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अखिल भारतीय Agni Shikha मंच के ब्लॉक वह आज दिनांक 1/9/ 2021(किसको आप पढ़े सिंधी का प्रचार वापस आ और देखें हमारे रचनाकार को जाने समझे और उनकी रचनाओं का आनंद ले डॉ अलका पांडे





हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई 

14 सितंबर 1949 को संविधान ने एकमत से हिंदी को भारत की राजभाषा बनाए जाने का निर्णय लिया था इसलिए भारत में प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है ।हिंदी दिवस मनाए जाने का उद्देश्य इसका व्यापक प्रचार-प्रसार एवं राजकीय प्रयोजन में इसके उपयोग को बढ़ावा देना है। हर वर्ष सरकारी प्रतिष्ठानों एवं कार्यालयों में धूमधाम से हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है 
हिंदी हमारी मातृभाषा व राजभाषा है। हमें कार्यालयीन कामकाज हिंदी में संपादित किए जाने में गर्व महसूस करना चाहिए। राजभाषा हिंदी में कार्यालयीन कार्य किए जाने के लिए निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे। हिंदी के प्रयोग में संकोच की भावना छोड़ते हुए कार्यालयों में व्यक्तिगत आवेदन हिंदी में ही लिखे जाने से शुरूआत करनी चाहिए

खेद की बात यह है की संविधान को बहकाने के लिए हम ने हिंदी प्रचार के नाम पर हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मना कर कुछ बहाने ढूंढे। भारत सरकार ने गृह मंत्रालय के अंतर्गत राज भाषा विभाग खोल दिया। सभी जानते हैं कि राज भाषा के नाम पर यह महज एक खाना पूर्ति ही है। इस का काम हिंदी का प्रचार प्रसार करने की अपेक्षा आंकड़े बनाना हो गया। भारत सरकार के प्रत्येक कार्यालय में राज भाषा अधिकारी बन गए, जो स्वयं में सफ़ेद हाथी ही साबित हुए. अनुवाद ब्यूरो खुल गया जिस का काम हिंदी अनुवाद में सहायता करना था। संसदीय समिति बन गयी जिस का काम विभिन्न कार्यालय में जाकर हिंदी की प्रगति को देखना और उन्हें निर्देश देना है। लेकिन वास्तविकता क्या है यह सब जानते हैं। कभी किसी ने इन से नहीं पूछा की ये सांसद स्वयं हिंदी में कितना काम करते हैं ?
सही मायने में हिंदी का प्रचार प्रसार करने में मिडियां सरकार 
जनता सबको मिलकर काम करना होगा 

भारतेंदु के यह उदगार मानव जीवन और सभ्यता में भाषा के महत्त्व को दर्शाते हैं। भाषा हामरे सोचने की दिशा निर्धारित करती है, हम बोलें चाहे कोई भी भाषा मगर सोचते अपनी मातृभाषा में ही हैं। मातृभाषा की तरक्की से ही राष्ट्र की साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति एवं प्रसिद्धि संभव है और यह तरक्की प्रचार के माध्यम से ही संभव है। बाजारवाद के युग में यह कहावत खूब प्रसिद्द है कि "जो दीखता है वह बिकता है" ठीक वैसे ही आज हिन्दी ने संचार माध्यमों के द्वारा दुनियाभर में क्रांति मचा दी है। हर कोई हिन्दी में लिखना चाहता है, हिन्दी सीखना और बोलना चाहता है। हिंदी में रोजगार के अवसर भी बढे हैं और यह सब संभव हो सका है विभिन्न संचार माध्यमों से जिसमे प्रिंट और वेब पत्र पत्रिकाएँ आते हैं। आज हामरे देश में पत्र-पत्रिकाओं ने सूचना एवं तकनीक का साथ लेकर विश्व भर में हिन्दी के प्रचार की कमान संभाली है और जन-जन में राष्ट्रभाषा के प्रसार और उसे अपनाने का विगुल बजाया है। भाषा राष्ट्र को एकजुट लाती है और हिन्दी ने यह काम बखूबी किया है और इसके पीछे हमारे देश की हिन्दी पत्र पत्रिकाओं का विशेष हाथ है। सर्वसाधारण की जन-भाषा और हृदय को छू लेने वाली हिन्दी का प्रयोग करना और करने के लिए तैयार करना हमारे देश की पत्र पत्रिकाओं का प्रमुख उद्देश्य था। भारतेंदु के आगमन से पूर्व ही हिन्दी पत्रकारिता का आरंभ हो चुका था। हिन्दी भाषा का प्रथम समाचार-पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' 30 मई, 1826 को कानपुर निवासी पं॰ युगल किशोर शुक्ल ने निकाला। सुखद आश्चर्य की बात यह थी कि यह पत्र बंगाल से निकला और बंगाल में ही हिन्दी पत्रकारिता के बीज प्रस्पुफटित हुए. 'उदन्त मार्तण्ड' का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को जागृत करना तथा भारतीयों के हितों की रक्षा करना था। यह बात इसके मुख पृष्ठ पर छपी पंक्ति से ही ज्ञात होती है-"यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया..."
हिंदी तभी समृद्ध होगी जब रोज़गार हिंदी में मिलना शुरु होंगे ! 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई 
9920799214

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वि शंकर कोलते क: बुधवार दिनांक*** ०१/०९/२१ 
विधा*****लेख
विषय**वंदे मातरम के रचयिता
       #**** बंकिमचंद्र****# 
               ^^^^^^^^^^^
      
         साथियों, हम जब स्कूल में 
पढ़ते थे तब सुबह प्रार्थना के बाद बंदे मातरम जरूर गाया करते थे, आज भी गाते हैं ,पूरे भारतवर्ष में भारत का कण कण आज भी गाता है । बहुत से लोग नहीं जानते कि इस सुंदर रचना के रचनाकार कौन है। भारत भूमि की यह वंदना हमारा राष्ट्रीयगान है, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था ।    
         बंकिम बाबू का जन्म २७ जून १८३८ को बंगाल में चोबीस परगना के कांठाल पाडा ग्राम में हुआ था । बाल्यावस्था में ही उन्हें अपनी मातृभाषा और मातृभूमि से बेहद प्रेम था। देश भक्ति उनमें कूट-कूट के भरी थी।
          बंकिम बड़े ही बुद्धिमान थे पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिली और साथ ही साथ वह साहित्य सेवा का भी प्रारंभ किया ।बांग्ला भाषा में उनकी कविताएं प्रकाशित होने लगी वे चर्चित कवि हो गए । उन्होंने गद्द के क्षेत्र में भी हाथ आजमाने का निश्चय किया जिसके फलस्वरूप उनका पहला उपन्यास दुर्गेश नंदिनी का सृजन हुआ उस समय बंकिम बाबू की उम्र 27 वर्ष थी ।
         बंकिम जी ने बंग दर्शन नाम से एक साहित्यिक पत्रिका भी निकाली थी जिसमें अच्छे लेखकों के लेख रहते थे मगर बंकिम बाबू की रचनाओं का अलग ही आकर्षण रहता था ।
           गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर भी बंकिम चंद्र को अपना गुरु मानते थे। उन्होंने कहा था बंकिम बाबू बांग्ला लेखकों के गुरु और बंगाली पाठकों के मित्र हैं ।
         उन्होंने कपाल कुंडला मृणालिनी, विषवृक्ष, रजनी, चंद्रशेखर ,और आनंद मठ जैसे चर्चित ,सुप्रसिद्ध उपन्यास लिखा जिसकि शुरुआत ही वंदे मातरम गीत से की गई है ।
      आनंदमठ उपन्यास के जरिए उन्होंने देश के युवकों को फिरंगी शासन के खिलाफ विद्रोह का मंत्र फूंका। इसके बाद , उन्होंने सीताराम और राजसिंह उपन्यास लिखा राजसिंह उनका अंतिम उपन्यास था । उन्होंने कृष्ण चरित्र भी लिखा। वे हमेशाही पोंगा पंथ के विरोधी थे ।
        यह महान रचनाकार ,भारत के गौरव ,राष्ट्रकवि बंकिमचंद्र जी ८अप्रैल १८९४ को 56 वर्ष की आयु में स्वर्ग सिधार गए ।
         इस महान रचनाकार को मेरा और हम भारतीयों का कोटि कोटि वंदन ।

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर ।
[01/09, 12:54 pm] 
वीना अडवानी 👩: शिक्षा क्षेत्र
********

शिक्षा क्षेत्र मे समयानुसार निरंतर परिवर्तन हुआ जा रहा है पहले मात्र किताब से ही शिक्षा ग्रहण की जाती थी आज शिक्षा के इतने अधिक आधुनिक तरीके उपलब्ध हो चुकेहैं की कोई भी घर बैठै ही शिक्षा प्राप्त कर सकताहै। एक बड़ा परिवर्तन ये भी हुआ है की शिक्षा को आज शिक्षा देना कम और आर्थिक लाभ अधिक कमाने का तरीका बनाते जा रहे हैं। शिक्षा आवश्यक है जिसके चलते अआर्थिक कमी के मजबूरी के चलते बहुत से लोग शिक्षा से वंचित भी रह जाते हैं।हमारी सरकार को ही कोई ठोस कदम उठाते हुए बढ़ती फीस दरों के खिलाफ कोई कदम उठाने चाहिए ताकी हर किसी को जो शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है उस अधिकार से कोई आर्थिक कारणों के चलते वंचित नहीं रह पाऐ। 

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
******************
[01/09, 1:00 pm] 👑
मीना त्रिपाठी: *देश की बड़ी समस्या भ्रष्टाचार से कैसे मुक्क्त हो देश ( लेख )*

जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था में मान्य नियमों के विरुद्ध जाकर अपनी स्वार्थ एवं लोभ में आकर गलत आचरण करने लगता है तो वह भ्रष्टाचारी कहलाता है। भ्रष्टाचार एक संक्रामक रोग की तरह है। आज स्थिति यह है कि देश का हर कोना आज भ्रस्ट हो चुका है।चाहे वह चिकित्सा व्यवस्था हो,या न्याय व्यवस्था, या निर्माण, शिक्षा छेत्र आदि ऐसे अनगिनत छेत्र हैं जहाँ भ्रस्टाचार अपनी जड़ें जमा चुका है। अभी हालफिलहाल में कोरोना के वक़्त सांसो की कालाबाजारी बहुत ही चर्चित रही। अगर इस अपराध के लिए कड़ा दंड निर्धारित नही होगा तो यह दीमक की तरह देश को खा जाएगी। परिस्थितियां भयावह हैं लेकिन जैसे हर रात का अंत होता है वैसे ही इस स्याह पहलू को भी एक न एक दिन धवल होना ही होगा। आवयश्कता यह है कि जन जन पहले अपने घर में दिया जलाना आरम्भ करें। यद्धपि कुछ स्तर पर यह पहल हो चुकी है डिजिटल भुगतान, आर्थिक सहायता को आधार आधारित खातों द्वारा वितरण, नकद लेनदेन की सीमा निर्धारण आदि कुछ ऐसे कदम हैं जो एक लंबी अवधि में भ्रष्टाचार को कम करने में कारगर होंगे। श्रीमती किरन बेदी का यह कथन पूर्णतः सत्य प्रतीत होता है कि " बिना शाशक और शाषित की बीच की दूरी को कम किये, भ्रष्टाचार को नही मिटाया जा सकता। अतः जरूरी है कि , हम अपने जिम्मेदारीयों के प्रति निष्ठावान रहें तभी हम एक भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को सच कर सकेंगे।
       पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम जी ने कहा था-----" अगर किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त एवं सुंदर मन वाले लोगों का देश बनाना है तो मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि समाज का तीन प्रमुख सदस्य यह कर सकता है,---'माता' , 'पिता',और 'गुरु'।।
        तो चलिए.. अपने स्तर पर हम छोटे छोटे प्रयास करके भ्रष्टाचारी रूपी इस जहरीले नाग के फन को कुचलने की तैयारी संकल्पित मन से करें और कहना न होगा कि शुरुआत हमें अपने घर से ही करने की जरूरत है।

मीना गोपाल त्रिपाठी
1 / 9 / 2021
[01/09, 1:04 pm] 
हेमा जैन 👩: 🙏अग्निशिखा मंच को नमन


 विषय :-हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार(लेख )

वर्तमान काल के तकनीकी विकास के युग में हर क्षेत्र में हर जगह आये दिन नई- नई चीजों का विकास बड़ी तीव्रता से हो रहा है। और इन्हीं के चलते भाषाओं में भी बदलाव हो रहे है आजकल हिंदी भाषा के बजाय अंग्रेजी बोलने में लोग शान समझते है उसके लिए क्लास लेते है और ना जाने क्या-क्या जतन करतें है इन सबके कारण हिंदी भाषा का प्रयोग कम होता जा रहा है जबकि ये हमारी मातृभाषा है हम सब का ये फर्ज बनता है कि अपनी मातृभाषा का यूँ अपमान नहीं होने देंगे उसके प्रचार- प्रसार के लिए इसकी शान बनाये रखने के लिए हर भरसक प्रयत्न करेंगे जैसे कि कुछ निम्न उपाय के माध्यम से हम अपनी हिंदी भाषा का प्रचार -प्रसार कर सकते है :-

1)अंग्रेजी भाषा के अलावा बाकी विषय की शिक्षा हिंदी भाषा में दी जाए।

2)माता -पिता तथा आजकल के युवा हिंदी भाषा बोलने में शर्म ना महसूस करे इसका सम्मान करे और गर्व से अपनी भाषा हर जगह बोले।

3)सारे शासकीय व अशासकीय जगहों पर कार्य के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग अनिवार्य किया जाए।

ऐसे कई तरीको से हम हिंदी भाषा का प्रचार -प्रसार कर सकते है।

हेमा जैन (स्वरचित )
[01/09, 1:12 pm] 😇
ब्रीज किशोर: *अंग्नि शिखा मंच*
  *१/९/२०२१/*
   *स्वतंत्र लेखन*
*जग मे है कितने राम*
**********************
राम हमारे राम तुम्हारे, इस जग मे है कितने राम।
सब के अपने अपने राम।

बालक राम अवध मे जन्मे।
कौशल्या के दुलारे राम।
दशरथ के प्राणो से प्यारे राम।
केकई के अति प्यारे राम।
जन जन के राज दुलारे राम।
सब के अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।

शबरी के है अपने राम जूठे बेर प्रेम से खाये राम।
सुतिक्षण के है अपने राम दिल मे अपना रुप दिखाये राम।
अनुसुइया के अपने राम पुत्र प्रेम मे बसते राम।
भरद्वाज के अपने राम कणकण मे है बसते राम।
सबके अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।

लक्ष्मण के अपने राम सेवा भाव मे बसते राम।
भरथ के अपने राम आज्ञा मे है बसते राम
शत्रुघ्न के अपने राम उनके मौन मे बसते राम।
सबके अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।

सुग्रीव के है अपने राम मित्रता मे बसते राम।
बाली के है अपने राम मोक्ष मे है बसते राम।
विभीषण के अपने राम शरणागत मे बसते राम।
रावण के है अपने राम दुश्मनी मे बसते राम।
हनुमत के है अपने राम रोम रोम मे बसते राम।
सबके अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।

 बालमीक के राजा राम रामायण पहले लिख डाला।
तुलसी के है प्रभूवर राम राम
चरित्र मानस लिख डाला।
सबके अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।

सबके प्रेम मे बसते राम।
सबके अपने अपने राम।
जग मे है कितने राम।
भारत के कण कण मे राम।
 *स्वरचित*
  *बृजकिशोरी त्रिपाठी*
[01/09, 1:19 pm] 
रामेश्वर गुप्ता के के: ।अग्नि शिखा मंच ।
हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार।
भारत की राजभाषा हिन्दी है। इसके प्रचार प्रसार के लिए सभी सरकारी और अर्ध सरकारी विभागों में हिंदी प्रचार एवं प्रसार के लिए ये संस्थाएं लगी है। सभी विभागों में हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है।
हिन्दी पखवाड़ा कार्यक्रम आयोजन में निम्न लिखित कार्यक्रम आयोजित होते है। 
1-वादविवाद प्रतियोगिता 
2-निबंध प्रतियोगिता 
3-हिन्दी कार्यशाला आदि। 
4-पत्राचार कार्यक्रम 
5-श्रुति लेखन
उक्त प्रतियोगिताएं हिन्दी और बिना हिन्दी क्षेत्रों के लिए अलग अलग आयोजित की जाती है। 
हमारे देश में हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसका स्तेमाल करीब करीब पूरे देश में किया जाता हे। हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए निम्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 
1-दूरदर्शन द्वारा प्रसारण 
2- सम्पर्क भाषा से प्रसार। 
3-हिन्दी पत्र पत्रिकायें। 
4-समाचार पत्र 
5-स्कूल और विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में। 
6-समाचार बुलेटिन। 
7-जनसम्पर्क भाषा है। 
उक्त कार्यक्रम से हिंदी ने शिखर भाषा का सम्मान प्राप्त किया है। 
संकलनकर्ता :
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[01/09, 1:49 pm] 😇
ब्रीज किशोर: *अग्नि शिखा मंच*
 . *स्वतंत्र लेखन*
          *लघुकथा*
      *मा का अकेला बेटा* 
        . *मोहन*
    *भीख नही आगे बढने का*
           *राह बताईये*
मोहन माँ का एकलौता बेटा
 थाऔर एक बेटी मुनिया थी
उसके पिता का देहांत हो चुका था माँ उसकी घरो मे बर्तन माँज कर दोनो बच्चों को पाल रही थी। मोहन अपनी माँ को काम करते देख कर दुःखी हो जाता।एक दिन वह एक कालोनी मे गया ऐसे ही खडा़ सोच रहा था एक मैडम को देखा तो बोल पडा़ मेमसाहब गार्डेन की सफाई करायेगीं।मैडम सोची 
लग रहा है यह लडका भूखा है। तो कुछ काम करना चाह रहा है खूद्दार है इसी लिए भीख न मागं कर काम मागं रहा है बोली अन्दर आ जाओ कुछ खाओगें मैडम बोली। लड़का कहा पहले गार्डेन साफ तो करले ठीक है मैडम बोली अच्छा पढ़ने क्यों नही जाते है मैडम क्या मजाक कर रही है खाने का ठिकाना नहीं पढने कैसे जाँय।तू पढ़ना चाहता है जी मैडम ले पहले खाँ ले फिर बात करते है नही मैडम घर ले जाऊँगा मुनिया और माँ के साथ खाऊँगा अच्छा रूक दो पराठा और ४० रू०लेले कल फिर आना। अच्छा रूको मै तुम्हारे घर तुम्हे छोड देती हूं।
    ... दुसरे दिन जब मोहन आया तो देखता क्या है मैडम के गेट के अन्दर सब्जी से लदा एक ठेला खडा़ है।देखते ही मोहन ने पूछा मैडम यह क्यों यहा है।मैडम ने कहा एक लड़का जो ठेला पर सब्जी बेचेगा और रात के स्कूल मे पढा़ई करेगा उसका है।मोहन आँखे चौडा़ कर कहता है सच मे मैडम जी। हां तू भी पढेगा ?वह बोला पढ़ता तो पर मै काम कब करूंगा मैडम बोली दिन मे सब्जी का ठेला लगाओ शाम को स्कूल जाओ।मुझे ठेला कौन देगा मैडम बोली इस ठेले को तुम्ही लेलो शाम को सब्जी बेच कर पैसा लेके आ जान फिर आगे बात होगी सब सब्जी का भाव बता कर मैडम बोली जाओ।
मोहन शाम को ठेला लेकर अन्दर आया और खुश हो कर बोला मैडम जी सारी सब्जी बिक गई मैडम बोली बहुत अच्छा सब पैसे का हिसाब ले कर देखा सौ रुपया मुनाफा हुआ था सौ रु०मोहन को देकर बोली यह माँ को दे देना और कल सबेरे मंडी से थोक भाव मे सब्जी लाना बेचने केलिए।
इसके बाद मोहन पढा़ई और सब्जी बेचना साथ साथ करने लगा।
धीरेधीरे आगें बढ़ते हाईस्कूल इन्टरमीडिएट फिर बी.ए पास कर सबइंस्पेक्टर की परीक्षा का आज रिजल्ट आया मोहन पास होगय था। मोहन को इन्टरव्यू देने जाना था सब्जी का ठेला मिठाई का डिब्बा ले कर मैडम के घर गया पैर छू के प्रणाम किया बोला मैडम मुँह मिठा करे और आशीर्वाद दे कल मेरा इन्टरव्यू हैं **मैडम खुश होकर बोली**मेरा आशीर्वद
हमेसा तुम्हारे साथ है मोहन 
बोला मैडम यह ठेला।इस ठेले से किसी और का जीवन
सुधार देना।
*बृजकिशोरी त्रिपाठी*
    **गोरखपुर यू.पी*
[01/09, 1:59 pm] 
रजनी अग्रवाल जोधपुर: पत्र शैली में
  "यादों का दर्द"

प्रिय छुटकू विवेक, असीम शुभाशीष!
              सदा खुश रहो और कर्मशील दयालु बने रहो । तुम्हें अमेरिका गए हुए आज पूरे 2 वर्ष हो गए हैं ।पर तुम्हारा एक भी पत्र नहीं आया। जबकि मैं तुम्हें 10 पत्र डाल चुका हूं । हां माना कि तुम मोबाइल पर मुझसे बात अक्सर कर लेते हो । पर पत्र वाली तृप्ति नहीं मिलती । रात बेरात जब आंख खुल जाती है और तारे गिनने की नौबत आ जाती है तब लगता है कि काश तुम्हारा एक पत्र भी मेरे पास होता तो मैं घंटों उसी को पढ़ने में व्यतीत कर देता । तुम्हारी याद बहुत आती है सारे फोटो, एल्बम छान मारे हैं। अवस्था के कारण कुछ बहक भी गया हूं ।स्वास और विश्वास भी कई बार डगमगा जाते हैं । अब श्वास पर विश्वास भी नहीं रहा अब तो कम से कम एक पत्र तो अपने प्यारे दादू को लिख दो, ताकि मन की संतुष्टि बरकरार रहेगी । यादों का दर्द कुछ तो हल्का हो जाएगा । नहीं तो तड़प तड़प कर रह जाता हूं । 
अपना पूर्ण ध्यान रखना । बात भी करते रहना । वहां की ठंड से बचना। खाना पौष्टिक ही खाना । यहां सभी कुशल मंगल है। तुम अपना ध्यान रखना। तुम्हारा अपना ही प्रिय दादू ,,,,,
रमाकांत

स्वरचित पत्र शैली में रचना -
    रजनी अग्रवाल
    जोधपुर
[01/09, 2:13 pm] 
Nirja 🌺🌺Takur: अग्निशिखा मंच 
तिथि- १-९-२०२१
विषय- लेख, पत्र, निबंध

प्रिय रुनझुन
        खुश रहो
      पिछले पत्र में तुमने हिंदी भाषा के व्यंजन के विषय में पूछा था ,वह बता रही हूंँ। 
         हिंदी भाषा बहुत समृध्द भाषा है। में व्यंजन मूलत: ४ प्रकार के होते हैं
१- स्पर्श व्यंजन
२- अंत्स्य व्यंजन
३- उष्म व्यंजन
४-संयुक्त व्यंजन

        आज हम स्पर्श व्यंजन के विषय में बात करते हैं। स्पर्श व्यंजन ये संख्या में २५ होते हैं।

१- क वर्ग- इसमें आते हैं
क ख ग घ ड़- ये कंठ से बोले जाते हैं,
इस लिए इन्हें कंठ्य कहा जाता है। 
२- च वर्ग- इसमें हैं च छ ज झ इय् ये तालू के स्पर्श से बोले जाते हैं इस लिये इन्हें तालव्य कहा जाता है। 
३-ट वर्ग- इसमें ट ठ ड ढ ण ये मूर्धन्य वर्ण कहलाते है। 
४-त वर्ग- इसमें हैं त थ द ध न ये दांतों के स्पर्श से बोले जाते हैं। इस लिए यह दंत्य वर्ण कहलाते हैं। 
५- प वर्ग- इसमें हैं प फ ब भ म ये ओंठ के स्पर्श से बोले जाते हैं इसलिए इन्हें ओंष्ठ्य वर्ण कहे जाते हैं। 
     ये स्पर्श व्यंजन हैं। 

२अंतस्थ व्यंजन-इसमें है़ य र ल व 
३ - उष्म व्यंजन- इसमें है़ श ष स ह
४-संयुक्त व्यंजन- श्र क्ष त्र ज्ञ 
संयुक्त व्यंजन आधे होते हैं जो दूसरे वर्ण से जुड़ते है़। 
जैसे-
श्र- र
आधा श+ आधा र
क्ष-आधा क+आधा ष
त्र- आधा त+आधा र
ज्ञ- आधा ज+आधा य
 ज+आधा य

       अच्छा रुनझुन। आज के लिए बस इतना ही बाकी बाद में
                तुम्हारी मम्मी
              नीरजा ठाकुर नीर
          पलावा डोम्बिवली
             महाराष्ट्र
[01/09, 2:28 pm] 
ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: हरिवंश राय बच्चन ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
मन्दिर मस्जिद बैर कराते
मेल कराती मधुशाला
इन महान पंक्तियों के रचयिता, महान छायावादी कवि, जिसने बिना मदिरा पिलाये कई पीढ़ी के लोगों को मदहोश कर दिया, कितने लोगों ने बच्चनजी की मधुशाला पढ़ कर , इनके दीवाने हो गये , इसका हिसाब किसी के पास नहीं है. निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य का वह स्वर्णिम युग रहा होगा, जिस युग में बच्चनजी हुए. 27 नवम्बर 1907 में इलाहाबाद के पास एक छोटे से गाँव में आप का जन्म हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए की शिक्षा पूरी करने के उपरांत वहीं पर प्रध्याआपक हुए. राज्यसभा के सदस्य व विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया.
इनके रचनाओं की लम्बी सूची है, उसका वर्णन करना सूरज को दीपक दिखाना है. लेकिन उनके लिखे अग्निपथ की निम्नलिखित पंक्तियाँ बहुत ही प्रेरणादायक है
तूं न थकेगा कभी
तू न रुकेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
इस प्रकार आपकी कविता संग्रह दो चट्टानें की निम्न पंक्तियाँ निराश व्यक्ति को बहुत ही प्रेरणा देती हैं.
हिम्मत करने वालों की
कभी हार नहीं होती
फिर लिखा है
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चढती
चढती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
इस महान कवि विचारक को मेरा शत् शत् नमन्.
------ ओमप्रकाश पाण्डेय
[01/09, 2:40 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय
सामाजिक चेतना

समाज की पृष्ठभूमि में मानव का जीवन घुला मिला हुआ है समाज हमारे संवेदना है संविधान है हमारे मूल्य हैं सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन करना हर पारिवारिक व्यक्तियों का उत्तरदायित्व के साथ-साथ एक कर्तव्य भी है
   आधुनिक समाज के एक पहलू पर मैं अपना विचार व्यक्त कर रही हूं वह पहलू है विवाह।
विवाह के बदली हुए स्वरूप को देखते हुए मन में बहुत सारे भावनाएं और विचार उठने लगती हैं आज विवाह संस्कार नहीं है बल्कि एक समारोह बन गया है।
सामाजिक पुरुष मालवीय जी से उनके एक मित्र से पूछा आजकल विवाहों के बाद दंपत्ति में जैसी एकरूपता दिखनी चाहिए वह नहीं दिखती है इसका क्या कारण है।
मालवीय जी बोले इसके कारण तो अनेक हैं विवाह के साथ जुड़े उच्च आदर्शों पर से लोगों की आस्था हट चुकी है और आज विवाह एक समारोह बनकर रह गया है यही कारण है आधुनिक समाज में वैवाहिक जीवन में स्थिरता नहीं बन पा रही है क्योंकि संस्कार का प्रभाव उसमें कभी नहीं भर पाया।
मालवीय जी के ख्याल से पुनः समाज का निर्माण करना अति आवश्यक है क्योंकि विवाह के माध्यम से ही समाज का नया विकास होता है और नए पुष्ट करते हैं नए पुष्प सुगंधित हो चरित्रवान हो उसके लिए संस्कार की अति आवश्यकता है संस्कार एक व्यवहार है जिसकी सामाजिक मूल्य होते हैं जिन सामाजिक मूल्यों का अस्तित्व खत्म हो जाता है वहां पर संस्कार का विनाश होने लगता है और पारिवारिक सामाजिक जीवन में भी खराब बढ़ जाता है जिसके कारण तनाव उन्माद अपराध की संख्या बढ़ जाती है।
   इसलिए वैवाहिक जीवन को समारोह ना बनाया जाए बल्कि इसे संस्कार वान बनाया जाए।
पाश्चात्य देशों की नकल करके हम अपने भारतीय संस्कृति से सभ्यता से धीरे-धीरे विमुख होते जा रहे हैं और दूसरी ओर विदेशों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का परचम लहराया जा रहा है भारत की संस्कृति और सभ्यता एक सनातन धर्म पर निर्भर करती है जिसमें ऋषि मुनि का बहुत वैचारिक संबंध बना रहा है।
इसलिए हमें अपनी चेतना को सामाजिक चेतना को धीरे-धीरे फिर से जगाना है जो बीत गई है उस पर तो अब किया नहीं जा सकता लेकिन आगे का समय को सुधारना अति आवश्यक है

कुमकुम वेद सेन
[01/09, 2:46 pm] 
👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏

🙏🌹विषय: *हिंदी में छिपे अद्भुत भाव* 🌹🙏
🙏🌹 जय अम्बे🌹1/8/21🌹🙏

अ, ऊ म, से ॐकार, अंतर मन में प्रकाशमान,
हिंदी में है स्वर ज्ञान, करते हिंदी भाषा को प्रणाम, 

संस्कृत की बेटी है हिंदी, दैवत्व भाषा है सुहानी, 
मधूर झृँकार ह्रदय जगाती,हिंदी भाषा मनको भाती, 

राष्ट्रभाषा, राज्यभाषा, मांँ जैसी होती अभिलाषा, 
हिंदी हमारी मातृभाषा, करते हिंदी भाषा को नमन, 

मींरा सूरदास कबीर के भाव, दोहा, छंद, अलंकृत श्रिँगार,
सहज, सरल, गुंजन,उल्लास,निर्मल, तरल, हिंदी,मनभावन,

वंँदेमाँतरम् की शान है, रामायण की पहचान है, 
पुराणों की आत्मा हिंदी, शहीदों की शान है, 

हिंदी फिल्म की महारानी, गौरव गाथा की कहानी, 
हरेक प्रान्त को जुडनेवाली, हिंदी है सभ्यता की निशानी, 

🙏🌹 पद्माक्षी शुक्ल,🌹🙏
🙏🌹स्वरचित रचना, 🌹🙏
[01/09, 3:01 pm] 
रानी अग्रवाल: १-९-२०२१.बुधवार
विषय_हिंदी भाषा का 
प्रचार_ प्रसार। विधा_लेख।
हिंदी हमारी(भारत की) राष्ट्रभाषा है। हर देश के लिए उसकी राष्ट्र भाषा गर्व की बात होती है।किसी देश की समृद्धि_संपन्नता उस देश की राष्ट्र भाषा की समृद्धि_संपन्नता से मापी जा सकती है,राष्ट्रभाषा जितनी उन्नत होगी,राष्ट्र भी उतना उन्नत होगा।
     अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए भूतकाल से लेकर आधुनिक काल तक अनेकों प्रयास किए गए हैं।१४सितंबर, १९४९में संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का स्थान दिया।"मेरा मानना है कि राजभाषा की जगह राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग अधिक उचित रहता।"इसलिए अब भारत में १४ सितंबर को हिंदी_ दिवस के रूप में मनाते हैं।पहला विश्व हिंदी सम्मेलन १०जनवरी,१९७५
को नागपुर में हुआ था जिसमें १२२ देशों ने भाग लिया था।भारत में हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या ७०करोड़ है।विश्व स्तर पर इसका दूसरा स्थान है। चीन की मैंडरिन भाषा प्रथम स्थान पर है वैसे अभी अंग्रेजी हर भाषा पर हावी है

हिंदी साहित्य बहुत समृद्ध है।हिंदी के महान साहित्यकारों ने हिंदी के प्रचार_प्रसार,विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया है।जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र के मंडल ने,महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का अनूठा योगदान रहा है,राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जैसे अनगिनत नामों से हिंदी साहित्य की सेवा हुई है।इसके अलावा साहित्यिक_सामाजिक संस्थानों ने भी हिंदी के विकास के लिए सराहनीय कार्य किए हैं।राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी का तो हिंदी प्रेम तो सर्वविदित है,स्वयं हिंदी सीखना, औरों को सिखाना,दक्षिण भारत के हिंदी
क्षेत्रों में इसका विकास करने का उन्होंने पूरा प्रयत्न किया।
     राष्ट्रभाषा के विकास के लिए राजनैतिक इच्छा का होना बहुत जरूरी है।इसके लिए राजनैतिक दल भी अपना योगदान दे सकते हैं।आजकल देश व अन्य कई राज्यों में भाजपा की सरकार है जो हिंदी की समर्थक है,स्वदेशीकरण भी इनका मुद्दा है, सो ये भी बहुत कुछ कर सकते हैं जैसे_सरकारी कामकाज अनिवार्य रूप से हिंदी में हो, सब परीक्षाएं हिंदी में हों, कोर्ट की भाषा हिंदी को बनाकर,राजभाषा या राष्ट्रभाषा केंद्रों की स्थापना कर,अहिंदी भाषियों की सहमति लेकर इत्यादि।
     किसी भी भाषा के विकास के लिए उसमें लचीलापन होना आवश्यक होता है।हिंदी ने उर्दु, फारसी,अंग्रेजी भाषा के शब्दों को अपनाया है।हिंदी के और विकास के लिए हिंदी में वैज्ञानिक शब्दावली का विकास होना चाहिए,आजकल कंप्यूटर,लैपटॉप का युग है उनमें भी हिंदी भाषा होनी चाहिए,हिंदी में शोध कार्य होने चाहिए।
     खैर इतिहास दोहराने या कोसने से कोई लाभ नहीं होने वाला है। यदि हम आज अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से निभा गए तो आने वाले समय में निश्चित रूप से हिंदी विश्वभाषा के सिंहासन पर विराजमान हो जायेगी। बीज हमारे पूर्वज बो गए हैं,हमें उनकी फसल को संरक्षण देना है और आने वाली पीढ़ी हमारे इस श्रम का फल अवश्य चखेगी।
     हमें अपने योगदान पर ध्यान देना चाहिए इसलिए अपना ये अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच भी अपना योगदान दे रहा है और हम भी यानि मैं और आप भी उसमें आंशिक ही सही अपना योगदान दे रहे हैं जैसे रामायण में गिलहरी ने रामसेतू बनाने में अपना योगदान दिया था।हमें इस प्रवृत्ति के लिए औरों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए।
    अंत में निम्न उक्ति से लेख का समापन करती हूं_____
निज भाषा उन्नति अह,
               सब उन्नति कौ भूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के,
             मिटे न हिय कौ शूल।।
स्वरचित मौलिक लेख_____
रानी अग्रवाल,मुंबई.१-९-२१.
[01/09, 5:21 pm] 
Chandrika Vyash Kavi: विषय --: मन की भाषा हिंदी

     मन की भाषा है हिंदी
फिर क्यों फल फूल रही अंग्रेजी
     कारण जानकर अंजान
     बनते हैं हम सभी !
     
व्यापार ,व्यवहार के विस्तार में
   होता है अंग्रेजी का प्रसार
    धन कमाने का तरीका
   होता है भाषानुसार !

   जुडी़ हर काम से इसीलिए
     बनी वह मान की भाषा
  आज विश्व का अभिमान बन
      खडी़ है अंग्रेजी भाषा !

      बचपन में जब दादी नानी 
      खिंचती थी झूले की डोरी
      तब कानों में रस घोलती थी
        हिंदी में ही मां की लोरी !

         हिंदी मेरे मन की भाषा है
        बने अब राष्ट्र की भाषा 
        यही हर हिंदी प्रेमी की
        बनी है जीवन की अभिलाषा !
        
       हिंदी महज भाषा ही नहीं 
        इसमें हमारी मां बसती है
      एकता में अनेकता की सुवास
         लिए विश्व में प्रसरति है!

         भाषा का प्रवाह जब
         बनती है नदी की धारा 
        होता सागर से मिलकर
         जिस भाषा का संगम
         वह हिंदी ही होती है !

     बना हिंदी को राज भाषा
     काम अग्रेजी में करते रहे
       अगर भाषा मरी तो 
     बच नहीं पायेंगे हम भी !

   गुणों की खान लेकर भी 
   बिना हिंदी हम कुछ रच नहीं सकते
    अपने ज्ञान के भंडार का पट
     हम खोल नहीं सकते !

तो ,
   आओ बाजार से हटा दें 
       हम अंग्रेजी भाषा
  बना लें फिर से हिंदी को
    हम व्यापार की भाषा
    बना लें फिर से हिंदी को
      अपनी प्यार की भाषा
    बना लें फिर से हिंदी को
      अपने मन की भाषा !

आओ पहचान दे हिंदी को
    विश्व के हर कोने में
सम्मानित कर अपनी भाषा को
     परचम अपना फहरायें !

            चंद्रिका व्यास
         खारघर नवी मुंबई
[01/09, 5:23 pm] Chandrika Vyash Kavi: क्या ईमानदारी से कर्म किया जा सकता है? 

जब कोई व्यक्ति बेईमानी या धोखे जैसा कोई अपराध करता है तब लोग गुस्से से यही कहते हैं "जैसा बोओगे वैसा पाओगे" अथवा जैसी करनी वैसी भरनी " वगैरह वगैरह कई बातें मुंह पर चिपका देते हैं ! यह भी निश्चित है कि बेईमानी से किये कर्म का फल बुरा और भले कर्म का फल भला होता है..... हां! कर्म का फल मिलने में समय भले ही लगे पर मिलता अवश्य है किंतु ....

आज की परिस्थिति को देख लोगों को कहते सुनते हैं इस जमाने में सच्चाई और ईमानदारी से नहीं जिया जा सकता! यदि हमें जमाने के साथ चलना है तो थोड़ी बेईमानी का सहारा तो लेना होगा! भ्रष्टाचार से परहेज न कर बहती गंगा में हाथ धो मौके का फायदा तो उठाना ही होगा !आज की यही सच्चाई है किंतु... क्या यह सही है ? कदापि नहीं! 

यदि विद्यार्थी कक्षा में प्रथम श्रेणी मे पास होना चाहता है तो उसे परिश्रम करना होगा ना कि नकल कर! कठोर श्रम की आदत डालनी होगी! विषम परिस्थिति में भी दृढ़ता के साथ अपने अच्छाई को लेकर ही चलना चाहिए ! बेईमानी करके हम परिस्थिति को दोषी नहीं ठहरा सकते! 
बेईमानी से मिला सुख क्षणभंगुर है किंतु इमानदारी से मिले फल का स्वाद युगों युगों तक लोगों की जुबान पर रहता है !
और.... यही सच है! 

           चंद्रिका व्यास
        खारघर नवी मुंबई
[01/09, 5:25 pm] +91 70708 00416: बेरोज़गारी
      ************
 "बेरोज़गारी के तानों से
  दर्द नहीं होता साहब
   दर्द तो तब होता है
    जब खुद पर ही
    भरोसा कायम ना रहे"
           बेरोज़गारी भारत देश में बढ़ती हुई समस्या है जिस प्रकार भारत की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है उसी प्रकार बेरोजगारी की समस्या भी निरन्तर बढ़ती जा रही है।बेरोजगार युवक-युवतियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोज़गारी की बढ़ती समस्या निरन्तर हमारी प्रगति, शान्ति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है।
      बेरोज़गारी समाज के लिए एक अभिशाप है इससे न केवल व्यक्तियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि बेरोजगारी पूरे समाज को भी प्रभावित करती है।
भारत में बेरोज़गारी को बढ़ाने वाले कारक--
1-जनसंख्या में वृद्धि-देश की जनसंख्या में तेजी से होती वृद्धि बेरोज़गारी के प्रमुख कारणों हूं से एक है।
2-मंदा आर्थिक विकास-देश के धीमे आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप लोगों को रोजगार के कम अवसर प्राप्त होते हैं जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।
3-मौसमी व्यवसाय-देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में जुड़ा हुआ है। मौसमी व्यवसाय होने के कारण यह केवल वर्ष के एक निश्चित समय के लिए काम का अवसर प्रदान करता है।
4-कुटीर उद्योग में गिरावट-कुटीर उद्योग में उत्पादन काफी गंभीर गया है और इस वजह से कई कारीगर बेरोजगार हो गये हैं।
5-मौसमी व्यवसाय-देश की आबादी का बड़ा हिस्सा क़ृषि क्षेत्र में जुड़ा हुआ है। मौसमी व्यवसाय होने के कारण यह केवल वर्ष के एक निश्चित समय के लिए काम का अवसर प्रदान करता है।
बेरोज़गारी खत्म करने के लिए निम्नलिखित समाधान हैं---
1-जनसंख्या पर नियंत्रण-यह सही समय है जब भारत सरकार देश की आजादी को नियंत्रित करने के लिए कठोर कदम उठाये।
2-शिक्षा व्यवस्था-भारत में शिक्षा प्रणाली कौशल विकास की बजाय सैद्धांतिक पहलुओं पर केन्द्रित है। कुशल श्रमशक्ति उत्पन्न करने के लिए प्रणाली को सुधारना होगा।
3- औद्योगिकरण-लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर बनाने के लिए सरकार को औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने चाहिए।
4-विदेशी कंपनियां-सरकार को रोजगार की अधिक संभावनाएं पैदा करने के लिए विदेशी कंपनियों को अपनी इकाइयों को देश में खोलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
5-रोजगार के अवसर-एक निश्चित समय में काम करके बाकी समय बेरोजगार रहनेवाले लोगों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा किए जाने चाहिए।
   देश में बेरोज़गारी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। हालांकि सरकार ने रोजगार सृजन के लिए क‌ई कार्यक्रम शुरू किए हैं,पर अभी तक खास प्रगति हासिल नहीं हो पाई है।नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए।
   वर्तमान में सरकार इस बात पर अधिक बल दे रही है कि देश के सभी युवक स्वावलंबी बनें। वे केवल सरकारी सेवाओं पर ही आश्रित न रहें अपितु व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण कर स्वरोजगार हेतु प्रयास करें।
    नवयुवकों को उद्यम में लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान कर रही है तथा उनको उचित प्रशिक्षण देने में सहयोग कर रही है। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि बदलते परिपेक्ष्य में हमारे देश के नवयुवक कसौटी पर खरे उतरेंगे और देश में फैली बेरोज़गारी जैसी समस्या दूर रहने में सफल होंगे।
" पढ़ा लिखा मैं कलमकार
घर पर बैठा बेकार
समाज करता तिरस्कार
यारों मैं भी हूं बेरोजगार"

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[01/09, 5:30 pm] 
सुरेन्द्र हरडे: अग्नि शिखा मंच को नमन
विषय *हिंदी राष्ट्रभाषा*
विधा :- स्वतंत्र लेख

     भारत में हिंदी का सम्मान सदा-सर्वदा से होता आया है। 
हिंदी भारत मां की बिंदी है, ऐसा बोला तो अतिश्योक्ति नहीं होंगी। आज भी भारत में हिंदी भाषा का बोल बाला है केवल दक्षिण के राज्य छोड़ दिए सारा हिंदी -हिंदी है! बीच में देश पारतंत्र होने पर या उर्दू और अंग्रेजी का बोलबाला रहा जो कि अंग्रेजों के आने से हुआ किंतु आज स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी हिंदी इस भार को सहर्ष सहन कर रही है!
   भारत के प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण बोलकर हिंदी का विश्व विख्यात कराने में बहुत बड काम किया हैं आदरणीय नरेंद्र मोदी जी हिंदी के प्रति बड़ा सम्मान रखते हैं।
     किंतु आश्चर्य इस बात का होता है कुछ विचारक हिंदी के राष्ट्रभाषा पढ़ने का विरोध करते हैं मेरा मत है वह नहीं चाहते अंग्रेजी भाषा और में पले हुए कुछ विचारक अंग्रेजी कोई राष्ट्रभाषा के पद पर देखना चाहते हैं ऐसे विचारों को विकृति समझना चाहिए। महात्मा गांधी लोकमान्य तिलक राष्ट्र को स्वतंत्र करना है हिंदी अपनाना चाहिए जनमानस की भाषा है बोलचाल की भाषा हिंदी है इस भाषा में अपनापन व्यवहारिकता आती है इस बात का साक्षी है कि जब दो विभिन्न प्रदेशों के निवासी आपस में मिलते हैं तो संवाद हिंदी में होता है प्राय: सभी भाषाओं का विकास संस्कृत से हुआ है और हिंदी संस्कृत की सबसे बड़ी पुत्री है इसलिए हिंदी बोलने वाले प्राय:सभी प्रादेशिक भाषाओं का थोड़ा बहुत तो समझ लेते हैं विदेशी भाषाओं का बोलने वाली हिंदी को थोड़ा बहुत समझ लेते हैं!
     इसी कारण १४ सितंबर १९४९मे संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का स्थान दिया है मेरा मानना है कि राजभाषा की जगह राष्ट्रभाषा शब्द का बोला जाता तो और अच्छा होता।
विश्व का प्रथम हिंदी सम्मेलन १० जनवरी १९७५ को नागपुर में हुआ! हिंदी अपने गुणों से अपनी लोकप्रियता की बूते न जाने कब से सारे भारत का कंठ हार बन चुकी थी राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त कर चुकी थी भारत सरकार ने तो उसे सिर्फ दफ्तरी भाषा का पद दे दिया है दफ्तरी भाषा के पद पर हिंदी को प्रतिष्ठित किये जाने को ही हिंदी भाषियों ने अपनी विजय मान ली है और वह फूले नहीं समा है लेकिन अपना कर्तव्य हो भूल गए उन्हें जो अपने घर में करना चाहिए नहीं किया और हिंदी के दिग्विजय की कल्पना विभोर हो गए तथा उन्हें आज हिंदी दिवस मनाया जा रहा है।
     मेरा विश्वास है यदि हिंदी भाषी जनता हिदी को अपनाना चाहिए तो फिर कोई कारण नहीं कि हिंदी राज्यों में राजकाज के हिंदी करण की तुरंत में संपन्न किया जा सकता दुख इस बात का है हिंदी भाषियों की अपेक्षा हिंदी भाषियों ने ही अधिक प्रयत्न किए जिनमें श्री गोपालाचारी भी प्रमुख रहे हैं हिंदी को अपनाना चाहिए अपने बच्चों को हिंदी पढ़ना चाहिए।

    *जय -हिंदी -जय -भारत*

सुरेंद्र हरडे (समिक्षक)
नागपुर 
दिनांक ०१/०९/२०१
[01/09, 6:10 pm] 
डा. अंजूल कंसल इन्दौर: किताब - मधुशाला 
लेखक -डा हरिवंश राय बच्चन

पद्मभूषण पुरस्कृत लोकप्रिय कवि डा हरिवंश राय बच्चन की कालजयी कृति मधुशाला है।इसके प्रथम पृष्ठ पर कवि ने लिखा है - 
      मिट्टी का तन,मस्ती का मन
     क्षण भर जीवन,मेरा परिचय।
महाकवि सुमित्रानंद पंत के शब्दों में"मधुशाला की मादकता अक्षय है"
मधुशाला बच्चन की एक ऐसी कृति है,जिसने लोगों को उनका दीवाना बना दिया था।मंच पर जब उनके नाम की घोषडा़ की जाती थी तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गडा़हट से गूंज उठता था।
   शहरों और गाँव की गली-गली में मधुशाला की रुबाईयाँ गाई जाती थीं।बच्चन की मदिरा ग़म गलत करने या दुख को भुलाने के लिए नहीं है,वह शाश्वत जीवन-सौंदर्य एवं शाश्वत प्राण चेतना- शक्ति की सजीव प्रतीक है।
   छायावादी दौर में बच्चन जी ने अत्यंत सरल भाषा में काव्य रचा,जिसने हिन्दी साहित्य को आलोकित किया।मधुशाला में हाला,प्याला, मधुबाला,और मधुशाला के चार प्रतीकों के माध्यम से कवि ने अनेक क्रांतिकारी,मर्मस्पर्शी,रागात्मक एवं रहस्यपूर्ण भावों को वाणी दी है।
  मेरी पसंदीदा मधुशाला की कुछ पंक्तियां - -
पहले भोग लगा लूं तेरा,फिर प्रसाद जग पाएगा
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।

प्रियतम,तू मेरी हाला है,मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भर कर तू बनता है पीनेवाला

एक बरस में एक बार ही,जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाजी,जलती दीपोँ की माला

        दुनिया वालों,किन्तु किसी दिन
        आ मदिरालय में देखो
        दिन को होली, रात दीवाली
        रोज मनाती मधुशाला।
मधुशाला की एक एक रुबाई पाठक के रागात्मक भावों को जगाकर उसके कोमल और एकान्तिक क्षणों को अद्भुत मादकता में रसलीन कर देती है।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
26-9-20
[01/09, 6:26 pm]
 निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच
विधा-निबंध/आलेख
दिनाँक-1/9/2021
 विषय। :-स्वतन्त्र;(-लिंग भेद व शिक्षा)।

हमारी सनातन कालीन भारतीय संस्कृति सदा से नारी का सम्मान करती आयी है।ऋग्वेद काल में नारी को नर से अधिक महत्व दिया गया।वह शिक्षा सामाजिक ढांचे सभी मे अहम भूमिका निभाती रही।परन्तु धीरे धीरे समय काल के परिवर्तन के साथ इस देश पर विदेशी शक्तियों ने अधिपत्य कायम करना आरंभ कर दिया जिसका प्रभाव नारी की स्थिति पर भी पड़ा उसे भोग्या माना जाने लगा और उसकी स्वाभाविक चेतना का दमन कर के उसकी स्थिति में पतन होने लगा।जिसका परिणाम ,""लिंग भेद"के रूप में दिखाई दिया।।
सबसे पहले उसकी शिक्षा व अभिव्यक्ति पर आघात हुआ।।बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियां इसी की देन रहीं।
परन्तु अनेक समाज सुधारकों ने इन कुप्रथा को रोकने का हर सम्भव प्रयास किया।।सती प्रथा तो बंद हो गयी।पर बाल विवाह व अशिक्षा अभी भी कहीं कहीं दृश्य हो जाते हैं।जिनका उन्मूलन आवश्यक है।
यहां मै लिंग भेद के बारे में अपने कार्य क्षेत्र का अनुभव(ग्रामीण)साझा करना चाहूँगी।जिसका मुझे सदा मलाल रहता है।।
पिछले वर्ष ही जो बालिका कक्षा 10 उत्तीर्ण हुई उसके विवाह का कार्ड मिला मुझे हैरानगी के साथ दुख हाउस कि एक प्रतिभाशाली बालिका अपने घर परिस्थिति के आगे घुटने टेक गयी!

मैं बच्चों को समझाती हूँ कि भगवान ने तो सिर्फ इंसान का सृजन कियासबको सम भाव दिया।।परन्तु इस दुनिया मे मनुष्य ने इनमें भेद कर डाले जाति ,धर्म अमीरी गरीबी के।।सबसे अधिक दुखदायी लिंग भेद का होना है।''आज भी अनेक स्थलों पर लड़का लड़की में जन्म सेलेकर परवरिश व सुख सुविधा ,शिक्षा सभी जगह भेदभाव किया जाता है।मैने अपने शिक्षकीय जीवन मे भी देखा।आज भी बालिकाएं घर मे छोटे भाई बहनों के रख रखाव के लिए पढाई छोड़ घर मे रहतीं हैं जबकि उनके हमउम्र भाई पढ़ने के नाम पर शाला आते हैं और ध्यान से पढ़ते भी नहीं।।कहीं कहीं पर बेटे की चाहत में 5-6 बेटियां होती जाती हैं ।और यही कहतीं हैं एक भाई हो जाता मेडम।।
उन बेटियों की निश्छल मुसुकान व सजल आंखें दिल मे क्रंदन उतपन्न कर देती हैं।उन्हें समझाती हूँ पर लगता है उन्हें समझाने का क्या फायदा।उनके माता पिता तो शाला आते ही नहीं ।कभी बेटी जागरूकता पर कुछ स्लोगन लिख कर भी सन्देश देने का प्रयास करती हूँ।।काश इन सबका कोई ठोस निराकरण कर पाती।।सदा मलाल रहता है।।
निहारिका झा।।🙏🙏
[01/09, 6:44 pm] 
आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: अग्निशिखा मंच के नमन 
विषय -- स्वतंत्र लेख

" कर्म करना ही धर्म है।"

कोरोना की दूसरी लहर ने ऐसा कहर ढाया कि अभी तक जन सामान्य उस पीड़ा से उबर नहीं पाया है विशेषकर युवा वर्ग बहुत चिंतित है क्योंकि उनका एक पूरा साल बर्बाद हो चुका , दूसरा साल भी अभी अधर में है और अब तीसरी लहराने वाली है क्या होगा? विद्यार्थियों का भी यही हाल है लेकिन हिम्मत नहीं हारना है ।हमें निराशा की कुहासा को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है और न कायरों की तरह हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना है। काम करते रहो, रुकना नहीं है ,कर्म करना ही हमारा धर्म है। आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।आशा की डोर पर ही तो जीवन की पतंग उड़ती है।आशा ही वह ऊर्जा है जो शरीर में नए प्राणों का संचार करती है। धैर्य व आत्मविश्वास के साथ हमें कर्तव्य मार्ग पर चलते रहना चाहिए ।
जो बीत गया है,उसे जाने दो अब आशा से भर कर जीवन को देखो ।निराशा और नकारात्मक दृष्टिकोण से देखोगे तोआगे का रास्ता धुंधला हो जाएगा। अनंत धैर्य ,विश्वास और आशा से अपनी मंजिल को देखो ।जो आज नहीं हुआ है ,वह कल अवश्य होगा ,कल नहीं तो परसों अवश्य होगा।हमारे प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होंगे। प्रतीक्षा और आशा जीवन पथ के दो ऊँचे प्रकाश स्तंभ है ।लेकिन ऐसी चीजों को परिस्थितियों को अपने आसपास के व्यक्तियों के अंधेरे हिस्से की तरफ मत देखो जहांँ से स्थितियां कष्ट पूर्ण और प्रतिकूल दिखाई देती हैं। देखो तो उस हिस्से को देखो जहांँ से प्रकाश छन - छन कर आ रहा है। हर किसी के उज्जवल पक्ष के उजाले की ओर देखो ।बगीचों में फूल और कांँटे दोनों होते हैं लेकिन हमेशा कांँटो के बीच खिले गुलाब की ओर देखोजो जीवन को महकाते हैं। मुश्किलें आने पर उनका सामना करते हुए आगे बढ़ते रहो।हारना नहीं है ,जीतना सीखो अतः निराशा का त्याग कर उत्साह ,लगन ,विश्वास के साथ आगे बढ़ो ,एक न एक दिन तुम्हें मंजिल अवश्य मिलेगी।

आशा जाकड़ (शिक्षिका व साहित्यिकार)
9754969496
[01/09, 6:50 pm] 
पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 🌹🙏
              🌳लेख🌲
      🌲दिनांक:01/9/2021🌲
***************************************
🌹
***गुरुर्ब्रह्मा,गुरुर्विष्णु,गुरुर्देवो महेश्वर
     गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरु वेनमः***
       मनुष्य विवेक शील प्राणी है,जिसकी अपनी विशेषताएँ हैं ,बचपन से ही सीखने
/जिज्ञासा की भावनाओं का होना,,,मनुष्य का गुण है।अतीत काल से गुरु और शिष्य की परंपरा चली आ रही है ।
     जिनको हम भगवान मानते हैं, उनके भी गुरु हुए हैं । राम के गुरु वशिष्ठ, कृष्ण के गुरु संदीपनी,पाण्डवों के गुरुद्रोणाचार्य ,   
को कौन नही जानता !! 
     गुरु ज्ञान के दाता होते हैं, जिनसे
 आचरण से लेकर व्यवहारिक ज्ञान तक    
हम सीखते हैं। जीवन में उत्कर्ष प्राप्त करने के लिए गुणवत्ता का होना आवश्यक है , जो हमें गुरुओं से प्राप्त होता है ।
     वैसे तो मानव की चेतना ही ऐसी है कि किसी से भी हम अच्छे गुणों को सीखना चाहते हैं ।
      सूफी धर्मग्रंथों में सुग्गा को गुरु माना गया है ---
  " गुरु सुआ जेहिं राह दिखावा।
        बिन गुरु जगत को निर्गुण पावा ।।" 
 गुरु की परंपरा के क्रम में हम माता- पिता को कैसे भूल सकते हैं, ये हमें केवल जीवन ही नहीं ,बचपन के संस्कार देते हैं । 
कहा भी गया है कि ,,,,," माँ की गोद ही बच्चों की प्रथम पाठशाला है । "
       गुरुओं के प्रति हमारे मन में आदर और सम्मान का भाव रहता है क्योंकि गुरु 
के द्वारा ही हमारे अवगुण दूर होते हैं ।भक्ति काल के पुरोधा कवि कबीर ने बहुत
कुछ कहा है---गुरु के संबंध में, दो-चार पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रही हूँ--
"गुरु-गोविन्द दोउ खड़े,का के लागूँ पांय।
 बलिहारी गुरु आपने,जिन गोविंद दियो बताय।।"
      और यह भी कहा है कबीरदास जी ने--
"गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है,गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।। "
   शिक्षा देने के क्रम में यदि गुरु, अपने शिष्य को दंडित करता है तो, एक तरह से
वह उसका उपकार ही करता है ।
     हमारी हिन्दु संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि,,,,* गुरु पूर्णिमा * को       
समर्पित है । हम सभी इस दिन अपने -
अपने गुरु को याद करते हैं ।
    5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है,,इस दिन सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी (भारत के द्वितीय राष्ट्रपति)के जन्मदिन के उपलक्ष्य में, उनको याद करते हुए,,,,अपने गुरु को याद करते हैं, उपहार आदि भी देते हैं ।
    इन दिनों को, गुरु के लिए सुख ,स्वास्थ्य 
और संवृद्धि की कामना करते हैं , मीडिया
भी इन कार्यक्रमों में अपनी मुख्य भूमिका 
निभाते हैं । यह समारोह हम सभी दिल से मनाते हैं,क्योंकि आजीवन मनुष्यअपने
गुरु को याद किया करते हैं,,,,यह मीडिया का दिखावा भर नहीं है ,सच्चे दिल से गुरु 
की सेवा- वंदना है,,,,,,।
🌹🙏🙏🌹🙏🙏🌹🙏🙏🌹🙏
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-- डॉ पुष्पा गुप्ता ,
मुजफ्फरपुर, बिहार--
🔵⚫❤️🟣🌴🔵⚫❤️🟣🌴🔵⚫❤️🟣🌴







[01/09, 8:47 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
बुधवार -1/9/2021
विधा - स्वतंत्र- पत्र - निबंध - लेख
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विषय : ‘र’ का रहस्य
 मित्रो, देवनागरी वर्णमाला कितनी वैज्ञानिक है इसकी चर्चा तो आपने सुनी ही होगी। यहाँ हम इससे कुछ हटकर बताना चाहते हैं।
बनावट की दृष्टि से देखें तो देवनागरी के व्यंजन वर्णों को कई भागों में बाँटा जा सकता है– 1. अंत पाई वाले वर्ण, जैसे- ख ग घ आदि, 2. मध्य पाई वाले वर्ण, जैसे- क, फ आदि, 3. अर्द्ध पाई वाले वर्ण, जैसे- ट ठ ड ढ आदि।
लेकिन एक वर्ण ऐसा भी है जिसकी तीन लोक से मथुरा न्यारी है। वह है- र। यह इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं आता और इसका व्यवहार भी सबसे भिन्न है। जैसे- इसके साथ उ व ऊ की मात्रा का योग करने पर रु व रू रूप होता है- र् + उ = रु, र् + ऊ = रू
यानी अन्य वर्णों की तरह ये मात्राएं नीचे में न लगकर बीच में लगती हैं। इसी तरह यह वर्ण जब किसी अन्य वर्ण के पूर्व संयुक्त होता है तो उसके ऊपर चढ़कर पंडित जी की चोटी का रूप ले लेता है जिसे रेफ कहते हैं यथा- र् + प = र्प। जब यह किसी अन्य वर्ण के पश्चात संयुक्त होता है तो इसका रूप कुछ ऐसा हो जाता है जैसे कोई ग्रामीण कांख में लाठी दबाकर जा रहा हो, यथा- प् + र = प्र। किन्तु जब यह वर्ण ट ठ ड या ढ में से किसी के पश्चात जुड़ता है तो टूटी हुई लकड़ी की तरह दो भागों में बंटकर या अंग्रेजी के उल्टे V की तरह नीचे लटक जाता है, यथा- ट् + र = ट्र।
इसका का आकार भी कुछ कुछ किसान के हल की तरह होता है। यानी यह वर्ण सबसे अलग थलग और विचित्र है।
है न रहस्य पूर्ण। आप भी जानिये और दूसरों को भी बताइये।
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डा. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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[01/09, 9:55 am] 👑सुषमा शुक्ला: मंच को नमन स्वतंत्र साहित्य विधा,,

जीवन परिचय,,

*हिंदी साहित्य के छायावाद के प्रमुख चार स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला*
 लेखक कहानीकार कवि उपन्यासकार निबंधकार व संपादक थे।
 किंतु कविताओं में लोकप्रिय हुए इनको प्रगतिवाद प्रयोगवाद में काव्य का जनक माना जाता है।
*निराला जी काव्य के रूप में शक्ति के पुंज*
आत्मा विश्वासी थे थपेड़ो के बीच चट्टान की भांति स्थिर रहने की सामर्थ रखते, आपकी अंतर्शक्ति असीम है l

जन्म 21 फरवरी १८९९, मेदनीपुर में, पिता,,,,, पंडित राम सहाय ,,,,,
पत्नी,,,,, मनोहरा देवी ,,,,,
बच्चे एक पुत्री, पुत्र पुत्री सरोज,,,
 देहावसान 1961 15 अक्टूबर,,,

 अवार्ड ,,,,
*विशिष्ट सेवा पदक* 
सारा जीवन संघर्षों व निर्धनता में बीता, पर वे अडिग और स्थिर रहे रहेl

काव्य संग्रह अनामिका ,परिमल गीतिका ,तुलसीदास बेला, अणिमा आराधना,,, आदि आदि

कविताएं,,, मित्र की प्रति,,, हताश,,, स्वप्न स्मृति,,दीन और ध्वनि।

भाषा ,,शुद्ध संस्कृत निष्ठ प्रगतिवादी काव्य में सरल।

इस प्रकार अनेक सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक, चित्र अंकित कर जनता का नवजागरण का भी संदेश दिया।

निष्कर्ष,,,
 *वास्तव में निराला जी क्रांतिकारी युगस्रेष्टा कवि थे* आधुनिक कवियों में इनका स्थान बहुत ऊंचा है वास्तव में निराला जी *निराला* कवि थे💥💥💥💥💥 सुषमा शुक्ला
[01/09, 10:11 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:- *लघु कथा*
विषय:-- *बिन बादल बरसात*

यह बात १९६३ की है,अचानक एक मध्यम परिवार के संचालक के जीवन का अस्त हो गया। इसे कहते हैं, *बिन बादल बरसात का माहौल बनना*।
 जिस के कारण गृह संचालिका और बच्चे एवं परिवार के लोग काफ़ी सदमे में रहे।अंत मे,अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए तथा परिजनों के सुझाव को देखते हुए, गृहस्थी की गाड़ी को चलाने हेतु घर पर ही बच्चों का स्कूल के स्थापना की। शुरुआती दौर में अपने घर से पूंजी लगाकर चला रही थी। यहां से बच्चे जो भी बाहर निकलते उन्हें अच्छे स्कूल में प्रवेश मिल जाता। यह देखकर मोहल्ले के लोग वहां के स्थानीय नेता एवं विधायक से बातचीत किए। विधायक जी भी स्कूल आकर निरीक्षण किए और सही पाया, तब उन्होंने सरकार से अपील किए।इस विद्यालय को सरकारी संस्था में तब्दीली किया जाए। शिक्षा विभाग को आदेश दिया गया निरीक्षण करे और अपना टिप्पणी करें। टिप्पणी में स्वीकृति व्यक्त करने का अनुरोध किया गया। उसके के कुछ दिनों के बाद विद्यालय सरकारी हो गई। शिक्षिका महोदया को वहां के प्रधानाध्यापिका पर भी नियुक्ति की गई लेकिन एक शर्त रखा गया एक साल के बीच आप टीचर्स ट्रेनिंग पास कर ले इस में शिक्षा विभाग हर संभव सहायता करेगी। 
प्रधानाध्यापिका महोदया इसे सहर्ष स्वीकार कर अपना मंतव्य लिख कर भेज दी,तब आपका मानक वेतन लागू होगा।
 इस तरह से अपना जीवन एवं परिवार का जीवन सुचारू रूप से निभाते हुए अपने जीवन का अंतिम यात्रा तक पहुंच कर चिर निद्रा में लीन हो गई।

विजयेन्द्र मोहन।
[01/09, 10:30 am] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
1/9/2021 बुधवार
विषय-स्वतंत्र लेख लेखन

सत्संग से जीवन में परिवर्तन

जो ईश्वर से भीतर से जुड़ा हुआ है,वह संसार के कष्टों से कभी विचलित नहीं होता।संसार के सुख जो हम इंद्रियों के द्वारा ले रहे हैं।ज्ञानी समझता है गुण गुणों मे बरत रहे हैं,इंद्रियां इंद्रियों में,मैं कुछ नहीं नहीं करता। ज्ञानी कि सारे कर्म ईश्वर को समर्पित होते हैं ज्ञानी भोक्ता हुआ भोक्ता नहीं है। क्योंकि ज्ञानी पूरी तरह परमात्मा पर समर्पित है ।जब परमात्मा से योग हो गया तो वही रह गया मैं कुछ भी नहीं ।ज्ञानी के सारे कार्य परमात्मा के निमित्त होते राजा जनक राजाई में बैठा है पर उनकी वृत्ति परमात्मा से जुड़ी है ।हरि का नाम मुख से नहीं जपना है। स्वास स्वांस में निकले हरि का नाम ।हम परमात्मा में ऐसे डूब जाए की वही रहे हम बचे ही ना ।सच्चा सुमिरन वही है जब तन मन एक रस होय ।दो में योग होता है जब दूसरा कोई है ही नहीं तो किससे मिलना और किससे बिछड़ना। गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्र एक साथ शहीद हो गए। गुरु गोविंद सिंह ने हाथ ऊपर उठाकर आसमान की ओर देखते हुए कुछ कहा ।उनके एक साथी ने पूछा क्या परमात्मा से दुख सहने की शक्ति मांग रहे हो। गोविंद सिंह ने कहा नहीं मैंने परमात्मा से कहा है कि आपकी अमानत थी आपने वापस ले ली ।जो परमात्मा के सुमिरन में है उनके जीवन में दुख के कारण तो आते हैं पर वह कभी दुखी नहीं होते ।जो परमात्मा से जुड़ जाता है वह माया में रहकर भी माया में लिप्त नहीं होते। वह हमेशा इसी विचार में रहता है कि माया मेरे लिए है पर मेरी नहीं। मेरा कुछ भी नहीं, ज्ञानी सदा इसी भाव में रहता है। संसार को चाहे कितना भी पकड़ो पर वह एक दिन छुट ही जाएगा। माया में कभी तृप्ति नहीं है जहां तृप्ति नहीं वहां पीड़ा है ।पर हरी नाम में तृप्ति है और ज्ञानी सदा पीड़ा रहित रहता है। रमता राम रमो मोरे जिया,ज्ञानी ने गुप्त खजाना पा लिया ।जो परमात्मा के नाम में रत है। उसे संपूर्ण सृष्टि में उसी परमात्मा का रूप नजर आता है। परमात्मा के सिवाय कुछ और है ही नहीं ।जब सर्वत्र परमात्मा का रूप देखकर कर्म किया जाता है तो वह कर्म नहीं सेवा हो जाती है। ज्ञानी अपने कर्म द्वारा जड़ चेतन की सेवा करता है ।हर एक में जो ईश्वर का रूप देखता है उसके व्यवहार में नम्रता आ जाती है ।वह परमात्मा का ही रूप बन जाता है। एक स्त्री डॉक्टर के पास गई और बोली आपकी दवाई असर नहीं कर रही है ।डॉक्टर ने कहा मैंने तुम्हें दवाई कब दी। स्त्री बोली पिछले साल जो दवाई दी थी वही ले रही हूं। डॉक्टर ने कहा पिछले साल की दवाई आज की बीमारी में असर नहीं करेगी। आज की बीमारी के लिए आज की दवा लेनी पड़ेगी ।ऐसे ही हमें आज की परिस्थितियों के लिए आज का ज्ञान चाहिए। इसीलिए रोज का सत्संग जरूरी है रोज के सत्संग से हमारी स्थिति में रोज बदलाव आता है। हमारी स्थिति बनती जाती है ।जो परमात्मा से जुड़ गया माया उसकी दासी बन जाती है जो परमात्मा से जुड़ जाता है उसके योग - क्षेम का भार परमात्मा स्वयं उठाता है। एक चोर संत के यहां चोरी कर ने गया। चोर ने सेंध लगाई और सारा सामान एक चादर में बांध लिया ।तभी संत की नींद खुल गई संत सेंध में से भागने लगा पर सामान के साथ उसमें से निकल नहीं पा रहा था ।संत ने कहा चोर भाई क्यों परेशानी उठा रहे हो सामान दो बार में ले जाओ। संत की बात सुनकर चोर का मन परिवर्तित हो गया। चोर संत के चरणों में गिर गया। ऐसे ही ज्ञानी गुरु के संग से हमारे जीवन में भी परिवर्तन आ जाता है। हमेशा गुरु से जुड़े रहे और परमात्मा के शुक्रानो में भीगे रहें ॐ
                      तारा "प्रीत"
                  जोधपुर (राज०)
[01/09, 10:44 am] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹1/9/21🌹🙏

🙏🌹 *मंथन* 🌹🙏


 *रिश्तों में प्रतिबद्धता का दूसरा नाम है कृष्ण!*

 चोरी करना अपराध है, लेकिन उसने मक्खन चुराया। उन्हें मक्खन चोर कहा जाता था। मरुभूमि को छोड़ना योद्धाओं के लिए बड़ी लज्जा की बात है, परन्तु धर्म की रक्षा हेतु वे मरुभूमि को छोड़कर चले गए।और रणछोड़ कहलाए। जो उन्हों ने प्रेम से स्वीकार किया। 
     इसलिए समझ में नहीं आता है। यह हमारी धारणा से पर है। यह एक अनुभव है और इसलिए इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने दूसरों की अपूर्णताओं को पूरा करना जारी रखा और इसलिए उन्हें एक सिद्ध पुरुष कहा गया। कृष्ण एक रोमांच है। एक युगपुरूष है।पुरुषोत्तम है। 

           यह नियम बनाता है और उन्हीं नियमों को तोड़ना सिखाता है। यह सहनशक्ति भी पैदा करता है और एक घाव भी इसे टुकड़े-टुकड़े कर सकता है। कहा जाता है कि गांधी जी अहिंसा के उपासक थे, लेकिन कृष्ण इस मामले में गांधीजी से आगे थे। गांधी जी ने कहा था कि एक गाल पर थप्पड़ मारूं तो दूसरे गाल को आगे कर दो। कृष्ण ने कहा कि यदि कोई सौ छलनी नहीं देता है, तब तक तो सुनो, लेकिन एक सौ एक छलनी मत सुनो। जब तक उन्हें सुई की धार न दी जाए, वे युद्ध के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ते। वह अहिंसा का सबसे अच्छा उपासक है, लेकिन अहिंसा का दास नहीं है। वह जानता है कि कब अहिंसा का अंत करना है और कब हिंसा शुरू करनी है। अगर गांधी जी को इस बारे में पता होता तो भारत का बंटवारा नहीं होता।

          कृष्ण का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है स्वीकृति। हर कोई उन्हें वैसे ही स्वीकार करता है जैसे वे हैं। वे द्रौपदी की धार कुंद करने की कोशिश नहीं करते। यह द्रौपदी को यह कहने से नहीं रोकता है, 'अंधे का पुत्र अंधा होता है।' *मत कहो तुम* वे व्याख्यान भी नहीं देते कि द्रौपदी के टुकड़े-टुकड़े होने पर जीभ को संयमित कर लेना चाहिए था। 

 अगर आप इसे इस तरह से देखें तो कृष्ण ने उन्हें वह सब कुछ दिया जो उन्होंने मांगा था। भीष्म चाहते थे कि उनका भीष्म व्रत जीवन भर चले। कृष्ण ने उन्हें दिया। पूरे महाभारत में भीष्म की प्रतिज्ञाओं को छुआ नहीं गया है। कर्ण को दुनिया का सबसे अच्छा परोपकारी कहा जाना था। उसने उससे ढाल और कुंडल लिया और उसे सबसे अच्छा परोपकारी बनाया। जो लोग महिमा के लिए मरना चाहते हैं, उन्हें महिमा में मरने दो और जीत तुम्हारी होगी। कर्ण को जीत से ज्यादा प्रसिद्धि पसंद थी, इसलिए उसने इसे महिमा दी। द्रोण के लिए पुत्रत्व सर्वोपरि था। कृष्ण ने उसे पुत्र मोह में मार डाला। द्रोण को हराना मुश्किल था। ऐसा कहा जाता है कि अगर उन्हें हारना है तो उन्हें हथियार के नीचे रखना होगा। अश्वत्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था। लेकिन द्रोण की पुत्र प्रेम धर्मपरायणता अंधी थी। *नरो वा कुंजारो वा* ' सुनने के बाद, उसने मान लिया कि वह अश्वत्थामा हमारा पुत्र ही मारा गया है । द्रोण की मृत्यु धृष्टद्युम्न के हाथों नहीं बल्कि अपने ही पुत्र के प्रेम के कारण हुई थी। कृष्ण ने उन्हें एक महान पिता की मृत्यु दी। दुर्योधन सर्वश्रेष्ठ गदाधारी था। अपराजेय था। वह कहते थे कि *जानामी धर्मं नचमे प्रवृति... जानामे अधर्मं नचमे निवृति* ।' यानी मैं धर्म को जानता हूं लेकिन उसका पालन नहीं कर सकता और मैं अधर्म को समझता हूं लेकिन मैं इससे दूर नहीं हो सकता। ऐसे दुर्योधन का वध करते हुए कृष्ण स्वयं भीम को अधर्मी बना कर जाँघ पर थप्पड़ मार देते हैं। सबके साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह चाहता है।

 वह जीवन भर सहज बने रहे। उस उम्र में मक्खन चुराना स्वाभाविक था। उसने ऐसा किया। बाल सहज क्रीड़ा से अहंकार दूर करना चाहते थे, और छोटी उम्र में ऐसा करना स्वाभाविक था जब गोपियों के कपड़े चुरा लिए। उसने ऐसा किया भी। वह अपनी सहजता के कारण समझ नहीं पाया। किसी भी चीज़ में बंधा नहीं है और इसलिए कृष्ण हर जगह हैं और फिर भी कहीं नहीं ।

 कृष्ण सहज होने के साथ-साथ प्रतिबद्ध भी रहे। जीवन भर प्रतिबद्धता के लिए जिया । उन्हें राधा से प्यार हो गया और वे चले गए, लेकिन अपनी प्रेम प्रतिबद्धता को बनाए रखा। आज उनके नाम के आगे राधा का नाम लिया जाता है, उनकी पत्नी रुक्मिणी का नहीं। आज जब रिश्तों से प्रतिबद्धता कम होती जा रही है, तो यह कृष्ण से प्रतिबद्धता सीखने जैसा है। उन्होंने कच्चे चावल खाकर अपनी दोस्ती कायम रखी। कृष्ण भी प्रतिबद्धता के लिए पूर्ण पुरुषोत्तम होने के अपने अहंकार को अलग रखते हैं। पूरे महाभारत में किसी ने भी अहंकार को इतनी सहजता से नहीं छोड़ा जितना कि कृष्ण ने अहंकार को एक तरफ रख दिया है। भीष्म गिरवी रखने वाले अहंकार को अलग नहीं रख सकते थे, अगर उन्होंने इस अहंकार को एक तरफ रख दिया होता, तो कुरुवंश का विनाश नहीं होता। कर्ण की प्रतिबद्धता कौरवों के लिए नहीं थी। परोपकारी होने के अपने अहंकार के लिए थी। कौरवों की जीत होती अगर उन्होंने एक परोपकारी के रूप में अपनी छवि को बनाए रखने के लिए ढाल और कुंडल दान नहीं किए होते, लेकिन कृष्ण पांडवों के लिए प्रतिबद्ध रहे। उसने शस्त्र न लेने की अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी और हाथ में एक पहिया पकड़े हुए भीष्म को मारने के लिए दौड़ा।

 कृष्ण ने उसी प्रतिबद्धता के साथ द्रौपदी के साथ अपना संबंध बनाए रखा। उसने युद्ध के माध्यम से कौरवों से बदला लेने का अपना वादा निभाया। कर्ण के प्रति द्रौपदी का प्रलोभन द्रौपदी के प्रति प्रतिबद्धता-विराम नहीं था, बल्कि युद्ध से पहले कर्ण को भावनात्मक रूप से नीचे लाने के लिए एक युद्धाभ्यास था। उसने युद्ध में अपनी सेना भेजकर दुर्योधन के प्रति अपनी वचनबद्धता भी रखी। उन्होंने कृष्ण धर्म के लिए भी प्रतिबद्ध किया। राम ने कभी नहीं कहा, लेकिन कृष्ण ने कहा कि भारत में जब भी अधर्म बढ़ेगा, मैं अवतार लूंगा!

                  किसी भी रिश्ते को जिंदा रखने के पीछे सबसे अहम चीज होती है कमिटमेंट। जिस व्यक्ति से आप संबंधित हैं, उसके प्रति प्रतिबद्ध रहें। कृष्ण रिश्तों में प्रतिबद्धता सिखाता है। कृष्ण रिश्तों में प्रतिबद्धता का नाम है।

🙏🌹🙏 *पद्माक्षि शुक्ल* 🙏🌹🙏
[01/09, 10:53 am] वैष्णवी Khatri वेदिका: अ. भा. अग्निशिखा मंच
बुधवार -1/9/2021
 विधा - लेख 
विषय-वर्तमान भारत

प्राचीन भारत धन- धान्य से परिपूर्ण और प्राकृतिक रूप से संतुलित था। फिर इस देश को विदेशी आक्रमणकारियों लगभग हज़ार वर्षों में तहस-नहस कर दिया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत पुन: शक्ति और सामर्थ्य अर्जित करने की राह पर चल पड़ा । संकीर्ण जातिगत मान्यताओं को मिटाकर लोकतंत्र के इस युग में निरक्षरता, उद्‌योग-धंधों, कृषि के क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई है। भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया है ।

 स्वतंत्र भारत में कृषि सुधार, उद्योग, यातायात, वैज्ञानिक अनुसंधान-कार्य हो रहे हैं; कारखाने बन रहे हैं; विद्युत्-शक्ति का उत्पादन बढ़ रहा है। परमाणु शक्ति के लिए प्रयोगशालाएँ व सुरक्षा के साधन जुटाए जा रहे हैं। विदेशों से मैत्री-संबंध मजबूत करने का प्रयास चल रहा है। 
सामाजिक व धार्मिक क्षेत्रों में परिवर्तन और भारतीय धर्म, संस्कृति की मूल विशेषताओं की रक्षा पर चिंतन हो रहा है।

आज राजनीतिक मान्यताएँ भी द्रुत गति से बदल रही हैं । एक विचार-धारा प्रजातांत्रिक भावनाओं को दूसरी साम्यवाद विचारधारा वर्ग-विहीन समाज की कल्पना करती है । भारत की संस्कृति बहुरंगी है फिर भी सब भारतीय एक राष्ट्र के संविधान में आस्था रखते हैं। कभी झगड़े और धार्मिक उन्माद भी होते हैं, पर भारतीयता का तत्व फिर से मजबूत हो जाता है ।

भारत में जनाधिक्य,अशिक्षा, बेरोजगारी, आतंकवाद और राजनीतिक तुष्टिकरण प्रमुख समस्या है । कुछ लोग भारत के संविधान का गलत लाभ उठा कर भारत की प्राचीन मान्यताओं और संस्कृति पर प्रहार किए जा रहे हैं। आतंकवादी मनोवृत्ति को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो रहा है। वर्तमान युग के लिए वैज्ञानिक तथा आर्थिक उन्नति परमावश्यक है। यहाँ प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, मगर उन साधनों का उपयोग नहीं हो पाया है ।
हमें इन समस्याओं को समझ कर राष्ट्र की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना पड़ेगा |

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश
[01/09, 10:55 am] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
मंच को नमन, 
विषय ***मुन्शी प्रेमचंद जी पर लेख*
          मुन्शी प्रेम चन्द जी भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं । उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य में युगान्तर उपस्थित किया ।मुन्शी प्रेमचंद जी के युग का विस्तार सन् 1880 से 1936 तक है। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 में हुआ।और मृत्यु 8 अक्तूबर 1936 को हुई।
            मुन्शी प्रेम चन्द जी का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।उनका जन्म वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था ।
             उनकी शिक्षा का आरम्भ उर्दू फारसी भाषा से हुआ।उनको पढ़ने का शौक बचपन से ही था ।गरीब परिवार में जन्म लेने तथा अल्पआयु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनका बचपन अत्यधिक कष्ट मय रहा ।प्रारम्भ में वे कुछ वर्षों तक स्कूल में अध्यापक रहे , बाद में शिक्षा विभाग में सब डिप्टी इंस्पेक्टर हो गए । कुछ दिनो बाद असहयोग आन्दोलन से सहानुभूति रखने के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी, और आजीवन साहित्य सेवा करते रहे ।कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया      
             मुन्शी प्रेम चन्द जी ने लगभग एक दर्जन उपन्यास और तीन सौ कहानियों की रचना की ।उनका साहित्य, समाज सुधार और राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है ।उसमें किसानो की दशा, सामाजिक बन्धनों में तड़पती नारियों की वेदना और वर्ण व्यवस्था की कठोरता के भीतर संत्रस्त हरिजनों की पीडा का भी मार्मिक चित्रण मिलता है ।
             मुन्शी प्रेम चन्द जी की भाषा शैली सहज, सरल, व्यवहारिक , प्रवाह पूर्ण , मुहावरेदार एंव प्रभावशाली है। उनकी भाषा में उर्दू हिन्दी का प्रयोग बहुत है ,एंवम् भाषा में सादगी है । उनकी रचना दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में अभिव्यक्त हुई । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । एसे साहित्य पुरोधा को शत् शत् नमन ।।।
 स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
[01/09, 11:09 am] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: लेखक मुंशी प्रेमचंद्र 

गोदान पर लेख

मुंशी प्रेमचंद जी की गोदान उस वक्त की है ,जिस वक्त भारत ब्रिटिश राज्य के जंजीरों में जकड़ा था। जमींदारी,किसान ,कृषि शोषण, सामंती व्यवस्था और पाखंड पर जहां एक तरफ चोट थी वहीं दूसरी तरफ अपने जीवन दर्शन को मालती आदि पात्रों को आधार बनाकर अभिव्यक्त करते हैं ।
मुंशी प्रेमचंद्र जी ने परतंत्र भारत में जिन समस्याओं को उठाया था, वे स्वतंत्र भारत में भी जस के तस मौजूद हैं ,यानी इतिहास वर्तमान से ज्यों का त्यों चिपका हुआ है। गोबर और धनिया के प्यार को आधार बनाकर जो टिप्पणी की गई है। वह चिंतनीयऔर विचारणीय है ।किसानों की दशा 1936 के पूर्व थी ।वह आज भी है ।आंध्र प्रदेश ,बुंदेलखंड से लगाया महाराष्ट्र तक के किसानों के पास आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बहुत सी समस्याएं ज्वलंत हैं।
भाषा शैली --भाषा शैली बहुत अच्छी है। भाषा सरल है जो पाठकों को समझ में आ जाती है ।सभी पात्रों के परस्पर संवाद गोदान को और भी प्रभावशाली बनाता है। हालांकि मालती की अनुपस्थिति खटकती है। कुल मिलाकर लगता है कि गोदान कालजई रचना थी, है और रहेगी।
          
           श्रीमती शोभा रानी तिवारी
          इन्दौर म.प्र.
[01/09, 12:00 pm] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: नमन पटल 
आज की विधा -लेख
विषय- ऑरगैनिक खेती

जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश के किसानों के लिये खेती ही जीविकोपार्जन का माध्यम है। प्राचीन समय में किसान खेती के लिये प्राकृतिक खाद ही उपयोग में लाते थे जिससे अनाज, दालें, सब्जियाँ ,फल इत्यादि शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक होते थे। पहले लोग प्राकृतिक संपदा पर ही निर्भर रहते थे। गोमाता के गोबर से खाद बनाते थे। हरे पत्तों से यहाँ तक कि चूल्हे की राख को भी खाद के रूप में काम में लेते थे किन्तु जैसे जैसे हम प्रगतिशील होते गए वैसे वैसे हमने हर क्षेत्र में प्रयोग करना शुरू कर दिया।
इसी तरह से कृषि के क्षेत्र में भी प्रयोग होने लगे।
पारंपरिक खाद से उत्पादन थोड़ा कम होता था। लोग उत्पादन को बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करने लगे जिसे फसलों की पैदावार बढ़ने लगी।
पहले लोग प्राकृतिक चीजों को कीटनाशक के रुप में इस्तेमाल करते थे जैसे छोटी मछलियों को आम के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर सबसे छोटी मच्छी डाल देते थे जिससे आम के पेड़ में फल लगने लगते थे। नीम के पत्ते, खट्टी दही,लकड़ी की राख या खेत मे जो फसलों का ढेर होता था उन्हें हटाने के बाद कुछ खेत में ही बचा रह जाता था जो बाद में खाद का काम करता था।
धीरे -धीरे रासायनिक खाद प्रचलन में आया आरम्भ में इसका बहुत स्वागत हुआ। लोग बिना सोचे विचारे निःसंकोच इसका भारी मात्रा में इस्तेमाल करने लगे।
रासायनिक खाद से पैदावार तो बढ़ी किन्तु अनाज की गुड़वत्ता में भारी गिरावट आ गई। इसका एक कारण रासयनिक उर्वरा एवम कीटनाशक दवाइयों का उचित मात्रा में न डालना है। भारत में किसान कीटनाशक अंदाज़ से डाल देते हैं और प्रायः अधिक मात्रा में पड़ जाता है जिससे कीटाणु के साथ-साथ लाभदायक जीवाणु मर जाते हैं और कीटनाशक को जरूरत से ज्यादा डालने से अनाज प्रदूषित हो जाता है। जिससे स्वास्थ्य को बहुत हानि होती है इसलिये आजकल इतनी सारी बीमारियाँ फैली हुई हैं। बच्चे से लेकर बूढ़े कोई भी स्वस्थ नहीं है।
फसल जल्दी से जल्दी उग जाए इसके लिये भी दवाइयों का प्रयोग होने लगा है। ये भी बहुत हानिकारक बात है। 
आजकल हरी सब्जियों में सुइयाँ लगा देते हैं और ये सब्जियाँ कम समय में ही अपना पूर्ण आकार ले लेती हैं।
जब लोग अधिक बीमार पड़ने लगे तब पुनः कुछ लोगों का ध्यान पारंपरिक खेती,प्राकृतिक खेती ,ऑरगैनिक खेती या जैविक खेती की तरफ गया और धीरे-धीरे ये कुछ परिमार्जन के साथ पुनः प्रचलन में आ रहा है। आजकल महानगरों में नगर पालिका द्वारा भी जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया बताई जाती है और इसके लिए वे प्रारंभिक सामग्री मुफ्त में देते हैं।( मुझे भी मिला है)
ऑरगैनिक खेती के बहुत फायदे है।
ये पर्यावरण में संतुलन बनाये रखते हैं। वातावरण को प्रदूषित नहीं करते हैं।
ऑरगैनिक खेती में रासायनिक खेती की अपेक्षा कम पानी का प्रयोग होता है।
इस विधि से उगाए अनाज स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं अपितु लाभदायक होते हैं।
उत्पाद कम होने के वावजूद फायदा इसलिए है कि इसमें लागत कम लगानी पड़ती है।आजकल ऑरगैनिक उत्पाद बहुत मँहगे मिलते हैं जिससे कृषक को ज्यादा फायदा मिलता है।
आज के परिदृश्य में ऑरगैनिक उत्पाद का उपयोग केवल उच्चवर्ग के लोग ही कर पाते हैं।अब तो महंगाई की मार इतनी ज्यादा पड़ रही है कि आम जनता दो समय ढंग से खाना खा ले यही बहुत बड़े सौभाग्य की बात है।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
[01/09, 12:18 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
  * १/ ९ / २०२१ / बुधवार 
  * विधा - निबंध *
 * डाॉ• हरिवंशराय बच्चन *

" बचचन" मुझे क्यो पसन्द है ?
सबसे पहले मेरा परिचय " मधुशाला"के जरिये हुआ ! मेरे किशोर मन पर इसकी अमिट छाप छप गई ! बीच बीच मे बहुत उनको पढा! बचपन के उस आकर्षण की चिंगारी को ओर हवा तब लगी जब उनकी आत्म कथा के चार खंड पढें ! " क्या भूलूँ क्या याद करू " " नीङ का निर्माण फिर से " बसेरे से दूर " ओर "दशद्वार '" से " सोपान " तक! आपने इतनी बाबा बेबाकी ओर साफगोई से अपने जीवन की सच्चाई को कह है ,ऐसा साहस कोई सामान्य व्यकित नही कर सकता! 
आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे! गध एवम् पद्ध मे आपकी लेखनी समान रूप से चली ! आप जब गद्य लिखते तो कविता साथ, साथ चलती थी ! आप का गद्य लेखन पढने वाले को एक अलग संसार में ले जाता है!
अपके लिखे गद्य की बानगी देखिए!
हमने माना कि रेगिस्तान के उस पार है बहारिस्तान 
! जहाँ है छायादार वृक्ष दरख्त, रंगदार फूल ,दूर दूर तक फैले दूब के मैदान, जहां बहती है नीले पानी की नहर , चलती है ठंडी हवा सर,सर,सर ,करती है सोरभ की बौछार 
,हर मोसम मे हर वक्त , मेहरबान है आसमान, गूंजता है चिङियो का गान ,मुलायम पत्तियों का मर्मर स्वर ! जहाँ टीले पर बैठा चरवाहा अपनी बाँसुरी पर छेङता है मनुहार भरी तान, चरवाहिन करती है मान ,प्रेम फिर मांगता है प्रमाण, ऐसों का ही प्रेम सदा रहता है जवान ओर भेङो के झुंड किनारो पर बांध कतार ,झुका कर गरदन बुझाता है अपनी प्यास ,ओर होता है निहाल देख कर अपनी परछाई, मिलते हैं अधर से अधर होता है सब पर मुहब्बत का असर ! 
दोस्तों आया ना कविता का स्वाद? 
" बचचन" जमीन से जुङे रचनाकार थे! आप ने चेतन ,अवचेतन, संसकार ,अनुभूति मे संचित कल्पना ,भय आशा, निराशा,वेदना ,संवेदना हर्ष, विमर्श, जीवन संघर्ष के कुशल चित्रे थे!
आप कुशल अनुवादक थे ! आप ने शेक्सपियर की रचनाओं का हिंदी मे अनुवाद कर हम जैसो का विश्व स्तरीय रचनाओ से परिचय करवाया ! आज तो अंग्रेजी
 का बोल बाला है मगर उस वक्त आप ने अकल्पनिय 
काम किया ! 
बचचन की बात हो ओर मधुशाला का जिक्र ना हो !
1935 से लेकर आज तक "मधुशाला " उतनी ही मादक ,ओर नशीली है ! भारतीय जन मानस से इसका नशा कभी नही उतरेगा!
मधुशाला मे कवि अपना परिचय इस रूप मे देता है!
मिट्टी का तन, मस्ती का मन 
क्षण भर जीवन, परिचय मेरा 
आपने ' उमर खय्याम ' की रबाईयो का अनुवाद कर इतिहास रच दिया ! 
बच्चन की " मधुशाला चैतन्य की ज्वाला है ! जिसे पढ सोने वाला भी जग जाता है! 
" बच्चन की मदिरा गम गलत करने का साधन नहीं है! यह तो शाश्वत जीवन सोंदर्य ओर प्राण शक्ति की सजीव प्रतिक है! आपने मधुशाला के जरिये जीवन की हर विसंगति पर अपनी बात कही ! जाति ,पाती के भेद ,धार्मिक कट्टरता पर आधात किया! आपने तो लोगो का प्रेम की मदिरा परोस मदमस्त किया !
श्री सुमित्रा नंदन पन्त के शब्दो मे  
धुमङ रह था ऊपर गरज जगत - संघर्षण, 
उभङ रहा था नीचे जीवन वारिधि- क्रनंदन ।
अमृत हदय मे, गरल कंठ मे, मधु अधरों मे - 
आए तुम वीणा घर कर मे जनमन- मादन मे 
बच्चन प्रकृति ओर प्रेम के कवि है मगर जीवन की पथरीली पगडंडियो पर आपकी कलम खूब चली !
" निशा निमंत्रण मे आपने लिखना 
दिन जल्दी ,जल्दी ढलता है ।
हो जाय न पथ मे रात कहीं 
मंजिल भी तो दूर नही 
यही सोच थका दिन का पंछी जल्दी- जल्दी चलता है ।
भीगी रात विदा अब होती है 
हाथ बढा सूरज किरणो के 
पोंछ रहा आंसू सुमनो के 
अपने गीले पंख सुखाते तरू पर बैठ कपोत - कपोती
छायावाद के उस युग मे लेखक ने अपनी अमिट छाप छोड़ है? 
अपने अल्प ज्ञान से अपने प्रिय साहित्यकार के बारे मे अपनी भावनाओं को शब्द दिये ,जिनसे मै किशोर वय से प्रभावित थी 
अपने गद्य का समापन मै मधुशाला की एक रूबाई से करती हूँ 
बने ध्यान ही करते- करते जब साकी साकार, सखे ,
रहे ना हाला, प्यासा, साकी , तुझे मिलेंगी मधुशाला ।  
                   🙏🙏🙏
[01/09, 12:40 pm] Anita 👅झा: अग्निशिखा मँच को नमन 
दिनांक -१-९-२०२१
दिए गये विषय पर 
* स्वतंत्र लेखन विधा हिंदी ज्ञान* 
के अंतर्गत हिंदी भाषा का ज्ञान लक्ष्य मान युवाओं को जागृत किया विवेकानंद जी राष्ट्रीय युवा दिवस पर विश्व पुस्तक मेले का अद्भुत ज्ञान दिया स्वामी विवेकानंद जी ने अदभुत ज्ञान दिया जिसे मैंने अपने शब्दों में पिरोया है ।
आनन्द हर पल को हसरतों के साथ जिया । 
" उठो,जागो और तब तक न रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये।  
 कहने ,सुनने ,सुनाने से अधिक कर्म , नयन सुख दुःख परम ज्ञान होता है ? क़्या नही ?क्या होगा ?और क्या होना चाहिये । पुस्तकों के आवरण से पढ़ कर वास्विकता का अंदाज़ा विचारों के माध्यम से अपनी ही कलम वाक् पटुता की पहचान होती हैं ।
विश्व हिन्दी भाषा हितकारी गुणकारी हैं ।विश्व हिंदी भाषा में लक्ष्य ज्ञान मान अपने व्यक्तित्व कर्तव्यों की पहचान ज़रूरी हैं
मुस्कान आत्मीयता की चाहत है ।
परमात्मा की अमूल्य भेंट होती है । 
जिसे लेने देने की अमिट चाहत होती है ।
बेक़रारी बेख्याली की चाहत बना जाती हैं ।
चाहत मंज़िल का रास्ता होती हैं ।
ग़मों को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाती हैं ।
भाग्य लकीरों को खींच आगे बढ़ा जाती हैं ।
उम्मीदों के साथ रास्ता बढ़ा जाती हैं ।
जिस तरह सुबह की धूप सुहानी होती है ।
 नज़ारों में क़ैद बहार होती हैं ।
पल पल जीने एहसास होती हैं ।
अंधेरा दूर भगा रोशनी होती हैं ।
कर्म इंसानियत की जीत होती है ।
इससे बड़ा क़ोई धन नही होता है ।
पापपुण्य कर्मों का लेखा जोखा होता हैं । 
विद्या ज्यों खर्चे त्यों त्यों बढ़े ।
धर्य मानवता सफलता मधुर रिश्तों की अनमोल कुँज़ी होती होती है ।जीवन को सुखमय बनाना सफलता की कुँज़ी होती है ।हर दिन नये आयाम विश्वास के साथ आगेबढ़े जाती है ।
आने वाला कल समय संस्कारों की पूँजी है ।
अंतह करण की आवाज़ सुन रचनाकार रचयिता होता है । 
 सभी रचनाकारों का आभर अभिनंदन
अनिता शरद झा रायपुर

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