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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज दिनांक 26 नो 2021 को ऑनलाइन कवि सम्मेलन और सम्मान समारोह संपन्न हुआ 125 वां काव्य सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ आइए और आज की रचनाओं का आनंद लीजिए डॉक्टर अलका पांडे मुंबई



आज के विषय पर कविता 
२६/९:२०२१

कभी यू भी तो हो 


कभी यू भी तो हो 
हम दोनों चाँदनी रात में 
चाँद तारो के साथ में 
हाथो में हाथ लिये 
बतियाते रहे ….
कभी यू भी तो हो 
मैं खामोश रहू 
मेरे नयन बोले 
और तुम सब मन की बात जानो
मेरे प्यार को पहचानो . …
कभी यू भी तो हो 
मेरी संवेदनाएँ 
अंतस कीं पीड़ाएँ 
बिन कहे तुम जानो 
मेरी भावनाओं को पहचानो 
मेरे प्यार की गहराई 
समझ सके तो समझो …..
कभी यू भी तो हो 
सागर के तट पर 
बहती लहरों में 
नंगे पैरों रेती पर 
हम दोनों चलाते रहे 
न समय का पता हो 
न मंज़िल का ठीकाना 
बस तेरा मेरा साथ हो ….
कभी यू भी तो हो 
जीवन के कँटीली राहों पर 
सदा तेरा साथ रहे 
अंतिम साँसो तक 
मेरी आँखों में तेरी छबी रहे 
हर साँस पर तेरा ही नाम हो 
सदा सबका कल्याण हो 
कभी यू भ तो हो …..
अलका पाण्डेय मुम्बई

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[25/09, 9:47 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: 🌹🌹दिल 🌹🌹
मेरा दिल , दिल से पूछे ,
क्या तुम जानों, दिल की बात ,
बेचारा दिल ये सोचे 
दिल हो तो सोचूं 
दिल की बात ,
दिल तो 
बन बैठा है पत्थर ,
कहां रहा 
उसमें एहसास ,
अरमानों ने 
छेड़ी राग ,
पर कहां गया
उसका अनुराग ,
दिल गाये झूमे मस्ती में ,
मचले अपने
हस्ती में ,
फिर कौन सुने
दिल की बात
बस दिल ही जाने 
दिल की बात ।
*****************
स्वरचित व मौलिक रचना
डाॅ . आशालता नायडू.
भिलाई . छत्तीसगढ़
********************
[25/09, 9:53 pm] निहारिका 🍇झा: नमनमंच 
अग्निशिखा मंच
-विषय-25/9/2021
विषय ; स्वतन्त्र-श्राद्ध
श्रद्धा का भाव
पूर्वजों के प्रति
हर जन रखते 
करते तिल व 
जौ अर्पण 
जल पात्र का दान 
होम धूप से
पितृ को करें प्रसन्न
चलता है यह काल
अश्विन मास एकम से 
पितृ मोक्ष अमावस्या
करते सब पितृ का मान
पर एक को याद रखें 
जाने के बाद सभी करते भाव पुष्प अर्पण
देते हैं दान दक्षिणा 
हो जायें पितृ संतृप्त
काश यही सब बातें 
जीते जी उनको मिल जाये
पितृ श्राद्ध सब कुछ 
उनके जीवन मे ही 
दे जाएं उनको खुशियाँ।।
निहारिका झा🌹🌹🙏🙏
[26/09, 1:59 pm] Chandrika Vyash Kavi: बेटी
               ******
   सीता का अवतार बेटी
   नारी के कोख की शान बेटी
   मात-पिता का सम्मान बेटी
   विश्व का कल्याण बेटी
  फिर क्यों सावन में भी
 पतझड़ ही पतझड़ देखूं
हरियाली के इस उपवन में
ढूंढ़ती रहती हूं अपना आंगन
 पूछे है मुझसे मेरी बेटी !

यादें ताजा कर मुझसे
कहती है मेरी बेटी
मां का आंचल,पिता की अंगुली
     पकड़ जब चलती थी
कितना सुंदर था तब यह उपवन
जब, झूले पर बैठ हिचकती थी मैं
तब , मां झूला देती थी
गिरने के भय से घबराती तब
थाम पिता की अंगुली लेती
लाडली की हर खुशी का ध्यान
     रहता था उनको
मुख से निकले उससे पहले
खड़े पैर रहते थे दिल खोले !

पापा मेरी गुड़िया को 
एक गुड्डा ला दो 
सावन के आते ही
शादी करवा दूंगी उसकी
 मम्मी पापा दोनों हंसते
 गुड़िया की प्यारी 
बातों का रस लेते 
एक दिन गुड़िया को लेने
राजकुमार सा दूल्हा 
आया घोड़ी में !

हर सुख साधन संग दिया
भारी मन से विदा किया 
संस्कार का गहना पहने
आशीर्वाद की चुनरी ओढ़े
चली ससुराल दुल्हनिया बनकर 
अंतर्मन के सपनों को लेकर !
ससुराल में ,
ड्योढी पर लक्ष्मी बन आई 
घर पर बनी बहु 
पति की प्यारी भारिया बन 
धन्य हुई प्रभु !

तेज हुई रफ्तार वक्त की
 बदले रंग अनेक 
हरियाली बन आया मौसम
 लेकर प्यार का संदेश !

 बनी एक बिटिया की माता 
नानी कहती लक्ष्मी बन बिटिया आई
 संग घर में अपने ढेरों खुशियां लाई !
 पापा जब लक्ष्मी को सहलाते 
  दादा दादी देख ना पाते !

 समय की सुई कभी न रुकती
 मां की ममता कभी न थकती 
 जीवन में कड़वा रस पीकर भी 
 बेटी की ममता में वह सब कुछ सहती !

 समय की धारा संग बहकर
 खिला पुनः एक फूल
बेटी की किलकारी सुनकर 
  .बत्ती हुई गुल !

मां की अब कसौटी देखो
बंधी हुई थी जिस खूंटे से
वह खूंटा भी अब छूटा
पर बेटी की ममता में 
उसका साहस न टूटा
सोच मैं भी तो एक बेटी हूं !

दिन महिना साल गुजरा
बनाया उसने नया बसेरा
बेटी का भविष्य हो उज्जवल
   संघर्षरत हो बनी वह
     अबला से सबला !

संस्कार और ममता में पली
  हर दुख को बिसराती हुई
    बेटी बैरिस्टर बन बोली 
    संघर्ष हुआ पूर्ण तुम्हारा
        अब है मेरी बारी
    सम्मानित करना है तुम्हें
      नारी सम्मान पदक से !

            चंद्रिका व्यास 
           खारघर नवी मुंबई
[26/09, 2:26 pm] 😇ब्रीज किशोर: नमन फलक फाउंडेशन

बेटियां 
,🌷आगन की फुलवारी होती है केशर की क्यारी होती है
बाबा का मान अम्माँ की अरमान होती है।
बाबा का लाड़ली अम्मा की दुलार होती है
भाई की सोन चिराई घर की जान होती है
फुदंकती है जैसे चिडिया बोलने मे कोकीला होती है।
फिर एक दिन बाबा की लाडली पराई हो जाती है।
पहुंच जाती है ससुराल जान पिहर में छोड़ जाती है
बाबा कैसे होगें अमाँ कैसी होगीं ये सोच आसुं लुढक जाते है।
न जाने भइया लिवाने कब आयेगें सोच कर घबडा जाती है।
लड़किया मैके मे कुछ लेने नहीं देने आती है।
बाबा का बाढ़े परिवार सुख सम्पत्ति अपार आशिर्वाद दे जाती है
बेटियां साडी पैसा कुछ नहीं चाहती थोड़ा प्रेम सम्मान ही लेने आती है
हम भी इसी परिवार की सदस्य है ए बाते बता जाती है।
बेटियाँ सदा माँ बाप के दिल के कोने में अपनी जगह बनाती है।
बुढ़ापे मे बेटियांँ माँ बाप को बहुत याद आती है।
मरने से पहले हर माँ बाप बेटी से मिलना चाहते है।
कौन कहता है कि बेटियाँ पराई होती है।
बेटियाँ भी तो उसी माँ की जाई है जिससे जन्मा उनका भाई है।
जिस कोख से वे जन्मी है उसी कोख से जन्मा उनका भाई भी है।
तब कैसे बेटा सगा बेटी पराई, यह रीत किसने बनाई है।
यह रीत किसने बनाई है।
स्वरचित बृजकिशोरी त्रिपाठी
[26/09, 2:39 pm] स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह: आप सभी को बेटी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🙏🙏

क्यूँ परेशान हो जाते हैं ?
बेटी के माँ बाप,
बेटी को यदि शाम को,
घर आने में देर होने लगती है।
माथे पर शिकन दिखती है,
क्योंकि वह बेटी के माँ बाप हैं।
मालूम है उन्हें समाज के कुछ,
खतरनाक भेड़ियों के बारे में।
दोमुहें चेहरे वालों शैतानों और,
नृकृष्ट हैवानों के बारे में।
जो घूम रहे हैं इधर उधर,
सड़कों पर मंदिरों में गली मौहल्लों में,
यहाँ तक कि घर की छतों पर भी।
कहाँ रहे कहाँ जाये बेटी?
चाचा,मामा,ताऊ,मौसा, जीजा,फूफा,
या कोई अजनबी इंसान,
बचे किसकी किसकी कामुक नज़रों से।
रिश्तों की दुहाई दे या अपने आबरू की,
इन्हें परवाह नहीं स्त्री के सम्मान की।
ये भी नहीं सोचते कि,
इनकी, माँ, और बहन भी एक स्त्री है।
अगर इनके साथ वैसा ही हो,
जो ये एक मासूम ,बेटी,बहन और,
किसी की माँ के साथ करते हैं।
केवल बेटी दिवस पर ही क्यों हम,
बेटी के मान सम्मान की बात करते हैं?
उसे हर वो अधिकार क्यों नहीं मिलता,
जो इस समाज ने बेटों को दिया है?
कर्तव्य का बोझ बेटों से ज्यादा,
बेटियों के सिर पर क्यों पड़ा है?

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
26/8/21
[26/09, 3:01 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: 🌹 स्पदंन 🌹

 जीवन है जी ले रे बंदे
पीछे सब छूट जाएगा,
मैं कौन और तू कौन 
कोई समझ नहीं पाएगा । 

आया है तो जाना ही है 
कोई नहीं छूट पाएगा 
राजा हो या हो रंक
कोई यहां न बच पाएगा ।

चलती का नाम ही है जिन्दगी,गर
ठहर गई तो समझ 
थम गई जिन्दगी ।

सांसों का ताना-बाना ही 
है तेरे जीवन अपना बाना 
जब तक चले ये सांस 
तबतकहीहैजीवनकीआस

ये जो हैं तेरे अपने  
जिनमें बसा है 
तेरा अपनापन 
कोई तुझे न रख पाएगा ।

ठहर जाए गर ये स्पंदन
प्राण पखेरू उड़ जाएगा
ये जो तेरा है अपना 
वही तुझे आग लगाएगा।

शीश झुका ले प्रभु आगे
वही तुझे पार लगाएगा
अच्छे कर्मो से भर ले झोली 
वही तुझे जीवित रख पाएगा।
*******************
स्वरचित व मौलिक
डाॅ . आशालता नायडू.
भिलाई . छत्तीसगढ़.
******************
04/09/2021.
******************
[26/09, 3:10 pm] राम राय: *कभी तो ऐसा भी कहो*
🙏🙏
अग्निशिखा मंच को नमन। आज का दिन अत्यंत ही उल्लास भरा दिन है। आज मंच पर सम्मान समारोह के साथ ही कवि सम्मेलन भी आयोजित है।अपनी निरंतरता कायम रखते हुए अग्निशिखा मंच आज 125 वा आयोजन करने जा रहा जो हम सभी के लिये गौरव की बात है।इस गौरवशाली आयोजन के लिए मंच की राष्ट्रीय अध्यक्षा आदरणीय डॉ अलका पाण्डे जी,आदरणीय सुरेंद्र हरड़े जी, आ शोभा जी,आ आशा जी जाखड़ जी ,आ अर्चना दुबे जी , आ पन्ना लाल जी ,आ कोलते जी व आ संतोष साहू जी के साथ समस्त विद्वानों को पुनः प्रणाम।
🙏🙏🌹🙏🙏
-----श्रीराम रॉय, आजके अध्यक्ष
[26/09, 3:37 pm] Nirja 🌺🌺Takur: अग्निशिखा मंच

फिर आया है पित्र पक्ष ,
करते याद हम अपने बड़ों को। 
जिन्होने हमारी एक हंसी के लिए 
छुपा लिया अपने गमों को। 

देता हूँ मैं जल आपको 
 स्वीकार कर इसेधन्य करेंगे आप हमको
आपके दिखाये मार्ग पर चलूंगा
ये विश्वास दिलाता हूँ आपको

मेरी किसी बात से आपको दुख हुआ हो 
मेरे किसी कर्म सेआपको कष्ट पहुंचा हो तो हाथ जोड़कर क्षमा मांगता हूँ मैं
आशीष आपका मिले ,तो मेरा जन्म सफल हो

क्यों चले गये आप,मन भरा नहीं अभी।
आपसे मार्गदर्शन लेना, बाकी था अभी
आप साहस का बीज बो गये थे मुझ में
पेड़ वो फल देने लगा है अभी अभी 

ऐसा नहीं है कि मैं आपको भूल गया
या सिर्फ पित्र पक्ष में याद करता रहा
आप तो हमेशा मेरे मन में बसे हो
 तर्पण कर मैं पितृ ऋण चुकाता रहा

कहा जाता है पितृ कौए के रुप में आते हैं
और आशीर्वाद दे कर चले जाते हैं।
पर आप आना मेरे घर मेरे बच्चे बन कर
इस बार मैं लाड़ करुंगा आपको जी भर करट


नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबिवली
महाराष्ट्र




[26/09, 3:37 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: कभी तो ऐसा भी कहो 

चलो
आज घूमने चलें जिंदगी 
जिंदगी के अधूरे सपने पूरे करने चलें 
चारों तरफ खुशियां बिक्री हुई हैं 
उन खुशियों को हम 
अपने आसपास भी बांटते हुए चलें 
जिनकी आंखों में आंसू हैं 
उनके आंसू पहुंचते हुए चलें 
जिन्हें भोजन नहीं मिला है 
उन्हें पेट भर खाना खिला कर चलें
 जिन्हें रहने के लिए आवास नहीं मिला 
उन्हें आशियाना देते हुए चलें 
जिन्हें कभी पढ़ने को अवसर नहीं मिला 
उनके हाथ में कलम पट्टी हम आते हुए चले
 उन्हें थोड़ा सा अक्षर ज्ञान देते हुए चलें
 जिनकी आंखों में सपने बसे हुए हैं 
उनके सपनों को साकार कराने की
कोशिश करते हुए चलें 
काश हम कुछ ऐसा कर जाएं 
काश हम कुछ ऐसा कर जाएं कि
 हमारे बाद भी लोग हमें याद करते रहे 
क्योंकि सत्कर्म ही तो हमारे बाद रह जाते हैं
आशा जाकड़
[26/09, 3:39 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: श्रद्धांजलि : चौपाई 

 सजल नैन से स्वागत करें
अपने भूले बिसरे पुरखे 
हम श्रद्धांजलि अर्पण करें 
उनके सत्कर्म स्मरण करें 

वे बड़े बुजुर्ग थे हमारे 
बड़े जतन से हमें संवारे 
आज हम भी तो अपना फर्ज 
उनके प्रति कुछ अदा करें 

वे छोड़ गये इस जहान् में 
कर्म औ सत्कर्म करने को 
मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ 
जो हमें मिला ये करने को।।

 आशा जाकड़
[26/09, 3:40 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: मैं गीत खुशी के गाती हूं 
************************************
मैं गीत खुशी के गाती हूं,
चाहे जैसा भी मौसम हो ,
हर मौसम को सह जाती हूं,
 हूं मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

हमेशा कष्टों से बचाता ,
हमारा यह परिवार है ,
बट वृक्ष ही परिवार के ,
मूल का आधार है ,
प्यार पनपता है जहां ,
मिलता हमें संस्कार है ,
कुम्हार हाथों से देता ,
घड़ों को आकार है ,
सबके सपनों को साकार करने ,
आशा के दीप जलाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

माला के बिखरे मोती को ,
एक सूत्र में मैं बांधूंगी,
 प्रेम की माटी से नफ़रत की,
 खाई को मैं पाटूंगी ,
  उगी हुई है बेल विषैली ,
उनको भी मैं छांटूंगी ,
औरों के ग़म को लेकर मैं,
 अपनी खुशियां बाटूंगी ,
मर्यादा की चादर ओढ़े,
अपना फर्ज निभाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

संकल्पों के पंख लगाकर ,
हम नई चेतना लाएंगे ,
चुनौतियों को लक्ष्य बना ,
आगे ही बढ़ते जाएंगे ,
स्वर्ण रश्मियों के संग,
हम नया सवेरा लाएंगे,
 समय की साक्षी बनाकर,
 नया इतिहास रचाएंगे ,
मन की वीणा में सरगम की,
 झंकार भरती जाती हूं,
 मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी
619अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक,
 इंदौर म.प्र. मोबाइल 8989409210
[26/09, 3:42 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: कभी ऐसा भी तो हो

कभी ऐसा भी तो हो।
फूल बनकर खिल जाऊँ।
बिखरुँ मैं इन वादियों में।
महक बन कर लहराऊँ।

कभी ऐसा भी तो हो।
किसानी हाथों में जाऊँ।
लहराऊँ फसल बन जाऊँ।
इच्छाएँ पूरी कर जाऊँ।

चाँद बन उतरुँ धरा पर,
यहीं कहीं छुप जाऊँ।
सब ढूँढूँ यहाँ वहाँ मुझे,
मैं सागर में नजर जाऊँ।

मैं तारों में छुप जाऊँ।
तारों में झिलमिलाऊँ।
तू ढूंढे मुझे यहाँ वहाँ
मैं वहाँ नज़र न आऊँ।

कभी ऐसा भी तो हो।
धरा से अम्बर तक डोलूँ
मन की सीमाएँ खोलूँ
सभी के साथ मैं चलूँ।

साँसें बन जाएँ चंदन।
मैं बन जाऊँ धड़कन।
तुम सावन बन जाओ।
कभी ऐसा भी तो हो।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर
[26/09, 3:46 pm] वीना अडवानी 👩: कभी यूं भी तो हो
**************

कभी यं भी तो हो
धरा आसमान बन जाए
आसमान धरा पर आए
कभी यूं भी तो हो
हम चांद सितारें तोड़ लाऐं
चांद पर अपना घर बनाऐं
कभी यूं भी तो हो
भग्वान दरस दे जाऐं
हम अपने आराध्य को खिलाऐं
कभी यूं भी तो हो 
हम पंछी बन जाऐं
खुले आसमान मे विचरण कर जाऐं
कभी यूं भी तो हो
ख्वाब सिर्फ ख्वाब ना रह जाऐं
हकीकत हो हमें ये ख्वाब सजाऐं।।
सच कभी यूं भी हो।।२।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*****************
[26/09, 3:52 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय कभी ऐसा भी तो हो

कभी ऐसा भी तो हो
बिना मेहनत किए
हर ख्वाब पूरे हो जाए
बिना बीज बोए फसल तैयार हो जाए

सभी के पेट में रोटी का निवाला हो
गरीबी ना हो चारों और अमीरी हो
गरीब और अमीर के बीच
कोई मत भेदी दीवार ना हो

कभी ऐसा भी तो हो
जो चला गया है संसार से
हमें तड़पता छोड़ कर
मुझे अकेला कर गया है
वापस पुनः वह आ जाए
अपना एहसास मुझे दिला जाए

कभी ऐसा भी तो हो
हर रात दिवाली हो
हर मन में खुशियां ली हो
हर घर में दीपक जगमग करे
अंधियारा घर को कभी ना डसे
[26/09, 3:57 pm] Alka: आओ साथी गांव चलें
शहर हो रहे हैं जहरीले, 
आओ साथी, गांव चलें।
गोबर से लीपे आंगन में
आओ नंगे पांव चलें।

वन उपवन दुर्गंध भरे हैं
तन मन हुए अपावन है।
मलय पवन में लू की गर्मी
सुखा भादों सावन है।
बढ़ता जाता ताप विश्व का
चल पीपल की छांव चलें।

चारों ओर बवाल मचा है
खींचातानी चीख-पुकार
कोई नहीं किसी की सुनता
दिशा दिशा में हाहाकार
कानफोडू संगीत से अच्छा
सुनें काग की कांव चलें।

चैन कहीं ढूंढे न मिले
सभी जगह बेचैनी है
प्रेम के ऊंचे महलों पर
चले घृणा की छेनी है
चारों ओर अशांति बढ़ी
चलो शांति के ठांव चलें। 

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[26/09, 4:01 pm] डा. महताब अहमद आज़ाद /उत्तर प्रदेश: "महान होती है बेटियाँ "

बेटों का संसार होती है बेटियाँ!
कुदरत का उपहार होती है बेटियाँ!! 
जिससे घर आंगन होते है रोशन! 
एेसा एक प्यार होती है बेटियाँ!! 

बेटी क्या होती है जमानें को दिखाया है! 
बेटी ने भी ऊँचा उठ कर दिखाया है!!
बेटी बेटों से कम नहीं होती है 
बेटी ने भी देश का मान बढाया है!! 

खुशियों का एक जहान होती है बेटियाँ! 
सच में घर की शान होती है बेटियाँ!! 
श्रेष्ठा सिंह, अंजुम आरा,सुजाता सिंह! 
बेटो से भी महान होती है बेटियाँ!! 

डा. महताब अहमद आज़ाद
[26/09, 4:03 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विषय:-- * *रहे लाज माथे पर हरदम*

*लाज रहे माथे पर हरदम !*
क्यों पूछती हो हाल ढलती शाम में।
धूप मे तो परछाइयां साथ देती ही है।।

जब तुम्हें मालूम है कि जिंदगी बेहाल है।
फिर भी पूछती हो, सुनाओ! और क्या हाल है।।

सुनो! रहे लाज माथे पर हरदम
अकेला नहीं हूं लेकिन अंदर से खोखला हूं।
टूटा नहीं हूं लेकिन अंदर से पूरा विखरा हूं।।

रहे लाज माथे पर हरदम, जिंदगी तू जा ऐश कर मैं भी अपने धुन में मस्त रहू ।।

वक्त का मारा हूं दिल से हारा हूं फिर भी।
अपने सारे दर्द को छुपा कर हंस रहा हूं।।

रहे लाज माथे पर हरदम, आंखें क्या जाने मेरा हाल।
आने वाला बाढ़ को रोकने वाला मैं ही हूं।।

रहे लाज माथे पर हरदम दुनिया भर से रिश्तेदार बचाने आते फिर भी मैं अकेला हूं।।

जिंदगी भर रहे लाज माथे पर हरदम ।
अब बचाने के लिए मैं बेताब नहीं हूं।।

विजयेन्द्र मोहन।
[26/09, 4:14 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: सबको आपस में जोड़े

हर तरफ़ 
बिखराव है,
कहीं भावनाओं का तो,
कहीं संवेदनाओं का।
आदमी स्वयं
बिखरा पड़ा है,
ज़माने की दौड़ती
भीड़ में।
जी रहा है
घुटन भरा जीवन,
खोया खोया सा
कुछ ढूंढ रहा है,
स्वार्थ की गलियों में।
भटक कर रह गया है
उसका अस्तित्व,
संवेदनहीनता की
अंजानी राहों में।
नोंच-खसोट रहा है
नफ़रत के नाखूनों से
ख़ुदा के नूर से बने
नूरानी चेहरों को।
अपने ही घर में
अपनों के ही बीच
आज कहाँ
कोई सुरक्षित है?
आओ" तो
एक बार फिर से
क्यों न समेट ले,
इस बिखरते संसार में
बिखरते इंसां को,
उसके बिखरते
अहसास को।
हो जाये हम सब
 मिल कर एक,
हमारी एकता को,
न कोई तोड़ पाए।
आपस में 
हम सब प्यार करें
नफ़रत को छोड़े,
आओ' हम सब मिलकर
 सबको आपस में जोड़े।।
                     तारा "प्रीत"
                 जोधपुर। (राज०)
[26/09, 4:17 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
***********
अग्नि शिखा मंच
दिन- रविवार
दिनांक-26/9/2021
शीर्षक- *उलट पलट*
विधा - कविता 

चांद काला हुआ,चांदनी काली हुई।
भोर फीकी पड़ी, रात उजियारी हुई।
विषधर से ये फुंकारतें हैं। 
कुर्सी पकड़ नेता हुंकारतें हैं ।
देख इनका रवैया सब हैरान हैं। 
गिरगिट से भी आगे श्रीमान हैं 
आश्चर्यचकित जनता भोली भाली हुई ।
चांद काला ----------

33% में राजू अफसर बना बड़ा।
90% पाके सक्षम लाईन में खड़ा ।
भ्रष्टाचारी रूपी राक्षस दरवाजे में अड़ा।
कैसे-कैसे वो रिश्वतखोरो से लड़ा। 
खिला-खिला के जेब खाली हुई।
चांद काला---------

सागर कुछ और भी गहरा हुआ ।
नदियों पर बस पहरा 
हुआ ।
रेत को भी निचोड़े निकालें ये नीर ।
डॉल्फिन में भरी है मौसमी समीर ।
तट से चिपकी जो मीन कत्ल वाली हुई ।
चांद काला-------।

चाहिए गर वोट चले आते हैं वो।
स्वर्णिम अपनी झोली फैलाते हैं वो।
नहीं पैरों पर वो घुटने बल खड़े ।
एक वोट की जिद में अड़े हैं पड़े ।
अब ऐरावत सी चाल मतवाली हुई ।
चांद काला ------------- ।

अब ना आयेंगे इनके झांसे में हम ।
भास्कर को लपेटे भरते हैं तम।
ये खून को पानी सा बहाते सनम ।
निर्लज्जता की कसमें खाते सनम ।
बाती तेल हमारा इनकी दिवाली हुई ।

चांद काला हुआ, चांदनी काली हुई।
भोर फीकी पढ़ी, रात उजियारी हुई ।

स्वरचित रचना 
रागिनी मित्तल ,
कटनी, मध्य प्रदेश
[26/09, 4:23 pm] सुरेन्द्र हरडे: कविता विधा,
 शीर्षक, *निर्देश*

प्रभु का निर्देश है संवेदनाएं अपनाओ,,,,, हर्ष उल्लास से अग्रसर होते जाओ,,,,
 अभ्युदय, उत्थान,,,
 निगाहें बागवान,
 कीच का सरोज रहे ,,
केवल्य ज्ञान ,,,, 

 ऐसा निर्देश है हर पल हर क्षण हरशाओ🙏


आनंद ,खुशी मानवीयता से मिले,,,,
 ऐसे जीवन चले,,
 वाटिका की मधुर बयार सी,,, सुगंध फैलाओ,,, हर पल कृतज्ञ होकर शीश झुकाओ,,,
 ऐसा निर्देश है हर पल हरशाओ 🙏

 दंभ दर्प से कर लो किनारा ,,,
इसी से भार ढोता सारा,,, निर्मल पावन शुची होकर,, आत्मा में बस जाओ ,,,
मैं दास तुम्हारा प्रभु मिलने आओ।
ऐसो प्रभु साक्षात्कार कर जाओ🙏

नक्षत्र तारक में जगमगाओ,,,
 ना तुम कभी मुझे भुलाओ,,
 चाप कमान से
 निकल गया,,, अब तो आत्म दर्शन कराओ,,,,,
 ऐसे हीरक होकर हरशाओ

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
स्वरचित रचना सुषमा शुक्ला इंदौर
[26/09, 4:29 pm] +91 98822 39135: मंच को सादर नमन🙏
🌻कभी ऐसा भी तो हो🌻
वो बीता बचपन दोबारा आ जाए
जिम्मेदारियों का बोझ थोड़ा कम हो जाए
दादा दादी फिर से हमें कहानियां सुनाएं
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

हम मां के आंचल में छुप जाए
मां हमें मीठी लोरी सुनाए
उनकी गोदी में हम सो जाए
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

जवानी की वो रुत फिर से आ जाए
प्रेम के वो गीत फिर से हम गाए
पतझड़ में भी बहार आ जाए
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

वैर भाव मन से मिट जाए
शत्रु भी मित्र बन जाए
सब ओर शन्ति का पैगाम फैलाए
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

लड़का लड़की का भेद मिट जाए
लड़की की हत्या गर्भ में ना हो पाए
लड़की को भी लड़कों जैसा मान मिल जाए
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

बहू ससुराल में बेटी बन जाए
सांस मां की भक्ति लाड लड़ाए
दोनों मिलकर घर को स्वर्ग बनाए
काश कभी ऐसा भी तो हो जाए

नीरज कुमार
 हिमाचल प्रदेश
[26/09, 4:34 pm] Chandrika Vyash Kavi: नमन मंच
विषय-: कभी यूं भी तो हो
दिनांक-: 25/9/2021

कभी यूं भी तो हो 

चांदनी रात हो
तुम मेरे साथ हो 
और प्यार की सौगात हो !

कभी यूं भी तो हो

हसीन रात हो 
बिन सुने बिन कहे 
तुम मेरे धड़कनों की ज़ुबान बनों !

कभी यूं भी तो हो 

चांद जमी पर उतरे 
पर्वत की शिला में दोनों बैठे हों
कहीं दूर जहां की नजर से
 हम कहीं खो जायें !

कभी यूं भी तो हो

आसमान से तारे छिप जायें
ये वक्त रात की ठहर जाये !
 
कभी यूं भी तो हो

वो रात कभी ना गुजरे
जब चाँद उतर कर आये !

कभी यूं भी तो हो

छुप छुपकर हम प्यार करें
कोई ढूंढने भी आये
तो हमे न ढूंढने पाये! 

कभी यूं भी तो हो

ख्वाबों की छलनी में छनकर 
तू मेरी निंदिया में आ जाये
तू जब भी मिले मुझको
 वो घड़ी सावन बन जाये !

        चंद्रिका व्यास
     खारघर नवी मुंबई
[26/09, 4:35 pm] 💃वंदना: कभी ऐसा भी तो हो

कभी ऐसा भी तो हो
लौट आए वही पुराने दिन
नदियां झरने ताल तलैया
पोखर नहर औरगहरी कुइया।

अब तो घर घर ट्यूबवेल है
नहीं दिखती पनिहारीन कोई
चूल्हा-चौका लकड़ी कंडा
ना जाने सब कहां चले गए।

गैस इंडेक्स स्टोप जलाए
या फिर खाना बाहर से लाएं
खयालात आजाद हो गए
रहन-सहन सब चेंज हो गए।

चौपाल सिनेमा सभागार
कहां चहल-पहल नुक्कड़ कि यार
घर-घर टेलीविजन हो गए
और अपने अपने कमरे हो गए।

घर के बंदे आपस में
फोन पर बातें करते हैं
पहले होता था एक फोन
अब हर हाथ मोबाइल होते हैं।

काश कभी ऐसा भी तो हो
लौट आए वही पुराने दिन
सब एक साथ मिलजुल बैठे
चाय पे लंबी चर्चा हो।

दादा दादी पापा मम्मी भैया भाभी
सब एक साथ मिल बैठे हो
फिर हंसी मजाक का दौर चले
काश कभी ऐसा भी तो हो 
काश कभी ऐसा भी तो हो।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश।
[26/09, 4:36 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹अग्नि शिखा मंच 🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹२६/९/२१🌹🙏
🙏🌹 *कभी ऐसा भी तो हो* 🌹🙏

बरस रही बारिश की बूँदे ,
अणु अणु में बसते आशुतोष, 
अहसास भोलेनाथ का हो, 
मानो अभिषेक हो रहा हो, 
*कभी एसा भी महसूस हो*, 

माता के दरबार जा रहे, 
डगर में अंधकार छा रहे ,
दिखाई नहीं देता रास्ता, 
ठंडी हवा का है सपाटा
बादल की गर्जना सुनाई। 
नभ में बिजली भी चमकाई।। 
अंधकार चीर उजाला छाया । 
*कभी एसा प्रकाश भी हो जाए* ।।

कृष्ण का शृंगार की बेला ।
मोर मुकुट, पुष्प की माला ।।
चंदन शृंगार, प्रसाद, दीपक ।
भूल गई बाँसुरी लगाना, ।।
मोहन का मधुर मुस्कराना ।।
मोहक हास्य दर्शन हो जाए, 
*कभी एसा भी दर्शन हो*

जीवन में समस्या आई । 
बहुत परेशान हो गई ।।
मार्गदर्शन नहीं मिलता था।  
आंखों से अश्रु बह रहा था । 
बैढ गई रामायण पढने ।।
प्रकाश फैलाया था मन में ।।
समस्या का उपाय मिला, 
*कभी एसा मार्गदर्शन भी हो*

🙏🌹स्वरचित रचना 🌹🙏
🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏
[26/09, 4:37 pm] रानी अग्रवाल: २६_९_२०२१, रविवार।
अ. भा. अग्निशिखा मंच।
अगस्त माह काव्य और सम्मान समारोह।२०२१.
विषय_"कभी ऐसा भी तो हो"।
(प्रिय पाठकों,रचना की हर पंक्ति के पहले शीर्षक जोड़ लीजिए)
१)मेरी कविता किसी नामी_गामी
पत्र_पत्रिका में छप जाए ।😃
२) नामी कवि सम्मेलन में मंच
पर काव्य_पाठ कर आएं।😃
३)मेरे हाथ का खाना खाकर पति
खुलकर मेरी प्रशंसा कर जाएं,😄
सुनकर शर्म से मेरे गाल लाल
हो जाएं।
४)पत्नी महीने भर को मायके चली जाएं,😄
घर पर दोस्तों की महफिल
 जम जाए,👫
जोर का म्यूजिक लगाकर,
डांस कर पाएं,💃
मन पसंद खाना खाकर 
मौज मनाएं।🍔🥪
५)रूठी हुई महबूबा, बिन गिफ्ट
दिए ही मन जाए ।
६)बहु सास की सहेली बन जाए
अलग हुए मां_बाप साथ आ जाएं
धन_धान्य से भंडार भर जाएं,
सब मिलकर खुशियां मनाएं।
७) पीहर से सावन की तीज मानने का न्योता आ जाए।
रूठे हुए रिश्तेदार घर चले आएं,
अमेरिका में दूर रह रही बेटी का
वीडियो कॉल आ जाए,
कुंवरजी,धेवते,धेवती,
हॅस_हॅस बतलाएं।
पोते_पोती ट्रॉफी जीतकर,
पैर छूने आएं।
८)स्वर्गवासी हुए संबंधी,
उचित मौकों पर लौट आएं।
९)सखियों संग टूर पर जाने का
प्रोग्राम बन जाए,
१०)ठेले पे खड़े होकर
चैट_पकौड़ी खाएं।
११)पास_पड़ोसी मिलकर,
गेट_टुगेदर मनाएं।
१२)अमेरिका जाकर स्काय_डाइव कर आएं,
सभी तीरथ धामों के दर्शन कर आएं,
मेरी भक्ति से कान्हा खुश हो जाए
सबके समक्ष मेरे साथ रास रचाए
१३) कोरोना से पूर्ण मुक्ति
 मिल जाए,
जीवन का भरपूर आनंद उठाएं,
सारे सपने पूर्ण हो जाएं।
१४)खूब नाचें गाएं,
      तालियां बजाएं,
       हुडदंग मचाएं,
      हर गम भूल जाएं,
       बस.............
      और कुछ न चाहें।
स्वरचित मौलिक रचना____
रानी अग्रवाल,मुंबई,२६_९_२१.
[26/09, 4:41 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: ऐसी भी है मधुशाला --- ओमप्रकाश पाण्डेय
कितने घर बर्बाद हो गये
उजड़ गए कितने परिवार
सब कुछ लुटा दिया उसने
फिर भी आज फल फूल रहा
 हर एक गली चौराहे पर
एक न एक मधुशाला..... 1
पति पत्नी के बीच में झगड़ा
भी करवाती मधुशाला
नाली और चौराहों पर
अच्छे भले लोगों को
लड़खड़ाती झूमाती गिराती 
ऐसी ही कोई मधुशाला....... 2
बर्तन माँजती औरत से पूछो
किसने बेचा उसका गहना बर्तन
भीख मांगते बच्चों से पूछो
कहाँ गया उनके मुँह का निवाला
सब कुछ खा गया उनका
एक न एक मधुशाला........ 3
लीवर किडनी फेल हो गया
बन्द हो गया दिखना आंखों से
मृत्यकाय काया लिए हुए 
वह फिरता रहता दवाखानों में
उसने खो दिया अपना सब कुछ
ऐसी ही किसी मधुशाला में ....... 4
कहते हैं कभी इसको पीते थे
देवतागण भी अप्सराओं के हाथों से
पर आंखों से बहते आंसुओं से पूछो
कैसी दिखती है उनको मधुशाला
उसके लिए तो अंधकार से भरी हुई है 
हर एक मधुशाला.......... 5
जहरीली शराब पी कर 
मरनेवालों के विधवाओं से पूछो
उनके बिलखते बच्चों से पूछो
कैसी लगती उनको मधुशाला
इतने मौतों के बाद भी 
गली गली में खुली है मधुशाला....... 6
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[26/09, 4:45 pm] रामेश्वर गुप्ता के के:        ।कभी यू भी तो हो। 
कभी यूं भी तो हो,
अपनो की बात हो।
समय का पता न चले,
हमारी ये मुलाकात हो।।
कभी....................... 1 
प्यार का सिलसिला चले, 
नहीं कोई गम की बात हो। 
मंजिल की तरफ को चले, 
सफर में बस तेरा साथ हो।। 
कभी........................ 2 
वादा जो तुमने किया था, 
वह पूरा होने कि बात हो। 
जिन्दगी बीत जाये इस तरह, 
तेरा मेरा पूरा ही साथ हो।। 
कभी....................... 3
कभी ऐसे भी आया करो, 
न जाने की बात किया करो। 
खिला दो फूल कांटों में तुम, 
जब कभी तेरा मेरा साथ हो।।
कभी..........................4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[26/09, 4:50 pm] +91 70708 00416: कभी ऐसा भी तो हो
********************
 काश मेरी जिन्दगी में
कभी ऐसा भी तो हो
जब हमारी ख्वाहिशें
हिलोरें मार रही हों
समाज में कुछ कर गुजरने की
हमारी दिल्ली ख्वाहिश
 काश कि मैं डॉ बन जाती
तो मेरा लक्ष्य होता जन-सेवा
 मैं किसी ऐसे गांव में क्लिनिक खोलती
 मैं किसी ऐसे गांव में क्लिनिक खोलती
जहां चिकित्सा की बहुत जरूरत होती
केवल पैसा कमाना मेरा उद्देश्य नहीं होता
 मैं मरीजों से नम्रता पूर्वक बातें करती
 मरीजों की परेशानी को गहराई से समझती
मैं मरीजों को सही तरीके से जांच करती
 फिर जरूरत की दवाईयां उपलब्ध कराती
अस्पताल में कार्यरत होने के बावजूद
कभी रोगी को घर पर जाकर देखना पड़ता
तो मैं उसके लिए हमेशा तैयार रहती
काश कभी ऐसा भी तो हो
मरीजों को ग़लत राह नहीं दिखाती
मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि
हे प्रभु!मेरी ख्वाहिशों को पूर्ण कीजिए

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[26/09, 4:59 pm] Anita 👅झा: माँ शारदे को नमन 
अग्नि शिखा मँच को नमन 
आप सभी का अभिवादन अभिनंदन 
विषय - *कभी ऐसा भी तो हो* 
राहत की साँस सुकून का बसेरा हों 
ज़िंदगी की राहों में मजबूर ना हों 
बेअसर बरसते नैन में ठहराव हों 
कभी ऐसा भी तो हो 
मीरा की धुन कृष्णा की बाँसुरी में 
चैन का बसेरा हो 
कभी ऐसा भी तो हो
ज़िंदगी अथाह सागर ना हो 
ज़िंदगी किन किन विपदाओं से गुजरती है 
ये नैन अध खुले स्तब्ध कहती कहानी है 
कभी ऐसा भी तो हो 
जवानी के रंग बेख्याली का मौसम हो 
हवाओं के ज़ोर में ज़िंदगी ख़ुश रंग हो 
अब ये बेअसर बरसते ये नैन है 
खुले आसमाँ छतरी का सहारा है ।
जीवन नैया भवसागर पार लगाना है 
थक गई आँखे स्थिर हो गये पैर है 

अनिता शरद झा मुंबई
[26/09, 5:01 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: कजरी गीत

राधा निहारत झूला झूलें - 2 देखो
कान्हा की बाजत बांसुरिया
देखो रितु आई सावनिया - - -
बदरी छाई गगनवा - -

आओ सखियां हिंडोला झूलें -2देखो
देखो कान्हा की भोली सुरतिया
देखो हरित छाई सावनिया - - -
देखो गा रही कोयलिया - -

राधा रानी झूमर पहनेँ - 2 देखो
सजे लंहगा हरी चुनरिया
देखो आई श्यामल बदरिया- - -
देखो खनक रही चूडि़यां- --

माखन खावत मेहा बरसे - देखो
नन्द का लाला रास रचावे
देखो बरस रही बदरिया
देखो बाज रही पायलिया - - -

सोलह सिँगार सखियां करें - 2 देखो
कजरी गावें हिंडोला झूलें
देखो झूमन लागी नथनिया
देखो पेँगा बढा़वें गोरियां - - 
देखो झोंटा देवें सखियां- - - 

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
स्वरचित इंदौर 15-7-20
[26/09, 5:01 pm] रवि शंकर कोलते क: #**कभी ऐसा भी तो हो**#

वों होता नहीं जो तुम चाहो ।
सुखदुख को सीने से लगाओ ।।
मगर प्रिय साथी ना बिछड़े ।
जीवनमें कभी ऐसा भी तो हो ।।१

हमारे हाथ में क्या है प्यारे ।
साथ अंधेरे के हैं उजियारे ।।
यार कभी ऐसा भी तो हो ।
डूबती कश्तीको मिले किनारे ।।२

कोई मिलके ना बिछड़ जाए ।
खिलती बगियां ना उजड़ जाए ।।
कभी ऐसा भी तो हो यार कि ।
कि चलती गाड़ी न बिगड़ जाए।।

प्रा रविशंकर कोलते
    नागपुर
[26/09, 5:03 pm] निहारिका 🍇झा: नमन मंच
दिनाँक;-26/9/2021
प्रदत्त पँक्ति;-""कभी तो हो ऐसा""
भागती है ज़िंदगी अपनी ही रफ्तार से।
चल रहे हैं यंत्र वत सँग उसी की चाल पे।
धर लिया कांधे पर बोझ जिम्मेदारी का।
खुद के मन को मार मार बेजार हो गए हैं हम।।
हो कभी ऐसा कहीं।
दूर हों इस झंझट से
मिल जाये एक दिन बेफ़िक्री का जी लें हम।।
याद आ रहे हैं हमें बचपन के 
प्यारे दिन
फ़िरते थे पँछी बन उन्मुक्त से नील गगन।
बेफ़िक्री की रातें थीं मस्ती भरे प्यारे दिन।
काश हो ऐसा कभी 
लौट जाएं उस जगह जहां से चले थे हम।।
निहारिका झा।।🙏🙏🌹🌹
[26/09, 5:04 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: शीर्षक __ एक दीप जलाए

आओ एक दीप जलाए, घना अंधेरा दूर भगाए,🌹
उल्लसित मन कहीं खो गया, व्याकुल मन सोच रहा, ये कैसी है संकट की घड़ी आई,🌹
मानव प्रकृति का तांडव देख घरो में सिमट रहा,🌹
यह युद्ध नहीं रणभेरी है रोद्र रुप लेकर प्रकृति खड़ी है🌹🌹

संकल्प, विजय को हम फहराएं, जन बल संगठित कर दीप जला भारतीय संस्कृति का अलख जगाए🌹 नमस्ते, मुंह पर पट्टी, दूरी बनाए,
विजय विश्व तिरंगा लहरा ये,🌹
आओ हम सब मिलकर दीप जलाए🌹
आओ हम सब मिलकर दीप जलाए उन देश भक्त वीर जवानों के लिए🌹🌹 आओ हम दीप जलाए माताओं के नाम जिन्होंने अपने लाल देश पर कुर्बान कर दिए🌹
आओ हम सब मिलकर दीप जलाए राषट्रनिर्माण का बिगुल बजाए🌹🌹🌹🌹🌹🌹
               सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित
[26/09, 5:07 pm] 👑मीना त्रिपाठी: *प्रतिक्षा*

न होता कोई रूप - रंग
न कोई आकार प्रतिक्षा !
दिलों का मीठा बंधन मात्र
अधरों की मुस्कान प्रतिक्षा !

कभी प्रतिक्षा में होता रुदन
कभी होती मौन प्रतिक्षा ! 
हर किसी के हिस्से में होती
कभी न कभी ऐसी प्रतिक्षा !

सारा जगत बंधा है ऐसे
मिलन-वियोग की डोरी हों जैसे!
चर-अचर , जीव- निर्जीव
हर का जीवन है प्रतिक्षा !


          *मीना गोपाल त्रिपाठी*
          *अनुपपुर (मध्यप्रदेश )*
[26/09, 5:07 pm] सुरेन्द्र हरडे: कभी ऐसा भी हो
कभी ऐसा भी मेरा बचपन लौटा दे, हे ईश्वर मुझे कुछ नहीं चाहिए
मेरा बचपन लौटा दे वह हंसी
खेलना कुदना फिरसे आये।।1।।

कभी ऐसा भी हो राम राज्य
लौट आये राम फिरसे अवतारे
ना वह भेदभाव ,द्वेष मत्सर,
मारकाट शांति से हो जीवन।।2।

हे मानव तू क्यु करता है ? ऐसा
जिंदगी शांति को हो ऐसा काम कर ना सोना चांदी धन-दौलत
सुख शांति हो मेरा भारत।।३।।

बेटा बेटी का भेद न हो
बेटी को मत मार तू कोख में
बेटी ही पिता एवं ससूराल 
नाम रोशन करती है।।४।।

सुरेंद्र हरडे कवि
नागपुर
[26/09, 5:15 pm] पुष्पा गुप्ता / मुजफ्फरपुर: 🌹🔅ग्नि शिखा मंच 🙏🌹
     विषय:* तेरी मधुर मुस्कान *
           बाल साहित्य रचना
🙋🏻‍♀️🌹बेटी दिवस पर विशेष🌹🙋🏻‍♀️
            दिनांक 26/9/21
*******************************
तू है नन्ही मेरी जान
तेरी मधुर मुस्कान 
पंकज के है समान
सदा मन मोहे रे ,,,,×2

मेरी बिटिया रानी रे
तेरी मधुर कहानी है
जब से तू आई है
घर - खुशियाँ छाई है,,,,×2

सबके मन को तूने 
कितना तू रिझाई है,
दादा की प्यारी है-
पापा की दुलारी है,,,,×2
 
मेरी राज नंदनी तू,
तू परियों की रानी है
अब सबका मन मोहे
ये तेरी मधुर मुस्कान,,,,,×2
❤🙋🏻‍♀️❤
****************************
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार- डॉ पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर 
बिहार
🌹🙏
[26/09, 5:19 pm] Nilam 👏Pandey👏 Gorkhpur: अग्निशिखा मंच 
नमन मंच 🙏
26/9/21
कभी ऐसा भी तो हो


 कभी ऐसा भी तो हो
 मेरे मन की पीड़ा का
 तुझको भी अनुभव हो
 मेरे मन की पीड़ा का जब मन मेरा व्याकुल हो
 मन व्याकुल तेरा भी तो हो
 कभी ऐसा भी तो हो
 जब कभी मैं पल्लू के कोने से
 बंधी कुछ ख्वाहिशों की 
सख्त हो चुकी गांठों को
 खोलने को आतुर होऊं
 मेरे संग आतुर तुम भी तो हो
 कभी ऐसा भी तो हो
 कभी ऐसा भी तो हो
 ईटों की दीवार छतों को
 घर बना दिया मैंने 
 घर का कोना-कोना
 सुंदर सुसज्जित करने में
 पूरा जीवन लगा दिया मैंने
 यह एहसास कभी तुमको भी तो हो

बृज किशोरी त्रिपाठी
गोरखपुर उत्तरप्रदेश
[26/09, 5:31 pm] चंदा 👏डांगी: *कभी तो हो ऐसा*

काश कभी हो जाए ऐसा
मेरे सपने का भारत
रहे स्वच्छ हमेशा 
 हो नही पाॅलीथीन का नामोनिशान 
खाद्य सामग्री बने पशुओ का भोजन 
बचा अनुपयोगी समान 
काम जले कारखाने की किलन मे
नही दिखे कहीं कचरे के पहाड़
चारो तरफ हो सिर्फ हरियाली 
मकान सभी बनाए सिर्फ रहने के लिए 
नही हो किसी को अधिक
मकान रखने का अधिकार 
काश कभी ऐसा हो जाए 
करे न कोई अन्न बर्बाद 
नही सोयेगा कभी कोई भूखा 
धरती माँ की कोख से न खीचे
 कोई पानी दिनरात 
हो ना कभी सूखे के हालात 
काश कभी ऐसा हो जाए 
कभी नही हो कोई बिमार 
हमेशा रहे स्वच्छ वातावरण 
मेरे सपने का भारत
बन जाए फिर से सोने की चिड़िया 
शिक्षा नीति हमे सिखाए 
मेहनत से रोजी कमाना 
आलस का नही हो कही
नामोनिशान 
काश कभी ऐसा हो जाए 
करे न कभी कोई नशा 
औरत और बच्चे पर 
करे न कोई जुर्म 
काश कभी ऐसा हो जाए 
मेरे सपने का भारत 
बन जाए फिर सोने की चिड़िया 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[26/09, 5:33 pm] Nilam 👏Pandey👏 Gorkhpur: अग्निशिखा मंच 
🙏नमन मंच 🙏
मां सरस्वती को नमन 🙏
आज का विषय - कभी ऐसा भी तो हो 

कभी ऐसा भी तो हो 
जो मैं मन में सोचूं
 सब सच हो जाए 
नैनों की डिबिया में मेरे
 बन्द थे जो भी सपने
आंख खोलते मेरे 
वह सब अपने हो जाए
 काश कभी ऐसा भी तो हो 
कभी ऐसा भी तो हो
 आंख कोई ना हो गम में गीली 
सब बच्चे हो हंसते मुस्कुराते 
खौफ नहीं हो किसी गली में 
दिखे ना कोई भूख से रोते 
काश कभी ऐसा भी तो हो

 काश कभी ऐसा भी तो हो 
अखबारों में हो अच्छी खबरें
 बस दया धर्म ईमान की खबरें
 कोई किसी का हक ना मारे
 ना हो दहेज दानव की खबरें 
काश कभी ऐसा भी तो हो 

काश कभी ऐसा भी तो हो 
बेटा - बेटी में भेद नहीं है
 यह बातें बस बातें ना हो
 खुली हवा में जी लें सब
 खौफ में डूबी रातें ना हो
 काश कभी ऐसा भी तो हो

स्वरचित कविता
नीलम पाण्डेय
गोरखपुर उत्तर प्रदेश
[26/09, 6:03 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
मंच को नमन 
विषय ***** कभी एसा भी तो हो **
दर्द में भी मुस्कराएं
कभी एसा भी तो हो 
ज़िन्दगी को आज़माऐं
कभी एसा भी तो हो 
ज़िन्दगी के हर 
सुनहरे मोड़ पर 
प्यार की शमअ जलाऐं
कभी एसा भी तो हो 
दिल जहाँ पर खुद ही
झुकने लगे
कभी एसा भी तो हो 
दोस्ती में जब दरार आने लगे 
दुश्मनी को भूल जाऐं
कभी एसा भी तो हो
हाँ ग़मे दिल की
तसल्ली के लिये
शे'र कोई गुनगुनाऐं
कभी एसा भी तो हो
आ गए हम किस मोड़ पर 
फिर से वो ज़माना आए
कभी एसा भी तो हो ।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
[26/09, 6:15 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक-"मंजिल कहां मुश्किल"

1. बस होंसला रख प्यारे ,
 हिम्मत कभी नहीं हारे,
 उसके बहुत सहारे, उनसे आकर मिल , 
 मंजिल कहां मुश्किल ,,,,,,

2. कर्म करना भगवान सा है , 
धर्म यही इंसान का है, मिलजुल कर बनो सहारे , 
धड़कता रहेगा तेरा दिल , 
मंजिल कहां मुश्किल,,,,

3. अपने हिस्से से खुश रहो ,
 दूसरे के हाल में नजर न रखो , 
अपने भाग्य के रहो सहारे , 
सब कुछ जाएगा तुझे भी मिल , 
मंजिल कहां मुश्किल,,,

4. मोटा मिले मोटा पहन , 
 नकल से किसी के ना मिल , 
खाने को तो सभी रोटी ही खाते , 
सब्र कर ले गर खाने को मिले तिल , 
मंजिल कहां मुश्किल,,,,,

स्वरचित गीत -
रजनी अग्रवाल जोधपुर



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2 Comments
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  1. सभी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाए माँ सरस्वती की कृपा सभी पर बनी रहे ।

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