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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 1711 2021 को तुलसी विवाह के महत्व पर लेख पढ़ें और रचनाकारों का हौसला बढ़ाएं अलका पांडे मुंबई



तुलसी विवाह का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन देवोत्थान एकादशी व्रत और तुलसी विवाह मनाया जाता है। इस दिन तुलसी विवाह होने की वजह से इस एकादशी का महत्व बहुत बढ़ जाता है। तुलसी विवाह माता तुलसी का भगवान विष्णु यानी तुलसा जी से किया जाता है। 

तुलसी विवाह का महत्व 
ऐसी मान्यता है कि तुलसी विवाह से पुण्य की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि जिन लोगों की बेटियां नहीं होती हैं और वह कन्यादान के समान पुण्य कमाना चाहते हैं तो उन्हें देवी तुलसी का विवाह तुलसा जी से करने पर कन्यादान का पुण्य प्राप्त होता है। कहते हैं कि धार्मिक क्रियाओं में तुलसी विवाह से ज्यादा पुण्य देने वाला अन्य और कोई नहीं हैं। हिंदू धर्म में तुलसी विवाह के बाद ही शादियों के मुहूर्त निकाले जाते हैं। तुलसी विवाह का बहुत महत्व माना जाता है।
प्राचीन कथा के मुताबिक तुलसी विवाह का प्राचीन इतिहास उस समय से जुड़ा हुआ है जब भगवान शंकर का जलंधर नाम का एक अंश देवी वृंदा यानी तुलसी से शादी कर अमर होना चाहता था। लेकिन भगवान विष्णु ने राक्षस का विनाश करने के लिए उसकी इस इच्छा को पूरा नहीं होने दिया और देवी वृंदा से भगवान विष्णु ने स्वयं विवाह किया। तब से हिंदू पंचांग की तिथि के मुताबिक हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवी वृंदा यानी तुलसी जी का विवाह तुलसा जी यानी भगवान विष्णु से किया जाता है।
तुलसी विवाह की विधि

तुलसी विवाह के दिन सूर्योदय से पहले उठने के बाद स्नान कर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद देवी तुलसी को स्नान करवाकर जल चढ़ाएं। अब देवी तुलसी पर श्रृंगार का सामान, वस्त्र, चूड़ियां, मेहंदी और बिंदी आदि अर्पित करें। फिर तुलसा जी यानी को भी दुल्हा के रूप में तैयार करें। अब तुलसा जी की बारात निकालकर शुभ मुहूर्त में तुलसी जी के साथ विधिपूर्वक से उनका विवाह करवाएं। विवाह हो जाने पर तुलसी जी को विदा करने की प्रथा है।
अलका पांडेय

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[17/11, 8:30 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺बुधवार =17/11/ 2021
🌺विषय _तुलसी विवाह का महत्व
 विधा - लेख 

*तुलसी विवाह का महत्व*

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का विशेष महत्व बताया गया है। तुलसी विवाह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार माह की लंबी निद्रा के बाद जागते हैं और इसके साथ ही सारे शुभ मुहूर्त खुल जाते हैं. इस दिन भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम का विवाह तुलसी से कराया जाता है।

तुलसी विवाह का आयोजन करना बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम के साथ तुलसी का विवाह कराने वाले व्यक्ति के जीवन से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उस पर भगवान हरि की विशेष कृपा होती है। तुलसी विवाह को कन्यादान जितना पुण्य कार्य माना जाता है. कहा जाता है कि तुलसी विवाह संपन्न कराने वालों को वैवाहिक सुख मिलता है।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[17/11, 9:54 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- लेख

*तुलसी विवाह या*
🙏🕉️ *तुलसी की महत्ता*🕉️🙏

तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिसका नाम वृंदा था, 

राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था, बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.

बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.

जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। 

जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.

वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.

एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा -
"स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे, मैं पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुंगी, और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी"। 

जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।

फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैस ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए, जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया, उनका सिर वृंदा के महल में गिरा। 

जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा – आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा।

तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में विवाह किया जाता है.

देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

विजयेन्द्र मोहन।
[17/11, 10:59 am] 😇ब्रीज किशोर: .....अग्नि शिखा मंच नमन
         जय माँ शारदे
      १७/११/२०२
   विषय लेख
          तुलसी पर लेख.....
   तुलसी दैत्यराज जालन्धर की पत्नी थी ।जागलन्धर शिव
भक्त था कठीन तपस्या करके शिव जी को प्रशन्न किया ।उसकी पत्नी पती ब्रता थी जीससे जालन्धर
का जीवन सुरक्षित है।देवता जब परेशान हो गये तो बिष्णु भगवान से बोले नाथ हमारी
जालन्धर से रक्षा करे।तब भगवान जालन्धर का रुप धारण कर बृन्दा के पास गये। बृन्दा बहुत खुश हुई 
लेकिन भगवान तो दिलचस्पी नही ले रहे थे बृन्दा को सन्देह हुआ वह बोली आप कौन है दैत्यराज तो नही है भगवान अपने असली रूप में आगये।उधर
देवताओं ने दैत्यराज का बध कर दिया।बृन्दा भगवान से बोली आप कितने पत्थर दिल है।आप को मुझ पर दया नही आई आप पत्थर
के है ।भगवान बृन्दा श्राप स्वीकार किये और तुम सती
होने के बृन्दा का पौद्धा बनो
और मै शालिक ग्राम शिला बनुगा नारायणी नदी में और
मेरी पूजा बृन्दा की पत्ती से
होगी मै तुम्हें अपने पत्नी का 
दर्जा देता हूं मेरे भोग मे बृन्दा 
की पत्ति डाल के ही भोग लगेगा। तब से तुलसी की पत्ती भगवान को चढ़ती है। हर हिन्दू के घर मे तुलसी
का पौद्धा जरूर रहता है।            
सनातन धर्म मे तुलसी का बहुत महत्व है।वैश्णव हिन्दू रोज भगवान शालिग्राम या विष्णु जी को भोग लगता है विना तुलसी पत्र डाले भगवान भोग ग्रहण नही करते।हमारे पूर्वज जो भी पूजा पद्धति बनाये है सब वैज्ञानिक आधार पर है। जिस पेड़ पौद्धे का संरक्षण करना होता है उसे औरतो के ब्रत पूजन से जोड़ दिया।इसी तरह तुलसी भी है तुलसी का पौद्धा आक्सीजन छोड़ता है।
पीपल बरगद सब मनुष्य के लिए फायेमंद है।हाँ तो कार्तिक मास मे तुलसी का एक माह तक पूजन किया जात है और रोज तुलसी के निचे दीपक जलाया जाता है
कार्तिक शुक्ल एकादशी को
बिष्णु भगवान से तुलसी का विवाह कराय जाता है।इसके बाद हम लोगो के यहाँ शादियां शुरू होजाती है। नदी के किनारे बडे़ धूम धाम से तुलसी जी की सालिक ग्राम से विधिवत शादी होती है तुलसी जी को साड़ी कपडा़ भी ओढ़ाया जाता है।इसका भी वैज्ञानिक कारण है।इस महिने से ठंडक शुरू हो जात है तुलसी का पौद्धा सुकोमल होता है।ढ़का न जायँ त़ो पत्तियाँ गल जाती है।और दिया जलने से पौद्धे को गर्मी मिलती है।
भगवान बिष्णु पालन कर्ता है तो माँ तुलसी रोग का निवारण करती है।
जै विष्णु भगवान।
जै तुलसी माता।
 स्वंरचित
  बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ
   भानुजा गोरखपुर .यू.पी
[17/11, 11:07 am] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: नमन पटल
आज का विषय- तुलसी विवाह की महत्ता

तुलसी के विषय में एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है जो इस प्रकार है:-
देवता और दानवों के युद्ध में दानव देवताओं पर भारी पड़ रहे थे कारण था पतिव्रता वृंदा(तुलसी)का पति जालंधर।
उसके प्रगाढ़ पतिव्रत धर्म के कारण उसे देवता मारने में अक्षम थे।
यूँ तो वृंदा का जन्म राक्षस कुल में हुआ था किन्तु वह भगवान विष्णु की परम भक्त थी। विवाह योग्य होने पर उसके माता-पिता ने उसका विवाह राक्षस कुल के दानव जालंधर के साथ कर दिया। कहते हैं कि वह समुद्र से निकला था। पतिव्रता वृंदा अपने पति के अतिरिक्त अन्य किसी का स्वप्न में भी स्मरण नहीं करती थी तथा अपने पति की बहुत सेवा करती थी।
जालंधर देवताओं से युद्ध करने चला गया और वृंदा यह प्रण करके पूजा पर बैठी कि जब मेरे पति युद्ध जीतकर आ जाएंगे तभी मैं अन्नजल ग्रहण करूँगी।
देवताओं के उकसाने पर भगवान विष्णु जालंधर के रूप धरकर आये और वृंदा ने प्रसन्न होकर उनका चरण स्पर्श कर लिया।
उसी समय जालंधर का शीश भी उसके सम्मुख आ गिरा । अब वृंदा सोच में पड़ गई। पूरी बात जानने पर उसने उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया और विष्णु जी पत्थर बन गए। देवताओं और लक्ष्मी जी के अनुनय विनय करने पर उसने अपना श्राप वापस ले लिया और अपने पति के शीश के साथ सती हो गई।
कहते हैं-"चिता की राख से एक पौधा निकला लोग उसे वृंदा समझने लगे तथा उसे तुलसी नाम दिया।"
चूंकि भगवान विष्णु ने उसका पतिव्रत धर्म नष्ट किया था इसलिये लोग विष्णु जी के साथ हर वर्ष कार्तिक माह की एकादशी के तुलसी  पौधे का विवाह कराते हैं। इसके बाद शादी ब्याह और शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। पूरे माह तुलसी के पौधे को दीपक जलाकर पूजा करते हैं।
तभी से तुलसी की पूजा की जाने लगी और तुलसी दल भगवान विष्णु का प्रिय भोग बन गया।

आयुर्वेद में तुलसी की बहुत महत्ता है। तुलसी का काढ़ा पीने से सर्दी, जुकाम, खाँसी में आराम मिलता है।
कई प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं में तुलसी पत्ते का प्रयोग होता है। तुलसी की डंडियों की माला भी बनती है।
तुलसी का रस चेहरे पर लगाने से कील, मुँहासे, नहीं होते ,फुंसियाँ ठीक हो जाती हैं।
आजकल वजन कम करने के का लालच देकर तुलसी ग्रीन टी बेंच रही हैं।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
सौजन्य से- गूगल
[17/11, 11:14 am] रामेश्वर गुप्ता के के: तुलसी विवाह का महत्व:
हिंदू मान्यता के अनुसार तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है. इसलिए अगर किसी ने कन्या दान न किया हो तो उसे जीवन में एक बार तुलसी विवाह करके कन्या दान करने का पुण्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए. मान्यताओं के अनुसार, तुलसी विवाह विधि-विधान से संपन्न कराने वाले भक्तों को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है. सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और भगवान विष्णु की कृपा से सारी मनोकामना पूरी होती है. किसी के वैवाहिक जीवन में यदि परेशानी आ रही हो तो सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं.
द्वारा: रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
[17/11, 1:27 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्निशिखा मंच
तिथि -१७-११-२०२१
विषय- तुलसी विवाह का महत्व

कहा जाता है गणेश जी तपस्या कर रहे थे तब तुलसी जी ने उन पर मोहित हो कर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। गणेश जी तपस्या भंग होने से क्रोधित थे। उन्होंने मना कर दिया। तुलसी जी ने क्रोधित हो कर गणेश जी को २ विवाह का श्राप दिया तो गणेश जी ने क्रोध में कहा कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। तुलसी जी के क्षमा मांगने पर गणेश जी ने कहा जब तुम तुलसी पौधे के रुप में रहोगी। तुम्हें हर घर के आंगन में स्थान मिलेगा और तुम पूजी जाओगी। तुलसी जी का विवाह विष्णुजी के शालीग्राम रुप से करवाया जाता है। तुलसी विवाह करवाने पर कन्या दान का पुण्य और सुख सौभाग्य मिलता है। 
        तुलसी में औषधिय गुण बहुत होते हैं। इस में विटामिन सी ,केल्शियम जिंक आयरन होता है। छोटी मोटी बीमारियां तो इसके सेवन से ही ठीक हो जाती है। इस लिए भी शायद इसे घर में स्थान मिला है। 

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[17/11, 1:38 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;--देवोत्थानी एकादशी का ह
महत्व।।
दिनाँक -17/11/2021
आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी को भगवान निद्रा लीन होते हैं।।जिसे देव शयनी एकादशी कहा जाता है।इस दिन से सभी शुभकार्यों पर विराम (विवाह ) लग जाता है।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान चार मास की निद्रा से जागते हैंजिसे देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है।इस दिन भगवान का तुलसी (वृंदा) से विवाह होता है।तुलसी एक बहुउपयोगी औषधीय पौधा हैजिन्हें माँ का दर्जा दिया गया है
।।सम्भवतः यह प्रथा उनके सम्मान स्वरूप प्रारम्भ की गई होगी। इस दिन के बाद से समस्त वैवाहिक कार्यक्रम व शुभकार्यों (उपनयन, मुंडन आदि) का आरम्भ हो जाता है। चूंकि यह दीपावली के ग्यारहवें दिन पड़ता है इस लिए इस को छोटी दिवाली भी कहते हैं। इस दिन को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।भगवान गोविंद श्री नारायण की आराधना की जाती है।गन्ने का मंडप बनाया जाता है। माँ वृंदा को दुल्हन सा सजाया जाता है व उनका विवाह ,किया जाता है।उनके 7 परिक्रमा लिए जाते हैं।समस्त मौसमी सब्जी फल आदि का नैवेद्य लगाया जाता है।व्रत पूजन के उपरांत रात्रि जागरण का भी प्रावधान है।जो इस व्रत को नियम से करते हैं उन्हें भगवत कृपा प्राप्त होती है।।
निहारिका झा🙏🙏
[17/11, 1:58 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: बुधवार =17/11/ 2021
विषय _तुलसी विवाह का महत्व
 विधा - लेख 
एक प्राचीन कथा से जुड़ा हुआ है। जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ जो कि शंकर जी का एक अंश था। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। उसे अभिमान हो गया और उसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। 

जब वह सबको आतंकित करने लगा तो दुःखी होकर सब देवता भगवान विष्णु जी से जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। 

भगवान विष्णु ने जलंधर रूप धारण करके छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्तिहीन हो कर युद्ध में मारा गया। भगवान विष्णु के छल का पता चलते ही वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर में परिवर्तित होने का शाप दिया बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शाप वापस ले लिया और जलंधर के साथ सती हो गई। वृंदा की राख से तुलसी का पौधा निकला। 

वृंदा के साथ हुए छल के कारण भगवान विष्णु लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को पत्थर रूप में शालिग्राम बनकर जीवित रखा। भगवान विष्णु को तुलसी रूप लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय है इसी कारण उसका स्थान शीश पर है। भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखी जाती है। बिना तुलसी के प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं। 

वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने प्रबोधनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। तभी से तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि जिनकी बेटियां नहीं होती वे देवी तुलसी का विवाह करके कन्यादान के समान पुण्य कमा सकते हैं। तुलसी विवाह के बाद ही शादियों के मुहूर्त भी निकाले जाते हैं। 

तुलसी विवाह के दिन सूर्योदय से पहले उठने के बाद नहाकर साफ कपड़े पहने जाते हैं। इसके बाद तुलसी देवी को स्नान कराकर वस्त्र, मेहंदी, बिंदी, चूड़ियाँ आदि से श्रृंगार कराया जाता है। शालिग्राम जी को भी सजाकर बारात निकाली जाती है। तुलसी माता के साथ उनका विवाह संपन्न कराया जाता है

 वैष्णोखत्रीवेदिका
[17/11, 2:01 pm] रवि शंकर कोलते क: बुधवार दिनांक**१७/११/२१
विधा ***लेख
 विषय***
#**तुलसी विवाह का महत्व **#
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```तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.।बड़े ही मेंप्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` -
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प
नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे
ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।
उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में
बिना तुलसी जी के भोग```
```स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में```
```किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !
         तुलसी का पौधा बहुत ही आरोग्य वर्धक है । इसके सेवन से फोड़े फुंसी और त्वचा का रोग नहीं होता , सुबह खाली पेट 5 तुलसी के पत्ते नियमित रूप से खानेसे वात पित्त कफ , खांसी सर्दी के रोग नहीं होते । तुलसी के पत्ते के बिना भगवान को भोग भी लगाया नहीं जाता । 
        दिवाली में तुलसी विवाह के बाद ही हर घर में बच्चों की शादी करने का चलन है। घर में तुलसी के पौधे हो तो कीड़े मकोड़े् मच्छर
नहीं रहते । तुलसी पौधे का दवाइयों में बहुत प्रयोग होता है ।
इसलिए तुलसी का हमारे जीवन में बहुत महत्व है 

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[17/11, 2:02 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय** तुलसी विवाह का महत्व **
           कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी के साथ ही शादी विवाह आदि सभी मंगल कार्य आरम्भ हो जाते हैं, इसलिए एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन अच्छा माना जाता है।
            हिन्दू पंचाग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान् विष्णु के स्वरूप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है ।
            पौराणिक कथा के अनुसार राजा जलन्धर की पत्नी वृन्दा के श्राप से भगवान् विष्णु पत्थर बन गए थे, इस कारण उन्हें शालिग्राम भी कहा जाता है ।अपने शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान् विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरूप में तुलसी से विवाह करना पड़ा, और उसी समय कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है । भगवान् विष्णु को प्रिय है तुलसी इसे विष्णु प्रिया भी कहते हैं ।इस सुअवसर पर मांगलिक कार्य किये जाते हैं । 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
[17/11, 2:10 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: *तुलसी कौन थी?*
```तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` -
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प
नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे
ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।
उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में
बिना तुलसी जी के भोग```
```स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में```
```किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !`
तभी से शुभ कार्य एंव विवाह का कार्य शुरू किया जाता है ।
🙏🏻🚩🙏🏻🚩🙏🏻🚩
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़ में
[17/11, 2:52 pm] Anita 👅झा: विषय - तुलसी की महत्ता 
हर घर आंगन शोभा श्रद्धा विश्वास 
जगाती ऊर्जा का संचार जगाती तुलसी है ।
आधुनिकता की भाग दौड़ में इंसान चाहे कितना भी आगे बढ़ जाये ।
घर की रौनक़ तुलसी चौरे से है 
सभ्यता संस्कृति विकास का महत्व तुलसी देश विदेश में अपना आधिपत्य जमाया है । मैंने देखा है पानी की जार में फलों के साथ तुलसी की पत्तियाँ डाल स्वास्थवर्धक बने रहे जल का सेवन नियमित करते है ।
आरोग्य स्वास्थ की देवी बन अपने जड़ से नख सिख तक मानव मन में प्रकृति वनस्पति आरोग्य में अपना स्थान बनाया है 
धार्मिक आस्थाओं में तुलसी घर बाहर हर वस्तुओं में उपस्थिति दर्ज करा रामबाण का काम करती है 
जहाँ पहुँचे हरि वाह पहुँचे तुलसी हाथों में जल हरि तुलसीपान मान सम्मान है 
हितकारी और गुणकारी औषधि की तरह होती हैं 
हमारे पूर्वज कहा करते -
बिन तुलसी के घर भूत का डेरा है 
जहाँ बसे तुलसी वहाँ लक्ष्मी डेरा है
अनिता शरद झा रायपुर
[17/11, 2:52 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: , हरिप्रिया तुलसी
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तुलसी जालंधर की पत्नी थी ।वह भगवान विष्णु में बहुत ही विश्वास रखती थी। केवल आप बस उसकी शादी उसका विवाह जालंधर से हुआ था ।जालंधर राक्षस था ।अपनी प्रवृत्ति के चलते वह असुरों के अतिरिक्त अन्य प्राणियों को कष्ट देता था। ।उसका विनाश देवताओं की परम इच्छा थी ।इसीलिए" छल करि टारेसु तासु ब्रत ,प्रभु सुर कारज कीन्ह।।"पतिव्रता को यह अच्छा नहीं लगा कि साक्षात विष्णु जिसे वह बहुत ही श्रद्धा से देखती है ।उसके पति का स्वरूप लेकर उसके व्रत को बंद करें। उसने श्री हरि को वशीभूत क्रोध के श्राप दिया ।क्योंकि वह स्पष्ट कुछ बताए नहीं ।उसको वह बार-बार पूछती रही -"तुम कौन हो ?तुम कौन हो ??"अंत में अपने मूल स्वरूप में आए ।स्वाभाविक है ,कोई भी पतिव्रता अपना व्रत भंग करना नहीं चाहेगी ।वह चाहे साक्षात् नारायण ही क्यों न कारण हो। उसने श्राप दिया ।श्रीहरि पत्थर बन गए ।काले पड़ गए ।बाद में भगवान ने उससे कहा-" मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता" "वृंदा तो जल गई ।
उस स्थान पर जो ,पौधा उगा वह तुलसी था ।उस तुलसी के पत्ते के बिना ना तो भगवान भोजन करते हैं और जब तक वह पता उनके मस्तक पर नहीं रखा जाता उनके सिर में पीड़ा बनी रहती है ,इसीलिए आज भी विष्णु पूजक तुलसी को अति महत्वपूर्ण कहते हैं ।उसे हरिप्रिया विष्णुप्रिया कहते हैं ।जहां श्रीहरि की पूजा होती है -वही "नमो नमो तुलसी महारानी "कह कर तुलसी की भी पूजा होती है।वह हमारे लौकिक और पौराणिक दोनों जी जीवन में परम पूज्य मानी जाती है ।औषधि विज्ञान इसे आपाद मस्तक के रूप में प्रयोग करते हैं। सामान्य बुखार से लेकर कैंसर तक दूर करने में इसका प्रयोग होता है।।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🙏🌹🙏🌹🌻
[17/11, 3:58 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹नमन मंच 🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे 🌹१७/११/२१🌹🙏
🙏🌹 *तुलसी विवाह का महात्म* 🌹🙏


तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी, जिसका नाम वृंदा था। राक्षस कुल में जन्मी यह बच्ची बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में ही दानव राज जलंधर से संपन्न हुआ
 सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा.. स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं, आप जब तक युद्ध में रहेंगे, मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करुंगी। जब तक आप नहीं लौट आते मैं अपना संकल्प नहीं छोड़ूंगी।

 उसके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को न हरा सके। सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास पहुंचे और सभी ने भगवान से प्रार्थना की
भगवान बोले, वृंदा मेरी परम भक्त है, मैं उससे छल नहीं कर सकता। इसपर देवता बोले कि भगवान दूसरा कोई उपाय हो तो बताएं लेकिन हमारी मदद जरूर करें। इस पर भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धरा और वृंदा के महल में पहुंच गए।

वृंदा ने जैसे ही अपने पति को देखा तो तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिया। इधर, वृंदा का संकल्प टूटा, उधर युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। जलंधर का कटा हुआ सिर जब महल में आ गिरा तो वृंदा ने आश्चर्य से भगवान की ओर देखा जिन्होंने जलंधर का रूप धर रखा था।

इस पर भगवान विष्णु अपने रूप में आ गए पर कुछ बोल न सके। वृंदा ने कुपित होकर भगवान को श्राप दे दिया कि वे पत्थर के हो जाएं। इसके चलते भगवान तुरंत पत्थर के हो गए, सभी देवताओं में हाहाकार मच गया। देवताओं की प्रार्थना के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया।

इसके बाद वे अपने पति का सिर लेकर सती हो गईं। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने उस पौधे का नाम तुलसी रखा और कहा कि मैं इस पत्थर रूप में भी रहुंगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा।
इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि किसी भी शुभ कार्य में बिना तुलसी जी के भोग के पहले कुछ भी स्वीकार नहीं करुंगा। तभी से ही तुलसी जी कि पूजा होने लगी। कार्तिक मास में तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। साथ ही देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी-शालीग्राम विवाह किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा के बाद जागते हैं. इस दिन तुलसी-शालीग्राम विवाह कराने से कन्या दान के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है इसलिए जिस भी व्यक्ति को अपने जीवन में कन्या दान करने का अवसर न मिला हो उसे कम से कम एक बार तुलसी-शालीग्राम विवाह अवश्य कराना चाहिए. यहां पढ‍़ें तुलसी विवाह का महत्व,

*तुलसी विवाह का महत्व*

हिंदू मान्यता के अनुसार तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है. इसलिए अगर किसी ने कन्या दान न किया हो तो उसे जीवन में एक बार तुलसी विवाह करके कन्या दान करने का पुण्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए. मान्यताओं के अनुसार, तुलसी विवाह विधि-विधान से संपन्न कराने वाले भक्तों को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है. सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और भगवान विष्णु की कृपा से सारी मनोकामना पूरी होती है. किसी के वैवाहिक जीवन में यदि परेशानी आ रही हो तो सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं.
🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल 🌹🙏
[17/11, 4:03 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: तुलसी विवाह का महत्व -- ओमप्रकाश पाण्डेय
हमारे देश में बहुत सी महान सति महिलाऐं हुईं हैं, उनमें तुलसी का नाम प्रमुख है. कथा है कि तुलसी भगवान विष्णु की महान भक्ति थी और उसका विवाह जलंधर नामक राक्षस से हुआ था. उसने सभी देवताओं को परास्त कर विश्व में अपने आतंक से सबको परेशान कर रखा था.
तुलसी के सतित्व के बल से जलंधर काफी शक्तिशाली हो गया था. 
देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. एक बार जब देवताओं और जलंधर के बीच युद्ध चल रहा था और तुलसी पति के लिए तप कर रही थी, भगवान विष्णु जलंधर का रुप धारण कर तुलसी के सामने खड़े हो गये. जिससे तुलसी अपनी पूजा छोड़ उठ खड़ी हुई और उसका तप भंग हो गया. उसी समय जलंधर का शीष कट कर तुलसी के गोद में गिरा. तुलसी ने पति के वियोग में, उसके शीष के साथ ही सति हो गई और अग्नि में भष्म हो गई. भष्म के राख से तुलसी का एक पौधा उत्पन्न हुआ . लेकिन तुलसी ने विष्णु को पत्थर होने का शाप भी दे दिया. भगवान विष्णु उसी समय शालिग्राम पत्थर हो गये.
भगवान विष्णु ने तुलसी को घर घर में पूजित होने का आर्शीवाद दिया. ऐसा कहते हैं कि कार्तिक माह में शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी विवाह कराने से एक कन्या के विवाह कराने का पुण्य मिलता है.
तुलसी के पत्ते बिना कोई प्रसाद पूरा नहीं होता और हर हिन्दू के घर में तुलसी की पूजा की जाती है.
[17/11, 4:40 pm] 💃वंदना: 🙏तुलसी जी की कथा🙏

कार्तिक महीना में एक डोकरी मां रोज तुलसा जी 
के सीचति ने कहती तुलसा माता सच की दाता हूं थारो बिड़ला सिचती म्हारे बेटों दे ,बहु  दे ,पीतांबर की धोती दे ,मिठो मिठो गास दे  ,बैकुंठ  में वास दे ,
चटक की चाल दे ,पटक  की मौत दे, चंदन की काठ  दे, रानी सो राज दें, दाल भात को भोज दे ,
ग्यारस की मौत दे, कृष्ण जी को कान्धों  दे,या बात सुन के तुलसा जी सूखने लगी सब दूं पर कृष्ण जी को कान्धों काॅ  से दूं। एक दिन भगवान ने पूछी बई
तुलसा तू क्यों सूखे तुलसा जी ने भगवानजी के डोकरी  मां की सब बात बताई  कृष्ण जी ने की  तुम चिंता छोड़ो डोकरी मरेगी उन दिन मैं खुद कंधों देने अइ जाऊंआ 

जब डोकरी मरी सब लोग आया ले जाने लगे तो डोकरी उठेइ नी सब परेशान  तब भगवान कृष्ण  
बारा बरस का बालक का रूप मैं आया ने डोकरी मां के कान्धो दियों कान में झन्कार दी बेटो ले ,बहू ले , पीतांबर की धोती ले, मिठो मिठो गास ले, बैकुंठ को बास ले, चटक की चाल लें, पटक की मौत ले, चंदन की पाटले, रानी को राज ले , दाल भात को भोज ले, ग्यारस की मौत ले, कृष्ण जी को कान्धों ले डोकरी झट हल्की हुईगी। डोकरी के मुक्ति मिली।

हे तुलसी माता जैसी डोकरी मुक्ति मिली वैसी सबके दे।

            🙏  जय श्री हरि 🙏
जय जय जय तुलसा महारानी ओम नमो हर की पटरानी🙏

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश। 
         
[17/11, 4:52 pm] वीना अडवानी 👩: तुलसी की महत्ता
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तुलसी जोकि कान्हा की सदैव प्री रही कान्हा जी ने उन्हें वर दिया की हर पूजा के प्रसाद में या हर पूजा स्थल पर तुलसी का प्रयोग सदैव किया जाएगा। साथ ही तुलसी को औषधि के रूप में भी जाना जाता है हाल ही में कोरोना काल में तुलसी का प्रयोग अत्यधिक मात्रा में काड़े या अन्य रूपों से प्रयोग करते हुए लोगों को देखा गया तुलसी वह पूजनीय पौधा है जो जिसके बारे में वेद पुराणों में भी हमने पड़ा है, कार्तिक मास में तुलसी के पौधे का स्वयंवर हमने बहुत अधिक देखा है कहा जाता है की तुलसी विवाह का व्रत करने वालों का जिनकी जिंदगी खुशहाल हो जाती है और उनकी जिंदगी में अत्यधिक धनसंपदा का भी समावेश होता है।।

वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[17/11, 5:06 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लेख) ‌ ‌🌹 तुलसी विवाह का महत्व 🌹
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          देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का विशेष महत्व होता है। आज के दिन माता तुलसी का शालिग्राम यानी विष्णु जी के साथ विवाह किया जाता है ।सुहागिन स्त्रियां इस तुलसी विवाह को संपन्न कर अपने दाम्पत्य जीवन की मंगल कामना करती हैं।
          ‌ पौराणिक कथा अनुसार वृंदा का विवाह गणेश जी के श्राप के अनुसार जालंधर नामक दानव से होता है। जालंधर देवताओं से युद्ध में मारा जाता है ।उसका कटा सिर वृंदा के गोद में आकर गिरता है । विष्णु जी की वह असीम भक्त रहती थी। पर विष्णु जी के छल के कारण वह उन्हें क्रोध में पत्थर होने का श्राप देती है और स्वयं अपने पति जालंधर का सिर लेकर सति हो जाती है।उस भस्म में तुलसी का पौधा उत्पन्न होता है।
          इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए विष्णु जी ने शालीग्रार पत्थर के रूप में अवतार लिया और तुलसी को मान सम्मान देने के लिए तुलसी विवाह किया। आज के दिन जो तुलसी एवं शालिग्राम का विवाह रचाते हैं ,कहते हैं, उन्हें एक कन्यादान का पुण्य मिलता है ।तुलसी का महत्व एवं उपयोगिता घर-घर में होती है। इसीलिए हर हिंदू के घर में तुलसी का पौधा श्रध्दा से लगाया जाता है जो पूजनीय होने के साथ-साथ अनेक कार्यों में उपयोग में लाया जाता है ।सिर्फ गणेश जी के प्रसाद को छोड़कर पूजा के हर प्रसाद में तुलसी पत्ते का अत्यधिक महत्व है।
  ‌ अलावा इसके यह औषधि के भी बहुत काम आता है। घरेलू दवाइयों में तुलसी का महत्वपूर्ण स्थान है ।इसलिए प्रतिदिन श्रद्धा से तुलसी के पौधे में जल चढ़ा कर शाम को दिया लगा उनका मान सम्मान कर पूजना चाहिए।
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डॉ . आशालता नायडू.
भिलाई . छत्तीसगढ़.
17/11/2021.
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[17/11, 5:58 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक-"तुलसी विवाह का महत्व"

तुलसी विवाह का बहुत अधिक महत्व है। इससे भक्तों को सुख की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार एक राक्षस जालंधर जिसकी पत्नी वृंदा थी। उसके सतीत्व के कारण वह अपनी वीरता से नाम कमा रहा था ,और सारे देवताओं को हरा देता था। एक बार विष्णु ने वृंदा की परीक्षा लेने के लिए जालंधर का रूप धारण करके उसे छुआ। उसके छूते ही वह राक्षस जालंधर मर गया। उसका सर वृंदा के आंगन में आकर गिर गया। अब वृंदा को पता पड़ गया कि यह मेरे साथ विष्णु ने छल किया है। तब उसने श्राप दिया कि तुम काला पत्थर हो जाओ। इसी श्रॉप की मुक्ति के लिए भगवान ने शालिग्राम पत्थर के रूप में अवतार लिया और तुलसी से विवाह किया ।यह कहीं एकादशी और कहीं द्वादशी के दिन होता है। तुलसी और विष्णु का विवाह प्रतीकात्मक माना जाता है इससे सुखों की प्राप्ति होती है।

स्वरचित रचना पौराणिक में पढ़कर रजनी अग्रवाल
  जोधपुर
[17/11, 6:10 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन🙏

विधा। लेख

विषय *तुलसी विवाह का* *महत्व*

     तुलसी के बारे में एक पौराणिक कथा यह है कि तुलसी का पौधा पूर्व जन्म में एक लड़की थी जिसका नाम वृंदा था दैत्यों कुल में उसका जन्म हुआ।
बचपन से वह भगवान विष्णु की भक्ति करती थी। भगवान की सेवा पूजा अर्चना करती थी जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह दैत्य कुल में दानव राज जलंधर से हुआ जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। एक बार देवतावो और दानव में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध में जाने लगे तो वृंदा ने कहा,"स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हो आप जब तक युद्ध में रहेंगे मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत की के लिए अनुष्ठान करूंगी और जब तक आप वापस नहीं आ जाते,मैं अपना संकल्प नहीं छोडूंगी। जलंधर तो युद्ध में चले गए। और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी। उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को जीत न सके। सब देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गए सब ने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि,", वृंदा मेरी परम भक्त है। मैं उसके साथ छल कपट नहीं कर सकता फिर देवता बोले भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं।
    भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा वृंदा के पास पहुंच गए जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा वे तुरंत पूजा में से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए जैसे उनका संकल्प टूटा युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया उसका सिर काटकर अलग कर दिया उसका सिर वृंदा के महल में गिरा जब देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर यह जो मेरे सामने खड़े हैं यह कौन है उन्होंने पूछा आप कौन हो इसका स्पर्श मैंने किया था भगवान अपने रूप में आ गए पर वे कुछ ना बोल सके और सारी बात समझ गई उन्होंने भगवान को शाप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ भगवान तुरंत पत्थर के हो गए सभी देवता में आग का करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगी और प्रार्थना करने लगी जब जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्र के रूप में रहेगा इसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी की शादी पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करूंगा तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी की विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है।
      देव उठावनी एकादशी के दिन इस तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है तुलसी का पौधा बहुत ही आरोग्य वर्धक इसके सेवन से सभी त्वचा रोग नहीं होता सुबह खाली पेट तुलसी के पत्ते खाने से वात पित्त कफ खासी सर्दी के रोग नहीं होते तुलसी के पत्ते के बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जा सकता दिवाली के बाद तुलसी विवाह होने के बाद घर में लड़के लड़कियों की शादी करने का रिवाज है कोरोना काल में तुलसी का रस पीने से कोरोना का असर ना के बराबर हुआ है इसलिए तुलसी हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है।

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक :- १७/११/२०२१
[17/11, 6:30 pm] रानी अग्रवाल: १७_११_२०२१,बुधवार।
विषय_ देवउठनी एकादशीऔर तुलसी विवाह का महत्व।
विधा_ लेख।
शीर्षक_ मेरे घर का तुलसी विवाह।
आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी "देवशयनी एकादशी" कहलाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से जग के पालनहार श्री विष्णु जी चार महीनों के लिए क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं।इसके पीछे भी कई पौराणिक कथाएं हैं।इनमें से एक है कि ये श्री लक्ष्मी जी ने विष्णु जी से मांगा था ताकि उन्हें तथा भगवान जी को अपने कार्य से आराम मिल सके।श्री विष्णुजी ने इसे मान्य भी कर लिया।(अपनी पत्नी का कहा देवता भी मानते थे तो मनुष्य की बात ही क्या? अपनी आजकल की भाषा में इसे break ब्रेक लेना कहते हैं)क्योंकि देवता शयन कर रहे होते हैं इसलिए इस दिन से विवाह आदि मंगल कार्य बंद हो जाते हैं।(चार महीने की छुट्टी)
     इसके विपरित कार्तिक मांस की शुक्ल पक्ष की एकादशी को " देवउठनी एकादशी" कहते हैं यानि आज के दिन श्री विष्णु जी अपनी महानिंद्रा से जागते हैं और इसी दिन शुभ मंगल कार्यों की शुरुआत हो जाती है इसीलिए आपने देखा होगा कि देवउठनी एकादशी के दिन बहुत सी शादियां होती हैं।
      इसी दिन को तुलसी विवाह का दिन भी कहते हैं।मान्यता है श्री विष्णुजी ने शालिग्राम रूप में तुलसी को वरा था।जो लोग तुलसी का विवाह अपने घर में या सामूहिक, सामाजिक स्थानों में कराते हैं उनके पिछले जन्मों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं(इस जन्म के पाप? पता नहीं)जिनके अपनी संतान न हो वो तुलसी का विवाह कराकर "कन्यादान" का पुण्य कमा सकते हैं।तुलसी विवाह बिलकुल असली ब्याह की तरह किया जाता है।लोग व्रत रखते हैं, बाजा बारात निकलते हैं,दहेज देते हैं,मंगल, गीत गाए जाते हैं।
      मैंने भी बड़ी श्रद्धा_ भाव से अपने घर शालिग्राम_ तुलसी का विवाह रचाया।मेरे घर हरा_ भरा तुलसी जी का घना ,बृहद पौधा है।मैंने वहां शालिग्राम जी को स्थापित किया।उनके पीताम्बर का अटूट गठजोड़ तुलसीजी की चुनरी से कर दिया।मिठाई का भोग लगाया,घी का दीपक जलाया, मां तुलसीजी की आरती की।उनसे प्रार्थना की कि आप जैसा मेरा भी गठबंधन अमर रहे,मेरे परिवार पर आपकी कृपा बनी रहे।
        देखिए मुख्य है अपनी
 श्रद्धा ,अपना भाव।शुद्ध मन से पूजन अर्चन करें तो कहा ही गया है कि "भगवान तो भक्त वत्सल हैं भक्त के पुकारने पर दौड़े_ दौड़े चले आते हैं।"
हे श्री विष्णुजी,श्री कृष्ण जी,श्री तुलसीजी मुझे और मेरे परिवार को अपने आशीर्वाद की छाया दे सुखी रखना।
     राम राम।जय श्री कृष्ण।
स्वरचित मौलिक लेख____
रानी अग्रवाल, मुंबई,१७.११.२१.
[17/11, 6:40 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: *तुलसी माता पूजन का महत्व* _
- व्यक्ति निरोगी रहता है, राक्षस, भूत-पिशाच आदि योनि से छुटकारा मिलता है, पापों का नाश होता है, संकटों से मुक्ति मिलती है, सर्वकार्य सिद्ध होते हैं, सौभाग्य प्राप्त होता है, मोक्ष मिलता है, विवाह बाधा समाप्त होती है, धन और समृद्धि आती है, शांति मिलती है, मोह-माया और बंधनों से मुक्ति मिलती है, हर प्रकार के मनोरथ पूर्ण होते हैं, खुशियां मिलती हैं, सिद्धि प्राप्त होती है, उपद्रव शांत होते हैं, दरिद्रता दूर होती है, खोया हुआ सबकुछ फिर से प्राप्त हो जाता है, पितरों को अधोगति से मुक्ति मिलती है, भाग्य जाग्रत होता है, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, पुत्र प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, सभी रोगों का नाश होता है, कीर्ति और प्रसिद्धि प्राप्त होती है, वाजपेय और अश्‍वमेध यज्ञ का फल मिलता है और हर कार्य में सफलता मिलती है।

सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित धन्यवाद। 🙏

 
 
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[17/11, 6:57 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: तुलसी विवाह का महत्व

कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव भारत भर में विशेष कर उत्तर भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। एकादशी को व्रत करके नियम से पूजन करके अगले दिन तुलसी का पौधा ब्राह्मण को दिया जाए तो बहुत ही शुभ होता है ।तुलसी एक साधारण सा पौधा होता है परंतु भारतीयों के लिए यह गंगा- जमुना के समान पवित्र है। पूजा की सामग्री में तुलसी दल रखना आवश्यक होता है।तुलसी के पौधे को वैसे तो स्नान के बाद प्रतिदिन पानी देना स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होता है। तुलसी के कारण उसके आसपास की वायु शुद्ध हो जाती है इसलिए सभी लोग अपने घर में तुलसी का पौधा रखते हैं। सत्यनारायण की कथा मैं भी तुलसी रखना आवश्यक माना जाता है ।तुलसी की पूजा क्यों आरंभ हुई इसके विषय में एक कहानी प्रस्तुत है 
प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक राक्षस था ।वह बड़ा ही वीर और पराक्रमी था पर उसने चारों तरफ बड़ा उत्पात मचा रखा था। उसकी वीरता का रहस्य" उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म था।"उसी के प्रभाव से वह सर्व जयी बना हुआ था। उसके उत्पातों और उपद्रवों से भयभीत ऋषि व देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए तथा उससे रक्षा करने के लिए कहने लगे। विष्णु जी ने काफी सोच विचार कर.वृन्दा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया ।
उन्होंने योग माया द्वारा एक मृत शरीर वृंदा के आंगन में फिकवा दिया ।माया का पर्दा होने से वृन्दा को अपने पति का शव दिखाई दिया ।अपने पति को मृत देखकर वह उस मृत शरीर पर गिर कर विलाप करने लगी ।उसी समय साधु उसके पास आए और कहने लगे इतना विलाप मत करो मैं इस मृत शरीर में जान डाल दूंगा ।साधु ने मृत शरीर में जान डाल दी ।भावातिरेक मैं वृंदा ने उस मृत शरीर का आलिंगन कर लिया । बाद में वृन्दा को भगवान का छल कपट मालूम हुआ।
उधर उसका पति जो देवताओं के साथ युद्ध कर रहा था कर रहा था ,वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही वह देवताओं द्वारा मारा गया ।इस बात का जब वृन्दा को पता लगा तो उसने क्रोधित होकर विष्णु भगवान को शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग पतिदेव दिया है ।उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छल पूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्युलोक में जन्म लोगे ।यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई
विष्णु जी अपने घर पर बड़े लज्जित हुए ।देवताओं और ऋषियों ने उन्हें कई प्रकार से समझाया तथा पार्वती जी ने वृन्दा की चिता भस्म में आंवला ,मालती व तुलसी के पौधे लगाए। भगवान विष्णु ने तुलसी को ही वृन्दा का रूप समझा। कालांतर में रामावतार के समय राम जी को सीता का वियोग सहना पड़ा ।
वृन्दा ने विष्णु जी को शाप दिया कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है अतः तुम पत्थर बनोगे इसलिए विष्णु जी काले रंग के पत्थर बन गए जिन्हें शालिग्राम कहा जाता है।
विष्णु जी बोले - हे वृंदा ,तुम मुझे लक्ष्मी जी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। यह सब तुम्हारे सतीत्व का ही फल है ।तुम तुलसी बनकर मेरे साथ रहोगी तथा जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा वह परमधाम को प्राप्त होगा। इसी कारण शालिग्राम जी या विष्णु शिला की पूजा बिना तुलसी दल के अधूरी होती है ।इसी पुण्य की प्राप्ति के लिए आज भी तुलसी विवाह बड़ी धूमधाम से किया जाता है । तुलसी को कन्या मानकर व्रत करने वाला यथा विधि से भगवान विष्णु को कन्यादान करके तुलसी विवाह संपन्न करता है ।
इसलिए तुलसी पूजा का आज भी महत्व माना जाता है।
आशा जाकड़
[17/11, 7:01 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: तुलसी विवाह का महत्व 

तुलसी को विष्णु प्रिया और हरी प्रिया भी कहा जाता हैI तुलसी पौधा आरोग्य वर्धक हैl तुलसी का भोग, प्रसादी में लगाया जाता हैl
" हर आंगन तुलसी कानन" के अनुसार सभी को अपने घर में तुलसी को अवश्य लगाना चाहिए और तुलसी चौरा पर दीपक अवश्य लगाएं ,ताकि प्रकाश फैलता रहेl 
तुलसी विवाह से शादी- विवाह के मुहूर्त शुरू हो जाते हैं जो शुभ होता है। तुलसी ऊर्जा का संचार करती है। संस्कृति- संस्कार की पोषक है। तुलसी पत्तियों को चाय में सेवन करने से लाभ होता है। 
        तुलसी का आयुर्वेदिक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।धार्मिक आयोजन में तुलसी का प्रभुत्व दिखाई देता है। तुलसी मंजरियां तोड़ते रहना चाहिए,ताकि उनसे नए पौधे प्रस्फुटित हो सकें। तुलसी गुणकारी औषधि है। हमारे पूर्वज कहते हैं-
            तुलसी मैया जहां बिराजे
           लक्ष्मी मैया वहां डेरा डालें 

डॉक्टर अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
17-11-21

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