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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 22/6/2022को प्रदत विषय** ऋषि मुनि साधु संत का मतलब***पर लेखक के विचार जाने********* ***********डा अलका पाण्डेय मुम्बई *********



 *ऋषि, मुनि, साधु ,संत ,इन सब का क्या मतलब है*।

 *ऋषि*

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा का शब्द है। वैदिक ऋचाओं के रचयिताओं को ही ऋषि का दर्जा प्राप्त है। ऋषि को सैकड़ों सालों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। वैदिक कालिन में सभी ऋषि गृहस्थ आश्रम से आते थे। ऋषि पर किसी तरह का क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या आदि की कोई रोकटोक नहीं है और ना ही किसी भी तरह का संयम का उल्लेख मिलता है। ऋषि अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त हो जाते थे और अपने सभी शिष्यों को आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ-साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम थे। हमारे पुराणों में सप्त ऋषि का उल्लेख मिलता है, जो केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं।

 *मुनि*

मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति यानि जो मुनि होते हैं, वह बहुत कम बोलते हैं। मुनि मौन रखने की शपथ लेते हैं और वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो ऋषि साधना प्राप्त करते थे और मौन रहते थे उनको मुनि का दर्जा प्राप्त होता था। कुछ ऐसे ऋषियों को मुनि का दर्जा प्राप्त था, जो ईश्वर का जप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे, जैसे कि नारद मुनि। मुनि मंत्रों को जपते हैं और अपने ज्ञान से एक व्यापर भंडार की उत्पत्ति करते हैं। मुनि शास्त्रों की रचना करते हैं और समाज के कल्याण के लिए रास्ता दिखाते हैं। मौन साधना के साथ-साथ जो व्यक्ति एक बार भोजन करता हो और 28 गुणों से युक्त हो, वह व्यक्ति ही मुनि कहलाता था।

*संत*

संत शब्द संस्कृत के एक शब्द शांत से बिगड़ कर और संतुलन से बना है। संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे- संत कबीरदास, संत तुलसीदास, संत रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। बहुत से साधु, महात्मा संत नहीं बन सकते क्योंकि घर-परिवार को त्यागकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए चले जाते हैं, इसका अर्थ है कि वह अति पर जी रहे हैं। जो व्यक्ति संसार और अध्यात्म के बीच संतुलन बना लेता है, उसे संत कहते हैं। संत के अंदर सहजता शांत स्वभाव में ही बसती है। संत होना गुण भी है और योग्यता भी।

:* *साधु*

साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। प्राचीन समय में कई व्यक्ति समाज से हटकर या समाज में रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उससे विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि साधना से व्यक्ति सीधा, सरल और सकारात्मक सोच रखने वाला हो जाता है। साथ ही वह लोगों की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहता है। साथु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति और इसका एक उत्तम अर्थ यह भी है 6 विकार यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर का त्याग कर देता है। जो इन सबका त्याग कर देता है और साधु की उपाधि दी जाती है।।

अलका पाण्डेय मुम्बई
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[22/06, 8:15 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺 बुधवार /22//6/ 2022

🌺 विषय/ऋषि, मुनि, साधु,           संत, इन सब का क्या मतलब है,

भारतवर्ष ऋषियों की भूमि है । 
ऋषि उन्हें कहा गया जो आध्यात्मिक ज्ञान रखते थे और उसका प्रचार प्रसार करते थे। नियम संयम से रहते थे। विवाह भी करते थे, संतानोत्पति भी करते थे। हम सब इन्ही ऋषियों की संतान हैं। इन्ही ऋषियों के नाम पर हमारे गोत्र है। इनमें सप्त ऋषि सबसे प्रमुख माने गए हैं।

जो लोग निष्ठा पूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आध्यात्मिक जीवन जीते थे, उन्हें विद्वानों ने मुनि कहकर पुकारा।

जो स्वयं को साध कर यम नियम का पालन करते हुए साधना करते हैं उन्हें साधु कहा जाता है।

जिन्होने संसार के समस्त नाते रिश्ते तोड़कर तन मन धन से भगवान को समर्पित कर दिया, जिनका भगवान के सिवा कुछ भी ना हो उन्हें संत कहा जाता है ।

© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तंड, कोलकाता 
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[22/06, 8:53 am] रामेश्वर गुप्ता के के: बुधवार. दिनांक 22-06-2022
अग्नि शिखा मंच।
ऋषि, मुनि, साधु और संत:
संत:
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत। चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।।
ऋषि :अगस्त  ऋषि ।
मुनि: ( रावण) मुनि भेष। 
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।
साधु: जो मिल गया, उसी मे गुजारा करना। 
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
द्वारा :
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
[22/06, 9:04 am] Anita 👅झा: नमन मंच 
दिनांक -२२-६-२०२२
विषय -ऋषि ,मुनि, साधु ,संत 
का क्या मतलब है 
काव्य रूप में इनकी गणना इन शब्दों में प्रस्तुत है 
*ऋषि* 
वेदों की रचनाओं में पारंगत ऋषि 
ध्यान तपस्या में लीन गण ऋषि
काम क्रोध मद लोभ मोह छोड़ 
आत्मज्ञान से परिपूर्ण गुरू वशिष्ठ पुलस्य अंगिरा केतु पुलह भृगु गुरू कृपा ऋषि कहलाते हों 
*मुनि* 
योग तपस्या ज्ञान साधना 
३६ ग़ुणो से युक्त ज्ञान वाणी मुनि 
शास्त्रों से शास्त्रार्थ कर नारद मुनि 
तीनों लोक उजागर करते 
ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश वन मुनि कहलाते है 
*संत*
सांसारिक लीलाओं में पारंगत हों 
सत्य राह चल आध्यात्मिक ज्ञान व्यवहार कुशल सामंजस्य बिठाते 
तुलसी कबीर रविदास संत कहलाते है 
*साधु* 
करत समाज जन कल्याण साधु  
गुण अनेक , नेक अच्छे बुरे की 
फ़र्क़ करते पहचान निर्मोह साधु 
विकारों का करते बहिष्कार साधु 
साधना तप साधक कर बन साधु  
कहलाते है 
अनिता शरद झा अटलांटा
[22/06, 9:20 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: बुधवार /22//6/ 2022
🌺 विषय/ऋषि, मुनि, साधु, संत, इन सब का क्या मतलब है,

सभी में तीन प्रकार के चक्षु होते हैं। वह ज्ञान चक्षु, दिव्य चक्षु और परम चक्षु हैं। जिसका ज्ञान चक्षु जाग्रत हो जाता है, उसे ऋषि कहते हैं। जिसका दिव्य चक्षु जाग्रत होता है उसे महर्षि कहते हैं और जिसका परम चक्षु जाग्रत हो जाता है उसे ब्रह्मर्षि कहते हैं। 
महर्षि मोह-माया से विरक्त होकर परामात्मा को समर्पित हो जाते हैं।

सैकड़ों सालों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने वाले उच्च स्तर के ऋषि माने जाते हैं। वैदिक ऋचाओं के रचयिताओं को ही ऋषि का दर्जा प्राप्त है।  वैदिक काल में ऋषि गृहस्थ आश्रम मैं रहते थे।

ऋषि अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त हो जाते थे और अपने सभी शिष्यों को आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे। वे शिष्यों में छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम थे। हमारे पुराणों में सप्त ऋषि का उल्लेख मिलता है, जो केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं।

ज्ञान और तप की उच्चतम सीमा पर पहुँचने वाले महर्षि कहलाते हैं। इनसे ऊपर केवल ब्रह्मर्षि माने जाते हैं। 

अंतिम महर्षि दयानंद सरस्वती हुए थे, जिन्होंने मूल मंत्रों को समझा और उनकी व्याख्या की। इसके बाद आज तक कोई व्यक्ति महर्षि नहीं हुआ। 
 
मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति।
मौन साधना के साथ-साथ जो व्यक्ति एक बार भोजन करता हो और 28 गुणों से युक्त हो, वह व्यक्ति ही मुनि कहलाता था। मुनि मौन रहकर वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये मंत्रों को जपते हैं। अपने ज्ञान से एक व्यापक भंडार की उत्पत्ति करते हैं और शास्त्रों की रचना कर समाज के कल्याण के लिए रास्ता दिखाते हैं। जैसे कि नारद मुनि।  

साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। साधु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति यानी कि जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर का त्याग कर देता है उसे साधु की उपाधि दी जाती है।

संत शब्द संस्कृत के शांत से बिगड़ कर और संतुलन से बना है। संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे- संत कबीरदास, संत तुलसीदास, संत रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। ये संसार और अध्यात्म के बीच संतुलन बना लेते हैं।  संत होना गुण भी है और योग्यता भी।
[22/06, 10:10 am] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: 🌷अंग्नि शिखा मंच
  🌷२२-६-२०२२
    बिषय-ऋषि, मुनि,
     साधु,संत
 इन सब का क्या मतलब है।

भारत वर्ष  मे ऋषी परम्परा
है हम सब ऋषियों के संतान है। सात *ऋषि* ऐसे थे जो गृहस्थ थे गुरूकुल चलाते थे
पठन पाठन करना कराना रिचाये लिखना पढ़ना पढ़ाना
इन्ही ऋषियों के हम संतान है इन्हीं के नाम पर गोत्र चलता है उसी से पता चलता है  हम कौन ऋषी के संतान है। मुख्य सात ऋषी है गर्ग, अत्रि,गौतम, अंगिरा, ,पुलस्य,वशिष्ठ,भृगु ।

*मुनि*..जो मौन रह कर कोलाहल से दूर साधना और
नये नये मंत्र लिखते थे ये मंत्र क्या थे आज कल जो अविष्कार होता है अगस्त जी
ऐसे ही ऋषि मुनि थे जिन्होंने
भगवान राम को ऐसा बाण दिये थे जो वार करके तूणीर में आजाते थे।
*संत*  संत वह है जिसका आचरण सत्य व सांत हो जो
काम , क्रोध,मद,लोभ को जीत लिया हो जैसे संत कबीर, संत तुलसीदास, संत तुकाराम, संत गुरू नानक देव,संत सूरदास इत्यादि।
*साधू* ब्यक्ति बहुत सरल सीधा किसी का अहित न करने वाला छल ,कपट, से रहीत सबका शुभ चितंक होता है ऐसे ब्यक्ति को साधू
कहा जाता है।

स्वरचित
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरखपुर यू.पी
[22/06, 10:42 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- लेख
विषय:-- ऋषि मुनि साधु संत इन सब का क्या मतलब है?

जाहां तक हमें ज्ञान है,हमसब के पूर्वज *ऋषि* थे उन्हीं के हम लोग संतान हैं। इन्हीं के नाम से हमलोग के गोत्र  चलता है। विवाह बंधन में गोत्र को प्रधानता दिया गया है। एक गोत्र के वर-वधु के  साथ विवाह करने पर प्रतिबंध है।

*मुनि*:-जो मौन रहकर शांत वातावरण में साधना करते थे और नए-नए मंत्र लिखते थे । मुनि कहा गया है।

*संत*:-संत वह है जिसका आचरण सत्य व शांत हो जो काम क्रोध मद लोभ को जीत लिया हो उसे ही संत कहते हैं।
 जैसे:--संत तुलसीदास, तुकाराम, गुरु नानक देव, सूरदास आदि।

*साधू*:--साधु उसे कहते हैं जो सरल सीधा किसी का अहित न करने वाला छल, कपट, से रहित सब का शुभचिंतक होता है उसे साधु कहते हैं।

स्वरचित रचना
विजयेन्द्र मोहन।
[22/06, 10:46 am] शोभा रानी तिवारी इंदौर: ऋषि मुनि साधु संत का जीवन में क्या महत्व है

 भारत में प्राचीन समय से ही ऋषि मुनियों का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यह समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते हैं। ऋषि, मुनि अपने ज्ञान और तप के बल पर समाज का कल्याण करते हैं, और लोगों की समस्या से मुक्ति दिलाते हैं। आज भी तीर्थ स्थल जंगल और पहाड़ में कई साधु संत देखने को मिल जाते हैं।
 ज्ञान और सब की उच्चतम सीमा को पर पहुंचने वाले व्यक्ति को महर्षि कहा जाता है।
 मुनि शब्द का अर्थ है मोहन अर्थात शांति, यानी जो मुनि होते हैं, वह कम बोलते हैं ।मुनि मौन रखने की  शपथ लेते हैं और वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
 मुनि मंत्रों को जपते हैं शास्त्रों की रचना करते हैं।

 साधु साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं क्योंकि साधना कोई भी करसकता है साधु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति जो काम ,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मत्सर का त्याग कर देता है ,उसे साधु की उपाधि दी जाती।

 संत शब्द संस्कृत के शांत शब्द से बना है ।संत उस व्यक्ति हैं , जो को कहते हैं जो सत्य का आचरण करता है ,और  आत्मज्ञानी होता है। संत संत कबीर ,संत तुलसीदास ,संत रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। संत होना गुण भी है , और योग्यता भी।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी,
619 अक्षत अपार्टमेंट  खातीवाला टैंक ,
इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 8989409210
[22/06, 12:24 pm] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 22. जून 2022 दिन बुधवार विषय ऋषि,मुनी,साधु,संत इन सबका क्या मतलब है।     विषय बहुत ही अच्छा  है। यहां पर भांति भांति स्वभाव वाले नर नारी हुए और है। जिसमें सभी का अर्थ एवं उपयोगिता अलग अलग रही है तथा रहेगी।  जैसे।                       ऋषि स्वभाव वाले यहां पर रहकर अपना स्वयं पथ पंथ प्रचलित करते हैं। एवं अपनी साधना शक्ति  के द्वारा  सुख, सुविधा, शांति को प्राप्त करते हैं।                          मुनी की श्रेणी में जो हुए होंगे।वे अपने काम बनाने के लिए‌ परिवेश के अनुसार भेष धारण कर कर अपने कार्य बनाते रहते हैं।                           साधु की श्रेणी में जो रहें रहेंगे।वेअपना कार्य सादगी से करते रहते तथा किसी का कभी अहित नहीं सोचते। साधारण जीवन यापन करते हैं।                       संत की श्रेणी वाले सभी अपना कार्य सत्य को ध्यान में रखकर जितना हो सके दूसरों की भलाई करने में समय लगाते हैं।    यही पर अति संक्षेप में वर्णन एवं मतलब प्रस्तुत किया गया है।    और चाहें कोई भी हो जिसमें मानवता व सत्य नहीं है।तब सब कुछ बेकार है। यही दुनिया में रहस्य छिपा हुआ है।                  डॉ देवीदीन अविनाशी
[22/06, 12:41 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि - २२-६-२०२२
विषय- ऋषि मुनि साधु संत इन सबका क्या मतलब है
 हमारे भारत देश में पुराने समय से ऋषि मुनि साधु संत होते रहे हैं। ये सभी समाज की भलाई के लिए ही सोचते थे और कोई भी काम धर्म और समाज को दृष्टि में रख कर ही करते थे। 
ऋषि- जो ऋचाओं की रचना करते है वो ऋषि कहलाते हैं। ऋषि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते हैं। ज्ञान और तप के द्वारा समाज कल्याण करते थे। लोगों की मुश्किल आसान करते थे। 
इनकी बातें अधिक तर सच्ची ही होती थीं। सच्चे ऋषि आज भी पहाड़ों की कंदराओं न में मिल जाते हैं। ऋषि गृहस्थ आश्रम का जीवन भी बिताते थे। 
मुनि -  मुनि मतलब मौन रह कर  मनन करने वाले , मुनि वो होते हैं जो किसी भी बात को गहराई से सोचते हैं। इन्हें  वेदों और ग्रंथों का ज्ञान रहता है। मुनि भगवान के मंत्रों का जाप करते थे जैसे नारद मुनि। 
साधु- साधु संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब  सिद्ध पुरुष,सज्जन होता है। लघुसिद्धांत कौमुदी में कहा गया है साधु मतलब जो दूसरों के कार्य कर देता है। साधु हिंदू धर्म के उपदेशक बन कर धर्म का प्रचार करते हैं। वह हिंदुओं के द्वारा सम्मानित किए जाते हैं और आशीर्वाद दे कर भोजन प्राप्त करते हैं। 
संत- संत संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब सरल व्यक्ति। संत शब्द को कवियों से जोड़ा जाता है। जैसे संत सूरदास संत कबीर। 

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[22/06, 1:42 pm] रानी अग्रवाल: विधा_ लेख।
२२_६_२०२२,मंगलवार।
विषय_ ऋषि,मुनि,साधु,संत,इन सबका क्या मतलब है?
     हमारा देश भारत देवों की पुण्यभूमि है।इसके बारे में कहा गया है कि देवता भी यहां जन्म लेने को तरसते हैं।यह राम,कृष्ण,गौतम की जन्मभूमि है।हमारे यहां सदियों से ऋषि,मुनि,साधु ,संतों की परंपरा रही है।
     चलिए दिए गए विषानुसार देखें कि इनका क्या अर्थ होता है।इनकी परिभाषाएं और कर्तव्य की जितनी व्याख्या करें कम है फिर भी संक्षिप्त में अर्थ जान लेते हैं______
ऋषि_इसी मान्यता है कि जिन्होंने वेदों की रिचायों की रचना की वे ऋषि कहलाए ऋचाओं के जनक माने जाते हैं।इनका कार्य वेदों का सूक्ष्म अध्ययन कर,उनका अर्थ स्पष्टीकरण कर लोगों का जीवन मार्गदर्शन करना होता था।ऋषि भी गहन साधना करते थे।ईश्वर की आराधना में लीन होकर जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानने का प्रयास करते थे,फिर सिद्धि प्राप्त करते थे।उन्ही के आधार पर लोगों को ज्ञान बताओ किया करते थे।इनके भी कई प्रकार हुआ करते थे जैसे राजृषि,सप्तऋषि,ब्रह्मऋषि आदि ।च्यवन,वशिष्ठ,विश्वामित्र,गौतम जैसे अनेक ऋषि हुए।समाज में इनको उच्च स्थान प्राप्त था।
     मुनि___ जो मौन रहकर साधना_ तपस्या करते थे वो मुनि कहलाते थे।ये अनेक मूल मंत्रों को जानते थे,मंत्रों की रचना करते थे इसलिए भी मुनि कहलाते थे।ईश्वर की साधना में लीन रहते थे,समाज का मार्गदर्शन करते थे।हम आज इस प्रथा को प्रखर रूप से जैन समाज में देखते हैं।
संत___सत्य की खोज करने और सत्य की राह पर चलने वालों को संत कहा जाता है।ये लोग संसार में रहकर भी सांसारिक प्रलोभनों से अलग कमल की भांति अपना जीवन व्यतीत करते थे।सदा भजन_ कीर्तन के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करते थे।इसे कई संत या कहिए महासंत हमारे यहां हुए जैसे संत कबीर,रहीम,तुलसीदास,रामदास,नामदेव,तुकाराम,मीराबाई आदि।आज भी उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान हमारा मार्गदर्शन है।समाज में इनका स्थान अग्रणीय माना जाता था।आज भी हमें संत मिल जाते हैं।
साधु__साधना करनेवालों को साधु कहा जाता था।इस लोग घर द्वार छोड़ जंगल,गुफा आदि में बैठकर ईश्वर की साधना में लीन हो जाए थे।वे काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद जैसे विकारों से मुक्ति पाते थे।रिद्धि_ सिद्धि प्राप्त कर समाज को मार्गदर्शन देने समाज में लौट आते थे।एक जगह टिककर नहीं रहते थे,भिक्षा याचन से उदारपूर्ति करते थे।वास्तव में सज्जन व्यक्ति के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है।ये शांत,स्वभाव वाले,निर्मोही,निरंकारी गुणों से संपन्न होते थे।ये अपना अलग सा रूप भी बना लेते थे जैसे माथे पर बड़ा तिलक लगाना, जटाएं बढ़ा लेना,रुद्राक्ष पहनना,गेरुआ वस्त्र धारण करना,पांव में खड़ाऊ पहनना या नंगे पैर चलना आदि परंतु ये सब साधु होने की आवश्यक शर्तें नहीं हैं।
     इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋषि,मुनि,संत,साधु कोई भी हो सबका काम ईश्वर की साधना और समाज का सही मार्गदर्शन करना ही था उनके इस कार्य के लिए समाज हमेशा उनका ऋणी रहेगा।जय हो।
स्वरचित मौलिक लेख__
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[22/06, 3:09 pm] रवि शंकर कोलते क: बुधवार।  दिनांक २२/६/२२
विधा**** लेख 
विषय**** ऋषि मुनि साधु संत इन सब का क्या अर्थ है ?
        
        हमारा भारत देश ऋषि-मुनि संतों का देश है । भारत की धरती पर प्रत्यक्ष ईश्वर ने समय-समय पर अवतरित होकर इस धरती को पाप से मुक्त किया है । हजारों साल से आज भी ऋषि मुनि साधु संतों का प्रगटीकरण होते रहता है ।
        हमारे भारतवर्ष मे आध्यात्मिक की सदैव गंगा बहती है । धरती के कोने कोने में ज्ञान की वर्षा होती रहती है । हर जगह प्रवचन हरि नाम संकीर्तन भजन पूजन चलते रहता है । हमारे यहां माता पिता, गुरु ,ग्रंथ इन सब को पवित्र दर्जा दिया है जो हमारे ज्ञान के स्त्रोत है ।
          ऋषि *****यह शब्द संस्कृत भाषा से आया है । इन रषियों ने वैदिक ग्रंथों का निर्माण किया है। ऋषि बहुत उच्च कोटि के ज्ञानी कहलाते हैं यह षडरिपुओं से दूर  है ।
           हमारे पुराणों में सप्तर्षियों का उल्लेख है ।  केतु पुलह पुलत्स्य अत्रि अंगिरा वशिष्ठ तथा  भ्रुगू है । यह अपनी कठिन साधना से भगवान को प्राप्त कर लेते थे ।

मुनि **** हमारे मुनि भी उच्च कोटि के महात्मा कहलाते हैं । इनका भी उद्देश्य भगवत प्राप्ति ही है । इसके अलावा यह ज्ञान के स्त्रोत है । जनमानस को ज्ञान देकर उन्हें भक्ति मार्ग पर ले जाना इनका प्रमुख उद्देश्य है । समाज बुरे मार्ग पर ना जाए इसलिए यह लोगों को अपने वाणी से प्रबुद्ध करते रहते हैं । 
         मुनि का मतलब है मौन रहना। जो लोग मौन धारण करके ईश्वर को प्राप्त करते हैं उन्हें मुनि कहते हैं । इन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त रहता है । मुनि कम बोलते हैं और मौन ज्यादा रहते हैं । मुनि निरंतर जप करते रहते हैं ।मुनि एक ही बार भोजन करते हैं ।
   मुनियों में सर्वश्रेष्ठ मुनि है भगवत भक्त नारद मुनि जो नारायण नारायण कहके ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं ।

साधु***** जो व्यक्ति कठिन तप साधना करते हैं उन्हें साधु कहते हैं । यह किसी जंगल पहाड़ उचित स्थान पर जाकर कई दिनों तक साधना करते हैं और ईश्वर को प्राप्त करते हैं । ये उच्च कोटि के तपस्वी और बहुत ज्ञानी होते हैं
      साधु छ विकारों पर विजय प्राप्त करते हैं । काम क्रोध लोभ मोह मद और मत्सर । संस्कृत में साधु यानी सज्जन व्यक्ति जो हमेशा दूसरों को मदद करने में अग्रसर रहते हैं ।

संत*** संत का अर्थ है सत्य के पथ निरंतर चलना । और जो  इस पथ पर चलता है वही संत कहलाता है । संत भी उच्च कोटि के ज्ञानी महात्मा पुरुष होते हैं । ये भी छ विकारों पर विजय प्राप्त कर संत की पदवी प्राप्त करते हैं । 
       महान संतों में ,संत तुलसीदास ,सूरदास, कबीर, मीरा , संत रविदास, ज्ञानेश्वर तुकोबा ,जनाबाई, संत नामदेव इत्यादि संतो ने सामाजिक प्रबोधन कर समाज को नई दिशा दी है । इनकी ग्रंथ सामग्री अपार है इनसे मनुष्य सत मार्ग पर चलकर ईश्वर  को प्राप्त करता है ।
       इन संतो ने कलयुग के मानव को भक्ति का सरल मार्ग  सुझाया है जिससे  मानव ईश्वर को प्राप्त कर सकता है और वह है #*नामस्मरण*#  केवल हरि का नाम उठते बैठते लेना ।
 
       हमारे इन ऋषि-मुनियों साधु संतों ने समय-समय पर अगाध ज्ञान देकर मानव को सन्मार्ग पर चलाया है और भी हमें उनके संत साहित्य के द्वारा सदियों तक चलाते रहेंगे ।
           मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि मुझे मेरे भारतवर्ष में ही निरंतर मानव जन्म दे ताकि इनका ज्ञान पाकर हर जनम पुण्य प्राप्त करता रहूं ।
            इन तमाम महान आत्माओं, विभूतियों को मेरा कोटि कोटि वंदन है । 

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[22/06, 3:13 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय ऋषि मुनि साधु संत का क्या मतलब है

ऋषि मुनि साधु संत सभी प्रकृति के चार देवदूत है
योग्यता साधना ज्ञान के आधार पर इन सभी को 4 शब्दों से सम्मानित किया गया है यह बड़े ही समाज के सम्मान जगत आदरणीय महापुरुष कहलाते हैं
जहां तक मेरी जानकारी है ऋषि शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है।
संस्कृत भाषा और उत्कृष्ट भाषा मानी गई है।
वैदिक ऋचाओं के रचयिता ऋषि कहलाते हैं पर ऋषि में संयम का नियंत्रण कम होता है यही कारण है अगर ऋषि किसी को श्राप दे दे तो वह श्रापित हो जाते। ऋषि में महर्षि ब्रह्म ऋषि तीन भेद है
ज्ञान चक्षु जागृत ऋषि कहलाते हैं
दिव्य चक्षु जागृत महर्षि कहलाते हैं
परम चक्षु जागृत ब्रह्म ऋषि कहलाते हैं।

मौन रखने वाले को मुनि कहते हैं मुनि शास्त्रों की रचना करते हैं और समाज के कल्याण के लिए पथ प्रदर्शक बनते हैं । जो एक बार भोजन करें और 28 गुणों से युक्त हो वह मुनि कहलाता है

साधना करने वाले व्यक्ति साधु कहलाते हैं इन्हें विद्वान होने की आवश्यकता नहीं होती है किसी विषय को लेकर साधना करते हैं और उस साधना से बहुत कुछ हासिल कर लेते हैं साधना करने वाले व्यक्ति सीधा सरल और सकारात्मक प्रकृति के माने जाते हैं जो मानव स्वभाव के नकारात्मक गुणों का त्याग कर देते हैं

संत जैसा कि शब्द से अस्पष्ट है सत्य का आचरण करने वाले व्यक्ति ही संत कहलाते हैं जो व्यक्ति अध्यात्म और संसार के बीच संतुलन बना लेता है वही संत कहलाते हैं संत होना गुण भी है और योग्यता भी है

इस प्रकार समाज परिवार और देश की रचना और विकास में मुख्य भूमिका इन पुरुषों की रही है

कुमकुम वेद सेन
[22/06, 3:46 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: ऋषि, मुनि,साधु,संत इन सबका क्या मतलब है....?
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     भारत में प्राचीन समय से ही ऋषि मुनियों का विशेष महत्त्व रहा है। क्योंकि यह समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे। ऋषि मुनि अपने ज्ञान और तब के बल पर समाज कल्याण का कार्य करते थे और लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाते थे। आज भी तीर्थ स्थल, जंगल और पहाड़ों में कई साधु संत देखने को मिल जाते हैं।
ऋषि----
---वैदिक संस्कृत भाषा का शब्द है ऋषि को सैकड़ों सालों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। वैदिक कालीन में सभी ऋषि गृहस्थ आश्रम  से आते थे। ऋषि अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त हो जाते थे। और अपने सभी शिष्यों को आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे। हमारे पुराणों में सप्त ऋषि का उल्लेख मिलता है ,जो केतु ,पुलद, पुलस्त्य , अत्रि ,अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं।
मुनि--मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति यानी जो मुनि होते हैं वह बहुत कम बोलते हैं जो ऋषि साधना प्राप्त करते थे और मौन रहते थे उनको मुनि का दर्जा प्राप्त होता था। कुछ ऐसे ऋषियों  मुनि का दर्जा प्राप्त होता था।कुछ ऐसे ऋषियों को मुनि का दर्जा प्राप्त था जो ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे ,जैसे कि नारद मुनि। मौन साधना के साथ-साथ जो व्यक्ति एक बार भोजन करता हो और 28 गुणों से मुक्त हो। वह व्यक्ति ही मुनि कहलाता है।
साधु---साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। साधु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति और इसका एक उत्तम अर्थ यह भी है 6 विकार यानी काम ,क्रोध ,लोभ मोह, मद और मत्सर का त्याग कर देता है ।जो इन सब का त्याग कर देता है और साधु की उपाधि दी जाती है।
संत---संत शब्द संस्कृत के 1 शब्द शांत से बिगड़ कर और संतुलन से बना है ।संत उस व्यक्ति को कहते हैं ।जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे संत कबीर दास संत, तुलसीदास संत ,  
संत रविदास ,ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। जो व्यक्ति संसार और अध्यात्म के बीच संतुलन बना लेता है ।उसे संत कहते हैं ।संत के अंदर सहज ता शांत स्वभाव में ही बसती है ।संत होना गुण भी है और योग्यता भी।

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[22/06, 4:04 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
विषय* **ऋषि,  मुनि, साधु सन्तो का क्या मतलब होता है ****
 जो ऋचाओं का जनक है , वह ऋषि, जो मनन करता हो वह मुनि, जो सरल हो वह साधु, और जो सत् में  स्थिर हो वह संत कहलाता  है।।
  ऋषि---- भारत ऋषियों  की भूमि है।ऋषियों ने आध्यात्मिक  ज्ञान को आगे बढ़ाया। नियम संयम से रहना सिखाया। हम सब ऋषि  की सन्तान  हैं और उनके गोत्र से जाने जाते हैं ।
मुनि----जो लोग नैष्ठिक ब्रह्मचार्य का पालन करते हुए आध्यात्मिक जीवन बिताते हैं,  उन्हें  मुनि कहा  जाता है ।
साधु---- जो स्वयं को साध कर यम नियम का पालन करते हुए साधना करते हैं  उन्हें साधु कहा  जाता है ।
संत---- जिसने संसार के समस्त  नाते तोड़ कर तन मन धन से स्वंय को भगवान्  को समर्पित  कर दिया  हो, जिसका  भगवान्  के सिवा  कोई  भी ना हो, वह संत कहलाता है ।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।
[22/06, 4:24 pm] हेमा जैन 👩: *अग्निशिखा मंच*

लेख - ऋषि, मुनि, साधु -संत का क्या मतलब होता है।

*मुनि*

मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति यानि जो मुनि होते हैं, वह बहुत कम बोलते हैं। मुनि मौन रखने की शपथ लेते हैं और वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो ऋषि साधना प्राप्त करते थे और मौन रहते थे उनको मुनि का दर्जा प्राप्त होता था।

*साधु*

साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। प्राचीन समय में कई व्यक्ति समाज से हटकर या समाज में रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उससे विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि साधना से व्यक्ति सीधा, सरल और सकारात्मक सोच रखने वाला हो जाता है। 

 *संत*


संत शब्द संस्कृत के एक शब्द शांत से बिगड़ कर और संतुलन से बना है। संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे- संत कबीरदास, संत तुलसीदास, संत रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं

*ऋषि*

ज्ञान और तप की उच्चतम सीमा पर पहुंचने वाले व्यक्ति को महर्षि कहा जाता है। इनसे ऊपर केवल ब्रह्मर्षि माने जाते हैं। हर सभी में तीन प्रकार के चक्षु होते हैं। वह ज्ञान चक्षु, दिव्य चक्षु और परम चक्षु हैं। जिसका ज्ञान चक्षु जाग्रत हो
 जाता है, उसे ऋषि कहते हैं।

*हेमा जैन*
[22/06, 4:56 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: ऋषि, मुनियों और संत का मतलब ---- ओर पाण्डेय
आजकल ऋषि, मुनियों और संत का मतलब लिया जाता है कि वे लोग हिमालय में जाकर तपस्या करते हों, केवल ईश्वर में ध्यान लगाये रहते हों और जगह जगह लोगों को ईश्वर के विषय में बताते हों और भजन कीर्तन करते  हों.
परन्तु ऐसा नहीं है. संतों के विषय में तो एक हद तक  यह बात सही है कि वे लोग समाज में लोगों को धर्म, रामायण, भागवत और अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों का प्रचार एवं उनके उपदेशों को कथा, कहानियाँ और भजन के माध्यम से लोगों को बताया करते थे. इनका जीवन लोगों के लिए अनुकरणीय होता है.
लेकिन ऋषि और मुनि, ये हमारे शिक्षा व्यवस्था के अभिन्न अंग थे. ये लोग विचारक, मनिष्यवी, शोधकर्ता थे. ये सब अपने शिक्षा के आश्रम, जिन्हें गुरुकुल के नाम से जाना जाता था,  अपने अपने में आश्रम लोगों को शिक्षा देते थे.
वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक,अगस्त, गौतम, जमदग्नि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु आदि महान ऋषि हुए हैं. ये सब अपने अपने क्षेत्र के महान ज्ञानी थे. इन्होंने महान ग्रंथों की रचना की हैं. तुलसी दास, कबीर, नानकदेव आदि हमारे संत परम्परा में आतें हैं.
[22/06, 6:15 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-ऋषि मुनि साधु संत
विधा:--आलेख
दिनाँक:--22/6/2022

हमारा देश भारत संस्कृतियों की भूमि रहा है।यहां की सनातन कालीन सभ्यता सँस्कृति इतनी उत्तम थी कि यह देवों को भी भा गयी अतः इसे देवभूमि भी कहते हैं।यहां समय समय पर अनेक दिव्यात्माओं ने जन्म लिया व भारत भूमि को पावन किया।।
इसी भारत भूमि की देन ऋषि मुनि साधु संत हैं।।
ये सब नाम भले अनेक पर इनका कर्म जीवन दर्शन एक ही रहा संयम तप के मार्ग पर चलकर ईश्वर की प्राप्ति और अर्जित पुण्य से समाज जन कल्याण।।
ऋषि जिन्होंने ऋचाओं की रचना की।
हमारेवेदऋग्वेद ,यजुर्वेद ,
अथर्वेद, सामवेद,इन्हीं की देन हैं जो आज भी हम सबका जीवन पथ प्रशस्त कर रहे हैं।।
मुनि ये मौन साधना कर ईश्वर का ध्यान करते रहे।
इसी प्रकार साधु संत भी संयम नियम तप के द्वारा साधना करते हुए ईश्वर में लीन रहे।।
सम्भवतः इन्हीं सब के योग तप से आज हमारा भारत देश विश्व गुरु बन कर सर्वोपरि  बना हुआ है।।
निहारिका झा
खैरागढ़ राज .(36 गढ़)
[22/06, 6:18 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ( विधा  -- लेख )
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शीर्षक -- -ऋषि,मुनि,साधु ,संत.
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        साधु संत ऋषि मुनि ये सब सज्जन व्यक्ति होते हैं ।जो समाज का  पथ प्रदर्शन करते हुए, धर्म के मार्ग पर चलकर ,मोक्ष को प्राप्त होते हैं ।साधु संत महात्माओं ऋषि मुनियों का जीवन साधना तपस्या ध्यान में लीन रह कर व्यतीत होता है ।ये अपने आध्यात्मिक ज्ञान को हम मनुष्यों को प्रदान कर हमारे जीवन को सरल व आनंदमय बनाते हैं। यह अपना जीवन त्याग और वैराग्य से जीते हैं ।ईश्वर के भक्ति भाव में लीन रह कर ईश्वर की सेवा में विलीन हो जाते हैं।
          साधु संत महात्मा अपने योग के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं। हमारे देश को साधु-संतों की भूमि के रूप में भी माना जाता है। सच्चे व अच्छे संतो के लिए संपूर्ण सृष्टि ईश्वर का घर है ।वे प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का वास मानते हैं। अपनी पंच इंद्रियों पर पूरा पूरा नियंत्रण कर लेते हैं। इसीलिए इनके मन में कोई कामना नहीं होती है। ये हर कामना से मुक्त हो जाते हैं।
           मात्र गेरवे कपड़े पहन तिलक लगा रुद्राक्ष पहनने से कोई भी साधु संत या ऋषि मुनि नहीं हो जाते ,बल्कि संत महात्मा में पूर्ण तरह मानवता का वास होता है ,वे मानवता के लिए समर्पित होकर सबके कल्याण की सोचते हैं और कर्म करते हैं ।असल में सच्चे संतो का इस संसार में बड़ा महत्व है । वे हमारे लिए  ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में हैं। एक सच्चे संत महात्मा का पूरा जीवन जनकल्याण के लिए व ईश्वर के प्रति संपूर्ण भक्ति में ही समर्पित हो जाता है।
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डॉ. आशालता नायडू.
मुंबई. महाराष्ट्र.
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[22/06, 7:00 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: विधा-लेख 
विषय-ऋषि , मुनि,साधु,संत ।
तिथि-२२जून२०२२


ऋषि-ऋषियों का हमारे देश में महत्त्वपूर्ण स्थान है।ऋचाओं के जनक को ही ऋषि कहा जाता है।ऋषि समाज में एक पथ प्रदर्शक का काम करते हैं और अपने तप और ज्ञान के आधार पर समाज का कल्याण करते हैं और समाज के लोगों की समस्याओं का निराकरण भी करते हैं 
   ये गृहस्थ जीवन से आये होते हैं अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त होते हैं। पहले हर समस्या के निदान और मार्गदर्शन के लिए एवं शिक्षा के लिए ऋषियों के ही शरण में जाते थे ।

मुनि  -मुनि में ही इसका अर्थ छिपा है जो अध्यात्म के मार्ग में जाने के लिए मौन का सहारा लेते हैं या बहुत कम  बोलते हैं हमें उचित अनुचित का भेद कराते हैं ये संतुलित भोजन और संयमित जीवन जीते हैं।  मौन साधना इनकी खास पहचान है ।

साधु-साधु का संस्कृत में अर्थ होता है सज्जन व्यक्ति ।जो सीधा सरल रहता है साधना करता है वह साधु कहलाता है या यूँ कहें रात-दिन साधना करने वाले व्यक्ति में सारे नकारात्मक गुण भी सकारात्मक में बदल जाते हैं और वह व्यक्ति साधु प्रवृत्ति का हो जाता है 
    साधु व्यक्ति काम ,क्रोध मद  लोभ मोह और मत्सर से दूर होता है इसलिए ही सज्जन व्यक्ति के लिए साधु शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

संत-सत्य का आचरण करने वाले को संत कहते हैं।यह आत्मज्ञानी होते हैं जैसे -संत कबीरदास ,संत रविदास ,संत तुलसीदास ।
   धार्मिक व्यक्ति को भी संत कहते हैं जो मोक्ष प्राप्ति के लिए घर परिवार का त्याग कर जप करते हैं ।

पल्लवी झा(रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
[22/06, 7:18 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 
विषय:  ऋषि, मुनि , साधु और संत मे क्या अंतर है 
लेख
दिनदिना22/6/22
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हिन्दू धर्म की अपनी विशेष संस्कृति है जिसमे ऋषि-मुनि और साधु-संत की अपनी अहमियत है ।
ये सभी आसपास के ही शब्द है जिसका अलग अलग अभिप्राय है ।
ऋषि वे है जिनका ज्ञान अपरिमित है  ,इन्होने वैदिक काल
मे ऋचाओ की रचना की है ।इनकी कही गई बात सत्य होती है ।इनको हम वैज्ञानिक अनुसंधान 
कर्ता भी कहा सकते है।भारतवर्ष मे सात ऋषि हुए हैलो सप्तर्षि कहलाते हैं ।इनका वरदान और शाप दोनो अचूक होता है।लोग इनसे ज्ञान सीखते है  तथा शाप से डरते भी है ,दुर्वासा ऋषि के 
शाप के विषय मे किसने नही सुना है ।
 मुनि सदैव मनन करते है और ज्ञान  प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयत्न किया करते है ।
इसमे नारद मुनि का नाम विशेष रूप से लिया जाता है । इनके कारण ही रत्नाकर बाल्मीकि 
बन पाए ।
साधु के साथ सज्जनता कारण भाव दीखता है  ये सदा सन्मार्ग 
कारण अनुसरण करते है कभी भी गलत राह नही अपनाते है। इनका स्वभाव बहुत ही अच्छा और सरल होताहै ।
 संत  शब्द साधु का ही समान 
गुण का है,  ये अपने अध्ययन की गहराई से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना करते है । ये प्राय 
निर्गुण भाव से परिपूर्ण हुआ करते है और उसी मे विश्वास करतेहै ।जैसे कबीर दास ,रैदास 
आदि ।
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स्वरचित  एवं मौलिक रचना
डा. पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर बिहार 
🙏🌹

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