Tuesday, 12 October 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज 12/9/2021/प्रदत्त विषय बांसी बच्चे न कुत्ता खाए पर लघु कथाएं पढ़ें और रचनाकारों का हौसला बढ़ाएं अलका पांडे मुंबई




बासी बचे न कुत्ता खाये 
लघुकथा 

परोपकार 

माँ जी आज अष्टमी है मैंने खाना ज़्यादा बनाया है आप नाराज़ न होना पास की झोपड़ी में गरीब बच्चों को बाँटने जाऊगी , आप पहले कन्या पूजन कर ले माज़ी ,अनु ने अपनी सांस को कहाँ 
माँजी क्या तुमने कन्या बुला ली , 
हाँ माँजी आप आये बस सब आ रही है अनु ने माता को भोग लगाते हुये कहाँ 
कब तक कन्यायें भी आ गई माँ जी सबके पैर पखार कर पाटे पर बैठाया उन्हें प्रेम से भोजन करा उन्हें तोहफ़े व नेक दे कर विदा किया ..
अनु ने फिर माँ जी को भोजन लगा कर दिया फिर बाकी सबने बैठ कर भोजन किया , 
अनु माँ जी मैं अब यह भोजन ले कर बाँटने जा रही हूँ , आज आप यह मत कहना की “बासी बचे न कुत्ता खाये “मैंने आज जान कर ज़्यादा बनाया बाँटने के बाद बचेगा तो कुत्ते को भी दे दूगी । 
माँ जी अनु तुम बहुत चालाक हो मेरी बात समझी नहीं मेरा कहने का मतलब होता है रोज रसोई उतनी बनाओ जो ख़त्म हो जाये बासी न बचे , यदि बचे तो पहले ताज़ा खाना ही किसी को खिला दो , जो हम न खाये वो दूसरों को भी न दे खाने को , 
इस लिये कहती हूँ “बासी बचे न कुत्ता खाये “ 
अब समझी ..
अनु समझ गई तभी अभी सारा खाना ग़रीबों को खिला कर आती हूँ । आज अष्टमी के दिन परोपकार तो करना चाहिए माता रानी भी प्रसन्न होगी । 
अलका पाण्डेय मुम्बई


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[12/10, 12:08 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक १२/१०/२१
विधा****लघु कथा 
विषय****
 #**बासी बचे न कुत्ता गाय**#
            ***********

     आज का विषय सुंदर है । क्योंकि इस विषय पर आज चिंतन होना जरूरी है । 
          हमारे देश में 133 करोड जनसंख्या है जिसमें आधे से ज्यादा लोग भूख से पीड़ित है उनको दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता । हम जो भी पकाते हैं वह अन्न् जिसको हम परब्रह्मा कहते हैं बर्बाद ना हो, हमें जितना लगता है उतना ही पकाया जाए अगर बच जाता है तो गरीबों में दान करके उनकी भूख को मिटाया जाना चाहिए। 
          जितनी हमारी जरूरत है उतनाही पकाओ ताकि वह ना बचे । हमारे पास ज्यादा का है इसलिए हमें उसी कदर नहीं, मगर जिनके पास नहीं है उनका हाल जा कर देखिए कि कैसे वे जीते हैं ? भूख क्या होती है उन से पूछिए । बचा अनाज बासी हो जाए तो कुत्ता भी ना खाएं । तो बेहतर यही होगा कि हम अपनी आवश्यकतानुसार ही पकाए ।
       आज कुछ बड़े होटल में या शादी ब्याह में ज्यादा का खाना बच जाता है तो कुछ सामाजिक संस्थाएं उस बचे खाने को गरीबों में ले जाकर बांटते हैं यह बहुत पुण्य का काम हो रहा है । 
        इस बढ़िया सोच विचार को , इस पुण्य काम को हम सलाम करते हैं ।
          मित्रों , ख्याल रहे कि कोई भी चीज जरूरत से ज्यादा अगर हमारे पास है तो उसे दूसरों को दे उसे बर्बाद ना होने दिया जाए ।
फिर चाहे वह अनाज हो कपड़ा हो या और कोई घरेलू चीज हो ।
      इसलिए महापुरुष कह गए कि #*अनावश्यक वस्तुओं का संचय ना हो उसे दान करो*#
 दान करने से पुण्य मिलता है । जग में करना दान ।। 
 है इक काज महान ।।  

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर ३०
[12/10, 12:10 pm] वीना अडवानी 👩: प्रश्न- बासी बचे न कुत्ता खाए?
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बांसी बचे न कुत्ता खाए
ये मुहावरा एक सोच दिलाए।।
क्यों फिर शादीशुदा का भी
वहशी कुत्ता हनन कर जाए।।

प्रश्न- बांसी बचे न कुत्ता खाए?
उत्तर- बांसी बचे कुत्ता ही खाए।

अपने घर की रोटी इन नीचों
का कभी ना भाए।।
दूजों की रोटी में आनंद ही
आनंद देख ग्रहण कर जाए।।

प्रश्न- बांसी बचे ना कुत्ता खाए?
उत्तर- बांसी बचे कुत्ता ही खाए।

घर में रोटी विधि सामाजिक रीति
 रीवाज से ला कर भरपेट है खाए।।
फिर भी बांसी खाने की रेड एरिया
में अकसर है जाए।।

प्रश्न- बांसी बचे कुत्ता ना खाए?
उत्तर- बांसी बचे कुत्ता ही खाए।

विवादित, गरम जोशी का ये सत्य
मुद्दा हर औरत के पक्ष को दर्शाए।।
बताओ ताजी रोटी हक की बोटी को
क्यों अपमानित कर बांसी हो खाए।।

प्रश्न- बांसी बचे कुत्ता ना खाए?
उत्तर- बांसी बचे कुत्ता ही खाए।

कलमकार की कलम चले जब 
जहर वो शब्दों में उगल ही जाए।।
खुद की गाथा या दूजों की व्यथा लिख
 अपना साहित्यकार दायित्व निभाए।।

प्रश्न- बांसी बचे कुत्ता ना खाए?
उत्तर- सच बांसी बचे कुत्ता ही खाए।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[12/10, 1:03 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: , आदरणीय मंच को नमन 
विषय बाकी बचे न कुत्ता खाए
-------------लघुकथा--------
 राम सागर के यहां मेहमानों की भीड़ लगी रहती थी इसका कारण यह था कि उनके यहां किसी को भी ना नहीं कहा जाता था वैसे भी भारतीय परंपरा यह कहती है कि "जो अपने यहां आवे उसका स्वागत करो। "कुछ लोगों ने उनकी सिधाई का फायदा उठाते हुए स्थाई रूप से इस घर को अपना मान लिया था। और वहीं जमे रहते थे। बड़े बेटे की बहू जब ससुराल से जब ससुराल में आई, उसने देखा' यहां तो निकम्मे लोगों का अड्डा बन चुका है,। ऐसे लोगों को अपने हाथ से दूर करने का उसने एक रास्ता सोचा। उसने भोजन और जलपान के समय में परिवर्तन कर दिया। साथ ही उतना ही भोजन बनता था। जितना कि घर के लोगों के लिए पर्याप्त होता था ।बहू चुपके से घर के लोगों को भीतर बुलाकर भोजन करा देती थी।उसके सास ने कहा--" बहू क्या कर रही हो"? उसने कहा--" मां जी घर की भलाई के लिए सब कुछ किया जाता है ।"जब लोगों को उसके यहां उनके मुताबिक स्वागत नहीं मिला, तब लोगों ने धीरे-धीरे घर को खाली करना शुरू किया ।अब केवल घर के प्राणी या एक आध रिश्तेदार रहते थे ।बहू ने साफ कह दिया कि --"मैं उतनी ही व्यवस्था करूंगी, जिसने में अपने लोगों को कष्ट न हो और व्यर्थ के लोग यहां भीड़ न करें।" उसके रसोई की वही स्थिति थी कि "बासी वचे न कुत्ता खाए" इस तरह घर पर आर्थिक बोझ कम हो गया। घर के लोग मेहमान दारी के अनावश्यक श्रम से भी बच गए ।पैसों की भी बचत होने लगी, जिससे घर के और नए-नए काम होने लगे।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
[12/10, 1:09 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्निशिखा मंच
तिथि-१२-१०-२०२१
  विषय- बासी बचे न कुत्ता खाये। (जरूरत के हिसाब से ही सामान बनाना)

             भोज    
     
       लता एक पार्टी में गई थी ।वहां उसने देखा कि लोग प्लेट भर-भर कर खाना ले रहे हैं और थोड़ा खा कर फेक रहे हैं।
   लता ने अपने घर बच्चे के जन्म दिन पर भोज रखा है। करीब १५० लोगों को बुलाया है।
      उसने हलवाई से कहा - "आप करीब १३० लोगों का खाना बनवा लो और करीब २५ लोगों के लिए 
ऐसी तैयारी रखना कि खाना आधे घंटे में बन जाए।"

भोज के दिन क्यों कि खाने का सामान कई प्रकार का था इस लिए १३० लोगों के खाने में १४० लोग खा लिए। हां खाना कुछ बचा नहीं। 
लता ने कह- "अरे वाह ये तो वहीं हुआ कि बासी बचे ना कुत्ता खाये।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र
[12/10, 1:47 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- लघु कथा
विषय:-- *बासी बचे न कुत्ता खाए*

हमारे शहर में एक बैध श्यामा पांडे जी । अपने दवाखाना में जाने के पहले श्रीमती जी से पूछ लिया करते थे घर में क्या क्या चीज़ की आवश्यकता है और उसका मूल्य बजार से जानकारी ले कर उतना ही कमाते । उसके बाद जितने भी रोगी आते उन्हें निशुल्क परामर्श देते। घर जाने पर उनके गृह लक्ष्मी बराबर सलाह देती घर में बेटी बड़ी हो रही है उसकी शादी के लिए कुछ तो पैसा कमा कर रखो। श्यामा पांडे जी कहते *बांसी बचे न कुत्ता खाए*। बेटी के विवाह के समय जो भी आवश्यकता होगा उस दिन प्रभु पूरा करेंगे। यही मानसिकता सेअपना दिन चर्चा व्यतीत कर रहे थे। बेटी की शादी तय हो जाने के बाद जिस दिन तिलक उत्सव मनाना था अपने दवाखाना में परामर्श देने के लिए बैठे हुए थे एक सज्जन जो रोगी था निरोगी हो चुका था उस दिन आकर जितनी भी उनकी जरूरत थी पूरा कर दिया उसके बाद किसी भी रोगी से पैसा नहीं ले रहे थे चूकि उनका असुल धा। *यानि बासी बचे न कुत्ता खाए*।
सज्जन निरोग हो गए थे साथ में काम करते हुए धनवान भी बन गए उसका भी एक *अपना सिद्धांत बनाया समय पर जरूरतमंद को मदद करना यह मानवता के अधीन है*। अतः अपने सिद्धांत के अनुसार बैध श्यामा पांडे जी के साथ कदम-कदम मे साथ दिया।
*नेकी कर दरिया में दाहो भविष्य की चिंता ना करें*।


विजयेन्द्र मोहन।
[12/10, 1:54 pm] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - 12/10 /2021
विषय_बासी बचे न कुत्ता खाय
अर्थः जरूरत के अनुसार ही सामान बनाना।
🌺विधा - लघुकथा 
अन्न का अपमान करना भगवान को भी पसंद नहीं है। किसान कितनी मेहनत से साग सब्जी और अनाज पैदा करता है। और नौकर पेशा या व्यापारी भी दिनरात पैसा कमाता है इसी साग सब्जी एवं अनाज खरीदने की व्यवस्था करता है।चाहे कोई गरीब हो या अमीर हो खाना तो सभी खाते हैं।
राजेश का परिवार खूब खाता पीता परिवार था। घर में नई बहू आई और सास ने पूरी जिम्मेदारी उसे सौंप दी। और स्वयं भक्ति भाव में लीन हो गई। 
एक दिन जब सास तुलसी के पौधे पर जल ढालने गई तो उसने देखा कचड़े की बाल्टी में एक पॉलिथिन में रखी हुई अनेक रोटियां पड़ी थीं। उसे इस तरह अन्न का अपमान और दुरपयोग अच्छा नहीं लगा।
जब दोपहर को जब बहू उसे खाना देने आई तो सास ने कहा – बेटा, बाजार में हर चीज की महंगाई है। बच्चे दिन रात परिश्रम करते है तब कहीं भोजन मिलता है। फिर दो पैसा गाढ़े समय के लिए भी रखना जरूरी है। खाना खूब हिसाब से बनाया करो। सब लोग खा भी लें और अधिक बचे भी न। बासी बचे न कुत्ता खाय। 
बहू तुनक कर बोली– तो आप क्या समझती हैं मैं बर्बादी करती हूं। आपने कभी देखा है अन्न बर्बाद होते हुए।
सास ने कहा– आ मेरे साथ। 
वह भी ताव में आकर सास के पीछे चल दी। सास ने उसे कूड़े के ढेर में पडा हुआ रोटियों का पेकेट दिखाया ।
बहू की जबान सफाई देते हुए लड़खड़ा रही थी।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[12/10, 2:12 pm] 💃वंदना: बासी बचे ना कुत्ता खाए
अर्थात जितनी जरूरत है उतना ही बनाएं।

मिनाक्षी को खाना बनाने का बहुत शौक था वह
रसोई में हमेशा कुछ नया करना चाहती थी। वह
उत्साह वश ढेर सारा भोजन बना लिया करती थी
मजे से दो-तीन दिन गर्म कर करके खाओ उसकी इस आदत से घर वाले बड़े परेशान थे सभी को बासी बचा खाना पड़ता बाकी बासी बचा खराब होने पर कुत्ता भी ना खाएं। पर मीनाक्षी को तो जैसे बरवादी से कोई मतलब नहीं उसे लाख कैसे  ही समझा लो एक दिन उसकी सास उसे गरीबों की बस्ती में ले गई वहां का नजारा देख उसे अन्य की कीमत पता चली लोग एक वक्त की रोटी के लिए किस तरह हाथ पैर मारते हैं बच्चे किस तरह भूख से बिलखते हे । जहां एक वक्त की रोटी के लिए 
आदमी पूरा दिन परेशान होता है फिर भी शाम को क्या होगा मिलेगी कि नहीं यही सोचता रहता है।
वहीं वह इतना बर्बाद करती है। तभी से उसने प्रण लिया कि वह अब आगे से बिल्कुल भी भोजन की बर्बादी नहीं करेगी जितना जरूरत हो उतना ही बनाएगी अगर कुछ बचा भी तो वह उन गरीब मजदूरों की बस्ती में भिजवा देगी इस तरह ना बाकी बचे ना कुत्ता खाए।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश
[12/10, 2:47 pm] चंदा 👏डांगी: $$ बासी बचे न कुत्ता खाए $$

जबसे समझ आयी है मैने अपनी दादीजी से यही सीखा है कि खाना अतिरिक्त नही बनाना है ।गाय और कुत्ते की रोटी पहले ही बनाकर रखना है । कभी किसी समारोह वगैरह मे खाना बच जाता है तो उसी समय ताजा खाना ही जरूरतमंद को दे दिया जाए । ये बचपन की सीखी बात मुझे हमेशा काम मे आती है ।
स्पीक मेके के इंटरनेशनल कन्वेंशन हो,महावीर जयंती हो या कोई भी कार्यक्रम वहाँ मेरी नजर उसी बात पर रहती है कि कोई छुठा तो नही छोड़ रहा है । और मैं हाथ जोड़कर सभी से प्लेट खाली करवाती हूँ ।इसी का नतीजा है कि हम स्पीक मेके के इंटरनेशनल कन्वेंशन मे 1000 /1500 लोगो के खाने मे भी सौ ग्राम भी जुठन नही मिलती है और बचे हुए खाने को हम लगभग 150 लोगो का पेट भरते है ।
 यही बात मैंने अलका दीदी द्वारा आयोजित अग्निशिखा के कार्यक्रम मे भी किया जहाँ पहली बार खूब खाना बर्बाद हुआ फिर तीनो समय के खाने मे मैने डस्टबीन के पास खड़े रहकर किसी को भी जुठन नही डालने दी । जिससे खाना बनाने वाले भी बहुत खुश हुए कि दीदी आपने हमारे बहुत बचत कर दी नही तो हमारे को दूसरी बार खाना बनाना पड़ रहा था । मुझे आज भी याद है कि वहाँ से उनहोने मुझे प्यार से रास्ते के लिए गरम खाना बनाकर दिया और भी मिठाई भी दी और कहा कि आप जैसे लोग हो तो बासी बचे न कुत्ता खाए। 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[12/10, 2:55 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: मंगल वार - 12/10 /2021
विषय_बासी बचे न कुत्ता खाय
लघुकथा

बेटा अभी मैंने ₹10000 रखे थे कहाँ चले गए।
"मुझे नहीं पता भैया। आप मुझ पर आरोप लगा रहे हो।" ऐसा कहती हुई और पैर पटकती हुई सीमा बाहर निकल गई। 

दुकान से निकलते ही उसने अपने पिता के साथ मिलकर थाने में रिपोर्ट करा दी कि इसने मेरे साथ ग़लत हरक़त की।

दो माह पहले ही सीमा पिता के साथ वीरेंद्र की दुकान पर आई थी। उसके पिता ने बताया कि इसके पति ने इसे छोड़ दिया है। हम भी गरीब हैं। हमारे यहाँ तो बासी बचे न कुत्ता खाय वाला हिसाब है। इसका पालन पोषण कैसे करें। आप अपनी दुकान पर रख लीजिए। 

उसे अपनी दुकान पर रखने की गुहार करने लगे। वीरेंद्र बहुत ही सज्जन था। उन्हें सब जानते हैं ऐसा कर ही नहीं सकता। उसके दो बच्चे और प्यारी सी पत्नी है।

 पुलिस आई वीरेंद्र को पकड़ कर ले गई। एक माह से जेल में बंद रहा। एक दिन सीमा के मामा और पिता जेल में वीरेंद्र के पास आए और सात लाख में कम्प्रोमाइज करने की बात करने लगे।

वीरेंद्र ने कहा जब मेरी बदनामी हो ही चुकी है और मैंने कुछ किया ही नही तो भी मैं जेल में रहना मंजूर है तुमको सात लाख नहीं दूंगा। 

अच्छा वकील किया तो सीमा के वकील ने पेशी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन कब तक। एक दिन फैसला हो गया और वीरेंद्र बाइज्जत बरी हो गया


वैष्णो खत्री वेदिका
[12/10, 2:58 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक-"बांसी बच्चे ना कुत्ता खाए"

एक बार सुमन के बच्चों का जन्मदिन था। वह दोनों बच्चों का जन्मदिन एक साथ ही मनाती है। 1 दिन के अंतर में जो आता है। काफी लंबी- चौड़ी पार्टी रखी थी। हलवाई समय पर नहीं आया तो खाना घर की महिलाओं ने मिलकर के बनाया था। जब पार्टी समाप्त हुई तो सुमन की सासू मां जल्दी जल्दी चल कर आई और पूरी के भगोली में से हाथ डाला तो उसमें चार 5 पूड़ियां पढ़ी थी ।उठाकर ले जाने लगी और बोली और पूढ़ियां कहा रखीं हैं सुमन !और पूड़िया नहीं बची। सुमन ने कहा नहीं मांजी। सब खा चुके खाना। मांझी बोली-- वाह! बहुत नापतोल के खाना बनाया बहुरानी । सुमन बोली मांजी यह तो घर की महिलाओं ने ही मिलकर बनाया है खाना। सासू मां ने कहा वाह वाह इसको ही कहते हैं "बासी बचे ना कुत्ता खाए ! वाह वाह बहुत ही सुगृणि यां हो,,,,,, और मैं जोर-जोर से हंसने लगी

स्वरचित लघु कथा
 रजनी अग्रवाल
  जोधपुर
[12/10, 3:01 pm] 💃rani: अग्निशिखा मंच
 विषय---बासी बचे ना कुत्ता खाए 
विधा--- लघुकथा
 दिनांक---- 12-10 -2021 

                रीमा की शादी तय हुई तो उसके परिवार वालों ने खाना बनाने के लिए हलवाई करना था । परिवार वाले मिलकर चर्चा कर रहे थे कि खाने में क्या-क्या बनाना चाहिए । रीमा के पिता का समाज में बहुत नाम था । सभी उनकी बहुत इज्जत करते थे,तो कहने लगे, खाना तो ऐसा होना चाहिए कि सब खुश हो कर जाएँ और कहीं कोई कमी ना रहे ।
          इतने में रीमा बोली 'पिता जी' आप ठीक कह रहे हैं खाने में गुणवत्ता तो होनी चाहिए । पर खाना बारातियों धरातियों हो के हिसाब से ही बनवाईएगा । जरूरी नहीं कि खाने में हर पदार्थ की दस-दस वैरायटी हो, कम हो पर सबको पसंद आए, जिससे पेट भी भरे और बर्बादी भी नहीं। हंसकर बोली, पापा, बासी बचे ना कुत्ता खाए । दिखावे के लिए नहीं,जरूरत के हिसाब से ही खाना तैयार होना चाहिए । जिससे महंगाई के जमाने में पैसे की बर्बादी भी रुकेगी और अन्न का अपमान भी ना होगा ।
           सीमा के पिता जी ने सहमति जताते हुए कहा, बिल्कुल ठीक बेटा तुम्हारे भाई की शादी में हमने अन्न बर्बाद होते देखा है पर ऐसा अब नहीं होगा । अगर कुछ बच भी गया तो गरीबों में बाँट देंगे किसी भूखे का पेट भरेगा तो पुण्य भी मिलेगा । इस तरह बासी बचे ना कुत्ता खाए वाली बात सत्य चरितार्थ हो जाएगी ।

                       रानी नारंग
[12/10, 3:06 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-""बासी बचे न कुत्ता खाय।।''
दिनाँक;-12/10/2021
बासी बचे न कुत्ता खाये
इस उक्ति का अर्थ है कि हमें जितनी जरूरत हो उतना ही हमें अपने पास रखना चाहिए।।
यह उक्ति सदा से एक प्रमाणिक व मान्य रही है।
पर इसकी सार्थकता को इंसान शायद ही समझ पाए।।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे परिवेश ,समाज मे होने वाले अनेक सार्वजनिक ,व्यक्तिगत कार्यक्रम में दर्शित होता है।जिसमें आडम्बर या दिखावा के लिए इंसान अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च कर लेता है भले ही इसके लिए उसे ऋण लेना पड़े जरूरत से इतना अधिक भोजन बनवा दियाजाता है और आगंतुक भी अपनी प्लेट में क्षमता से अधिक ले लेते हैं सभी प्रकार के व्यंजन को चखने के चक्कर मे ,भले ही बाद में वो जूठन के रूप में फिका जाय।(काश वह खाना जूठा नहीं होता तो किसी और के काम आ जाता।)और यदि जरूरत के अनुरूप बनता तो कर्ज का बोझ नहीं होता।।।इस प्रकार वह एक दिन के कार्यक्रम में होने वाले व्यय की भरपाई करने के लिए उसे वर्षों लग जाते हैं,व्यय भी ऐसा जो सार्थक नहीं हो पाया।।सम्भवतः यह कहावत तभी चरितार्थ हो पाएगी जब जन जागृति आएगी।।
निहारिका झा।।🙏🙏
[12/10, 3:19 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: बासी बचे न कुत्ता खाय** लघु कथा **

सासू मां ने अपनी बहू रमा से कहा..रमा यहां आओ ,"जी मां जी" कहिए.. इस बार बहू सर्वपितृ अमावस्या को गांव के करीब 200 लोगों को खाना खिलाना चाहती हूं, और इसकी सारी जिम्मेदारी बहू मैं तुमको दे रही हूं । तुम राशन मंगवा लेना और जो भी सामान लगे, मंगवा लेना। जी मां जी 'बहू बहुत होशियार थी ,उसने राशन और समान डेढ़ सौ लोगों के हिसाब से मंगवाया और खुद खड़े होकर खाना अपने सामने बनवाया। बहू जानती थी, कि पूरे लोग नहीं आते हैं, और अगर कम भी पड़े तो तुरंत बनवाया जा सकता है ।वह जानती थी कि अन्न का अपमान नहीं होना चाहिए।।बहू जानती थी कि* बासी बचे न कुत्ता खाय*। बहू ने बहुत स्वादिष्ट भोजन बनवाकर गांव के लोगों को भर पेट भोजन करवा दिया। सभी तृप्त होकर तारीफ करके गये , और सामान भी कुछ नहीं बचा ।गांव वाले सासु मां की तारीफ करते थे, और सासू मां बहू की तारीफ करते नहीं थकती थी । बहू ने इसका सारा श्रेय सासू मां को दिया।

 
शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश
[12/10, 3:42 pm] कुम कुम वेद सेन: बासी बचे न कुत्ता खाए

यह कहावत हर परिवार के गृहिणी को समझना अति आवश्यक है अपनी आवश्यकता के अनुसार खाना बनवाना ताकि बने हुए खाने बर्बाद ना हो इससे संबंधित दो घर की कहानियां मैं लिख रही हूं दोनों सहेलियां हैं प्रभा और शशि शादी के बाद दोनों सहेली बनी दोनों का घर एक ही मोहल्ले में आस पास ही है पर दोनों क्या आर्थिक आमदनी बहुत अलग-अलग है शशि खुद भी कम आती है और उसके पति भी कमाते हैं घर में धन-संपत्ति आवश्यकता से अधिक है पर दोनों की व्यवस्था पति पत्नी बड़े ही सुचारू ढंग से करते हैं जिसके कारण उनके यहां कभी भी खाना नहीं बचता है जैसे जन्मदिन की पार्टी हो या सतनारायण भगवान का पूजा हो जितने लोगों को निमंत्रण दिया है उनके अनुसार उनको सारी इच्छाएं पूरी की जाती है और कभी कुछ बचने की संभावना दिखती है तो तुरंत उसे अन्य लोगों में पैकेट बनवाकर भिजवा देती हैं जिसके कारण चीजों की बर्बादी नहीं होती है और ना बासी खाना खाने की बात होती है ठीक विपरीत है उसकी सहेली प्रभा भी खुद कमाती है और उसके पति भी अच्छा कमाते हैं पर दोनों का हर वक्त यह कहना हम लोग दोनों काम करते हैं घर में किसी चीज की कमी नहीं होनी चाहिए ज्यादा ही बन जा वह अच्छा है लेकिन कम नहीं होना चाहिए इस मानसिकता के कारण उनके घर में काम करने वाले जो रसोईया और सहायक थे वह कभी भी नपे तुले खाना को नहीं बनवाते थे फल स्वरुप हर दिन उनके यहां खाना विशेष मात्रा में बच जाता था बचने के बाद भी प्रभा को इस बात का ख्याल नहीं रहता था कि वह बचे हुए खाने का प्रयोग कर ले और खाना डस्टबिन में फेंका जाता था 1 दिन शशी उसके घर आई हुई थी और नौकर आ करके पूछा मेमसाहेब बहुत सारा खाना बचा हुआ क्या करें क्या करोगे 10 दिन में डालना ही होगा ना तब शशि को बहुत तकलीफ हुई और उसने कहा प्रभा अनाज का अपमान मत करो क्यों इतना ज्यादा खाना बनाती हो प्रभा ने यह तो मत अपने रसोइए पर डाल दी वह बना देता है शशि ने कहा नहीं तुम उसको सही ढंग से निर्देशन नहीं देती हो सिर्फ मेनू बताती हो और कितने लोगों के लिए बनेगा कितना बनेगा इसका तो मार्गदर्शन नहीं करती तभी खाना इतने बच जाते हैं ऐसा खाना बनवा फिर खाना नहीं बचे यह कहावत तुमने सुनी है बाकी बचे न कुत्ता खाए। कुत्ता भी प्राणी है अगर उसे खाना खिलाना है किसी जानवर को खाना ही देना है तो उसे ताजा खाना दो बचे हुए चीजों को क्यों देना चाहते हैं इसलिए मेरी समझ से बासी बचे न कुत्ता खाए यह एक अच्छी गृहिणी का पहचान है।

कुमकुम वेद सेन
[12/10, 3:55 pm] सरोज लोडाया कवि: *बांसी बचे न कुत्ता खाय*

रोज़ की तरह सुधा ने थोडा़ ज्यादा ही चावल डा़ल के भात बनायी। दोपहर का समय भोजन करने पति और सास -ससुर भी बैठे । देवरानी भी खाना खायी। देवरानी भात ज्यादा खाती थी इसलिए सुधा ने थोडा़ और डाल दिया। सब खाना खाने के बाद थोडा़ भात बचा गया। सास ने देख लिया। भृकटी चढाते हुए बचा हुआ भात बेटे को याने सुधा के पति को दिखाते हुए कहा 'देख बेटा रोज़ इतना चावल बचता ही है बोलो तुम्हारी पत्नी को ,बांसी न बचे ।' सुधा ने देख लिया तो नाराज होकर पति से कहा 'क्या आधा पेट खाना चाहिए ,थोडा़ बचा तो क्या हुआ ? पति कुछ भी उत्तर नहीं दिये। देवरानी और सुधा दोनों मिलकर उसके बारे में ही बार -बार बात करने लगे। एक दिन उसी में बीता। सुधा को तो बहुत बुरा लगा था। उसको लग रहा था कि बहू को इतना भी अथिकार नहीं ? शाम को सुधा के भाई ने फोन किया । सुधा बात करते हुए कहा ' अच्छा है ,इसमें कुछ गलत नहीं ।बांसी न बचे कुत्ता न खाए।' भाई भी ऐसे समझाने के बाद सुधा को भी भाई की बात ठीक लगा। बांसी न बचे कुत्ता न खाय।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय।
[12/10, 4:05 pm] Anita 👅झा: लघुकथा 
बासी बचे न कुत्ता खाय 
  चतुराई 
गाँव के चौपाल पर रमियाँ अपनी बहु रेवती की तारिफ़ करते नही थकती। इतनी सुघड़ है ,थोड़े में काम चलना जानती है ! रसोई में कोई चीज़ नही बचती बासी बचे न कुत्ता खाये । रेवती किससे कहती रोज़ दस लोगों के खाने में नव लोगों का ही बनवाती है बाक़ी में बहु रेवती को ही रोज़ किसी ना किसी तरह सामंजस्य करना पड़ता ।घर बाहर तारिफ़ के पूल मानो चने के झाड़ में रेवती चढ़ी होती कुछ कह भी नही पाती । 
काम वाली कमली को रेवती पर दया आती ,कभी रोटी कम कभी सब्ज़ी दाल कम ये देख रेवती पर दया आती ।कमली ने एक दिन रमियाँ दीदी से भरें चौपाल में कहा - देखो सामने कौसल्या दीदी की बहु को यदि खाना बच भी जाय तो उसका उपयोग करना जानती है ! पर कोई भूखा या अपना शौक़ नही मारता सबको छक कर खाने का शौक़ है 
सोचा नही था इतनी गुणी मिलेगी ससुराल वाले कहते -हमारे यहाँ तरह के बची हुई सब्ज़ियों ,भात ,दाल, रोटी के व्यंजन बनते है ।सारी चीज़ें काम में लाई जाती है ।
गरजकर कहती -महिला चौपाल में मेरे घर सब छक कर खाते है ।
बासी बचे को इंसान खाते कोई भूखा मन मारकर एड़े बन पेड़े नही खाता ! 
रमियाँ को अपनी चतुराई का होश आया अब नही कहेगी चौपाल के बीच बासी बचे ना कुत्ता खाए 

अनिता शरद झा रायपुर
[12/10, 4:12 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
12/10/2021 मंगलवार
विषय-बासी बचे न कुत्ता खाये।

संगीता एक साधरण सी गृहणी थी।संगीता का पति अमित रेल्वे में गार्ड की पोस्ट पर कार्यरत्त थे।तीन साल पहले उनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी।उनकी मृत्यु के बाद उनकी नौकरी उनके पुत्र सौरभ को मिल गयी।संगीता ने अमित के फंड का जो पैसा था,उन पैसों से संगीता ने अपने ससुराल पक्ष से मिली जमीन पर दो कमरों का एक घर बना लिया और बाकी बचे पैसों से सौरभ का विवाह कर दिया। बीस हज़ार अमित की पेंशन और चालीस हज़ार सौरभ की तनख़्वाह,दोनों के पैसे मिलाकर घर का खर्चा आराम से चलता था। संगीता हर चीज किफ़ायत से खर्च करती।फिजूलखर्ची उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी।
       परन्तु जब से सौरभ की पत्नी मनीषा आयी है। घर का खर्च कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। मनीषा को बनाव-श्रृंगार का बहुत शोक है।इस कारण वो नित नये कपड़े व सौंदर्य-प्रसाधन खरीदती।
जब भी बाजार जाती अनावयशक वस्तुएं खरीद लाती। रसोई में भी पहले की बची किराणे की समाग्री देखती नहीं,और नयी मंगवा लेती।संगीता समझाती भी, पर मनीषा शायद समझना ही नहीं चाहती थी।
             कल संगीता की ननद सीमा जयपुर से आने वाली थी।सौरभ ने अपनी पत्नी मनीषा से कहा,"मनीषा कल बुआजी आने वाली है,वो थोड़े पुराने ख़यालात की।"वो जब तक यहां रहे एडजेस्ट कर लेना। मनीषा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा,"ठीक है।
       बुआजी ने घर में प्रवेश करते ही सामने रखे सोफे पर पसरते हुए कहा,अरे! "जरा संगीता जरा अपनी नयी बहू मनीषा से तो मिलवाओ।" मनीषा ने सर पर पल्लू लेते हुए,बुआजी के चरण-स्पर्श किये।दूधो नहाओ,पुतो फलो का आशीर्वाद देते हुए बुआजी ने कहा"बहुत थक गई हूं बहु, एक कप चाय तो बना ला।" ठीक है बुआजी कहते हुए,मनीषा रसोईघर में चली गयी।
          तीन-चार दिनों बाद बुआजी को लगा कि बहु तो हर चीज को वेस्ट कर रही है।खाना भी इतना ज्यादा बना लेती है कि बाहर फेंकना पड़ता है।बुआजी से रहा नहीं गया और आखिर एक दिन उन्होंने कह ही दिया कि"बहु तुम तो बहुत ही वेस्टज करती हो। तुम्हारी सास से सीखो "वो कितनी किफ़ायत से घर चलाती है।" किसी भी चीज को जरा भी वेस्ट नहीं करती। "तभी तो ये कहावत बनी है कि बासी बचे न कुत्ता खाये।
             बहु तुम भी अपनी सास की तरह उतना ही सामान खरीदो,उतना ही खाना बनाओ।जितनी आवश्यकता हो। बुरा मत मानना बहु ये सीख भविष्य में तुम्हारे बहुत काम आएगी।
मनीषा को अपनी गलती का अहसास हुआ,उसने बुआजी व अपनी सास से माफी मांगते हुए कहा कि-"अब मुझसे ऐसी भूल फिर कभी नहीं होगी।" संगीता ने मनीषा को गले से लगा लिया।
                         तारा "प्रीत"
                      जोधपुर (राज०)
[12/10, 4:21 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, मंच को नमन,
विषय ** बासी बचे न कुता खाय***
ज़रूरत के अनुसार ही सामान बनाना ******
        मालती ने जैसे ही फ्रिज़ खोला ,उसमें से महक आ रही थी।फ्रिज में कुछ भगोने ढके हुए रखे थे,एक का ढक्कन हटा कर देखा उसमें सब्ज़ी रखी थी, उसे याद आया ,यह तो दो दिन पहले बनी थी,दूसरे भगोने में गुंधा हुआ आटा रखा था, जो लगभग मटमैला हो गया था,सब कुछ मिला कर फ्रिज में पुरानी खाद्य सामग्री रखी थी।उसने गुस्से में अपनी बहू आशा को आवाज़ दी, आशा डरती हुई पास आई मालती गुस्से में चिल्ला पड़ी,, आशा ये सब क्या है, इतना बासी खाना फ्रिज में क्यों रखा है। आशा डरते हुए बोली मम्मी जी खाना बच गया था तो फ्रिज में रख दिया, बाई को देना भूल गई। बहू मैने कितनी बार कहा है खाना ज़रूरत के अनुसार बनाओ, जितना काम आ सके, अब तुम्हारा ये बासी बचा खाना तो कुते भी नहीं खा सके।समय रहते बाई को दे दती, व्यर्थ में ही इतनी खाद्य सामग्री बर्बाद कर दी।आशा रूआंसी खड़ी रही ।
                तब मालती ने उसका हाथ पकड़ कर प्यार से समझाया, देखो बहू मैं ये नहीं कह रही तुम कम बनाओ, कंजूसी करो,या कम खाओ, तुम मन पसन्द बनाओ और खूब खाओ, परन्तु अन्न की बर्बादी मत करो, ।जितनी ज़रूरत है उतना ही बनाओ । देखो अब ये फ्रिज में रखा बासी खाना किसी के काम का नहीँ ।कुते भी नहीं खा सकते,बहू आगे से ध्यान रखना ।।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[12/10, 4:48 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा *लघुकथा*

शीर्षक *बासी बचे न कुत्ता*
            *खाऍं*
     
     "हैलो, हैलो, हैलो, मोबाइल से आवाज आयी बधाई !हो बधाई हो!आपकी बेटी हमारी बहू बनेगी चंपकलाल तो खुशी के मारे झूम उठे हम कल फलदान के लिए आ रहे हैं रमेश जी बोले, चंपकलाल ने अपनी पत्नी को आवाज लगाइए अरे ,वो सरला अपनी बिटिया का कांता का रिश्ता पक्का हुआ ।"'क्या बात है आखिर मेरी बेटी भी परी जैसी सुंदर है! पसंद तो आना ही था सरला बोली, बड़े खुशी के मारे सरला और चंपकलाल झुम उठे अपनी बेटी कांता रमेश अग्रवाल जी के खानदान की बहू बनेगी और अपने ही शहर में रहेंगे। और प्लास्टो कंपनी की मालिकीन बनेगी क्या पता था? यह कोरोना के कारण सारी खुशियां काफूर हो गई थी अखिर कोविड-19 के सरकारी आदेश के अनुसार केवल सौ मेहमानों को बुलाने की अनुमति थी।
     तब दोनों परिवार वालों ने सोच विचार कर कम से कम दौ सौ मेहमान आएंगे दोनों परिवारों ने सोचा शादी में सौ मेहमानों बुलाएंगे और स्वागत समारोह में सौ मेहमानों को बुलाएंगे सरकारी आदेश का पालन भी होगा और अपनी बेटी और बेटे की शादी धूम-धड़ाके से होंगी। उसके लिए घर का हलवाई चंदूलाल को बुलाया गया चंदूलाल बड़ा अच्छा खाना बनाता था। चंदू को लगा कोराना का काल है ज्यादा मेहमान नहीं आएंगे। लेकिन चंपकलाल का स्वभाव के अनुसार एकलौती पुत्री होने के कारण बहुत सारे मेहमान आए उसमें रसमलाई अच्छी बनी थी और लोगों ने रसमलाई अच्छा ताव जमाया था । इसके कारण रसमलाई खत्म हुई और चावल भी खत्म होने जा रहे थे। चंदू ने अलग से अपने पचास रसमलाई के अलग से रखी थी वह निकाल कर रख दिऐ ले और चावल के लिए गर्म पानी तैयार था और चावल तुरंत बन गये किसी को पता ही नहीं चला। शादी समाप्त होने के बाद दूसरे दिन चंपकलाल ने पूछ लिया ,"अरे चंदू भाई आपने यह कैसा प्रबंधन किया तब चंदूलाल ने कहा मेरे धंधे का वसूली है खाना बर्बाद नहीं होना चाहिए अन्नम पूर्णा ब्रह्मो"इसको ही बोलते *बासी बचे ने कुत्ता खाएं* दोनों ठहाके लगाकर हंसने लगे।

सुरेंद्र हरड़े (लघुकथाकार)
नागपुर
दिनांक १२/१०/२०२१
[12/10, 5:07 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय_ बासी बचे न कुत्ता खाए
विधा __ लघु कथा
शीर्षक___ निमंत्रण


      शहर मैं तीनों ननद का ससुराल है , समय समय पर राखी, तीज त्यौहार श्राद्ध पक्ष , कोई न कोई अवसर पर निमंत्रण रहता ही था ।
       हर बार की तरह इस बार भी सपरिवार जीजी को निमंत्रित किया, यह क्या ? जीजी अकेली ही आई , पूछने पर ,"जीजाजी नही आए , बाहर जाना पड़ा, बेटे बहू , आज आफिस जल्दी जाना पड़ा, बहू , के पीहर वाले आए है उसे बाजार जाना है सबको लेकर ।" दोनों बच्चें पढ़ाई में लगे हैं । भाभी मैं उनके चक्कर मैं तो खुद उलझ जाती । दूसरी ननद ने तो तबियत ठीक नहीं है कह दिया , तीसरी ननद आई पर बच्चों ने आने से मना कर दिया कालेज की बिदाई पार्टी में शामिल होना है तो नही आ पायेंगे , ।" 
   अब मैं सोच रही थीं काश , मुझे संकेत दे दिया होता तो भोजन उसी हिसाब से तैयार करवाती संकोचवश पूछ नही पाई , कही बुरा न लग जाए , मन ही मन सोच रही थीं _ *बासी बचे न कुत्ता खाए* 
    मैने भी सोच लिया अगली बार क्या करना है । भोजन की तैयारी ऐसी करनी है अन्न का दुरुपयोग भी ना हो , सभी जीजी होन सपरिवार जीम लेवे , मेरा बुलाना सार्थक रहे। 

धन्यवाद जी 🙏🙏🌹
सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित 🙏🙏🙏🙏🙏
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
[12/10, 5:16 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: बासी बचे न कुत्ता खाये (जरुरत के अनुसार ही सामान बनाना) ----ओमप्रकाश पाण्डेय
इधर मालती का बेटा अजय और बहु सुधा दो दिनों के लिए
बाहर गए थे. एक दिन सुबह मालती ने सोचा कि आज कोई काम नहीं है तो चलो फ्रिज साफ कर देते हैं. 
जब मालती फ्रिज से सामान निकाल कर बाहर रखने लगी दो देखी कि कई कटोरी में बनी हुई सब्जी, खीर, हलुआ जो कि कई दिनों पहले बना था, रखा हुआ है. 
खैर, उसने सारा सामान निकाल कर बाहर कूड़े में फेंक दिया. जब दो दिन बाद बेटा बहु लौट कर आये तो रात में खाना खा लेने के बाद, मालती ने बहु से सारी बातें बताई.
बहु ने कहा मम्मी मैं भूल गई थी. मालती ने बोला कोई बात नहीं बेटा, लेकिन आगे से ध्यान रखना कि बासी बचे न कुत्ता खाये.
[12/10, 5:26 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: 🌹 लघुकथा🌹 
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बासी बचे न कुत्ता खाय 
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             कंचन का विवाह निश्चित हो चुका था। माता पिता बहुत खुश थे। शादी की तैयारियां जोर शोर से चल रही थीं। आखिरकार शादी का दिन आ ही गया। धूम धाम से शादी संपन्न हुई । कंचन के माता पिता ने शादी में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होने दी । वर पक्ष के लोग भी बहुत प्रसन्न थे। बड़ा सा पेंडाल डला था । डेकोरेशन में कोई कमी न थी । जो देखता वही प्रसन्न हो तारीफ करने लगता। रात को प्रीतिभोज का आयोजन था। सभी अतिथि पधार रहे थे ।शाम को 7:00 बजे के बाद से अतिथि के आगमन तक भोजन की व्यवस्था थी। बहुत ही बढ़िया प्रबंध था । भोजन की व्यवस्था भी उत्तम थी। 
      ‌‌ बड़े बड़े बर्तनों में स्वादिष्ट व जायकेदार भोजन बन कर तैयार था। जिस ठेकेदार को भोजन की व्यवस्था का भार सौंपा गया था ।वह बहुत सतर्कता व जिम्मेदारी से अपना कार्य भार सम्हाले हुए था । उनकी सोच थी, कि इतने बड़े समारोह में बासी बचे न कुत्ता खाय की व्यवस्था चरितार्थ हो तो किफायत से काम हो सके और भोजन बर्बाद होने से बचें । ऐसे विचार धारा के लोगों से ही अन्न नष्ट होने से बचता है और देश की समस्या का भार कम होता है ।
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स्वरचित व मौलिक रचना
डाॅ . आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़
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[12/10, 5:46 pm] 😇ब्रीज किशोर: **मंंगलवार १२/१०/२१**
**विधा -लघुकथा**
**बिषय* -   
 **बासी बचे न कुत्ता खाय**    
यह मुहाबरा बहुत पुराना।गाँव देहात मे तो जिसके यहाँ शादी ब्याह मे खाना नही बचता था तो लोग ब्यगं मे कहते थे।आदमी क्या खायेंगे *बासी बचे न कुत्ता खाय*
 ।तब लोग बासी भोजन अपने आस पास रहने वाले कमजोर वर्ग को बाँट देते थे।
अब लोग थाली में छोडते है।
नाली मे जाता कूडे़ मे फेका जाता है कुत्ते खाते है।कुछ यन ,जी.ओ वाले प्रचार करते है छोडो़ न थाली मे, फेको न नाली मे।इस पर यह मुहाबरा 
बनता है उतने खाना पकाओ जितना खाँ जाओ।बासी करके सडक पर न फेको। मानसिकता बदल गई है।पहले कोई पके अन्न को कुडे़ मे नही फेकता था फेकना माँ अन्नपूर्णा का अपमान था।
अब प्लेट में लोग सामान लेकर छोड़ देते है जो अन्न की बर्बादी है।इसमे कोई शान नही है।हम सब को इस पर ध्यान देना होगा हमे अन्न को फेकना नही चहिये जीतना जरूरत हो उतना ही पकाये और जो पका है उसे बचने पर जरूरत मंद को दिया जाँय इसमे देने वाला बधाई का पात्र होता है देहात का किसान हमेसा गरीब के साथ रहता है जितने 
आस पास रहने वाले होते है
उन लोगो से भाई चारा होता है और सब को सपरिवार आमंत्रित किया जाता है जिसके कम आमदनी है।वह केवल एक आदमी को बुलाता है।हम शहर मे रहते है तो हमे कम ही बनवाना चाहिए कम लगे तो हलवाई से कह कर फिर बनवा लिया जाँय। लेकिन किसान की मेहनत और माँअन्नपूर्णा का
सम्मान होना चहिए।
 *उतने पकाईये न बासी बचे** *न कुत्ता खाय*
स्वरचित 
         बृजकिशोरी त्रिपाठी
    गोरखपुर।यू.पी
[12/10, 5:49 pm] रानी अग्रवाल: बहू बदल गई।
१२_१०_२०२१.मंगलवार।
विधा_लघुकथा।
विषय_बाकी बचे ना कुत्ता खाए।
शीर्षक_बहू बदल गई।
अमृता की बहू बड़ा स्वादिष्ट भोजन बनाती थी पर एक खराबी थी कि वह खाना जरूरत से ज्यादा पका देती थी।घर में खाने वाले चार लोग थे। वो टोप भर के चावल ,खूब सारा आटा,सब्जी में तेल ज्यादा डाल देती थी।जब सब लोग खा चुकते तो पता चलता कि काफी खाना बच गया है।
     अब प्रश्न उठता कि इस खाने का क्या करें? फेंक दे, ऐसी उनकी आर्थिक परिस्थिति नहीं थी इसलिए वो खाना फ्रीज में ठूंस दिया जाता अगले दिन बासा खाने के लिए।अगले दिन फिर वही हाल।क्या करें?उसकी सास उसे समझाती थी तो उसे बुरा लगता था।एक सास ने तरकीब निकाली।उन्होंने बहू की मां से कहा इसे समझाइए।
     मां ने बड़े प्यार से बेटी को घर_गृहस्थी की बातें बताई,अच्छी रसोई पकाने के नुस्खे बताए,बेटी समझ गई।
     अब बहू सटीक अंदाज से भोजन पकाती,सब्जियों में तेल कम डालती, आटा कम लगाती ।अब सब ताजा भोजन खाते हैं।खाना बर्बाद नहीं होता,इससे उनकी बचत बढ़ गई जिससे वे अपने परिवार की दूसरी जरूरतें पूरी कर पाते हैं।इस प्रकार बहु सीख गई कि भोजन इतना ही बनाई जो"बाकी बचे ना कुत्ता खाए"।
स्वरचित मौलिक लघुकथा__
रानी अग्रवाल,मुंबई,१२_१०_२१.
[12/10, 6:11 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: विषय- बासी बचे ना कुत्ता खाए- जरूरत के अनुसार ही सामान बनाना 

शांति देवी की चार बहुए हैं, सब मिलजुल कर खाना बनाती हैं, पर अक्सर रोटी ज्यादा बन जाती है, जो फेंकी जाती है।एक दिन शांति देवी ने अपनी बहुओँ से कहा-" बहूरानी, तुम लोग इतनी ज्यादा रोटी मत बनाया करो। बासी बचे न कुत्ता खाए ।"
बहुए मुंह बिचका कर हंसने लगीं और बोलीँ- "माताजी ज्यादा रोटी बन गई तो फेंक दीजिए कहने से क्या फायदा"।
 शांति देवी बोलीं-" उतना लो थाली में, व्यर्थ ना जाए नाली में।अन्न को तो सहेजना चाहिए। घर के आदमी मेहनत करके कमाते हैं। आटा, गैस, समय, मेहनत,सब व्यर्थ जाता है। किसी भूखे को खिला दो, कचरे में रोटी ना फेंका करो।"
 एक बहू आगे बढ़कर बोली-" माता जी, हम आगे से ध्यान रखेंगे। आपको शिकायत का मौका नहीं देंगे।"
 शांति देवी ने खुश होकर बहू को आशीर्वाद दिया- "सुखी रहो बहू"

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
12-10-21
[12/10, 6:51 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: मुहावरा - बासी बचे न कुत्ते खायें ( लघुकथा)

मम्मी जी कल तो अष्टमी की पूजा करना है तो कल ज्यादा खाना खाना बनवाना है न बाई से।
 हाँ बहू ,ज्यादा खाना तो बनवाना है लेकिन इतना भी नहीं कि 2 दिन तक बासी खाते रहे।
 मम्मी जी 9 बच्चियों को खाना खिलाना हैं न।
 अरी बच्चियां कितना खाती हैं । दो पूरी बच्चियां खालें वही बहुत है और फिर शाम को तो ताजी पूड़ियां बनवा लेना क्योंकि मैं तो पूरी वगैरह ज्यादा खाती नहीं हूँ इसलिए हिसाब से खाना बनवाना , समझ गई ना। मैं बासी खाना खा नही सकती हूँ ,मुझे डाक्टर ने मना किया है।
  ठीक है न । न बासी बचे न कुत्ते खाएं।


आशा जाकड़
[12/10, 6:57 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🙏अग्नि शिखा मंच🙏🌹
विषय: * बासी बचे न कुत्ता खाए *
विधा: लघुकथा 
दिनांक:12/10/21
*********************************
🌹🙏 
     रतन जी को सेवा निवृत हुए दो महीने हो गए,,,,,,अब उनकी दिनचर्या भी थोड़ी 
बदल सी गयी है,,,,,
दिन भर समय काटना पहाड़ सा लगता है,
लेकिन , क्या करें,,,,,!
उनका इकलौता बेटा लगभग ठीक है,भोंदू 
नहीं है, तो चालाक भी नही है।
रतन जी को हमेशा उसके भविष्य की चिन्ता बनी रहती थी,कि उसके लिए कौन सा रोजी रोजगार या फिर क्या किया जाए ?
बेटा थोड़ा खर्चीला था ,,,,दोस्तों के साथ मौज मस्ती करना उसे अच्छा लगता था ।
उसकी इस हरकत से , पिता परेशान रहते लेकिन क्या बोलते ?
   एक दिन रमन जी ने ये सब बातें अपने मित्र बिमल जी से बयायी ।
  बहुत मजबूर होकर उन्होंने बेटे से कहा,,,,,," थोड़ा तो समझदारी से काम लिया कर ,,,,ऐसा न हो कि बासी बचे न कुत्ता खाए,,,,वाली स्थिति हो जाए ।
    मनन के मन पर पिता की बातों का खासा असर हुआ ,,,,वह मन ही मन 
अपने आप को सुधारने का संकल्प 
लिया,,,,,,।
🙏🌹
 
********************************
स्वरचित एवं मौलिक रचना
डाॅ.पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर 
बिहार 
🌹🙏
[12/10, 7:48 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: ।बासी बचा न कुत्ता खाय-लघुकथा ।
घनश्याम जी के चार बेटे है। उन्होंने अपनी वसीयत बनवाई। वसीयत में तीन पहले बेटों को अच्छी जायदाद बांट में मिल गई और सबसे छोटे बेटे श्याम को गांव का मकान उसके हिस्से में लिख दिया।गांव का मकान पुरखों के समय का बनाया हुआ था। सबसे छोटा बेटा श्याम ही घनश्याम जी की सेवा करता है। छोटा होने के कारण एवं घर के काम के कारण उसकी पढ़ाई ढंग से नहीं हो पाई।
एक दिन घनश्याम जी की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। तेरहवीं तिथि पर जब परिवार के लोग इकट्ठा हुए तो वसीयत नामा पढा गया:
उसी समय बुआजी बोल पड़ी : बेचारे श्याम को :बासी बचा कुत्ता न खाये वाला मकान श्याम के पल्ले पड़ा। 
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।


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