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Akhil Bharti agnishikha Manch ke block per Aaj dinank 14 /10/2021 जिसको दिए गए चित्र पर रचनाकारों के रचनाएं पढ़ें अलका पांडे मुंबई





चित्र पर कविता 
हरित माँ की गोद 
१४/१०/२०२१

मां की गोद देती है आराम ।
प्रकृति की गोद में मिलता है आनंद ।।
वहां पर बसते हैं घनश्याम।
हरित वृक्ष और ऊंचे ऊंचे पर्वत ।।
कलकल बहती नदियां झरने ।
संत सभी हैं तलाश में ऐसी सुंदर जगह ।।
साधना और जप तपकरने के लिए ।
घर आंगन भी लगता सुंदर ।।
चबूतरे पर उगती है जब हरी हरी घास ।रंग बिरंगे फूलों वाले गमले सौंदर्य बढ़ाते हैं ।।
हर पौधा आकर्षन पैदा करता है ।
पेड़ों की डाली पर बैठे परिंदे कलरव रोकरते हैं ।।
घर के चबूतरे पर देव प्रतिमा स्थापित हैं ।
आंगन को देवालय बनाया हैं ।।
सुबह शाम नित्य पूजा करते ।
पौधों को लगाया हैं देख रेख करते ।।
ऑक्सीजन का भंडार भर दो ।
सब लोग अपने आप लेंगे ऑक्सीजन ।।
सुरभित तो होगा घर आँगन ।
पर्यावरण बचा लो प्रकृति नाचेगी  बन दुल्हन ।।
और सब को निरोगी काया देगी ।
 आंगन में सजाई है माता की प्रतिमा ।।
पत्थरों में भी जान डाली है ।
पूजा अर्चना नित्य करते भगवान को रिझा ते हैं ।।
देशवासियों की समाज की रक्षा करने की गुहार लगाते हैं ।
साथ में रंग बिरंगे पेड़ों पर पुष्प खिले हैं ।।
जो वातावरण को महका रहें हैं ।पर्यावरण बचा लो या हमें जीवन देता है ।।
हम सबको जरूरी ऑक्सीजन है ।
जो हमें वृक्षों से मिलती है ।।
ईश्वर को खुश करना है ।
तो वृक्ष लगाओ पर्यावरण बचाओ घर आंगन को महका लो।।

अलका पाण्डेय मुम्बई 
Alka Pande Mumbai
🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢








[14/10, 8:43 am] 👑सुषमा शुक्ला: चित्र पर आधारित कविता

 🌷🌷 पूजा आराधना की,,,,,
 मन की विरादना दूर की
🌹
पर्यावरण के दुलार में,
पहुंच गया अलग संसार में l

जिसके सर प्रकृति मां का हाथ है।
 दुआएं उसके साथ हैं।
 सुरक्षा का कवच है, लहराता हुआ ध्वज है।

श्री कृष्ण भी मां के आंचल में,
 अपने आप को धन्य समझते थे।
पेड़ की ठंडी छांव में,
 मस्त मुरली बजाते थे l
 हरित भू के आंचल के आगे,,,,
 सब हथियार बेकार थे।
 मन का संबल था,,
 मजबूती का बल था💐

आंचल की छांव में, 
नंद बाबा के गांव में।
प्रकृति के निसार में,,,
 हरित चुनरिया के संसार में।

पूजा के संसार में,,,
 मुरली की तान में,,
 यशोदा का मान 
था💐 
पेड़ के नीचे बैठ
कन्हैया का गान था।

 

भारत भूमि की हरित क्रांति,,,,,
 हिंदुस्तान का आंचल है,,
 जो हमारी सुरक्षा की 
कवच और ढाल ।

 मातृभूमि के आंचल की लाज निभाना।
 समय आने पर इस पर कुर्बान हो जाना।

पेड़ों की रक्षा करना,,,
 और प्राण वायु को बचाना।
प्रकृति के निकट रहना,
 और धरती मां को हरित चुनरिया ओढ़ाना

 जय हिंद,
 जयभारत ,

स्वरचित सुषमा शुक्ला इंदौर🙏
[14/10, 8:59 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: गुरुवार 14//10/ 2021
विषय- चित्र पर कविता माता दुर्गा (धनुषाकार वर्ण पिरामिड)

माँ
दुर्गा
सृष्टि की
आद्य शक्ति
इन्हीं की शक्ति 
हो सृष्टि उत्पत्ति, 
ब्रह्मा, विष्णु व शम्भू
शक्ति से शक्तिमान 
दुष्ट-संहारक।  
उत्साह-ऊर्जा
का संचार
करती
माता
श्री




माँ
भक्ति
प्रभाव
से मिलती
सुख व शांति, 
शक्ति और विद्या 
जाग्रत देव होते 
हनुमान, कालिका 
हुई है उत्पत्ति
पापी विनाश
धर्म रक्षा
करती
काली 
माँ
 
वैष्णो खत्री वेदिका
[14/10, 9:58 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: गुरुवार 14//10/ 2021
विषय- चित्र पर कविता
हर चित्र कुछ कहता है 

मित्रो एक बात लो जान
प्रकृति ही स्वयं एक भगवान।

प्रकृति बनाए, प्रकृति बिगाड़े
प्रकृति रचे संसार नया।
प्रकृति गलाए, प्रकृति जलाए
प्रकृति गढ़े आधार नया।

प्रकृति की शक्ति के बाहर
कुछ भी नहीं जहान।
प्रकृति ही स्वयं एक भगवान।

ब्रह्मा विष्णु महेश देव गण
सारे नाम उसी के हैं।
दुर्गा काली लक्ष्मी वाणी
सारे धाम उसी के हैं।

प्रकृति कुपित हो जाती जब भी
कहीं न मिलता त्राण।
प्रकृति ही स्वयं एक भगवान।

बाढ़, सुनामी, भूमिकंप, 
दावानल जब जब होते हैं।
दुनिया भर के सारे ईश्वर
अपनी शक्ति खोते हैं।

तब सारे बौने हो जाते
लगते नहीं महान।
प्रकृति ही स्वयं एक भगवान।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड,
 कोलकाता
[14/10, 10:45 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: चित्र पर आधारित कविता
प्रकृति ईश्वर का अनमोल वरदान है।
हमारे जीवन का मुख्य आधार है।
हमें प्राणवायु, जल, खाद सभी
 को पूरा करती है।
प्रकृति के बिना जीने की
 कल्पना नामुमकिन है।
हम सभी को कर्तव्य है प्रकृति 
को समझें और बचाएं प्रकृति है तो हम हैं।
आओ चले हम सब प्रकृति के 
लिए पूजा अर्चना करें।
लोभ,मोह, स्वार्थ और द्वेष त्याग कर
 चलो प्रकृति वंदना करें।

विजयेन्द्र मोहन।
[14/10, 11:04 am] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी,  
चित्र पर आधारित रचना, 
प्रकृति में प्रतिबिम्ब है उसका 
इस धरती पर नीलाम्बर आकाश तले
एक बाग के फूल हैं सारे
एक माला के मोती
बड़ी दूर से आकर बैठे
चरणों में माता 
सितारों दीप जलाओ
दिशाओं रंग बरसाओ
करूँ मैं वन्दन
मेरा जीवन अर्पण
बिराजो मेरे आँगन मैया
वृक्ष तले बनी फुलवारी 
चहुँ दिशा हरियाली छाई
फूले हरित लता तरूपल्लव
सुखद सुरम्य चलती
रसभीनी मन्द सुगन्ध समीर 
अभिराम छवि छायी 
शोभित है माता दुलारी
शोभा वर्णी न जाई
चातक मयूर पपीहा बोले
माता की महिमा बड़ी निराली।।।।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[14/10, 11:22 am] रजनी अग्रवाल जोधपुर: चित्र आधारित कविता

1.जन-जन उतारे मां , तेरी आरती ,
 बड़ी समस्या से उबरे हैं, 
 मां तू भी जानती , 
 हर मन में करती ,
है तू हरित क्रांति , 
हम उतारे तेरी आरती , 
तू ही सब के जीवन को है तारती ,
 जन जन,,,,,

 2.हम तेरे बालक अज्ञानी,
तू सब कुछ जानती, तेरी शरण में खड़ा हर भारती, 
धूप -दीप नैवेद्य तुझ पर वारती,
जीवन के कठिन समय में मां !
 मैं तुझे ही पुकारती,
तू ही शरणागत की रक्षा करती,
जन जन,,,,

स्वरचित गीत
 रजनी अग्रवाल
 जोधपुर
[14/10, 12:22 pm] चंदा 👏डांगी: $$ चित्र आधारित रचना $$ $$ कहाँ गए वन $$

जंगल का नहीं नामोनिशान 
गमले मे आ गए हम 
काट दिए सारे बड़े बड़े पेड़ 
बसा दिए पत्थरों के जंगल 
देवी देवता भी रहते थे 
गहरी गुफाओं में कभी 
देखो आज जमीन पर आ गए 
कब तक होता रहेगा 
ऐसे ही विनाश 
करते रहोगे जंगलों का नाश ऐसे ही 
जीवन सभी का है प्रकृति की देन 
दूर प्रकृति से रहना 
पड़ गया था भारी 
जब आयी कोरोना बिमारी
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाओ भाई
सांसे हो रही है कम 
जंगल का महत्व जानो तुम 
धन दौलत बचा भी लोगे 
क्या कर लोगो 
जब अपनी संतान को
साफ पानी और शुद्ध वातावरण 
नही दे पाओगे 
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[14/10, 12:43 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: जय माँ दुर्गा जी ( चित्र पर आधारित कविता) ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
( विधा - सायली) 
हे
माँ दुर्गे
तुझको मेरा नमन
चाहिए तेरा
आशीष...... 1
मुझे  
बस केवल
तेरा ही सहारा
इस जग
में......... 2
तुम
दुष्टों की
संहारक हो माँ
शक्ति रुपा
रणचंडी....... 3
आज
भी वही
दशा है यहाँ
बढ़ रहे
अत्याचार........ 4
बढ़
रहा पाप
आज धरा पर
कराह रही
मानवता........... 5
कोई
नहीं आज 
दिख रहा यहाँ
जो उद्धार
करे... ..... 6
अब
तो आओ
माँ कृपा करो
अपने भक्तों
पर........ 7
दो
आर्शीवाद हमें
दो शक्ति हमें
लड़ने की
उनसे........ 8
हमें
करो शक्तिशाली
सामर्थ्य लड़ने की
परास्त करें
उनको....... 9
तूं
है आराध्य
है शक्ति हमारी
हम सबकी
रक्षक....... 10
[14/10, 12:57 pm] वीना अडवानी 👩: कण-कण में भगवान समाए
प्रकृति भी इस कण में आए
पत्थर हो या पेड़ पौधे सब
देखो भगवान चहू ओर पाए।।

देखो यही पेड़ पौधे हमें 
मात-पिता जैसे छाया दे पाए
जैसे मात-पिता खाद्य देते
वैसे पेड़ हम पर फल बरसाए।।

ममता सुकून की नींद भी देते
जो पेड़ो की छांव में सो जाए
पूजे जो प्रकृति को हर दम
वही तो मानव सच्चा कहलाए।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*****************
[14/10, 1:41 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
14/10/2021 गुरुवार
विषय-चित्राधारित रचना

कोई जगह नहीं है खाली,
प्रभु व्यापक डाली-डाली।

सकल संसार उपवन का,
प्रभु तू ही तो है एक माली।

खाली हाथ कभी न लौटा,
तेरे दर पर आया सवाली।

हरा-भरा ये बाग प्रभु का,
प्रकृति की छटा निराली।

पत्थरों को भी पूजा जाता,
कहीं शिव तो कहीं शेरोवाली।

वन-उपवन की रक्षा करना,
बात कही सौ टको वाली।
                         तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)
[14/10, 1:49 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: चित्र आधारित कविता

1.जन-जन उतारे मां , तेरी आरती ,
 बड़ी समस्या से उबरे हैं, 
 मां तू भी जानती , 
 हर मन में करती ,
है तू हरित क्रांति , 
हम उतारे तेरी आरती , 
तू ही सब के जीवन को है तारती ,
 जन जन,,,,,

 2.हम तेरे बालक अज्ञानी,
तू सब कुछ जानती, तेरी शरण में खड़ा हर भारती, 
धूप -दीप नैवेद्य तुझ पर वारती,
जीवन के कठिन समय में मां !
 मैं तुझे ही पुकारती,
तू ही शरणागत की रक्षा करती,
जन जन,,,,

स्वरचित गीत
 रजनी अग्रवाल
 जोधपुर
[14/10, 2:15 pm] Anita 👅झा: चित्र आधारित रचना 
*उपवन शाला* 
घर के अंदर सजी ये सुंदर उपवन शाला है 
जादू का ये खेल निराला सबके मनको भाता है 
कलकल करता झरना बहता ठंडा इसका पानी हैं 
लाईट की रंगिनियों से सबके मन को भाता है 
घर के अंदर सजी ये सुंदर उपवन शाला है 
भले बुरे का भेद बताती जादू का ये खेल दिखाती है 
हर पत्थर मूरत को भगवान बनाती है 
नीली पीली टक्कर खाए लाल हरी को ख़ूब जिताते है 
घर के अंदर सजी ये सुंदर उपवन शाला है 
हर घर गमलों में बहार बन छाये बोनसाई बन फल फूल उगाये 
लताओं से घिर ये गीत सुनाये 
पशु पक्षी की आवाज़ निकाले 
घर के अंदर सजी ये सुंदर उपवन शाला है 
बच्चों बूढ़ों को ख़ूब लुभायें 
नित जीवन नव राग सुनायें 
मनिप्लांट से धन घर भर जाये 
रोते को ख़ूब हँसायें 
घर के अंदर सजी ये सुंदर उपवन शाला है 
अनिता शरद झा रायपुर
[14/10, 2:24 pm] रवि शंकर कोलते क: गुरुवार***१४/१०/२१
 विधा***कविता
 विषय#**चित्राधारित रचना**#
                  ^^^^^^^^^^

घरके आंगनमें देवालय अति सुंदर है ।
जिसमें विराजमान श्रीभोले शंकर है।।
चोरों तरफ छाई है प्यारी हरियाली ।
प्रकृति को सजाते ईश रुपी कंकर है ।।१

हमारी यह प्रकृति ही ईश का रूप है ।
यह देती हमें जल पवन छांव धूप है ।।
न छेडों इसे भूल कर भी तुम कभी ।
वरना ये जीवन बन जाता कुरूप है ।।‌२

संत साधु तप साधना करें तपोवन में ।
सुंदर हरे- भरे इस घने जंगल बन में ।।
पशु पक्षी चहकते बहते झरने नदियां ।
मिले शांति मनको शांत वातावरण में ।।३

मन मंदिर में अपने ईश्वर को बसाइए ।
श्रद्धा भक्ति के फूलों से सदा सजाइए ।।
अच्छे विचार ही मन की हरियाली है ।
जीवन प्रकृति को रख हरित बचाइए।। ४

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[14/10, 3:04 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
*********
 अग्निशिखा मंच
***********
दिन -गुरुवार 
दिनांक- 14/10 /2021 
चित्र आधारित रचना 

छोटी सी सजी ये बगिया मन को बहुत लुभा रही।
हरी-भरी हरियाली पास अपने बुला रही।
इसमें रखे पत्थरों में भी जान हैं। 
आज भी प्रकृति पसंद इंसान है ।
कहीं सफेद कहीं पीले फूलों से सज रहा उपवन ।
यूं लगता जैसे किसी साधक का हो मन ।
ऐसा ही हरा -भरा हमें संसार चाहिए।
इसी तरह से फैला आपस में प्यार चाहिए ।
छोटी हो या बड़ी,ऐसी ही दुनिया में भगवान आते हैं ।
ऐसी ही जगह भोलेनाथ अपना आसन लगाते हैं।
सरोवर किनारे सफेद पत्थर में बैठे हैं भोलेनाथ ।
लग रहा हिमालय पहुंच गए हम सभी साथ। 

रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश
[14/10, 3:07 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: ।देवी जगराता गीत ।
आज माता का घर में,
भक्तों का जगराता है।
माता घर में आ जायेंगी,
भक्तों ने जोड़ा नाता है।।
भक्तों..................... 1 
इस जगराता में भक्त जन,
अपनी भेट उसे चढायेगे।
माता  सबको आशीश देगी,
सब भक्त प्रसन्न हो जायेगे।।
भक्तो....................... 2 
इस जगराते हम भक्त सभी,
माता को चुनरी चढायेगे।
माता के चरण में जाकर,
अपनी हाजिरी को लगायेगें।।
भक्तो........................ 3 
माता का सजे दरबार में,
माता जी को भोग लगायेंगे।
माता के इस जगराते आकर,
माता की भक्ति सब पायेंगे।।
भक्तो.......................... 4
मां अपनी बाल्कनी में आई, 
सब पूजा करके सुख पायेंगे। 
रोली चंदन का टीका लगाके, 
माताजी से आशीष हम पायेंगे।। 
भक्तो.......................... 5
माता जी हरियाली में विराजी, 
सब के कष्ट मां दूर कर देगी। 
चलो चले उनके चरणों मे, 
हम  माता जी को रिझायगे।। 
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[14/10, 3:36 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: चित्र पर आधारित रचना 

यह हमारा प्यारा भारत देश है ,
पेड़ पौधों में भगवान का वास है ,
पत्थरों में भी यहां भगवान हैं ,
हम सबका यह अटूट विश्वास है।

 वृक्ष हमारे जीवन का आधार है,
प्रकृति का जीवन में स्थान खास है,
 सदियों से मानव और प्रकृति का ,
  सदा चोली और दामन का साथ है।

  वृक्ष जंगल को कभी ना उजाड़ो,
 वृक्ष बिना न सावन न हरियाली है,
   इनसे ही बच्चों की किलकारी है,
   वृक्षों से ही जीवन में खुशहाली है।


 श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश
[14/10, 3:38 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन🙏

विधा *चित्रपर आधारित रचना*
हे मानव कितना है ,अद्भभुत संसार प्रकृति ने दिया अनमोल उपहार हरे हरे से पत्तियो पेडो लदा है संसार पशु-पक्षियों रहते वनों में मत कर इनका संहार।१।

कलकल बहती नदियां झरने
चहकते पक्षियों कोयल की मधुर आवाज़ संतों महात्माओं की है 
तपोभूमि यहां पत्थरों में है प्राण।

मानव तू मत कर प्रकृति का दोहन नहीं तो पस्तावा आयेगा
कर हरी भरी सुबह शाम यहां
पुजे जाते अल्लाह भगवान।।३।।

यहा पर रंग-बिरंगे फूलों आते हैं
यही झरने है उंचे उंचे पेड़ों पर
हिमालय जैसे शीतल पर्वत 
पेड़ों से मिलती है वनसंपदा।।४।।

वृक्षों लगाने से मिलेगा नैसर्गिक
ऑक्सीजन ईश्वर की आराधना 
करना है मत कर पेड़ों का दोहन
यही है ऋषि मुनियों आवासन।५।

सुरेंद्र हरड़े 
नागपुर
दिनांक :- १४/१०/२०२१
[14/10, 3:53 pm] 😇ब्रीज किशोर: चित्र आधारित कविता
******************
आओ हम प्रकृति से ताल मेल बिठाये प्रकृति बचाये।
प्रकृति हमारा जीवन दाता
है ।
पेड़ पौधों से हमे आक्सीजन भी मिलताहै।
हमारे वेद शास्त्र भी कहते है
पेड़ लगाने से पुण्य बहुत मिलता है।
चिडिय़ा कबुतर और तरह तहर के पक्षी,
पेड़ पर बिश्राम करते है।
सुरज से तपे हुए पथिक पेड़़ की छाया मे बिश्राम पाते है।
फलदार बृक्ष है तो फल खाँ कर भूख भी मिटाते है।
हर चिज नश्वँर. हैएक प्रकृति महान है।
प्रकृति के आगे सब छोटे है प्रकृति ही महान है।
सब बेकार प्रकृति है महान है 
थंथंकभी सूखा कभी बाढ़ यहसब अक्समात होते है
जीवन के फल सफा है प्रकृती बलवान है उसके आगे.मनुष्य लाचार है।
प्रकति के साथ चल कर सुखमय जीवन जिया जासकता है।
नदी पहाड़ सबसे छेड छाड ।बन्द किया जायँ इस प्रकार ताल मेल बिठा कर सुख से
रहा जायँ।
बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ भानुजा ,गोरखपुर, यूपी।
[14/10, 3:58 pm] Anshu Tiwari Patna: प्रकृति है मां समान 
मां है प्रकृति समान
 दोनों ही माएं हैं  
 रखती बच्चों को 
छत्रछाया में अपने 
करती उनसे ढेरों प्यार।
 हर तरह से ध्यान है रखती
 कभी-कभी दंड भी देती
 करते बच्चे जब भी नादानी
 प्यारे बच्चों ना करो नादानी
 प्रकृति मां को समझो
 ध्यान रखो और प्यार करो उनसे
 नहीं तो जीना भी हो जाएगा मुश्किल
 महामारी ने यह तो हमें सिखा दिया।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना
[14/10, 4:10 pm] 💃rani: अग्निशिखा मंच
 विषय--चित्र पर आधारित
 विधा--- कविता
 दिनांक---14-10-2021

 ईश्वर ने भी कितने सुंदर नज़ारे बनाए हैं,
 कहीं पेड़ पौधे, झरने कहीं पहाड़ सजाएं हैं ।
प्रकृति का एक छोटा सा नज़ारा
 उपवन में नजर आ रहा,
 किसी घर की बालकोनी की,
 शोभा बढ़ा रहा ।
पास में ईश का आसन सजाया है,
 इक मूर्ति को उस पर बिठाया है ।
घनी छाया तले ईश हैं विराजे ,
 रंग-बिरंगे पत्थर उपवन को सुंदर बनाते ।
 हमें प्रकृति की महिमा समझाते
 प्रकृति है तो हम हैं, प्रकृति है तो कल है ।
हमें इसे सदा सहेज कर है रखना,
 जीने को चाहिए ऑक्सीजन,
 तो पेड़ों को जिंदा है रखना ।
फल फूल सभी हमें मुफ्त में मिलते,
प्रकृति की सुंदरता देख मन भी खिलते ।
उस ईश्वर का शुक्रिया हमको सदा है करना,
 प्राणवायु हमें जिसने मुफ्त में दी है।
 इस प्रकृति से ही तो 'रानी' अपनी,
 खुशहाल जिंदगी है ।

                  रानी नारंग
[14/10, 5:08 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ( चित्र पर आधारित)
*******************

वन उपवन सिमट कर गमलों में आ गए ।  

प्रकृति को विस्तार चाहिए हरीतिमा को चाहिए जमीन ।      

मानव मन तो डूबा अपने स्वास्थ्य में निज की चिंता में बन बैठे हम स्वार्थी ।   

जंगलों को काट काट कर कंक्रीट के जंगल खड़े किए।       

प्राण वायु की अनिवार्यता भी हम समझ सकते नहीं ।            

पेडों को कर नष्ट अपने जीवन का कर रहे हैं खुद ही हम अंत ।     

जीवों में श्रेष्ठ हम पर श्रेष्ठता बची नहीं खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी हम चला रहे।  

गर समय रहते न संभले तो , न संभल पाएंगे नअपनों को संभालपाएंगे।          

जाग जा हे मानव संभल जा जरा अपना न सही आने वाली पीढ़ी की कर चिंता।
********************
स्वरचित व मौलिक रचना
डाॅ . आशालता नायडू .
भिलाई. छत्तीसगढ़ .
*********************
[14/10, 5:22 pm] रानी अग्रवाल: १४_१०_२०२१. गुरुवार।
चित्र पर कविता।
शीर्षक_हमारी श्रद्धा।
बात अलग है भारत के भक्तों की,
जो पूजा करते प्रकृति _ तत्वों की
भूमि पूजी जाती कहके धरती मां
पूजते सूर्य चांद तारे गगन के,
नदियों का जल पूजा जाता,
अग्निदेव पूजे जाते हवन में,
पूजे पवन पुत्र हनुमान में पवन।
बेल_ पत्ते, वृक्ष,फल_ फूल,
सभी हमारे अर्चन के मूल,
पाषाण का भी हो पूजन,
श्रद्धावत हो करते नमन,
सागर से निकले सीप_मोती,
उनकी भी यहां पूजा होती,
यहां तो विराजे हैं शिवशंकर,
फिर तो कांटा लगे न कंकर,
श्रद्धा अंध श्रद्धा का न कोई प्रश्न
करनेदो पूजन जैसा जिसका मन। 
प्रकृति पे निर्भर हमारा जीवन,
हमारा कर्तव्य करें सरंक्षण,
ना करें जल प्रदूषण,
खूब करें वृक्षारोपण,
जिससे हरे रहें वन,
पावन रहे पवन,
रम्य हों धरती गगन,
हम पर कुदरत की मेहरबानी है,
इससे ही जीवन"कहती "रानी" है।
स्वरचित मौलिक रचना___
रानी अग्रवाल,मुंबई,१४.१०.२१.
[14/10, 5:29 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: मन में विश्वास हो
श्रद्धा और भक्ति हो
दिल मैं दया और ममता हो
भगवान की मूर्ति जरूरी नहीं
पत्थर में भी भगवान दिखते हैं
उन्हें भी हम भगवान मानकर पूजते हैं
जिस रूप में हम देखेंगे
उसी रूप में हमें दिखेंगे
मन मे में बस आस्था होनी है
पत्थर में भी भगवान प्रकट होते हैं
हमारे आस्था कबूल करते हैं
हमे कहीं न कही‌ से देखते हैं
पत्थर में मेरे स्वरूप को की पूजा हो रही‌ है
भगवान ये मानते हैं
अपना आशीर्वाद हमें जरूर दें जाते हैं
क्योंकि पत्थर मैं भी भगवान बस्ते है
 यही मन में विश्वास रखना है
यदी भगवान को अपने पास ही पाना है🙏
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़
[14/10, 5:42 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय_ चित्र आधारित रचना
विधा_ कविता
शीर्षक_ *प्रकृति से प्यार*

       
सजा है दरबार प्रभु का आँगन में,
कर लो दर्शन ईश प्रभु का उपवन 
जान लो तुम , पहचान लो तुम,
प्रकृति का रुप स्वरूप है निराकार आकार ,
बसता है हरियाली मैं प्रभु का वास,
प्रकृति ही ईश्वर की कृति ,
विराजते है प्रभु हर पेड़ पौधे, हर डाली डाली,
करे हम प्रण हम और तुम, 
पेड़ों की रक्षा करना , प्राण वायु को बचाना,
जहां होती हरियाली, वहीं होती प्रभु की खुशहाली ,
मानव को मिलती असीम सुख शान्ति 
यही देती हमे जल वायु, फल फूल
होता हर मानव का मन आनंदित
घनी हरितिमा प्रकृति के क्रोध का करती शमन, 
पशु पक्षी, मानव जीवन हो जाता चमन,
यह भारत देश हमारा, 
आस्था , विश्वास सनातन धर्म हमारा,
जहां हर कंकर कहलाता, शिव शंकर, 
करो प्रकृति से प्यार आए जीवन में बहार।
धन्यवाद 🙏
 सुनीता अग्रवाल इंदौर 🙏🙏
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
[14/10, 6:40 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक;-14/10/2021
🥦🥦🥦🥦
होती प्रकृति सदा वंदनीय
इसके कण कण में हैं शंकर
देव सदृश्य हमेशा लगती 
माँ सम प्यारसदा यह देती 
इसके होते रूप निराले
बाग ,बगीचे नदियां झरने
हरित नीड़ में लगे सुहावन
मन को है यह हर्षाती।
पूर्व काल मे बाग बगीचे 
और वनों में दिखती शोभा
आज समय के सँग बदली है
इसकी छटा लगे निराली
बढ़ती आबादी के संग
कमी हो गयी जगह की 
गमलों में है सजी वाटिका
है यह प्रकृति की इक़ लीला
इसके कण कण में हैं ईश्वर 
हमको इसे संजोना है
क्षरित हुई ग़र यह प्रकृति
खत्म समझना सृष्टि सारी
करना है संकल्प हमें यह
बचा लें हम इस प्रकृति को
और बचा लें अपना जीवन।।
निहारिका झा
खैरागढ राज.(36 गढ़ )
[14/10, 6:42 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: चित्र पर आधारित रचना

घर में सजा छोटा सा उपवन 
हरियाली का हुआ आगमन 
फूल पेड़ पौधे मुस्कुराने लगे 
पत्थरों में भगवान दिखने लगे।

प्रकृति का हरियाला संसार 
दिख रहा है,मधुर मधुर प्यार 
शिवजी भी दौड़े चले आए हैं 
गले पुष्पहार,बेलपत्र चढ़ाए हैं।

वृक्षों से सजता है, वन उपवन
हरे हरे पात लेकर आए सावन 
पेड़ हैं आधार,होवे वर्षा घनघोर
खेत खलियान हंसे, होकर विभोर।

पेड़ बचाओ,आरी कुल्हाड़ी फेंक दो 
वृक्षों को सहेजो,कभी ना काटने दो
चहकते पंछियों का बसेरा ना उजाडो़
ऑक्सीजन स्त्रोत,पीपल बरगद लगाओ।

डॉक्टर अंजुल कंसल" कनुप्रिया"
14-10-21



[14/10, 11:01 pm] Alka Pandey 1: प्रकृति

प्रकृति को छेड़ना इंसान को भारी पड़ा कितना   प्रलय को आप  दावत दे गई यह मानवीय मनसा

सीना धरती का छलनी कर दिया हरे वृक्ष भी काटे
प्रकृति को छेड़ना इंसान को भारी पड़ा कितना

शहर यह इट कंकर पत्थरों का रह गया बाकी
हृदाय में पड़ गए पत्थर कोई एहसास ना बाकी

लगाई आग जंगलों में पशुओं का आशियां तोड़ा
उजाड़ी कोंख धरती की छीन ली हरित कला सारी

सहन वह भी करे कब तक बन गई वो प्रलयकारी 
बवंडर आपदाओं का विनाशक बन गई भारी

विलुप्त होती वनस्पतियां तोभैया अब समझ भी लो 
जीवन अंश है प्रकृति सहजो जल और वृक्षों को

शुद्ध पर्यावरण रखो शुद्ध पर्यावरण रखो
प्रकृति को छेड़ना इंसान को भारी पड़ा कितना

वंदना रमेश चंद्र शर्मा 
देवास मध्य प्रदेश जिला
[14/10, 11:02 pm] Alka Pandey 1: पत्थर पूजे क्यों भला,
मन ही ईश्वर मान।
पूजो तो माँ बाप को,
बसते निज ही धाम।

प्रेमी भाषा जो पढ़े,
हृदय ईश है वास।
पत्थर पूजन क्यों चले,
कर कर अंधविश्वास।

पाथर से पाथर बना,
मन्दिर बना न कोय।
जो मानस मन्दिर बना,
हिया उजारा होय।

हरियाली पत्थर रहे,
या पत्थर हरे होय।
प्रकृति में नव रूप है,
मानव समझे जोय।

धाम की क्या बात हो,
छोटा बड़ सब सोय।
हरियाली चहुओर हो,
आभा जग की होय।

प्रकृति ईश्वर भयी, 
ईश प्रकृति होय।
जय बोलो जोहार की,
तरु खुशहाली बोय।


    बुद्धि प्रकाश महावर 'मन'
        दौसा राजस्थान

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