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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 19 2021 को लघु कथा लेखन में अंबर के तारे गिनना विषय पर सभी रचनाकारों के शानदार लघु कथाएं पढ़ें डॉ अलका पांडे मुंबई



अंबर के तारे गिनना ।।
लघु कथा

सुशीला को सारी रात नींद नही आई । वहां अम्बर के तारे गिनती रही । 
आज उसका दिल बहुत बेचैन था क्योंकि आज के ही दिन उसके पति तरुण का कार एक्सीडेंट में मौत हो गई थी । सुशीला इस दिन को कभी भुला नहीं पाती है । दिन यूं ही उसके गुजरते चले जाते हैं बहुत ही मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला था , और एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करने लगी और अपना समय किसी तरह गुजार रही थी । पर यह मनहूस दिन आते ही उसे वहीं दुर्घटना याद आ जाती है और वह सारी रात बैठे हुए आकाश के तारे गिनते हुए काट देती है । यह सिलसिला यूं ही चला आ रहा हैं । सुशीला की सहेली कमला ने उसे बहुत ही सहारा दिया उसके हर मुश्किल दौर में साया की तरह उसके साथ रही और उसे समझाती हैं । होनी को कोई टाल नहीं सकता है । तुम्हें हिम्मत रखनी होगी , भूतकाल को भूल कर वर्तमान में जीना होगा भविष्य का सोचना होगा , पूरानी बाते भूलकर जिंदगी में आगे बढ़ना होगा । अभी लंबी जिंदगी पड़ी है ।तुम कोई अच्छा साथी चुन कर शादी कर लो , परंतु सुशीला तरुण को भूल नहीं पाती है । और वह उसे मना कर देती है । उसका कहना है कि तरुण की यादें उसे जिंदगी काटने के लिए बहुत है , इतना प्यार तरुण ने दिया है कि मैं दूसरी शादी के बारे में सोच भी नहीं सकते , कमला ने बहुत समझाया और कहा तुम नकारात्मक विचार मन से निकाल दो साकारत्मक  सोच अपनाओं हो सकता है तुम्हें तरुण जैसा ही कोई दूसरा साथी मिल जाए तो तुम्हारी जिंदगी आसान हो जाएगी , बहुत समझाने के बाद कमला ने कहा तुम सोचना मैं जा रही हूं पर तुम सोचना जरूर , इस बार  सुशीला ने कमला का हाथ पकड़ा और कहा मैं तुम्हारी बातों पर विचार करूंगी , तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो मेरे बारे में सोचती हो कमला को विदा करके सुशीला विचारों में मग्न हो गई , शायद कमला सही कह रही है वह सोच रही थी , तभी हवा का एक झोंका आया और उसके कानों में कुछ कह गया , सुशीला मुस्करा उठी 
अलका पांडे

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[19/10, 8:07 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - 19/10 /2021
विषय : अम्बर के तारे गिनना-नींद न आना।
🌺विधा - लघुकथा 

बात उस जमाने की है जब टीवी, कंप्यूटर मोबाइल भविष्य के गर्भ में थे। तब इनकी कल्पना की कहानियां कही जाती थीं। और लोग बड़े आश्चर्य चकित हो होकर सुनते थे। लोगो को विश्वास ही नहीं होता था कि ऐसा कभी हो सकता है।
तब तो व्यक्तियों के मध्य सूचना आदान प्रदान का साधन मात्र चिट्ठी होती थी। 
चिट्ठी जाने और उसका जवाब आने में महीने लग जाते थे। 
तब दूर दराज नौकरी करने वाले लोग अपने पत्नी बच्चों को साथ न ले जाकर घर पर मां बाप के पास छोड़ देते थे। साल छः महीन में घर लौटते थे।
x x x x x
साहब, श्रीराम का बेटा था। उसकी मां बीमारी में चल बसी थी। श्रीराम संपन्न व्यक्ति था अतः उसकी दूसरी शादी हो गई। साहब को नई मां तो मिल गई किंतु नई मां उसे फूटी आंखों पसंद नहीं करती थी। कुछ दिनों बाद उसके भी बाल बच्चे होने लगे। अब तो साहब की कठिनाइयां और भी बढ़ने लगी थीं। 
श्रीराम को अच्छा तो नहीं लगता था किंतु करे तो क्या करे। उसने कम उम्र में ही साहब की शादी कर दी और उसे अलग कर दिया। 
कुछ दिनों बाद साहब का भी परिवार बढ़ने लगा। खर्चे बढ़ने लगे। पिताजी ने खेत दिया था उससे गुजारा नहीं हो पा रहा था। 
मजबूर होकर उसे नौकरी की तलाश में कलकत्ता जाना पड़ा। वहां वह मिठाई का खोमचा लगाने लगा। वह 10 किलो दूध रोज खरीदता, उसकी मिल्क केक बनाता और एक स्कूल के सामने खड़ा हो जाता। जब बच्चों की छुट्टी होती तो उसकी मिठाई झटपट बिक जाती। कमाई के चक्कर में घर नहीं जा पाता।
इधर उसकी पत्नी चंद्रा विरह में तपती रहती। वह एक एक रात अंबर के तारे गिन गिन कर काटती। जब नहीं सहन होता तो किसी पढ़ने वाले बच्चे से निहोरे करती कि उसके पति को पत्र लिख दे। 
वह पत्र में लिखवाती खाना वहां खाओ तो पानी यहां पीना। थोड़ा लिखना बहुत समझना। तुम तो खुद अकल के मालिक हो। 
पति उसके पत्र का रहस्य समझकर घर वापस आ जाता। और वह खुश हो जाती। सारे कष्ट भूल जाती।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[19/10, 10:01 am] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: मंच अग्निशिखा 
विषय अंबर के तारे गिनना नींद ना आना 
कहानी 
उसका ये हर रोज का काम था चौखट पपर बिस्तर लगा कर रोज तारे गिनता 
गिनता क्या उन तारों में ढूढ़ता कोई अपना जो आकर उसे गले से लगाएगा और पूछेगा, खाना पेटभर खाया, 
सौतेली माँ गाली दे कर चली जाती कहती मा क़ो मरे समय हो गया मगर ये जोधन अब्ब भी उस कलमुही क़ो 
तारों में खोजता फिरता है, जोधन क़ो अब्ब हर तिरस्कार की आदत पड़ गई थी, रोटी मिले ना मिले उसे अब्ब पढ़ना थाउसकी मा माँ का सपना था की जिस बीमारी से वह मरी कोई और ना मरे, 
हा टीबी हो गई थी जोधन की माँ क़ो, 
जोधन क़ो नींद नहीं आती थी वह किताबें पढ़ता और ज़ब थक जाता तारों में माँ क़ो ढूढ़ता, 
समय बीतता गया.. और इस तरह से 
जोधन बड़ा हो गया और उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह डॉक्टर बन गया था. उसकी माँ का सपना पूरा हो गया था. आज ज़ब उसे नींद नहीं आ रही थी तारे ही गिन रहा था की एक तारा टूट कर उसके पास आया तारे की रौशनी से जोधन चकाचौध हो गया 
वो कोई और नहीं मा थी जोधन की जो उसे आशीष देने आयी थी... 
इशिता सिंह 
शिक्षिका
[19/10, 12:13 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* अम्बर के तारे गिनना *
* लघु - कथा *

बात उस ज़मानें की है जब राजस्थान के लोग व्यापारर्थ असम -बंगाल जाया करते थे ! उनके परिवार पीछे गाँव में ही रहते थे ! उस जमाने में संचार के माध्यम सीमित थे ! आपसी संवाद का जरिया चिठ्ठी पत्री ही होता था !
आज की तरह इंटरनेट , मोबाइल नहीं था की जब मन हुआ अपनों से संवाद हो गया ! 
माँताऐं अपनें पूत्र विरह में व्यथित रहती और उनकी सलामती की प्रतिपल कामना करती ! 
जिन युवतियों के पति परदेश कमाने जाते उनकी मनोदशा बहुत व्याकुल होती ! वे दिन में बेसब्री से डाकिये का इंतजार करती की शायद पिया की पाती आ जाए !
रात उनकी विरह में जलकर तारे "अंबर के तारे गिन गिन बितती !
सुबह अपनी हम उम्र ननद से अपनी व्यथा कहती !
उस ज़मानें में संयुक्त परिवार होते थे सो हम उम्र देवरानी - जेठानी एक दूसरे की राजदार सहेली होती थी और अपना सुख- दुख बाँटती थी !
वे उनके साथ अपने प्रियतम की बातें कर आत्मिक सुख का अनुभव करती थी ! कौन कहता है कि विवाह के बाद प्रेम मर जाता है?अरे वह तो काल के परिपाक के बाद प्रेम की चाशनी में पड़ कर और मीठा हो जाता था ! एक दुसरे से दूर रहते तो प्रेम में आर्कषण था ! रिश्तों में कहीं कोई बासीपन न था ! 
रूपया - पैसा भौतिक सुख सुविधा सब कुछ नगण्य था ! था तो बस सुखद अनुभूतियों वाला प्यार .....!
उन रिश्तों में में ही मित्रता का और विश्वास का रिश्ता पनपता था !
जब रात को खुली छत पर विविध भारती पर लता जी का कोई सुरीला विरह गीत बजता तो उन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति असंम्भव होती थी !
तकिया आँसुओं से गीला और रातें " "अंबर के तारे गिन- गिन " कटती थी ?

सरोज दुगड़
खारुपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[19/10, 12:37 pm] वीना अडवानी 👩: लघुकथा

नींद ना आना
***********

आज न जाने क्यों मन फिर उन्हीं पुरानी यादों में खो चला है जिसके चलते मां मेरा मन उदास है और मुझे नींद नहीं आ रही है, सविता भरे कंठ से अपनी मां को बोली। मां सविता को समझाते हुए बोली बेटी भूल जा उस बुरी यादों को और जी फिर से एक नई जिंदगी, मेरी लाडो। सविता जो की बहुत ही होनहार थी हर काम में चाहे वो पढ़ाई हो या घर का काम, सिलाई बुनाई क्या नहीं हुनर था सविता के पास निपुण दक्ष अपने मां बाप की इकलौती संतान थी सविता उसके बाबा उसे हर एक सुख देते थे। सविता की बुलंदियों को देख उसकी ही कुछ सखियां उससे द्वेष रखती और हर पल सविता को कुछ न कुछ कर सताने की युक्ति भी बनाती पर सविता सदैव सावधान होकर एसी लड़कीयों से दूर रहने में ही अपना हित समझने लगी। एक बार द्वेष में भरी एक सखी ने अपने ही परिचित मित्र संग मिल सविता को नुक्सान पहुंचाने की योजना बनाई और बातों ही बातों में सविता से दोस्ती कर घूमने के बहाने एक सुनसान इलाके में ले गयी सविता उसकी करतूत से बिल्कुल अंजान थी वो दोनों बाते करती हुई बस चली जा रही थी। पहले से ही घात लगाए सविता की सखी के मित्र सविता को नजदीक आते देख जो छुप के बैठे थे, बाहर निकल सविता और उसकी सखी को घेर बैठे। सविता की सखी मन में तो द्वेष के कारण खुश थी परंतु ऊपरी तौर से भय का नाटक करने लगी और मौका देख भाग निकली सविता सखी के मित्र की शिकार हुई और जो सविता के साथ हुआ जो हमारे देश की ना जाने कितनी बच्चियों, औरतों के साथ होता है जो ताउम्र जिंदगी में एक काल जैसा ग्रहण बन ना जीने देता और ना ही मरने देता है। ना जाने कितनी सविता होंगी जिनकी रातो की नींद आंखों से ओझल हो वेदना भरी कराहना के साथ घनी अंधेरी रातों में सिसकियां भर रही होती हैं ‌। बस खत्म कर देती कभी-कभी किसी की द्वेष भावना किसी के जीवन को। 

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[19/10, 12:43 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *लघुकथा*
विषय:--- *अंबर के तारे गिनना (नींद ना आना)*

मेरे मित्र विजय के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद उसे रात में नींद नहीं आता रात भर आकाश में तारे गिनते रहता था। सुबह-सुबह टहलने के समय मित्र होने के नाते हमे बताया ।चुकी काफी कम उम्र से ही सेवा में आ गये है,कारण परिवारिक जिम्मेवारी उसके कंधे पर था इसलिए करीब 40 वर्ष तक सेवाकाल अपनी स्नेहिल पत्नी के साथ बच्चों को ध्यान में रखते हुए अपने पैरों पर खड़ा कर नइ जिंदगी के शुरुआत करा कर उनलोग को भी अपने अपने कर्म क्षेत्र की भूमि पर बिदाइ कर दिये।अब उसे लगता है की कोई काम ही नहीं है। 
मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने के बाद बाहर के कमरे में एक दफ्तर ऐसा बना दिया गया जहां 10:00 बजे अपने नित्य कर्म करके टिफिन लेकर बैठ जाये ।यहां पर कॉलोनी में करीब-करीब सभी सेवानिवृत्त लोग रहते हैं लोग आयेंगे ही आकर अपना समस्या पर बात विचार करके समाधान खोजेगे ।जैसे :-बिजली बिल, मोबाइल रिचार्ज, मेडिक्लेम फॉर्म भरना बहुत अन्य कार्य में सहायक आप बन सकते हैं चाहे शुल्क ले या निशुल्क सेवा दे। बाहर एक सेवा सदन का बोर्ड लगा दे।
यह काम करने से रात में नींद भी अच्छी आने लगी अगर आपको साहित्य रुचि है उसे अपना इसी समय निपटा लें। मनोवैज्ञानिक परामर्श इसके अनुसरण करने के बाद मेरे मित्र विजय को रात में तारे गिरने नहीं पड़ते। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति के गिनती में आने लगे।

विजयेन्द्र मोहन।
[19/10, 1:55 pm] निहारिका 🍇झा: नमनअग्निशिखा मंच 
विषय;-
"अम्बर के तारे गिनना""
दिनाँक;-19/10/2021
विधा;-लघु कथा
श्यामली के विवाह को साल भर ही हुआ था कि नक्सलियों ने मुखबिर के शक में उसके पति व सास श्वसुर की हत्या कर दी।श्यामली मायके में डिलीवरी के लिए आई थी तो उसकी जान बच गयी।।एक रात में ही उसका हरा भरा संसार उजड़ गया।। चन्द दिनों में ही बेटा हुआ।वह उसे सीने से लगाये अपने घर वापस आ गयी।माता पिता व सभी ने बहुत समझाया पर वह नहीं मानी,कि बेटे को उसके घर मे ही रखूंगी।।वह ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी केवल सिलाई व कुछ हस्तकला भर आती थी उसको।उसने इसी को अपनी आजीविका बना लिया।लगातार मेहनत करके बेटे की परवरिश की। बेटा भी समझदार था व मां के संघर्ष व पिता व परिवार के बलिदान से वाकिफ था अतः मेहनत कर के पढ़ता रहाआज बेटे की प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम आने वाला था।।मां बेटा दोनो रात भर इसी सोच में अम्बर के तारे गिनते रहे कि क्या होगा ईश्वर उनपर मेहरबान होगा या नहीं?कि इस बार भी किस्मत साथ नहीं देगी।सुबह हुई कि बेटे के दोस्त जो आनलाइन सेंटर चलाता था का फोन आया बधाई हो तुम्हारी व मां की परीक्षा सफल हुई।।सुनते ही दोनो की आँखें बह चली आखिर अब वह पुलिस अधिकारी जो बन गया था।।इसी संकल्प के साथ कि वह अपने क्षेत्र से भय व आतंक के साये को खत्म करके ही रहेगा व जैसी उन पर बीती किसी औऱ पर नहीं गुजरेगी।। धैर्य तपस्या का फल मधुर ही होता है।।
निहारिका झा
खैरागढ राज.(36 गढ़)
🙏🙏
[19/10, 2:48 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक **१९/१०/२१ 
विधा ***लघु कथा
विषय ***
#****रात में तारे गिनना***#
          { नींद नहीं आना }
                °°°°°°°°°
      मित्रों, मेरे सहयोगी प्राध्यापक
श्री गंगाधर जी बड़े साहस के साथ पिछले 5 बरस से अकेले ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं । उनकी पत्नी का मामूली बीमारी से देहांत हो गया वे बहुत दुखी हुए । हालांकि कि घर की सब जिम्मेदारी से वह मुक्त है । ,बच्चों की शादियां हुई । चिंता की कोई बात नहीं । ,मगर जब किसी की पत्नी यूं ही बहुत दूर चली जाती है तो उस व्यक्ति पर क्या गुजरती है यह कोई नहीं जान सकता । वे गजानन महाराज के परम भक्त हैं शायद महाराज ने हीं उनको जीने का बल दिया है । उन्होंने अपने आप को संभाला । हम सब लोगों ने उन्हें मानसिक बल आधार दिया । आज भी वह जीवन जी रहे लेकिन फिर भी अकेलापन , खालीपन , विरह का दर्द क्या होता है वही जाने । 
           मैं जानता हूं । मित्रों, आप सभी जानते हैं कि, पिछले 6 सितंबर को मेरे भी पत्नी का देहांत हो गया। अचानक वह भी हमसे बहुत दूर चली गई जहां से कोई नहीं लोटता । उदास हो गई है मेरी जिंदगी । रात को नींद नहीं आती । कभी कभी मुझ पर भी तारे गिननेकी नौबत आती है। 
         साधु संतों के वचन प्रवचन याद कर अपने आप को समझाने की कोशिश करता हूं।
 इंसान अकेला और खाली आया है ,और वो अकेला और खाली ही जाएगा यह जीवन का सिद्धांत मानकर जी रहा हू ।
         जब अपना कोई प्रिय साथी दूर चला जाए , या जीवन साथी बिछड़ जाए तो रात में तारे गिनना पड़ता है । 
          मेरे सहयोगी प्राध्यापक आज भी रात में तारे गिनते हैं। मेरी भी स्थिति उनके जैसी है । मतलब हम दोनोंही एक ही नांव के प्रवासी हैं ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर ३०
[19/10, 3:00 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: अंबर के तारे गिनना (लघुकथा)
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रमा का दिल बैठा जा रहा था ,उसे न तो भूख लग रही थी ,ना प्यास और ना ही आंखों में नींद थी, क्योंकि उसके पति राम को कोरोना हो गया था ।वह अस्पताल में भर्ती था। उसकी स्थिति ठीक नहीं थी ।ऑक्सीजन और दवाइयों के ना मिलने के कारण कल उसके ससुर शांत हो गए थे। वह बहुत घबरा रही थी ।उसने राम से कहा था, कि आप बाहर मत जाइए.. अरे! रमा तुम तो फालतू चिंता करती हो। मैं तो अपने दोस्तों से मिल कर आता हूं ।सुनिए अभी अपने घर से कोई नहीं निकल रहे हैं कुछ दिनों के बाद चले जाजिएगा ।नहीं ...मुझे अभी जाना है राम के स्वर में गुस्सा था । रमा उसे बार-बार न जाने के लिए कहती रही,पर राम न माना।आखिर में रमा ने कहा ....कि अगर घर से बाहर जा ही रहे हो तो मास्क लगाकर और सेनीटाइजर लेकर जाइए, मुझे कुछ नहीं होगा ..कहकर राम चला गया ,और जब से दोस्त के यहां से मिलकर आया है,तब से सर्दी ,बुखार हैं, पिताजी को भी हो गया और उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। बहुत प्रयत्न के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। वह भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि, राम को बचा लीजिए मेरे मंगलसूत्र की रक्षा कीजिए भगवन ।रमा का मन बहुत घबरा रहा था ।नींद नहीं आ रही थी।सारी रात अम्बर के तारे गिन कर काट रही थी आखिर उसे नींद आएगी भी कैसे ?

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210
[19/10, 3:11 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक"अंबर के तारे गिनना"

रात भर नींद ना आना और आसमान तकते रहना। ऐसा बहुतों के साथ होता है ।पर अक्सर टीनएज में और किसी से आंखें चार हो जाए तब ही ऐसी स्तिथि होती है। अगर कोई चिंता हो जाए तब भी रात तारे गिनते हुए बीतती है । पता ही नहीं चलता कि कब दिन निकला और एक-एक करके तारा डूबता चला गया। अंत में भोर का तारा भी विदा लेकर जा चुका। अब आंखों में नींद धीरे-धीरे आने लगती है ।फिर पता नहीं कब लग जाती है आंख। सारी रात तो तारे गिनते हुए बीत जाती है। सारा अंबर टटोलते टटोलते आंखें निरीह सी हो जाती हैं।
याद करो अपनी-अपनी जवानी। किस-किस ने अंबर के तारे गिने हैं।

   स्वरचित लेख
     रजनी अग्रवाल 
      जोधपुर
[19/10, 3:12 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक"अंबर के तारे गिनना"

रात भर नींद ना आना और आसमान तकते रहना। ऐसा बहुतों के साथ होता है ।पर अक्सर टीनएज में और किसी से आंखें चार हो जाए तब ही ऐसी स्तिथि होती है। अगर कोई चिंता हो जाए तब भी रात तारे गिनते हुए बीतती है । पता ही नहीं चलता कि कब दिन निकला और एक-एक करके तारा डूबता चला गया। अंत में भोर का तारा भी विदा लेकर जा चुका। अब आंखों में नींद धीरे-धीरे आने लगती है ।फिर पता नहीं कब लग जाती है आंख। सारी रात तो तारे गिनते हुए बीत जाती है। सारा अंबर टटोलते टटोलते आंखें निरीह सी हो जाती हैं।
याद करो अपनी-अपनी जवानी। किस-किस ने अंबर के तारे गिने हैं।

   स्वरचित लेख
     रजनी अग्रवाल 
      जोधपुर
[19/10, 3:26 pm] प्रेरणा सेन्द्रे इंदौर साझा: शीर्षक-" किसे दोष दें"

 आज श्राद्ध का चौथा दिन था और रूही का कलेजा मुंह को आ रहा था।सुबह से बेटे को कभी प्यार कर रही कभी जोर से चिल्ला रही थी।लग रहा था जैसे जोर -जोर ईश्वर से लड़ना चाह रही थी । यह सब देख कर माँ का मन विचलित हों रहा था।
    समझ नहीं पा रही थी कि बेटी को कैसे समझाएं कि पांच साल ही सही तेरा पति तुझे सारे सुख दे गया एक बेटा भी।किसे दोष दें किस्मत को या फिर कोरोना को जो सारी खुशियां छीन कर ले गया।तीस साल की उम्र में पति को छीन कर ले गया। या फिर ईश्वर को जिसने तेरी किस्मत में यह गम लिखा।ऊपर से ससुराल में सौतेली सास की बेरुखी जो बहू और पोते को अपना नहीं रही।
    रुचि आज की समझदार बेटी है। मां की दुविधा भाँप कर उठ कर खड़ी हुई।और ग्यारह थाली खीर पूरी सब्जी की लेकर निकल पड़ी।और रास्ते में जो भी मिला गरीब उसे देती गई।
     लौट कर आई तो कुछ मन हल्का हुआ।बेटे को प्यार करने लगी। मां का भी मन रूचि को देखकर शांत हुआ। मन ही मन बोली हे ईश्वर अगर रूचि के जीवन मैं अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा भी कट जायगा बस हिम्मत देना उसे।


         प्रेरणा सेन्द्रे
[19/10, 3:42 pm] चंदा 👏डांगी: $$ अंबर के तारे गिनना $$

मौसम बहुत सुहाना था । बरसात भी बन्द हो गई थी ,आसमान मे तारे टिमटिमा रहे थे ।सुधा अपना कमरे मे उदास बैठी रो रही थी और आसमान को निहारे जा रही थी ।उसका बेटा अमेरिका मे नौकरी कर रहा था पिछले तीन साल से आया ही नही था अब जब भारत आने का टिकट बनवाया वीजा भी बन गया पर अचानक लाकडाऊन लग गया जो कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । अब इन्तज़ार करते करते दो साल और निकल गए। अभी भी कोई आसार नही ।सुधा सोच रही पता नही अपने बेटे को कभी देख भी पाऊँगी या नही ।तभी सुधा के पति राजेश ने आवाज लगाई क्या ऐसे बैठे बैठे तारे ही गिनती रहोगी या मुझे चाय भी बनाकर दोगी ।

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[19/10, 3:44 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: आदरणीय मंच को नमन
लघुकथा अपना अपना भाग्य
---------+
श्वेता और सनी दोनों ने ही एक ही मां के कोख से जन्म लिया था। साथ-साथ पले बढ़े। उन्होंने ही गरीबी और संघर्ष को देखा था ।पिता कैसे कष्ट सहकर खेत में अनाज पैदा करते और उसी से पूरे घर की व्यवस्था करते थे। बच्चों के लिए वस्त्र पढ़ने के लिए ,पुस्तकें विद्यालय की हर मांग को पूरा करते हुए बच्चों को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाता था।
दोनों ही अपनी उम्र पर पहुंची पिता ने जगह-जगह दौड़कर दोनों के लिए संबंध निश्चित कर दिया ।
ऊपर से देखने में दोनों ही परिवार खाते पीते सामान्य ठंड के लग रहे थे। पिता ने दोनों ही बेटियों का समय पर विवाह कर दिया दोनों अपने अपने घर गई। भाग्य को क्या मंजूर था ।श्वेता का पति, एक अच्छा अध्यापक इंटर कॉलेज में उसे पढ़ाने का मौका मिला। सम्मान मिला। उत्तम वेतन मिला और उसका जीवन अच्छी तरह से बीतने लगा।
सनी का पति देखने में सुंदर खेतिहर था। पिता के जाने के बाद उसके पति देव नाथ पर ही घर का सारा बोझ पड़ा था वह अपनी खेती गृहस्ती में श्रम और उत्पादन करके संतुष्ट था ,किंतु शनि असंतुष्ट थी उसने पिता से कहा-" मुझे आपने कहां डाल दिया। जीवन का कोई सुख में नहीं ले पाती।"पिता ने कहा-" बेटा मैंने तो अच्छा ही देख कर सब कुछ किया था ,अपना अपना भाग्य।"
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🌷🌷🌷🌷
[19/10, 3:49 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन🙏

आज की विधा:-लघुकथा

विषय:- *अंबर*के तारे गिनना*
अर्थ:- रात को नींद नहीं आना

     गांधी फिल्म देखकर मैं और मेरे बड़े भैया घर आए, बड़े भैया राजन ने कहा,"सुरेंन तू खाना खा मैं भी खाना खा रहा हूं", मैंने कहा,"मुझे भूख नहीं है ऐसा नहीं है सुरेन भूखे पेट सोते नहीं बडे भैय्या राजन ने कहा", अरे कल जो होगा वह होगा, चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं मेरी बारहवीं कक्षा का बोर्ड का परिणाम निकलने वाला था सोच रहा था क्या होगा पास होगा,या फेल चिंता सता रही थी।
     बड़े अधूरे मन से बडी मुश्किल से एक रोटी खायी पानी पीकर अपने कमरे में सोने चला गया लेकिन नींद तो कब की काफूर हो चुकी थी बेड पर करवटें बदलते गया इतने में रात के तीन बजे मेरे बड़े भैया है देखा तो बोले", अरे सुरेन तू अंबर के तारे गिन रहा क्या?,"
नहीं ,नहीं मैंने रोते हुए कहा भैया,रात रोते को रोते क्या पगले कहा सो जा चुपचाप ज्यादा सोच मत", जो होगा वो कल देखेंगे
     दूसरे दिन सुबह समाचार पत्र ईश्वर का नाम लेकर देखा तो अपना अनुक्रमांक देखा का खुशी के मारे फुले नहीं समा पाया कारण कि मुझे अठ्ठावन प्रतिशत अंक प्राप्त हो गये मैं बारहवी पास हो गया था माता-पिता बड़े खुश हुए और मेरे आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे इसलिए रात को कभी भी *अंबर के तारे नहीं गिनना चाहिए* और चिंता नहीं करना चाहिए।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक :- १९/१०/२०२१
[19/10, 3:50 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
विषय **अम्बर के तारे गिनना ***
           नींद न आना ***लघुकथा **
मालती जैसे कमरे में दाखिल हुई, उसने देखा रामलाल जी आँखे खोले छत की तरफ देख रहे थे, उन्हें एसे देख मालती बोली --अरे अभी तक आप सोये नही, क्या बात है, तब रामलाल जी उदास होकर बोले, नींद नही आ रही है,।शुभि की चिंता हो रही है।कितना अच्छा घर और लड़का देख कर शादी करवाई थी, यही सोच कर शुभि उसके साथ विदेश जाएगी खुश रहेगी, परन्तु ......इसी बीच मालती बोली, आपको तो शुभि के विवाह की बहुत ही जल्दी थी,बस लड़के के व्यक्तित्व और व्यवहार पर ध्यान दिया, ये नहीं देखा लड़का विदेश में क्या करता है, उसका चरित्र कैसा है।
               शुभि जो इनकी इकलौती बेटी है, उसका विवाह आलोक से करवा दिया जो विदेश में किसी कम्पनी में नौकरी करता था ।विवाह के कुछ समय बाद विदेश चला गया, यह कह कर कि कुछ इन्तज़ाम करके शुभि को जल्दी बुलवा लेगा।वह चला गया, कुछ समय तक तो रोज़ उसके फोन आते रहे,फिर धीरे धीरे आना बन्द हो गए, सम्पर्क टूट गया । बाद में कुछ सूत्रों से पता चला आलोक की विदेश मे पत्नी है ,वह पहले से ही विवाहित है। यह बात उसने सबसे छिपा रखी थी । पता लगने पर ससुराल वालों ने शुभि को घर से निकाल दिया, और अब वह अपने मायके रह रही थी । हर समय उदास, अपने कमरे में बन्द, किसी से बात नहीं करती।इसी समस्या को लेकर मालती और रामलाल जी चिन्तित रहते, अब शुभि का क्या होगा। चिन्ता में सारी रात नींद नहीं आती, अम्बर के तारे गिनते रहते।।।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[19/10, 3:52 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: अम्बर के तारे गिनना(नींद न आना) - लघुकथा।
राजीव की नयी नयी शादी हुई है। पूरे घर में रौनक आ गई है। नयी बहू (निशा) के स्वागत के लिए मेहमानों से घर अटा पड़ा है। चौथी का समय आ गया है। बहू का भाई अपनी बहन को अपने घर लेने आ गये है। बहू अपने मैइके पहुंच गयी है। इधर राजीव बहू(निशा) के जाने के बाद घर में खाली खाली महसूस कर रहा है।
दिन तो किसी प्रकार कट जाता है, रात को निशा की याद में राजीव, अम्बर के तारे गिैनकर काटता है।। 
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
[19/10, 3:55 pm] 💃वंदना: अंबर के तारे गिनना
नींद ना आना

शर्माजी की बिटिया की शादी को दो महीने बाकी थे। कोरोना के चलते कुछ तैयारी भी नहीं हो पाई थी आंखों से नींद उड़ी हुई थी बस वे दिन-रात अंबर के तारे गिना करते थे। हालांकि उन्हें सभी लोग समझाते हैं कि सब ठीक हो जाएगा और
अब तो लगभग कोरोना भी खत्म हो चुका है पर शर्मा जी कोरोना के डर से अंदर तक इतना हिल चुके थे कि वह हाथ में सेनेटाइज और मूंह पर मास्क के बगैरघर से कदम बाहर ही नहीं रखते थे। कोई कुछ भी कहें सुनो सबकी करो मन की शर्मा जी ने यह अच्छी तरह अपने मन में धारण कर लिया था न वह घर में पत्नी की सुनते न हीं बच्चों की। उन्हें  हमेशा यही डर लगा रहता कि कहीं कोई चूक न हो। बस सावधानी बरतो और बस सावधानी
सावधानी सावधानी अच्छी है पर इस डर से आदमी जीना छोड़ यह कैसी सावधानी घर के सभी लोग बहुत परेशान हो चुके थे। हार कर सब यही सोचने लगे थे जैसा चल रहा है चलने दो जैसे तैसे शादी करना है सब अपनी तरह से कोशिश में लगे हुए हैं नींद सभी की उड़ी हुई थी कौन सबसे ज्यादा अंबर के तारे गिनता है
जैसे तारे गिनने की प्रतियोगिता हो इसी तरह बीच-बीच में हल्की-फुल्की मौज मस्ती का माहौल बना रहता था। अब शर्मा जी भी अपने डर को कभी कबार दरकिनार करने लगे थे। लगता था धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश
[19/10, 3:59 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लघुकथा)
🌷अम्बर के तारे गिनना🌷 
 । सूर्यबाला ने इस वर्ष 12वीं की परीक्षा दी थी। पेपर तो उसके बहुत अच्छे गए थे। पास होने की कोई समस्या नहीं, उत्तीर्ण तो वह आसानी से हो जाएगी, पर उसे तो टॉपर में अपना नाम दर्ज कराना है। इसके लिए उसने भी जी जान मेहनत की है। रात दिन एक कर उसने अपनी पढ़ाई की। कहते हैं ,मेहनत का फल मीठा होता है। उसे मीठे फल की पूरी आशा है।
            कल उसका रिजल्ट निकलने वाला है। आज वह बहुत बेचैन है। उसका दिल जोरों से धड़क रहा है ।वह जानती है ,वह पास तो हो ही जाएगी , पर उसे आशा अनुसार फल की अभिलाषा है ।दिन तो काम काज व बातों बातों में बीत ही गया ,पर रात बिताना उसके लिए बड़ा कठिन हो गया ।सारी रात उसने अम्बर के तारे गिनते गिनते ही गुजार दिए। ईश्वर ने उसकी सुन ली । उसकी मेहनत रंग लाई। पेपर में उसका नाम ब्लॉक लेटर्स में सबसे पहले ऊपर छपा था।
उसकी खुशी का ठिकाना न था।उसके घर में माऩों उत्सव मनाया जा रहा था।सब बहुत खुश थे।वह ईश्वर को धन्यवाद देते थकती न थी।
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स्वरचित मौलिक रचना
डाॅ . आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
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[19/10, 4:01 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय अंबर के तारे गिनना

बुधना गांव में तिहारी मजदूरी का काम करता उसकी पत्नी भी साथ में काम करती दोनों पति पत्नी पैसे कमाते और घर की जिम्मेदारी को उठाए रहते उसके परिवार में 14 आदमी थे सभी के हिस्से का बटा हुआ था खर्चा। बुधना गांव के स्कूल में थोड़ी पढ़ाई लिखाई किया था लेकिन पैसों के अभाव में आठवीं क्लास के बाद उसकी पढ़ाई बंद हो गई थी इस बात से उसे हमेशा मन में तकलीफ होती रहती थी उसकी पत्नी भी पढ़ने लिखने में होशियार थी पर गांव के माहौल में वह भी सातवीं क्लास तक ही पढ़ पाई दोनों का हौसला पढ़ने का बहुत था पर पारिवारिक झंझट जिम्मेदारियों के कारण इस ओर वह कदम नहीं उठा पा रहा था हर रात घर के छत पर जब वह सोता पति पत्नी दोनों आसमान के तारों को निहारते रहते और गिनते रहते। हर तारों को देख कर अपने आप से एक निर्णय लेते मैं पढ़ाई करूंगा जब भी वह घर में अपने पढ़ने की बात को करता घर के सभी लोग यह कह कर उसे समझा देते पढ़ने के बाद भी तुम क्या करोगे पैसा कमाओगे आज भी पैसा कमा रहे हो बात जो दोनों एक ही है पैसा कमाना फिर वह चुप हो जाता फिर रात जब होती तारों को जब गिनने लगता फिर वह अपने संकल्प को मैं पढ़ाई करूंगा दूर आता मन में ऐसा करते-करते कुछ दिनों के बाद उसकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हो गई जो पढ़े लिखे इंसान अच्छी नौकरी करते थे वह गांव में आए थे और गांव में एक ऐसे स्कूल की स्थापना किए जो नाईट स्कूल कहलाता था और उस गांव के वैसे लोगों का दाखिला करवाया जिसमें पढ़ने की चाहत हो और दिन भर पैसे कमाओ और रात में पढ़ाई करो। बुधना अपना दाखिला उस नाईट स्कूल में करवा लिया 2 महीनों के बाद स्कूल के प्रबंधन समिति से बात किया कि क्या यहां महिलाएं भी पढ़ सकती हैं प्रबंधन समिति इस बात की स्वीकृति दे दी कि महिलाएं भी पढ़ सकती हैं अब तो बुधना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा वह अपनी पत्नी का भी दाखिला उस नाइट स्कूल में करवा दिया और 2 वर्षों के भीतर दोनों दसवीं क्लास पास कर गए अब आगे पढ़ाई के लिए हौसला तो पहले से था अब हिम्मत भी बढ़ गई परिवार में थोड़ी नोकझोंक अवश्य हुई लड़ाई झगड़े भी हुए फिर भी दोनों पति-पत्नी आगे पढ़ने के लिए तैयार हो गए और नाइट स्कूल के प्रबंधन समिति ने नेशनल ओपन स्कूल की ओर से परमिशन लेकर 12वीं का क्लास भी शुरू करा दिया धीरे धीरे वह नाइट स्कूल टेक्निकल क्षेत्र में भी पढ़ाई की शुरुआत की जिससे उस गांव के युवा वर्ग के साथ-साथ व्यस्को की भी पढ़ाई अच्छी तरह होने लगी और गांव की सोच रहन सहन में बहुत हद तक परिवर्तन आ गया कहां गया कि यह गांव विकसित हो गया। अंबर के तारों को गिनते गिनते तारों के सामने संकल्प लेते लेते बुधना और उसकी पत्नी एक पढ़े-लिखे दंपत्ति बन गए और शहर में नौकरी करने लगे

कुमकुम वेद सेन
[19/10, 4:10 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: अ. भा. अग्निशिखा मंच 
मंगल वार - 19/10 /2021
विषय_अम्बर के तारे गिनना-नींद न आना।
विधा - लघुकथा 

"मैडम हमारी बुक चोरी हो गई है। मैडम हमारी कॉपी चोरी हो गई है।" ऐसा बोलते हुए बच्चे मेडम के पास आए और मेम को ले गए। 

मैडम क्लास में आई और सब बच्चों के बैग टटोलने लगी। जिस लड़की का बच्चे बार-बार नाम ले रहे थे जब उसका बैग टटोला गया तो उसमें से बच्चों की किताब और कॉपी बाहर निकल आई।

बाद में पता चला वह कई बार अच्छे बच्चों की कॉपी या क़िताब चुरा लेती थी। जब मैडम उसका बैग तलाश रही थी, उसी समय एक सर दूसरी क्लास में जा रहे थे वह भी रुक गए। पूछने लगे 'मैडम क्या हुआ?" मैडम ने सारी बात बता दी।

लड़की को प्यार से सर और मेडम दोनों ने समझाया कि बेटा ऐसा नहीं करते। आइंदा के लिए ऐसा मत करना। ये कह कर दोनों अपनी-अपनी क्लास में चले गए। दूसरे दिन पुलिस पकड़ने आ गई। मेडम और सर और प्राचार्य किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ?

बाद में पता लगा कि लड़की ने ज़हर खा लिया था। इल्ज़ाम सर और मैडम पर लगा दिया कि इन दोनों ने मुझे प्रताड़ित किया इसीलिए मैंने ज़हर खाया है।
मैडम बहुत ख़राब है उन्होंने सर के साथ मिलकर के मेरी तलाशी भी ली। सर के ऊपर ग़लत धाराओं के केस भी चला।

उसके पिता नहीं थे लेकिन माँ किसी दल की नेता थी। इस कारण सुनवाई उन्हीं की हो रही थी। जब चाहे पुलिस आ जाती और सर और मैडम ज़मानत ले कर अपने आप को बचाते रहे। अम्बर के तारे गिन-गिन रातें कट रही थीं। रातों की नींद गायब हो चुकी थी। पूरा घर परेशान था।

ऐसे करते करते चार साल हो गए। उसी समय एक नए जज आए उन्होंने बारीकी से जांच की तब पता चला कि उन दोनों का कोई कसूर नहीं था। मैडम तो बाइज्ज़त बरी हो गईं और कुछ वर्षों बाद सर भी बाइज्ज़त बरी हो गए।

वैष्णो खत्री वेदिका
[19/10, 4:29 pm] 💃rani: अग्निशिखा मंच 
विषय--अंबर के तारे गिनना 
विधा---लघुकथा 
दिनांक ---19-10-2021 
                मीनू जो कि पढ़ने में बहुत होशियार थी ।उसके माता-पिता सदा उसे प्रोत्साहित करते थे । जिससे वह पढ़ने के साथ-साथ,कई खेलों में भी प्रवीण हो गई थी । वह बैडमिंटन,कैरम,क्रिकेट में अपने कॉलेज का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी थी । तभी अचानक एक दिन कॉलेज से आते वक्त एक गाड़ी वाले ने टक्कर मार दी,
और वह गिरकर बेहोश हो गई । जब उसे होश आया तो उसने खुद को अस्पताल में पाया । एक बार तो उसे लगा सब कुछ खत्म हो गया । वह तनाव में रहने लगी और इसी तनाव में उसकी रातें अबर के तारे गिन-गिन कर कटने लगी । 
       मीनू के माता-पिता भी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी व परेशान थे । फिर भी उन्होंने खुद को संभाला और बेटी को भी हौंसला दिया । उसे हिम्मत दी कि सब ठीक हो जाएगा,चिंता मत करो । धीरे धीरे माता-पिता का साथ और सकारात्मक विचार उसमें नई ऊर्जा का संचार करने लगे और मीनू ने भी ठान लिया था कि वह हिम्मत नहीं 
हारेगी और छ: महीने की अवधि पश्चात वे बिल्कुल ठीक हो गई और उसने अपने माता पिता के साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद दिया कि वह अपनी जिंदगी में जरूर कुछ अच्छा कर पाएगी ।
                        रानी नारंग
[19/10, 5:20 pm] Anita 👅झा: विषय *-अम्बर के तारे गिनना* 
*भोर के उजालें में अम्मा *
भोर के उजाले अम्मा आज तारे गिनते रह गई ,कब आँख लगी पता ही नही चला ?
चंपा ने कहा - अम्मा अभी सुबह का ९ बजा हैं ! आपका तरह तरह का खाना इतने जल्दी कैसे बन गया ! आपका नाती पोते आने वाले है ! अम्मा आप भी भोरे भोरे एकदम झकास तैयार हो जाती थी ! काम में दुगने उत्साह से जुट जाती थी ! 
हाँ चंपा - अलसाई अम्मा अपनी अतीत के दिन याद करते ताजगी का अनुभव करते कहने लगी आज ही के दिन मेरी सासु माँ इस दुनिया से विदा हुई ! फिर तो आप की सासु माँ लक्ष्मी थी । आज भी गुरुवार हैं ! 
अम्माँ ने कहाँ - पुरे आठ साल हो गये ! हमारा पूरा परिवार एक ही छत के नीचे दो विशाल काय वृक्ष नीम और पीपल के साथ साथ फलते फुलते नज़र आ रहे थे ! आदेश और निर्देश ब्रम्य वाक् की तरह होते ! जब कोई परिजन घर से दूर अलग घर जाने की बातें करता मना नही करते ! कहते इस नीम की हवा के नीचे जीवन है ! ये पीपल का पेड़ जहाँ देवता निवास करते हैं कुछ दिनो के मन बदलने गये ! आ जायेंगे ! हम यदि रोकते है !
जिसे मानना परिजनों का कर्तव्य होगा ? 
 तुमने सच कहा चंपा वो लक्ष्मी और नारायण की तरह थे ! परिजनों पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा ! इन आठ सालों में परिवार बिखर चुका और घर खंडहर में बदल गया !  
इस बहुमंज़िल इमारत में आ भोर का उजाला देखने आँखें तरस गई 
है । अब अम्बर के तारे गिनना ही बाक़ी है चम्पा ???
अनिता शरद झा रायपुर
[19/10, 5:29 pm] 😇ब्रीज किशोर: अग्नि शिखा मंच
दिनांक १९/१०/२०२१
बिषय अम्बर के तारे गिनना
विधा लघुकथा
हमारे गाँव मे उन दिनो लडकियों को कम पढा़या जाता था।लड़के पढ़ कै बाहर
कमाने चले जाते थे वहा से.चिठ्ठी भेजते जीसको माँ बाप बीवि को भेजते।वे किसी पढवा लेती।
ऐसा मौका हमे भी मिला जो हमारे यहाँ काम धाम करती थी उसका मर्द कलकत्ता कमाता था वह पढ़ा लिखा उसने सब हाल लिखा और लिखा था *गाँँव मे तारे के छाँव मे सोते थे *अब रात मे तारे गिनते है*। सुकउआ (शुक्रग्रह)उग जाला लेकिन
नींद नही आता है।
तूम अपना ध्यान देना।वह बोली बुआ आप हमारी चिठ्ठी 
लिख दे ।उसमे लिख दिजीएगा कि हमे हमेसा आप की चिन्ता लगी रहती है मै तारे नही गिनती मै देखती हूं भोर का तारा सुन्दर होता है। बृजकिशोरी त्रिपाठी
       भानुजा गोरखपुर।
[19/10, 6:20 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय_ अंबर के तारे गिन गिनकर रात गुजारना 

शीर्षक_ शादी 

     पलकों पर सुनहरे सपने सजाकर कामिनी ने ससुराल मैं प्रवेश किया, संयुक्त परिवार था ननद देवर सभी हँसी मजाक कर रहें थे , ननदोई जी हम उम्र होने की वजह से हम दोनों को परेशान करने मै लगे हुए थे सास ससुर जेठ जेठानी सभी चुहलबाज़ी देख मुस्कुरा रहें थे कुल मिलाकर खुश नुमा माहौल था । लेकिन पतिदेव के चेहरे पर उदासी विराजमान थी । समझ नही आ रहा था कारण क्या है ? पर एक दिन मेने सासू जी से कहते हुए सुना ," मैं तो शादी करके और भी दुखी हो गया 
कामिनी बेचारी सुनकर चकित हो गई पतिदेव ऐसा क्यों बोल रहे हैं?
धीरे धीरे पति का स्वभाव पता चलने लगा चिड़चिड़े, गुस्सैल, मानसिक अवसाद से पीड़ित हैं ,।
सोचने लगी मुझे अपने पति को 
स्वस्थ रखना होगा किसी अच्छे 
मनोचिकित्सक को दिखाना होगा
पति के अनुचित विचार सोच की वजह से कामिनी कुछ भी नही कर पा रही थी उल्टे उसी को सभी वरिष्ठ जन दोष देने लगे थे 
ऐसी विषम परिस्थिती में कामिनी बीमार रहने लगीं थी , रात रात भर नींद नहीं आती अंबर के तारे गिन गिनकर रात गुजारने लगी ।
दिनभर घर का काम , रात आंखों में ही कट ने लगी ।
इस बीच दो बच्चें हुए पति घर वालों की लापरवाही से वो भी नही रहे । गंभीरता से कामिनी ने सोचा ऐसे में तो मुझे तलाक ले लेना चाहिए । उसने यह बात सास ससुर को कही तो कोहराम मच गया , भाईयो को भी सुनकर अच्छा नही लगा माँ भी कहने लगी थोड़ा तो सहन करना ही पड़ेगा , लेकीन छोटे भाई को लगा की बात गंभीर हैं , उसने समस्या का निदान करना सही लगा दोनों पक्षों को बिठाकर बात की सभी सहमत हायर आज कमल का इलाज चल रहा हैं पहले से स्थिति काफी अच्छी है । दोनों का एक बेटा व एक बेटी है। 


आज समाज मनोरोग चिकित्सक को दिखाना नहीं चाहतें मानसिक बीमारी को समझना भी एक समस्या है सोच बदलने की बहुत बहुत जरूरी है।

सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित धन्यवाद 🙏🙏
[19/10, 6:26 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: शीर्षक-चिंतन- मनन 

कुछ बच्चे स्कूल के टीचर के साथ विजयादशमी पर्व पर मेला देखने गए।वहां दशानन को जलाने की तैयारी चल रही थी। एक बच्चे ने टीचर से पूछा-" सर यह दशानन को हर साल क्यों जलाते हैं?"
टीचर बोले-" देखो श्याम, वह बुराई का प्रतीक है, और उसने सीता मैया का अपहरण किया था"
    श्याम तुरंत बोला-" सर जी, दुर्योधन और दुशासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया था, भरी सभा में। उनका पुतला तो नहीं जलाते, हम लोग।"
    टीचर जी सोचने लगे, हाँ,श्याम ठीक ही तो कह रहा है, हम लोग हर साल रावण और कुंभकर्ण का पुतला जलाते हैं, क्या एक बार जलाकर यह किस्सा खत्म नहीं किया जा सकता?
     अब रात में टीचर जी तारे गिनने लगे और सोचने लगे, ठीक है, यह विषय भी गंभीर है, इसका चिंतन- मनन करना अति आवश्यक है।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
19-10-21
[19/10, 6:43 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच 
दिन -मंगलवार 
दिनांक -19/10/2021 

विधा -लघु कथा 
प्रदत्त विषय- *अंबर में तारे गिनना* मतलब नींद ना आना

 सीता पिछले 2 घंटे से काफी परेशान हैं वो कभी मोहल्ले में किसी के यहां जाती है ,कभी किसी के यहां जाती और पूछती कि उसका बेटा संयम तो नहीं आया है। सब जगह से निराशा हाथ लगने पर उसने अपने पति को फोन लगाया और बताया कि संयम अभी तक घर नहीं आया है। मुझे चिंता हो रही है। उसके पति सौरभ तुरंत घर आए और उन्होंने भी जहां- जहां हो सकता था ,वहां- वहां संयम का पता लगाया। लेकिन कहीं भी उसका पता नहीं लग पाया। काफी परेशान हुए सभी लोग अलग-अलग दिशाओं में भागने लगे और उसकी खोज करने लगे ।जब वो कहीं भी नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस में भी रिपोर्ट लिखाई ।पुलिस ने कहा; अब जो भी होगा सुबह ही होगा। सभी लोग घर में हताश होकर बैठ गए और परेशान होते रहे ।उसकी मां का बहन का तो रो-रो कर बुरा हाल था ।किसी तरह से सुबह हुई तब सौरभ अपने बेटे को देखने के लिए और उसका पता लगाने के लिए थाने के लिए निकला ही था, कि देखा संयम आ रहा है ।सभी ने दौड़कर उसे गले लगाया और पूछा कि तुम सारी रात कहां थे? क्या हुआ था? वह कहने लगा कि मैं एक दोस्त के यहां था ।उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं थी तो उसने मुझे रोक लिया था। मेरा फोन चार्ज नहीं था ,इसलिए मैं फोन नहीं कर पाया और मैं भूल भी गया था। सभी खुश थे लेकिन उन्होंने उसको डांटा भी कि तुम्हारी इस लापरवाही से हम सभी कितने परेशान रहे, इसका तुम्हें अंदाजा भी नहीं है। पूरा परिवार रात भर बैठ कर *अंबर में तारे गिनता रहा* और तुम कह रहे हो कि मैं भूल गया था। लापरवाही की भी हद होती है। 

रागिनी मित्तल
 कटनी, मध्य प्रदेश
[19/10, 6:53 pm] रानी अग्रवाल: तारे गिनना
१९_१०_२०२१,मंगलवार।
विधा_ लघुकथा।
विषय_तारे गिनना।
"संघर्ष की जीत"
मोहन पांच साल का था जब उसके पिता चल बसे। मां ने औरों के घर में कामकाज करके मोहन को पाला पोसा।बड़ी मुश्किल से मोहन बी कॉम तक पढ़ पाया।
    अब उसे एक अच्छी सी नौकरी की तलाश थी।उससे मां की तकलीफ देखी नहीं जाती थी।वो उसे आराम देना चाहता था।अपनी इसी फिक्र में वह" तारे गिन_गिनकर" रात गुजारता था।
उसे चैन की नींद नहीं आती थी।हर रोज कहीं न कहीं नौकरी की तलाश में जाता,साक्षात्कार देता पर अभी तक कहीं काम नहीं बना था।आरक्षण भी आड़े आता था।रातें यूं ही तारे गिन गिन कर गुजर रही थीं।
      आज उसे एक बड़ी कंपनी से बुलावा आया था।उसे पूरी उम्मीद थी कि ये नौकरी उसे मिल जायेगी।उसका साक्षात्कार अच्छा हुआ,उसने सारे सवालों के जवाब सही दिए थे।शाम को उसे फोन पर खुशखबरी मिली कि उसे नौकरी मिल गई है,कल से ज्वाइन कर सकता है।मोहन खुशी के मारे मां के गले से लग गया, मां की आंखों में भी आंसू झलक आए,उसकी मुराद पूरी हो गई।मोहन ने मां से कहा "मां अब बस तुझे काम नहीं करना,बहुत संघर्ष कर लिया,अब आराम करना,मैं कमा कर लाऊंगा।"आज उसे रात तारे गिन गिनकर नहीं गुजारनी पड़ी,उसे चैन की नींद आ गई।
    सुबह जल्दी उठकर तैयार होकर ऑफिस की ओर चल दिया।जीवन में नई मंजिल की ओर कदम बढ़ गए।संघर्ष करने से सफलता अवश्य मिलती है।
स्वरचित मौलिक लघुकथा___
रानी अग्रवाल,मुंबई,१९.१०.२१.
[19/10, 8:59 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: अम्बर में तारे गिनना
लघुकथा
शिवानी बचपन से हर काम में अच्छी थी । 10वी कक्षा में पढ़ती थी । अपनी मां को अपना साथी समझती थी इसलिए अपने मां के हर काम में हाथ बंटाती थी । शिवानी धीरे धीरे हर क्लास पार कर 12.वी भी पार कर ली।
अब शिवानी की माता रमा को शिवानी की शादी की चिंता होने लगी । शिवानी आगे पढ़ना चाहती थी पर उसके पिता भी आगे पढ़ाने से मना कर दिया ।ओ भी अपनी पत्नी की बात से सहमत थे । घर में पूजा थी गांव से भी सभी रिश्तेदार आये थे । शिवानी को घर के काम में दौड़ दौड़ कर करना देख सभी आये रिश्तेदारों में तारिफ पाने लगी ।
और वही उसे पसंद कर लिया लेकिन लड़के लड़की एक दूसरे से मिले नहीं थे । ना ही एक दूसरे को अच्छे से जाने थे । शादी तय हो गयी । शिवानी बिदा होकर गांव चली गई। एक दूसरे को देखें बातें हुई शरद पुर्णिमा थी ।चांदनी रात आंगन में बिखेरी हुई थी ।आंगन में शिवानी और उसके पति बैठकर एक दूसरे को समझने के लिए हाथों में हाथ डालकर चांदनी रात में हंसते हुए असमान के तारे गिनने लगे 🙏
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर ।छत्तीसगढ़।

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