठक में बैठकर अपनी पुस्तकें पढ़ा करता था । नास्ता भी वह मांगा नहीं करता उसकी बहने लाकर देती थी तब वह खाता था । कालेज पहुंचा तो भी वह फ्री नहीं हो पाया । वह घुमने फिरने के लिए दोस्तों के पास नहीं जाता था बल्कि दोस्त उसके पास आते थे
तब वह खुलकर ठहाके लगाता था । पढने में बहुत होशियार था पर रिजर्व नेचर का था । लडकीयां सामने आते तो नीचे सिर कर लेता था या नजरें चुका लेता । कोई बड़ा त्यौहार हो तो बाजार दुकान भी पसंद नहीं करता था । चाची की लड़की की शादी हुई बहने तैयार हुई तो उन्हें डांट दिया बोला इतना तैयार मत हुआ करो लिपस्टिक तो बिल्कुल मत लगाओ देखने से अच्छा नहीं लगता । अनिल की शादी के रिश्ते आने लगे, पीने खाने वाला था नहीं इसलिए रिश्ता लेकर घर आने लगे । अरुणा गोरी सुन्दर थी देखकर अनिल से शादी कर दी गई। अब घर गृहस्थी की गाड़ी धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी ।अरूणा जीती सुन्दर थी काम में बिल्कुल नहीं सिर्फ दिनभर 
मेकअप में लगा रहना । बाहर जाने पर भी मेकअप घर के अंदर भी मेकअप सीधा साधा अनिल जो मंगाते वह हर सामान लाकर देता। यदी नौकरानी न आये तो खुद अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए तरह तरह के व्यंजन बनाकर खिलाता‌बस तारीफ के एक शब्द सुनने के लिए अनिल की बहनें देखती तो जरा दुखी होती सोचती क्या दिन थे जब भाई के पीछे पीछे नाश्ता खिलाने भागा करती थी अब देखो खुद अपने और अपनी पत्नी के लिए खाना बना रहा है। और हमे तो ज्यादा तैयार होने पर डांटा करता था अब देखो भाभी दिनभर तैयार होती रहती है और अनिल भैया कुछ नहीं बोलते । अच्छा भाभी भाई को‌ सीधा देकर अपनी उंगली पर नचा रही है ।

,,इसलिए ज्यादा सीधा नहीं थोड़ा टेडा भी जरूरी है। ,,
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।

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