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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 23 /6/2022 को दिए गए ***चित्र ****पर रचनाकारों की रचनाएं पढ़ें****** डॉ अलका पांडे मुंबई


[ Alka: चित्र पर कविता 

तकनीकी युग


तकनीकी युग का हुआ आगमन खो गया न जाने कहां बचपन।। हाथों में मोबाइल झुकी हुई है गर्दन ।
अपनों से दूर होता जा रहा है 
बालमन ।।
तकनीकी युग का हुआ आगमन

 सब एक यंत्र के इर्द-गिर्द रहते हैं। आजकल सारे बच्चे इसी में समा गया है ।।
उनका जीवन बाहर की दुनिया से कट गया है।
  सारे मैदान सूने पड़े हैं अब बच्चे वहां खेलते नजर आते नहीं हैं ।।
 चक्रव्यू ने  ऐसा जकड़ा ,भीड़ में  खो गया है बचपन ।
निकलना नहीं चाहता इस दुनिया से बाहर यह बचपन ।।
निकले तो कैसे निकले बाल मन को जकड़ रखा है इस यंत्र ने ।
बाल मन को यह यंत्र न खुली हवा में सांस नहीं  लेने देना चाहता
 है ।।
 कुचल डाली है मासूमियत को इस यंत्र ने ।
बाल मन की  मस्ती की खिड़कियां हो गई है अवरुद्ध।।
 आवाज उठाना चाहता है इन के विरुद्ध ।
अंतरिक्ष में कैसे कैसे हो रहे हैं उपद्रव ।।
कैसे रुकेगा बच्चों के मन का या भयंकर युद्ध।
मोबाइल एक यंत्र नही  तकनीकी षड्यंत्र है ।।
दिखलाता है नए-नए उपक्रम और बाल मन को सताता है । भ्रष्टाचारीयो ने  घेराव किया है
परिवारों का कर रहे हैं बिखराव।।
  मिली जुली है सरकार 
देश का हो रहा है बंटाधार ।।
कैसे अखंडता को बरकरार रखें कैसे कदमों तले का अधेरा दूर
भगाए ।। 
मन में आक्रोश बढ़ रहा है सारा संसार यंत्र सिमट रहा है।
पुस्तकों से ध्यान भटक रहा है। मोबाइल में ध्यान अटक रहा है। । खिलवाड़ हो रहा मासूमों के संग। तकनीकी यंत्र के आने से झुकी हुई है सब की गर्दन।।
 अपनों से छूटा अपनापन । कसमसा कर रह गया है बचपन।।
गिल्ली डंडे चोर सिपाही लुका छुपी खेल खेलना भूले ।
हाथ गाड़ी के पहिए थक कर एक तार पर फांसी झूले ।
सारे खिलौने हाथ से छूटे और सारे हाथ एक मोबाइल के पीछे।। सब नाते  रिश्ते बन बैठे तकनीकी उपयंत्र
 इसी चकरव्यूह में भोला बचपन डूबा हुआ है यंत्र में।।
दादा दादी की वह कहानी का जमाना छूट गया 
अब वह सारा ताना-बाना खत्म हुआ।।
बच्चो के होठों पर मचले हनी सिंह का फिल्म का गाना ।
लाइक और कमेंट से इसे दबाते गाते ।।
पास पास बैठकर बेटा बापू एक दूजे को लाइक फॉलो करते जाते। लाइक कमेंट का आया जमाना।। अंगूठा दिखा कर खुश हो जाते ।
मुख से नही बीउगलियो से काम चलाते।।


अलका पाण्डेय मुम्बई
🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴

[23/06, 12:32 am] रामेश्वर गुप्ता के के: क्या जमाना अब आ गया, 
मोबाइल मे सब खो गये। 
युवा हमारे किधर जा रहे, 
खेत खलियान सब भूल गये।।
क्या............................ 1
अन्न से अपना पेट भरता है, 
जब किसान खेत पर जाता है। 
इलेक्ट्रॉनिक या मोबाइल कभी, 
नहीं किसी का वह पेट भरता है।।
क्या................................ 2
आज जमाना चांद पर पहुंचा है, 
नयी दुनिया की खोज कर रहा। 
अपने संदेश वह दूर ग्रह पहुंचाये, 
लेकिन अन्न वह उगा नही पाये।। 
क्या.................................3
मानव अब अनजान बन रहा, 
जीवन उसका अब किधर जा रहा। 
चलो चले हम सब अन्न उगाये, 
जीवन अपना नयी दिशा ले जाये।। 
क्या.................................. 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[23/06, 5:26 am] Anita 👅झा: चित्र आधारित रचना 
ग्लोब ग़ुब्बारे से भरा मानचित्र है 
इंसानो को रौंदता होश गुम है  
धुन धुन्ध में चला जीवन है 
रोबोट कार टेक्सला चला 
तकनीकी सुविधाओं का आदि है 

अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता 
आने वाले कल ग़ुलामी की ज़ंजीर 
बाँधता उँगलियों के साथ नाचता 
सर उठाने की फ़ुरसत नही है 

शूतुर्मुर्ग की तरह सिर उठाता 
बेख्याली का आलम है 
हाथ बढ़ा ईशारा करता है 
कल के ये कर्णधार 
आधुनिकतावाद की पहचान है 

आओ मिलकर व्यवस्था बदले 
जनहित परहित पहचान बतायें 
साहित्य समाज दर्पण दिखायें 
मार्ग व्यवहारिकता सिखायें 

अनिता शरद झा अटलांटा
[23/06, 9:24 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: गुरुवार23//6/2022
विषय- चित्र पर कविता, हर चित्र कुछ कहता है 

सबकी ज़िंदगी को प्रभावित, करता है विज्ञान।
जीवन को आसान बनाता, है तकनीकी ज्ञान।

अच्छा अनुभव मिलता है, करो फोन पर बात।
हाल चाल तुम जानो बूझो, दिन हो या फिर रात।।

राष्ट्र विकास और रक्षा में, तकनीकी विज्ञान।
जवान लड़ते हथियारों से, इसीका योगदान।।

चिकित्सा रक्षा व शिक्षा में, की है इसने खोज।
कई आविष्कार जीवन को, सरल बनाते रोज़।।



कंप्यूटर भी तकनीकी है, पल में होता काम।
तकनीक न होती तो जीवन, हो जाता निष्काम।।

कम्प्यूटर ट्रेन इंटरनेट, ओवन और जहाज़।
यहाँ सारी खोजों के बिना, मुश्किल होता आज।।

लगन को नष्ट कर देता है, हमारा स्मार्ट फोन।
अपनों से सारे कटे हुए, रिश्ता टेलीफोन।।

तकनीक बिन नहीं चले यहाँ, कोई भी काम।
मोबाइल से चिपक गई है, सारी ही आवान।।

वैष्णोखत्रीवेदिका
जबलपुरमध्यप्रदेश
[23/06, 10:27 am] रामेश्वर गुप्ता के के: भक्ति गीत।
दिनांक :24-06-2022
।गोपियां।
गोपियां कृष्ण विरह में,
यूं ब्यथित हो गई।
कृष्ण,द्वारिका गये,
वह बावरी हो गई।।
गोपियां...............1
उद्धव को मथुरा भेजा,
योग ज्ञान के लिए।
सब उलहाना देने लगी,
सिर्फ कृष्ण हमें चाहिए।।
गोपियां................2
उद्धव तुम्हारा योग,
साधना हमें नहीं चाहिए।
हमारे कृष्ण वही सबकुछ,
उन्हें स्वयं आना चाहिए।।
गोपियां.................3
कृष्ण बिना यह जीवन,
निष्प्राण हो गया है।
उद्धव तुम कृष्ण को लाओ,
कोई ज्ञान नहीं हमें चाहिए।।
गोपियां..................4
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
[23/06, 12:17 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *चित्र पर आधारित कविता।*

देखो भाई, तकनीकी युग का खेल।
बच्चों के बचपन भुलाकर 
हाथों से गिल्ली- डंडा छुट गया।
मोबाइल युग आ गई, दूर कर दी अपनों से, झुक गई गर्दन।।

उनका जीवन दादा- दादी, नाना- नानी से दूर हो गई।
तकनीकी युग के चक्रव्यूह ने ऐसा जकड़ा की नाता-रिशते 
 से अलग  हो गई बचपन।।

बालमन को मोबाइल ने खुली हवा में जाने से रोकी, सब खेल सिमट गई एक छोटी सी यंत्र मे।।

दादा- दादी, नाना- नानी के जगह ले लिया गूगल, है न चमत्कारी  तकनीकी युग।।

स्वरचित रचना
विजयेन्द्र मोहन।
[23/06, 12:38 pm] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: गुरुवार 23//6/2022
विषय- चित्र पर कविता, हर चित्र कुछ कहता है 
 
*अब दुनिया मेरी मुट्ठी में"
 
अब क्या पीना ग्राइप वाटर
अब क्या रखा है घुट्टी में।
अब दुनिया मेरी मुट्ठी में।
 
चूसा करते थे पपोरना
झूला करते थे झूले में।
मां का स्तन चूसा करते
सोया करते थे गीले में।
 
अब दूध पिलाती है मम्मी
तो मोबाइल दिखलाती है
एबीसीडी इंगलिश राइम
सब उससे ही सिखलाती है
 
अब नया जमाना आया है
सब गए पुराने छुट्टी में।
अब क्या रखा है घुट्टी में।
अब दुनिया मेरी मुट्ठी में।
 
हाथों में अब मोबाइल है
अब कंप्यूटर है टेबिल पर।
घर घर में वाई फाई है
हम पहुंच गए इस लेबल पर।
 
तकनीकें आई नई नई
अब खेतों में खलिहानों में
अब मुर्दे जलते बिजली से
लकड़ी न चले शमशानों में
 
खाते हैं पीजा बर्गर सब
अब मजा नहीं है लिट्टी में
अब क्या रखा है घुट्टी में।
अब दुनिया मेरी मुट्ठी में।
 
अब नहीं बैल गाड़ी दिखती
अब जाते हैं सब ट्रेनों में।
अब चलते है सब एसी में
उड़ते हैं एयरोप्लेनों में।
 
तकनीकी युग अब है आया
जीवन के कण कण क्षण क्षण में
कंप्यूटर पर ही खेल रहे
शिशु अब न खेलते आंगन में।
 
हल बैल नहीं दिखते अब
ट्रेक्टर चलते हैं मिट्टी में।
अब क्या रखा है घुट्टी में।
अब दुनिया मेरी मुट्ठी में।
 
© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तंड, कोलकाता 
 
[23/06, 12:54 pm] Nirja 🌺🌺Takur: 
अग्नि शिखा मंच
तिथि -२३-६-२०२२
विषय-चित्र पर कविता

 देखो कैसे  बेखबर हैं सब
वशीकरण मंत्र से जैसे बंधे हैं सब
 छोटी सी मशीन की गिरफ्त में हैं 
ना जाने क्या जादू  इस मोबाइल ने किया है 
एक ही जगह बुत बन कर बैठे हैं सब
सूने हैं खेल के मैदान, सूने बागीचे हैं। 
ठूंठ ही बन कर रह गये नौनिहाल हैं
अपने भविष्य को यूॅं ना बर्बाद करो 
जागो देखो जीवन को आबाद करो
पहले की बातें याद करो 
मस्ती में दौड़ना खेलना मैदान में 
स्कूल में सीखते पहाड़े याद रहते  
उंगलियों पर थी सामान्य ज्ञान की बातें 
श्लोक मंत्र सब  हरदम कंठस्थ रहते
छुट्टियों में गर्मी की, मामा के घर जाते
 सब बच्चे मिलकर खूब धमाल मचाते
कहाॅं गये वो दिन अभी भी याद आते
नई तकनीक का इस्तेमाल ज़रुर करो
पर उसे अपने ऊपर हाॅवी मत होने दो

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[23/06, 2:00 pm] शोभा रानी तिवारी इंदौर: चित्र पर आधारित कविता

 मशीनी युग में खो रहा है बचपन,
 स्वार्थी हुए लोग खो गया अपनापन,
 सुबह से शाम तक मोबाइल दोस्त है,
 किसी से मतलब नहीं इसी में मस्त है ।

मैदान सूना पड़ा है कौन खेले मैदान में,
 मानवता बची नहीं अपनों में व्यस्त  हैं,
 झुकी हुई गर्दन है मोबाइल में है ध्यान,
 आदतें ऐसी बनाई सब उसी से त्रस्त हैं।

  दादा -दादी की कहानियों को सुने कौन,
 भाग रहा  समय आज किसी के पास नहीं                 नैतिकता की शिक्षा में कमी आई है हरदम 
प्यार, विश्वास,संस्कार किसी के पास  नहीं,

 अविष्कार हो रहा वैज्ञानिक, डॉक्टर बन गये,
 धरती से आसमान तक परचम भी लहराया,
 शिक्षा तो ग्रहण कर  सभी शिक्षित हो गये 
 लेकिन अच्छे इंसान नहीं बन पा रहे हैं।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी,
619अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इन्दौर
म.प्र.
[23/06, 2:06 pm] निहारिका 🍇झा: नमन मंचअग्निशिखा 
दिनाँक;-23/6/2022
विषय:-चित्राभिव्यक्ति
🌹🌹🌹🌹🌹
किया मनुज ने विकास 
असीमित
जीवन के हर पहलू में।
तकनीकी में किया विकास पहुंच गया वो चाँद पर।
पर जीवन उसका न रहा
पहले सा सीधा सादा।
तकनीकी ने बना दिया 
यंत्रों सा मानव जीवन को
खाना चलना सोना उठना
सब कुछ है मशीन सहारे।
नहीं है मतलब हमें किसी से
बस जीना मोबाइल सहारे
नाते रिश्ते पीछे छूटे
स्वार्थ परकता हावी है
इन सबका परिणाम भयावह
युद्ध विभीषिका झेलें जन।
खुद अपने हाथों से ही 
खड़े विनाश कगार पे हम।
लानी होगी नव चेतना 
अब तो इस संसार में।
नैतिक मूल्यों की स्थापना पुनः हो संसार  में।।

निहारिका झा
खैरागढ राज.(36 गढ़)
[23/06, 2:26 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच 
विषय: चित्र आधारित रचना 
दिनांक 23/6/22
*****************
वैज्ञानिक युग है बड़ा  महान ,
देता  है   यह  अदभुत   ज्ञान ।
       देखो  कैसे  रोबोट  चलाता,
      सबको ऊँगली पर है नचाता।
हाथ में जब  मोबाईल  रहता ,
आगे- पीछे कुछ ना  दिखता ।
       सबकी  गर्दन  झुकी  हुई  है ,
       आँखे  इस पर  टिकी  हुई  है।
मोबाईल जब भी हाथ मे होता,
सारा  तिकड़म  साथ मे होता  ।
       कुछ अच्छा ,  कुछ  बहुत  बुरा है ,
       मोबाईल  से   रिश्ता   गहरा    है  ।
 संबंध कभी तो  जोड़े  जाते ,
लेकिन, अक्सर   तोड़े   जाते।
        इस पर बच्चों का गेम है चलता ,
        और ,उनका मन भी है मचलता ।
बच्चो  को इतनी समझ कहाँ है ,
और  इतनी भी  अक्ल  कहाँ है ।
         पर समय बड़ा अनमोल है भाई,
         यह जीवन की  है बड़ी  कमाई ।
इनको  थोड़ा  समझा  देना ,
जीवन की सीख, सीखा देना ।
******************************
स्वरचित एवं मौलिक रचना
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता
मुजफ्फरपुर 
बिहार
🌹🙏
[23/06, 2:41 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: चित्र आधारित रचना
शीर्षक _ आधुनिक बचपन 

सरल सहज बच्चें अक्ल के कच्चे
समय की समझ को समझते हैं
पर समझना नहीं चाहते 

डूबे हैं मोबाईल के नशे में
आधुनिकता की धुंध में
खोता बचपन, गुम होती 
जवानी

कही दूर शून्य में डूबता जीवन
चारो और अन्धकार ही अन्धकार
जकड़ रहे हैं मनोविकार 
अकड़ रहे हैं संस्कार
पकड़ ढीली होती जा रही है 

घर से भागते बच्चें ,झूठ बोलना
हिंसक होना , आत्महत्या मामले बढ़ना , गेम्स के टास्क पूरे करने पागल हो जाना 

झुकती गर्दन, कीबोर्ड पर नाचती 
अंगुलिया 
दर्शा रहा है आने वाला कल कैसा है , कैसा होगा आधुनिक बचपन।


सुनीता अग्रवाल इन्दौर स्वरचित🙏🏻🙏🏻

धन्यवाद🌹
[23/06, 2:42 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ‌ बच्चों का बचपन,     अपनों का अपनत्व ,  युवाओं की जवानी, बुढ़ापे का सुकून,        सब छीन लिया है,              इस मोबाइल में ने।

हे छोटा सा यंत्र,           पर है बहुत शक्तिशाली, किसी को न रहने देता,    है यह चैन से।

इसके बगैर,             जीवन दूभर है ,             न चैन है, न आराम है, बस इसी के ईद गिर्द जिंदगी है।

सुबह उठते से लेकर,   रात  सोते तक ,          क्षण भर के लिए भी,    इस मोबाइल से मुक्ति नहीं है।

बच्चों का बचपन,      खेल- कूद, हंसी- मजाक, खाना-पीना,सोना- जागना ,                    सब कुछ छीन लिया है इसने।

जीने के लिए,            सांस जरूरी है,          बिना सांस लिए,          इंसान जी नहीं सकता। 

उसी प्रकार ,             हमारी दूसरी सबसे बड़ी जरूरत,                  हमारा मोबाइल ही है, इसके बिना जीवन में नहीं।

बच्चा हो या बूढ़ा,       स्वस्थ हो या रोगी,      गरीब हो या अमीर ,    औरत हो या मर्द ।      

सबकी परम जरूरत है, यह छोटा सा मोबाइल, जिसके बिना अब ,   जीवन संभव नहीं।
********************
डॉ. आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र.
********************
[23/06, 2:46 pm] रवि शंकर कोलते क: गुरुवार दिनांक २३/६/२२
विधा ****काव्य 
विषय ******
    #**चित्र आधारित रचना**#
              ^^^^^^^^^^^^

देखिए  कैसा आ गया है जमाना ।
मोबाइल संग रहते सब दिन रात ।। 
ना मिलना और न  सलाम दुआ ।
ना  बात होती है  किसीके साथ ।।१

अपनी ही दुनियामें खोए रहते हैं ।
जगसे  इनका मानो वास्ता नहीं ।।
ये  मानव नहीं यंत्र सा ये जीते हैं ।
उनका तो एक अलगही रास्ता है ।।२

विज्ञान ने तो आज  कमाल किया ।
खिलौने से यंत्र देकर धमाल किया ।।
बच्चोंको मनरंजनका साधन मिला ।
अपने बचपन को दूर हकाल दिया ।।३

माना कि तकनीकी युगने प्रगति की ।
हर काम करने की प्राप्त गति की ।।
आदमी चांद पर भी पहुंच गया है ।
मगर इंसाने खुद कीही दुर्गति की ।।४

अपनी रक्षाके लिए हथियार बनाए ।
उद्योग खेतीके लिए औजार बनाएं ।।
इन्हीं बम हथियारों से आज मानव ।
  देखो एक दूसरेको शिकार बनाए ।।५


प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[23/06, 2:49 pm] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 23 जून 2022 दिन गुरुवार विषय चित्र पर आधारित कविता।   ‌।       कल के बस में हो करके सब, होशादि खो देते।   एक जगह से सारे विश्व को,पल में नाप वो लेते।। रोचकता संग कार्य सरल हो, तभी हौसले बढ़ाते।    अच्छा बुरा सभी मिल जाए, सार्थक उसे जो कर गुन लेते।।        ।          कल के बस हो करके सब, होशादि खो देते।          डॉ अविनाशी ‌‌
[23/06, 2:56 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे अग्निशिखा मंच 
दिन -गुरुवार 
दिनांक- 23/6/2022 
चित्र आधारित रचना ----

मोबाइल में व्यस्त युवा गर्दन झुकी हुई है।
मंजिल का कुछ पता नहीं ,राहे रुकी हुई है। मोबाइल के कब्जे में है इनका दिमाग ।
अपनी डपली बजती इनकी ,इनका अपना राग ।
रिश्ते नाते सब इनको लगते हैं बेकार।
मोबाइल ही इनकी दुनिया ,मोबाइल है परिवार ।
देश -विदेश की खबर रखते मां की बीमारी का की खबर नहीं।
दादी कल मर गई है, इनके ऊपर कोई असर नहीं ।
मोबाइल की इस बीमारी को जल्दी हटाना होगा 
वरना,रौदे जाएंगे ये सिर कोई कदम उठाना होगा। 
पथभ्रष्ट हुए हैं ये युवा क्या करेंगे ये जवान ।
कैसे संभालेंगे खुद को कैसे बनाएंगे हिंदुस्तान।

रागिनी मित्तल
कटनी,मध्यप्रदेश
[23/06, 2:56 pm] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: अंग्नि शिखा मंच
  २३-६-२०२२
 चित्रआधारित रचना
हम कहां थे कहां आगये।
हम तकनीकी दुनिया मे 
ऐसे खो गये अपनी दुनिया
ही भूल गये।

दीदी से लडाई बुआ की 
मनुहार ,दादा की कहनी
दादी का दुलार , हम तो
भूल ही गये कुल परिवार।

खट्टी इमली मीठा आम
जामुनी जामुन फल रसदार।
पेड़ हीला कर गिराते पके आम, मोबाईल के आगे सब
 बेकार।

अब कौन खेले कबड्डी खो
खो मोबाइल मे सब खेल
तैयार। 
कौन दौड़ लागये बाहर हम
खडे खडे मिलो चलते है यार।

गर्मी की छुट्टी बीत गई पर
नही आई ननीहाल की यांद
बुढी़ नानी पूछती घर परिवार
का कैसा हाल नही कोई मिला है बर्षों बाद।

नानी मिलता नही समय 
क्यों बोलते हो तुम झूठ।
कह दो मोबाइल के आगे
किसी से मिलने का न 
होता है मुड।

गाँव की मोटी मलाई की
दही का स्वाद न भूल पाए।
 हम खुद सुधरे मोबाइल से
दुरी बनाये अपने गाँव जाये
  बच्चे दादा दादी से सच्चा प्यार पाए।
बृजकिशोरी 
त्रिपाठी गोरखपुर
[23/06, 3:44 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *चित्रपर आधारित रचना*

लगता है यंत्रों की खेती हो रही
नई  पीढ़ी  मोबाइल में खो रही
अच्छे  बुरे का अंजाम ना सोचे 
यंत्रोंकी जमीन में सपने बो रही ।।१

सबकी कामयाबीका वक्त आ गया
हरएकके हाथमें मोबाइल आ गया
दूरियां खत्म हुई पास आ गए सब 
विज्ञान आज सबके काम आ गया ।।२

माना के आज यंत्रोंसे प्रगति हुई है
प्रगति  के साथ मे क्षति भी  हुई है
क्योंकि बच्चोंने अपना बचपन खोया 
इंसानों में अपनों को मारने की प्रवृत्ति हुई है ।‌।३

संयंत्रों  का युग आया है
हर काम संयंत्रों से हो रहे
मानता हूं की विज्ञान ने  प्रगति की बच्चो का बचपन चला गया है।४।

विज्ञान सभी कार्य सुलभ हुए
रिश्तों में दूरियां हो रही 
संदेश भी सेंकदो में पहुंचते हैं 
गले मिलना हंसी खिलावट खत्म हुयी।।५।।

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक २३/०६/२०२२
[23/06, 3:53 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: चित्र पर रचना
  शीर्षक -मोबाईल 

आया अब तकनीकी ये जमाना 
बदला सबके जीने का पैमाना 
चुटकी बजाते काम हो जाते सारे
दिन में भी दिखला देते ये तारे।

घर भर हाथ मोबाइल सब पकड़ें
तभी तो इन सब के गर्दन हैं जकड़े
चाहे कोई खुशी हो या कोई मातम छाये
अब तो सारे बच्चों को मोबाइल भाये।

हुआ छोटा परिवार बच्चे हो गये लाचार
बात-बात पे रोज ही होने लगती तकरार 
बच्चों को थमा देते माता पिता ये यंत्र
सारी समस्याओं का माने इसे ही मंत्र 

माना ज्ञान कोष संग बढ़ गयी बुद्धि
पर नैतिकता की रूक गयी वृद्धि 
मोबाइल कहीं हाथ से न छूट जाये 
सोचे क्यों न भूखे पेट ही रह लिया जाये।

शारीरिक व्यायाम खेलकूद है लुप्त 
इसीलिए हर बच्चा दिखता इतना सुस्त
चौबीस घंटे  बच्चे इसमेें ही डूबे रहते 
अकेलेपन से हादसे का शिकार भी होते।

उचित समय पर  मो०से रखो दोस्ती 
जैसे किताबों से हम करते हैं दोस्ती 
निश्चय जीवन सबका स्वर्णिम ही होगा 
इसके दुरूपयोग से बस हमें बचना होगा ।



पल्लवी झा (रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
२३जून२०२२
[23/06, 4:01 pm] हेमा जैन 👩: *चित्र आधारित रचना *

वक्त बदला माहौल बदला
विकास के युग में इंसान तक बदला

तकनीकी के अविष्कार ने कई
नई मशीने बाजार में लाई

उनमे से सबसे अनोखा है
मोबाइल जो सबसे अनोखा है

मोबाइल से सबसे जुड़े रहते
 मोबाइल ही अपनो से दूर करते

सब अपने में मस्त रहते
दिनभर इसी में खोये रहते

बूढ़े,बच्चे और जवान सभी को
ये खूब भाता सबके मन को

मनोरंजन भी खूब ये करता
पर सारा वक्त ये लेता रहता

संवदेनाये खत्म करता जा रहा ये
मिलने जुलने के वक्त को भूलता रहा ये

त्यौहार हो या शादी कही
तब भी इसके बिना अधूरे से सही

सही उपयोग कम उपयोग को जैसे 
भूल इसे दुनियां मान बैठे सब ऐसे

सम्हल जा ए मानव अभी भी वरना 
 स्वास्थ्य रिश्ते सब चटकर जायेगा ये फ़ोन

हेमा जैन (स्वरचित )
[23/06, 4:21 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: तकनीकी जमाना ( चित्र पर आधारित कविता) ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
बदलता रहा है  हमेशा से जमाना
पर आजकल बदला है जरा तेजी से
किसी के समझ में कुछ आता नहीं
क्या क्या सीखें और क्या सीखें नहीं
आप चाहो न चाहो जमाना तो बदलेगा ही....... 1
हर बदलाव हमेशा अच्छा तो नहीं होता
कुछ अच्छा तो कुछ विनाशकारी होता
अब कुछ भी हाथों में नहीं है हमारे
सबका जीवन चल रहा तकनीक के सहारे
अपने हिस्से की कीमत यहाँ चुका रहा हर कोई......... 2
सम्बन्ध सारे के सारे खो गये कहीं
लोग भी खोये रहते हैं अपने में कहीं
बचपन व जवानी की बात कौन करे
आज तो बुढापा भी खो गया कहीं
तकनीक के सहारे ही सब ढ़ूंढ़ रहे सबको.......... 3
लोग खुश हैं पर खुशी क्या पता नहीं
पराये चेहरों में अपनों को हैं  ढूढते रहते
दोस्तों की भीड़ में भी रहते सदा अकेला
बिना किसी काम के व्यस्त सब रहते हमेशा
पर कौन किसको क्या कहे आज के दौर में ........ 4
तुम चाहो तो खुश रह सकते हो आज भी
चाहो तो हसीन दुनिया बसा सकते हो आज भी
गैरों में भी कोई मिल जायेगा तुमको अपना
जमाना आज भी इतना तो है  नहीं बदला 
बस तकनीक का सही इस्तेमाल करना होगा......... 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[23/06, 4:35 pm] रानी अग्रवाल: मानव और मशीन।
२३_६_२०२२,गुरुवार।
विधा_ चित्र पर कविता।
[Image 784.jpg]
मानव और मशीन____
ये हो रही मानव की प्रगति,
बढ़ रही कार्य क्षमता,गति।
मानव बना रहा नवीन मशीन,
हुआ जा रहा उसी में तल्लीन।
हुआ मशीनों पर निर्भर,
भूला होना आत्मनिर्भर।
अच्छे_ बुरे की न पहचान इन्हें,
किसी के दर्द का ना ज्ञान उन्हें।
ढूंढ लाया कृत्रिम मानव,
रोबोट रूप में दानव।
इस काम में बड़ा शातिर चीन,
दुनिया के उद्योग रहा छीन,
अपनी ही धुन में हुआ लीन,
बता रहा दुनिया को हीन,
बजा रहा चैन की बीन।
चाहे सारी दुनिया पे अधिकार,
उसे केवल स्वार्थ से प्यार।
ये तो बटनों से चलते हैं,
हो जायेंगे बेवफा,
तेरी ही ओर मुड़ जायेंगे,
कर देंगे तुझे रफ़ा दफा।
तेरी बिल्ली तुझे ही करेगी म्याऊं,
कहेगी,अब तो मैं तुझे ही खाऊं।
जीवाणु फैला विश्व में,
रहा लोगों का गला घोंट,
एक दिन पछताएगा,
जब खायेगा चोट।
इसलिए रे मानव!
अपनी प्राकृतिक क्षमताओं पर
कर विश्वास,
उनको खोज,उनका कर विकास।
प्रकृति से रख मेल,
वरना खतम तेरा खेल।
स्वरचित  मौलिक रचना__
रानी अग्रवाल,मुंबई।२३_६_२२.
[23/06, 5:41 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: तकनीकी विज्ञान
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देखो ये तस्वीरें अपने देश के गौरव की
आओ दिखायें झांकी  तकनीकी विज्ञान की
आ गया है अब तकनीकी का विज्ञान
बदल गया है अब जीवन का संज्ञान
विज्ञान प्रगति का  है सपना सबको ज्ञान हो विज्ञान का
सब पढ़ें, सब आगे बढ़े नाम हो भारत देश का
 देखो मिट्टी उगल रही खेतों के कण -कण में सोना
यहां वैज्ञानिकों ने लगा दी बाजी अपने जान की
आओ तुम्हें दिखायें झांकी विज्ञान की
तकनीकी ने नये-नये आविष्कार है लाते बाजारों में
अब रोबोट है आया दस लोगों का काम झट कर देता तमाम
मोबाइल है जब से आया
बूढ़े हों या बच्चे या युवा
सबके हाथों में   है 
 धराया
 दिन -भर वीडियो गेम में है लगे रहते
सगे- संबंधी से हैं रिश्ते टूट रहे
शारीरिक व्यायाम से हैं कोसों दूर
खेलकूद का वक्त नहीं
मोबाइल चलाने से फुर्सत नहीं
मानती हूं विज्ञान ने कार्य किया है सुलभ
पर रिश्ते ,संगी, साथियों,  से मिलना कर दिया है दुर्लभ
आज वक्त बदल गया है 
 जरुरत है वक्त के साथ   चलने का


 डॉ मीना कुमारी परिहार
[23/06, 5:55 pm] कुम कुम वेद सेन: चित्र पर आधारित

कर लो दुनिया मुठ्ठी में
अगल-बगल ना देखो
हाथ में मोबाइल लेकर बैठो
पूरी दुनिया का खबर रखो
कर लो दुनिया मुट्ठी में

छूट गया गुल्ली डंडा
पीछे रह गया पिट्टो और गोली
लुकाछिपी तो सब भाग गया
मोबाइल के स्क्रीन पर सब खेल आ गया

बच्चों का बच्चों से मिलना हुआ दूर
पड़ोसी शब्द शब्दार्थ बना
जान न पाए अगल बगल कौन है
सैकड़ों दोस्त स्क्रीन पर बना डाले
पर बगल वाले का नाम न जाने

खुरपी कुदाल फाड़ा खत्म हुआ जमाना
यंत्रों से होने लगी है खेती
एक और विकास चरम सीमा पर
दूसरी ओर बेरोजगार चरम सीमा पर
यह तो है विकास का दस्तूर
नदी तालाब भूल गए
नल चापाकल कुआं दूर हुए
खरीद कर पानी भी घर ले आए
यह विकास का दस्तूर

कुमकुम वेद सेन
[23/06, 6:45 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच
चित्र देखकर रचना -मोबाइल 

आया मोबाइल का जमाना 
छूटा सारा प्रेम रिश्ता नाता 
जब भी मोबाइल हो हाथ में 
अपने को बादशाह समझता।

चुटकी भर, सब काम हो जाते 
पल भर में विदेश घूम आते 
क्षण में आसमान में उड़ जाते 
क्षण में पानी में तैरते जाते।

बच्चे बड़े जवान सब को मोबाइल भाए
कुछ अच्छी, कुछ बेकार,कच्ची सिखाते 
उछल कूद शारीरिक व्यायाम खो गया 
बच्चा अकेलेपन का शिकार हो गया।

जिस घर में लग जाए मोबाइल चस्का  
वहां बहस करें, तहस-नहस हो जाता 
मोबाइल गेम आत्महत्या को उकसाते
छुप छुप कर चोरी करते, गेम खेलते।

अब खेती के औजार छूते नहीं 
दिन भर मोबाइल से खेलते हैं
नानी दादी का प्यार भूल गए 
मशीन यंत्रों में खोते से गए।
 
डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
23-6-22
[23/06, 9:09 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: चित्र आधारित रचना
शीर्षक _ आधुनिक बचपन 

सरल सहज बच्चें अक्ल के कच्चे
समय की समझ को समझते हैं
पर समझना नहीं चाहते 

डूबे हैं मोबाईल के नशे में
आधुनिकता की धुंध में
खोता बचपन, गुम होती 
जवानी

कही दूर शून्य में डूबता जीवन
चारो और अन्धकार ही अन्धकार
जकड़ रहे हैं मनोविकार 
अकड़ रहे हैं संस्कार
पकड़ ढीली होती जा रही है 

घर से भागते बच्चें ,झूठ बोलना
हिंसक होना , आत्महत्या मामले बढ़ना , गेम्स के टास्क पूरे करने पागल हो जाना 

झुकती गर्दन, कीबोर्ड पर नाचती 
अंगुलिया 
दर्शा रहा है आने वाला कल कैसा है , कैसा होगा आधुनिक बचपन।


सुनीता अग्रवाल इन्दौर स्वरचित🙏🏻🙏🏻

धन्यवाद🌹

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