Type Here to Get Search Results !

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 18 11 2021 को चित्र पर कविता पढ़ें अलका पांडे मुंबई


जीवन का पड़ाव 
------------------
(चित्राधारित रचना)
 -------------------
जीवन में आई संध्या बेला 
पहना हमने नया यह चोला ।।

ढलान पर आ गये हम वृद्ध दम्पति 
लकड़ी के सहारे ही बांट रहें विपत्ति ।।

एक हाथ में हरा वो झोला पकड़ा हैं 
सपनों के सागर में जीने का लफड़ा हैं ।।
बने इक-दूजे के लिए हम ही खिवैया हैं 
सँवरेगी ऐसे ही जीवन की हमारी नैया हैं ।।

अपनों के लिऐ हमने क्या-क्या नही खोया 
अपनों ही ने अब हमको बहुत धोया ।।

उम्मीदों नित्य नये नये डूबे भँवर में 
गोते लगाते रहते भीषण कहर में ।।

अलका ऐसे में इक सयानी बात कही 
दोनों ने मन की पीड़ा एक दूजे से कहीं ।।
जिनको पाला पोषा , उन्होंने ही धोखा दिया 
जिनसे जीवन की आशा थी उन्होंने ही धोखा दिया ।।

रह गये हम जीवन के सफ़र में तन्हा 
एक दूजे के बन गये हम ही कान्हा ।।

अलका पाण्डेय

🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎🙎






[18/11, 9:02 am] 💃💃sunitaअग्रवाल: शीर्षक_ हमसफर

चित्र आधारित रचना

ए मेरे हमसफर , साथ निभाया तूने उम्र भर, 

जीवन की सांझ ढले, हम दोनों का साथ भले, 

हाथों में हाथ लिए, सब मुश्किल पार किऐ, 

अपनों के लिए बहुत जिए, अब जिए एक दूजे के लिए,

मिला है कदम कदम पर धोखा, 
बना न सके जीवन चोखा,

आज हो गए वृद्ध दपंत्ति,
कल तक थे बच्चों की संपत्ति

नियति कह रही है नेकी कर दरिया में डाल,
जीवन की ऐसी है चाल ,

ढलती शाम को संवारेंगे,
जीवन सन्ध्या को महकायेगे,

करेंगे ठाकुरजी की सेवा तन मन प्राण से,
हम दोनों हो जाए निष्प्राण , तुम ही हो हमारी आस विश्वास,

प्रभु, हमारे जीवन की नैया के तारणहार हों
अंधेरे जीवन की रोशनी हो, खुद से ज्यादा बना रहेगा यकीन तुममें, 
तुम्ही पालनहार हो ,

ऐ मेरे हमसफर, साथ निभाया तूने उम्र भर,____२
सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित
धन्यवाद 🙏🙏
[18/11, 10:23 am] 👑सुषमा शुक्ला: शीर्षक 

बुजुर्ग दंपत्ति के विचार,,,
 

 आज मुझे अवकाश मिला है ,
जीवन का इतिहास दिखा है,
 बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए?

 कुछ कड़वे कुछ मीठे अनुभव
 बिना असंभव कुछ नहीं संभव ,
दुनिया की घनी तेज धूप हैं ,
यह जीवन के ही अनुरूप हैl
 एक घड़ी एक मिला है छाता 
,आंखें मूंद चला नहीं जाता
 कह कर दिल भर आए 
बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए।

 आया बरसों बाद बुढ़ापा,
 दुख सुख का हर राग अलापा
35 सालों तक गाया है ,
सच कम झूठ अधिक पाया है। कौन है अपना कौन पराया 
,उसका ध्यान तनिक नहीं आया, 
कह कर दिल भर आए ।
बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए?

 रुपया पैसा और पेंशन ,
नहीं है मुझको बिल्कुल टेंशन,
 दो बेटे एक बेटी ब्याही ,
पथ पर चला अकेला राही ,
जब तक जीना साथ रहूंगा, 
 कुछ भी पुत्रों नहीं कहूंगा, 
 कैसे दिन फिर आए,
 बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए?।

 रवि शशि से दो रूप हमारे
 जमा खर्च सब नाम तुम्हारे,
 अपनी मां का ख्याल भी रखना,
 रोना नहीं सदा तुम हंसना 
,अब यह घर बार तुम्हारा ,
बेटे बहुओं को पुचकारा ,
पास बैठ समझाएं,
 बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए।

बहू का आगमन और सोचना🤔

 सारा दिन बकझक करते हो ,
सारा दिन बकझक करते ,,हौ
ना सोते ना सोने देते हो ।
और खटिया पर पड़े रात रात भर
 तुम तो खांसते रहते हो।
 बुढ़िया चकर मकर करती है,
 बस दिन भर बैठी चरती है,
 बुड्ढे तू कुछ काम किया कर, 
फटे पुराने वस्त्र सिया कर ,
पुत्र और वधू झुंझलाए,
 बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए, बच्चे पूछने आए पिताजी क्या लाए?

 धन्यwad
सुषमा शुक्ला🤔
[18/11, 10:50 am] 😇ब्रीज किशोर: बचपन माँ बाप के साये मे बिता।
जब मन में रही न कोई दुःख न कोई चिन्ता।

जवानी.ख्वाबो में बीता 
नया घोसला बनाने की चिन्ता।
 बच्चे को सारे सुख दिये
 अपने सारे दुःख लिए।

 सोची खूब पढा़ऊँगी। अफसर उसे बनाऊँगी।
अपने सारे शौक छोड़ दिये
बस बच्चे के सपनो में जिये।

मेरा बेटा अफसर बन गया।
ख्वो ने फिर गिरफ्त मे लिया।
अफसर की माँ बन इतराने लगी।
फिर एक नया सपना सजाने
लगी।

अब सुन्दर सी बहूं लाउगीं।
पलंग पर बैठ के हुक्म चलाउगीं।
एक दिन बेटा आके बोला।
हंस के धीरे से अपना मुख खोला।


माँ मै शहर जा रहा हूं
तेरी बहूं को भी लेके जा रहा हूं।
मै बोली हम सब चलते है।
वह बोला आप किसकी बात करते है।
मै और तेरे बाबू जी और कौन
यह बाते सुन के मेरा लाडला
हो गया मौन।


इतना मे बहुअरीया आई।
मुझे नया फरमान सुनाई।
सासु मै यह क्या बोलती है।
आप मेरे साथ नही चल सकती है।
तीन ही कमरे है एक में मेरा
पलंग पडा है।
दुसरा बच्चो का स्टडी रूम बना है।
तीसरे में बच्चे व मेहमान रहते है।


अब इसमे आप कहाँ रहेंगीं।
 इतना कष्ट क्यों कर सहेगीं।
यहाँ इतना बडां आप का मकान हैं।
खेत खलिहान है बगीचा बगान हैं।
नौकर चाकर रख महराजीन रख लीजिए।
अपने मौज से जिये हमे भी जीने दीजिए।

मै तो सुन के भौचंक्का हो गई
सपने टूटे आँख खुली हकीकत में आ गई।
इन्हीं बच्चो के लिए मैने इतना तप किया।
जीसने अपने जीवन से हमको अलग कर दिया।


आँखो के कोने गीले होने लगे।
सारे सपने मेरे बिखरने लगे
तब तक किसी का हाथ कंन्धे
पर पडा़।
मालूम हुआ तपती धरा पर स्वाति बुंद गीरा।


मै तो तृप्त हो गई जैसे नदी सागर में मील गई ।
मै जोश में उठ खड़ी हो कर उनके सिने लग गई।
 मैबोली दो से हम शुरु थे
दो ही फिर रह गये।
बच्चें अपना पुराना घोसला
छोड़ के गये।

अब यह आखिरी सफर हमे अकेले तय करना है।
एक लकडी़ के सहारे हमे जीना है मरना है।
जीते लकडी़ मरते लकडी़ लकडी़ से जल जाना है।
स्वरचित बृजकिशोरी त्रिपाठी
 भानुजा गोरखपुर यू.पी
[18/11, 10:54 am] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* चित्र देख कर कविता लिखो *

माँ बाबा नें पकड़ाया हाथ ,
गठजोडे की वो पक्की गांठ !
जीवन की आपाधापी मे खटते 
उम्र यूं ही रेत सी फिसल गई? 
जितनी भी बची खुची रह गई ,
उसकी आओ भरपाई कर ले!
आओ आज पैरो को गतिमान करे , 
थाम के हाथ एक दूजे के संग चलें 
बढ़ती उम्र का यही है तकाजा ,
एक- दूजे का बन के सहारा
 गई जवानी अब कैसा पतछाना ?
जितना बचा हुआ उसको संजोना !
जब हाथो मे हाथ है एक दूजे का ,
अपनी मुठी मे हमारे सारा जमाना ! 

सरोज दुगड़
खारुपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[18/11, 11:12 am] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (चित्र पर आधारित)
********************
      🌹 जीवन की आ गई शाम , बढते‌ कदम अब डगमगाने लगे ।
इन डगमगाते कदमों ‌‌को  
है सम्भालना ,
इसलिए रहना है
सम्भल सम्भल कर ।
जब तक है सांस
चलता रहेगा जीवन ।
नहीं चाहत है अब 
जीवन की।
अपने कर्तव्य से
हम हुए हैं मुक्त ।
बेटे को पढ़ा दिया ,
बेटी को ब्याह दिया ।
नाती पोतों को‌ 
गोद में खिला लिया ,
हर तमन्ना हुई है पूरी ।
अब हम लगे हैं तेरे 
कीर्तन भजन में।
बस अब है ईश्वर  
तेरी कृपा का इंतजार ।
जब आएगा तेरा बुलावा
हम संतुष्टि से चले आएंगे।
तुझे प्रभु कोटि कोटि नमन ,व कोटि कोटिस धन्यवाद। बस इतनी है प्रार्थना अपनी कृपा इन बच्चों पर भी यौं ही बनाए रखना।
हमारे साथ भी 
हमारे बाद भी ।
तू है कृपा निधान
तेरी महिमा अपरंपार।
*******************
स्वरचित ‌मौलिक रचना
डॉ ‍. आशा लता नायडू.
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
********************
[18/11, 11:26 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विषय:-- चित्र पर आधारित रचना

चलो हमसफर ३७ साल निभाया 
एक दूसरे के साथ हाथों में हाथ लिए
 सब मुश्किल पार किए दोनों बेटे को
पारिवारिक सुख में बांधा लेकिन
मिला हर कदम कदम पर धोखा।
फिर भी जीवन की सांझ ढले
हम दोनों साथ चलेंगे
अपनों के लिए बहुत जिए 
अब अपने लिए जिएंगे।

आज हो गये बुजुर्ग दंपत्ति
चलो हम चले जगन्नाथ पुरी
प्रभु की सेवा करेंगे अंधेरे 
जीवन की नैया पार लगाएंगे।
मेरे हमसफर अब माया छोड़ो
यह सब माया जाल यानि धोखा है
सच्चा प्रेम है प्रभु के साथ करो
वही है पालन हारा ।
करेंगे सेवा तन मन प्राण से हो 
जाएंगे प्रभु के भक्त 
जीवन के अंतिम क्षण में श्रीराम ही आएंगे। 
*जय श्री राम*सत्य है*।

विजयेन्द्र मोहन।
[18/11, 11:32 am] Nirja 🌺🌺Takur: 

अग्निशिखा मंच
तिथि - १८-११-२०२१
विषय- चित्र पर कविता

क्या हुआ जो बच्चे साथ छोड़ गये
हम एक दूसरे के और करीब हो गये। 
छड़ी के सहारे हम दोनो हैं चलते
पकड़ हाथ एक दूसरे का सहारा बनते
मैं सक्षम हूंँ तुम्हारी जिम्मेदारी उठाने को
है हिम्मत हममें,एक दूसरे का साथ निभाने को। 
सुबह जल्दी उठ कर सब्जी हम लायेंगे
दोनो मिल कर फिर खाना हम बनायेंगे। सिर दर्द हो तुम्हारा मैं सिर दबाया करुंगा 
जब पैर दुखेंगे मेरे तुम पैर दबा देना 
तुमसे गुजारिश है,छोड़ ना देना साथ
ईश्वर से मैं मांगता प्राण जाये एक साथ

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[18/11, 12:22 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: चित्र आधारित कविता
शीर्षक-"साथी साथ निभाना"

1.जीवन भर हम साथ रहे हैं और आगे भी साथ रहेंगे यह बात भूल न जाना साथी साथ निभाना,,,,,,,

2. एक दूजे के बिना अधूरे,साथ रहेंगे होकर पूरे , 
अधूरा छोड़ ना जाना ,
साथी साथ निभाना,,,,,

3. एक दूजे का बने सहारा स्नेह से पूरित करें गुजारा आधा-आधा जीवन जीना नहीं गंवारा साथी साथ निभाना,,,,,

4. एक है मंजिल एक डगर है,
मंजिल तक पहुंचाना साथी साथ निभाना,,,,,,

स्वरचित रचना 
  रजनी अग्रवाल
    जोधपुर
[18/11, 12:34 pm] वीना अडवानी 👩: चलो वृद्धाश्रम 
*************

देखो हमनें जी ली जिंदगी
अब बच्चों का जमाना है
रहने दो बच्चों को संग 
कहां वृद्धों का अब जमाना है।।

महंगाई की दुहाई दे बस जतलाना है।।
मात पिता बोझ समझ वृद्धाश्रम 
का रास्ता बस सता दिखाना है।।

चलो दुख अधिक नहीं मुझे आज
ये तो भविष्य में बच्चों को समझ आना है
तुम हो ना मेरे संग सनम मेरे
तुम्हारे संग ही मिल मुझे मरते 
दम़ तक जी कर मुस्कुराना है।।

समझाती हूं तुम्हें हमसफर मैं
वृद्धाश्रम चलो हमें जाना है।।2।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************
[18/11, 12:58 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: चित्रधारित कविता 18 Nov 2021

हाथों में है हाथ भले, जीवन का साथ चले,
छोड़ना न मुझे कभी, बस यही चाहिए।

दुनिया का मोह छोड़ो, ईश्वर से नाता जोड़ो,
चलता हो अंग संग, प्यार वही चाहिए।

लाठी सहारा वने, पोटली गुजारा बने,
प्रभु जी सहारा बने, राह सही चाहिए।

भक्ति भरी राह चल, भक्ति में ही बीते पल
मक्खन बनाने हेतु, शुद्ध दही चाहिए।

2)
प्यार है जवान होता, सिंधु से गहन होता,
नभ से विशाल होता, यह सच मानिए।

अपनी ही शाखाओं के, छाले हैं यह पाँव के,
इन पर वार करुँ, न पापी ऐसा जानिए।

संकल्प से जवाँ होते, काया से बुजुर्ग होते,
पत्ते शाखा छोड़ते हैं, मन मेरे ठानिए।

मुट्ठी की रेत सरकी, जिंदगी यहाँ ढलकी।
जितनी जरूरत है, चादर को तानिए।

3)
बच्चे साथ छोड़ गए, साथ साथ हम हुए,
हाथों में हाथ लिए, हम दोनों होलिए।

खुद का सहारा बने, सुख दुख शाम ढले,
रहें हम साथ साथ, सब कुछ बोलिए।

जीवन की सांझ ढले, मन में है प्यार पले,
दिल में न रखो कुछ, गठान को खोलिए।

है चार धाम जाएँगे, प्रभु के गुण गाएँगे।
यदि लग जाए मन, सारे पाप धोलिए।

वैष्णोखत्रीवेदिका
[18/11, 2:05 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: ।चलते चलते।
चलते चलते हम, 
दोनों पहुंच गये।
आज जिन्दगी के, 
उस मुकाम पर।।
चलते चलते......... 1 
साथ तुम्हारा मिला,
हुआ पथ उजियार।
जिन्दगी की गाड़ी में,
पहुंची राम के द्वार पर।। 
चलते चलते...........2
अपने इस जीवन में,
मेला पीछे छूट गया।
चले हम उस डगर पर,
जीवन सफल की डगर।।
चलते चलते............3
साथ तुम्हारा यूं मिला,
जीवन सफल हो गया।
प्यार की दुनिया है यह,
सफर है सही राह पर।।
चलते चलते............4
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[18/11, 2:54 pm] रवि शंकर कोलते क: कगुरुवार दिनांक १८/११/२१
विधा ***काव्य 
विषय ****
   #***चित्राधारित रचना***#
              **********

कब जीवन की शाम हुई पताही न चला । 
खबर ही नहीं कब उम्र का सूरज ढला ।।
ये जिंदगीका आखरी दौर है मुश्किल का ।
बुढ़ापा ले आया दर्द तकलीफों की बला ।।१

तुमने मेरा बहुत बढ़िया साथ निभाया ।
पडने न दिया मुझपे कभी गमका साया ।।
प्रभुने रख्खी हम दोनोंकी जोड़ी सलामत ।
रखना प्रभु जी ऐसे ही हमपे तुम माया ।।‌२

हाथ में थैला लिए चल पड़े बाजार में ।
चले हैं एक दूजे के सहारे आधार में ।।
कितने स्वार्थी लापरवाह बने हैं बच्चें ।
झोंक के चले गए बुढ़ापे की अंगार में ।।३

दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है ।
फानी जग में कोई हंसता कोई रोता है ।।
हमें तो अब इस लकड़ीका ही सहारा है ।
नसीब है अपना कोई पाता कोई खोता है ।।४

प्रा रविशंकर कोलते
    नागपुर
[18/11, 3:09 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: चित्र पर
दिनांक 18/11/2021
गुरुवार
जन्म जन्म का साथ है हमारा
छूटे ना साथ हमारा
हाथ पकड़कर रखें एक दूजे का
कोई ‌भी‌ मुश्किल आये
मिलकर करेंगे समाधान
दोनों एक दूजे के संग‌ है
यही क्या हमारे लिए कम है
लेंगे नहीं किसी से मदद
हम खुद ही एक विशाल पेड़ है
सबको छाया देते आये‌ है
शुरू से अब तक सारी जिंदगी गुजार दी 
अब ये आखिरी पड़ाव है 
इसे भी पार कर लेंगे
आत्मसम्मान से जीयेंगे ‌हम
जन्म जन्म का साथ हमारा तुम्हारा 
जो अब भी एक दूजे के साथ है
यही तो सबसे बड़ा हमारा धन है
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।
[18/11, 3:12 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
18/11/2021 गुरुवार
विषय-चित्राधारित रचना

जीवन पथ पर
 साथ चले है
साथ चलेंगे
समय की चाल
जैसे भी ढाले
वैसे ढलेंगे
तेरी आँखों में मेरे
मेरी आँखों में तेरे
सपने पलेंगे
दुल्हन बन कर 
आयी थी तेरे घर
कांधे तेरे चलेंगे
आँगन की
 फुलवारी में हमारे
बच्चे फूलेंगे फलेंगे
बच्चों की नजर में
जब हम तुम
कभी खलेंगे
उम्र के हर मोड़ पर
हम दोनों हमेशा
साथ चलेंगे
जब हम साथ होंगेF
कांटो भरी राहों में
फूल ही खिलेंगे
इस जन्म में ही नहीं
हर जन्म में
हम तुम मिलेंगे

              तारा "प्रीत"
          जोधपुर (राज०)
[18/11, 3:45 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: जीवन साथी ( चित्र पर आधारित कविता) ----- ओमप्रकाश पाण्डेय
लगता है जैसे अभी अभी
हम तुम मिले हैं पहली बार
वही सकुचाना वही शर्माना
वही रुक रुक कर बोलना
कुछ भी तो नहीं बदला
आज तक जीवन में अपने
जीवन साथी साथ निभाना.......... 1
छोटा सा था घर तब अपना
छोटी छोटी थी आशा अपनी
सामर्थ्य भी तब था सीमित
माँ बाबूजी भाई बहन व हम
बस इतना ही कुनबा था अपना
जो भी था वह अपना ही था
जीवन साथी साथ निभाना.......... 2
कमाते तो केवल तुम ही थे
पर बड़े मौज से रहते थे सब
एक एक कर सब बड़े हो गये
सबने बसाया घर अपना अपना 
माँ बाबूजी भी छोड़ गए सबको
बस रह गया यही छोटा आशियाना 
जीवन साथी साथ निभाना........ 3
अपना भी आशियाना था आबाद
सब बच्चे खुश हैं अपनी दुनिया में
हम भी तो खुश हैं अपने जीवन में
और क्या चाहिए हमको जीवन से
बस ऐसे ही कटती रहे जिन्दगीं
बस ऐसे ही तुम मेरे पास रहो
जीवन साथी साथ निभाना......... 4
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[18/11, 4:07 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;-चित्राभिव्यक्ति
जीवन सन्ध्या जब आये 
नज़रें हो जाएंगी कम।
सुन न पाएंगे कुछ हम।
उस पल में भी साथ रहेंगे
केवल बस तुम और हम।।1।।

छोड़ घरौंदा उड़ेंगे बच्चे
लीन रहेंगे नव दुनिया में
पड़े जरूरत नहीं है कोई
केवल होंगे हम औऱ तुम।।2।।
बिना सहारे चल न सकेंगे
खाना पीना दूभर होगा
कभी जरूरत कोई पड़े तो
हाथ पकड़ लेना बस तुम।
साथ ही रहना साजन तुम।।3।।
निहारिका झा🙏🙏
[18/11, 4:08 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹 *नमन मंच* 🌹🙏
🙏🌹 *जय अम्बे* 🌹 *१८/११/२१* 🌹🙏
🙏🌹 *चित्र आधारित रचना* 🌹🙏
🙏🌹 *आत्म स्वरूप से एक्ता* 🌹🙏

सूर्यास्त की बेला पर, हाथ पकड़कर चलते है। 
चले मिलाकर कदम कदम, खुशी खुशी हम रहते है।। 

कोई गिला शिकवा नहीं,साथ निभाए जीवन में। 
रखते नहीं अपेक्षा हम, प्रयाण करना मधुवन में।। 

भूतकाल गुजर गया अब, वर्तमान में जीना है। 
चिंता नहीं चिंतन करे, हर पल साथ बिताना है।। 

कितनी सांस साथ चलना, कौन छोड़कर जाएगा ।
*आत्म स्वरूप से एक्ता* ,कोई भूल न पाएगा।। 

🙏🌹 *पद्माक्षि शुक्ल* 🌹🙏
[18/11, 4:50 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी,  
विषय **चित्र पर आधारित कविता *
हाथ जो पकड़ा तुमने 
दुनिया संवर गई
अब न मुझे खौफ है
धूप बारिश का रहमत
बनकर तुम बरस गई
अब तो कदम से कदम
मिला कर चलना है
क्या हुआ जो बच्चों का
साथ छूट गया 
दुख सुख के साथी है हम
हाथ पकड़े एक दूजे का
गिरते सम्भलते रहेंगे हम
जीवन रूपी गाड़ी के 
दो पहिये है हम
मेरी ज़िन्दगी तुम्हारी
मुस्कराहट पर निसार रहेगी
ज़िन्दगी तुम्हारी कर्ज़दार रहेगी
महल हो या जंगल
मन्ज़िल दूर हो या पास
कभी न छोड़ेगे हम साथ
एक दूजे का सहारा बनेगे
लेकर हाथ में हाथ ।।।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।
[18/11, 5:43 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन🙏
विषय *चित्र पर आधारित रचना*

जीवन के अंतिम पड़ाव पर 
हम एक दूजे के साथ हैं ।
अब तक हम साथ चले हैं
यह भी नसीब की बात है ।।१।।

पता ही न चला कब समय 
का रंग बदल गया ,
कब बच्चों के देखभाल में ,
हंसते गाते वक्त निकल गया।।२।।

हमारी शिक्षा और संस्कार 
काम नहीं आ सके ।
बच्चे हमें छोड़ कर चले गए
पंख हमने दिए उन्हें उड़ने को
कैसे रुकते जमीन पर वो ,
आसमान को छूने चले गए ।।३।।

यहां कौन किसका है, सब
 जिंदगी अपनी जीते हैं 
जब भी बुढ़ापा आता है हम
 बूढ़े बस दर्द के आंसू पीते है।४।

बस तुम मेरा साथ नहीं छोड़ना
जिंदगी का सफर हम यू काट लेंगे
प्रभु हमारे साथ है तो दुख किस बात आगे भी हम दोनों दुख बांट लेंगे।५।।

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक १८/११/२०२१
[18/11, 6:09 pm] +91 70708 00416: मंच को नमन 🙏
चित्राधारित रचना
 18/11/21
चलो चलें वृद्धाश्रम की ओर
************************
कोई हमदम न कोई सहारा न रहा
हम किसी के अब न रहे कोई हमारा न रहा
चलें एक दूजे संग लेके हाथों में हाथ
 कभी न छूटे इस उम्र के पड़ाव पर साथ हमारा
बने रहेंगे एक दूसरे का सहारा
जिन बच्चों को सर्वस्व लुटाकर लाड़ -प्यार किया
आज उसी ने वृद्धाश्रम जाने को मजबूर किया
ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी से तो अच्छा है वृद्धाश्रम में सुकून से रहें
बच्चे क्या जानें आज की चकाचौंध में
बुजुर्ग देते हर कदम पर हिम्मत और हौसला
हर वक्त देते झोली भर आशीर्वाद
उन्हें क्या पता उनके जीवन में वटवृक्ष के समान हैं बुजुर्ग
अब पीछे मुड़कर नहीं देखना
चलो हम एक दूसरे का हम साया बन जायें
 चलो चलें वृद्धाश्रम की ओर
अब हमारा ना रहा कोई ठिकाना

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[18/11, 6:20 pm] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: नमन पटल

चित्र आधारित रचना

चलें एक नई राह
लिए साथ की चाह
बिता देंगे शेष जीवन
बिना निकाले मुँह से आह।

तुम कुछ कहना मैं भी कुछ कहूँगी।
सुख हो या दुख तेरे ही साथ सहूँगी।
कभी तुम रूठना मनाऊँगी मैं तुम्हें।
तुम रूठे तो बताओ मैं किस तरह रहूँगी।

तुमपर है अधिकार मेरा
जन्मों का साथ मेरा
रहना साथ सदा तुम
रहे यही सौभाग्य मेरा।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
[18/11, 6:38 pm] रानी अग्रवाल: १८_११_२०२१,गुरुवार।
विषय_ चित्र पर कविता।
[Image 574.jpg]
शीर्षक_ तेरा_ मेरा साथ।
एक तेरा साथ हमको,
दो जहां से प्यारा है,
तू है तो हर सहारा है,
एक तेरा साथ..... ।
देख प्रिये शादी के,
पचास साल हो गए,
काले से सफेद,
तेरे_ मेरे बाल हो गए,
इस जीवन को हमने_२,
साथ में गुजारा है,
तू है तो हर सहारा है....।१।
देख प्रिये, हमने,
तन_ मन एक कर लिए,
बच्चों की खुशियों से,
घर_ आंगन भर लिए,
उनकी हर खुशी में_२(repeat)
चमका, अपना हर सितारा है,
तू है तो हर सहारा है...।३।
देख प्रिये, हम तो,
बने हैं आत्म_ निर्भर,
जीवन नहीं अपना,
आश्रित किसी पर,
जीवन नैया को अपनी_२
स्वयं पार उतारा है,
तू है तो हर सहारा है....।४।
देख प्रिये, बच्चों ने,
घर अपने बसा लिए,
छोड़ गए हमको,
एक_दूजे के लिए,
इस बात को हमने_२
बड़े दिल से स्वीकार है,
तू है तो हर सहारा है....।५।
देख प्रिये हम तुम,
यूं ही साथ चलेंगे,
मरते दम तक,
हाथों में हाथ रखेंगे,
तेरा_ मेरा साथ_२
हर जनम में न्यारा है,
तू है तो हर सहारा है....।६।
एक तेरा साथ हमको,
दो जहां से प्यारा है,
तू है तो हर सहारा है।
स्वरचित मौलिक रचना___ 
रानी अग्रवाल,मुंबई,१८_११.२१.
[18/11, 6:50 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: अग्निशिखा मंच 
चित्र देखकर रचना 

ढलती सांझ में डूब रहा सूरज है 
हाथों में हाथ ले हम चले जा रहे हैं 
कभी- खुशी कभी- गम की बेला आई 
हिम्मत- हौसले से जीवन डगर बिताईl

  हर पल तुम्हारा साथ देता रहा संबल 
जीवन में समरसता का होता रहा संगम। 

जब कभी भी निराशा ने डेरा डाला 
तुम्हारी उमंग -आशा ने मुझे सवाँरा 
लड़खड़ाते कदमों को डिगने ना दिया 
तुम्हारी सशक्त बाहों का अवलंबन मिला।

       अब समय आ गया है 
           लाठी का सहारा मिले 
               भक्ति की राह हम चलें 
                   सेवा-संकल्प दान करते रहें 
                         परिवार हिल मिल कर रहे
                      बहू-बेटे सम्मान करते रहें
               पास- पड़ोस में मान बना रहे 
             खूब मान सम्मान मिलता रहे।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
18-11-21
[18/11, 7:05 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: एक रचना: चित्र पट आधारित
------------
उम्र भले ही साथ नदी हम साथ साथ हैं एक दूजे के।
एक का पद यदि डगमग होगा थाम लेंगे एक दूसरे को।।
क्या समय ही ऐसा है सभी अपने-अपने काम में व्यस्त हैं ।अपनी सुख-सुविधाओं और राग रंग में क्षण प्रतिक्षण व्यस्त हैं ।।किंतु हम दोनों को तो एक दूसरे का ख्याल है।
 किसी भी बात का नहीं रखना मलाल है ।।
चलो धीरे धीरे चलते हैं 
अपना सफर पूरा करते हैं।।
######
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी



[18/11, 9:10 pm] Alka Pandey 1: 🌺गुरुवार 18/11/ 2021
🌺विषय- चित्र पर कविता

साथ चले थे दो ही एक दिन, दो ही साथ रहे।
सुख दुख मिलकर सहे, प्रेम के दो दो बोल कहे।

पाले पोसे बच्चे पढ़ लिख ज्योंही बड़े हुए।
काम मिला अपने पैरों पर जमकर खड़े हुए।

पुत्रवधू घर आई घर में खुशियां हुई नई।
एक दिवस बेटे को लेकर बाहर चली गई।

बड़ी हुई बेटियां चली अपनी ससुराल गईं।
घर खाली हो गया, जिंदगी फिर बीरान हुई।

अब संध्या बेला जीवन की, कोई साथ नहीं।
अंग हुए कमजोर बदन में ताकत नहीं रही।
  
कहां जाएं, क्या करे, समझ कुछ काम नहीं करती।
वृद्धाश्रम जाने में भी तो आत्मा है डरती।

किंतु उपाय नहीं है अब तो जाना ही होगा।
अपने जैसे लोगों का संग पाना ही होगा।

चलो कदम से कदम मिलाकर आओ उधर चलें।
जिधर परिस्थितियां ले जाएं, मिलकर उधर चलें।
*
©️ कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[18/11, 9:10 pm] Alka Pandey 1: मेरे हमसफर
💞💞💞💞
चलो साथ चल के एक आशियां बनाते हैं 
एक कदम तुम तो दूजा हम बढ़ाते हैं 
जीवन की बलखाती राह पे
 एक दूजे का हाँथ बंटाते हैं 
जो तुम रूठो तो हम मना लेंगे 
मेरी मान-मनौव्वल करना हम गले लगा लेंगे 
जीवन के उतार चढाव मे बनेंगे सहभागी हम
सूझ दुःख को साथ सहेंगे बनेंगे दिया बाती हम
जब हो जायेंगे निर्बल एक दूजे का हाल जानेंगे 
तुम मेरी चिंता करना दोनो खुश हो जायेंगे 
बच्चे अगर हमसे हो जायें परेशान हैरान 
तो मेरा साथ ना कभी छोडना मेरी जान 
मै चिडचिडी भी हो जाऊं कभी 
अपनी बिगडती तबियत के चलते मे
तो मेरा ही साथ निभाना सनम 
बच्चों और मेरे बीच के बिगडे मसले मे
चाहे जो हो जियेंगे जिंदगी जिंदादिली से
जुदा न होंगे कभी वादा कर मेरे चांद बदली से

शुभा शुक्ला निशा रायपुर छत्तीसगढ़

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.