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Akhil Bharati e agnishikha Manch ke block per Aaj dinank 23 /11/ 2021 ko laghu kathaen padhen aur Rachna karo ko badhai den Alka Pande Mumbai


बेज़ुबान- लघुकथा-अलका 

सुबह का समय था , ठंडी ठंडी हवाऐ चल रही थी पर यह हनुमान मंदिर का मैदान आज सुनसान पड़ा था ! हमेशा यहाँ चहल पहल रहती थी । भक्त लोग आते दर्शन करते और चिड़ियों को कबूतर को दाने डालते और हज़ारों कबूतर आकर दाने फटाफट चुक जाते एक “काकी “आती थी जो रोज़ कुत्तों को बिस्किट डालती । पर आज कल यह मैदान एक दम सूना पड़ा रहता ...
बहुत सारे कबूतर बगीचे के पेड़ पर बैठ कर बातें कर रहे थे , क्या हुआ है इंसानों को घर से बहार ही नहीं आते मंदिर में ताला डाल दिया है । कितने मज़े थे हमारे रोज़ भर पेट भोजन मिलता था अब तो बहुत मेहनत करते हैं फिर भी भूखे रह जाते है , दूसरा कबूतर बोला 
“हाँ भाई सही कह रहे हो आजकल हमारे दोस्त “डागी “( कुत्ते) भी नहीं दिखाई देते है शायद उन्होंने भी जगह बदल ली है , एक उम्रदराज़ कबूतर बोला . तुम लोगों को नहीं मालुम कोई महामारी फैली है इंसानों में जिसके कारण सरकारी फ़रमान जारी हुआ है ,जिस की वजह से सब को घर में लाकडाऊन कर रखा है , यह एक इंसान से दूसरे इंसान में पहुँचती है , कोई इलाज नहीं है सब मर रहें है । तभी कोई दिखाई नहीं दे रहा है , अब हमारा क्या होगा...? 
अब हमें कुछ दूसरी जगह तलाशनी पड़ेंगी ? “ कोई फ़ायदा नहीं हर जगह लाकडाऊन  है बस यही रहो शायद किसी को हमारी  चिंता होगी , “ आप ठीक कह रहे जैसे हम याद कर रहे वो सब भी याद कर रहे होंगे ! 
तभी छत पर खेल रहे चिंटू की नज़र कबूतरों पर पडी , वो बहुत खुश हुआ और अपने पापा को खिंच कर मैदान में दाने की टोकरी के साथ आया और ख़ुश हो कर कबूतरों को आवाज़ देकर दाने डालने लगा , कबूतर सारे ख़ुश और पता नहीं किस दुनियाँ से सैकड़ोंकबूतर उड उड कर आने लगे तो चिंटू पापा को और दाने लाने की ज़िद्द करने लगा तभी डांगी भी आकर उनके पैरों के इर्द  गिर्द मंडराने लगा चिंटू के पापा समझ गये ये भी भूखा है , और वो घर गये कबूतरों को दाने व डागी के लिये रोटी तथा एक बाल्टी पानी लेकर आये डर भी लग रहा था कहीं पुलिस न आ जाए , दाने चिंटू को पकड़ाये व डांगी को रोटी डाली ही थी की ये क्या ?  कई कुत्ते और आये व रोटी पर झपट्टा मार भाग गये , डागी को और रोटी दे कर पहले से बने पक्षीओ के पानी पीने के सकोरे में पानी डाला ताकी कोई गर्मी में प्यासे न रहे ...
आज चिंटू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था , वह पापा को बोला हम रोज़ सुबह सुबह आकर कबूतरों को खाना देंगे , पापा ने कहा जल्दी सो कर उठना हम जल्दी उठकर डाल जायेगे ।
कबूतर चिंटू की सेवा भावना से बहुत खुश थे आज कई दिनों बाद सबने भर पेट खाना खाया 
छोटा कबूतर चिंटू के कंधे पर जा बैठा व उसे प्यार व आशिष देने लगा, चिंटू नेउसको सहलाते हुये कहाँ दोस्त चिंता नहीं मैं रोज दाने डालूँगा लाकडाऊन है तो क्या पेट को भूख तो लगती है 
फिर आप लोगों का क्या दोष मैं जरुर आंऊगा ....
जैसे चिंटू व उसके पापा को बहार से आते देखा चिंटू की मम्मी भड़क गई सेनेटाइज करो नहाने जाओ सीधे , यहाँ लोग जान बचाने की सोच रहे हैं इन्हें कबूतरों को दाना डालना है , कल से कोई नही जाएगा जो जाएगा उसकी मैं टाँगे तोड़ दूंगी जाओ सीधे बाथरूम में नहाकर  आओ चिंटू बोला माँ ग्राउंड में कोई नहीं था और हमने किसी को छुआ नहीं है हमने सेनेटाईजर लगा लिया है हाथ  पैर साफ़ कर लिए हैंनहाने  की ज़रूरत नहीं है और मैं रोज़ जाऊँगा कबूतरों को दाना दूँगा,  उनसे मैंने वादा किया है माँ बोली यहाँइंसानों  को खाना नहीं मिल रहा है , इन्सान भूख से मर रहे हैं और तुम्हें कबूतरों कुत्तों की पड़ी  है । चिंटू ने कहा माँ बेज़ुबान पक्षी व जानवर है भूख लगेगी तो किससे कहेंगे पहले तो बहार कुछ न कुछ मिल जाता था , अब कोई कचरा भी नहीं फेंकता ।  मैं और कुछ करूँ या न करूं ,  इनको दाने रोज़ ज़रूर दूँगा , माँ ये ही मेरा इस समय धर्म व कर्म है । मैं अधिक कुछ नहीं कर पा रहा हूँ तो इन लोगों को कुछ राहत दे दूँ आप मुझे इसके लिए रोकना नही । 
चिंटू के माता पिता बहूत ख़ुश थे क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे के मन में पशु पक्षी के प्रति दर्द देखा उन्हें  अच्छा लगा मेरे बेटे में मानवीय संवेदना तो है। 

डॉ अलका पाण्डेय- मुम्बई 

अलका पाडेंय (अगनिशिखा मंच)
देविका रो हाऊस प्लांट  न.७४ सेक्टर १
कोपरखैराने  नवि मुम्बई च४००७०९
मो.न.९९२०८९९२१४
ई मेल alkapandey74@gmail.com
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[23/11, 9:18 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:- *लघु कथा*
विषय:- *स्वैच्छिक*
शीर्षक:-- *श्री कृष्ण को गोविंद क्यों कहते हैं?*

मेरे प्यारे बच्चों जब भगवान कृष्ण छोटे थे तो बहुत नटखट थे।उनको कन्हैया, श्याम, नंदलाल और गोपाल जैसे कई नाम थे हर नाम के पीछे एक कहानी है। ऐसे ही कहानी उनके गोविंद नाम के पीछे भी है। तो आज की कहानी इस गोविंद नाम पर ही लिख रहा हूं।
*बात उन दिनों की है जब बाल- गोपाल, कृष्ण जंगल में गायों को चराने जाया करते थे*।
एक दिन अपनी गायों को जंगल में लेकर गए तो कामधेनु नाम की एक गाय उनके पास आई, उस गाय ने भगवान श्री कृष्ण से कहा *मेरा नाम कामधेनु है और मैं स्वर्ग लोक से आई हूं"*। जिस तरह आप पृथ्वी पर गायों की रक्षा करते हैं उससे मैं बहुत प्रभावित हूं और आप का सम्मान करने के लिए अभिषेक करना चाहती हूं।
कामधेनु की यह बात सुनकर भगवान मुस्कुराए और उन्होंने उसे अभिषेक करने की अनुमति दे दी। इसके बाद कामधेनु ने पवित्र जल से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। इसके बाद इंद्रदेव अपने हाथी एरावत पर बैठकर वहां आए और उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि आप के पुण्य कामों की वजह से अब से सारी दुनिया में लोग आपको गोविंद के नाम से भी जानेंगे। *तब से श्रीकृष्ण को गोविंद नाम से भी जाने जाते है।*

विजयेन्द्र मोहन।
[23/11, 9:24 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: मंगल वार - 23//11//2021
विषय स्वैच्छिक
विधा - लघुकथा 

काला भैया

"श्वेता! बिट्टू! देखो हम तुम्हारे लिए क्या लाए हैं? श्वेता! बिट्टू! कहाँ चले गए? श्वेता कहाँ छुप गए हो बेटा? बाहर आओ! देखो हम तुम्हारे लिए क्या लाए हैं?" बड़ी देर पुकारने के बाद भी जब कोई भी आवाज़ नहीं आई तो राजू और सीमा दोनों अंदर-बाहर ढूँढने लगे।  बच्चों को कोई अता-पता नहीं था। जब बच्चे कहीं नहीं मिले तो उन्होंने सोचा कहीं सड़क पर तो नहीं निकल गए इस कारण कार बेक कर निकल गए।

बच्चे कहीं नहीं मिले तो वापस आ गए। कार को पार्क करने लगे तो देखा की बेटी तो वहीं कुचली पड़ी थी। बेटा कहाँ गया कहीं दिख नहीं रहा था। अंत में जब वाशिंग मशीन के पास गए तो देखा कि उसमें से खून की कुछ बूंदे निकल रही है जब मशीन को खोला गया तो देखा कि बिट्टू उसके अंदर ठंडा हो चुका था जगह-जगह छिलने ने के कारण खून बह रहा था।

सीमा रोते-रोते बोल रही थी कि मैं ही मजाक में बोलती थी कि तेरा भाई काला है वाशिंग मशीन में डाल कर गोरा करेंगे। तुमने मेरी बात को सच मान करके ऐसा कार्य कर डाला और जब खून निकला तो डर कर कार के नीचे छुप गई। हमें पता नहीं चला हम तुम्हें कुचलते हुए चले गए। 

अब क्या करेंगे जी कर। उसी रात दोनों ने फाँसी लगा ली। जहाँ दिनभर रौनक रहती थी वहाँ अब उदासियों का डेरा था।

 इस कारण बच्चों के सामने कोई ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जिसे वे सही मानकर पूरा करने के लिए आमादा हो जाएँ। 

यह सच्ची घटना देहरादून की है।
वैष्णोखत्रीवेदिका
[23/11, 9:45 am] Anita 👅झा: लघुकथा अंगारिका संकष्टी 
*लड्डुओं की आस *

छुट्टियों में नानी के घर गये हुए थे ,,दादी कहती - नानी के घर जाओगे , दूध मलाई छोले पुरी खावगे मोटे हो के आओगे ,, 
फिर टीचर जेलर , मम्मा पापा की खाओगे मार , आ कर दादी के गले लग बाबा के चमत्कार , विघ्नहर्ता गणपति की कहानी सुनोगे , नही दादी आज तो आपको हमारी गणपति की कथा नानी नानु की कहानी सुननी पड़ेगी ।, 
नानी सोफ़े पर बैठे टी वी देख रही थी । नानी ने गणपति की पूजा के लिये गिनती के २१लड्डू बनाये प्रसाद चढ़ने के बाद मिलेंगे बच्चों को इंतज़ार सहन नही हुआ । बच्चों ने योजना बना ली , नानी जैसे ही टी वी में मशगूल होंगी । नानी के सर के ऊपर गणपति  जी पूजा के रेक पर विराज मान थे । और सामने भोग लड्डुओं का पहाड़ विराज मान था । बच्चों की नज़रें टी वी से हट कर लड्डुओं पर टिकी थी  । बच्चों ने मिलकर योजना बनाई । चौकड़ी बना लड्डू पार करने में लग गये । नानी ने कहा तुम सब ये क्या ? खड़े हो कर टी वी देख रहे हो । हाँ नानी हमें नानू ने सज़ा दी है । हमने सारे भीगे बादाम पेड़ बंनेने बग़ीचे में थ्रो कर दिये । जैसे ही टी वी का प्रोग्राम ख़त्म हुआ । सारे बच्चें बग़ीचे की ओर भागे चोरी के लड्डू खाने में मस्त हो गये । बच्चें बादलों की ओर देखते कहते चाँद निकल आया , नानी को पुकार कहने लगे - चाँद निकल आया पूजा कर लीजिये । नानी ने देखा पूजा की थाल में ११ लड्डू बाक़ी थे । लगता है दस लड्डू गणपति के चूहों को भोग लग गये , नानी ने अफ़सोस ज़ाहिर भी नही किया । और ११ लड्डुओं से पूजा समापन की । पर नानू ने हम बच्चों की चोरी पकड़ ली थी ।  वो पेड़ों में पानी डाल रहे थे । प्रसाद वितरण करते समय नानी ने कहा बच्चों को आधे आधे ही लड्डू मिलगे । 
नानू ने अपनी बुलंद आवाज़ में कहा आपके चूहे बच्चें ने चोरी कर लड्डू खायें है  ।इन्हें चोरी की सज़ा तो मिलनी तो मिलनी चाहिए । चलों कान पकड़ उठक बैठक लगाव , बच्चें नानी के इर्दगिर्द घुम कहने लगे । कृष्ण जी ने चोरी से माखन खाया तो वो भगवान हो गये । अब आप ही बताइये हमें चोरी की सज़ा मिलनी चाहिये । नही इन बच्चों को सज़ा नही मिलनी चाहिए । ये तो मेरे बाल गोपाल है। पहले इन बच्चों को प्रसाद मिलना चाहिये। 
नानू ने हँसी ठहाके लगाते कहा -अरे भागवान यही तो मैं बरसों से समझाना चाहता था । 
श्रीमती अनिता शरद झा 
रायपुर छत्तीसगढ़
[23/11, 10:17 am] 😇ब्रीज किशोर: अग्नि शिखा मंच
 जय माँ वीणावादिनी
   २३/११/२०२१
*मक्का जाने की*                                 "            *हसरत*"
    विधा  -लघु कथा
    .बिषय -   स्वतंत्र
सबीना अब बुजुर्ग हो चली है। उसे मक्का जाने की बहुत हसरत थी वह थोडा़ थोडा़ पैसा जोड़ रही थी। मक्का जाना चाह रही थी।उसके बगल की सकीना को बच्चा होने वाला था वह बहुत गरीब थी उसको भर पेट भोजनभी नही मिलता था वह बहुत कमजोर थी ।
एक दिन उसको पेट में दर्द होने लगा सबीना उसको लेकर हास्पिटल गई वहाँ डाक्टर ने कहा बच्चे को बचाने के लिए आप्रेशन जरूरी  है।उसका पति कासिम चारो ओर देखने लगाऔर अल्लाह के लिए हाथ उठा दिया।
सबीना बोली कासिम दस्खत कर दो जल्दी बच्चे की जान खतरे में है।चाची हम कुछ नही कर सकते।अब जो होगा अल्लाह करेगें।सबीना समझ गई और डाक्टर के पास जाकर बोली आप आप्रेशन करे मै अभी आई और तीर की तरह नीकल कर एक रिक्सा पर बैठ गई बोली
भैया जल्दी चलो किसी की जान खतरे मे है लौट के आना भी है।
माई चलो लेकिन क्या बात है
सबीना बोली भैया नन्ही सी जान अल्लाह के फजल से धरती पर आनेवाली है।मै उसी की स्वागत का इन्ताम करने
जारही हूं सबीना घर जाकर जहाँ पैसा रखा था पोटली ली फिर रिक्से पर बैठ कर हास्पिटल पहूंच गई डाक्टर के सामने पोटली रख कर बोली बस सकीना और बच्चे को बचा लिजिए।
डाक्टर साहब बहुत प्रभावित हुए ।आप्रेसन हुआ जच्चा बच्चा दोनो सकुशल हुए।कासिम तो खुश हुआ सबसे ज्यादा खुश सबीना हुई।
अब सबीना का लक्ष्य होगया सबका मदद करना इसमे उसको असीम सुख प्राप्त होने लगा।सबीना का कुछ साल बाद देहांत होगया।
कासिम मक्का हज करने गया था साथ मे सकीना और बेटाअहमद भी था तीनो जब काबा के पास पहूंचे तो देखते क्या है सबीना उनके सामने काबा में जाती हुई दिख रही है कासिम को ताज्जुब लगा कोई दूसरे आदमी में
इतना सामनता कैसे होगा तब तक एक फकीर आगये
उन्होंने पूछा बच्चा क्या बात है।कासिम ने पूरी बात बताई
और पूछा फकीर बाबा यह कैसे हो सकता है। फकीर ने
कहा अल्लाह की मेहर बानी
ऐसे दानीस लोगो पर होती है
जीस दिन मोहतरमा ने मक्का का पैसा दान किया मक्का जाने की ख्वाहिश अल्लाह ने पूरी कर दिया।
स्वरचित
 बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ 
  भनुजा गोरखपुर यू.पी
[23/11, 10:31 am] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय***लघुकथा  कथा ***
****** गुल मोहर का पेड़ *****
      आज भी मैने देखा आशू उस गुलमोहर  के पेड़  के नीचे उदास  बैठी थी ।स्कूल  से आकर बिना यूनिफार्म  बदले वह पिछले कुछ दिनों से इसी पेड़  के नीचे आकर अकेली  बैठ जाती थी ।आशू के माता पिता दोनों  नौकरी करते थे, प्राईवेट  कम्पनी में  अच्छा  वेतन मिलने के कारण आशू की माँ  नौकरी  छोड़ना नहीँ  चाहती थी,  इसलिए  गाँव  से उसने अपनी विधवा  मौसी  और उसके बेटे को शहर बुला लिया,  यह सोच कर उनके पीछे मासी आशू को सम्भाल लेगी, और घर भी सूना नहीँ  रहेगा । परन्तु  आशू स्कूल से आते ही पेड़  के नीचे  बैठ जाती  थी , मैं  सोचती आठ साल की बच्ची को  घर में  क्या  तकलीफ  है जो यहाँ  आकर उदास  बैठ जाती  है ।उस दिन उसे बहला कर घर ले आई, और कारण पूछा, वह डर गई और बोली  मैं  बताऊगी तो भैया  मारेंगे,  मरे आश्वासन  देने  पर उसने  रोते हुए बताया  मै जब यूनिफार्म  चेन्ज करती हूँ,  भैया  बैड टच करते हैं,  मुझे अच्छा  नहीँ  लगता  ।मैने पूछा  तुमने  मम्मी  को नहीं  बताया ।
बताया  तो था पर मम्मी पापा  ने ध्यान  नहीं  दिया,  दोनों  मज़ाक करते रहे ।मैने इस बात को गम्भीरता से  लिया,  सोचा अगर मैं  आशू की मम्मी  से बात करूँगी ,तो वे मूझ पर भी विश्वास नहीं  करेंगी ।एक अच्छे पड़ौसी होने के नाते मेरा भी कर्तव्य  बनता है  बच्ची की रक्षा  करना  ।मैने आशू को आश्वासन  देकर कहा बेटा कल तुम  अपनें  कमरे में  यूनिफार्म चेन्ज करना, आगे मैं सम्भाल लूँगी। दूसरे दिन आशू स्कूल से आकर अपने कमरे में  कपड़े  बदलने लगी, उसी समय मंसी का बेटा आया  गलत हरकतें करने  लगा । मैने सारे दृश्य  का विडियो  बना लिया , और अन्दर जाकर उस लड़के को दो थप्पड़  लगा दिये , और आशू को लेकर अपने घर आ गई । शाम को जब आशू के मम्मी पापा घर आए, उस मौसी  के बेटे ने न जाने उनको क्या  कहा, सीधे मेरे पास आए और चिल्लाने  लगे, आपको क्या  हक है उस पर हाथ उठाने का , आप होती कौन हैं  । मैने किसी तरह उन दोनो को शान्त किया,  फिर आशू की बात बताई,  फिर भी वे कहने लगे आशू तो बच्ची हो, कुछ भी कह देती है, आप झूठा इल्ज़ाम  लगा रही हैं ।तब मैने उनको विडियो  दिखाया,  और कहा आप नहीं  जानते वह छोटी बच्ची  कितने मानसिक  तनाव से  गुज़र रही है, कितना  अकेला  महसूस  कर रही  है खुद को ।विडियो  देखतेही दोनो हैरान परेशान  हो गए ।।।।
 वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)  ....
[23/11, 11:06 am] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच
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दिन- मंगलवार
दिनांक -23/11 /2021  लघु कथा 
विषय - *प्लेटफार्म* 

सुबह से पांचवी बार फोन बजने लगा ।रीता ने फोन उठाया वहां से फिर वही आवाज आई। दीदी तुम अभी तक नहीं आई ।आप नहीं आओगी तो मैं शादी  नहीं करुंगी।बस निकल ही रही हूं तुम उदास मत हो। रीता ने दोनों बच्चों को तैयार किया और ऑटो में जाकर बैठ गई ।ऑटो के स्टेशन पहुंचते ही वह जल्दी-जल्दी बैग उठाकर बच्चों को लेकर प्लेटफार्म की ओर भागी। गाड़ी का समय हो चुका था ।प्लेटफॉर्म 4 पर गाड़ी आनी थी ।वो जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ने लगी ।वो जा ही रही थी कि आखिरी सीड़ी में एक बुजुर्ग फिसल कर गिर गए ।वहां गाड़ी छूटने को थी। लेकिन रीता ने उनको उठाना ज्यादा जरूरी समझा। वह बच्चों को समान के पास बैठाया उन बुजुर्ग को उठाया और वही टिका कर बैठा दिया। फिर उसने फोन लगाकर रेलवे के डॉक्टर को वहीं प्लेटफार्म पर ही बुलाया ।उनका इलाज कराया ।डॉक्टर बोले ये अभी तो ठीक है लेकिन इन्हें 3-4 घंटे की देखभाल की आवश्यकता है और आराम की भी ।आप इनका ध्यान रखिए ।रीता ने हां में सिर हिला दिया। और उनके पास बैठ गई। कभी उनको पानी लाकर देती ,कभी उनके हाथ पैर सहलाती ।इतने में उसकी गाड़ी जा चुकी थी ।वो और उसके दोनों बच्चे प्लेटफार्म पर ही उन बुजुर्ग महाशय के पास बैठे रह गए । रात हो गई। उसने सोचा अब तो रानी(छोटी बहन) की शादी हो चुकी होगी और वह बहुत नाराज भी होगी। उसने डरते-डरते रानी को फोन लगाया तो पता चला कि दूल्हे के पिताजी कहीं बाहर से आ रहे थे। अब अचानक उनका पता नहीं चल रहा है ,इसलिए अभी तक शादी नहीं हो पाई है। सारी छानबीन के बाद पता चला कि जिन बुजुर्ग वार के पास रीता रुक गई थी । वही दूल्हे के पिता थे ।सारी बात पता चलने के बाद दूल्हे के पिता बोले !जिसकी बहन इतनी अच्छी है ,वह लड़की कितनी अच्छी होगी। यह चाहती तो मुझे प्लेटफार्म पर ही छोड़ कर अपने सफर पर जा सकती थी लेकिन इसने मेरा साथ देकर इस प्लेटफार्म को एक सशक्त और यादगार जीवन स्थल बना दिया।

रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश
[23/11, 11:15 am] सरोज दुगड गोहाटी: # अग्नि शिखा काव्य मंच #
    # विधा -  लघुकथा #
            # नम्रता #   
            
विनम्र होना व्यक्ति का विशिष्ट गुण है !
नम्रता सभी को अच्छी लगती हैं ! नम्रता व्यक्ति को विशिष्ट बनाती है जो सब में नहीं पाया जाती !
         " विधा ददाती विनियम् "
बौद्धिक संपदा से संम्पन्न व्यक्ति नम्र हो जाता है ! जैसे फलों से लदा वृक्ष झुक जाता है उसी प्रकार नाना गुणों से शुशोभित व्यक्ति के स्वभाव में नम्रता आ जाती है !
नम्रता स्वभाव में ऐसा लचीलापन लाती है कि व्यक्ति कहीं भी घुल-मिल कर रह सकता है !
विनीत शिष्य गुरू के लिए सुखदाई होता है और अविनीत कान में पानी की तरह खटकता है !
जीवन के हर क्षेत्र में नम्र व्यक्ति सफल होता है और सबको प्रिय होता है !
एक बार बहती नदी से पूछा गया की ये लम्बी - लम्बी घास तुम्हारे बहाव में बाधक नहीं बनती ? तब नदी में कहा जब मैं बहती हूं तो ये नम्रता से झुक जाती है है और बाद में फिर खड़ी हो जाती है ! ये इतनी विनम्र हैं कि मेरे प्रवाह में कभी बाधक नहीं बनती !
मित्रों कहने का ये तात्पर्य है कि हममें इतनी नम्रता आ जाए कि हम किसी के जीवन में बाधक न बनें !

सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[23/11, 11:58 am] Nirja 🌺🌺Takur: अग्निशिखा मंच
तिथि-२३-११-२९२१
वार - मंगलवार 

       अजय के हृदय में झरना को हंसते मुस्कुराते दीपावली की तैयारी करते  देख कर बहुत संतोष हो रहा है।                   पिछली दीवाली में झरना कैसे मुरझा  गई थी जब उसे  ब्रेस्टकैंसर हुआ था,  वह स्वयं कितना डर गया था पर उसने झरना को हिम्मत बंधाना नहीं छोड़ा। 
अजय-  " बहुत छोटा सा ऑपरेशन  है घबराना मत "
झरना  - " लो आप साथ में हो तो मैं क्यों घबराने लगी।  मैं तो  आपकी शेरनी हूँ,  आपरेशन छोटा हो या बड़ा मैं नहींं डरती।  "
    अचानक झरना ने पुकारा - " अजय  क्या सोचने लगे  चलो ना पूजा का मुहूर्त हो रहा है। "
   और अजय भगवान का धन्यवाद करते हुए  पूजा करने को चल पड़ा। 

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[23/11, 12:11 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक***२३/११/२१
विधा*** लघु कथा 
विषय***
        #**मिट्टी की महक**#
                   ^^^^^^^
           अपना घर, अपने लोग अपना परिवेश ,अपना पहराव   ,अपना धर्म, अपने मिट्टी की सौंधी  खुशबू किसे नहीं भाती ? इतना ही नहीं भारतीय लोगों में , परिवारों में जो अपनापन है, जो प्यार स्नेह दुलार एकता है और परिवार के प्रति जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश एवं संस्कार और परंपरा है यह सब देखते हुए वह  शख्स, अपने परिवार में, देश में, इस मिट्टी में घुल मिल जाना चाहता है और यही चाहत विदेश की चकाचौंध दुनिया को छोड़ कर प्यार सादगी से भरे इस देश की मिट्टी की महक एक नवयुवक को यहां खींच लाती है ।
         विदेश में नौकरी करने वाले निलेश ने जो गुजरात के एक बड़ी  कंपनी में काम करता था वहीं से प्रमोशन पर अमेरिका में चला जाता है । वहां पांच साल काम करने के बाद उसे ये एहसास हुआ कि जीने का मजा यहां नहीं । बहुत सोच विचार कर, उसने भारत आने का निर्णय लिया और सीधे नागपुर के एक बड़ी कंपनी में कम वेतन पर ही नौकरी पकड़ ली । 
          उसकी सोच ये थी कि भले कम वेतन है लेकिन मैं अपने परिवार के साथ रहूंगा। मां बाप की सेवा करूंगा। अपनी जिंदगी अपने लोगों के साथ भारतीय परिवेश में गुजारूंगा । 
        निलेश ने वह भी नौकरी छोड़कर अपना खुद का बिजनेस चालू किया ।आज निलेश , काम पाने वाला नहीं बल्की काम देने वाला बनकर, स्वस्थ मस्त मन से, तन मन धन से , लगन मेहनत से अपने काम को खूबसूरत अंजाम दे रहा है ।
           सलाम है ऐसे नवयुवक के जज्बे़ को जो विदेश की चकाचौंध , आलीशान  दुनिया को ठुकरा कर भारतीय मिट्टी की खुशबू में पल बढ़ रहा है । 
            सच कहा किसी ने कि जो अपने वतन का नहीं हो सकता वह किसी का भी नहीं हो सकता ।  भारत की इस मिट्टी की महक में इतनी कशिश है यहां हर कोई बसना चाहता है ।  

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर
[23/11, 12:42 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
23/11/2021 मंगलवार
विषय-लघु-कथा
माँ-बाप का दर्द

कृष्णकांत अस्पताल में लेबररूम के बाहर चक्कर लगा रहा था।तभी नर्स ने आकर कहा बधाई हो,आपके बेटा  हुआ है।कृष्णकान्त खुशी से उछल पड़ा, जेब में हाथ डाला और पांच सौ का कड़क नोट नर्स को थमाते हुए कहा-सिस्टर स्टाफ़ में मिठाई बांट देना।कृष्णकान्त का ये चौथा पुत्र था।
           अपनी पत्नी सुमित्रा का हाथ हाथ में लेते हुए कृष्णकांत ने कहा-बधाई हो सुमित्रा। सुमित्रा ने लजा कर आँखे नीचे झुका ली। आज हमारे चार कन्धे हो गए।जब हम मरेंगे तो किसी और के कंधे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
   समय पंख लगा कर उड़ने लगा,कब बच्चें पढ़ लिख कर जवान हो गए।आज सब अपने पैरों पर खड़े हैं,चारों की शादियां हो गयी हैं,सब अपने परिवार के साथ खुशी से रह रहें हैं।कृष्णकांत ने मोहवश जीते जी अपनी सारी प्रोपर्टी बच्चों में बांट दी। सुमित्रा ने कई बार कृष्णकांत को समझाया भी की थोड़ा बहुत अपने बुढ़ापे के लिए भी बचा कर रखो,समय का क्या भरोसा पर कृष्णकांत हमेशा हंस कर टाल जाता सुमित्रा मुझे अपने शेरों पर पूरा भरोसा है। 
वक़्त ने करवट बदली,जब सारी प्रॉपटी बच्चों को मिल गयी तो उनकी नीयत बदल गयी।धीरे-धीरे बच्चें उनसे दूर होते चले गए।
और आज कृष्णकांत और उनकी पत्नी अपने सबसे छोटे बेटे के सर्वेंट क्वाटर में रह रहे हैं।जो रूखा सूखा बचता था ,उन्हें दे दिया जाता।उनके पास इतना पैसा नहीं हैं कि वो अपनी पसंद का कुछ खा सके। कृष्णकांत अपनी पत्नी से आँखें नहीं मिला पाते,और रोते हुए कहते काश! मैंने तुम्हारी बात मानी होती तो आज ये दिन देखने न पड़ते। दोनों सोचते क्या कभी ऐसा भी हो सकता है? हमनें तो कभी सपनें में भी नहीं सोचा था।
कृष्णकान्त और सुमित्रा आज सोच रहें थे,काश! हमारे एक बेटी होती को हमारा दर्द समझ पाती,और दोनों की आँखें नम हो गयी।
                                 तारा "प्रीत"
                          जोधपुर  ( राज०)
[23/11, 12:51 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लघुकथा)
      🌹 पंछी 🌹
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          हम एक पाॅश कॉलोनी में किराए के बंगले में रहते थे ।हमारे बंगले के बाजू वाला बंगला बहुत ही शानदार था ।कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियां, उस पर टंगे सिल्क के पर्दे ,बात ही कुछ और थी। गर्मी के दिन थे ।स्कूल की छुट्टियां लग चुकी थी। पड़ोसी का देहरादून जाने का प्रोग्राम बना था।
         जिस दिन वे जा रहे थे। अपनी हड़बड़ी गड़बड़ी में घर बंद करते समय यह देख न पाए कि ऊपर कांच वाले कमरे में एक चिड़िया बंद हो गई है। उनकी कार जा चुकी थी ।जब पिताजी का ध्यान गया ,वह चिड़िया बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रही थी ।पर बार-बार कांच से टकराकर अंदर ही अंदर पूरे कमरे के चक्कर काट रही थी। बहुत घबराई सी थी ।वह गौरैय्या पक्षी थी। चिड़ी अंदर थी । चिड़ा बाहर था। चिड़ा बाहर तड़प रहा था ।चिड़ी अंदर कांच से टकरा टकरा कर हार रही थी।
          पिताजी से उनकी तड़प वह परेशानी देखी न गई ।उन्होंने परेशान होकर भैया को बुलाया। हॉकी स्टिक देकर कहा, "खिड़की के कांच का एक हिस्सा तोड़कर उसे आजाद करो ,नहीं तो वह मर जाएगी ।"जैसे ही कांच तोड़ा गया ,वह  बेतहाशा बाहर निकली और अपने साथी पंछी के साथ मुक्त गगन में निकल गई।
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स्वरचित मौलिक रचना.
डॉ . आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
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[23/11, 1:54 pm] वीना अडवानी 👩: लघुकथा
वो पागल
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बात उस समय की है जब मैं एक विडियो देख रही थी फेसबुक पर, तब उस विडियो को देख चकित भी हुई, और खुशी भी, भयभीत भी थी तो भग्वान से प्रार्थना भी कर रही थी । ये महज़ लघुकथा नहीं अपितु सच्चाई है जिसे मैं लघुकथा के रुप में ढ़ाल कर प्रस्तुत कर रही हूं। 
           विदेश के एक रेलवे स्टेशन पर एक पागल रहता था, उस पागल ने उस रेलवे स्टेशन को ही अपना घर बना लिया था लोग देखते रहते पर वो सदैव स्टेशन पर खामोशी से बैठ खुद से बतियाता, प्लेट फार्म पर घूमता रहता था। लोग पागल जान कर देखा अनदेखा कर चले जाते थे। एक बार उसी रेलवे स्टेशन पर एक महिला अपने पति और अपने छोटे बच्चे जो की प्रेम्म में लेटा हुआ था ट्रेन के आने का इंतजार कर रही थी, उसे लगा बच्चे का ध्यान पति देव रख रहे और पति को लगा पत्नी बच्चे को देख रही जैसे ही ट्रेन आई दोनों जल्द से चढ़ गये ट्रेन में पर बच्चा दोनों ही गलत फ़हमी के चलते स्टेशन पर छोड गये। ट्रेन का जब इलेक्ट्रिक दरवाजा बंद हुआ और ट्रेन चलने लगी तब उनका ध्यान गया। अब तो बच्चा स्टेशन पर ही छूट गया। अब क्या वो पागल सब देख रहख था वो उठा और उस बच्चे के प्रेम्म को यहां वहां भगा रहा था। कभी पटरियों की ओर धक्का देता और जल्दी पकड़ लेता उफ्फ वो क्षण जब पटरियों की ओर प्रेम्म जाता तब लगता कहीं बच्चा मर न जाए गिर कर या अचानक कोई ट्रेन ना आ जाए लोग खड़े देखा अनदेखा कर रहे थे। तीस मिनट का समय बीत चुका था यही प्रक्रिया वो पागल दोहरा रहा था। मेरी तो विडियो ही देख हलक में जान अटकी हुई थी आखिर मैं भी एक मां हूं ना किसी के बच्चे को कैसे देख सकती थी। पर तीस मिनट बाद उस बच्चे के मां बाप किसी दूसरी ट्रेन से वापस आए। साथ में उनके पुलिस और शायद कोई रेलवे अधिकारी भी था। उस मां ने जल्द प्रेम्म और बच्चे को उस पागल से लिया और अपने बच्चे को बांहों में भर जोर जोर से रो रही थी साथ बहुत धन्यवाद देकर उस पागल के आगे झुक कर अभिन्नदन कर रही थी। वो पागल बस पागल ही हरकत करता मुस्कुराता, खुद से बतियाते हुए उसी जगह चुपचाप बैठ गया। अब क्या सोचूं क्या दुनिया ने उसको पागल नाम दिया या गरिबी ने। पर सच उस पागल के दिल में प्यार, ममता और एक इंसानियत भरी जिम्मेदारी, दायित्व को निभाने की समझ थी। या उस मां और बच्चे का नसीब बहुत अच्छा था। पर सच वो पागल आज उसके प्रति मेरे दिल में सम्मान है। क्यों कि जो दुनिया पागल नहीं थी जो रेलवे स्टेशन पर लोग थे वो सिर्फ मूकदर्शक बन उस पागल को देख रहे थे। तो पागल कौन था समझदार दुनिया या वो पागल?

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[23/11, 2:05 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹 *नमन मंच* 🌹🙏🏻
🙏🌹 *जय अम्बे* 🌹 *२३/११/२१* 🌹🙏
🙏🏻🌹लघुकथाः   *सच हुए सपने*, 🌹🙏🏻

                     सरयु की आज शादी थी, एकलौती बेटी थी, खुबसुरत, पर ग़रीब मां बाप के यहाँ जन्म लिया था, घर था, थोड़ी ज़मीन थी, पर मजदूरी करके गुजारा हो जाता था,दहेज़ दे नहीं शक ते थे, कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था, 
      एक पैसादार परिवार वाले सरयु का सौंदर्य देखकर शादी के लिये हां कर दी, ओर सरयु दुल्हन के शृंगार में बारात आने की राह देख रही थी, जीवन के नये सपना के बारे में सोचकर, मन प्रसन्नता से भर जाता था, पर माता, पिता अकेला हो जाने की सोच से नयन अश्रुपूर्ण हो जाते थे, 
            नहीं, नहीं, मुझे माता पिता की देखभाल अवश्य रखना है , कुछ तकलीफ़ नहीं होने देंगे हम, भावना के दो किनारा से बहे जा रही थी, 
      जोरों से डी, जे की धुन सुनाई दी, ले जाएंगे, ले जाएंगे, ओर शहनाई बज रही थी बा़बुल की दुआ ए लेती जा, 
     महेमानो का स्वागत, कन्या को मंडल में लाने के लिये कहा गया, सरयु  को देख कर कोई अप्सरा गगन से उतर कर आ रही, लगता था, 
            इतने में दूल्हा के चाचा आकर कहने लगे, पहले दहेज़ रखना, फिर शादी, सरयु के पिता ने कहा मेरी पास घर ओर ज़मीन के अलावा कुछ नहीं है, दूल्हा के पिता ने चाचा से कहा, अभी रहने दो, ये एकलौती बेटी है, बाद में देखेंगे, चाचा माने ही नहीं, गुस्से से बताने लगे, ये घर ओर ज़मीन के कागज़ लाओ ओर दूल्हा के नाम कर दो,
      हो गया रंग में भंग, बेटी के पिता, अपनी बेटी खुश, तो हम भी खुश,यह साच कर कि, हम किराए के मकान में रह लेंगे, कागज़ लेने को घर में गया, 
         घुंघट निकालकर सरयु ने हिम्मत से कहा मुझे ये शादी मंज़ूर नहीं है, आप यहां से चले जाओ, मेरा पिता का ये अपमान मुझे मंज़ूर नहीं, गाना बंध हो गया, खुशी के रंग बिखर गये, 
        एक सादा कपड़ा  में एक लड़का, सरयु के पास आकर बोला, *मुझ से शादी करना पसंद करोगे*?, 
            सरयु के पिता सरयु के बगल में  थे, वो खुश हो गये, और कहने लगे, मंगल कहां थे तुंम? कितना ढुंढा में ने तुझ को!!!!!!!!! 
      मंगल ने प्रणाम करते हुए कहा, आपने अनाथालय से लाकर, पढ़ाये,प्यार से  बड़ा किया,यह बात जमाने को  पता नहीं, बी एड करने शहर गया था, दो साल से स्कूल  में शिक्षक हुं, कमाया हुं, सरयु का हाथ मांगने दो दिन पहले ही आया था, पर यहाँ शादी की तैयारी चल रही थी, तो बहार से वापस चला गया, आज मुझे ऋण चुकाने का मौका दे दो, मुझे सरयु के सिवा कुछ नहीं  चाहिये, 
         शादी में रंग में भंग होने के बावजूद, आंगन में खुशी यों की शहनाई  बज ने लगी ओर सरयु, हंसते,हंसते ससुराल गई, मंगल अपना सपना सच हुआ देखकर, ईश्वर को अंतर से प्रणाम कर रहा था, अच्छे करम का फल अच्छा ही मिलता है, 
       आज भी भारत भूमि ऐसे संस्कारी नव युवक ,और अच्छे इनसान की वजह से, मशहूर है, 

🙏🏻🌹पद्माक्षी शुक्ल,🌹🙏🏻
[23/11, 2:43 pm] +91 70708 00416: ख़ामोश मोहब्बत
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           बेहद खूबसूरत,शांत और सौम्य स्वभाव की थी मृणालिनी। उसके घर के सामने एक सभ्य परिवार   रहता था। उनका एकलौता बेटा था रीतेश। मृणालिनी और रीतेश एक दूसरे को चाहने लगते हैं.... दोनों के बीच बेइंतहा मोहब्बत हो जाती है। कुछ समय के पश्चात जब परिवार वालों को पता चला तो इनकी मोहब्बत रास नहीं आई.... क्योंकि मृणालिनी एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से थी....। फिर जल्दी में मृणालिनी की शादी दूसरे लड़के के साथ कर देते हैं....
कुछ दिन तो ठीक -ठाक चला.... फिरकुछ महीने बाद पति  बीमारी के कारण चल बसे। मृणालिनी अपने मायके चली आती है...जब रीतेश को सारी बातों का पता चला तो "उसका मन हिलोरें मारने लगा.... शादी के लाल जोड़े और गहने लेकर मृणालिनी के घर जाता है। "मृणालिनी की मां दरवाजा खोलती है....रीतेश ने पूछा - चाची जी मृणालिनी कहां है..... मां ने झट से कहा-वो तो छत पर गई है....रीतेश छत पर जाता है और उसके हाथों में लेकर चुपचाप आने लगता है .. दोनों एक दूसरे को ठीक से देख भी नहीं पाते हैं... मृणालिनी कुछ समझ पाती...?
"ख़ामोश मोहब्बत की बातें... उसके अन्दर अविरल प्रेम की अश्रुधारा बहनें लगी थी...
    
डॉ मीना कुमारी परिहार
[23/11, 2:58 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक-"फूल वाला"

इसकी उम्र कोई बारह तेरा साल की रही होगी हाथ में फूल लिए हुए बगल में टोकरी संभाले हुए आवाज लगा लगा कर फूल बेच रहा था। मैंने अपने पास बुलाया और पूछा क्या नाम है तुम्हारा ?उसने हरीश नाम बताया। मैंने दो गुच्चे फूलों के उससे खरीद लिए ।जिसकी कीमत ₹40 मात्र थी। मैंने जब उसे गौर  से देखा तो मुझे महसूस हुआ इसको मैंने 4 दिन पहले खिलौने बेचते देखा था ।जो मैंने उससे पूछ भी लिया तुम पहले खिलौने भी बेचते थे? उसने हां में सिर हिलाया और बताया सेठ जी जो भी बेचने को कहते हैं वह हमें बेचना पड़ता है ।उसका हमें कमीशन मिलता है! एक खिलौने या एक गुच्चे पर ₹2 मात्र!
मैंने हरीश को अधिक रुपए देने चाहे, पर उसने नहीं लिए। यद्यपि उसकी मां बहुत बीमार है ।3 बहन भाई हैं ।सबसे बड़ा वही है। बाकी और  बहन- भाई सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. जब मां बीमार नहीं थी तो वह भी दूसरी क्लास में पढ़ता था। पर तीन-चार साल से वह कमाई में लग गया था ।ताकि घर का गुजारा चला सके ,और मां की बीमारी का खर्चा निकाल सके. इतनी ढेर सारी जिम्मेदारी के बाद भी उसने फालतू का पैसा लेना नहीं गवारा किया. मैंने सहानुभूति दिखाते हुए उससे कहा तुम घर का काम करोगे ?वहां हम तुम्हें पढ़ाएंगे भी और खाना-पीना कपड़े भी देंगे .तुम रात को अपने घर जा सकते हो .उसने हां मैं अपनी गर्दन हिलाते  हुए अपनी स्वीकृति दी. लेकिन फिर बोला -कल मां से पूछ करके बताऊंगा  और चला गया ।दूसरे दिन आया सुबह-सुबह और नमस्कार कर के पैर छुए ,बोला मैं आज से आपके यहां काम पर लगता हूं ।मुझे बहुत खुशी हुई मैंने उसको स्कूल में भी दाखिला दिलवा दिया ।उसकी स्कूल ड्रेस भी बनवा दी और जब फालतू टाइम होता था तब मैं उससे थोड़ा बहुत छोटा-मोटा काम करवा लेती थी ।बाकी शाम को खिला पिलाकर और जो बचा था वह भी उसके साथ डाल दिया करती थी। ताकि उसके घर वालों को कोई परेशानी ना हो ।जो इमानदार होता है उसकी भगवान भी मदद करता है ।किसी न किसी रूप में करें, करेगा अवश्य ।इसलिए हमें अपनी इमानदारी कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

रचित लघु कथा 
 रजनी अग्रवाल
  जोधपुर
[23/11, 3:39 pm] चंदा 👏डांगी: !!!  लघुकथा  !!! 
एक रमेश जी उनके कुछ शिष्यो के साथ बातचीत कर रहे थे, विषय था महिलाओं को घर के बाहर जाकर काम करना चाहिए या नहीं रमेश जी ने जोर देकर कहा कि महिलाएँ अगर नौकरी करेगी तो घर गृहस्थी चोपट हो जायेगी बच्चों की परवरिश भी ठीक से नहीं हो पायेगी पर उनके शिष्य तरूण को अच्छा नहीं लगा उसने बोला सर इस बात में मै आपसे सहमत नहीं हूँ, तभी उनकी 60 वर्षीय पत्नी चाय नाश्ता लेकर आई तो वो उनपर चिल्ला पड़े बच्चों को तो जानवर भी सम्भाल लेते हैं खाना बनाना और बच्चे सम्भालने के अलावा तुमने चालीस सालों में किया क्या है
😭😭😭😭😭
चन्दा डांगी रेकी ग्रेण्डमास्टर
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[23/11, 3:39 pm] रानी अग्रवाल: बहू बदल गई।
२३_११__२०२१.मंगलवार।
विधा_लघुकथा।
विषय_बाकी बचे ना कुत्ता खाए।
शीर्षक_बहू बदल गई।
अमृता की बहू बड़ा स्वादिष्ट भोजन बनाती थी पर एक खराबी थी कि वह खाना जरूरत से ज्यादा पका देती थी।घर में खाने वाले चार लोग थे। वो टोप भर के चावल ,खूब सारा आटा,सब्जी में तेल ज्यादा डाल देती थी।जब सब लोग खा चुकते तो पता चलता कि काफी खाना बच गया है।
     अब प्रश्न उठता कि इस खाने का क्या करें? फेंक दे, ऐसी उनकी आर्थिक परिस्थिति नहीं थी इसलिए वो खाना फ्रीज में ठूंस दिया जाता अगले दिन बासा खाने के लिए।अगले दिन फिर वही हाल।क्या करें?उसकी सास उसे समझाती थी तो उसे बुरा लगता था।एक सास ने तरकीब निकाली।उन्होंने बहू की मां से कहा इसे समझाइए।
     मां ने बड़े प्यार से बेटी को घर_गृहस्थी की बातें बताई,अच्छी रसोई पकाने के नुस्खे बताए,बेटी समझ गई।
     अब बहू सटीक अंदाज से भोजन पकाती,सब्जियों में तेल कम डालती, आटा कम लगाती ।अब सब ताजा भोजन खाते हैं।खाना बर्बाद नहीं होता,इससे उनकी बचत बढ़ गई जिससे वे अपने परिवार की दूसरी जरूरतें पूरी कर पाते हैं।इस प्रकार बहु सीख गई कि भोजन इतना ही बनाई जो"बाकी बचे ना कुत्ता खाए"।
स्वरचित मौलिक लघुकथा__
रानी अग्रवाल,मुंबई,२३_११_२१.
[23/11, 3:50 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: अफ़सोस ----- ओमप्रकाश पाण्डेय
ये फालतू के लोग जहाँ देखो दूकान लगा देते हैं, कहीं भी सब्जी का ठेला खड़ा कर सब्जी बेचने लगते हैं, वह देखो उसने चाट का ठेला लगा रखा है, लोग वहीं चाट खा कर, वहीं पत्ते फेंक देते हैं. न जाने कब सुधरेगा इण्डिया और कब सुधरेगें यहाँ के लोग. जरा सी भी सिविक सेंस नहीं है.
आप अमेरिका में ऐसा करो तो, कोई करने नहीं देगा, यूरोप में कहीं भी जाओ, एकदम सलीके से दूकान रहता है, फूड कोर्ट, रेस्टोरेंट सब एकदम साफ सुधरा, देखते ही मन खुश हो जाता है. आजादी के सत्तर साल हो गये लेकिन इण्डिया वहीं का वहीं रह गया, रत्ती भर भी लोगों को अक्ल नहीं आयी.
यह सारगर्भित भाषण राजेन्द्र बाबू अपने साथ चलने वाली पत्नी अर्चना को दे रहे थे. अब राजेन्द्र बाबू ने कितना अमेरीका और यूरोप घूमा था, इसकी जानकारी पत्नी अर्चना को नहीं था, लेकिन पत्नी ने कक्षा सात के भूगोल के किताब में अमेरिका और यूरोप महाद्वीप के बारे में जरूर  पढ़ा था, इसके अलावा उसे अपने गाँव के बाहर के भूगोल की जानकारी नहीं थी. ऐसा  भी नहीं कि वह बुद्धिमान नहीं थी . लेकिन वह कक्षा आठ के आगे पढाई नहीं कर सकी थी क्योंकि गाँव के आसपास भी कोई ऐसा विद्यालय नहीं था जहाँ वह आगे की पढ़ाई कर सके. थोड़ी बड़ी होने पर पिता जी ने उसकी  शादी  एक सरकारी आफिस में काम वाले राजेन्द्र बाबू से कर दिया. राजेन्द्र बाबू ने नौकरी में जमाने के हिसाब से बहुत पैसा कमाया और बच्चों को खूब पढाया. बच्चे  भी अपनी अपनी जगह खूब पैसा कमाते हैं. 
खैर यह तो रही यहाँ तक की कहानी, अब आगे की कहानी यहाँ से  शुरू होती है.
तो राजेन्द्र बाबू ने अपने बच्चों की शादी बहुत बड़े घरों में की, बहुएं पढ़ीं लिखीं भी थी, दहेज भी, लिया क्या लोगों ने यूँ ही जबरदस्ती  दे दिया. आखिर लड़कीवालों को भी समाज में अपनी औकात भी तो दिखानी थी. खैर शादियां धूम धाम से हुई. सब बच्चे बड़े शहरों में रहते और वहीं नौकरी करते थे. राजेन्द्र बाबू ये सब देख कर बहुत खुश होते थे और अपने बुद्धि और परिश्रम पर गर्व करते थे. लेकिन यह सब करने के चक्कर में अनजाने ही में उन्होंने अपनी पत्नी अर्चना  के स्वास्थ्य के विषय में सोंचा ही नहीं, उसने कई बार चक्कर आने और भूख न लगने के बारे में बताया और राजेन्द्र बाबू ने उसका दवा भी कराया, पर बहुत अधिक चिंता नहीं की. अचानक एक दिन सुबह अर्चना को चक्कर आया और वह बेहोश हो गई. खैर पास के एक अच्छे हस्पताल में भरती कराया, कई जांच वगैरह हुआ, पता लगा सुगर बहुत अधिक 640 है और ब्रेन हैमरेज हो गया है. खैर कुछ दिनों के इलाज के बाद अर्चना को होश आया, लेकिन वह बोलने व चलने में असमर्थ थी. 
बच्चे माँ का हाल सुन कर आये, उनकी पत्नियों को, चूंकि वे नौकरी करतीं थीं, तत्काल नहीं आ सकी. कुछ दिनों बाद बच्चे बहु अपने अपने कामों के कारण वापस चले गए, रह गए राजेन्द्र बाबू. राजेन्द्र बाबू मन से अपनी पत्नी की सेवा में लगे रहते हैं और आशा भी रखें हैं कि एक दिन उनकी पत्नी पहले की तरह न सही, लेकिन कुछ तो ठीक हो जाये.
लेकिन उन्हें आज इस बात का अफसोस हो रहा है कि काश यही सेवा  उन्होंने पहले की होती तो आज यह दिन न देखना पड़ता. 
( यह मेरी मौलिक रचना है ------ ओमप्रकाश पाण्डेय)
[23/11, 4:07 pm] 👑सुषमा शुक्ला: मंच को मंच को नमन
लघु कथा,

 विषय कुत्ते की मौत मरना,


मानिक चंद जी अपने परिवार के साथ गरीबी मेंभी बहुत शांति पूर्वक सुकून से जी रहे थेl दो बेटे पत्नी और मां के साथ जीवन सुचारु रुप से चल रहा थाl मानिक चंद जी भले ही गरीब हो परंतु मन के बहुत धनी सामाजिक प्रतिष्ठा, समय पर सबके लिए खड़े होना ,गरीबों की बुजुर्गों की और बच्चों की मदद करना आपकी आदत में शामिल था🙏
 समय ने करवट बदली एक दिन अचानक उनकी लॉटरी खुल जाती है और उनके वारे न्यारे हो जाते हैं, और वह कहते हैं न कि लक्ष्मी के साथ-साथ माता सरस्वती का होना बहुत आवश्यक है जो हमें सद्बुद्धि और विवेक से लक्ष्मी का इस्तेमाल करना सिखाती है। परंतु मानिकचंद के साथ ऐसा नहीं हुआ, पैसे का घमंड सातवें आसमान पर ले गया उनके जितनी भी सुंदर करम गति थी वह बाधित होती रहीl समाज में जितना नाम था प्रतिष्ठा थी सब धूमिल हों गई lऔर उनके अंदर बुरी आदतों का संचार होने लगा।
 परिवार वालों ने बहुत समझाया समाज वालों ने भी सीख दी, किंतु लक्ष्मी सर पर चढ़कर बोलने लगी और सारी बुरी आदतें पीना और भी कई बुरी आदतें जो दुखदाई होती हैं, पैसे का रास कर गईl किसी की शिक्षा सीख का असर उन पर नहीं हुआ, 
*कहते हैं कि यश पैसा जब मिल जाए तो उसको बरकरार रखने की ताकत भी आप में होनी चाहिए आपके पैर मजबूती से जमें रहने चाहिए* परंतु विपरीत परिस्थिति में इन सब बातों का कोई असर नहीं हुआ और एक दिन वह शराब घर से शराब पीकर बाहर आते हैं और लड़खड़ाते हुए रास्ता पार करते हैं, उनके ऊपर से एक ट्रक निकल जाता हैl
 *हाय रे बदकिस्मती कुत्ते की मौत मारे जाते हैं* 
*संदेश*
*इसलिए लक्ष्मी वैभव यश को बनाए रखने के लिए आपके विवेक की बहुत जरूरत होती है अन्यथा पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता*


  स्वरचित  लघु कथा सुषमा शुक्ला
[23/11, 4:48 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच   
लघु कथा 
शीर्षक -तिरंगा ले लो 

शालिनी आज 15 अगस्त को तिरंगे एक टोकरी में रखकर सड़क पर बेच रही थी
" जल्दी से तिरंगा ले जाओ भैया। बिक जाएंगे तो नहीं मिलेंगे।"
 हंस-हंसकर आवाज लगा रही थी।वह फिर बोली-" देश की रक्षा सैनिक करते हैं, मेरा पति भी गया है सीमा पर। दुश्मनों के दांत खट्टे कर देगा, फिर आएगा। मैं तिरंगे को हाथ में लेकर उसका स्वागत करूंगी।जय हिंद,वंदे मातरम,का नारा लगाऊंगी।"
 फिर वह जोश भरी आवाज मे़ बोलने लगी -"तिरंगे ले लो, तिरंगे ले लो"बोलती हुई आगे बढ़ रही थी। 
      एक सभ्य व्यक्ति ने पान वाले से पूछा-" यह औरत जो तिरंगे बेच रही है, कौन है?"
 पान वाले ने कहा-" भैया यह पगली औरत है। शादी के एक माह बाद उसका पति सीमा पर चला गया था, तब से वापस नहीं आया। उसके गम में यह पागल हो गई है। तब से तिरंगे बेचती रहती है।"
     वह सभ्य व्यक्ति बोला-" हाय री किस्मत। देश की रक्षा करने गया पति, वापस नहीं आया, उसी के गम में ये औरत पागल हो गई है, हे भगवान, देश की रक्षा करने वालों की रक्षा करो।"

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
23-11-21
[23/11, 4:53 pm] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - 23//11//2021
विषय स्वैच्छिक
🌺विधा - लघुकथा 
कुंवर का मन आज बहुत उदास था। रह रह कर पुरानी यादें एक एक करके आती जा रहीं थी। 
उसकी मां के साथ भाभी का खूब झगड़ा होता था। बात गाली गलौज पर आ जाती थी। भैया कुछ नहीं बोलते थे। गुस्सा आने पर भाभी को पीटने लगते थे। और भाभी अपने भाई को खबर भिजवा कर उसे बुलवाती थी और उसके साथ अपने मायके चली जाती थी।
भाभी के मुंह पर एक से एक निम्नकोटि की गाली रहती थी। 
किंतु बाहर का कोई आ जाता तो उसके साथ ऐसा व्यवहार करती कि वह समझता कि इससे बढ़िया कोई और नहीं हो सकता।
कुंवर को भी कभी कभी उनकी गालियों का शिकार होना पड़ा। किंतु उनका प्यार भी मिला। कभी कभी वे कुंवर के लिए भैया से भी लड़ जाती थी। 
किंतु आज एक सूचना आई है कि भाभी चल बसी। तबसे कुंवर की कुंवर की बैचेनी बढ़ती ही जा रही है।
वह मन ही मन ईश्वर से विनय कर रहा है कि वह उन्हें स्वर्ग में स्थान दे। उन्हें मुक्ति दे। 
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[23/11, 5:20 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा  मंच  को नम:-

लघुकथा:- *क्या बचाया क्या गंवाया*

  "भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बार व्यक्ति उन बातों के लिए भी जान लगा देता है जिन्हें बिना रोके गुजरने देना चाहिए"
     आमिर लाल के पास बहुत धन संपत्ति थी किंतु स्वभाव से थोड़े कंजूस थे और कौड़ी- कौड़ी बचाकर उन्होंने बहुत सारा धन कमाया था! एक दिन अपने गांव से शहर जाना था उन दिनों गांव में बिजली नहीं होती थी प्रात:काल उठकर दीया जलाया और सुबह-सुबह यात्रा पर पैदल निकले। उस समय  यातायात के साधन भी नहीं थी दस मील जाने के बाद उन्हें याद आया कि घर पर दिया जलता हुआ छोड़ दिया है कि कई बुझाने में कुछ ऐसा ना हो कि तेल बर्बाद हो जाए उन्होंने घर आकर देखा तो दिया बुझा था उन्होंने पूछा किसने बुझाया? उनकी बहुने कहा ,"मैंने बुझाया उन्होंने तुरंत पूछा लिया बुझाने में तेल तो बर्बाद नहीं किया! मै आपके जैसे नहीं हूं  मैंने जिस तिनखे दिया बुझाया  फिर  वह वापस दिया तेल  में डाल दिया मैं आपकी तरह नहीं हूं उन्होंने बहू की बात सुनी मैंने ऐसा क्या किया? वह सोच में पड गये जो तुम मुझसे यह बात कर रही हो यदि मैं होता तो घर लौट कर क्यों आता बस मिल गए और वापस आए आपने तेल नहीं बचाया  उसने को तो जाना था और क्या कमाया बहू की बात सुनकर की विजयी मुद्रा में जूते मैं जानता था कि जाएंगे। बहु जोर से हंस कर बोली कि आपने बचाने के लिए आपने अपने पैरों को घिस दिया क्या बचाना था? और क्या गवा दिया। लोग जिंदगी खो देते हैं जबकि वह बचाने की चीज है इसलिए आपने जो कुछ ऐसा है जो गवा दिया जाता है वह उम्र के एक पड़ाव पर तभी समझ में आता था और जो चला गया था बहुमुल्य था।

सुरेन्द्र हरडे 
(लघूकथाकार)
नागपुर
दिनांक:-23/11/2021
[23/11, 5:24 pm] कुम कुम वेद सेन: लघु कथा  दीनू काका काकी
दीनू काका और काकी तालाब के किनारे बैठे सोच रहे हैं मछलियां क्या आजादी से पूरे तालाब में इधर उधर घूमती रहती है काश ये आजादी हम लोगों को भी होती।
कभी सोचता हूं हमें  हमें रोकता कौन है कभी सोचता हूं बहुत सारे बंधन है। खुद ही नहीं समझ पाता वास्तविकता क्या है। इसी उलझन में उलझ कर रह गया हूं कुछ निर्णय नहीं ले पा रहा हूं और मेरे इस निर्णय लेने में किसी ने सहयोग भी नहीं किया।
हर वक्त फसल पैसे अनाज त्यौहार की ही चिंता सताती रहती है। जीवन के ऐसे मुकाम पर पहुंच गया हूं जब मन होता है सब कुछ छोड़ कर आजाद पंछी की तरह आजाद मछलियों की तरह अपने जीवन को जीने का अवसर मिल जाए।
ऐसा सोचते सोचते वह पुरानी यादों में खो गए अपने पूर्वजों की दुनिया में जाते हुए उन्हें याद आने लगा ठीक इसी तरह मेरे दादा दादी माता-पिता भी इन बातों को दोहराया करते थे। आज मैं भी श्रृंखला की उस कड़ी में जुड़ गया हूं।
कितना बदल गया है जमाना जब दादा-दादी यह सोचा करते थे उनके पास उनके बेटा बेटी बहू की संख्या बहुत अधिक हुआ करती थी पर आज हमने जो अपनी चालाकी दिखलाइए कि बस परिवार के लिए एक या दो बच्चे उसी का यह नतीजा है आज जब हमारे बच्चे बाहर नौकरी करने के लिए चले गए तो हम सभी अकेले हो गए हैं आजादी तो मिल गई अपनी जिम्मेदारी भी खत्म हो गई पर ऐसा कोई ठिकाना नहीं मिल पाया जहां की आसानी से जा सके और पंछी की तरह अपना जीवन आजादी से गुजार सकें।
यह सोचकर दिनु काका ने
काकी से कहा। बहुत शौक था बच्चे को उच्च शिक्षा दिलाने का विदेश भेजने का अपनी तो सारी इच्छाएं पूरी हो गई पर कभी यह नहीं सोचा कि जब हमारे शरीर निर्बल होंगे तो फिर अपने इस आशियाने का क्या करूंगा खुद को किसके सहारे छोड़ दूंगा बात तो समझ में आई पर इतनी देर हो गई है कि कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है अब करना क्या है इसका निर्णय लेना बहुत आवश्यक हो गया है ऐसा लगता है अपनी संपत्ति को किसी ट्रस्ट के हवाले कर दो और उन्हीं के देखरेख में अपनी सारी जिंदगी गुजार दूं क्योंकि विदेश बच्चों के पास जाना संभव तो है पर रहना संभव नहीं है क्योंकि दोनों की मानसिकता बहुत ही बदल गई है इसी उलझन में दोनों तालाब के किनारे बैठे सोच रूपी तालाब में गोता लगा रहे हैं।

कुमकुम वेदसेन
[23/11, 5:36 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच   🙏🌹
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      🌹 विधा : लघुकथा 🌹
      🌿दिनांक:23/11/21🌿
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रचनाकार - डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर  बिहार --
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       "आजकल सीमा  अपने में  ही मगन रहा करती है,पहले तो हम दोनों का काफी खयाल रखती थी,अब देखता हूँ कुछ  दिनो से आँखें  चुराती रहती है ,आखिर  क्या बात है ? " -- कुछ बोझिल शब्दों  में बिमल बाबू ने अपनी पत्नी सुशीला से कहा ।
       सुशीला तो सब जान ही रही थी ,क्या
बोलती ! चुपचाप  किचेन मे गयी ,चाय लेकर आ गयी,चाय तो सीमा ने ही बनाई  थी ,लेकिन  पापा के पास आने में  उसे 
संकोच हो रहा था ।
      सीमा  इकलौती  संतान थी, गोरी सुन्दर और सुशील भी ।बचपन से पढ़ने- लिखने में भी ठीक-ठाक। एक साल पहले उसकी जाॅब बैंक में  एकाउंटेंट के पद पर हो गयी ।वह आराम  से अपनी  ड्यूटी करती , सुबह- शाम  ,माँ- पापा साथ-साथ चाय- वाय पीती ।
      इधर दो महीने से उसका मन परिवर्तन हो रहा था ,कारण था  कि  उसके बैंक  में
एक नव युवक-  कुमार नमन पी. ओ. के पद पर था ,जो  इसे  पसंद  करता  था ।अवसर पाकर, इससे अपनी पसंद की बात बताई ।बहुत- बहुत  हिम्मत जुटाकर सीमा ने अपनी मम्मी  को बताया,लेकिन 
अपने पति के मिजाज देखते हुए, उनसे कह न सकी ।
        दोनों ने अपनी मर्जी से मंदिर में  शादी कर ली । इधर नमन की माँ ने अपनी 
स्वीकृति दे ही चुकी थी,नमन के पिताजी बीस साल पहले गुजर चुके थे ।
        सीमा का सारा हाल माँ  जानती थी लेकिन पापा नहीं ,इस लिए यह पापा से नजरें चुरा रही थी। माँ  ने एकदिन बहुत 
तरीके  से बिमल बाबू को सारी बातों से अवगत कराया ।
       बिमल बाबू ने पत्नी से मिल- विचार कर पटना के  होटल में  पार्टी रखी, सभी इस जश्न  मे शरीक होकर  वर - बधू को 
आशीर्वाद देने पहुंचे ।
   नजरे  चुराने वाली ,सीमा ने पापा- के पाँव छूए,,,,सबके चेहरे खिले- खिले थे।
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स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-- डॉ पुष्पा गुप्ता, मुजफ्फरपुर
 बिहार----
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[23/11, 5:50 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: लघु कथा

शीर्षक- शर्मिंदगी
       ट्रेन से मुंबई जा रहे थे, बच्चो की छूट्टी या थी। हमारे सामने वाली सीट पर एक महिला तीन बच्चो के साथ बैठी थी, अच्छे घर से लग रही थी तभी टी. सी. आया
टिकट दिखाने को कहा, उसने अपना टिकिट दिखा दिया दोनों बच्चो की ओर इशारा किया, इन
लोगो का टिकिट नही लगता है,५
साल के है, दोनो जुड़वां है, बच्चे मां की बात सुन रहे थे , बीच में बोले मां में * नाइन इयर्स ओल्ड*
मां पर घड़ों पानी पड़ गया। सब यात्रियों के सामने खरी खरी सुननी पड़ी, जुर्माना भी देना पड़ा।

धन्यवाद सुनीता अग्रवाल
इंदौरस्वरचित
[23/11, 6:19 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: भेदभाव

आज बीमा पॉलिसी वाला आने वाला है।
किसका  बीमा करवाना है ?
अरे तान्या 4 साल की हो गई है।तुम इसका इंश्योरेंस करवा दो। 20- 21 साल बाद इसकी शादी के समय  कोई टेंशन नहीं होगा ।
"ठीक है तान्या करवा देती हूँ और अनुष्का का भी करवा देती हूँ।"रमा बोली थैंक यू अरे क्यों अनुष्का का क्यों कर पाओगे रमा के पति ने पूछा ।
अरे तान्या की दादी हूंँ और  अनुष्का की नानी हूंँ।
 दोनों ही अपनी है और  दोनों में 10 महीने का अंतर है। अरे अनुष्का के दादा- दादी करेंगे उसका इंश्योरेंस ।उसकी चिंता उसके दादा-दादी करेंगे ।फिर अनुष्का का इंश्योरेंस को उसके पापा ने करवा दिया होगा वह तो अपनी कंपनी का डायरेक्टर है।
 जो उसके पापा का फर्ज है उसके पापा कर रहे हैं लेकिन हमारे लिए तो दोनों बेटियांँ समान है ।हमें तो दादा दादी, नाना - नानी का फर्ज निभाना है ।मैं चाहती हूं सभी बच्चों को बराबर पॉलिसी  की जाये ।कोई भेदभाव ना हो कल को अनुष्का बड़ी हो जाएगी उसे मालूम पड़ेगा या अपनी बेटी को ही मालूम पड़ेगा तो उसके मन में यह प्रश्न नहीं आएगा कि मम्मी ने तान्या को अपना समझा और अनुष्का को नहीं। और अभी छोटी बेटे के लिए भी तो सोचना है।
 अरे मैं तो इसलिए कह रहा था कि अपने बेटे की नौकरी इतनी ऊंची नहीं है।
 तो ठीक है शादी होगी तो उस समय और लगा देंगे मैं सर्विस करती हूंँ तो सभी बच्चों के प्रति समानता का भाव रखना चाहती हूंँ ,किसी प्रकार का भेदभाव नहीं ।आज बेटा - बेटी दोनों समान है ।जबकि बेटी तो अपने घर चली गई है उसकी तरफ से निश्चिन्त हैं ।अभी हम व्यस्त हैं तो बेटे की जिम्मेदारी  निभाने में।
छोटा बेटा पास ही लैपटॉप पर काम कर रहा था ।अपने माता-पिता की बात सुनकर बोला "डैडी मम्मी का दृष्टिकोण बिल्कुल सही है । बच्चों में भेदभाव नहीं होना चाहिए। 

आशा जाकड़
[23/11, 6:47 pm] रामेश्वर गुप्ता के के:         ।नमूना -लघुकथा।
वह बीना, भारतीय खाद्य निगम के भंडार में साफ- सफाई का काम करती है। आजकल बोरों में चावल का भंडारण किया जा रहा है।नमूना लेने के औजार (सिरसी) से थोड़ा चावल का नमूना बीना बोरों से लेने का काम करती है। एक दिन बीना को लालच आ गया है। वह नमूने का चावल सिरसी से निकालती और अपने पास की थैली में इकट्ठा करने लगी है। इस तरह किसी का ध्यान उसके इस कृत्य पर नहीं जा पाता है और वह निकाले हुए चावल से अपना जीवन यापन करने लगी। 
एक दिन बीना बीमार पड़ी। उसके शरीर के सभी जोडों पर दर्द रहता है। 
डाक्टर ने बीना से कहा:
बीना ¡ तुम्हारे सभी जोड़ों से मुझे रोज नमूना लेकर, तुम्हारे खून के नमूने का परीक्षण करना होगा, यही तुम्हारा इलाज है। 
बीना को समझ आ गया, यह मेरी सजा है। मैं सिरसी से अपने लिए नमूना लेकर जीवन यापन करती थी और आज मेरे शरीर के सभी जोड़ का नमूना लिया जा रहा है, वह डाक्टर के कहने की बात (नमूना) का मुख देखने लगी¡
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[23/11, 6:57 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
आयोजन विषय;-लघु कथा
विषय:-स्वेच्छिक 
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हरिराम को आज कलेक्टर साहब स्वयं घर छोड़ने जा रहे थे 25  साल से वह यह कार्य कर रहा था व इन कलेक्टर साहब (राजन जी) के पास  पिछले 4 वर्ष से  कार्यरत था।।साहब जब उसे छोड़ने जाने लगे तो उसे संकोच भी हुआ।वह झिझकते हुए गाड़ी के पास खड़ा ही रहा ।कलेक्टर सा0 ने उसके कंधे पर हाथ रखा व गाड़ी का दरवाजा खोल अंदर बिठाया व स्वयं ड्राइव करने लगे।।
हरिराम अपने परिवार के बारे में सोच रहा था क्या होगा।एक बेटी बची है जिसका विवाह हो जाता तो मै गंगा नहा लेता''पर इतना खर्च व व्यवस्था सब कैसे ?कैसे करूँ??यही सोचते सोचते उसकी बस्ती आ गयी वह कहता है साहब यहीं अंदर गली में मेरा घर है मैं चला जाऊँगा। पर कलेक्टर साहब ने कहा नहीं आज मैं भी साथ चलूंगा ""काका""!ज्यों ही सुना हरिराम ने तो आँखे भर आईं आप मुझे ?घर?काका??कितने ही प्रश्न..कलेक्टर साहब ने कहा आज से आप मेरे काका हैं चलिए ।घर पहुंचते ही हरिराम ने आवाज लगाई मीनू बेटा!देखो तो कौन आया है ।आवाज सुनकर मीनू बाहर आई बेटा नमस्ते करो ये कलेक्टर साहब हैं आज स्वयं मुझे घर छोड़ने आये हैं। कलेक्टर साहब ने कहा  ने कलेक्टर साहब नहीं राजन भैया! अपने भैया को चाय नही  पिलाओगी?
मीनू  मैं! जी जरूर कह कर अंदर चली गई।।हरिराम ने कहा साहब इसकी  माँ तो बचपन मे ही गुजर गई।एम ए इंग्लिश है ट्यूशन पढ़ाती है।साहब ने कहा मैं जानता हूँ काका इसी लिए तो आज मै आपके साथ आया  आप फिक्र न करें अब यह जिम्मेदारी एक भाई की है मेरे जान पहचान में आपकी ही बिरादरी का लड़का है जो लेक्चरर है ।मेने उसे आपके बारे में बताया था वह राजी है ,मीनू भी उसे जानती है।।
हरि राम ने हाथ जोड़ लिए व उसकी आंखें  भर आयीं उसने कहा मीनू का विवाह  मेरे लिए एक गढ़ फतह करने के समान था  जिसे आपने एक पल में हल कर दिया।।आपका ऋण मै कैसे चुका पाऊंगा।राजन  जी ने कहा काका ऐसा मत कहिए जब आपने इतनी लगन से हम सबके लिए काम किया तो ये हम सबका कर्तव्य है।।सारे विभागीय स्टाफ ने मिल कर इस जिम्मेदारी को वहन करने का फ़ैसला लिया है।।अतः अब आप फिक्र न करें व मीनू के सामने यह चिंता भी जाहिर न करें।।
निहारिका झा।।




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