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Akhil Bhartiya agnishikha block Aaj dinank 20 10 2021 diye Gaye vishay,," Insan safalta Bhajpa per nirbhar Karthi e hai hai yah yah kam per"vishay per lekhak padhe Alka Pande Mumbai


20/10/2021
क्या व्यक्ति की सफलता 
में भाग्य से अधिक कर्म पर निर्भर होता है ।..? 

हर व्यक्ति की सफलता में भाग्य उसका साथ देता पर कर्मठ व्यक्ति को ही देता है, मेरा मानना है की भाग्य ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहियें कर्म ही भाग्य की रचना करते हैं, इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए, तभी भाग्य का साथ मिलता है। ... इसके विपरीत भाग्य बलवान है और कर्म अनुकूल नहीं है, तो भाग्य भी उसका अधिक साथ नहीं देता।
पर कभी कभी उल्टा होता है हमने बड़ों को कहते सुना है । 
अच्छे कर्मों का फल भी अच्छा होता है। लेकिन बहुधा ऐसा देखा गया है की हमें अपने सत्कर्मों का पूरा पूरा फल नहीं मिलता। किसी की मदद की तो बदनामी मिली
और कोई कुछ नहीं करता तब भी सब तारिफ़ करते है । 
भाग्य तो हर मानव का उसके साथ है पर कर्म से हम उसे निखार सकते है । 
भाग्य के भरोसे न रहकर कर्म करते रहना चाहिये कर्मों का फल मिलता है गीता में कर्मों को ही महत्व दिय है । 
भाग्य अच्छा और हम कर्म भी करते हैं तो सोने पर सुहागा हो जाता है । 
सिर्फ़ भाग्य के सहारे नहीं रह सकते ....कर्म ही सफलता की कूंजी है । 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

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[20/10, 9:06 am] 👑सुषमा शुक्ला: कर्म या भाग्य,,

*मेरी तकदीर को बदल देंगे मेरे बुलंद इरादे,,, मेरी किस्मत नही मोहताज मेरे हाथों की लकीरों की*

हाथों की लकीरों को दृढ़ बनाना है तो, कर्म करना ही होगा। कर्मवीर पुरुषार्थी व्यक्ति जीवन में आने वाली हर मुसीबत को सहजता से ले लेता है lऔर साहसपूर्व सामना करता है। कर्म के बिना भाग्य निरर्थक है जहां कर्म 80% है वहां भाग्य का रोल 20% हो सकता है ।
महत्व कर्म की, पुरुषार्थ की, मेहनत की है।

 भाग्यवादी लोग कर्म प्रधान नहीं होते,
सफलता कोसौ दूर रहती है। कमियों को ढूंढ ने स्थान पर भाग्य को दोष देते हैं। 

इतिहास में ऐसे अनगिनत, मनुष्यों की गाथाएं हैं,,,, जिन्होंने पुरुषार्थ के बल पर मेहनत के बल पर असाध्य को साध्य बना दिया🙂 
महाबली भीष्म पितामह ने महाभारत के युद्ध में ,,भगवान श्री कृष्ण को भी शस्त्र उठाने पर विवश कर दिया।।
 महात्मा गांधी ने सत्य अहिंसा के बल पे देश में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही अंग्रेजी दास्ता से मुक्ति दिलाई ।😆
  विजय प्राप्त की,,,
 यह चमत्कार पुरुषार्थ कर्म का प्रतिफल है। *जो इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है* 

यदि हम विश्व के अग्रणी देशों का इतिहास जानने का प्रयास करें तो यहां के नागरिक अधिक स्वावलंबी हैl भाग्य नहीं कर्म पर विश्वास रखते हैं। 
भौगोलिक दृष्टि से जापान बहुत छोटा देश है।

 पर विकास की दृष्टि से देखें तो तीव्रता से अग्रसर हुआ है वह अन्य विकासशील देशों के लिए अनुकरणीय है।

 अतः देश परिवार समाज को उन्नत बनाना है तो यह आवश्यक है की देश के नवयुवक पर कर्मठता पर विश्वास करें स्वावलंबी बने। आश्रित रहने की प्रवृत्ति ,, भाग्य भरोसे को त्यागे।।। 
 कठिनाइयों को दूर करने हेतु बल प्रदान करेगा। 

 *श्री कृष्ण ने कहा है कर्मण ये वाधिकारस्ते मां फलेशु कदाचन* कर्म का मार्ग पुरुषार्थ का मार्ग है धैर्य पूर्वक कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहना ही पुरुषार्थ दर्शाता है।

 कभी-कभी भाग्य भी स्वीकार कर लेना क्योंकि इस स्थिति में संतोष धैर्य का अनायास साथ मिल जाता है जो उन्नति का पथ प्रदरशक है।
 
 *कर्म जीवन का मुख्य विषय है फिर भले ही पकड़ नहीं आए पर हर कोई कर्म से पहचाना जाता है*

 प्रस्तुत करता सुषमा शुक्ल
[20/10, 9:43 am] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि काव्य मंच *
* गुरूवार - २०/१०/२०२१ 
*क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर र्निभर करता है या कर्मचारी पर *
विधा - लेख

जीवन में भाग्य का बहुत महत्व है मगर बिना पुरूषार्थ और परिश्रम के कुछ भी नहीं मिलता है ! भाग्य भरोसे बैठे रहने वाले का भाग्य भी हो जाता है !
जब भाग्य और पुरुषार्थ का मणीं काँचन योग मिलता है तो भाग्य देव भी प्रसन्न होते हैं !
हम अपने आसपास में देखते हैं कि कई बार भाग्य इन्सान को धोखा देता है मगर व्यक्ति अपने सम्यक पुरूषार्थ से अपने हाथों की लकीरों को बदल देता है और सफलता का राजपथ उसके कदमों के नीचे होता है !
 विश्व मंच पर भाग्य शब्द का जितना दुरूपयोग हुआ है उतना संम्भावत:
किसी ओर शब्द का नहीं ?भाग्य भरोसे बैठ वे जीवन संग्राम में अपराजित हो गये व आलस और अकर्मण्यता के बन्दी बना गये !उनका सारा तेज नष्ट हो गया ! 
हमारे अतीत ने हमारा वर्तमान बनाया है और वर्तमान हमारे भविष्य को बनायेगा ! अपने उत्थान पतन के हम स्वयं जिम्मेदार हैं ! बाहर की कोई भी अदृश्य शक्ति न हमें उठा सकती है ना गिरा सकती है !
  सभी सिद्धियां श्रम अधीन है,
श्रम से मत घबराओ !
श्रम की बूंदों का सिंघन कर ,
जीवन सफल बनाओ !

सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[20/10, 10:01 am] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: मंच अग्निशिखा 
विषय.. क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करता है या कर्म पर 
वो मनुज ही क्या, 
जो झुक जाये इस बात से, 
की मेरे हाथो की लकीरो में नहीं, 
सुख, ख़ुशी,, 
बस लिखा भर है तकलीफो में जीना, 
धिक्कार है अगर ये सोचकर 
हर गम क़ो गले लगा लो, 
उठो, लो कर्म रुपी हथियार, 
और नामुमकिन क़ो मुमकिन बना दो, 
कुछ भी नहीं जो बदला ना जा सके, 
क्या ही वे लकीरे वो खुद सवारी ना जा सके, 
उठा लो कलम लिख़ दो खुद अपनी किस्मत, 
क्यों मोहताज बनो की की हाथो की लकीरो में वो नहीं, 
जगा जूनून, जला मशाल कर्म की,. 
और काट दे पहाड़ नुमा मुसीबतो क़ो, 
की जो ताकत तुझमें है किसी औऱ में नहीं, 
बस हार मत मानना, भाग्य के भरोसे, 
नहीं, कभी नहीं, कर्म का दीपक जला 
रास्तो क़ो रौशनी से भर दे, 
उठ तू, लडख़ड़ाएगे कदम मगर 
जीवन क़ो उम्मीदों से भर दे 
@ishita singh ✍️
Shikshika sandila block
[20/10, 10:08 am] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा-मंच
20/10/2021 बुधवार
विषय- क्या व्यक्ति की सफलता कर्म पर निर्भर करती है या भाग्य पर।

व्यक्ति के जीवन में कर्म प्रधान है।गीता में भी श्री कृष्ण कहते हैं कि"जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान"।परन्तु मेरे विचार से भाग्य और कर्म व्यक्ति के लिए दोनों ही आवश्यक है।कई बार हम देखते हैं,व्यक्ति अथक प्रयास करता है पर फिर भी उसे असफ़लता है हाथ लगती है।और कभी-कभी थोड़े से प्रयास से ही सफ़लता प्राप्त हो जाती है।ऐसा क्यों होता है,कभी विचार किया?
         व्यक्ति के क्रियामान कर्म,उसके मरणो उपरांत संचित कर्म में परिवर्तित हो जाते हैं।और ये संचित कर्म व्यक्ति के वर्तमान जीवन में उसकी प्रारब्ध बन कर उसके सामने आते हैं।श्री रामचन्द्र तो भगवान थे,उन्हें राजपाट मिलने वाला था परंतु अचानक उन्हें वन प्रसाथान करना पड़ा।क्योंकि ये उनके प्रारब्ध के कर्म थे जो उनकी नियति बनकर उनके कर्म के आड़े आयी। व्यक्ति के कर्म ही उसके भाग्य की सफलता और असफलता को निर्धारित करते हैं। व्यक्ति की जैसी नियति होती है वैसी उसकी प्रवर्ति हो जाती है। अगर व्यक्ति के भाग्य में सफ़लता लिखी है तो उससे,उसके अनुसार कर्म हो जाते हैं।"करत-करत अभ्यास के जड़मति होए सुजान"।
अर्थात हमारे जैसे कर्म होंगे वैसा ही हमारा भाग्य होगा।जीवन में सफ़लता के लिए भाग्य,और सुनहरे भाग्य के लिए सद्कर्म आवश्यक है।
                       तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)
[20/10, 11:08 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺बुधवार =20/10/ 2021
🌺विषय _
क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करता है या कर्म पर
🌺 विधा -

बहुत से व्यक्ति सोचते हैं कि सफलता भाग्य पर निर्भर करती है और वे सफलता प्राप्त करने के लिए तरह तरह से भाग्योदय के उपाय करते हैं। कोई ताबीज पहनता है, कोई अंगूठी पहनता है, कोई मंदिर के चक्कर लगाता है, कोई मान्यता मानता है, कोई हवन पूजन करता है, कोई किसी विशेष साधु सन्यासी या विशेष देवता की पूजा करता है। 
पता नहीं कितनों को फल मिलता है कितनों को नहीं किंतु जिसको फल मिल जाता है, वह सोचता है कि भाग्य से ही मुझे यह फल प्राप्त हुआ है।
कुछ लोगों की धारणा है – 
"अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम दास मलूका कह गए सबके दाता राम।"
कोई कहता है– 
"जिसने चोंच दी है वह चुग्गा भी देगा।"
कुछ लोग सोचते हैं –
"भाग्यं फलति सर्वत्र कार्याणि न मनोरथै।"

वास्तविकता यह है कि आलसी लोग ही भाग्य पर अधिक भरोसा करते हैं –
"दैव दैव आलसी पुकारा"

किंतु सच यह है – आलस्यम हि जनानां महान दुर्गुण:।

वास्तविकता यह है कि भाग्य और पुरुषार्थ एक सिक्के के दो पहलू हैं अर्थात भाग्य भी तभी साथ देता है जब पुरुषार्थ किया जाता है अर्थात कर्म किया जाता है बाबा तुलसी दास ने भी कहा है–
 "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा"
एक चलती हुई चींटी हजारों किलोमीटर चली जाती है बैठा हुआ गरुड़ एक कदम भी आगे नहीं जा पाता।
दुनियां में सबको दिन के 24 घंटे और साल के 365 दिन ही मिलते है, किंतु उतने ही समय में आकाश की ऊंचाइयां छू लेते हैं और कुछ लोग मिट्टी में मिल जाते हैं। कुछ लोग तो अवनति के गर्त में गिर जाते हैं। 
कर्मठ व्यक्ति ही सदैव उन्नति के शिखर छूते हैं। भाग्यवादी सदैव पीछे रह जाते हैं।
सफलता कर्मवादी को ही मिलती है भाग्यवादी को नहीं। 
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[20/10, 11:46 am] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करता है या कर्म पर

 व्यक्ति की सफलता कर्म पर निर्भर करता है। जो व्यक्ति जीवन में दृढ़ निश्चय , मेहनत और लगन से काम करता है, भाग्य भी साथ देता है, और जो व्यक्ति कर्म नहीं करना चाहता ,हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है,ऐसे व्यक्तियों का साथ भाग्य भी नहीं देता ।गीता ने भी लिखा है कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, कर्म करो लेकिन फल की इच्छा मत करो। कर्म वह भी अच्छा कर्म। बुरा कर्म करने वालों का अंजाम भी बुरा होता है। हां कभी-कभी ऐसा होता है कि व्यक्ति कर्म तो को पूरी निष्ठा से करता है, लेकिन उसका फल उसे ठीक से नहीं मिलता ।इसका मतलब यह नहीं कि कर्म करना बंद कर दें। गीता का उपदेश भी यही है कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान ,जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान ,ये है गीता का ज्ञान। हम मानव है हमें अच्छा कर्म करना चाहिए और समाज और देश की रक्षा करनी चाहिए। कहते हैं कि भाग्य हाथ की लकीरों में होता है, पर भाग्य तो उनके भी होते हैं , जिनके हाथ नहीं होते।मेरे हिसाब से कर्म ही भाग्य का आधार होता है ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश
[20/10, 12:21 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: बुधवार =20/10/ 2021
विषय _क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करता है या कर्म पर
 विधा - लेख 

व्यक्ति की सफलता या असफलता कर्म पर ही निर्भर करती है। केवल भाग्य के सहारे दुनिया नहीं चल सकती। भाग्य चमकाने के लिए भी कर्म की आवश्यकता होती है। कई बार कर्म करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती तो हम निराश हो जाते हैं। हमको लगने लगता है कि भाग्य से ही सफलता मिलती है। लेकिन ऐसा नहीं है। कर्म कभी ना कभी अपना रंग दिखाता ही है और मनुष्य को सफलता दिलाता ही है। इस कारण कर्म को छोड़ कर के भाग्य के सहारे बैठे रहना ठीक नहीं। यदि आप कर्म करोगे आपका साथ भाग्य भी देगा और यदि भाग्य के सारे बैठे रहोगे और कर्म नहीं करोगे तो आप सफल नहीं हो सकते। जैसे बैठे हुए शेर के मुँह में अपने आप हिरन नहीं जाता। उसके लिए उसे कर्म करना पड़ता है। उत्कृष्ट कर्म से ही भाग्य उन्नत होता है। कृष्ण जी ने भी कहा है कि कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो। यदि कार्य करते रहोगे तो फल अपने आप मिल जाएगा। एक शिशु भी दूध तभी पी पाता है जब दूध खींचने का कर्म करता है अन्यथा दूध उसके मुँह में अपने आप नहीं जाता।
 इससे सिद्ध होता है की सारी सृष्टि कर्म आधारित है।
अच्छा काम करने में कई रुकावटें आती हैं लेकिन अंततः उसकी विजय होती है। इस कारण अच्छे कर्म करके उसे भाग्य के सहारे छोड़ देना चाहिए।

हम कर्म करते समय लक्ष्य का निर्धारण नहीं करते उसकी रूपरेखा नहीं बनाते, इसी कारण हम विफल होते हैं। और भाग्य को कोसते हैं। हमें पहले ही कहाँ जाना है? कैसे करना है? उससे कौन-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है? उससे क्या लाभ हानि है? इसके बारे में पहले ही रूपरेखा बनाने बना लेनी चाहिए। यदि ऐसा कर लिया जाए तो असफलता का मुँह ना के बराबर देखना पड़ सकता है। बीच की रुकावटों को पार कर जाना और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए डटे रहना ही सफलता की सीढ़ी है।

यदि आप असफलता से परेशान हो चुके हैं तो सफल व्यक्तियों की जीवनी को पढ़ सकते हैं। वे भी कई बार गिरकर ऊपर उठे हैं। उनको देखकर आपका आत्मविश्वास जगेगा और आप पूरी लगन से अपने कर्म की ओर अग्रसर हो जाएँगे। जिससे उन्नति आपके कदम चूमेगी।

वैष्णो खत्री वेदिका
[20/10, 12:35 pm] रवि शंकर कोलते क: बुधवार दिनांक २०/१०/२१
विधा**** लेख
 विषय*** #**क्या व्यक्ति की 
   सफलता उसके भाग्य 
       पर निर्भर है या 
           उसके कर्म पर ?***#
           
         मेरी राय ये है कि किसी व्यक्ति की सफलता उसके भाग्य और कर्म पर ही निर्भर करती है । जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए हमारे भगवान कृष्ण ने अपनी भगवतगीता में भी भाग्य और कर्म पर जोर दिया है । इसलिए अगर किसी व्यक्ति को आगे बढ़ना है तो केवल भाग्य के भरोसे पर नहीं रहना चाहिए उसे अपने कर्म कर्तव्य करते रहना चाहिए ।
अगर कर्म करने के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती है तो इसका अर्थ यही है कि उसके भाग्य में सफलता नहीं है ।
कभी ऐसा भी देखा गया है कि कर्म नहीं करने पर भी जीवन में किसी व्यक्ति को भरपूर मिल जाता है अपेक्षा से ज्यादा तो समझो कि उसका भाग्य प्रबल है । हमारे मराठी में एक कहावत है #**देगा हरी पलंगावरी**#. इसका अर्थ ये है कि , हे प्रभु मुझे पलंग पर बैठे बैठे सबकुछ दे ।
      ऐसे आलसी और निकम्मे इंसान को जीवन में कुछ नहीं मिलता । सफलता शारीरिक श्रम और बुद्धि की कसौटी पर मिलती है । मजदूर बेचारा रात दिन मेहनत करता फिर भी उसे कुछ नहीं मिलता दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल होता है ।
और एक पढ़ा लिखा इंसान करोड़ों रुपए कमाता है ।
       चोर उचक्के भी करोड़ों रुपए कमाते हैं मगर ऐसी संपत्ति को धर्म शास्त्र के अनुसार निषिद्ध धन कहा जाता है ।
        अंत में मैं यही कहूंगा कि व्यक्ति की सफलता उसके भाग्य और कर्म पर ही निर्भर करती है ।
भाग्य और कर्म एक दूसरे को पूरक है उन दोनों के बगैर हमें कुछ नहीं मिलता ।

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर ३०
[20/10, 12:55 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹 *नमन मंच* 🌹🙏
🙏🌹 *जय अम्बे* 🌹 *२०/१०/२१* 🌹🙏

 🙏🌹 *क्या व्यक्ति की सफलता उसके भाग्य पर निर्भर है या कर्म पर* 🌹🙏

*हम जैसे कर्म करेंगे वैसा ही हमारा बही खाता होगा और उसी के आधार पर हमें इस जन्म में संचित कर्म का फल प्राप्त होगा। इस तरह हमारा भाग्य भी कर्म से ही बनता है और भाग्य के मूल में भी कर्म ही होता है। भाग्य का प्रभाव मनुष्य में ही नहीं, सभी प्राणियों में देखा जा सकता है*।
            *ईश्वर कर्म के हिसाब से भाग्य बना देता है,पूर्व जन्मों में या पूर्व समय में हमने जो भी कर्म किये, उन्हीं सब का फल मिलकर तो भाग्य रूप में हमारे सामने आता है। भाग्य हमारे पूर्व कर्म संस्कारों का ही तो नाम है,और इनके बारे में एकमात्र सच्चाई यही है कि वह बीत चुके हैं। अब उन्हें बदला नहीं जा सकता। लेकिन अपने वर्तमान कर्म तो हम चुन ही सकते हैं। यह समझना कोई मुश्किल नहीं कि भूत पर वर्तमान हमेशा ही भारी रहेगा क्योंकि भूत तो जैसे का तैसा रहेगा लेकिन वर्तमान को हम अपनी इच्छा और अपनी हिम्मत से अपने अनुसार ढाल सकते हैं*।
              *हमारे पूर्व कर्म संस्कार जिन्हें हम भाग्य भी कह लेते हैं, मात्र परि​स्थितियों का निर्माण करते हैं। जैसे हमारे जन्म का देश-काल, घर-व्यापार, शरीर-स्वास्थ्य आदि हमारी इच्छा से नहीं मिलता लेकिन उन परिस्थितियों का हम कैसे मुकाबला करते हैं, वही हमारी नियति को निर्धारित करता है*।  
          *जीवन में अगर आपको कुछ पाना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। मंजिलें उन्हीं को मिलती है जो उसकी ओर कदम बढ़ाते हैं*।

             *इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपना कार्य करें, फल ‍की चिंता बाद में करें। किसान जब खेत में बीज बोता है तो उसे यह नहीं पता होता कि बारिश होगी या नहीं। जमीन में से बीज से अंकुर फूटेगा या नहीं। अगर पौधे आ भी गए तो उस पर फल आएंगे या नहीं। लेकिन किसान बीजों को जमीन बोता है और फसल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देता है*।

🙏🌹 *पद्माक्षि शुक्ल* 🌹🙏
[20/10, 1:36 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: क्या ब्यक्ति की सफलता भाग्यपर निर्भर करता है या कर्म पर:
ब्यक्ति की सफलता निम्नलिखित विषयों पर आधारित होती है:
रामायण में चौपाई है:
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो फल चाखा।
उक्त मानस की चौपाई से सिद्ध होता है कि ब्यक्ति का कर्म ही उसे सफलता के शिखर पर ले जाता है। हमारे समाज में ऐसे बहुत से उदाहरण है जो कर्म से सफलता की सीढ़ी पर चढे है।
उसमें
1- सर्व श्री डा अब्दुल कलाम : पूर्व राष्ट्रपति :
बचपन में अखबार बेचकर और फिर कर्म से वह राष्ट्रपति बने।
2-हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी:
बचपन में चाय बेचकर और कर्म से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुचे।
3- हमारे देश के स्वामी विवेकानंद जी :
   इन्होंने कर्म और साधना के रास्ते से देश और विदेश में आध्यात्म के शिखर पुरुष बने।
4- अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति एबराहम लिंकन:
एक छोटे परिवार में जन्म लेकर कर्म द्वारा वह अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति बने।
ऐसे अनेक उदाहरण है, श्रेष्ठ कर्म द्वारा सफलता की सीढ़ी पर शिखर तक पहुचे।
मनुष्य की सफलता के लिए भाग्य का श्रेय:
मनुष्य का भाग्य उसके प्रारब्ध से बनता है। प्रारब्ध बनाने के लिए फिर कर्म का सहारा लेना पढता है।
वैसे मनुष्य जीवन का उत्थान 80% कर्म पर और 20 % भाग्य पर निर्भर करता है।।
इसलिए गीता के अनुसार निष्काम कर्म योग ही मनुष्य को सफलता के शिखर पर पहुंचाता है।
द्वारा :
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[20/10, 1:58 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *लेख*
विषय:-- *क्या व्यक्ति की सफलता उसके भाग्य पर निर्भर है या उसके कर्म पर?*

मेरी अपनी राय है किसी मनुष्य की सफलता उसके कर्म पर निर्भर है भाग्य सहयोगी है। कर्म के अनुसार हस्त रेखा एवं भाग्य रेखा में परिवर्तन होते रहता है। 
अतः मूल रूप से कर्म की प्रधानता दी जानी चाहिए। गीता में भी एक अश्लोक है जिसे मैं प्रस्तुत कर रहा हूं *कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन कर्म करो लेकिन फल की इच्छा मत करो*। कर्म अच्छा करो फल अच्छा मिलेगा। बुरा कर्म करने वाले को अंजाम भी बुरा होता है। अंत में मैं यही कहना चाहूंगा हम मानव अच्छा कर्म करना चाहिए देश और समाज के लिए
अभी हमारे देश की स्थिति देखिए मोदी जी एक चाय बेचने वाला व्यक्ति देश दुनिया में प्रतिष्ठित नेता में गिने जाते हैं क्यों कि उनकी कर्म बोलता है साथ में भाग्य भी साथ दे रहा है। वहीं दूसरी ओर गांधी परिवार का कर्म से जनता विमुक्त होते जा रहे हैं। इस परिवार का कर्म का अंजाम मिल रहा है।
इसलिए गीता के अनुसार निष्काम कर्म योग ही मनुष्य को सफलता के शिखर पर पहुंचाता है।

विजयेन्द्र मोहन।
[20/10, 2:11 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक"क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करती है या कर्मचारी पर"

अधिक प्रतिशत जनता भारत की भाग्यवादी है । लेकिन हमारी प्राचीन काल की सभ्यता और धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि भारतीय कर्म बादिता पर अधिक विश्वास करते हैं और उसी को महत्व देते हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म किए जाओ फल की चिंता मत करो ।भाग्य के भरोसे तो एक निवाला भी नहीं मिलता 
कर्मवीर तो पहाड़ खोद कर भी पानी निकाल लेते हैं ।भाग्य भरोसे रहने वाले भूखे मरते देखे हैं ,और कर्म चारी वर्ग के कम शील जीवन में सफलता अवश्य प्राप्त करते हैं। अतः हम पूर्ण रूप से कह सकते हैं कि भाग्य के भरोसे ना रहकर हमें अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होगी।
वंदे वंदे वंदे मातरम कर्म योगी बनो जीवन में सफलता हासिल करो।

स्वरचित लेख
   रजनी अग्रवाल
   जोधपुर
[20/10, 2:14 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लेख )
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व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करती है या कर्म पर
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🌹मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस समाज में उसे मान मर्यादा के साथ अपना जीवन यापन करना पड़ता है। अपने मान सम्मान को बनाए रखना उसके अपने हाथ में है ।वह जितनी अधिक मेहनत करेगा, उसे उतनी अधिक सफलता मिलेगी ।यही सफलता उसे अपने आप को गौरवान्वित करती है। परिवार ,कुटुम्ब , समाज में उसका स्थान बनता है ।
  ‌‌ अपनी वाह वाही सुनना कौन पसंद नहीं करता । यह उसके मेहनत का फल है जो उसको मान सम्मान और स्वाभिमान भी दिलाता है ,जो कर्म करता है ,उसे मीठा फल मिलता ही है। घर, समाज, परिवार में उसका नाम होता है ।उसे अपने आप पर गर्व का अनुभव होता है ,जो स्वाभाविक भी है ।
         जो लोग भाग्य के भरोसे अपना जीवन व्यतीत करते हैं ,वे अपने जीवन में बहुत कम सफल हो पाते हैं ।भाग्य एवं परिश्रम में परिश्रम का पलड़ा भारी होता है ,जो उसे मान सम्मान के साथ आत्मविश्वास से भर देता है ।उन्नति की राह पर आगे ही आगे ले जाता है और सफलता के कदम चूमता है ,इसीलिए कर्म ही जीवन का आधार है।
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स्वरचित मौलिक रचना, डॉ .आशा‌लता नायडू . भिलाई.
छत्तीसगढ़ .
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[20/10, 4:22 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: आदरणीय मंच को नमन
आज का विषय कर्म या भाग्य 
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अर्जुन परात्पर ब्रह्म श्री कृष्ण के मित्र ।साथ साथ रहने के कारण उन्हें कृष्ण के उस स्वरूप का ज्ञान नहीं था, जिसके लिए कृष्ण ने अवतार लिया था। महाभारत के युद्ध में द्रोपदी के तिरस्कार का किस प्रकार से प्रतिकार हो, सके सभी लोग विचार कर रहे थे ।पांडवों में आक्रोश था। हमारी राजलक्ष्मी का तिरस्कार हुआ ।उसे नंगा करने का प्रयास हुआ ।राज मर्यादा का हनन होता रहा ,किसी ने रोकने का प्रयास नहीं किया। आज अवसर है उन्हें दंडित करने का। अपने बाबा बाबा संबंधियों आत्मीय जनों और परिवारी जनों को देखकर अर्जुन के मन में यह भाव आया क्या करेंगे हम ऐसा राज्य लेकर के जो खून से सना हुआ है ।श्री कृष्ण ने उसे बार-बार कहा" यह धर्म युद्ध है, हमें अन्याय को हराना है व्यक्ति को नहीं।" फिर भी, अर्जुन मोह बस कहने लगा -"मेरे हाथ से गांडीव छूटा जा रहा है, मेरा शरीर पसीने पसीने हो गया है, ऐसा लगता है कि मैं युद्ध नहीं कर पाऊंगा"।
तब कृष्ण ने कहा-"कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन"फल की इच्छा मत रखो कर्म करो कर्म नहीं करोगे तो इच्छित परिणाम नहीं मिलेगा।
अंततः अर्जुन को युद्ध करना पड़ा ।
परिणाम सामने था। अपना ही अन्यायी परिवार और सगे संबंधी पराजित हुए। युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ वे राजा बने।
रामचरितमानस में बाबा तुलसीदास ने भी लिखा है- "दैव दैव आलसी पुकारा।"
लक्ष्मण की यह युक्ति काम कर गई। राम ने समुद्र को अपने अग्निबाण की धमक दिखाया । उसने रामेश्वरम जा श्रीलंका जाने का रास्ता बताएं। बंदर भालू की सेना ने सेतु का निर्माण किया और घनघोर युद्ध के बाद रावण पराजित हुआ ।राम विजई हुए ।जानकी राम के पास आएंगे और अंत में उत्साह सभी के दिल में छा गया।यह
कर्म का ही परिणाम था। यदि राम समुद्र रास्ता दो मांगते रह जाते, तो वह अपनी वांछित परिणति को न प्राप्त कर पाते। इसीलिए बाबा तुलसीदास ने लिखा--"कर्म प्रधान विश्व करि राखा ।जो जस करें सो तस फल चाखा।।
स्पष्ट है फल श्रम के बाद ही प्राप्त होता है इसलिए सर्वत्र कर्म की महत्ता को स्वीकार किया गया है।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🌷🌷🌷🌷🌷
[20/10, 4:28 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय क्या व्यक्ति के सफलता भाग्य के ऊपर निर्भर करता है या कर्म के ऊपर

इस विषय से संबंधित जहां तक मेरा विचार है बिना बिना कर्म जीवन में सफलता नहीं मिलती है कर्म और भाग्य जब दोनों की कुंजी एक साथ ताला में लगती है तो सफलता का ताला खुलने लगता है इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर रही हूं।

किसी भी बैंक में जब हम लॉकर लेने जाते हैं तो हमें दो चाबी दी जाती हैं। एक चाबी बैंक में रहता है और दूसरी चाबी कस्टमर के पास रहता है जब भी लॉकर खोलना होता है जब तक दोनों चाभी एक साथ लॉक में नहीं लगाया जाता है तब तक लॉक खुलता नहीं है उसी प्रकार जीवन में मेहनत की चाभी मनुष्य के हाथ में है और भाग्य की चाबी भाग्य के पास है या हाथों की लकीरों के पास है या भगवान के पास है जब दोनों चाबी अर्थात वक्त के अनुसार परिश्रम रूपी चाबी नहीं लगाएंगे तो भाग्य रुपी चाबी से सफलता नहीं मिलेगी।
मेरी समझ के अनुसार बिना कर्म किए हुए सफलता क्या एक कप चाय भी नहीं मिल सकती चाय सामने रखी रहेगी उसे पीने के लिए आपको हाथों से मेहनत करना पड़ेगा बिना कर्म भाग्य नहीं खुलते गीता में कहा गया है कर्मण्ए वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचना।
कर्म योग की प्रधानता है कर्म योग से भाग्य योग की लकीरों को भी बदला जा सकता है।

कुमकुम वेद सेन
[20/10, 5:04 pm] 💃वंदना: व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करती है या कर्म पर।
कहते हैं भाग्य में जो लिखा हो वही मिलता है ना ज्यादा ना कम किंतु गीता में श्री कृष्ण जी ने कहा है कर्म किए जा फल की चिंता छोड़ भाग्य भी उसी के साथ है जो कर्म करता है। कर्म के बिना जीवन का कोई मोल नहीं कर्म ही सफलता की कुंजी है व्यक्ति का कर्म उसकी भाग्य रेखा बदल सकता है जो किसी ज्योतिषी के बताने पर किस्मत के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाता है वह वास्तव में बेठा ही रह जाता है और जो भाग्य के साथ में कर्म पर भी विश्वास करता हो वह सफलता की सीढ़ी बड़े ही आसानी से चड़ जाता है उदाहरण के तौर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र जी मोदी कहां एक चाय बेचने वाला नन्हा सा बालक अपार कठिनाइयों को झेलते हुए कर्मठता का पाठ पठन
करते रहे उनके हिम्मत और बुलंद हौसले के बल
पर आज वह राज योग में है उनकी मेहनत और
कर्म ने उनका भाग्य बदल दिया। व्यक्ति की सच्ची लगन उसकी तकदीर तो बदल सकती है।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश।
[20/10, 5:14 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: .वीना अचतानी 
विषय**क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य पर निर्भर करती है या कर्म पर 
 सकल पदार्थ है जग माहि
कर्महीन नर पावत नाहि।।।
        व्यक्ति की सफलता कर्म पर निर्भर करती है ।बिना कर्म के सफलता सम्भव नहीं ।यह प्रकृति का नियम है ।गीता में भी कहा गया है"कर्म करो फल की चिंता मत करो"जीवन की सफलता में भाग्य और कर्म दोनो का योग दान है।सफलता तभी प्राप्त होगी जब हम कर्म करेंगे ।भाग्य तो उसको सजाता संवारता है , भाग्य से कर्म को नहीं जीता जा सकता, लेकिन कर्म से भाग्य संवर जाता है। 
           कर्म और भाग्य एक दूसरे के पूरक हैं ।भाग्य कमज़ोर भी हो तो व्यक्ति अपने कर्म से पूरी तरह बदल सकता है ।भाग्य भी अच्छे बुरे कर्मों का फल माना जाता है ।कर्म से हम समय को बदल सकते हैं । भाग्य कर्म से ही जुड़ा है ।उचित समय पर किया गया कर्म ही सफलता प्रदान करता है ।भाग्य विधि का विधान है, कर्म हमारा अपना विधान है। समस्त जीव मात्र कर्म प्रधान है। आलसी होते हैं वे जो भाग्य पर निर्भर करते हैं ।
कर्म शीलता के भाव ही सफलता दिलाते हैं ।उत्कृष्ट कर्म ही मानव भाग्य जगाते हैं ।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[20/10, 6:16 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: विषय -
क्या व्यक्ति की सफलता भाग्य के ऊपर निर्भर करती है या कर्म पर।

जीवन में सफल वही होता है जो मेहनत करता है और कर्म करता है भाग्य के भरोसे नहीं बैठता ।संस्कृत में एक कहावत है "उद्यमेन ही सिध्यंति कार्याणि ना मनोरथै:" परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं इच्छा करने से नहीं। सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम ही एकमात्र मंत्र है। जो व्यक्ति आलस्य का जीवन व्यतीत करते हैं वे कभी सुख सुविधाओं का आनंद नहीं ले सकते।परिश्रम से ही हमें सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध होती है
यह ठीक है कि जीवन में भाग्य का बड़ा हाथ है। दुर्भाग्य के कारण संभव है कि मनुष्य के विकास और वैभव के दर्शन ना हो पर परिश्रम के बल पर वह अपनी जीविका के प्रश्न को हल कर सकता है ।कुछ लोगों का विचार है कि भाग्य के अनुसार ही मनुष्य सुख दुख भोगता है। दाने- दाने पर मोहर लगी हुई है। भगवान सब का ध्यान रखता है जिसने पैदा किया है वह खाना भी देगा पर ऐसा नहीं है। वेक्षलोग भूल जाते हैं कि भाग्य का निर्माण भी परिश्रम के द्वारा ही होता है । राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा है कि
"ब्रह्मा ने कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है 
उसने अपना सुख अपने ही भुजबल पाया है"
ईश्वर ने मुख के साथ हमें दो हाथ भी दिए हैं। इन हाथों से काम करके ही मनुष्य अपनी दरिद्रता को दूर कर सकता है। हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने वाला व्यक्ति आलसी होता है और जो अलसी होता है वह हमेशा गरीबी का जीवन जीता है ।मेहनत करके बंजर भूमि को भी शस्य श्यामला बनाया जा सकता है। असाध्य कार्य परिश्रम के बल पर संपन्न किए जा सकते हैं ।बुद्धिमान व्यक्ति कितना ही प्रतिभाशाली हो लेकिन उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता तभी मिलती है जब वे अपनी बुद्धि और प्रतिभा को परिश्रम की सान पर तेज करते है।
जिन लोगों को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त नहीं है उन्हें अपने परिश्रम के बल पर भरोसा रख कर कर्म में जुटना चाहिए सफलता उन्हें अवश्य मिलेगी।
भाग्य का हमारे जीवन में महत्व है लेकिन आलसी बनकर बैठे रहना तथा असफलता प्राप्त होने पर भाग्य को दोष देना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। परिश्रम के बल पर मनुष्य भाग्य की रेखाओं को बदल सकता है। परिश्रम सफलता की कुंजी है ।आलस्य हमेशा जीवन को जड़ बनाता है और आलसी व्यक्ति कभी अपने जीवन में प्रगति नहीं कर सकता ।आलसी हमेशा परावलंबी होता है। वह हमेशा पराधीन बनकर ही रहता है और भाग्य के भरोसे रह कर जीवन भर दुख भोगता रहता है ।अतः स्वाबलंबी बनिए मेहनत करिए और जीवन में खूब आगे बढिए। सफलता आपका इंतजार कर रही है।



आशा जाकड़
[20/10, 6:57 pm] सुरेन्द्र हरडे: आज का विषय* *व्यक्ति की* *सफलता भाग्य के ऊपर निर्भर करता है या कर्म के ऊपर*
     गीता में कहा है *कर्मण्येवाधिकारस्ते*मा फलेषु* कदाचन*कर्म करो लेकिन फल की आशा मत रखो,
लेकिन कर्म नहीं करेंगे तो भाग्य भी आपको साथ नहीं देगा किसी :!;ने कहा घर बैठे लेकिन कुछ काम नहीं करे कुछ कर्म नहीं करें तो भूखे रहने की नौबत आएंगे सही कहा है।
     एक किसान के चार बेटे थे लेकिन वह खेत में कोई काम नहीं करते थे जब किसान बूढ़ा हो गया तो उनको चिंता सताने लगी मेरी संतान तो कुछ काम नहीं करती आलसी है इन को कैसे सुधारा जाए उनको एक तरकीब सूची और चारों बेटों को बुलाया चारों बेटों को मुफ्त में खाने की आदत पड़ी हुई थी किसान ने कहा बेटा मेरा जाने का समय आ चुका है मुझे याद नहीं है मैंने खेत पर मेरे दादा ने एक घड़े में कुछ सोने के सिक्के रखे हुए हैं कुछ दिन के बाद किसान का स्वर्गवास हुआ। चारों बेटे आपस में मिले और उनको लगा कर का घड़े में सोने के सिक्के कहां होगे? इसलिए उन्होंने पूरा खेत जोत डाला लेकिन सोने के सिक्के नहीं मिले बारिश हुई बारिश होने के बाद गेहूं के बीज खेत मे बोऐ और गेहूं की फसल अच्छी आयी। सब बड़े खुश हुए चारों भाई ने अपने अपने हिस्से के गेहूं बांट लिये तब बेटो को क लगा यही सोना है जो पिताजी बोल रहे थे। सोना ही है सोने जैसे को पाकर खुश हुए। इसलिए जीवन में कर्म करो और भाग्य का सहारा मिलता रहता है कर्म करने वालों को भाग्य हमें सहारा देता है ईमानदारी की कमाई फलदाई होती है किसी को धोखा मत दो। उदाहरण के लिए भारतीय क्रिकेट के सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी यदि मेहनत नहीं करते क्रिकेट खेल में रुचि नहीं रखते तो इतने महान खिलाड़ी नहीं बन पाते उन्होंने तालीम की क्रिकेट की और एक ऊंचे मुकाम पर पहुंच गए। या फिर सचिन तेंदुलकर मेहनत करने से ही सफल खिलाड़ी बने या फिर धीरूभाई अंबानी मेहनत करने से कर्म करने से महान आदमी बने इसलिए कर्म करते रहो फल अपने आप मिल जाएगा भाग्य का सहारा मिलेगा यह निश्चित है। *मंजिले उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान हैं पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों में उड़ान होनी चाहिए*

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर
दिनांक :- २०/१०/२०२१/
[20/10, 7:02 pm] हेमा जैन 👩: आज का विषय :*-व्यक्ति की सफलता भाग्य के ऊपर निर्भर करता है या कर्म के ऊपर*


व्यक्ति की सफलता कर्म पर ही बहुत हद तक निर्भर करती है क्योंकि बिना काम किये बिना मेहनत के सिर्फ भाग्य के भरोसे तो नहीं बैठ सकते ऐसे तो हर व्यक्ति नकारा बन जायेगा जैसे की :-
1)अगर एक विद्यार्थी सोच ले कि पढ़ने से क्या फायदा भाग्य में जो लिखा है होना तो वही है तो ऐसे तो वह कभी सफलता नहीं प्राप्त नहीं कर सकता

2)अगर एक व्यापारी व्यापार के लिए मेहनत नहीं करेगा भाग्य के भरोसे रहेगा तो असफलता निश्चित है उसकी

ऐसे ही कर्म ही सब कुछ है बिना कर्म के भाग्य नहीं बदल सकता है भाग्य भरोसे रहना लगभग अंधविश्वास कि तरह है इसलिए गीता में भी कहा गया है
*"कर्म कर फल की चिंता मत कर "*


*हेमा जैन* 🙏
[20/10, 7:50 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;-मनुष्य की सफलता भाग्य पर निर्भर है या कर्म पर।।
विधा-;आलेख
दिनाँक;-20/10/2021
कर्मण्येवाधिकारस्ते ....।।
यह हमारे पवित्र ग्रन्थ ""गीता""का मूल मंत्र है।।हमें सदा कर्म करना चाहिए सफलता मिलना या न मिलना इस पर विचार करके अपने प्रयास को कम नहीं करना चाहिए।।सीख भी हम अगली पीढ़ी को यही दें कि कर्म करना हमारे हाथ मे है।।अच्छे भाव व लगन से किया गया कार्य हमें भले ही सफलता न दे परन्तु आत्म संतुष्टि अबश्य देता है।।भाग्य के भरोसे बैठना व कर्म न करना जीवन को अंधकार में डाल सकता है।।भाग्य भी उसी का साथ देता है जो कर्म करने से पीछे नहीं हटता।।
अतः मनुष्य की सफलता में यदि भाग्य व कर्म का योगदान देखा जाए तो भाग्य सिर्फ 15प्रतिशत ही होगा शेष 85 प्रतिशत तो कर्म ही प्रधान होता है।।
अतः यदि जीवन मे सफल होना है तो सद्मार्ग व सद्कर्म को ही अपनाना होगा।भाग्य या किस्मत के सहारे नहीं बैठना है।।
निहारिका झा।।
खैरागढ़ राज.(36गढ़ )
[20/10, 8:16 pm] चंदा 👏डांगी: $$ व्यक्ति की सफलता भाग्य के ऊपर निर्भर है या कर्म पर $$

बहुत सुंदर विषय है जितना लिखा जाए कम ही है और कम मे भी समझा सकते है । 
जिस तरह खाने की थाली आपके सामने परोसी हुई है ये आपका भाग्य है पर जब तक हाथ का उपयोग कर खाना खायेंगे नही या मुंह से चबाने का काम नहीं करेंगे तब तक पेट नही भरेगा यही कर्म है । तो आपका भाग्य कितना भी प्रबल हो कर्म का तड़का नही लगेगा आपकी कोई मनोकामना पूरी नही हो सकती । 
हाँ एक बात और कर्म का फल जरूरी नही की तुरंत मिल जाए पर मिलता जरूर है ।कर्म का फल ही भाग्य है ।

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश

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