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अखिल भारती अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 17 /5 /2022 को प्रदत्त विषय पर लघु कथाएं ***तोबा करना*** पर लघु कथाएं पढ़,,********** अलका पांडे मुंबई


तोबा करना

मीना  ने किरण को आवाज लगाई चल जल्दी से खेलने के लिए , सारी  सहेलियां मैदान में खेल रही हैं  । हमे देर हो गई है स किरण भागती  हुई  आई ...उसके हाथ में खाने के लिए मां की बनाई हुई बर्फी थी , आकर  उसने मीना को एक बर्फी दिया ओर बोली  चल खाएंगे आज सब मिलकर बड़ा मजा आएगा । मीना और किरण ग्राउंड में पहुंचे तो देखते हैं कि रोमा आम के पेड़  पर चढ़ी हुई है और बाकी  सहेलिया  नीचे उसे नीचे उतरने को कह रही है कि.. और ऊपर मत जा गिरेगी तो टांग टूट जाएगी पर वह मान नहीं रही है बोलती है मुझे बहुत मजा आ रहा है, और ऊपर जाऊंगी और ऊपरवाला आम भी तोड कर
लाती हूं,  सब उसको मना कर रहे हैं पर वह नहीं मान रही है ।
तब किरण कहती है मेरे पास कितनी अच्छीमां के हाथ की बनी बर्फी  है। आओ सब मिलकर खाएंगे बड़ा मजा आएगा रोमा आम को भूल जाओगी।
नीचे आ जाओ अभी किरन उसे आवाज दे ही रही थी कि चल चल की आवाज के साथ आम की डाल टूटने की आवाज आई और किरण धड़ाम से नीचे गिरी और उसके जोर जोर से रोने की आवाज से सब डर गए अब क्या होगा तभी सुशीला ने उसे उठाया तो देखा उसके घुटने बुरी तरह छिल गए थे उससे थोड़ा थोड़ा खून बह रहा था सब ने रोमा को सहारा दिया और साइड में बिठा लिया रोमा रोते हुए बोली आप सब की बात नहीं मान कर मैंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है कितना तुम लोग मना कर रही थी अब मैं तोबा करती हूं आज के बाद सबका कहना सुनूंगी बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करूंगी तभी पास से रामू काका गुजर रहे थे उन्होंने देखा ही लड़कियां क्यों जमघट लगाए हुए हैं उन्होंने पास में आकर देखा कि रोमा को चोट लग गई है तो उन्होंने कहा चलो मैं तुम्हें पास में क्लीनिक पर ले चलता हूं और मरहम पट्टी करवा देता हूं कहां काका अब मैं क्या करूं मेरे से गलती हो गई है पर मैं तोबा करती हूं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूंगी रामू काका ने हंसकर कहा कोई बात नहीं तुम्हारी मां को समझा दूंगा , शुक्र मनाओ ...ज्यादा चोट नहीं आई जल्दी ठीक हो जाओगी ।
रोमा मैं अपने हाथों से काम को पकड़े और सभी सहेलियों को बोली तोबा तोबा अब मैं तोबा करती हूं मैं आगे से तुम्हारी बात जरूर मानूंगी!.
अलका पाण्डेय मुम्बई


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[17/05, 8:15 am] रानी अग्रवाल: समुंद्र किनारे की सैर।
१७_५_२०२२,मंगलवार।
तोबा करना_ किसी काम को न करने की कसम खाना।
विधा__लघुकथा।
शीर्षक_समुंद्र किनारे की सैर।
     एक बार मैं अपनी सहेलियों के साथ समुंद्र के किनारे सैर के लिए गए।समुंद्र में उफनती हुई लहरें किनारे तक आकर समतल हो रही थीं उन्हें देखकर हमारा मन मचल उठा और हमने पानी के अंदर जाने की सोची।
    हम धीरे_ धीरे पानी के अंदर जाने लगे।हम घुटनों तक पानी में पहुंच गए।मेरी सहेलियां और आगे बढ़ीं पर मैं रुक गई क्योंकि मैंने सोचा मेरे लिए और आगे जाना उचित नहीं होगा।मेरी सहेलियां और आगे कंधों तक की गहराई के पानी में चलीं गईं और पानी में खेलने लगी,मैं दूर से ये सब देख रही थी और मजे ले रही थी।और अपनी कम गहराई की लहरों में ही खुश थी।
इतने में मेरी एक सहेली बोली तुम भी यहां आ जाओ,बहुत मजा आयेगा,मैने कहा_ नहीं मैं यहां ही ठीक हूं।पर वो और दो सहेलियां मेरे पास आकर बोली चलो हम तुम्हारा हाथ पकड़ के ले चलेंगे,कुछ नही होगा।मैं डरते_ डरते उनका हाथ पकड़कर आगे बढ़ रही थी कि इतने में एक जोर की लहर आई और मेरा संतुलन बिगड़ गया,मैं पानी में गिर गई,पर मैंने सहेलियों के हाथ नहीं छोड़े,उन्होंने खींचकर मुझे निकल लिया ,हम बड़ी मुश्किल से पानी में खड़े हो पाए।हम सब डर गए।मेरी तो जान ही निकल गई थी कि आज तो गए पर बच गई।
     इसके बाद हम सभी पानी से बाहर निकल आए।भगवान का धन्यवाद किया और मैंने तो" तोबा कर ली" कि कभी भी किसी के कहने से गहरे पानी में नहीं जाऊंगी।कसम खाई कि ऐसा काम कभी नहीं करूंगी और इससे सबक सीखा कि कभी किसी के कहे में आकर वो काम नहीं करना चाहिए जिसमें हमारे लिए खतरा हो।
स्वरचित मौलिक लघुकथा___
रानी अग्रवाल,मुंबई।
[17/05, 8:24 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: मंगल वार - 17/5/2022
विषय / मुहावरा –तोबा करना 
अर्थ – किसी काम को न करने की कसम खाना

नन्हा कान्हा  
तोबा करना
कान्हा बहुत गरीब घर का बच्चा था। उसके पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। वह गुरुजी के पास पढ़ने जाता जहाँ पर सारे अमीर बच्चे पढ़ते थे। सब कुछ ना कुछ गुरुजी के लिए लेकर आते रहते थे। एक बार गुरु जी ने कहा कि सब दूध की एक-एक मटकी लाएँगे। विद्यालय में खीर बनाकर सबको परोसी जाएगी और जो नहीं लाएगा उसे मार पड़ेगी। कान्हा डर गया था। घर गया और माँ से कहने लगा कि कल मुझे भी मटकी भर दूध ले जाना है। अगर नहीं लेकर गया तो मुझे मार पड़ेगी। 

माँ ने कहा-"बेटा हमारे पास कहाँ है? हमने तो तुम्हें भी आटे का घोल देकर पाला है।"  

नहीं माँ, दूध ले जाना ही पड़ेगा नहीं तो मुझे मार पड़ेगी।

तब कुछ सोचकर माँ ने कहा कि तुम गोपाल से माँगो। वे तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकते हैं।

कान्हा ने पूछा-"माँ गोपाल कहाँ मिलेंगे?"

माँ ने कहा कि जंगल में।

कान्हा-"मुझे क्या करना होगा?"

माँ-"वन में जाकर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाना, गोपाल आ जाएँगे तब तुम जो भी माँगोगे तुम्हें दे देंगे।"

वह नन्हा-सा बच्चा वन में जाकर ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगा। गोपाल! गोपाल! मुझे दूध की मटकी चाहिए। गोपाल मुझे दूध की मटकी चाहिए। मेरे विद्यालय में गुरु जी ने मंगाया है वह रो-रो के पुकारने लगा।

 बहुत पुकार के बाद गोपाल आए और एक छोटी-सी मटकी दूध की गई दे गए। जब मटकी लेकर कान्हा विद्यालय पहुँचा तो सब उसका मज़ाक  उड़ाने लगे। मास्टर जी ने कहा-'इस छोटी-सी मटकी से क्या होगा?"

खैर सबसे पहले उसी की मटकी का दूध डाला गया। यह क्या! दूध खत्म ही नहीं हो रहा था। सारे पात्र भर गए पर दूध फिर भी बच गया। 

गुरुजी-"दूध कहाँ से लाए।"

कान्हा-"गोपाल ने दिया।"

गुरुजी-"कहाँ रहते हैं?"

कान्हा-"वन में।"

गुरुजी श्री कृष्ण की करामात समझ गए। उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी भविष्य में ऐसा न करने की तौबा कर ली।

सच ही कहते हैं कि जिसका कोई नहीं उसका प्रभु है यारो।

वैष्णो खत्री वेदिका
[17/05, 8:37 am] राम Ram राय: लघुकथा
तौबा करना
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"नहीं अब यह काम नहीं करूंगा।मुझे माफ कर दो भाई ! मैंने बहुत गलती की।"  कहते -कहते विजय दहाड़ मार कर रोने लगा। विजय को रोते देख डॉक्टर साहब अजय की मरहम पट्टी कर कहने लगे कि "अब चिंता की कोई बात नहीं,कुछ ही देर में होश आ जाएगा।" इस पर विजय कहने लगा कि "आज हम लोग कॉलेज छोड़ कर पिकनिक मनाने गए थे। रास्ते में मेरे ही कहने पर अजय ने भी शराब पी लिया और बाईक दुर्घटना हो गई "।कहते हुऐ वह पुनः रोने लगा। डॉक्टर साहब कहने लगे कि "शराब बहुत बुरी चीज है।आज भगवान की कृपा से दोनों बच गए। अभी शपथ लो कि जीवन में कभी शराब की ओर देखूंगा भी नहीं ।" डॉक्टर साहब की बात समाप्त होते ही विजय ने उनके पांव पकड़ लिऐ और कहने लगा कि "आज के बाद जीवन में न शराब की ओर देखूंगा और न ही किसी को पीने दूंगा।"
@ श्रीराम राय palolife.com
[17/05, 9:22 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: मुहावरा –तोबा करना 
अर्थ – किसी काम को न करने की कसम खाना

कुंवर एक मेधावी छात्र था । वह विद्यार्थी जीवन से ही कविताएं लिखने लगा था। सौभाग्य ऐसा रहा कि मंचों पर भी उसको स्थान मिलने लगा । सम्मान के साथ बुलाया भी जाने लगा। बड़े-बड़े कवियों के साथ उसका परिचय हुआ। उनके साथ उठना बैठना शुरू हुआ। कविता का विकास हुआ । लेकिन कुछ बड़े कवियों की देखा देखी कुछ बुराइयां भी आ गई।

उसने देखा कुछ बड़े कवि शराब पीते हैं कुछ भांग खाते हैं और मंचों पर खूब जमते हैं।

युवा कुंवर ने सोचा उनके जमने का कारण शायद यही है। इससे मंच पर उनकी झिझक निकल जाती है।

मनुष्य अच्छाइयां जल्दी नहीं पकड़ता मगर बुराइयां बड़ी मधुर होती हैं । एक कवि सम्मेलन में उसने भी बड़े कवियों की देखा देखी एक छोटी सी गोली भंग की गले में डाल ली।

नया कवि होने के कारण उसे आगे ही पढ़ने का मौका मिल गया । उसने खूब तरन्नुम से कविता पड़ी , वाहवाही लूटी, खूब तालियां मिली। वह खुशी-खुशी सब का आशीर्वाद लेते हुए अपने स्थान पर बैठ गया और आज की अपनी विजय पर प्रसन्न होने लगा। भविष्य के सपने बुनने लगा।

थोड़ी देर में प्यास लगी मंच पर पानी वाले घूम रहे थे । पानी पी लिया । थोड़ी देर के बाद भंग ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया । अब तो उसका सीधा बैठना मुश्किल हो गया । वह सीधा गर्दन करके बैठ जाता लेकिन थोड़ी देर के बाद ही गर्दन लटक जाती।

वह समझ गया इसका कारण क्या है । उसने अपने सीनियर कवियों से विनय पूर्वक कहा दादा मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मैं मंच के पीछे लेट रहा हूं । दूसरे दौर में कृपया मुझे ना बुलाएं । कवि सम्मेलन समाप्त होने पर ही मुझे जगा दें।

संचालक ने उसे दोबारा नहीं बुलाया । कवि सम्मेलन समाप्त हो गया । कवियों को लिफाफे दिए जाने लगे। तब संचालक ने कुंवर को उठाया । कुंवर की आंखों में अभी भी खुमारी थी । उसने उठकर लिफाफा ले लिया और सब कवियों के साथ साथ बस पकड़ने के लिए बस स्टैंड की ओर चल पड़ा।

बीच में एक दुकान पर गरम गरम जलेबीयां सिक रही थीं। कवियों की इच्छा हुई यहां नाश्ता कर लिया जाए। कुंवर ने भी उनके साथ समोसा जलेबियां खाईं। उसके बाद तो नशे ने और भी रंग दिखाया।

जैसे तैसे कुंवर अपने घर पहुंचा । घर पहुंचते ही उसके हाव भाव देखकर बड़े भाई जो स्वयं एक कवि थे और इन चीजों से वाकिफ थे, समझ गए।

कुंवर का पहला मौका था अतः यह नशा कई दिन तक चला । कॉलेज जाना भी नहीं हो पाया।
इसके बाद  कुंवर ने इस नशे से *हमेशा हमेशा के लिए तौबा कर ली* 

अब वह मंच पर जाता। पूरे आत्मविश्वास के साथ कविताएं पढ़ता। पर नशे को हाथ नहीं लगाता।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[17/05, 9:35 am] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लघुकथा)
   🌷 तोबा करना 🌷
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        रमा और रजि़या अड़ोसी पड़ोसी थीं । बचपन से ही साथ खेले- खाए ,बड़े हुए, एक ही स्कूल के ,एक ही कक्षा से पढ़ाई शुरू हुई। दोनों पढ़ने खेलने ,अन्य सभी कार्यों में दक्ष थीं । दोनों का परीक्षा फल आगे पीछे ही आता था ।कोई किसी से कम न थीं । असीम प्रेम भाव भी भरा हुआ था ।कहीं द्वेष भाव न था ।दोनों एक दूसरे के लिए समर्पित थीं।   
        ‌ रमा का ब्याह निश्चित हुआ ।रजिया ने कदम कदम पर उसका साथ दिया ।कपड़े ,गहने, श्रृंगार ,प्रत्येक कार्य में रजिया के बिना कुछ न होता। रमा की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी रमा की मां ने रजिया को सौंप दी ।उसका सूटकेस, श्रृंगारदान, गहने , दिगर सामान,जूते चप्पल तक की मैचिंग रज़िया ने बखूबी निभाई।                                                         ब           ब्याह के दिन धूमधाम से ब्याह हुआ। सब कुछ शांति पूर्वक संपन्न हुआ। रमा बिदा भी हो गई ।बारात दुल्हन को अपने साथ ले गई ।घर एकदम सूना सूना हो गया। सप्ताह भर बाद   पगफेरे की रस्म करना था। रमा की मां और अन्य रिश्तेदारों के साथ रजिया भी रमा को लिवा लाने के लिए उसके ससुराल गई।
         रमा के देवर की नजर रजिया पर थी। रजिया भी महसूस कर रही थी ।उसने रमा से चर्चा भी की ,कि "तेरा देवर लाइन मार रहा है।" पगफेरे के दिन रजिया को अकेली पाकर देवर ने करीब आना चाहा। रज़िया ने हाथ झटक दिया ।गुस्से से देखकर, वह रस्म पूरी होने पर ,घर आ गई। उसी दिन उसने तौबा कर ली, कि अब वह रमा के ससुराल कभी नहीं जाएगी ,क्योंकि रज़िया ने सही सोचा ,जो संबंध हो नहीं सकते उन्हें हवा देने से क्या फायदा।
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डॉ,आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र .
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[17/05, 10:41 am] 😇ब्रीज किशोर: अंग्नि शिखा मंच को नमन
     १७/५/२०२२
  बिषय-तौबा करना

श्रीकृष्णा की भक्त मीरा जी बृन्दावन मे मन्दिर मे रहती थी और अपने गिरधर गोपाल के सेवा में लगी रहती  थी उनको भगवान का भोग बनाने का सेवा मिला था वह बडे़ प्रेम से अपने गिरधर गोपाल का भोग बनाती थी।
और भगवान भी उसको प्रेम 
से भोग लगातेथे।
एक दिन बड़े महंथ से सेवादारों ने शिकायत की कि मीरा बिना स्नान के ही प्रभु का भोग बनाती है। महंथ जी
मीरा को बुलाकर कहे ,मीरा जी भोग स्नान करके बनाइये। मीरा जी दुसरे दिन सोचती रही ठीक से स्नान कर लू तो भोग बानाऊँ।
स्नान करके मीरा भोग बनाने
लगी और मन मे सोचती पता
नही स्नान ठीक से हुआ की नही। गिरधर के लिए जो भजन के माध्यम से प्रेम अर्पित करती और भोग बनाती थी आज उनका मन भटक गया था स्नान में।भोग बन गया कान्हा को भोग लगाया गया।रात मे महंथ जी
से सपने में कान्हा बोले बाबा भूख लगी है महंथ जी बोले लाला भोग तो लगाये थे। कान्हा बोले बाबा भोग बेस्वाद था मैने खाया नही।महंथ जी बोले भोग तो मीरा
ने बनाया था कान्हा बोले आज मीरा स्नान के बारे सोचती रही भोग प्रेम से नही
बनाई बाबा मीरा को नहाने
की जरूरत नही है वह तो मेरे
प्रेम रस से सदा स्नान करती है।महंथ जी की नीद उड गई
और आँख सेअश्रु धारा बहने
लगी ।ओह मैने क्या किया कृष्ण प्रेम में मीरा सदा पवित्र है। *तौबा कर रहा हूँ* मै अब कभी मीरा को कोई आदेश नही दूगा।सुबह हुई मीरा को बुलाया गया महंथ जी बोले मीरा भोग बन गया
मीरा बोली नही अभी स्नान नही की हूँ महंथ जी बोले मीरा मै आप से माफी मांगता हूँ आप जैसे चाहे वैसे भोग बना दें लाला मेरा भूखा है।
इतना सुनते मीरा पाकशाला के तरफ दौड़ गई और गाती जारही थी गिरधर मेरा भूखा है।गिरधर के प्रेम मे दिवानी मीरा प्रेम से भोग बनाने लगी।
स्वरचित
बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ भानुजा गोरखपुर यू.पी
[17/05, 12:44 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक १७/५/२२
विधा****लघुकथा
विषय***#***तौबा करना***#
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(कोई काम न करनेकी कसम खाना )
     
        इंसान जब किसी वजह से ठोकर खाता है, बर्बादी के कगार पर आता है , या भारी नुकसान होने की नौबत आती है तो वह उससे दूर रहने की कोशिश करता है ,उससे तोबा करता है ।और कसम खाता है कि जिंदगी में वो काम नहीं करेगा जिससे  आर्थिक, सामाजिक , आत्मिक,और शारीरिक नुकसान होता है ।
         मैं एक सच्ची घटना पर लघुकथा दे रहा हूं जो मेरे ही एक गांव के मित्र से जुड़ी है । सुनील मेश्राम नाम का लड़का था , हम साथ-साथ पढ़े लेकिन मैं घर का सधन था इसलिए नागपुर शहर में पढ़ने आ गया और वह बेचारा गांव में ही रह गया आर्थिक पिछड़ेपन के कारण । 
         आप सब जानते हैं कि गांव में विकास की गति कम होती है शैक्षणिक सुविधाएं भी नहीं होती । इसलिए वह शिक्षा नहीं ले पाया , आगे नहीं बढ़ पाया ।
         10,12 साल के बाद में जब गांव गया तो पता चला कि सुनील को शराब की लत लगी है जिसके कारण उसकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई है । मैं तुरंत उससे मिलने गया और उसको समझाया । जीवन क्या है यह बताया।  मैं दो-चार दिन गांव में ही ठहरा हुआ था  क्योंकि मुझे दो माह की शैक्षणिक छुट्टियां मिली हुई थी तो रोज उस से मिलता उससे बात करता ।उसको हर तरह से रास्ते पर लाने की कोशिश करता ।
        मैं जितने दिन था उतने दिन उसने शराब नहीं पी। मैंने कहा अब मैं जा रहा हूं लेकिन मुझे एक वचन दे कि मेरे जाने के बाद तू शराब को छुएगा नहीं । अपने काम धंधे से लगा रहेगा अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगा और परिवार को संभालेगा । 
            उसने मुझे वचन दिया शराब नहीं पीने का । उसने कहा, मित्र, मैं ईश्वर की कसम खाता हूं , मैं इस बुरी लत से तोबा करता हूं तब मैं भी खुश हुआ । मैंने उससे कहा था, जो भी तुझे मदद लगेगी मुझसे बेहिचक मांगना । 
          एक दिन वह खुद ही मुझसे मिलने नागपुर आया । उसका हुलिया देखकर मैं समझ गया कि ये निरव्यसन है स्वस्थ मस्त है । मैं बहुत आनंदित हुआ ।
          मित्रों, किसी को अगर बुरी लत से छुटकारा पाना है तो वह उस चीज से तौबा कर सकता है । बस मन में इमानदारी हो, निर्णय पक्का हों कुछ करने की ठान ली तो इंसान सब कुछ कर सकता है ।
        
      
प्रा रविशंकर कोलते,
     नागपुर
[17/05, 12:47 pm] Dravinasi🏆🏆: अग्नि शिखा मंच दिनांक 17मई 2022 दिन मंगलवार  विषय तौबा करना बिधा लघुकथा      दो मित्र साथ साथ एक ही क्लास में पढ रहे थे।पहला मौका लगा कर पढता रहता था जिसके करुणा बहुत ही होशियार था। और अच्छे नम्बरो से पास हो जाने के कारण उसको नौकरी मिल गई।दूसरा मित्र फेल हो गया। तब उसके आखे हों गई और खेलने से तौबा कर लिया।वह दूसरी साल मन  लगाकर पढ़ने लगा तब कहीं परीक्षा में पास  हुआ। तब उसके जान में जान आई।     डां देवीदीन अविनाशी
[17/05, 12:50 pm] शेभा रानी तिवारी इंदौर: तौबा करना लघुकथा

" बेटा अनिल! तुम भविष्य में क्या बनना चाहोगे"? " मां ने कहा मैं तो फौज में जाना चाहता हूं ,और देश सेवा करना चाहता हूं"।
"तो फिर तैयारी शुरू कर दो".."जी मॉ जी"।

' तभी बाहर से आवाज आई ,अनिल -अनिल आ रहा हूं ।अनिल ने देखा कि उसके दोस्त आए हैं। "अरे यार! दिन भर पढ़ाई- पढ़ाई,कुछ मनोरंजन भी तो होना चाहिए"।
"हम सब कल पिकनिक पर जा रहे हैं, तुम भी चलो"?
"अरे नहीं यार! मैं नहीं जा सकता,चलो अब मना मत करना, बस एक दिन की तो बात है", अच्छा ठीक है ।दूसरे दिन  अनिल दोस्तों के साथ चला गया ,वहां पर खाना खाने के बाद के दोस्तों ने उसे शराब पिला दी,"मैं शराब  नहीं पीता"।
"अरे यार! एक दिन पीने से तुम शराबी नहीं  हो जाओगे।एक शाम  दोस्तों के नाम ".।
'धीरे-धीरे अनिल को  शराब पीने की आदत पड़ गई ।पढ़ाई-लिखाई बंद हो गया... वह शराब पीकर सोया रहता था।मॉं भी दुखी थी, कि बेटे को क्या हो गया ? अनिल भी इस लत से बाहर निकलना चाहता था ।मॉ ने हिम्मत नहीं हारी, और अनिल को नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती करा दिया। धीरे-धीरे उसकी शराब पीने की आदत छूट गई।
" अनिल ने कहा..." मां मुझे तो देशभक्ति का नशा था, और मैं अपने सपनों को पूरा करना चाहता हूं"।
अनिल ने इस नशे से अपने आपको हमेशा के लिए तौबा कर लिया, और अपने साथियों से भी।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी ,
619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर,
 मध्य प्रदेश मोबाइल 8989409210
[17/05, 1:17 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्नि शिखा मंच
तिथि- १७-५-२०२२
विषय- लघुकथा-तौबा करना-किसी काम को ना करने की कसम खाना
            गप्पें
      निशा और इशरत  विदेश में रहती , पड़ोसी और  बहुत अच्छी सहेलियां हैं। निशा ऑफिस से शाम ४,,५ बजे तक घर आती। इशरत का काम घर से होता है वो भी जल्दी ही फ्री हो जाती। फिर दोनों सहेलियां एक साथ शाम की चाय पीतीं। ऐसा हफ्ते में २ बार तो होता ही है।  इशरत पाकिस्तानी है। उसकी हिंदी मिश्रित उर्दू निशा को अच्छी लगती और इशरत को निशा की लखनऊ की आप जनाब की बोली अच्छी लगती।  परदेस में जब कोई अपना सा मिल जाए तो बहुत अच्छा लगता है।  दोनों जब गप्पें मारती हैं घंटा कब निकल जाता है पता नहीं चलता। इन दोनों का टाॅपिक अधिकतर मंहगाई ,    घर के काम की परेशानी रहती है।  भारत में दंगे फैले थे और इसमें पकिस्तान का हाथ बताया जा रहा था।  दोनों सहेलियां चाय पर बैठी और राजनीति पर बात चल पड़ी। ग़लती किसकी है पर  बहस छिड़ गई। अपनी-अपनी बात पर अड़े रहने  पर दोनों का मन ख़राब हो गया।दोस्ती खत्म करने के निर्णय के साथ दोनों अलग हो गईं। मन शांत होने पर दोनों को  अपने बहस करने पर  पछतावा था
        बहुत दिनों बाद दोनों का आमना सामना हुआ। हलो के साथ धीरे-धीरे बात शुरु हुई। अब दोनों ने तौबा की कि भारत पाकिस्तान की राजनीति पर कभी बात नहीं करेंगी। 

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा मुंबई
महाराष्ट्र
[17/05, 1:21 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *लघु कथा*
विषय:-- *तौबा करना*

 गया जिला शहर के पास एक छोटा सा कस्बा है वहां सभी लोग शिक्षित संयुक्त परिवार रहते हैं। अपने-अपने काम- धंधे के लिए  शहर आते हैं। परिवार के बड़े बच्चे जो कॉलेज में पढ़ते हैं वही शहर आते हैं। सभी बच्चे के अभिभावकगण अपने बच्चे को रेल सेवा के उपयोग के लिए
मासिक यात्रा टिकट बनवा कर देते हैं। रमेश जो विजय के मित्र हैं अपना मासिक यात्रा टिकट नहीं बनवाया करता उस पैसे से
गुटका खाने लगा। एक समय की बात है, विजय किसी कारण बस कॉलेज नहीं जा रहा था। रमेश  रेल यात्रा अकेला ही कर रहा था इसी बीच टिकट निरीक्षक उसके पास आकर बोला टिकट दिखाओ रमेश बोला जल्दी में घर पर छुटने का बहाना बना कर छुट गया। उस के पास पैसे नहीं थे। मध्य माह में इस काम के लिए अभिभावक से पैसा मांग भी नहीं सकता। काफी चिंतित एवं परेशान रहने लगा जिसके कारण गुटखा का भी सेवन भी ज्यादा होने लगा। ज्यादा गुटखा खाने के कारण माउथ कैंसर के रोगी हो गया। खैर रोग प्रारंभिक अवस्था में था। इलाज के दौरान डॉक्टर के सलाह से गुटखा खाने से तौबा किया जिससे स्वास्थ्य में सुधार होने लगी। उसके बाद अब शहर में घूम घूम कर स्वास्थ्य प्रचारक के भुमिका कर रहा है। गुटका कितना स्वास्थ्य के लिए नुकसान दे है। सरकार से इसका अनुरोध कर रहा है की जन स्वास्थ्य के लिए इसे बंद किया जाए।
इस बात को जानकारी मिली प्रधानमंत्री कार्यालय में आयोजित सभा समारोह में शामिल  कराने का फैसला किया गया।यही है देश के अच्छे दिन है लोग को अच्छे-बुरे के बारे मे जागरूक होना।

विजयेन्द्र मोहन।
[17/05, 2:20 pm] 👑मीना त्रिपाठी: *तौबा करना    (लघुकथा )*

मेरे घर से बस स्टॉप की दूरी कोई 500 मीटर के करीब ही रही होगी और इसी वजह से मैं जब बस स्टार्ट होकर हार्न देती तो दौड़ती हुई अपने घर से निकलती थी। और यह क्रिया लगभग हर रोज हर दिन कई सालों से मैं करती चली आ रही थी ।  हमारे ड्राइवर अंकल काफी पुराने थे और वह मुझे बहुत छोटे से लाने ले जाने का काम करते चले आ रहे थे। इसलिए मुझे बहुत अच्छे से जानते भी थे। बहुत ही अधिकार के साथ वह अक्सर मुझे डांटते थे कि, किसी दिन छोड़ दूंगा तुम्हें , पहले आकर बैठा करो पर मैं भी अपनी आदत से लाचार थी। एक मेरा बीएससी फाइनल का प्रैक्टिकल एग्जाम था।पर इसी बीच हमारे एग्जाम की प्रिपरेशन के टाइम ,  हमारे पुराने ड्राइवर अंकल रिटायर हो गए थे जो कि मुझे नहीं पता था । उस दिन भी बस के हार्न देने के साथ ही मैं भागती हुई बाहर आई तो ये देखकर मेरे होश उड़ गए कि, मेरे देखते ही देखते बस जा चुकी थी। 
   अब तो मुझे पता था कि घर जाऊंगी तो मम्मी की अच्छी - खासी डांट खाऊंगी.. पर जाना तो था ही..वही कुछ कर सकती थीं। घर के अंदर दाखिल होते ही मेरी तो अच्छी आवभगत हुई। फिर मम्मी ने पापा को उनके ऑफिस फोन किया तो पापा ने गाड़ी भेजी। ईश्वर की अनेक कृपा से मैं सही समय पर कॉलेज पहुँचकर अपनी परीक्षा दे पाई।
      और तब से मैंने तौबा किया कि, आइंदा से ऐसा काम मैं कभी नही करूंगी। और समय से पांच मिनट पहले ही जाकर बस में बैठ जाऊंगी ।भले ही घर कितना भी पास क्यों न हो।

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*17/ 5 /2022*
[17/05, 2:53 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
*********
 अग्निशिखा मंच
 दिन -मंगलवार 
दिनांक- 17/ 5/2022 लघु कथा-
प्रदत्त विषय- *तौबा करना*

 रीता गांव में रहने वाली एक साधारण परिवार की लड़की थी।उसकी शादी बड़े शहर में हो गई जहां पर पढ़ाई की सारी सुख सुविधाएं हैथी। दो-तीन साल के बाद में रीता के भाई के लड़के की पढ़ाई के लिए उसे शहर में आना था।वे समझ नहीं पा रहे थे कि बेटे को बाहर कैसे भेजें। तब रीता ने कहा -कोई बात नहीं यह मेरे यहां रह जाएगा ।वो रीता के यहां आकर के रहने लगा। रीता अपने बच्चों की तरह उसकी परवरिश की। उसका ध्यान रखा ।खाने-पीने का भी पूरा ध्यान रखा। पढ़ाई में भी पूरे समय ध्यान रखती और जो भी खर्च होते उसमें भी वह पीछे नहीं हटती। तीन साल तक पढ़ने के बाद उसकी पढ़ाई पूरी हो गई। रीता ने उसका भरपूर सहयोग किया। फिर किसी दूसरी जगह उसकी नौकरी लग गई।        सभी लोग एकत्रित हुए खुशी का माहौल था। सभी रीता के भाई को बेटे की सफलता के लिए बधाइयां देने लगे और यह कहा कि इसमें आपकी बहन ने भी काफी सहयोग किया।
           तब रीता के भाई ने यह कहा। क्या सहयोग किया ?मेरे बेटे ने मेहनत की और बीच-बीच में मैं खुद भी चला जाता था। कुछ पैसे देकर भी आता था। यह तो मेरे बेटे की मेहनत है।
            रीता भाई की बात सुनकर हथप्रभ रह गई और बहुत दुखी हुई। अभी और भी भाईयों के बेटे थे ।रीता ने सोचा था कि मैं सभी को अपने पास रख कर पढ़ा दूंगी। परंतु भाई की ये बातें सुनकर उसने *तौबा कर* ली अब किसी को अपने पास नहीं रखेगी।

 रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश
[17/05, 3:02 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-तौबा करना
दिनाँक-17/5/2022
रीमा बचपन से ही जिद्दी थी।।
सबसे छोटी  संतान होने के कारण उसकी हर जिद पूरी हो जाती थी इसलिए वह येन केन प्रकारेण अपनी मांग मनवा ही लेती।अभी शीतकालीन  छुट्टी में सारे परिवार के सँग जगन्नाथपुरी दर्शन कर के ही आयी थी कि स्कूल खुलते ही सारी सहेलियों ने फ़िर घूमने का प्लान बनाया कि इस साल 12 बोर्ड है फिर सब कहाँ मिलेंगे ।सब तैयार हो गए।रीमा के मम्मी पापा का बजट उतना नहीं था एक पापा की कमाई से ही उन तीनों भाई बहन व दादा दादी (दादी अस्वस्थ )सभी का निर्वाह होता था।।अभी भाई के कॉलेज के 4 सेमेस्टर की फीस भी देनी थी।।बड़ी दीदी ट्यूशन वगैरह लेती थीं पर कोरोना के कारण बहुत बच्चे भी बहुत कम हो गए थे।।अतः आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।दादी दादा की इच्छा केअनुरूप वे सब पुरी दर्शन करके आये थे ,अब एक माह के अंदर फ़िर से जाने की व्यवस्था कैसे हो! दीदी ने समझाया भी पर रीमा मानने को तैयार ही नहीं थी वह जिद में अड़ गयी कि सब जा रहे हैं तो मैं भी जाऊँगी।थक हार कर मम्मी पापा ने पैसों का इंतजाम कर के इजाजत दे दी।।
रीमा खुशी खुशी घर से निकल पड़ी।वे सब बोलेरो करके जा रहे थे।सारे सफ़र सभी लड़कियाँ मस्ती में झूमती हुई जा रहीं थीं।  वहाँ पहुँच कर सभी ने होटल किया व अगले दिन समुद्र घूमने का प्लान बनाया।नियत समय पर सभी निकले। पर ये क्या?रीमा का तो बैग ही गायब?सब पैसे (ए टी एम)उसी में थे  साथ की एक दो लड़कियों का भी वैसे ही हो गया।।शायद कोई उन पर नजर रख रहा था जिसने मौका पाते ही वारदात को अंजाम दे दिया।।चूँकि यह घटना होटल से बाहर हुई थी अतः वे तहकीकात भी किससे करते  एक तो अनजान जगह और साथ में कोई परिपक्व व्यक्ति भी नहीं।यह ट्रिप स्कूल की तरफ से भी नहीं था ।सब लड़कियाँ बहुत पछता रहीं थीं कि क्यों इस तरह  का प्लान बनाया।।गनीमत  गाड़ी वाले का पेमेंट वे सब कर चुकीं थीं।। अब कोई चारा नहीं था सिवाय वापसी के ।वे सभी तौबा कर रहीं थीं ऐसे सफर से ।रीमा की आंखें बरस रहीं थीं सावन भादों जैसे! कि क्या मुंह दिखाएगी घर में कितनी बड़ी परेशानी में डाल दिया उसने  घर को।
मन ही मन कसम खा रही थी ऐसी जिद न करने की।।
निहारिका झा।।
[17/05, 3:39 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: तौबा करना ( लघु कथा) कोई काम न करने का निर्णय करना --- ओमप्रकाश पाण्डेय
बात यही कोई बीस साल पहले का होगा. मिश्रा जी बनारस जा रहे थे. उनके सामने की सीट पर एक सज्जन बैठे थे. जैसा अक्सर  होता है गाड़ी चलने के थोड़ी देर बाद ही सामान्य बातों का सिलसिला शुरू हो गया. आस पास बैठे कुछ और लोग भी वार्तालाप में शामिल हो गये.
थोड़ी देर बाद सामने वाले सज्जन ने मिश्रा जी को कहा कि जरा मेरा सामान देखियेगा, मैं बाथरूम से आ रहा हूँ. मिश्रा जी ने हाॅं कह दिया. लगभग पन्द्रह मिनट बाद पुलिस आ गयी. पुलिस सबके सामान की तलाशी लेने लगी. उसके सामान को दिखा कर पुलिस ने पूछा कि यह किसका सामान है. मिश्रा जी ने सही बात बता दिया. पुलिस ने बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा खुला था. खैर पुलिस ने जब सामान चेक किया तो उसमें गांजा निकला. पुलिस ने मिश्रा जी को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन सामान जब्त कर लिया.
तब से मिश्रा जी ने तौबा कर लिया कि यात्रा में कोई कितना भी अनुरोध करे, उसका सामान नहीं देखेंगे.
( यह मेरी मौलिक रचना है --- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[17/05, 3:46 pm] मीना कुमारी परिहारmeenakumari6102: तौबा करना(लघुकथा)
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  श्रेया मायके से लौटती है सासू मां गले से लिपट खूब प्यार करती हैं ...और क्यों न करें...घर में बेटी तो थी नहीं सिर्फ एक बेटा। श्रेया को बेटी से भी बढ़कर प्यार करती है। स्नेहा भी मां से बढ़कर प्यार और सम्मान देती है।सासू मां बहुत ख्याल रखती हैं "बेटी!तू तो रोज आंफिस जाती है  ...जमाना कैसा है...? ऐसे में तुझे अपना विशेष ख्याल रखना चाहिए। श्रेया ने कहा -- बिल्कुल मां  जी!
        श्रेया तड़के ही आंफिस के लिए तैयार हो जाने लगती है। कहीं आंफिस की मीटिंग में देर न हो जाये..." सासू मां रसोई से ही आवाज लगाती हैं  श्रेया बेटी कुछ तो खा के जा...इतनी दूर आंफिस जाना है।आंफिस से रात होने से पहले आ जाना।  जाने की जल्दी में अनसुना कर चल देती है।
 मीटिंग खत्म होने में रात के ग्यारह बज चुके हैं। श्रेया घर के लिए निकलती है।उस दिन आंफिस की कैब भी खराब हो जाती है।अब करें तो क्या करें....? परेशान हो रही है।अकेली देख लो मवाली पीछे पड़ जाते हैं उसे खूब परेशान करते हैं.. " इतने में एक सज्जन व्यक्ति पहुंचते हैं  और मवाली से बचाकर अपनी गाड़ी में बिठाते हैं।श्रेया से पूछते हैं बेटा कहां रहती हो मैं छोड़ देता हूं।"  श्रेया उनका दिल से शुक्रिया अदा करती है। आज अगर आप नहीं होते तो क्या होता...?"
   "  आज श्रेया को बहुत ग्लानि हो रही है और एहसास होता है कि मेरी सासु मां की बात मां की  मां मेरी इतनी चिंता करती हैं मुझे समझाती हैं...और मैं...?" "मैं तौबा करती हूं कि सासु मां की बातों पर जरूर अमल करूंगी...
देर रात बाहर अकेले नहीं जाऊंगी।"

डॉ मीना कुमारी परिहार
[17/05, 3:56 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
मंच को नमन
विषय*****तौबा करना****
छोटे  से गांव में  आए दिन चोरियां  होती रहती  थीं ।कुल 80,000 आबादी  है।सब एक दूसरे  को जानते और अधिकतर रिश्तेदार थे।सब गाँव  वाले चकित थे कि आखिर  ये चोरियां  कौन करता है,  कभी किसी की बकरी,कभी  फसल चोरी हो जाती।अगर रात को घर के बाहर कोई सामान  भूल जाता  सवेरे तक वह भी गायब हो  जाता ।इस समस्या  से छुटकारा पाने के लिए गांव में  पंचायत  बिठाई गई, एक एक करके सबको पहरे का काम दिया  गया,  परन्तु  परिणाम  वही, चोरियां  होती रहीं ।तब सब गाँव  वालों  ने फैसला  किया  सब गाँव वाले रात को  छिप कर पहरा देंगे
रात होते ही सब पेड़ों के पीछे  दीवारों  के पीछे  छिप गए। आधी रात एक आदमी मुँह  ढके किसनू के घर की तरफ जा रहा  था, जैसे ही उसने बकरीखोली सब लोग  उस पर बिजली की तरह टूट पड़ेउसके अंजर पंजर ढीले कर दिये चौकीदार  भोलाराम  था।रात भर उसे रस्सी  से बांध कर  रखा ।सवेरे पंचायत  बुलाई गई , उसने बताया  उसे नशे की लत लग गई है ,वह सामान चुरा कर पास वाले गांव  में  बेच कर उन पैसो से नशा  करता है।।जैसे ही उसके माता पिता  को पता पड़ा  वे भी बिजली की तरह उस पर टूट पड़े । रोते हुए  भोला राम ने नशा  करने से तौबा  कर ली।फिर उसे नशा मुक्ति केन्द्र पर भेजा गया ।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
[17/05, 3:58 pm] Anita 👅झा: नमन मंच 
विषय -तौबा करना 
लघुकथा
वर्तमान 
 रजत को आँटी ने टोका फ़्लेट रैंट पर देना है ।चाबी का बाक्स रख , ब्रिफकेश लिये कहा चले , अभी अभी तो रेनिवेट कराया था ! 
जिसका उपयोग तुम लोग कर भी ना पाये । तुमने कहा था ना ,कुछ दिनों में राशि को ले वापस आ जाओगे ।बड़ी कार  से लेकर छोटी कारे खेल खिलौने सब क़रीने से सज़ा रखा है ।कितने विश्वास के साथ तुम पड़ोसी का धर्म निभाते थे 
ये चाबी मुझे यह कह सौंपीं थी ना , आँटी आप हमारी अपनी माँ है । रजत राशि के बच्चों को मैंने ही सम्भाला था ।
अब हमारे बच्चे नाती पोते बड़े हो होस्टल चले गये ।
अंकल के जाने के बाद सारे मन के उदगार तमन्नाए पुरी करते थे ! 
आज मेरे बेटे बहु मुझसे यह कह दूर हो गये । हम से ज़्यादा पड़ोसी का धर्म निभाती हो , 
रजत मैंने तुम्हें बेटा मान तुम्हारे बच्चों में मन लगा लिया ! एक साल बाद तुम सब वापस आ जाओगे । तुम दोनो ने क्या ? अपना कारोबार वही जमा रखा है ! कितनी सहजता से कह ,तौबा कर लिया ।
आप को और परेशान नहीं करना चाहते फ़्लेट किराये पर देना हैं  ! 
अब समझ में आया ऐक अन्तराल के बाद  मानवता का यही मोल होता ! 
अनिता शरद झाअटलांटा 
रायपुरछत्तीसगढ़
[17/05, 4:54 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 
विषय:  * तौबा करना *
लघुकथा 
दिनांक  17/5/22
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      नीलू जी कुछ  महीनों से बीमार हैं ।
उन्हे डायबीटीस,  थाराईड, एवं  ब्लड प्रेशर ने तबाह कर रखा है ।
 दवा खाते- खाते नाक मे दम हो गया है ।
आजकल  कुछ  ज्यादा ही परेशान  दिख रहीं हैं ।
 बात है कि  दवा के साथ दुआ  और संयम दोनो ही चाहिए ।
   दवा खाकर भी  वह परेशान  रहती  !!
संयम तो वह कर ही नही पातीं ।
  एक दिन चली फिर डाॅक्टर के पास !
उनसे सब हाल सुनाया । डाक्टर ने दवा बदली और संयम- परहेज़  बताया ।
नीलू जी ने आनन- फानन मे पूछ दिया,,,,
सर , " ,रसगुल्ले को
 निचोड़ कर खा ही सकती हू "
 डाक्टर साहब ने झल्लाते हुए कहा,,,,
 " तौबा कीजिए  वह भी कोई खाने की चीज है ?,,,वह भी आपके लिए,,,,???
नीलू जी का मुँह लटक गया,,,,,,!!!
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रचनाकार-- डॉ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर बिहार 
🙏
[17/05, 5:43 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा :-लघुकथा

मुहावरा कोई का न करने का निर्णय करना

अर्थ *शीर्षक तौबा करना*

     पती रामनारायण बड़ी देर रात मुंह लटकाकर घर आया पत्नी शारदा ने पूछा ",क्युं जी क्या बात है,इतनी देर क्यों हो गयी, तबियत तो ठीक है ना हाथ लगाते हुए कहा",अरे! बुखार तो नहीं है? 
फिर पूछा ,आपके बॅक के शाखा प्रबंधक ने कुछ बोलो क्या? नहीं शारदा मै कैसे बताऊं!, रामनारायण बॅक में बाबू था तनख्वाह अच्छी थी दो बच्चे सबसे अच्छे परिवार में बडे खुशियों से किराए के मकान में रहता था किसी कोई बात की कमी नहीं थी ,चलो हाथ पैर धो 
मै खाना परोसती हूं।  शारदा ने कहा," रामनारायण  ने बडी मुश्किल एक रोटी खायी।
रात भर शयनकक्ष में करवटे बदल रहा कैसे बताऊं शारदा को सोच रहा था नींद तो काफूर हुयी थी, ।
       दुसरे दिन इतवार होने से बच्चे मैदान में क्रिकेट खेलने गए तब रामनारायण ने कहा ", शारदा कल जो तनख्वाह मिली वह में जुव्वे में हार गया पहले बहुत सारे पैसे जीत लिए कहते  हैं लालच बडी बुरी बला है, अब मकान का किराया कैसा देना बच्चों की फीस 
समझ नहीं रहा सब्जी भाजी दुध का बील कैसे देना?  
     पत्नी आखिर पत्नी होती है
शारदा ने अपनी बचत की रकम निकाली तो वह बीस हजार रुपए थी, अपनी सोने अंगूठी लायी, यह देखकर रामनारायण आंखों अनवरत अश्रु बहने लगे और उसी दिन से जुव्वे को हमेशा हमेशा *तौबा कर दी* 

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक १७/०५/२०२२
[17/05, 6:12 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय तौबा करना
नहीं काम करने की कसम खाना

अंजलि की मां बहुत ही चिंतित रहा करती थी उन्हें हमेशा अपनी बेटी पर नाराजगी रहती थी क्योंकि वह सोकर देर से उठा करती थी। बार-बार समझाने के बाद भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया करती थी कुछ ही दिनों में उसकी शादी होने वाली थी अंजली की मां अंजलि के पापा से अपनी चिंता बता रही थी पापा समझा रहे थे समय आने पर सुधर जाएगी।
फिर उन्होंने खुद को ही समझाया चलो देखा जाएगा जो होगा 15 दिनों की बात अंजली की शादी हो गई अंजली की मां शादी करने के पहले अपनी बेटी अंजलि से कुछ कसमे करवाएं जिसमें उन्होंने यह हिदायत दी ससुराल में हमेशा सुबह उठ जाया करोगी कसम खिलवा ते हुए तोबा भी करवाया यह कब आया मां बाप का नाम खराब नहीं करोगे मेरी परवरिश में कोई दाग नहीं लगाओगे।
किसी के बातों को ध्यान से सुनना है पलट कर जवाब नहीं देना है।
तभी ससुराल में तुम्हें भी प्यार मिलेगा अब से तुम्हारा घर वही होगा। तुम जितना मिठास डालोगी उतना ही तुम्हें लोग पसंद करेंगे
अंजली की मां बार-बार इन बातों को अंजलि को समझाया करती थी धीरे-धीरे अंजलि के दिमाग पर एक छाप छोड़ गई और उसने अपने आप से ही वादा किया कि मैं अपनी मां का परवरिश का मान सम्मान रखूंगी और तौबा किया कभी भी अपने से बड़ों को पलट कर जवाब नहीं दूंगी।
बातों के साथ जब वह ससुराल पहुंची और उसके व्यवहार ने सबका मन मोह लिया और अच्छी बहू अच्छे संस्कार वाले परिवार से आई है

कुमकुम वेद सेन
[17/05, 7:02 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
विषय तौबा करना 

    सुरेश के दोस्त उसके घर आए और बोले -"सुरेश चल,हम लोग नदी में नहाने जा रहे हैं।" सुरेश भी खुशी-खुशी चला गया।
 वहां सब दोस्त नदी में नहाने के साथ तैरने भी लगे। सब दोस्तों ने उकसाया," सुरेश तू भी तैर ले। आ जा सुरेश"।सुरेश ने अपने हाथ पाँव मारे, पर वह गहरे पानी में चला गया और डूबने लगा।
 सब ने शोर मचाया तो गांव वालों ने जैसे-तैसे सुरेश को निकाला। सुरेश बहुत डर गया उसने नदी में नहाने,और तैरने से तौबा कर ली और हाथ जोड़कर दोस्तों से कहा-" भैया हमें माफ करो दोबारा नदी में नहाने नहीं जाएंगे। बड़ी मुश्किल से मेरी जान बची है, मैंने तो तौबा कर ली।"

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
17-5-22
[17/05, 8:10 pm] चंदा 👏डांगी: *!!   तौबा करना  !!*

 शराब और सिगरेट के आदि कमल को आखिर आज दोनों से तोबा करनी ही पड़ी आखिर क्यों ।
कमल की जब अनिता से  शादी हुई वह कभी कभी शराब और सिगरेट पीता था तब सुमन उसकी पत्नी ने उसे बहुत समझाया कि शराब सिगरेट पीना अच्छी बात नहीं है पर वह कहता पिताजी ने बहुत कर्ज ले रखा है और मुझे दिन रात इसी बात का तनाव मे रहता है इकलौता बेटा जो हूँ,तब सुमन ने समझाया  शराब सिगरेट पीने से तो कर्ज और बढ़ेगा और तनाव भी । पर ये बाते उसकी समझ मे नही आती । एक दिन कमल की माँ की तबीयत बहुत खराब हो गई और उनके इलाज के लिए घर मे पैसे नही थे सबने कर्ज देने से मना कर दिया तब सुमन ने अपने सारे गहने दिए और कहा तुम माँ का ईलाज कराओ ,तब कमल बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने शराब सिगरेट से तौबा कर ली ।
चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर मंदसौर मध्यप्रदेश

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