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Akhil Bharati Agni Shikha Manch ke a block per Aaj dinank 11, 11 2021 ko diye Gaye Chitra per kavitaon ka ka Anand lijiye Alka Pande Mumbai



चित्र पर कविता
11/11/2021
ताकत

हाथों में पहना दी हथकड़ियां है। मेरी उमंगों को ,मेरे हर ख्वाहिश को  ,जकड़ दी है तुमने ।।
पर मैं घबराई नहीं हूं ।
कितने भी मुझ पर पहरे बैठा दो। मेरी कलम से हर एक शब्द शब्द में ताकत होगी ।।
ललकार होगी ।
दुनिया को जगाने की तासीर होगी।।
 मेरा दिल सच्चा है ।
मैं निर्णय लूंगी । ।
मेरे कलम की आवाज ही मेरी ताकत बनेगी ।
कयामत आएगी कलम लिख जाएगी  । 
इंसाफ दिलाएगी।
 चाहे हाथों में तुम हथकड़ियां पहना दो ।।
मैं कमजोर नहीं हूं मैं घबराई नहीं हूं ।
खाली पन्नों पर मन के भाव को।। शब्दों की माला बनाकर मैं जग को दिखाऊंगी ।
अपनी आवाज दुनिया में पहुंचाउगी ।।
 बेजुबा ए अक्षर न्याय दिलाएंगे सच्चाई बताएंगे    ।
जात पात का भेद बता कर सच्ची बात लिखूंगी।।
हथकड़ियों का डर नहीं है ।
कलम की ताकत मेरे पास पड़ी हैं।।
 मेरे पैरों में भी बेड़ियां डाल दो ।
जो मन में आए वह अत्याचार कर लो ।।
पर मैं लिखूंगी कलम की ताकत से ।
इंसाफ दिलाऊंगा मैं न्याय दिलाउगी।।
सच्ची ताकत है कलम की ताकत  मैं नहीं डरती ,अब तो कलम की ताकत मेरे पास हैं।।
कलम की ताकत मेरे पासहैं।।

अलका पाण्डेय

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[11/11, 9:27 am] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (चित्र पर आधारित)
  ‌‌ कविता
कि मैंने ये क्या किया ???
********************

हाथों में डालो हथकड़ियां, या दिल पर चलाओ छुरियां । मेरा मकसद बदल न पाओगे । मेरी कलम को रोक न पाओगे । तुम जानते नहीं इस कलम की ताकत । तलवार से भी तेज धार है । अन्याय सहने की ‌ ताकत है मुझमें , पर, क्यों सहूं अन्याय ?
 नारी शक्तिकरण को तुमने जाना नही । मुझे तुमने पहचाना नहीं मेरी कलम को तुम समझ न पाए , इसीलिए ये नादानी तुम कर बैठे, ‌ मेरे हाथों में हथकड़ियां डाल बैठे । कल की सुबह देखना क्या होगा ? इस गुनाह से तुम बच न पाओगे , पछताओगेे , बहुत पछताओगे। पर पछताने का भी तुम्हें वक्त न मिल पाएगा। जब सलाखों के पीछे रहोगे, तब खून के आंसू रोओगे और जीवन भर पछताओगे, कि मैंने ये ही क्या किया?
********************
डॉ . आशालता नायडू.
भिलाई , छत्तीसगढ़ .
स्वरचित मौलिक रचना
[11/11, 10:49 am] Nirja 🌺🌺Takur: 

अग्निशिखा मंच
तिथि-११-११-२०२१
विषय-चित्र पर कविता(एक पाती प्रेयसी के नाम)

हम थे एक दूसरे में खोये
हमें न थी जग की ख़बर
हमेशा से चाहता था मैं तुम्हें 
प्राणों सेअधिक प्यार करती थी तुम मुझे
 क्या मजबूरी थी जो धोखा दिया तुमने
जगा कर विश्वास ,घात किया तुमने। 
जान न्योछावर करता था मै़
 कह कर तो देखती तुम 
मैं हट जाता रास्ते से तुम्हारे
षड़यंत्र कर फंसाया मुझे
कैसे इतना नीचे गिर गई तुम 
कलम की ताकत है पास मेरे
 यह कैसे भूल गई तुम
सच्चाई बयां कर सकता हूँ मैं
चाहूं तो बदनाम कर सकता हूँ तुम्हें
अभी भी लिखे ख़त मेरे पास हैं तुम्हारे
न न घबराओ मत ,इतना भी बुरा नहीं मैं
बदनामी का गरल स्वयं पी लूंगा
तुम पर बदनामी के छींटे न आने दूंगा
हमेशा सच्चरित्र बने रहना
ऐसा फिर किसी के साथ ना करना

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[11/11, 10:58 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: गुरुवार 11/11/ 2021

विषय- चित्र पर कविता

मैं लेखक की कलम
अपरिमित आग भरी मुझ में।
हर सकती हूं अखिल विश्व का 
अंधकार मैं ही।
जला खाक कर सकती हूं मैं
अगजग का कूड़ा
असत, बुराई, बेईमानी, सारा भ्रष्टाचार

मैं प्रकाश की प्रखर किरण
मैं हूं चपला की कड़क
मैं हूं तूफान का अतुल वेग
सब कुछ उलट पलट कर
रख देने की क्षमता मुझमें

मेरे शब्दों में शक्ति अपरिमित
इंद्रासन को कंपित करने की
ताकत मुझमें।

मैं हूं जिसके हाथों की शोभा
वो साहित्य मनीषी है।
हथकड़ियों को तोड़ गिराने की
शक्ति है उसमें।

इसने हर युग में बदले हैं समाज
हर जाति धर्म को सदा दिए
संस्कार नए।

इसको न बांध पाया कोई
इसने ही बांधा है सबको।
इसका सम्मान करो

हे ताकत वालो झुको
जरा नीचे ताको
तुम बड़े हुए 
इसका न कभी अभिमान करो।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[11/11, 10:59 am] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: नमन पटल
आज का विषय-चित्र आधारित रचना

हथकड़ी बेशक हो हाथ में ,पर हौसलों में कमी नहीं।
दिल में भरे हो ज़र्ब कितने, पर आँखों में नमी नहीं।

कफ़स में कैद कर लो, लगा दो ज़ालिम सौ पहरे।
जज़्बातों को उकेरने  में ये क़लम कभी थमीं नहीं। 

करते हैं हमेशा बेबाक हकीकतों की नुमाइंदगी।
 करना जी हुजूरी इस दिल को कभी ज़मी नहीं।

हाथ   बेशक हैं  बंधे  पर  ये  मन तो आज़ाद है।
 कितने करो जतन रुकेगी लेखनी की समी नहीं।

कहते हैं बातें दिल की हर्फ़ों की लड़ियों में सजाकर।
कह दो दिमाग वालों से मेरी अशआर  में गमी  नहीं। 

पकड़ी है लेखनी जो किसी के रोके भी न रुकेगी।
जिस दिन  न रहेगी ये, उस दिन से तो  हमीं नहीं।

समी-ऊंचाई

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
[11/11, 11:29 am] 👑सुषमा शुक्ला: कविता विधा,,,,

 हाथों में बेड़ियां डाली, मन के उदगार पर पहरा डालो तो जाने,

,,साहित्य का सृजन करें ,
इस विधा का मंथन करें ,
दूर तलक चलते रहे ,
सृजन को साकार करें।
मन पर बेड़ियां डालो तो जाने,
तभी तो माने तभी तो माने।

साहित्य सागर महा सागर,
सुधा पीयूष हर्षावन लागन,,
उत्कर्ष प्रगति की ओर जाते ,,
सागर में गोता लगाते ।

दुख अवसाद कभी पास ना आवे,,
साहित्य हमको पार लगा वे,,
सृजन में सरस्वती विराजे,,,
हमारी कलम में वे ही साजे✒️


जिव्हा पर मां का करें आव्हान,, 
कलम लेखनी हो अरमान,,
सतत कलम चलती रहे,
श्री गणेश आशीष रहै🙏

सुषमा शुक्ला स्वरचित रचना
[11/11, 12:17 pm] रागनि मित्तल: जय मांँ शारदे
अग्निशिखा मंच
दिन- गुरुवार
दिनांक- 11/11/2021
चित्र आधारित रचना

जिन हाथो ने कलम पकड़ी,वो नही कभी रुकते है।
खुले हो या हथखड़ी लगे,जो सच है वो लिखते है।
आसान हो या मुश्किल राहे,कवि हमेशा लिखता है।
वो ऐसा दर्पण है,जिससे सच्चाई का चित्र दिखता हैं।

रागिनी मित्तल
कटनी, मध्यप्रदेश
[11/11, 12:24 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹 *नमन मंच* 🌹🙏
🙏🌹 *जय अम्बे* 🌹 *११/११/२१* 🌹🙏
🙏🌹 *चित्र पर आधारित* 🌹🙏

आसान नहीं कलम उठाना ।
दहलीज पार करके जाना ।।
बंधन में बंधी है नारी ।
बात दिल की किसको बताना ।।

घर काम करो चुप ही रहना ।
दखल अंदाजी बंद करना।।
इतनी समझ नहीं है तुझ मैं ।
जवाब सामने नहीं देना ।

अब बेड़ी तोड़ना पड़ेगा ।
कलम हाथ में लेना होगा।।
जन-जन में जागृति है लाना ।
आगे कदम बढ़ाना होगा ।।

घरसे आज़ादी है पाना। 
दहेज प्रथा को दूर करना।। 
मन में है संस्कार हमारे। 
भ्रूण हत्या को बंद करना ।।

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल 🌹🙏
[11/11, 12:41 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: बेड़ियाँ
मेरे हाथ में बेड़ियाँ हैं कोई बात नहीं
पैरों को भी जकड़ दो तुम।
लेकिन मैं ना रुका हूँ रुकूँगा
आसमान छू लूंगा।
मेरा तन अशक्त है तो क्या?हाथों में 
तो उड़ान बाकी है। 
उसी के सहारे सब को जगा लूंगा
कुछ करने हेतु प्रेरित करूंगा
उल्टी धारा बहा दूँगा।
रोक सके तो रोक लो मुझे 
मैं किसी से डरूँगा नहीं।
मेरी आवाज को रोक सकते नहीं
मेरी कलम को थाम सकते नहीं 
जो मन में है वह मैं लिख डालूँगा।
मेरे ख्यालों में है लिखूंगा जरूर 
संसार की सारी फैली बुराइयों को
कागज पर उकेर दूंगा।
अंतर्मन की पीड़ा को स्याही से भर दूंगा
दुख से भर गया हूँ सब लिख दूँगा।
संसार वालों को कोई गम नहीं 
पेड़ पशु काटे फिर भी वह बेदम नहीं
नालों पर घर बनाए फिर कहते हैं 
प्रकृति का प्रकोप अरे।
शर्म करो यह सब तुम्हारा किया
फिर इसे कौन भरे।
पेड़ जमीन के रेत तक तो छोड़ी नहीं
पत्थर भी मलिया मेट किया।
नदियों को भी छीन लिया
पहाड़ों का विनाश किया।
किसी से डरता नहीं हूं
मैं लिखता हूँ लिखता ही रहूंगा।
बांध दो बेड़ियों से मैं न कभी 
डरा हूं न डरूँगा।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर
[11/11, 1:03 pm] वीना अडवानी 👩: कैद कहां होते जज़्बात
******************

कैद करलो चाहे मेरे हाथ
लेखक हूं ना कहूंगी हर बात
रोक ना पाओगे मेरे जज़्बात
दिल में उमड़ पड़ते एहसास।।

कैद कर लो चाहे मेरे हाथ।।२।‌

जख़्मों को सजाऊंगी सुनो
मैं हर दिन और रात
तंहाई से ना घबराती अब मैं
ना ही चाहूं कोई कहे वाह क्या बात।।

कैद कर लो चाहे मेरे हाथ।।२।।

जिम्मेदारी से ना मुंह मोड़ी अपनी
कहूं डंके की चोट पर ये बात
निभाऊं अपना हर धर्म संग लाऊं
बिखराऊं हर रिश्तों में मिठास।।

कैद कर लो चाहे मेरे हाथ।।२।।

कवयित्री हूं यही तो बुराई हे खास
रोक न पाई, न रोक पाऊंगी एहसास
लिख सुकून पाती जो मेरे लिये खास
साथ चाहूं अपनों का लगाऊं मैं आस।।

कैद कर लो चाहे मेरे हाथ।।२।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************
[11/11, 1:08 pm] साधना तोमर: हाथों में हथकड़ी बांधे है मन को बांध सको तो जाने।
भावना का सैलाब मन में जो उसे रोक सको तो माने।

माना कि लाखों पहरे तुमने बिठा लिये मेरे तन पर,
मेरे दिल की हर धड़कन पर पहरे बिठाओ तो जाने।

संवेदनाओं के सागर में लहरें देखो कितनी उठती हैं,
इन लहरों के आवेग को तुम अब रोक सको तो जाने।

माना तूफानों का जलधि अब मन को मेरे मथता है,
रोक मेरी कल्पनाओं पर तुम लगा सको तो जाने।

नहीं रुकेगी लेखनी मेरी कितने बंधन लगा लो तुम,
इन भावों की धारा को तुम अब रोक सको तो जाने।


डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत)
उत्तर प्रदेश
[11/11, 1:38 pm] Anita 👅झा: बेरंग दुनिया के अब यही हालात है 
कोरे कागज बँधे हाथ है 
दर बदर ठोकरें खाता इंसान 
सामयिक समस्याओं से घिरा है
 
बेरंग दुनिया में रोशनी की तलाश 
आँखें बंद कर खुद को निहारता हूँ 
कोरे कागज में क्या लिखू ?
लब सिले हुये गम्भीर हालात है 

हथकड़ियों ने बाँध बेबस ज़िंदगी है 
स्याही ने छोड़ दिया क़लम साथ है 
लेखनी बनी सौतन थी 
हालातों से कर लिया समझौता है 

लेखक लेखनी साथ छोड़ दिया है 
बेरंग दुनिया के यही हालात 
रोशनी ज़िंदगी में फिर लौट आई है
बहार बन ज़िंदगी में छाई है 

ना गिले ना शिकवे ना शिकायते 
लगी चोट तूफ़ान बन उड़ जायेंगे 
बेरंग दुनिया अब यही हालात होंगे  

अनिता शरद झा रायपुर
[11/11, 1:50 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: शीर्षक _ मजबूत कलम

बेशक! डालो हाथों में हथकड़ियां 
या पावों में बेडिया,
हम आज की जाग्रत नारियां ,
धर्म संस्कृति के नाम से जकड़ी गई, 
युगों युगों से छली गई, कहीं घूंघट के नाम, कहीं रीति रिवाजों के नाम , तो कभी व्रत उपवास के नाम,
तुम जानती ही क्या हो? मौन तुम्हारा गहना, चारदीवारी में ही रहना, 
मै हूं आज की अहिल्या, कलम मैं मेरी असीम आग है भरी , जनमानस को बदल दूंगी, बदल डालूंगी सारी दुनिया, 
   लेकीन, आज समय बदल गया है ,
समाज के चंद ठेकेदार , नही कर सकते सोच पर अधिकार, 
हमारे मन मस्तिष्क न बनो पहरेदार,
वर्तमान से न करो तकरार, 
हम साहित्यकार है, नित नए सृजन में करते विश्वास, 
समयानुरूप रूढ़ियों को बदलने का अहसास,
यही कलमकार की आस,,
कलम होती हैं निष्पक्ष,
, लिखनें में दक्ष। दिखाते है समाज को अक्स,।


सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित धन्यवाद 🙏🙏
[11/11, 2:04 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
11/11/2021 गुरुवार
विषय-चित्राधारित रचना

हाथ तो बांध सकते हो
 तुम मेरे पर,
मेरे मन को कैसे बाँधोगे?
उमड़ते भावों के तूफान को
तुम कैसे रोक पाओगे
मेरी कलम जो चली तो
मोड़ देगी समय की धारा
बदल देगी समाज के नियम
कर देगी वो युग परिवर्तन
कौन रोकेगा मुझे?
आशा और विश्वास का
थाम कर आँचल
हर कठिनाई को
करेंगे पार
तोड़ कर हर बंधन
उड़ना है स्वछंद
पंछी की तरह
विस्तृत आकाश पर
बहना है मुझे
एक बहती नदी की तरह
बंधे हाथों से भी लिखूंगी 
अपने जीवन का अर्थ
अपनी आजादी की कहानी।
                 तारा "प्रीत"
             जोधपुर (राज०)
[11/11, 2:18 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
विषय ***हथकड़ी ***
हाथ में हथकड़ी है
तो क्या ऊँची उड़ान 
रखते हैं 
आज़ादी हमारी
जागीर है
अल्फाज़ों की हथकड़ी 
से मत बान्धो हमें 
हौसलों की उड़ान
रखते हैं 
देश हो अपना चमन
कामना है यही
बान्ध हथकड़ी 
फिर भी आज़ादी 
पाऐंगें हम
ए मात्रभूमि 
तेरी जयकार 
मनाएंगे हम ।।।।
[11/11, 2:21 pm] चंदा 👏डांगी: $$ चित्र आधारित रचना $$

कलम की ताकत रोक नही सकते 
कोई भी हथकड़ी या बेड़ी
बांधकर रख सकते हो तन
मन नही मानता कोई बंधन 
राह सत्य की न छोडूंगा कभी मे
धर्म के पथ पर चलता रहूंगा सदा
क्या बिगाड़ लेगी ये हथकड़ी मेरी
लिखेगी कलम मेरी हर दास्तां
दम लुंगा भी तो मंजिल पर पंहुच कर

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[11/11, 3:10 pm] रवि शंकर कोलते क: ।गुरुवार दिनांक ११/११/२१
विधा*****लेख
विषय****
      #*** चित्राधारित रचना***#
                     ^^^^^^^^ 

आप लाख लगालो हाथोमें हथकड़ियां ।
पर क़ैद न कर सकोगे कभी विचारको ।।
हथकड़ी से है ज्यादा ताकतवर कलम ।
तुम जानते नहीं इसकी पैनी धार कों ।।१
 
फिरंगों ने फांसी दी लगाई हथकड़ी ।
तोड न सके मगर वो एकता की कड़ी ।।
मां भारतीको करना था आजाद हमें ।
लौट गए फिरंगे निकली उनकी हेकड़ी ।।२

विचारके आगे झुकी है बेडी तलवार ।
काट डाले बेड़ियों को कलम की धार ।।
नवाब हो या सरकार सब है बेबस ।
कलम की होती है सदा जय जयकार ।।३

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[11/11, 3:13 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;-चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक ;-11/11/21
रीति का दे कर के वास्ता
मर्यादा की जंजीरों में
बांध दिया अस्तित्व नारी का।
सपनों को उसके था मारा
अवसर छीन लिए वो सारे
पर कोई ये छीन न पाया
बुद्धि कौशल जो पास हैं उसके
अपनी बुद्धि से नारी 
भरे उड़ानेंउम्मीदों की
लगा रही क्षमता वो सारी
हाथ लगी ताकत इक़ ऐसी
झुक जाएगी दुनिया सारी
है यह ताकत कलम की ही तो
जिससे सारी दुनिया हारी।।
अभिव्यक्ति को मिला है
यह ब्रम्हास्त्र कभी न खाली जाए
कलम के ही बल पर तो नारी
दुनिया को लोहा मनवा दे।।
कलम ......।।।।
निहारिका झा।।
खैरागढ राज.(36 गढ़)
[11/11, 3:50 pm] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: गुरुवार चित्र आधारित कविता
शीर्षक लब्ज नही कैद होते,
भाव नही बधते,
अर्थ नही ढहते,
वीर नही डरते 
सुनो,लब्ज नही रुकते,
कैद कर दो,हाथो को,
पहरे लगा दो शाखों पे,
पंछी नही रुकते,
सदा उड़ते,
सुनो ,ये लब्ज ह ,
ये लब्ज नही रुकते,
काट दो जबान को ,
काट दो कानो को ,
रोक न पाओगे ,
फिर भी उड़ानों को ,
मेरे सपनों को,
मेरी कोशिशों को,
बदल देगी तकदीर मेरी,
मेरी फौलादी सोच को,
क्योकि सैनिक नही झुकते,
सुनो,ये लब्ज ह ये लब्ज ,
नही रुकते,,
@ishita singh 
From lucknow
[11/11, 4:14 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: --------
आदरणीय मंच को नमन
रचना चित्र आधारित
-------
हथकड़ियों ने हाथ को बांधा 
पर क्या मन को बाँध सकेगा।
तन बांध जाए भले किंतु यह मन स्वतंत्र है कभी न बँधता।
 रुकता नहीं किसी के रोके झुकता नहीं किसी के टोके जहां-जहां इच्छा होती है
 वहां वहां तक जाता है।।
मन की गति है पवन वेग सी
कभी यहां है कभी वहां है 
यह अपनी अभिलाषाएं ले
घूमता रहता जहां-तहां है।।
हाथ बांधे हो फिर भी इच्छा
 यदि कहती है कुछ करने की करके यह अनगिन उपाय
 आगे बढ़ता न बात डरने की।।
तभी कहा है लोगों ने यह 
मन जीता तो हम हैं विजई, वरना मन यदि अपना हारा
 हार हमारी निश्चित होगी।। 
छूता है या कभी गगन को निर्झर धारा के संग बहता
 सुंदर सुंदर दृश्यों को यह
 सदा निहार आनंदित रहता।।
इसीलिए मन मनमाना है
 इसे नहीं बंधन भाता है 
करता है यह वही कि जो कुछ इसकी गति मति को भाता है।।
---------
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🌻🌹🌻🌹🌻🌹
[11/11, 4:36 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
चित्र देखकर रचना 

हथेलियोँ पर चाहे लग जाएं 
हथकड़ियों की अनगिनत जंजीरें 
नारी अस्मिता को आंच ना आएगी
नारी अपना अस्तित्व बना कर रहेगी।

लाख पहरे बैठा दो 
नारी की उम्मीदों को 
कभी जकड़ ना पाओगे 
उसकी उन्मुक्त उड़ान को।

विचारों पर लग नहीं सके बंधन 
उल्लास उन्मुक्त भाव हैं बेखबर
कलम की ताकत पहचान बनकर 
हौसले से विचरण करती झूम कर। 

नारी के संस्कार करें मंथन 
साहित्य संस्कृति का सृजन 
मत लगाओ नारी पर पहरा 
पंख फड़फड़ा छू लेगी आकाश।

कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ  
नारी ने पा ली है विजय 
शराब पीकर बरात लाए दूल्हा 
दुल्हन के हौसले ने शादी से 
इंकार कर बारात लौटा दी है।

कलम में ताकत बहुत है 
शब्द शब्द में ललकार है 
अन्याय पर न्याय की जीत होगी 
अंधकार पर उजाले की लौ जगमगाएगी।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
11-11-21
[11/11, 4:37 pm] रानी अग्रवाल: १०_११_२०२१. गुरुवार।
विधा_चित्र पर कविता।
शीर्षक_ मेरी कलम_ मेरी शक्ति।
पढ़कर मेरी बातें खरी बड़ी_ बड़ी,
पहना दी तुमने मेरे हाथों हथकड़ी
मैं डिगूंगी नहीं,रहूंगी डटी खड़ी,
आ गई है ज़ुल्मो की अंतिम घड़ी।
थमी मेरे हाथों में कलम की छड़ी,
मेरी हरेक रचना है सत्यार्थ जड़ी,
तोड़ेगी हर पापाचार की लड़ी,
ये जो तुम्हारी मानसिकता है सड़ी
मानती है कि नारी है नाजुक कड़ी
समझोगे ,ये कितनी भारी पड़ी।
क्या आपको पता नहीं ये खबर,
तलवार से भी कलम ताकतवर?
नहीं चाहिए, कापुरुष का साथ,
सुरक्षा के लिए है कलम मेरे हाथ।
ऐसी हजारों हथकड़ियां तोड़ दूंगी
अत्याचार पापको पीछे छोड़ दूंगी
"परिवर्तन संसार का नियम है"
ये गीता ज्ञान जानते भी हम हैं,
आ पहुंचा नया ज़माना है,
हमने अपनी शक्ति को पहचाना है
आप भी जान लो तो अच्छा है,
हमारा लोहा मान लोतो अच्छा है।
अब सरपट दौड़ेगी, मेरी कलम,
भ्रष्टाचारियों का करेगी सरकलम,
अब कोरे नहीं रहेंगे ये कागज़,
इनपर लिखा होगा हमारा आगाज
अपने लेखक साथियों को ललकार है,
जो लिखा है अपनी कलम से,
वो कर दिखाना,ये पुकार है।
चलिए ये कलम, 
लिखेगी हमारी कहानी,
सभी होंगे सफल,
ना केवल "रानी"।
स्वरचित मौलिक रचना______
रानी अग्रवाल,मुंबई१०_११_२१.
[11/11, 4:49 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: चित्र पर आधारित कविता 

हाथ तो मेरे मैला ही सही,
 कागज ना मैला होने दूंगी,
 जैसे दिया बाती का संग है,
 मैं भी हरदम साथ रहूंगी।

 शब्द को अर्थ दे आकार दिया ,
हर परिस्थितियों में साथ दिया,
 कभी मैंने सुख-दुख को लिखा,
 कभी जनता की आवाज लिखा।

 हर कलमकार के है हाथ से से,
 गीता, वेद, और पुराण लिखा ,
महाभारत और रामायण लिख ,
जनता को ज्ञान का संदेश दिया।

 जैसे धड़कन का श्वास से नाता,
 वैसे ही कागजों का कलम से,
 शब्दों को रस,छंद से सजाता,
 विचारों को लिखता कलम से।

 अनवरत यह चलता रहता है,
 कभी नहीं यह झुक सकता है ,
अत्याचारों को सजा दिलाता ,
कभी नहीं यह बिक सकता है ।

जो काम कलम कर सकता ,
वह तलवार कर सकता नहीं ,
जो लेखक लिख सकता है ,
कोई और लिख सकता नहीं ।

शोभा रानी तिवारी,
 619 अक्षत अपार्टमेंट ,
खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश
[11/11, 5:34 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: हथकड़ी ( चित्र पर आधारित रचना) --- ओमप्रकाश पाण्डेय
आज भी अंधकार में डर लगता
भूतों का डर बैठा है अभी भी मन में
झाड़ फूंक ओझा का लगाते चक्कर
बाबाओं के चक्कर में पर जाते लोग
तोड़ो अंधविश्वास की हथकडिय़ां........ 1
जात पात का पालन करते
छूआछूत नीच ऊंच मेरा तेरा
मेरा जाति ही श्रेष्ठ है सबसे
यह सब बढ़ाता संघर्ष समाज में
तोड़ो हथकडिय़ां पुराने विचारों की....... 2
बेटा ही वंश बढाता जग में
बेटी तो पराये घर की है
इसके चक्कर में न जाने
कितने बच्चे पैदा कर देते
तोड़ो हथकडिय़ां ऐसे विचारों की........ 3
नया समय है नवीन प्रभात है हुआ
नयी चुनौतियां आज खड़ीं हैं सामने
नये विचारों को साथ लेकर आओ
हम एक नया सशक्त राष्ट्र बनाये
अपनाओ नये विचार तोड़ो पुराने हथकडिय़ां........ 4
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[11/11, 5:35 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* चित्र देख कविता लिखो *

मुझ पर लगे युगों - युगों से पहरे ,
हथकड़ी से बंधे हाथ घाव गहरे !
मन उन्मुक्त पंछी नील गगन का ,
अभिव्यक्ति पर लगाओ ना पहरे ?

 माँ ,पत्नी,बेटी कह कर छली गई 
रिश्तों नातों के नाम पर ठगी गई
स्त्री हो सब कुछ सहना ही पड़ेगा  
कितने पहरों में हथकड़ी बांधी गई ?

स्त्री है तूँ पुरुष प्रधान समाज की ,
तेरी सीमाँऐं आँगन रसोई तक की ?
क्यों अभिव्यक्त करे अंदर के भाव ,
हाथों बाँधी गई तेरे हथकड़ी लौहे की ?

चाहै बाँधो कितनी हाथों हथकड़ियां ,
अभिव्यक्ति की पूरी-पूरी स्वतंत्रता !
हाथों की हथकड़ी मुझे क्या रोकेगी ?
कलम से निकली आग मुक्त करेगी !

सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[11/11, 6:10 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन
विषय **चित्र पर आधारित रचना**

अंग्रेजों ने पहना दी हथकड़ियां
मगर भारत के लोग न झुके हारे
कलम की शक्ति इतनी ज्यादा की
हो गए परेशान अंग्रेज सारे।१।

कलय धर्म जात का भेदभाव न करे वो सरकार को उखाड़ फेंकती है काट डालती है वो सारी बेड़ियां तलवार से ज्यादा उसकी धार है
बंद कर न सके कारागृह राष्ट्र भक्तों को ।
बंद करें हथकड़ी विचार खोलते द्वार है ।।२

 कामयाब ना हो सके अंग्रेज कभी ।
भारतवासी कर गए खुद को आजाद ।।
यह कलम का परिणाम है की मातृभूमि पर ।
दे गए जान अपनी भगत सिंह आजाद ।‌।३।।

सावरकर को कैद हुयी कालापानी
फिर भी हार नहीं मानी कलम ने
तिलक जी ने गीता लिखी कैद में
जवाहर प्रेमचंद जी ने किताब लिखी क्योंकि डरे नहीं वो मौतसे।४।

कलम चली उनकी निडरता से 
हथकड़ियां हाथों को बांध सकती है मगर विचारों को कैद नहीं कर सकते हथकड़ी जीवन लेती है मगर कलम जीवन देती है।।५।।

कवि """" सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक :- ११/११/२०२१
[11/11, 6:19 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: ।बंधन। 
कलमकार के हाथ में, 
हथकडियां लग गई है।
इस अधिकार को उसने, 
गिरवी रख रख दिया है।।
कलमकार............... 1 
गीतकार के बस दिल में, 
दुनिया की बात होती है। 
यह कलम ऐसा लिखती, 
दिल की बात कहती है।। 
कलमकार.............. 2 
कवि की कविता को हमें, 
दायरे में नहीं बांधना है। 
उसकी कविता प्रेरणा है, 
उसमें बंधन नहीं रखना है।। 
कलमकार................ 3
कलम स्वछन्द होनी चाहिए, 
यही बात ध्यान रखना है। 
जीवन की स्वछन्द गति को, 
नहीं बंधन में कभी रखना है।। 
कलमकार.................. 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[11/11, 6:23 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: --------
आदरणीय मंच को नमन
रचना चित्र आधारित
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हथकड़ियों ने हाथ को बांधा 
पर क्या मन को बाँध सकेगा।
तन बांध जाए भले किंतु यह मन स्वतंत्र है कभी न बँधता।
 रुकता नहीं किसी के रोके झुकता नहीं किसी के टोके जहां-जहां इच्छा होती है
 वहां वहां तक जाता है।।
मन की गति है पवन वेग सी
कभी यहां है कभी वहां है 
यह अपनी अभिलाषाएं ले
घूमता रहता जहां-तहां है।।
हाथ बांधे हो फिर भी इच्छा
 यदि कहती है कुछ करने की करके यह अनगिन उपाय
 आगे बढ़ता न बात डरने की।।
तभी कहा है लोगों ने यह 
मन जीता तो हम हैं विजई, वरना मन यदि अपना हारा
 हार हमारी निश्चित होगी।। 
छूता है या कभी गगन को निर्झर धारा के संग बहता
 सुंदर सुंदर दृश्यों को यह
 सदा निहार आनंदित रहता।।
इसीलिए मन मनमाना है
 इसे नहीं बंधन भाता है 
करता है यह वही कि जो कुछ इसकी गति मति को भाता है।।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🌻🌹🌻🌹🌻🌹

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