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अखिल भारती अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 21/6/ 2022 को प्रदत्त विषय ***उल्टी गंगा बहाना ****पर लघुकथा कारों की रचनाएं पढ़ें***********डॉ अलका पांडे मुंबई********



लघु कथा 

विषय उल्टी गंगा बहाना 
शीर्षक 

गिरीश की माता चंद्रिका देवी बहुत ही उदास थी ,और उन्होंने शाम को अपने पति को चाय देते हुए कहा ,आप कुछ कीजिए क्योंकि मैं गिरीश की हरकतों से बहुत परेशान हूं । वहां इतना 
उलजलूल बकवास करता है। हर किसी को गाली गलौज करता है। और मुझे भी ठीक से जवाब नहीं देता मुझे समझ नहीं आ रहा है उसका भविष्य क्या होगा तो  तो निखिल जी हंस कर बोले तुम ही नहीं परेशान थी।
 मैं भी बहुत दिनों से परेशान चल रहा था अचानक उस में आए परिवर्तन को देखकर पर मैंने उसको सही कर दिया है ।हर बात का तोड़ है मेरे पास...
 उसमें होते हुए परिवर्तन को देखोगी तुम ।
 तभी गिरीश कुछ गुनगुनाते हुए घर के अंदर प्रवेश करता है ।
तो निखिल कहते हैं गिरीश यहां आओ और हमारे साथ बैठकर चाय पियो, गिरीश कहता  हैं जी पिता जी जैसा आपका आदेश  चंद्रिका देवी एकदम हैरान परेशान हो जाती है।
 इस अनहोनी  को  देखकर अरे या *उल्टी गंगा ***कहां से बह गई जो  कभी सीधे मुंह बात नहीं करता था, उसने बड़े आदर के साथ पिता से बात की या देखकर उन्होंने ,निखिल को देखा और कहा ये अनहोनी कैसे ? 
 निखिल मुस्कुराए और बोले हर बात का कोई तोड़ होता है और वह तोड़ मैंने निकाल लिया जिससे गिरीश की सारी बदतमीजी सही हो गई तुम हैरान मत हो उसकी *उल्टी गंगा ***बहते हुए देखकर अब या इसी तरह सबसे प्रेम से बातें करेगा कैसे क्या ..मैं बाद में बताऊंगा ।

अलका  पाण्डेय मुंबई
8369853084
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[21/06, 6:33 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- लघु कथा
विषय:-- मुहावरा
शीर्षक:-- *उल्टी गंगा बहना*
         ***************
मेरे बड़े भईया हम सभी भाई - बहनों पर बहुत रोब दिखाते और डांटते भी। हम सभी उनसे बहुत डरते ।पर, एक आदत उनमें बहुत अच्छी थी,वह कोई भी खाने की चीज़ लेकर आते जैसे मिठाई अथवा चाकलेट आदि तो हम सभी भाई-बहनों में बांट कर ही खाते।
    एक दिन रसोईया नहीँ आया तो माँ ने मुझे खाना बनाने की जिम्मेदारी सौंपी ।मैंने बना भी दिया, लेकिन रोज न बनाने की आदत होने के कारण दाल में नमक कुछ ज्यादा हो गया।जिस-जिस ने खाना खाया सबने पूरी आलोचना की-"दाल में नमक" झोंक दिया है, ठीक से खाना नहीं बनाने आता है।इसी तरह घर में सभी ने दाल में अधिक नमक को लेकर-कुछ न कुछ सुनाया, मैं चुप रह कर सुनती रही ।
    लेकिन अब सबसे ज्यादा डर मुझे बड़े भईया से लग रहा था।मैं जानती थी कि जितना सबने सुनाया, उसका दुगना- चौगुना बड़े भईया से सुनना पड़ेगा ।वह कुछ देर से लंच करते थे,लगभग 
डेढ़ बजे वह खाने के लिए आये ।मैंने सब चीजें उनकी प्लेट में अच्छे से लगा दिया, वह खाने लगे और मैं सहमी सी एक तरफ बैठ गई--अब उनसे भी डबल डांट खाने की बारी थी ।
   पर यह क्या -- ? भईया ने तो पूरा खाना फिनिश कर लिया, पर दाल में अधिक नमक को लेकर कुछ नहीं बोले।मुझे आश्चर्य भी हुआ-मैं सहमी सी आवाज़ में उनसे बोली--" भईया,आपको दाल में नमक ज्यादे नहीं लगा क्या?-आप कुछ बोले नहीं ? *यह तो उल्टी गंगा बहाना चित्रार्थ हो गया* । कहकर दोनों भाई बहन हंसने लगे।
   *भईया ने मेरी तरफ देख कर कहा--"साधना, इस बाबत पूरे घर ने तुमको सुना दिया था,और तुमने सुना भी--अब क्या मेरा बताना भी जरूरी था ?*
  हमेशा डांट देने वाले भईया की यह बड़ी बात सुनकर मेरा मन उनके प्रति गर्व और सम्मान से परिपूर्णं हो गया ।
           ***********
विजयेन्द्र मोहन।
[21/06, 8:34 am] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: 21-6-22
लघु कथा
बिषय -उल्टी गंगा बहाना

ठाकुर प्रताप सिंह बडे़ गुस्सैल मिजाज के थे रोज किसी न किसी पर गुस्सा उनका उतरता ही था नौकर
खानसामा पत्नी बच्चे सब पर सब लोग डर से कापते थे।
एक दिन खानसामा बिमार पड़ गया अब खाना कौन बनाये। नौकरानी सब काम कर देगी गुडियाँ खाना बनायेगी ऐसा उनका आदेश
हुआ।गुडियाँ परेशान हो गई
उनकी पत्नी भी चिन्तित थी
आज क्या होगा कारण गुडियाँ कभी खाना नही बनाई थी। नौकरानी की सहायता और माँ की देख रेख मे गुडियाँ खाना बनाई।
रोटी सेक रही थी सारी रोटी फूली नही गुडियाँ के आँख से
झर झर आँसू गिरने लगा माँ
से पूछी माँ अब क्या होगा हमे बहुत बाबू जी से डर लग रहा है। तब तक आवाज आई गुडियाँ खाना लगाओ।
गुडियाँ आवाज सुन के चौका मे पानी पीढा़ रख कर खाना परोसी तब तक बाबू जी आकर बैठ चुके थे खाने में दाल ,चावल ,दो सब्जी , रोटी, दही सब परोसी दी और डरी हुई खडी़ हो गई ठाकुर साहब पहला निवाला
खांते बोले बाह बेटी बहुत अच्छा बनाई हो खडी़ क्यों हो बैठो गुडियाँ के आंसू बडे
वेग से निकल पडें ठाकुर साहब बोले क्यों रो रही हो
गुडियाँ बोली बाबू जी रोटी फूली नही है। तब तक उसकी माँ बोली *आज उल्टी*
*गंगा क्यों बह रही है* आज तो रोटी फूली ही नही है ठाकुर साहब बोले भाग्यवान बच्चा जब पढ़ना
शुरू करता है तब क ख टेढ़ा मेढा़ ही लिखता है *आज का भोजन अमृत समान*  
*है मेरी बेटी ने बनाया है*

यह मेरा स्वयम् का अनुभ है
यह लेख मेरे पिता को समर्पित है।
 
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरखपुर यू.पी
[21/06, 9:04 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - /21//6/2022

विषय/उलटी गंगा बहाना - (परंपरा के विपरीत कार्य करना) -

हरेश एक अच्छा लड़का था। हर काम के लिए तत्पर रहता था। किंतु उसमें तीन बड़े अवगुण थे। पहला वह पैसा कमाने के लिए नौकरी या कोई बिजनिस करना नहीं चाहता था, दूसरा बिना कमाए दूसरों पर निर्भर रहकर अच्छा खाना और अच्छा पहनना पसंद था। तीसरा पैसा मिलते ही शराब पीना। 
फिर भी उसके बहन बहनोई उसे 11वर्ष तक उसकी सारी इच्छाओं की पूर्ति के साथ सहन करते रहे। हां, शराब पीने की सख्त मनाही थी। किंतु यदा कदा वह पीकर आ ही जाता। और बोलने पर झगड़ा करता। अपनी बहन को गाली गलौज करने लगता। नाक में दम हो चुकी थी। इतनी बुराइयों से युक्त निठल्ले व्यक्ति को रखने से सब तंग आ चुके थे। 
एक दिन तंग आकर बहनोई उसके पैरों में गिर पड़े। पत्नी ने दौड़कर उन्हें उठाया। अरे, ये वेबकुफ है ही, *पर तुम उलटी गंगा क्यों बहा रहे हो?*
अब इसको यहां से हटाना ही होगा। 

© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तंड, कोलकाता 
[21/06, 9:57 am] Anita 👅झा: नमन मंच 
विषय -उल्टी गंगा बहाना 
लघुकथा 
लघुकथा 
सौगन्ध
मेडम - चम्पा क्या हुआ ?
तेरा चेहरा उतरा दिखाई दे रहा है ।जब दर्द ज़्यादा होगा ।लापरवाही नही करना मुझे फ़ोन कर देना हास्पिटल महतारी ,जच्चा ,बच्चा वेन चलती है ।जिससे जल्दबाज़ी में दर्द तेज़ हुआ दाईं आया भी रहती है ।पिछली बार जैसे घर पर प्रसव पीड़ा सहते नाल गले फँस गई बच्चे से हाथ धोना पड़े । 
चम्पा ने कहा - मेडम इस बार मैं ख़ुद अपना ज़्यादा ध्यान रखती हुँ !
किसी की कही सुनि बातों नज़र अन्दाज़ कर आगे बढ़ जाती हूँ 
मेडम ने कहा फिर ठीक हैं । 
चम्पा दूसरे दिन नहीं आई , मेडम हास्पिटल पहुँची ।चंप्पा ने कहा 
 मेडम यहाँ आइये ना बेटा हुआ है । सिस्टर ने पास आकर कहाँ कोई नहीं है तुम्हारे साथ ? 
चम्पा ने कहा - सुबह नल में पानी भरते ही दर्द बढ़ गया ।रिक्शे को वही रोका जो वहाँ से गुज़र रहा था । और जैसे ही हास्पिटल पहुँची लेबर रूम में जाते ही , 
 एक महिला को बेड से नीचे उतरने कहा -तुझे टाईम है ? नर्स जैसे ही एनिमा लगान आई । बच्चे का सिर बाहर निकाल नर्स ने कहा - आठ नं चम्पा को बेटा हुआ ।इसके घर के लोगों को बुलाव अब मेडम आप अच्छें टाईम में आ गई । रिक्शे वाले को पैसे दे दीजिये ! मेरा सही नाम न . बता ? मेडिकल फ़ीस भर दीजिये ना । पाँचों बेटियाँ को वो सुख नही मिलेगा मेरे घर के लोगों को सूचना दे दो ? 
चम्पा ने कहा - आप मेरा इतना ध्यान रखती थी । इसी लिये भगवान ने आपको मेरे पास भेज दिया । इसका नाम भी आप लिखवा दो । 
मेडम ने कहा - सौगंध लिखा दिया है । देखो मेडम उसके पापा और दादी दोनो आ गये ।
मेडम से माफ़ी माँगने लगे । मेडम ने कहा इतनी लापरवाही अच्छी बात नही ,कुछ अनहोनी हो जाती तो ये तो वक्त पर पहुँच ही नही पातीबगई । और चम्पा के पति से कहा - खा सौगंध अपने बेटे की कभी दारू नहीं पियेगा , इसका नाम सौगन्ध रखा है ।
श्रीमती अनिता शरद झा
[21/06, 10:04 am] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि- २१-६-२०२२
विषय - उल्टी गंगा बहना
          उल्टी गंगा
   परेश जी का घर बन रहा था तभी उनकी पत्नी की तबीयत बिगड़ गई। 
उसका सब टेस्ट हुआ , फिर इलाज शुरू हुआ। इस सबमें उनका अच्छा खासा पैसा खर्च हो गया। आगे पत्नी के स्वास्थ्य में कब तक और कितना खर्च होगा ठिकाना नहीं है। 
          घर आधा बना पड़ा है। पैसे का इंतज़ाम कैसे होगा समझ में नहीं आ रहा है। एक महीने में बारिश शुरु हो जायेगी कम से कम बाहर का काम तो पूरा होना चाहिए , नहीं तो अधबना घर खराब ही होगा। परेश जी अपने सभी रिश्तेदार और दोस्तों से पूछ चुके थे पर कहीं से सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। तभी उनसे किसी ने कहा -" अशोक से भी एक बार बात कर लो। उन्होंने कहा - "वो तो वैसे ही बहुत कंजूस है ,उससे क्या पूछूं। "
       तभी देखा कि अशोक आ रहा है
उसने कहा - " अभी ही पता चला कि तुम्हें पैसों की ज़रुरत है मेरे पास मेरे रुके हुए पैसे अभी-अभी आये हैं, अधिक तो नहीं पर १ लाख की मदद कर सकता हूॅं। 
परेश जी ने खुश हो कर कहा नेकी और पूछ पूछ। 
फिर धीरे से बड़बड़ाये आज ये उल्टी गंगा किधर से बह रही है। 

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा मुंबई महाराष्ट्र
[21/06, 10:14 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: 21 जून 22 उलटी गंगा बहाना -

एक लड़की थी पूनम। पढ़ने में उसका मन नहीं लगता था। जैसे-तैसे पास हो जाती थी। संयुक्त परिवार था सब परेशान थे। सब बोलते कि बेटा पढ़ लो पर वह ध्यान नहीं देती थी। 

एक दिन उसके दूर के चाचा जी आए। कुशल क्षेम के बाद परिवार वालों ने कहा कि सब बढ़िया है बस पूनम से परेशान हैं। इसका मन पढ़ने में नहीं लगता। 

चाचा जी के पूछने पर पूनम बोली कि पढ़ाई में नहीं हूँ तो क्या? ड्रॉइंग-पेंटिंग, गाने-बजाने में तो बढ़िया हूँ। चाचा जी कहने लगे कि चलो सब का एक-एक उदाहरण दो। 

उसने पेंटिंग बनाई कोई ख़ास नहीं थी। कहने लगी, अच्छी बना लेती हूँ पर कलर अच्छे नहीं है। 

गाना गाने के लिए कहा तो कहने लगी गा तो लेती हूँ पर गला खराब है। 

तब चाचा जी बोले बेटा यह तो वही बात हुई नाच न जाने आँगन टेढ़ा। बेटा जिसे आता है वह गले या रंगों का बहाना नहीं बनाता। 

इसकी तह में पूरी तरह दक्ष न होना दर्शाता है। दक्ष इंसान विपरीत परिस्थितियों को भी अपनी ओर झुका लेता है। दक्षता की कमी ही आप में आत्मविश्वास की कमी दर्शा रही है।

चाचा जी चले गए पर पूनम के मन में बार-बार चाचा जी की बात गूँज रही थी। उसने मन ही मन दृढ़ निश्चय किया कि कुछ भी हो मैं उलटी गंगा बहाकर रहूँगी। चाचा जी की बात को अपना लक्ष्य बनाकर अपने मन में उतार कर पूरी एकाग्रता से पढ़ाई में जुट गई। 

जब उसने ठाना तो ईश्वर भी उसे लक्ष्य तक पहुँचाने में लग गया। सारी निरुत्साहित कड़ियाँ टूटने लगीं वह आसमान छूने को तत्पर हो गई। हर वर्ष उत्कृष्ट परिणाम। दसवीं में टॉप और बारहवीं और बाद में एक महान वैज्ञानिक बन गई। 

उसे समझ में आ गया था कि नाकामियों पर शर्म महसूस करने से कोई लाभ नहीं होता, वरन्
नकारात्मक बातें भूल कर जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। 

पूनम ने यही किया और महान् वैज्ञानिक बन कर उसने अपना, समाज का और पूरे देश का नाम रौशन किया।

जो कमियों से सीख कर आगे बढ़ते हैं वह विश्व विजेता बन जाते हैं। अपनी नाकामियों से कभी न घबराकर उससे सीखते हुए आगे बढ़ जाना चाहिए।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर
[21/06, 10:58 am] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच 
 दिन -मंगलवार
 दिनांक- 21/6/2022 लघु कथा 
प्रदत्त विषय- *उल्टी गंगा बहना* 

नीतू घर में सबसे छोटी लड़की है ।वोलाड प्यार में इतनी अधिक बिगड़ी है कि घर का एक भी काम नहीं करती ।सबसे सिर्फ अपने मन का करवाती है ।सबसे लड़ती है ।उसकी इस आदत से सभी बहुत परेशान हैं। मां हमेशा कहती कि बेटा कुछ काम किया करो ।अब तुम बड़ी हो रही हो। लेकिन वह बात-बात पर सबसे लड़ती रहती ।
            देर तक सोना उठ करके खेलने चले जाना ।सहेलियों के यहां चले जाना या फिर मोबाइल लेकर के बैठ जाना ।सभी लोगों ने उससे बहुत कहा लेकिन उसने किसी की बात ना मानी।
              एक दिन शाम को वो जल्दी 
-जल्दी बैठक रूम ठीक करने लगी। कुछ नाश्ते का भी इंतजाम करने लगी और सबसे अच्छे से बात करने लगी तब नीतू की दादी ने बोला-- आज *उल्टी गंगा कैसे बह गई* किसी को कुछ समझ में नहीं आया।
           थोड़ी देर बाद पता चला कि उसके कुछ दोस्त और सहेलियां घर में पार्टी करने आ रहे हैं ।तब *उल्टी गंगा बहने* का राज सबको मालूम हुआ ।

रागिनी मित्तल कटनी मध्य प्रदेश
[21/06, 1:20 pm] 👑मीना त्रिपाठी: *उल्टी गंगा बहना ( लघुकथा )*

शैली की सुबह रोज 10:00 से 11:00 के बीच हुआ करती थी मां रोज उसे डांटा करती थी । 'कल को ससुराल जाएगी तो कैसे उठेगी ...'मगर उस पर जरा भी असर नहीं होता था। मां कभी हार कर तो कभी गुस्से से छोड़ दिया करती। 'ससुराल जाना तो सारे नखरे समझ आ जाएंगे..' माँ बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर आ जाती।
     आज सुबह से ही घर मे रौनक थी। आज शैली को लड़के वाले देखने आ रहे थे। शैली भी आज किसी तरह उठकर माँ के साथ तैयार होकर किचन में हेल्प करवा रही थी। माँ साथ ही साथ उसे सीख भी देती जा रही थी। 
        शैली सुंदर तो थी ही । सबने उसे पसंद कर लिया और आने वाले तीन माह के बाद की शादी की तिथि भी निकाल ली गई। घर मे सभी खुश थे। लड़का भी इंजीनियर था। तो शैली को भी कोई आपत्ति न थी। मगर शैली की माँ को शैली को लेकर बहुत चिंताएं थी। सब पूर्वत ही रहा.. शैली के उठने के समय में कोई परिवर्तन नही था । बस अब माँ के डायलॉग चेंज हो गए थे..."तीन माह बाद शादी है ..भगवान जाने ये लड़की क्या करेगी ससुराल जा के...ससुराल वाले क्या कहेंगे...माँ ने यही सिखाया है ..देर से उठना.आदि..आदि..!
      अब मात्र दो महीने ही रह गए थे विवाह के...माँ को कल रात से ही कुछ हरारत महसूस हो रही थी। शैली ने उनको आराम करने कहा और खुद रात का पूरा खाना बनाया। माँ मुस्कुराते हुए बोली --ऐसे ही कभी सुबह भी उठ जाया कर...आज 6 बजे शैली माँ के कमरे में जाकर ..माँ और पापा दोनो को चाय देने पहुँची..।
माँ हतप्रभ हो गई शैली को देखकर। और खुश होकर चाय लेते हुए बोली---"आज ये उल्टी गंगा कैसे बह रही है"...शैली ने मुस्कुराते हुए कहा---"अब तो मुझे ससुराल जाना है न! उठूंगी नही तो लोग क्या कहेंगे..माँ ने कुछ सिखाया ही नही..माँ की ही तरह उनके बोल बोलकर वह हंस पड़ी और हंस पड़े पापा और माँ दोनो ही। 
*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*21 जून 2022*
[21/06, 1:23 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक २१/६/२२
विधा ***"लघुकथा
विषय*****
    #***उलटी गंगा बहना#***#
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         मेरे एक जान पहचान के व्यक्ति है जिनका नाम राजेश वालदे हैं । ये दूरसंचार विभाग में काम करते हैं। ये स्वभाव से विनम्र और मिलनसार है । ये बौद्ध समाज के होने के नाते देव , पूजा, भविष्य इन सब से दूर रहते हैं । 
          कभी-कभी जब मिलना होता है तो चर्चा के दौरान यह व्यक्ति हमारी बातों को नकारता है कहते हैं ईश्वर कहां है हम नहीं मानते। हम मनुष्य धर्म को यानी मानवता को महत्व देते हैं । हम भी कहते हैं कि ठीक हैं मानवता को हम भी मानते हैं । ईश्वर पूजा भविष्य में हमारी आस्था है ,और हमारा विश्वास भी है ।
          परंतु जब जब उसको विफलता मिली ।उसका कोई काम बनता नजर नहीं आया तो वह निराश हो गया था । 
           हमने कहा भाई राजेश क्या हुआ क्यों चेहरे पर बारा बजे 
है । क्या करें यार कुछ समझ में नहीं आता लड़की की शादी नही जुड रही हैं । 
       मैंने कहा तुम तो भविष्य, पत्रिका, वगैरा मानते नहीं ।मेरा अगर कहना मानो तो तुम मेरे साथ चलो बच्ची की जन्म पत्रिका लेकर, शायद काम बन जाए ।
      इतना कहकर मैं वहां से चल दिया ।
       15 दिनों के बाद उसने मुझे फोन किया और कहा, चलो भाई देखते हैं ।
          मेरे पहचान के एक पंडित के पास में उसे ले गया । सारी बातें हुई और कहां थोड़ी सी अड़चन है । आपको कुछ नहीं करना है, बस शेगांव के गजानन महाराज की पोथी का एक बार पारायण करना है। महाराज का आशीर्वाद मिल जाएगा ।
          राजेश ने बड़े मनोभाव से पोथी का पारायण किया और चमत्कार हुआ । एक लड़का उसकी लड़की को देखने आया और शादी की बात पक्की हो गई
राजेश बहुत खुश था । 
      मिठाई का डब्बा लेकर राजेश मेरे घर आया मुझे धन्यवाद देने के लिए । जो व्यक्ति ईश्वर , देव, पूजा, पोथी पुराण को नहीं मानता वह आज यह सारी बातें करने लगा । और विश्वास भी करने लगा। 
       इसे कहते हैं, उलटी गंगा बहना । राजेश ने माना कि ब्रह्मांड में कोई शक्ति है जिसे हम ईश्वर या देव कहते हैं ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[21/06, 1:28 pm] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 21 जून 2022 दिन मंगलवार विषय उल्टी गंगा बहाना लघुकथा दो मित्र थे। पहला मन से संकोची होने के कारण ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था। परन्तु दूसरा मित्र हर समय अपने अलग अंदाज़ में कार्य करने में लगा रहता था। जैसे सर्दियों में हो या गर्मियों में बिना ध्यान दिए कार्य में जुट जाता था। एक दिन गर्मी के मौसम में किसी काम से जा रहे थे। पहले मित्र ने कहा बहुत गर्मी है। पानी साथ में लेलें। परन्तु उसने नज़र अंदाज़ कर दिया। थोड़ी देर बाद प्यास के कारण तबियत खराब होने लगी। तभी पहले मित्र ने आनन फानन में पास के अस्पताल में ले गया। तभी डाक्टर ने पानी की बोतलें चढ़ाई।आधा घंटे बाद तबियत कुछ ठीक हुई।तब डाक्टर ने समझाया कि हर समय उल्टी गंगा ना बहाया करो तब उसने गल्तीमानी। भविष्य के लिए ध्यान देने के लिए कहने लगा। डॉ देवीदीन अविनाशी
[21/06, 2:00 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 
विषय: " उल्टी गंगा बहाना "
लघुकथा 
दिनांक: 21/6/22
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    सुरेश चंद्र के दो बेटे,रवि और सन्नी ।
 दोनो तीन साल के छोटे- बडे ।
 बड़ा बचपन से जितना सीधा , छोटा उतना ही तेज- तर्रार और धूर्त ।
पढ़ने- में बड़कू ज्यादातर अच्छे अंक 
लाता ,, छोटकू हर बार पीछे रह जाता ।
इससे कभी-कभी उसे डांट भी खानी पड़ती ।
        लेकिन जैसे- तैसे जिन्दगी की गाड़ी 
आगे बढ़ती गयी , दोनो को स्कूल में नौकरी हो गयी ।मिला जुला कर घर ठीक- ठाक चल रहा था।
        एक दिन कुछ अनहोनी हो गयी,
घर में जिसका डर था वही बात हो गयी।
आखिर उल्टी गंगा बह ही गयी ।
छोटा भाई सन्नी अपनी बैचमेट से कोर्ट
मैरेज करके,माला-वाला पहन कर घर में आ धमका । मिठाई का डिब्बा सामने टेबुल पर रखा और मौन खड़ा रहा फिर ,सहमा सहमा पिता जी की ओर बढ़ा - पाँव छूने ।
       सुरेश चंद्र पीछे हटते हुए कहा----- अबे ,सुनती हो,,,,आखिर में छोटकू ने उल्टी गंगा बहा ही दी ।
       लेकिन क्या करते!
माँ ने कहा--" बाल - बच्चे जो न कराए !!
नवागंतुक के साथ दोनो ने घर में प्रवेश किया !!!
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स्वरचित एवं मौलिक रचना 
डाॅ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर
 बिहार 🌹🙏
[21/06, 2:02 pm] शोभा रानी तिवारी इंदौर: उलटी गंगा बहना लघुकथा

" बेटा मनोज तुम क्या कर रहे हो"? "तुम अपने माता-पिता की और बड़ों की इज्जत क्यों नहीं करते"? " तुम्हारे व्यवहार में इतना अंतर क्यों आ गया है"?
" जब भी मुंह खोलते हो जहर उगलते हो ,आखिर हमसे क्या गलती हो गई? हमने तो तुम्हें शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता की भी शिक्षा दी थी"।
हम क्या करें? कहकर मॉ जागृति रो पड़ी।
' हुआ यह कि जब से मनोज कॉलेज जाने लगा.. तब उसकी संगति बिगड़े हुए अमीर बच्चों के साथ हो गई, वह भी अपने स्टेट्स अच्छा दिखाने के लिए बहुत पैसा खर्च करने लगा, उनके साथ शराब पीना ,सिगरेट पीना शुरु कर दिया ।
देर से घर में आता। माता-पिता को अपशब्द कहना, सिर्फ अपने बारे में सोचना और पैसे न देने पर चोरी करना भी शुरू कर दिया था।
' इतना अच्छा लड़का जो लाखों में एक था जिसकी मिसाल समाज में दी जाती थी ,उसका व्यवहार आक्रामक हो जाना,घरवाले परेशान थे।पर कहते हैं ना कि "हर रात की सुबह होती है"। 'एक दिन रात में जब वह घर लौटा, तो एक बोझ उसके दिमाग में था ।उसे नींद नहीं आ रही थी। वह सोचा था कि... मैं अपनों के साथ गलत व्यवहार क्यों कर रहा हूं? मन में ग्लानि हो रही थी। सुबह जब उठा तो सामान्य था,उठकर माता-पिता को प्रणाम किया। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ! कि आज उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ?
'मनोज माफी मांगने लगा और आंखों में पश्चाताप के आंसू बहने लगे।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी,
619अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक,
इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 8989409210
[21/06, 2:35 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
विषय****लघुकथा *****
****उल्टी गंगा बहाना****
मधु चहकती हुई मेरे पास आई, बोली , देखो दीदी मेहन्दी कितनी अच्छी लगी है, और ये कपड़े सुन्दर है ना। बहुत खुश नज़र आ रही थी। मैने पूछा , क्या बात है, ये सब किसने किया । मधु खुश होकर बोली, ये सब माँ ने किया है, और दीदी पता हैं माँ ने आज मुझे मिठाई भी खाने को दी। मैं कुछ हैरान सी सोचने लगी वो सौतेली माँ जिसने कभी मधु को भर पेट खाना भी नहीं दिया, आज ये उल्टी गंगा कहाँ से बहने लगी । ग्यारह वर्षि मधु चहक कर बोली, पता है दीदी माँ कह रही थी कल हम पहाड़ी वाले मन्दिर जाएँगे, भगवान् जी के दर्शन करने । मै सोचने लगी ये उल्टी गंगा कब से बहने लगी।इसकी माँ तो कभी मंदिर जाती नहीँ ।ज़रूर कुछ दाल में काला है।
          दूसरे दिन मधु अपनी माँ के साथ जाने लगी, मै कालोनी कुछ महिलाओं को साथ लेकर मंदिर गई, वहाँ मधु दुल्हन के वेश में बैठी रो रही थी, और उसके पिता से भी बड़ी उम्र का आदमी दूल्हा बना बैठा था।विवाह की तैयारियां चल रही थी।हमने किसी तरह उनके काम को रोका।और फोन करके पुलिस को बुलाया ।पुलिस ने दूल्हे को और मधु की माँ को गिरफ्तार कर लिया ।पूछताछ के दौरान पता चला, विवाह महज़ एक दिखावा था।वास्तव में मधु की माँ उसका सौदा कर रही थी। मधु रोते हुए मुझसे लिपट गई। मैं खुश थी मधु की माँ का उल्टी गंगा जैसा व्यवहार उसी पर भारी पड़ गया ।
वीना अचतानी जोधपुर ।।
[21/06, 3:10 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय उल्टी गंगा बहाना

विश्वविद्यालय के ऑफिस से सर्टिफिकेट निकलवाना था राहुल 5 साल पहले m.a. की परीक्षा में टॉप किया था नियमानुसार 1 साल के बाद सर्टिफिकेट मिल जाता है पर देखिए राहुल को पास किए हुए 5 वर्ष बीत गए और उसे सर्टिफिकेट अभी तक नहीं मिला है वह विश्वविद्यालय का चक्कर लगाते लगाते थक गया है अंत में निराश होकर छोड़ दिया अचानक उसके मित्र का फोन आया और उसने यह सूचना दी मैंने तो अपना सर्टिफिकेट निकाल लिया तुम भी जाकर निकाल लो राहुल कहने लगा मैं तो बहुत कोशिश किया लेकिन सफल नहीं रहा उसका मित्र बोला अरे जाओ जा अभी उलटी गंगा बह रही है कुलपति बदल गए हैं ना कुलपति के बदलने से पूरा विश्वविद्यालय का कार्य शैली ही बदल गई है जो पहले रिश्वत लेकर काम करते थे अब बिना रिश्वत के तुरंत काम होता है इसलिए तुम जाकर के निकाल लो। राहुल बहुत खुश हुआ वह जब विश्वविद्यालय पहुंचा और अपना आवेदन जमा किया उसे 1 घंटे ठहरने के लिए कहा गया 1 घंटे के अंदर उसके हाथ में सर्टिफिकेट था वह हैरत में आ गया । यह जो उल्टी गंगा बहने लगी है उसके लिए तो प्रबंधन समिति को एक धन्यवाद ज्ञापन तो बनता ही है और बिना हिचक के सीधे विश्वविद्यालय के कुलपति के ऑफिस में पहुंचकर कुलपति को धन्यवाद ज्ञापन किया और अपनी इच्छा जताई अगर इसी तरह विश्वविद्यालय में कार्य होता रहा तो विश्वविद्यालय बहुत जल्दी अच्छे विश्वविद्यालय की श्रेणी में गिना जाएगा।

कुमकुम वेद सेन
[21/06, 3:11 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-उलटी गंगा बहना
(अपेक्षा से हट कर काम करना)
दिनांक;-21/6/2022
सुबह के छः बजे मम्मी ने रीमा को तैयार देख कर मम्मी विस्मय से भर गयीं कि अरे आज सूरज किधर से निकला आज यह उलटी गंगा कहाँ से बह रही है जो तुम इस वक्त तैयार होकर नीचे नजर आ रही हो, रीमा ने आंखें झुका कर कहा जी मम्मी जी मैं अबइसी समय उठा करूँगी ,मैंने बहुत सी गलतियां कीं जाने अनजाने में मुझे क्षमा कर दीजिए कहकर रीमा रोते हुए मम्मी जी अर्थात सावित्री देवी के चरणों मे झुक गयी ।सावित्री देवी ने स्नेह से रीमा को गले लगा लिया और प्यार से पूछा बता बेटी क्या हुआ?
रीमा रोते हुए बोली मम्मी जी आप तो जानती हैं विवाह के पहले पढ़ाई लिखाई व घूमने के अतिरिक्त्त कोई काम नहीं था वहां मम्मी बार बार समझातीं पर मुझे कोई असर ही नहीं हुआ और मेरे आदत व्यवहार में कोई सुधार ही नहीं हुआ।।आनन फानन में मेरा विवाह नीरज से हो गया।यहाँ भी आपको काम करते देख मुझे फर्क नहीं पड़ा। आप ने भी मुझ पर सख्ती नहीं की ।पिछले साल ही भाई का विवाह हुआ।किंतु इन छुट्टियों में जब मैं मम्मी के यहाँ गयी तो मैने अपनी भाभी को भी अपने जैसा व्यवहार करते पाया।।मेरी मम्मी बुखार की हालत में भी सुबह से काम मे लगी हुई थीं व भाभी मीठी नींद में डूबी हुई थी।।
जब मैने यह दृश्य देखा तो मुझे अपनी गलती समझ मे आ गयी।।और मैने स्वयं में सुधार का निर्णय लिया।मम्मी जी अब मैं आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगी।
सावित्री देवी ने रीमा को गले लगाकर कहा।।बेटा जब जागे तब सवेरा।।
ईश्वर करे तुम्हारी मम्मी को भी अपनी बेटी जल्द ही मिल जाये।।
[21/06, 3:26 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ( लघुकथा)
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🌹उलटी गंगा बहना 🌹
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       किरण को मीठा बहुत पसंद था ।वह भोजन के हर कौर के बाद मीठे का एक कौर खाती थी ।बिना मीठा खाएं ,वह भोजन कर ही नहीं सकती थी ।घर में माॅं हमेशा किरण को चेताती थी ,इतना मीठा खाना ठीक नहीं है ।यह बिमारी को निमंत्रित करता है ,पर किरण की कान पर जूॅं तक न रेंगती थी।
          एक बार वह ठोकर खाकर गिर पड़ी। उसका घुटना बुरी तरह फूट गया और रक्त रंजित हो गया। खून देखकर सब घबरा उठे ,तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया ।मरहम पट्टी हुई ,पर उसके घुटने का दर्द ठीक ना हुआ ।घाव और दर्दनाक होता गया। तब ब्लड टेस्ट करवाने पर पता चला उसे बहुत अधिक शुगर है। डॉक्टर ने एकदम हिदायत दे दी ।मीठा बिल्कुल न खाएं। दवाइयों से शुगर पर काबू तो पा लिया गया ।पर जीवन प्रतिबंधित हो गया।
          बेचारी किरण अब भोजन में या कभी भी मीठा खा ही नहीं पाती थी ।मां ने कहा बह उठी ना उल्टी गंगा । किरण मुस्कुरा कर रह गई।
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डॉ.आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र.
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[21/06, 3:26 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय __उल्टी गंगा बहाना _अनहोनी करना 
शीर्षक __ समझ आना 

       शालू और नीलू दो बहनें जिसमे नीलू बड़ी है। बड़ी होने के कारण घर का सारा काम खुद ने अपने जिम्मे ले रखा है, शालू सारा दिन मस्ती करना , पास पड़ोस के बच्चों को इकट्ठा कर लीडर बन डिग हांकना, घर तो बस भूख प्यास लगे जब आना रात को सोना , माँ इन हरकतों से परेशान हों गई थी , दादी पिताजी भी हर कभी माँ को सुनाते रहते तुम्ही ने सर चढ़ा रखा है , माँ आँसू बहाने के अलावा कुछ भी न कर पाती बस ऐसे ही दिन गुजरते जा रहे थे ।
    एक दिन सुबह माँ चक्कर खाकर गिर गई फिर बेहोश हो गई 
तुरन्त डाक्टर के पास ले गए उसने बताया कि यदि थोड़ी देर भी हों जाती तो जान भी जा सकती थी बीपी लो हो चुका है शुगर भी हम कुछ भी नही कर सकते शालू साथ मैं थी उसने डाक्टर की बात सुनी मन ही मन निश्चय किया अब में माँ को बिलकुल भी परेशान नहीं करूंगी 
भगवान के सामने रो रोकर प्रण किया प्रभु, "आप मेरी माँ को पहले जैसा ही कर दो " अबसे मैं कहना मानूंगी ।," डाक्टर की आवाज कानों में पड़ी मरीज को होश आ गया है दौड़कर मां के पास पहुंची माँ ,"आप जल्दी से अच्छे हों जाओ, घर चलो में अब सब कहना मानूंगी आप बस ठीक हो जाओ " ।
       शालू ने माँ की दिनरात सेवा की । माँ को अच्छा कर दिया । 
दादी पापा कहने लगे ,"उल्टी गंगा केसे बहने लगी" ये तो चमत्कार हो गया । नीलू कहने लगी दादी ये अनहोनी हो गई । सब शालू को देखकर हंसने लगे शालू माँ से लिपट गई।


सुनीता अग्रवाल इन्दौर स्वरचित🙏🏻🙏🏻🌹
[21/06, 3:42 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: उल्टी गंगा बहना ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
आलोक की शादी मालती से आठ माह पहले ही तय हो चुका है. आज परिवार के लोग बैठे हैं यह चर्चा करने के लिए कि बरात कैसे जायेगा और उसमें कौन कौन लोग जायेंगे. परिवार के सभी बड़े लोग, आलोक की माँ और अन्य महिलायें भी बैठीं थीं
इतने में अचानक आलोक बंगलौर से आ गया. लोग आश्चर्यचकित हो गये, क्योंकि उसके आने की कोई पूर्वसूचना नहीं थी. खैर उसकी छोटी बहन सरला तुरन्त पानी और चाय ले आयी. सबों ने चाय पिया. इतने में आलोक की माँ ने पूछा बेटा सब ठीक तो है, कभी चर्चा नहीं किया कि तुम आने वाले हो. अभी परसों ही तो रात में तुमसे बात हुई थी. बताते तो एयरपोर्ट कार भेज देती.
आलोक बोला माँ मुझसे यह गलती हो गया लेकिन मैंने भी आने का निश्चय कल ही किया. आलोक के पिता कौशल बाबू ने पूछा कोई खास बात बेटा. आलोक बोला कि पापा कोई खास बात नहीं है लेकिन चूंकि शादी करीब आ रहा है तो मैं एक बात कहना चाहता था.
आलोक की माँ बोली बेटा बोलो, हम सब लोग इसीलिए तो आज बैठे हैं. अच्छा किये तुम आ गये. आलोक बोला कि मेरी इच्छा है कि शादी में तामझाम न दिखा कर हम घर के दस लोग चले जाते हैं और शादी कर लेते हैं. आखिर शादी का धार्मिक रस्म ही तो महत्वपूर्ण है. बहुत लोगों का बारात में जाना, तमाम तरह के तामझाम कोई जरुरी नहीं है.
कौशल बाबू को तो जैसे करंट लगने गया हो. सब लोग सन्न हो गये. एकदम से मौन का वातावरण कमरे में छा गया. थोड़ी देर बाद कौशल बाबू ने कहा तुम्हारा दिमाग खराब है, उल्टी गंगा बहाना चाहते हो. हमारे रिस्तेदार, सम्बन्धी, लड़की वाले क्या कहेंगे. सारी इज्जत चली जायेगी. सभा में भाषण देना और बात है, लेकिन ऐसा करना सम्भव नहीं. समाज में मेरा सम्मान है, कुछ परम्परा होता है, परिवार की मर्यादा है.
थोड़ी देर बाद आलोक ने कहा कि पापा किसी को तो शुरुआत करना ही पड़ेगा, इन फालतू के परम्पराओं को तोड़ने के लिए. परम्परा, मर्यादा आदि के नाम बिना मतलब के पैसे का अपव्यय, दिखावा, ढोंग का कोई मतलब नहीं है. मैंने निश्चय किया कि इसका शूरुवात मैं ही करुंगा. मैंने मालती से भी बात कर लिया है. यह मेरी शादी हो रही है, आत: यह शादी मेरे ही हिसाब से होगा.
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[21/06, 4:27 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 
विषय: " उल्टी गंगा बहाना "
लघुकथा 
दिनांक: 21/6/22
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    सुरेश चंद्र के दो बेटे,रवि और सन्नी ।
 दोनो तीन साल के छोटे- बडे ।
 बड़ा बचपन से जितना सीधा , छोटा उतना ही तेज- तर्रार और धूर्त ।
पढ़ने- में बड़कू ज्यादातर अच्छे अंक 
लाता ,, छोटकू हर बार पीछे रह जाता ।
इससे कभी-कभी उसे डांट भी खानी पड़ती ।
        लेकिन जैसे- तैसे जिन्दगी की गाड़ी 
आगे बढ़ती गयी , दोनो को स्कूल में नौकरी हो गयी ।मिला जुला कर घर ठीक- ठाक चल रहा था।
        एक दिन कुछ अनहोनी हो गयी,
घर में जिसका डर था वही बात हो गयी।
आखिर उल्टी गंगा बह ही गयी ।
छोटा भाई सन्नी अपनी बैचमेट से कोर्ट
मैरेज करके,माला-वाला पहन कर घर में आ धमका । मिठाई का डिब्बा सामने टेबुल पर रखा और मौन खड़ा रहा फिर ,सहमा सहमा पिता जी की ओर बढ़ा - पाँव छूने ।
       सुरेश चंद्र पीछे हटते हुए कहा----- अबे ,सुनती हो,,,,आखिर में छोटकू ने उल्टी गंगा बहा ही दी ।
       लेकिन क्या करते!
माँ ने कहा--" बाल - बच्चे जो न कराए !!
नवागंतुक के साथ दोनो ने घर में प्रवेश किया !!!
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स्वरचित एवं मौलिक रचना 
डाॅ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर
 बिहार 🌹🙏
[21/06, 5:17 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: उल्टी गंगा बहना(लघुकथा)
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      रिया और लीना बहुत अच्छी दोस्त हैं। दोनों में खूब पटती भी थी।तभी फोन की घंटी बज उठती है।"रिया ने जल्दी से फोन लिया...हाय लीना डियर ! बहुत अच्छा लगा जो इस समय तूने फोन किया...?" मैं मुझसे बात करने ही वाली थी...लीना ने कहा-क्या हुआ ...?सब ठीक तो है ना....?रिया -सब तो ठीक नहीं है... "क्या बताऊं... आजकल "मेरी सासू मां का रवैया बहुत ठीक नहीं है..?सुबह से ही खरी -खोटी सुनाती हैं... कभी ये लाओ तो कभी वो लाओ जरा सी देरी पर उफन पड़ती हैं...लगता नहीं कि मैं उनकी बहू हूं... समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं ....? मेरे पति आंफिस चले जाते हैं और बेटा स्कूल चला जाता है....दिनभर मुझे ही सहना और सुनना पड़ता है..? लीना ने कहा --
ओहो तो ये बात है ...तो सुन तुझे जैसा बताती हूं वैसा ही करना...तू बोल तो....देख डियर लिया उनका उम्र भी तो सत्तर के करीब हो चला है...और इस उम्र में एक साथी के रूप में उनके साथ समय बिताने के लिए कोई तो... चाहिए। तू प्यार से उनके साथ कुछ पल गुजार .... बातें कर.... थोड़ी बहुत सेवा कर.... फिर देख कैसे ठीक हो जाती हैं ...?"
      "अब रिया थोड़ा समय निकाल कर उनके पास बैठती.... ,फिर बातें करती.... थोड़ी सेवा भी... धीरे-धीरे उनमें परिवर्तन दिखने लगता है..."अब वो अरे!वो लिया बेटा....आ पास बैठ जा ..तू मेरी लाडली प्यारी बहू है।युग-युग जियो मेरी बच्ची रिया उनकी प्यारी बातों को सुन.... अचंभित।" रिया अब उल्टी गंगा बहते देख"उसके खुशी का ठिकाना न रहा.....वह कभी सासू मां को अपलक देखती रही और सासू मां प्यार से रिया को... दोनों खूब खुशी से एक दूसरे से लिपट जाती हैं।"

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[21/06, 5:32 pm] रानी अग्रवाल: लघुकथा_ उल्टी गंगा बहाना।
२१_६_२०२२.गुरुवार।
     आज उपरोक्त विषय मिला और आज ही महाराष्ट्र में धक्कादायक हलचल देखने को मिली।कल महाराष्ट्र विधान परिषद की १० जगह के लिए चुनाव हुआ। ११वा सदस्य विरोधी पक्ष विजयी हुआ और सत्ता पक्ष के वोटों में फूट पड़ गई।
     इस परिणाम से यह स्पष्ट हो गया कि सत्ता पक्ष के सदस्यों को निर्देश दिए गए थे कि किसे मतदान करना है लेकिन उसका पालन नहीं किया गया इससे यह स्पष्ट हो गया कि बहुत से विधायकों ने" उल्टी गंगा बहा दी"।
     इस प्रकार परंपरा के विपरीत व्यवहार करके उल्टी गंगा बहाई गई और बह गई इसलिए हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए।
स्वरचित मौलिक लघुकथा__
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[21/06, 5:35 pm] ब्रज किशोरी त्रिपाठी: अंग्नि शिखा मंच
    २१-६-२०२२
   बिषय लघु कथा  
   उल्टी गंगा बहाना
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ठाकुर साहब बडे़ सख्त थे
जरा गल्ती पर चिल्लाते गुस्साते थे सब लोग घर में उनसे डरते थे जरा सी बात पर खना फेक देना आम बात थी।
एक दिन उनका खानसामा बिमार पड़ गया ठाकु साहब को पता चला तो वह बोले
आज का खाना गुडियाँ बनाएगीं जो सुना वह डर गया गुडियाँ कभी खाना नही
बनाई थी कौन कहे ठाकुर साहब से अब बात यह हुआ
महरिन बाहर से सब काम कर देगीं माँ जी के देख रेख में गुडियाँ खाना बनायेगीं।
गुडियाँ सब खाना माँ के देख रेख में बनाई रोटी बना रही थी
एक भी रोटी फूली नही गुडियाँ के आँँख से आँँसू निकल गया फिर भी सब रोटी सेक के रखीं तब तक ठाकुर साहब की आवाज आई गुडियाँ खाना लगाओ
गुडियाँ पीढ़ा पानी रख के खाना परोसने लगी तब तक
बाबू जी आकर बैठ गये खाना परोस कर बाबुजी को 
दे कर सामने खडी़ रही बाबु जी बडे़
प्रेम से रोटी खाँ रहे है गुडियाँ से बोले बेटा खड़ी क्यों हो तो गुडियाँ रो के बोली बाबुजी रोटी फूली नहीं हैऔर रो पडी़ ठाकुर साहब बोले बेटा खाना
बहुत बढि़या बना है ठकुराइन सुनी तो बोली *आज कैसे उल्टी गंगा बह रही है* *एक भी रोटी फूली नही है* *ठाकुर साहब बोले* *भाग्यवान जो बच्चा प्रथम दिन क ख लिखता है* *तो टेढ़ा मेढा़ ही लिखता है सब* *लोग कहते है बहुत अच्छा है मेरी बेटी भी आज* *पहली बार भोजन बनाई है यह भोजन अमृत* *तुल्य है यह सुनते गुडियाँ के झर झर आँँसू बहने लगा बाबु जी कह कर पिता से लिपट*
*गई आज पता चला सख्त दिल में भी प्यार होता है*

*स्वरचित*
*बृजकिशोरी त्रिपाठी* 
*गोरखपुर यू पी*
[21/06, 5:45 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *लघुकथा*

विषय उल्टी गंगा बहना
अर्थ :- *अनहोनी करना*। समझ आना

     ",देखना तुमने मेरे हिस्से की थोडी जगह ज्यादा ली। ऐसा कैसा? नहीं नहीं रमेश ने अपने बड़े भाई से कहा ",बंटवारे में थोड़ा उन्नीस बीस होता है बाबुजी ने कहा! नहीं नहीं बाबुजी ऐसा कैसा होता ? मै छोटा हुं दोनों सगे भाई बराबर का हिस्सा करना था। चलो जल्दी हाथ पैर धो और खाना खा लो मां सरला एवं पिताजी किशनचंद्र बड़े परेशान हुए क्यों मेरे मन बंटवारे के ख्याल आये।
        दो तीन साल से दोनों भाई
 एक दुसरे से बोलना तो दुर एक दूसरे को देखते तक नहीं थे। सुरेश और रमेश के बच्चे में आपस में खेलते थे हुए बातो बातो में रमेश के बेटे अविष्कार पुछा ने पूछा? "दादा जी बड़े पिताजी एवं मेरे पिता बचपन हमारे जैसे खेलते थे क्या यह बोलते ही दादाजी के आंखों में गंगा यमुना जैसे धारा बहने लगी दादाजी ने धोती से आंखें पोछते हुए कहा,हा मेरे अवि यह बात समाचार पत्र पढ़ते हुए बेटे ने सुनी उससे रहा नहीं गया दुसरे दिन दोनों भाई रमेश और सुरेश पिता के चरणों में गिरकर माफी मांगी दोनों भाई गले मिलकर चलो बच्चों आज इतवार है शाम को घूमने जाएंगे और बाहर ही खाना खायेंगे दोनों भाई का परिवार बच्चे दादाजी मां पार्वती दोनों भाई अपने अपने कार में होटल में खाना खाते मां सरला ने बोला"अरे वाह आज तो कमाल हुआ *यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी* है।
यह बोलते ही सारी परिवार हंसने लगा मां पिता के खाने से ज्यादा 
दोनों बेटे जो मनमुटाव हुआ था वह खत्म हुआ।

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक २१/०६/२०२२
[21/06, 6:08 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय- उल्टी गंगा बहाना (लघुकथा)

     मालती रोज सुबह घूमने जाती थी, पर उसका बेटा राजू सोता रहता था। एक दिन राजू ने अपनी मम्मी की शुगर चेक की, तो काफी बढी़ निकली। राजू थोड़ा परेशान हो गया।
      दूसरे दिन मालती रोज की तरह घूमने जाने लगी, तो राजू उठा, और बोला-" मम्मी आप थोड़ी देर ठहर जाइए, मैं चाय बना कर लाता हूं।" मालती हंसी और बोली-" आज ये उल्टी गंगा कैसे बह रही है?"
   राजू बोला-" मम्मी मैंने आपकी शुगर चेक की थी, तो बहुत बढी़ हुई थी, इसलिए आपके घूमने जाने से पहले, मैं चाय बना दिया करूंगा। कुछ खा पी कर जाइएगा।"
    मालती भी राजू की बात सुन कर मुस्कुरा दी और थोड़ी देर ठहर गई।

डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
21-6-22
[21/06, 6:14 pm] पल्लवी झा ( रायपुर ) सांझा: विधा -लघुकथा
विषय-उल्टी गंगा बहना 
तिथि-२१जून २०२२

सुबह कविता को माँ उठाने गयी तो वह अपने कमरे में नहीं थी चूंकि कुछ दिन से कविता की तबीयत खराब चल रही थी वह थी तो बीस साल की पर खाने सोने और बैठे बैठे ज्यादा रहने से चर्बी बढ़ने के साथ बहुत सी समस्या के चलते कुछ दिन पहले ही एडमीट होना पड़ गया था उसके स्वास्थ और भविष्य को देखते हुए सभी कुछ न कुछ समझाते रहते थे तो घरवालों को किसी अनहोनी का अंदेशा होने लगा सभी घर बाहर मोहल्ले ढूंढ आये माँ का रो-रोकर बुरा हाल हो रहा था तभी दरवाजे से कविता चहकते हुए अंदर आई उसे देखकर सभी चकित रह गये हर समय खाने और सोने वाली कविता मुस्कुराते हुए योग दिवस की सभी को बधाई दे रही थी उसके पहनावे और उसे देख लग रहा था वह सचमुच योगा करके आ रही ।
     माँ ने झट आंसू पोछते पूछा "आज उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ?"
"कविता ने कहां रोज तो सबकी बातें मैं यूं ही अनसुना कर देती थी पर उस दिन जो मेरी तबियत खराब हुई और मुझे लेडी डाक्टर ने आकर प्यार से समझाया कि ऐसे ही रही तो मैं अपनी वजन के चलते दूसरों का क्या अपना जरूरी काम भी नहीं कर पाऊंगी और उन्होंने मुझे बहुत सी ऐसी तस्वीर दिखाईं जिनको देखकर ही मुझे डर लग रहा था तो मैंने तभी से ठान लिया इक्कीज जून आ ही गया तो इस शुभ दिन से ही मैं अपने स्वास्थ पर ध्यान देना शुरू कर दूंगी और योगा करूंगी और माँ को बाहों में भरकर कहती हैं अब से शाम की रोटियां मैं ही बनाया करूंगी और छोटे मोटे आस-पास के काम भी पैदल ही कर आया करूंगी इसमें मेरा ही तो फायदा है ।" 
अब तक जो सभी के चेहरे के भाव उड़े थे अब उनमें अलग सा सुकून दिख रहा था ।

पल्लवी झा (रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़

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