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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक आज दिनांक 7/12/2021/ लघुकथा ,/ रचनाएं पढ़ें अलका पांडे मुंबई


बाल लघु कथा
शीर्षक - हम सब साथ साथ है 

गोलू . मम्मी मुझे बहार साईकल जलाना है मेरे दोस्तों के संग ..
आप पापा से परमिशन दिला दो 
मम्मी - नहीं बेटा आज नही और कुछ दिनों तक नहीं लाकडाऊन है पुलिस पकड़ लेगी , कोरोना का डर है आप बहार नहीं जा सकते ..
गोलू - मम्मी आप नही समझती हो मुझे दोस्तों के साथ जाना है मैं घर में बंद रह रह कर पागल हो जाऊगां , 
आप हमारे साथ खेलती नहीं हो पापा हर समय टी वी देखते हैं वो भी मेरे साथ नहीं खेलते , ऑनलाइन पढाई कर के पक गया हूँ मम्मी 
चलो फिर आप खेलों मेरे साथ मैं बहार नहीं जाता ..
मम्मी - ने गोलू को कहाँ बेटा मुझे काम कितना रहता है बेटा आप मेरे साथ काम करा लिया करो मैं आपके साथ खेलूँगी दोनों का काम हो जायेगा बोलो मंजूर ..
गोलू - ओह मम्मी यह तो मज़ेदार रहेगा मैं भी घर का काम सिख जाऊगा और आप मेरे साथ खेलने को समय मिल जायेगा मैं पापा को भी साथ में आने को कहता हूँ मिल कर हम काम बाँट लेंगे फिर साथ में खेलेंगे
और रात को हम सब पापा के साथ पिक्चर देखेगे मिल जुल कर काम करेंगे बहुत मज़ा आयेगा 
मम्मी - हाँ गोलू जा पापा को लेकर आ सब फटा फट मिलकर काम निपटाते है 
गोलू - पापा ओ पापा 
पापा - क्या बात है गोलू बहुत खुश हो हाँ पापा आज मुझे एक आइडिया आया है 
बोल पापा हम मम्मी को सरप्राइज़ देते है , आज से हम सब मिलकर घर का काम ख़त्म कर देंगे फिर दोपहर को गेम मिलकर खेलेंगे और रात को हम सब मिल कर पिक्चर देखेगे लाकडाऊन का आनंद ले आपस में मिल कर एक दूसरे का साथ दें और अपने रिश्ते मज़बूत करे ...
पापा - वाह बेटा यह तो मैंने सोचा ही नहीं तू तो मेरा भी बाप निकला क्या सुपर आइडिया है तेरी मम्मी को आराम मिलेगा ख़ुशी मिलेगी और हम सबको एक दूसरे का साथ मिलेगा , चल मेरी कसरत भी हो जायेगी सारा दिन लेटे रहने से पीठ अकड गई है ...
गोलू पापा मैं बर्तन करता हूँ मम्मी खाना बनायेगी आप झाड़ू पोछा कर लो कपडें मशीन में मैं डाल दूँगा बस 
हो गया काम 
फिर सारा दिन खेल धमाल पापा कितना मज़ा करेगे 
पापा - गोलू को गले लगा कर बोले बेटा तुमने घर की ख़ुशहाली ला दी सारी मायूसी चली गई चल मम्मी को बोल आज कुछ मीठा बनायें खाने में जश्न करेंगे आज से हम नया जीवन शुरु करते है हम सब साथ साथ है 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई
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[07/12, 9:53 am] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय **लघुकथा ***
*****कंजूस लाल*****
लालचन्द जी ने जैसे ही ऑफिस में प्रवेश किया ,सब कर्मचारियों के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान आ गई।कंजूस कहीं का ।उनका व्यक्तित्व था बी एसा ।मैले से कपड़े, रूखे।बाल, और टिफिन में हमेशा एक जैसी सब्ज़ी रोटी , और तो और ऑफिस में चाय न खुद पीते न किसी को पिलाते ।सब उनसे दूरी बनाये रखते थे ।
       आज शनिवार था, लालचन्द जी ऑफिस नहीँ आए। बृजमोहन बोला तो आज कंजूस नहीँ आया ।इतने पैसों का करता क्या है, पत्नी को मरे आठ साल हो गए , बच्चे है नहीँ ,फिर इतनी कंजूसी क्यों? उसने अपने दो और साथियों से कहा ,आज शनिवार है जल्दी ऑफिस से निकल कर उस कंजूस लाल के।घर चलते हैं ।ऑफिस समय समाप्त होते ही वे तीनों लालचन्द जी के घर की तरफ चल दिये । वहाँ जाकर देखा लालचन्द जी अपने गार्डन में कुछ दिव्यांग बच्चों के साथ बैठे थे।पास ही टेबल पर बहुत सी खाने पीने की चीज़ें और उपहार रखे हुए थे।उन्होंने एक बच्ची को गोद में बिठा रखा था,उसे अपने हाथ से खाना खिला रहे थे, उस बच्ची के दोनों हाथ नहीँ थे ।उनको देख कर लालचन्द जी ने बहुत सम्मान से बुलाया, ।फिर बोले आज इस परी का जन्म दिन है इसलिए ऑफिस नहीँ आ सका । तब बृजमोहन बोला ये बच्चे ......? लालचन्द जी बोले ये दिव्यांग बच्चे जिनको माता पिता कहीं सड़कों पर छोड़ देते है, मैं इन्हें अपने घर।ले आता हूँ , और यहीं इस घर में रहते हैं । मै इनके लिये ही कंजूसी करता हूँ, ताकि इनकी ज़रूरतें पूरी कर सकूं ।वे तीनों नतमस्तक हो गए ।
             सोमवार को जब लालचन्द जी ऑफिस गए, सब कर्मचारी उनके सम्मान में खड़े हो गए । बृजमोहन ने उनको बड़ा सा पैकेट थमाया, और बोला ये उपहार उन बच्चों के लिये ,जिनके लिये आपको कंजूस लाल की उपाधि मिली ।।।।
 वीना अचतानी, 
जोधपुर ( राजस्थान)....
[07/12, 11:08 am] Nirja 🌺🌺Takur: 
अग्निशिखा मंच
तिथि - ७-१२-२०२१
विषय -लघुकथा

     
          ठिठुरन

      श्याम जी सारी रात खॉंसते रहे 
बहू सीमा ने सुबह कहा - " बाबूजी आप ना खुद सोते हैं ना दूसरों को सोने देते हैं। '
श्याम जी - " क्या करुं बहू खॉंसी रुकती ही नहीं। अगर तुम्हारे पास समय हो तो किसी दूसरे डॉक्टर को दिखायें। "
सीमा - " बाबूजी अभी पिछले ही महीने तो आपको डॉक्टर को दिखाया था। अगर हर महीने आप पर ही खर्च करती रही तो घर कैसे चलेगा। "
श्याम जी -" वो बाहर के कमरे की खिड़की ठीक से बंद नहीं होती मुझे बहुत ठंड लगती है।मैं ठंड से ठिठुर जाता हूँ। " 
 सीमा - " बाबूजी आप तो शिकायत पेटी बन गये हैं। "
      कमरे के अंदर आ कर सीमा ने पति अतुल से कहा -" अब इन्हें वृद्धाश्रम भेजना ही पड़ेगा। बाबूजी के पास जितने पैसे हैं उनसे वृद्धाश्रम का काम हो जायेगा ,मुझसे अब इनकी सेवा नहींं होती। "
अतुल - "सीमा प्लीज़ बाबूजी के साथ ऐसा मत करो वहाँ कौन उनका ध्यान रखेगा। " 
सीमा -" देखो अतुल दुर्घटना के बाद जब से व्हील चेयर पर आये हो तुम्हारी कमाई बंद हो गई है। इसलिए घर के मामले में तो तुम कुछ भी मत बोलो। "
        अतुल भरी ऑंखों से सीमा को बाबूजी को वृद्धाश्रम ले जाने की तैयारी करते देखने लगा। तभी एक फोन आया सीमा ने फोन सुना और बैठ कर रोने लगी। 
     अतुल ने पूछा क्या बात है सीमा
सीमा -" अतुल वो भाई ने पिताजी को वृद्धाश्रम में भरती कर दिया है। तुम दोनों मुझे क्षमा कर दो मैने तुम्हारे दर्द को नहींं समझा। "
   अतुल - " कोई बात नहीं सीमा तुम उन्हें यहॉं ले आओ। तुम्हारे पिता जी मेरे भी तो पिता जी है़।"

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[07/12, 11:14 am] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: अस्तित्व ( लघुकथा)

 "मोनिका तुम क्या कर रही हो ?अमित की आवाज सुनकर मोनिका खुशी से उछल गई। अमित ने कहा... चलो तैयार हो जाओ, मैं तुम्हें तोहफा देना चाहता हूं,तुम्हारे जन्मदिन पर, क्या? कहां? मैं ये नहीं बताऊंगा। जो सीधे मुझसे बात नहीं करता था, उनकी मीठी आवाज सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था । अमित बहुत चिड़चिड़ा स्वभाव का था, उसने कभी मोनिका को कुछ समझा ही नहीं । मोनिका सोचती थी कि मेरा कोई अस्तित्व है भी या नहीं।
 एक बार मोनिका चाय बना कर लाई ,उसमें चीनी डालना भूल गई थी ।अमित को बहुत गुस्सा आया, उसने जोर से फेंक दिया था।एक दिन अमित ऑफिस के लिए घर से निकला ही था,कि कुछ दूर जाने पर उसका एक्सीडेंट हो गया ,उसके एक पैर की हड्डी टूट गई, वह बिस्तर पर आ गया ।मोनिका ने तन और मन से उसकी बहुत सेवा की।खिलाने पिलाने से लेकर हर छोटी-छोटी जरूरतों को वह पूरा करती। पूरे दिन उसके पास बैठी रहती, और उसे दिलासा दिलाती ,कि आप जल्दी स्वस्थ हो जाएंगे। मोनिका के नि: स्वार्थ सेवा से उसकी अहमियत अमित को समझ में आ गई, मेरी इतनी अच्छी जीवनसाथी है ।मैं क्यों नहीं समझ पाया ?
अमित अब धीरे -धीरे मोनिका का सहारा लेकर चलना शुरू किया ,और वह कुछ दिनों में पूरा ठीक हो गया ।अब उसका व्यवहार बदल गया था। अरे भाई !बहुत देर हो गई ,तैयार नहीं हुई क्या? मैं तैयार हूं । मोनिका जब आई, तो अमित ठगा सा उसे देखता ही रह गया। अब चलिए भी, अमित हॉ, हॉ चलो। गाड़ी के पास पहुंचे तो ,अमित ने दरवाजा खोला और मोनिका को बैठने का इशारा किया ।गाड़ी जब एक घर के सामने रुकी,तो मोनिका आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगी । अमित उतर कर उसका हाथ पकड़कर घर तक ले गया। घर में ताला बंद था ।अमित ने चाबी उसके हाथ में पकड़ाया, और कहा... अब तुम इस घर की स्वामिनी हो। क्या मोनिका चौक पड़ी?अमित ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,मैंने यह घर तुम्हें तोहफे में दिया है ।मोनिका घर के अंदर जाने लगी तो अमित ने उसे रोका , वह अंदर से आरती की थाली और एक लोटे में चावल भरकर लाया। मोनिका कीआरती उतारी और कहा.... कि अब पैर से लोटे को गिराकर अंदर आओ ।मोनिका बहुत रोने लगी यह आंसू खुशी के थे ।रात में अमित के दिल के सागर में वह समा गई अपने अस्तित्व को तलाशने के लिए ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी ,
619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर ,मध्य प्रदेश मोबाइल 8989 409 210
[07/12, 11:36 am] 💃💃sunitaअग्रवाल: विधा _ लघु कथा
शीर्षक_ बच्चों का प्यार 

गोयल दपंत्ति बहुत खुश थे। अपने बच्चों की प्रगति पर इतरा रहे थे वो बेटे बेटी के पास पांचवी बार अमेरिका आए थे उन्हे कभी लगा ही नही बच्चें विदेश में है।
     हर बार की तरह आने जाने की टिकिट भेज बुलवा लेते।
पड़ोस में रहने वाली दामले दंपत्ति का बेटा विदेश जाने के बाद शुरू मैं तो ठीक रहा लेकीन अब फोन पर भी बात नही करता वही गोरी मैम से शादी कर ली ,पैसे भेजने भी बंद कर दिया ।
       बडी मुश्किल से खर्च चला पाते है।
अपने बच्चों का प्यार पाकर , दामले दंपत्ति का दुःख देख आँखों
की कोर गीली हो गई, बेटी ने देखा ," तो बोली माँ , आप रो रही है।" 
  माँ ,"बोली नही, सोम तुम्हारा प्यार ओर सम्मान पाकर मैं गर्वित 
और भावुक हो गईं।""आज जिंदगी में कभी सोचा नही था अमेरिका में रहना घूमना, करेंगे
सोमू हरदम कहता है आप यहां ना आ पाओगे तो हम अपना सब कुछ लेकर अपनी मातृभूमि पर लोट आएंगे। कहते कहते बेटी के गालों को चूम लिया।

सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित धन्यवाद 🙏🙏
[07/12, 11:46 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- लघु कथा
शीर्षक:-- *मानवता*

मैं बोकारो स्टील प्लांट में कार्यरत थे।बात, सर्दी के ठंड मौसम 1999 की है, मैं प्लांट से स्कूटर से रात 11:00 बजे करीब घर लौटे थे तो जाडें की कड़ाके की ठंड में करीब 10 साल का लड़का अधफटी चादर ओढ़ कर छोटे-छोटे लकड़ी जलाकर आग ताप रहा था। देखकर मुझे दया आई और ठंड महसूस करने लगे राहत देने के लिए अपना गैरज के अंदर जगह बनाकर वही सोने को कहा। घर आकर अपनी पत्नी को यह बात बताएं गैरेज में एक लड़का और कुत्ता छोड़ कर आए हैं, लकड़ी जलाकर सो रहा है। उसके ओड़ने के लिए फटा हुआ चादर है। पत्नी बोली मेरे पास बहुत पुराना ओड़ना है उसे दे दो जाकर देने के बाद बहुत ही एहसान महसूस करने लगा। लड़का के साथ कुत्ता रोज रात में गैरेज के पास बैठ जाता था मैं, काम से लौटते तो उसे सोने की जगह देते थे। सप्ताह भर में वह दोनों हमारे तथा हमारे परिवार के सदस्य के साथ काफी नजदीक बन गया। धीरे-धीरे साफ सुथरा रहने लगा। एक दिन पत्नी ने पूछी पढ़ोगे, उसे सहर्ष स्वीकार किया। बच्चों के किताब देखकर पढ़ाई शुरू करा दी इस तरह उसकी पढ़ाई में रुचि होने लगा साथ मैं घर का छोटा मोटा काम करने लगा ।आज बड़ा होकर झारखंड पुलिस में सिपाही की नौकरी भी पा लिया है। अब तक हम लोग को भुलाया भी नहीं है जब कभी उसको छुट्टी मिलती है,तो आकर जरूरत आशीर्वाद लेता है।
*मानवता का काम नेकी कर फल ईश्वर देंगे*।

विजयेन्द्र मोहन।
[07/12, 11:47 am] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
*********** 
अग्निशिखा मंच
दिन- मंगलवार
दिनांक-7/12//2021
 लघु कथा 
शीर्षक - *मेरे दादा जी*

 मैंने जब होश संभाला तब घर में मैंने सभी सदस्यो को देखा। चाचा, चाची, बुआ,ताऊ, ताई भाई, बहन और दादी। मैं हमेशा सोचती काश मेरे दादाजी भी होते,तो जैसे सभी सहेलियां अपने दादा के साथ में घूमने जाती हैं; मैं भी जाती ।मैंने कभी पूछा भी नहीं कि मेरे दादा कहां है। बस ललचाई आंखों से अपनी सहेलियों को उनके दादा के साथ जाते ,खेलते, घूमते देखती रहती ।
           दादी को भी मैंने हमेशा चुप ही देखा। कभी-कभी दादा जी का चरखा दिख जाता है । मैं पूछती !ये क्या है? तब दादी उसके बारे में सब कुछ बताती ।कभी मुझे तिरंगा झंडा दिख जाता फिर मैं उसके बारे में पूछती; दादी फिर उसके बारे में सब कुछ बताती कि किस तरह से तेरे दादाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और इन चीजों से दिन-रात का उनका वास्ता था ।
      एक दिन मैं जब स्कूल से आई तो, मैंने देखा कि एक बहुत ही जर्जर अवस्था में वृद्ध मेरे घर में बैठे हुए हैं ।मां उनको चाय दे रही है चारों और घर के परिवार के सभी लोग बैठे हैं और सभी की आंखों से आंसू बह रहे हैं ।मैंने अचानक पूछ लिया कि ये कौन है तब मुझे पता चला यही मेरे दादाजी हैं ।जो कि देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ते हुए पकड़े जाने पर जेल में बंद थे ।उनकी ऐसी अवस्था जेल की कालकोठरी में रहने से हो गई थी। मैं गर्व से फूली नहीं समा रही थी कि मेरे दादाजी ने देश के लिए पूरा जीवन *जेल की कालकोठरी* में व्यतीत कर दिया। 

रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश
[07/12, 11:59 am] चंदा 👏डांगी: !! लघुकथा !!
             !! भाई का फर्ज !!

सुमन ने जब ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए शहर जाने की बात की तो उसके माता-पिता को डर था कि गांव में पली बढ़ी बेटी को शहर अकेले कैसे भेजें और वो सुमन की पढ़ाई रोकना भी नहीं चाहते थे।हर वर्ष अपनी कक्षा में प्रथम आने वाली सुमन की पढ़ाई बीच में रोकने के बारे में जैन दम्पत्ति सोच भी नहीं सकते थे।वो सब इसी पशोपेश में थे कि कमल जो कि सुमन के साथ ही पढ़ता था आया और बोला अंकल जी आप परेशान न हों मैं भी उसी कालेज में प्रवेश ले रहा हूं और मैं अपनी बहन की तरह सुमन का ध्यान रखूंगा ।
इसी विश्वास के साथ सुमन का प्रवेश महाविद्यालय में करवा दिया ।
*चन्दा डांगी रेकी ग्रेंड मास्टर*
*मंदसौर मध्यप्रदेश*
[07/12, 12:36 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: 7 dec 2021
मूक पशुओं की भाषा


बलबीर सिंह का ब्रिगेडियर बलबीर सिंह सिंह जी का तबादला हो गया वह वहीं पर रहने लगे और आपने इसमें रंगे उनको याद नहीं थी किक बिल्ली का बच्चा जिसे छोटे से बड़ा किया था वहीं पर उसकी राह देख उनकी राह देख रहा था उनको याद नहीं था कि कोई बिल्ली का बच्चा इनकी देखरेख में बड़ा हुआ था। कारण रणवीर सिंह सेना में मेजर के पद पर थे। कुछ दिनों बाद उनका तबादला कहीं बाहर हो गया। रोजमर्रा की ज़िंदगी में उन्हें याद ही नहीं रहा कि कोई बिल्ली का बच्चा जिसे वह भूल चुके हैं वह अभी भी आँखें बिछाए उनकी राह ताक रहा है।

कुछ दिनों बाद उनका फिर तबादला उसी जगह पर हो गया जहाँ पहले रहते थे। जब वहाँ गए तो उसी बिल्ली ने उनको न जाने कैसे पहचान लिया। वही क्वाटर मिला था।  

पहला दिन था जब पति पत्नी सुबह उठकर डाइनिंग टेबल पर बैठने लगे तो क्या देखते हैं कि बिल्ली मोटा सा चूहा मार कर उनका डाइनिंग टेबल पर इंतजार कर रही है। उसको देख कर उनको सारा माज़रा समझ में आ गया कि शायद बिल्ली ने सोचा होगा कि इनकी आवभगत मैं सबसे प्यारे भोजन चूहे से करुँ। उनकी हँसी रुक नहीं रही थी और बिल्ली पर भी बहुत प्यार आ रहा था। बाद में चूहे को उठाया और बिल्ली को साथ में रखने का वादा किया गया। सोचा कि बिल्ली को अब छोड़ कर नहीं साथ लेकर जाएँगे।

 ऐसा होता है मूक पशुओं का प्यार। सही है हम भूल जाते हैं लेकिन वे कभी नहीं भूलते। इन्हें दुलार तो करिए उससे दुगना प्यार ये आपसे करेंगे।
वैष्णोखत्रीवेदिका
[07/12, 12:54 pm] वीना अडवानी 👩: कुछ सुने शब्द जो होते तो व्यंग्य मात्र हैं पर जो कभी भुलाए भी नहीं जा सकते। इसी तरह का एक तीखा कटाक्ष व्यंग्य जो मुझे पीछे मुड़कर देखने को विवश कर दिया की आखिर ये व्यंग्य कसा किसने। अपनी ही जिंदगी में घटे एक व्यंग्य भरे संस्मरण को लघुकथा के रुप में प्रस्तुत कर रही हूं। जो मैं कभी नहीं भुला पाती।।

उफ्फ इतनी छोटी उम्र में विधवा और बच्चा भी
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वीना को बच्चे बहुत पसंद थे वो सारा टाईम छोटे-छोटे बच्चों संग खेलती रहती थी यहां तक की उन्हें नहलाना, तैयार करना, खिलाना , सुलाना उसे बहुत पसंद था। पड़ोस की बहुत से औरते अपने बच्चे वीना को देती और सुकून से अपने घर के सब काम करती थीं। धीरे-धीरे वीना खुद बड़ी हो गई पर बच्चों के प्रति उसका प्रेम कम न हुआ । जब वीना नवीं कक्षा में थी तो उसके स्कूल की पोशाक में सलवार-कमीज का समावेश हुआ , एक दिन वीना विद्यालय जाने के लिए तैयार हुई उस दिन बुधवार था और बुधवार दिवस के चलते उस दिन विद्यालय की पोशाक का रंग था पूरा सफ़ेद वैसे रोज़ाना के हिसाब से गुलाबी कुर्ता और सफ़ेद सलवार ही पोशाक थी पर सिर्फ बुधवार को पूरे सफेद पोशाक। हुआ यूंकि उस दिन वीना समय से पूर्व तैयार हो गयी क्यों कि विद्यालय से पूर्व घर से कुछ ही दूर रहने वाली सखी के घर जाकर उसे अपनी कापियां लाना था जो कि सखी आशा और कामिनी को दे रखी थी। जब वो जाने लगी तो वीना की चाची ने कहा वीना अपने कज़ीन भाई (जो की एक वर्ष का था सन्नी) उसे भी साथ ले जा। वीना ने फट से अपने भाई को गोद में लिया और उसके संग बतियाते, चुमते सखी के घर की ओर चल दी। तभी वीना के पीछे चल रहा एक लड़का जो की उम्र में लगभग २२-२३ साल का होगा कहीं जा रहा था। (उफ्फ जैसे की आदत होती है कि लड़की देखी नहीं की व्यंग्य कसना शुरू) एसा ही कुछ वीना के साथ भी हुआ। उस लड़के ने वीना को व्यंग्य मारते हुए पीछे से कहा, उफ्फ इतनी छोटी उम्र में विधवा और ऊपर से एक बच्चा भी हे भग्वान तेरा इंसाफ़ कैसा। वीना जैसे भौंचकी रह गयी और पीछे मुड़े बिगेर रह न पाई। उसने घूर के उस लड़के को देख, लड़का नीची नजरें कर चुपचाप अपनी राह चला गया। वीना भी अपनी सखी के घर पहुंच कापी लेकर वापस घर आई और अपना विद्यालय का बस्ता ले विद्यालय चली गई। तब से वीना कभी भी विद्यालय की पोशाक में बच्चों को उठाकर बाहर न निकली।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[07/12, 1:11 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक***०७/१२/२१
विधा***** लघुकथा
विषय""""""#*** बलिदान#***#
                   ^^^^^^^^^^^^
      
      नागपुर के एक प्रचलित आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज के प्राध्यापक श्रीधर पंत जिनकी दो बेटियां और एक पुत्र ऐसी तीन संताने थी । जिसमें रमा सबसे बड़ी बेटियां थी जो एक बहुत उच्च शिक्षित थी जिसने अपने दो छोटे भाई बहन की अच्छी परवरिश की खातिर अविवाहित रहने का फैसला किया । 
       अचानक एक दिन श्रीधर पंत को दिल का दौरा पड़ा और उसमें वे चल बसे । घर की सारी जिम्मेदारी रमा बेटी पर आई जिसने बखूबी अपने घर का निर्वहन करने का ठान लिया । रमाने अपने दोनों भाई बहन को पढ़ाया लिखाया । उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया । दोनों को नौकरी लगी । भाई की शादी हुई । छोटी बहन भी अपने ससुराल चली गई । इस दौरान कई वर्ष निकल गए उसे भी अपने भविष्य का ख्याल नहीं आया ।
       रमा सेवा निवृत्त हुई । पर जब कभी वह बीमार पड़े तो उसका ख्याल कोई नहीं करता । उसके भाई की औरत भी उसकी देखभाल ठीक से नहीं करती ,भाई भी अनदेखा कर निकल जाया करता । सब अपनी अपनी जिंदगी में खुश मगन थे । किसी को यह ख्याल नहीं आया कि अपनी बड़ी बहन रमा की ओर ध्यान देना चाहिए जिसने अपनी खुशियों का बलिदान देकर हमें जीवन दिया । हमारा भी फर्ज बनता है कि हम भी उस मनुष्य के आखरी दिनों में मानवता को ध्यान में रखते हुए सहारा देना चाहिए ।
           रमा कुछ भी नहीं कहती , उसके ध्यान में सब आ रहा था । क्योंकि बलिदान कुछ मिलने या मांगने के लिए नहीं किया जाता है  
त्याग साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं है। ऐसे त्यागी जीव महान आत्माएं होती है ।
         लोक बहुत स्वार्थी हो जाते हैं । अक्सर यह देखा गया है कि जिसने उपकार किया है उसे अपकार मिलता है । उन्हें भूल जाते हैं, धुत्कार दिया जाता है । उनकी उपेक्षा की जाती है ।
      बलिदान किसी के प्यार का नहीं , प्रेम का भूखा होता है ।
     
प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[07/12, 1:16 pm] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - 7/12//2021
विषय स्वैच्छिक
🌺विधा - लघुकथा

*चीनी का शरीर*

रवि बहुत गोरा था। सब भाइयों में गोरा । स्वभाव से बहुत सीधा था। एक दिन के मित्र ने मजाक मजाक में उससे कह दिया– "तू तो चीनी का हो गया। "
उसको पक्का भरोसा हो गया। 
वह एक डॉक्टर के पास गया। 
" डॉक्टर साहब मैं चीनी का हो गया हूं। कोई दवा बताओ।"
डॉक्टर कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। फिर समझ गया किसी ने वेबकुफ बनाया है। 
डॉक्टर ने कहा –" चिंता मत करो, एक महीने की दवा दे रहा हूं। एकदम ठीक हो जाओगे।"
डॉक्टर ने उसे डायजिन टैबलेट का चूर्ण बनाकर पुड़िया बनाकर दे दीं। 
" रोज सुबह एक पुड़िया रोज खाना।। एक महीना बाद फिर आना।"
************
एक महीना फिर डॉक्टर के पास गया।
डॉक्टर ने कहा– "वाह! बहुत फायदा हुआ है। देखूं जरा हाथ इधर लाओ।" उसने कंपाउंडर से पानी मंगाया और उसका हाथ धोया। 
बहुत अच्छा अब तब बिलकुल ठीक हो गए। अब तुम चाहो तो घर जाकर नहा सकते हो।
वह घर जाकर नहाया। कुछ भी नहीं हुआ। उसने सबको बताया– "अब मैं बिल्कुल ठीक हूं।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[07/12, 1:45 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* ७/१२/२०२१ / मंगलवार !
विघा- लघु कथा 
बिषय - एक शाम शहीदों के नाम 

साल २०१८ जनवरी माह की बात है !
मुझे अपनें पैतृक गांँव सरदारशहर में लगभग एक माँह तक रहें का सु अवसर मिला ! गंणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हमाँरे गाँव के सभी बैंड मिल कर एक रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं! ओर एक से बढ़कर एक देश भक्ती के गीतों की प्रस्तुति देते हैं और समांँ बांध देते हैं ! सभी को देशप्रेम के भावों से ओत-प्रोत कर देते हैं !
         वो शाम मेरे लिए खास बन गई क्योंकि उस दिन हमाँरे गाँव के शहीद के परिवार का सम्मान किया गया ! शहीद की माँ व पत्नी को माला पहना कर सम्मानित किया गया ! 
जब रूंघे गले और बहती आंँखों से शहीद की मांँ वें वन्दे मातरम् का घोष किया तो हर एक की आँखे नमः हो उठी ! 
वो शाम सच में " एक शाम शहीदों के नाम " हो गई ! 
ऐसी घटनाएं ही देशप्रेम का भाव जगाती ओर आगे से आगे माँताऐ अपनें पूत्रों को देश को सर्मपित करती हैं ! 
सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम
🇮🇪🇮🇪🇮🇪
   🙏
[07/12, 1:45 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लघुकथा)
          *********
         विश्वास बड़ा है !!!!
     *****************

     समुद्र में तूफान उठा हुआ था ।जहाज के सभी यात्री सहमे और डरे हुए थे ।जहाज बुरी तरह हिचकोले खा रहा था। जहाज के एक कोने में एक व्यक्ति सो रहा था। यात्रियों ने उसे जगाया और कहा,,," तूफान उठा है "‌,उस व्यक्ति ने बाहर झांक कर देखा और बोला "आखिर इसमें डरने वाली क्या बात है। तूफान तो आते ही हैं ।जहांज भी डूबते ही हैं और मनुष्य भी मरते ही हैं। इसमें क्या ऐसी अनहोनी हो गई जो आप लोग इतनी बुरी तरह से घबरा रहे हैं।" 
         ‌ सभी उसकी तरफ आश्चर्य से देखते रह गए। उस व्यक्ति ने कहा "विश्वास की शक्ति तूफान से बड़ी होती है। तुम विश्वास क्यों नहीं करते कि यह तूफान क्षण भर में बंद हो जाएगा ।" अलमस्त व्यक्ति ने आंखें बंद की और अपने भीतर की झील में डूब गया ।पूरी शक्ति और विश्वास के साथ कहा "शांत हो जा मूर्ख"। तूफान तुरंत शांत हो गया ।जहाज का हिलना डुलना बंद हो गया। यात्रियों ने चैन की सांस ली ।जानते हैं ,आप, वह अलमस्त व्यक्ति कौन था। वे जीसस क्राइस्ट थे जिन्होंने साथियों से कहा ,"साथियों विश्वास बड़ा है ,तूफान को तुमने उससे बड़ा क्यों मान लिया!??" यह होती है, विश्वास की शक्ति, उसकी ताकत !!!
*******************
स्वरचित रचना 
डॉ . आशालता नायडू.
मुंबई . महाराष्ट्र .
********************
[07/12, 2:09 pm] Anita 👅झा: लघुकथा 
जवाब दादी के 
मोनु को हम उम्र बच्चों के साथ बारिश मे भीगना उछलना खेलना अच्छा लगता था ।
अब क्यों रोक रही हो मम्मी ? अब तुम बड़ी हो रही हों समय बदल गया है 
क्यों पापा समय दिन रात तो वही है ।
हाँ बेटा तुम्हारी मम्मी आज भी दकियानुसी ख़्यालों हालतों को देखती है ।
आपने हमारी हर सुविधाओं का ध्यान रखा ।
दादी बचपन से हमें क़िस्से कहानियाँ गीत के द्वारा सारी शिक्षाएँ दी । 
मम्मी -वो कैसे ? 
आप लोगों अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहते थे ।हमें पूरी स्वतंत्रता दी थी !
पर आज जब बेटी उम्र के उस पड़ाव में है ।
जहाँ कुछ सुनना ही नही चाहती ।
हमें गूगल से सब मालूम है । 
वो हौसला हिम्मत परिस्थितियों से हार ना मानना ।
अब आप बीती एहसास होते है ।दादी के साथ बिताये दिन वो खेल खेल में संस्कृति संस्कारो की शिक्षा गीत के माध्यम से गोल गोल रानी इत्ता इत्ता पानी बोल मेरी मछली कितना पानी इधर से जाऊँगा आरी लेकर आऊँगा उधर से जाऊँगा रस्से से कसवाऊँगा इस भँवर जाल खेल से बाहर निकलना सिखाती कहती, पानी उछाल आगे बढ़ हाथ पकड़ता तो दादी कहती ,हौसले पस्त कर दो हिम्मत ना हारना मँजिल तुम्हें स्वयं संयम से तय कर आत्मनिर्भर बढ़ जाना है 
आपको अपने काम के सिवाय कुछ नजर ही नही आता था ।आप हमारी छोटी सी छोटी बातों को नजर अन्दाज कर कहती थी ।
जाओं दादी से पूछो ?

अनिता शरद झा रायपुर
[07/12, 2:25 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: दिल तो बच्चा है जी ( लघु कथा) -- ओमप्रकाश पाण्डेय
लो चाय पियो मेरी जान, मेरे हाथ की चाय है, इस संसार में तुम पहली महिला हो जिसे मेरे बनाई हुई चाय पीने का सुअवसर मिल रहा है.
क्यों किसी दूसरी महिला ने अब तक घास नहीं डाली क्या ? 
अरे नहीं भाई जिन्दगीं में पहली बार तो मैंने चाय बनाई है और पहली बार रोमांटिक डायलॉग बोला है, क्या बन्दना तुमने सारा मूड ही खराब कर दिया. कहते हुए त्रिपाठी जी सामने के सोफे पर बैठ गए.
बन्दना यानि त्रिपाठी जी की पत्नी. त्रिपाठी जी अपनी नौकरी से सेवानिवृत्ति होने के उपरान्त गुड़गांव में अपने बेटे बहु के साथ ही रह रहे हैं. साथ में एक प्यारी सी गुड़िया यानि पौत्री भी है.
तुम्हें ये चाय बनाने की क्यों सूझी, मैं तो आ ही रही थी और ये डायलॉग का आयडिया कहाँ से आया, बन्दना ने पूछा. क्या यार पूरी जिन्दगी तो भागमभाग में कट गई, अब आजकल मेरे दिल में कुछ दिनों से कुछ कुछ हो रहा है, तो नये नये प्रयोग करने दो मेरी जान. दिल में कब से कितने अरमान मेरे छिपे हैं, बच्चे की तरह आजकल मेरा दिल मचल रहा है. बन्दना मुझे अब तो अपने दिल की करने दो यार, बहुत सवाल अब मत करो! बस! अब थोड़ा मुझे अपने मन की करने दो! 
( यह मेरी मौलिक रचना है -- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[07/12, 3:21 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: मंगलवार--लघुकथा
उम्मीद 
****************
मैं घर में अकेला छोटी सी नौकरी चौकीदार की करता था।घर में मेरी पत्नी विमला और मेरी बेटी रमा जो 10 वी की पढ़ाई कर रही थी उसकी पढ़ाई की चिंता थी ।कि इस कोरोना काल ‌मै उसकी‌ पढाई के लिए पैसे कहां से आयेंगे आनलाइन पढ़ाई मोबाइल नहीं था ।
हर जगह जाता लेकिन चेहरे और पद सुनकर कोई नेता विधायक समस्या सुनने को ही तैयार नहीं
नेताओं के कार्यकर्ताओं की तों बड़ी ठाठ बाट पर आम नागरिक तो फिरता रहता‌ है अपनी‌ समस्या लेकर पर कहीं कोई सुनवाई नही है।मायुस और हताश होकर रह जाता‌ है घर के कोने में ।
दो तीन दिन से पत्नी विमला रोज बोले जा रही थी की एक बार कलेक्टर सहाब‌से मिल लेते सभी‌बताते है अच्छे हैं सबकी सुनते हैं । फिर एक उम्मीद लेकर घर से निकला ।
आज जरूर काम करवाकर ही आऊंगा ।कहीं भी‌ छोटा‌ मोटा काम मां आकर आऊंगा ही‌ मेरी‌बेटी की पढ़ाई का‌ सवाल है
11 बजे से मैं निकला ।सभी‌ कलेक्टर साहब का अपनी समस्या लेकर इंतजार कर रहे थे।
मैं भी‌ सुबह‌से शाम हो गई इंतजार करता रहा की आज अपनी समस्या बताकर ही आऊंगा ।
शाम चार बजे साहब आये ।बाहर में ही हां क्या है बताईए सभी से पूछने लगे ।जो नेता थे उन्हें अरे इन्हें अंदर बैठाओ इन्हें चाय वाय पिलाओ आप अन्दर बैठीये मेरे चेम्बर्स में मैं आ रहा हूं ।बाकी चेहरे से मेरी बारी आई । क्या है बताईए मैं बोलना शुरू ही किया ‌था‌ की ओ लिख दिये किसी विभाग का नाम ।और अपने पिये से बोले अरे इन्हें देख लेना।
पूरा समय में सिर्फ दो मिनट में पूरा कवर कर लिया ।जो उम्मीद मन में लेकर चला‌ था वह इंसान के हैसियत के अनुसार जाती रही
हाथ कुछ हासिल नहीं हुआ । सोचा इन बड़ों के पास मदद मांगने जाओ तो समय की‌ बर्बादी है अच्छा है अपने आप से कोशिश करूं तो मेरी समस्या कुछ हद तक कम हो जाते
आजकल इंसान इंसान कहा रहा पैसे की लत हर किसी को होने लगी है ।आम व्यक्ति की दिल की बात ‌नही समझते हैं न सुनते पैसे की‌ बात ही समझते‌ है । 
आफिस में जाओ तो बाबू पैसे दो तो आपकी फाईल आलमारी से निकाल कर टेबल में रख देगा।
नहीं तो आलमारी में ही पड़ा रहेगा।फाईल की‌ मजाल जो टेंबल में आने की हिम्मत करेगा ।
यही सोचकर मैं पत्नी विमला ‌से बोला‌ की अब‌ उम्मीद लेकर किसी के पास नही‌ जाऊगा।अपना काम खुद से करूंगा।
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।
[07/12, 3:26 pm] 😇ब्रीज किशोर: *अंग्निशिखा मंच*
     *७/१२/२०२१*     
        *औरत*
       *लघु कथा* 
यह मेरी कहानी है हां मै एक औरत हूं मेरी कहानी शुरु होती है एक छोटी बालिका से।
हां मै माँ पिताजी की दूलारी भाइयो की लाडली बडा़ परिवार पर मै अकेली सारे घर मे फुंदकती।काकी चाची भाभी ढे़रो प्यार करने वाले लोग मै गुडि़यो से खेलती कब बडी़ हो गई पता ही नहीं चला।
एक दिन काकी पिता जी से कह रही थी बिटिया बडी़ हो गई पढाने की अब जरूरत नहीं कुछ चुल्हा चौका सिखे.मै बहुत कहीँ पर पिता जी चुप हो गये पढ़ने मे ठिक थी पर संयुक्त परिवार था अपने बच्चे के बारे मे पिता निर्णय नहीं ले सकता ।
मै पिता जी मजबुरी सोच के चुप हो गई।मै अच्छे उपन्यास .धार्मिक किताबे पढने लगी समय बीता मेरी शादी तय हो गई जिसका मतलब भी मुझे नहिं मालूम था बडी धुम धाम से शादी हुई।शादी जिससे हुई उसे मैने देखा नहीं कैसा है कौन है।मै तो सो रहीं थी रह रह के नाउन जागती थी फेरे कैसे लिए गये पता नहीं।शादी हुई सिन्दूर पडा़ भाभी बहनें आशिर्वाद दे रही थी तब पता चला मेरी शादी हो गई।
पहले छोटी उमर पर शादी होती थी लडकी की बिदाई बाद मे होतीं थी बिदाई के समय भी मुझे कोई समझ नहीं हर लोग परेशान मेरी लाडली ससुराल मे कैसे रहेगी मेरा रो रो कर बुरा हाल था।
खैर मै ससुराल पहुंची एक अनजान घर मे बिदा करते समय पिता जी एक सीख दिये बेटा पानी बन के रहना।
अब किसी की बहु थी किसी की भाभी और एक अन्जान आदमी की पत्नी हां वह अन्जान था लेकिन मेरी पहचान उसी से थी न जाने वह अन्जान कब अपना सा लगने लगा।कब उसके खाने पीने की चिन्ता सताने लगी उसके आने का इन्तजार रहने लगा।अब अन्जान आदमी खास बन गया। क्या औरत पानी की तरह है जैसा बर्तन वैसा आकार हां जैसे पानी बिना जिवन असम्भव है वैसे औरत बिना घर परिवार।समय बीतता गया और उस अन्जान के प्रति प्यार बढता गया।चौथे पन मे बस दो अन्जान एक हो कर रह जाते है।बच्चे अपनी दुनियां मे मस्त जो उस औरत के कोख से जन्मे रहते है उनके पास समय नहीं है माँ बाप के लिए लेकिन वे दोनो अन्जान अब एक जान बन चुके है ।
औरत अब उस अन्जान से इतना प्यार करती है की बिछुडने मात्र से सोच कर कापं जाती है।और कहती है।
किसी राह पर किसी मोड़ पर
चल देना न हमको छोड़ कर.
मेरे हम सफर मेरे हम सफर।
हर औरत की ये कहानी है।
यह कहानी हर लड़की की है। हम आप सब।
*औरतों को समर्पित*
*स्वरचित* 
*बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ* 
    *भानुजा, गोरखपुर ,यू.पी*
[07/12, 4:43 pm] +91 70708 00416: ##################
       बहू हो तो ऐसी
    *****************
करीब पैंसठ की उम्र जीते हुए दयानंद मिश्र और उनकु पत्नी अनुराधा, "अपनी बहू वन्दना की तारीफ करते नहीं थकते".........
जब भी कभी उनसे मिलने कोई रिश्तेदार या पड़ोसी आ जाए.....तो "वन्दना की तारीफों की झड़ी लग जाती। आगंतुक भी रस लेकर वन्दना की खूब बड़ाई करते,और साथ ही अपनी पढ़ी-लिखु बहूओं का रोना रोते , कोसते.........
दयानन्द मिश्र सान्त्वना देते और कहते-"अरे भाई जमाने के साथ चलना सीख लो।बहू को बेटी सिर्फ कहो नहीं, उसे बेटी मानों भी। फिर देखना आपकी बहूएं भी वन्दना की तरह सेवा करेंगी।" "हां.... बिल्कुल.. स्वभाव तो अब हमको ही अपना बदलना होगा .....?"
 आज दयानन्द के एक मित्र सक्सेना उनसे मिलने आए थे।
आते ही बोले-"भाई दयानन्द! कहां ग‌ई वन्दना बिटिया......?आज तो उसने मुझे बेसन का हलवा खाने के लिए बुलाया था। कहीं दिख नहीं रही....? तभी अनुराधा अंदर से-बेसन का हलवा और नमकीन लेकर आती हुई बोलीं--"अरे भाई साहब वन्दना ने आंफिस जाने से पहले ही बना लिए थे और कह कर ग‌ई है- .....कि अंकल को जी भर के गीला देना मांजी। तो लीजिए अपनी प्यारी बिटिया के हाथों का बेसन का हलवा..।" वन्दना आंफिस से आती ही होगी।अभी सब स्वादिष्ट हलुआ का आनन्द ही ले रहे थे तभी वन्दना भी आ गई। अंकल को चरण स्पर्श किया और बोली-बाबूजी पहले आंखों में ड्राप डलवा लीजिए,यह कहते हुए वन्दना ड्रापर उठा ला‌ई। दयानन्द और उनके मित्र सक्सेना की आंखों में सजलता साफ दिख रही थी-वन्दना के कर्तव्य पालन से......."तभी अनुराधा बोली-बेटी धन्य हो ग‌ई तुझे पाकर मैं गंगा नहा ली"जा पहले मुंह हाथ तो धो लें,आते ही सबकी फिक्र करने लगती है...."।

डॉ मीना कुमारी परिहार

मंच को नमन 🙏
विषय-लघुकथा
दिनांक-24/6/21
[07/12, 4:47 pm] आभा झा ( रायपुर ) साझां: बर्थ डे पार्टी 

बच्चो की बर्थ डे पार्टी चल रही थी ।सभी बच्चे बहुत खुश थे ।वे अपने अपने चेहरे पर मुखौटा लगाये खेल रहे थे और मजा लूट रहे थे ।इतने में ही एक बच्ची दौड़कर अपने पापा के पास आती है और कहती है देखो ना पापा कितना मजा आ रहा है? ना! सबलोग अपने अपने चेहरों पर मुखौटा लगाकर कैसे एक दूसरे को बुद्धु बनाकर मजा लूट रहे हैं क्या पापा यह मजा हम हमेशा नहीं लूट सकते। कितना अच्छा होता ना?पापा कहकर अपने पापा का हाथ पकड़कर उछलने लगी ।
                         
                            संजय कुछ सोच में पड़ गया---'एक लंबी श्वास छोड़ते हुए उसने मन ही मन कहा 
मेरी प्यारी भोली बच्ची तुझे 
 क्या समझाऊ।आज की दुनिया मे 
हर किसी चेहरे पर एक मुखौटा चढा हुआ है और हर कोई निरंतर एक दूसरे को बेवकूफ बनाकर मजा लूट रहा है कहते हुए उसनें अपनी बच्ची को गले से लगा लिया ।
                          डॉं आभा झा
                  रोहिणी पुरम गोल चौक 
               रायपुर छग ।
                  7 _12__21।
[07/12, 5:56 pm] रानी अग्रवाल: ७_१२ _ २०२१,बुधवार।
विधा_ लघु कथा।
शीर्षक_ भरोसा।
     श्रीमती सरोज एक कुशल गृहिणी हैं।उनका संयुक्त परिवार है।बहु_ बेटे,पोते_ पोती सब मिलाकर ७ जने हैं।ब्याही हुई बेटी भी इसी शहर में रहती है,आती_ जाती रहती है इसलिए घर गृहस्थी का काफी काम हो जाता है।
     इसमें सहायता मिल जाए इसलिए वो हमेशा एक बाई (कामवाली) २४ घंटे वाली रखती हैं ताकि घर का काम बिना झंझट के सुचारू रूप से हो सके।कामवाली चाहे कोई भी हो,सरोज जी सब पर भरोसा करती हैं।यदि घर की कोई वस्तु खो जाए तो सामान्यतः लोग घर की कामवाली पर ही आरोप लगा देते हैं पर श्रीमती सरोज इस बात को बिलकुल गलत मानती हैं,और वे ऐसा नहीं करतीं।उल्टा वो काम पर रखते समय ही उस कामवाली को ये समझाती हैं कि चोरी करना पाप है,इंसान को अपना ईमान नहीं खोना चाहिए,कोई चीज चाहिए तो पूछकर लेना,बिना पूछे लेना भी चोरी के बराबर ही होता है।इस प्रकार वो अपना भरोसा उनमें जमा देती हैं और उनके भरोसे को भी बढाती हैं।
      बस फिर वो कामवाली भी ईमानदारी से काम करती है और सब घर वाले भी बेफिक्र रहते हैं।
घर के सारे काम आसानी से हो जाते हैं।सरोज जी कामवाली को कभी भी कामवाली कहकर नहीं बुलातीं,उसकी उम्र देखकर दीदी या मासी का रिश्ता बना लेती हैं,उसको घर के एक सदस्य की तरह ही रखती हैं जिससे उसका मन भी खुश रहता है।
    इस प्रकार देखिए कि आजकल सभी को घर काम में एक सहायक की जरूरत रहती ही है।
उनके साथ सद व्यवहार करें तो दोनों पक्ष निश्चिंत रह सकते हैं।
स्वरचित मौलिक लघुकथा_____
रानी अग्रवाल,मुंबई,७_२१_२१.
[07/12, 6:02 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: श्राद्ध पक्ष
     (लघुकथा)
शीर्षक- मंत्रणा सभा 

कौवे कांव-कांव करते हुए समुद्र किनारे बैठ गए और धीरे-धीरे पंख फड़फड़ाने लगे।उनके मुखिया कौवे ने एक मंत्रणा सभा बुलाई थी। एक कौवा पंख फड़फड़ाते हुए बोला-" गुरु जी, आज कल श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं। हमें शहर से निमंत्रण मिला है, आज हम वहां जा रहे हैं खीर पूडी़ खाने।पंद्रह दिन मौज मस्ती रहेगी गुरुजी।"
 गुरु कौवा उदास होता हुआ बोला-" नहीं छोटू,वहाँ नहीं जाना है। यह सब दिखावा मात्र है। यह लोग जिंदा मां-बाप को नहीं पूछते हैं,मरने बाद लोगों को दिखाने के लिए बड़े-बड़े श्राद्ध का आयोजन करते हैं।हमें ऐसी जगह नहीं जाना है, जहां माता-पिता का निरादर होता है, उन्हें भूखे पेट रखा जाता है। अनाथालय छोड़ आते हैं ऐसे पाखंडी लोग।"
 तभी एक कौवा पंख फड़फड़ाते हुए बोला-" गुरु जी, आप ठीक कह रहे हैं। सोलह आने सच है। हमारा तो इस ओर ध्यान ही नहीं गया।"
 गुरु कौवा संयत होता हुआ बोला-" हां भाइयों, आपकी क्या राय है?"
 सभी कौवों ने सहमति में सिर हिलाया,और बोले-"हाँ गुरु जी, आप सही हैं। अपने जिंदा माता-पिता को तृप्त करो, उनका पेट भरो, उनकी पसंद को ध्यान में रखो, उन्हें संतुष्ट करना बेटे बहुओं का फर्ज है।"
 सभी कौवों ने सहमति में सिर हिलाकर कांव-कांव की और अपना पेट भरने जंगल की ओर उड़ चले। मंत्रणा सभा समाप्त हुई।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
6-10-21
[07/12, 6:18 pm] Chandrika Vyash Kavi: ठोकर खाना
 (लघुकथा) 

"सुखपाल की अपने पिता से बिल्कुल नहीं बनती थी! यदि पिता ने कुछ कहा है तो उसे वह बिल्कुल नहीं करता था! "

"उसके पिता ने कहा तुम कमसे कम ग्रैजुएट हो जाओ !डिग्री रहने से कहीं भी काम कर सकते हो! "

"आपने कौन सी डिग्री ले रखी है !"

"पिता ने कहा! इसीलिए तो कह रहा हूं आज जो ठोकरें में खा रहा हूं मेरे बेटे को वह ठोकर न खानी पडे़! "

"सुखपाल ने कहा आपको मेरी चिंता करने की जरुरत नहीं !"

"कैसे न करुं ! बेटा तुम्हारा बाप हूँ न! "

"जिस दिन तुम बाप बनोगे तब समझोगे !"

            चंद्रिका व्यास
         खारघर नवी मुंबई
[07/12, 6:22 pm] कुम कुम वेद सेन: लघु कथा
भूखा पंडित

गांव में मुखिया जी के बड़े तू हो गए वह भी कोरोनावायरस से हो गया।
मुखिया जी के परिवार में और भी दो लोगों की मृत्यु हो गई इस तरह गांव में कई लोगों की मृत्यु हो धीरे-धीरे गांव के लोगों में ब्राह्मण भोज कि जो पुरानी प्रथा थी वह समाप्त होने लगी क्योंकि मृत शरीर को आग देने वाला कोई नहीं था घर में आने वाला कोई नहीं था ऐसी स्थिति में ब्राह्मण भोज कैसे किया जाए।
मंदिर में बैठे पुजारी उनके सहयोगी सर यह विचार कर रहे हैं अब तो मंदिर भी बंद हो रहा है साथ ही साथ मृत्यु में श्राद्ध भी नहीं होता है हम लोगों का परिवार कैसे चलेगा अब तो भुखमरी से ही हमारा परिवार अब खत्म हो जाएगा।
पंडित ने कहा किसी की जान जा रही है और तुझे अपनी ब्राह्मण भोज की लगी हुई है अब यह पुरानी बातों को मन से निकालो और शारीरिक काम धंधा करने की शुरुआत करो अब बहुत लोग जागरूक हो गए हैं।
अब मृत्यु के बाद श्राद्ध की परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है प्रसाद वितरण का सिलसिला शुरू हो रहा है हो गया है इसलिए हम लोग को भी अपना राह बदल लेना ही उचित होगा
समझ में बात आई पर देर से आई।
नहीं तो पुरानी परंपरा के अनुसार जीवित प्राणी को जितनी सुख सुविधा नहीं मिल पाती मृत्यु के बाद उन्हें उनकी जरूरतों के सभी सामानों को ब्राह्मणों को दान दिया जाता था यह कहकर की परलोक में उन्हें आराम होगा कितनी गलत विचारधारा रहे सोच कितनी गलत रहे सामने का व्यक्ति भूखा है और स्वर्ग में जाने की चाह में तरह-तरह के व्यंजन बन रहे हैं सामानों का दान किया जा रहा है।

कुमकुम वेदसेन
[07/12, 6:24 pm] 👑सुषमा शुक्ला: मंच को मंच को नमन
लघु कथा,

 विषय कुत्ते की मौत मरना,


मानिक चंद जी अपने परिवार के साथ गरीबी मेंभी बहुत शांति पूर्वक सुकून से जी रहे थेl दो बेटे पत्नी और मां के साथ जीवन सुचारु रुप से चल रहा थाl मानिक चंद जी भले ही गरीब हो परंतु मन के बहुत धनी सामाजिक प्रतिष्ठा, समय पर सबके लिए खड़े होना ,गरीबों की बुजुर्गों की और बच्चों की मदद करना आपकी आदत में शामिल था🙏
 समय ने करवट बदली एक दिन अचानक उनकी लॉटरी खुल जाती है और उनके वारे न्यारे हो जाते हैं, और वह कहते हैं न कि लक्ष्मी के साथ-साथ माता सरस्वती का होना बहुत आवश्यक है जो हमें सद्बुद्धि और विवेक से लक्ष्मी का इस्तेमाल करना सिखाती है। परंतु मानिकचंद के साथ ऐसा नहीं हुआ, पैसे का घमंड सातवें आसमान पर ले गया उनके जितनी भी सुंदर करम गति थी वह बाधित होती रहीl समाज में जितना नाम था प्रतिष्ठा थी सब धूमिल हों गई lऔर उनके अंदर बुरी आदतों का संचार होने लगा।
 परिवार वालों ने बहुत समझाया समाज वालों ने भी सीख दी, किंतु लक्ष्मी सर पर चढ़कर बोलने लगी और सारी बुरी आदतें पीना और भी कई बुरी आदतें जो दुखदाई होती हैं, पैसे का रास कर गईl किसी की शिक्षा सीख का असर उन पर नहीं हुआ, 
*कहते हैं कि यश पैसा जब मिल जाए तो उसको बरकरार रखने की ताकत भी आप में होनी चाहिए आपके पैर मजबूती से जमें रहने चाहिए* परंतु विपरीत परिस्थिति में इन सब बातों का कोई असर नहीं हुआ और एक दिन वह शराब घर से शराब पीकर बाहर आते हैं और लड़खड़ाते हुए रास्ता पार करते हैं, उनके ऊपर से एक ट्रक निकल जाता हैl
 *हाय रे बदकिस्मती कुत्ते की मौत मारे जाते हैं* 
*संदेश*
*इसलिए लक्ष्मी वैभव यश को बनाए रखने के लिए आपके विवेक की बहुत जरूरत होती है अन्यथा पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता*


  स्वरचित लघु कथा सुषमा शुक्ला
[07/12, 6:41 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा : लघुकथा

शीर्षक *बिकाऊ आदमी*

        बाजार के रास्ते से जाते हुए
दुकान पर लगे साइन बोर्ड को देखकर मैं एका-एक रुक गया। तभी अन्दर से आवाज आयी--"आइए साहब यहां सभी प्रकार के आदमी बिकते हैं आपको कैसा चाहिए?'
     'कैसे कैसे आदमी है, आपके पास मैंने मजाक से पूछा?
"किसी की हत्या करवानी हो तो दस हजार में मिल जाएगा किसी और खून हो गया हो इल्जाम अपने सिर पर लेने के लिए पाच हजार रुपए मिल जाएगा, इतना ही नहीं किसी मुकदमे के गवाही देने वाला भी मिल जाएगा साहब,दस साल का तजुर्बा है,जेल से भगाने की कीमत सिर्फ चार हजार मगर, बाबूजी ऐसे आदमी तो सफेदपोश लोग ही खरीदते हैं, लगता है आपको शायद किसी का अपहरण करने वाले की आवश्यकता है,इनकी कीमत दो हजार से एक हजार तक होती है'"; मुझे आश्चर्ययुक्त देखते हुए दुकानदार बोला इससे सस्ते भी है साहब, जैसे मातम मनाने वाले, स्वागत करने वाले, ताली पीटने वाले चुनाव में पार्टी का झंडा उठाने वाले,दंगा,मोर्च के लिए किसी नेता के लिए सभा में भीड़ दिखाने के लिए सभा में भीड़ दिखाने के लिए पर आप बताइए साहब,आपको कैसा आदमी चाहिए?' वह बताते हुए अचानक झुंझला उठते है, जी मुझे एक नेक और ईमानदार संस्कारित आदमी चाहिए-"मैंने कहा"सठियां गए हो क्या? सुबह-सुबह बोहनी भी खराब कर दी पगला कहीं का कहीं ऐसे आदमी बिकते हैं क्या? खोजने पडते हैं साहब ,चलो अपना रास्ता नापो", कहता हुआ दुकानदार लड़ने लगा था.

सुरेंद्र हरड़े (लघुकथाकार)
नागपुर
दिनांक :- ०७/१२/२०२१
[07/12, 7:39 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🏻🌹अग्नि शिखा मंच, 🌹🙏🏻
🙏🏻🌹जय अम्बे, 🌹७/१२/21🌹🙏🏻
🌹 *लघुकथा* 🌹 *चींटी का पैर निकलना* 🙏🏻 

         मीना के घर में काम वाली को लोकडाउन में भी मीना ने पूरा तनखाह दिए,
एक साल हो गया, अभी वो काम वाली को काम पर फिर से आने के लिए फोन करती है, वो नहीं उठाये, 
       एक तारीख को तनखाह लेकर गई, कल से काम करना है, बता कर गई, वापसी एक महीने काम नहीं किया, 
        मीना एक दीन बहार गई, तो देखा काम वाली किसके घर से बाहर निकल रही थी, मीना ने उसी घर में जाकर पूछताछ किये तो पता चला की तीन महीने से यहां काम करती है , 
           मीना के पैरों तले से ज़मीन खिसक ने लगी, वो समझ गई, यह *चींटी को पैर निकल आए है*, अभी वो दूसरे काम वाली की तलाशी में है, 

🙏🏻🌹पद्माक्षी शुक्ल, 🌹🙏🏻

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