Thursday, 29 July 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर चंद्रशेखर आजाद जी को पढ़िए और एक क्रांतिकारी को याद करें सभी रचनाकारों की रचनाएं आप यहां पर पढ़कर आनंदित हो डॉ अलका पांडे मुंबई




चंद्रशेखर आज़ाद 
मैं आज़ाद हूँ आजाद ही रहूँगा और आज़ाद ही मरुगा । 
यह नारा दिया और नारे का मान रखा वह आज़ाद ही रहे ।।
सत् सत् नमन करती हूँ ऐसे वीर स्वतंत्रता चितेरे को ।
असहयोग आंदोलन के महान प्रणेता को ।।
निर्भीकता और निडरता से आज़ाद के अगंरेज काँपते थे । 
आपका देश प्रेम युगों युगों तक सुनाई जाती रहेगी ।।

भारत के दिल पर सदा तेरा नाम चमकता रहेगा ।
जवानों के दिलों में आज़ाद नाम सदा धड़कता रहेगा ।।
चंद्रशेखर आज़ाद को देश  कभी भूला न पायेगा । 
साहस और देश प्रेम की मिसाल बन कर सदा ज़िंदा रहेगा ।।

आज़ाद मौत से तुम कभी नहीं डरे , किसी से तुम्हे ख़ौफ़ होता नहीं था । 
तुम्हारे व्यक्तित्व पर सारा ज़माना नाज करता रहेगा ।।
असहयोग आंदोलन के तुम पथप्रदर्शक रहे । 
भारत की स्वतंत्रता का स्वप्न आज़ाद तुम ने दिखाया था ।। 

महात्मा गांधी के कार्यों से हुये प्रभावित और साथ काम किया था 
पर हमेशा अपनी अलग राह बनाई थी 
अंग्रेजों मूंह तोड़ जवाब दिया था ।।
बचपन के खाये कौड़े कभी न भूला पाया था । 
लहू में उनकी टीस उभरती और आज़ाद वीरता की निशानी बना था ।।

तन पर वह मार खाता मूंह से जय भारत के नारे बोलता ।
जख्म उसे विचलित न कर पायें स्वाधीनता का सपना आँखों में सजा था ।।

गांधी का अंहिसा का सिद्धांत आज़ाद को पंसद न आया । 
अंग्रेजों की तरह जवाब देना आज़ाद को सुकुन देता थ। 
आज़ाद हूँ आज़ाद रहूँगा और आज़ाद ही मरुगा ।।
यह नारा सच्च कर गया था , अंग्रेजों का बंदी नहीं बना । 
अपनी जान स्वंयम ले ली बलिदानी ने 

अल्फ्रेड पार्क में कर रहे थे मिटींग 
किसी ग़द्दार ने कर दी थी ग़द्दारी 
नांट बाबर ने घेरा आकर सवाल जवाब किये ।
बोला आज़ाद मैं तुम्हारा बाप आज़ाद हूँ 
सब को भगाकर अकेले ही भीड गया आजाद ।
गोलियों का जवाब गोलियों से देता रहा आजाद ।।


जब बची, सिर्फ़ एक गोली रख कनपटी पर दाग दी पिस्तौल । 
आज़ाद हो गया खेल गया खून की होली , ।।
आजादी की ज्वाला सुलगा गया ।
हर भारत वासी की नसों में खून बन बह गया ।।

आज देश को चंद्रशेखर जैसों की जरुरत है।

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई






चन्द्रशेखर आजाद। 
चन्द्रशेखर 'आजाद (२३ जुलाई १९०६ - २७ फ़रवरी १९३१) 
17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा।भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया। 
चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। 
चंद्र शेखर आजाद देशप्रेमी है, 
एक सफल क्रांतिकारी मेरे है। 
क्रांतिकारियों का साथ दिया, 
ब्रिटिश फौज से लोहा लेते है।।
चंद्र शेखर...................... 1 
ब्रिटिश संसद में बम फेका है
ब्रिटिश सरकार को हिलाया है। 
देश की आजादी के लिए, 
गर्म खून का साथ दिया है।। 
चंद्र शेखर.................... 2 
देश में जन जागरण किया है, 
अपना घर बार छोड़ दिया है। 
ब्रिटिश आफीसर को घेरकर, 
गोली से उसे उडा दिया है।। 
चंद्र शेखर.................... 3 
आजादी की क्रांति ज्वाला है, 
देश भर में खूब फैला दिया है। 
ब्रिटिश फोज के पैर फूल गये, 
उसकी जडों को हिला दिया है।। 
चंद्र शेखर...................... 4
आजादी हमें लेकर रहना है, 
चाहे बम से ब्रिटिश भगाना है। 
ब्रिटिश देश में नहीं रहना है, 
चाहे जान हमें कभी देना है।। 
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।



वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय ***चन्द्र शेखर आज़ाद ***
चन्द्र शेखर आज़ाद एक महान् क्रांति कारी थे।काकोरी ट्रेन डकैती (1926) वाइसराय की ट्रेन को उड़ाने का पर्यास (1926) लाला लाजपत राय की मौत का बदला उनकी उग्र देश भक्ति और साहस ने उनकी पीढ़ी के लोगों को स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने के लिये प्रेरित किया ।चन्द्रशेखर आज़ाद भगत सिंह के सलाहकार और एक महान् स्वतन्त्रत सेनानी थे ।भगतसिंह के साथ उन्हे भारत के सबसे महान् क्रान्तिकारीयों मे से एक माना जाता है । वे कट्टर सनातनी ब्राह्मण थे ।बचपन से ही उनमें भारत माता को स्वतन्त्र कराने की भावना भरी हुई थी , इसलिए उन्होंने स्वयं अपना नाम आज़ाद रखा ।
           सन् 1922 में जब गाँधीजी ने चन्द्र शेखर को असहकार आन्दोलन से निकाला दिया था तब आज़ाद और क्रोधित हो गए थे ।तब उनकी मुलाकात युवा क्रांति कारी प्रन्वेश चटर्जी से हुई , जिन्होने उनकी मुलाकात रामप्रसाद बिस्मिल से करविई, जिन्होने हिन्दूस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (H R A )की स्थापना की थी, यह एक क्रान्तिकारी संस्था थी।
            चन्द्र शेखर आज़ाद ने बड़ी बहादुरी से ब्रिटिश सेना का सामना किया, लम्बे समय तक।चलने वाली गोलाबारी के बाद अंतत : आज़ाद चाहते थे कि वे बिर्टिशो के हाथ न लगे और जब पिस्तौल में आखिरी गोली बची थी तब उन्होंने वह आखिरी गोली खुद को ही मार दी थी 
           एसे वीर क्रान्ति कारी शहीद को शत् शत् नमन ।।।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।



..... "क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद"
^^^^^^^^
भारत का सदियों पुराना इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब आक्रांताओं ने इस देश पर अपनी कुदृष्टि डाली है तब तब मुंह की खाई है।यद्यपि अंग्रेजों ने कुछ समय के लिए अपने कारनामों से भारत को गुलामी का दंश दिया परंतु भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों ने उन्हें छठी का दूध याद दिला दिया।उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे देश के चहेते कांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद।
आइए जानते हैं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में---
सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक बार कहा था--
"निज के विचारों तथा देश के हित में किसे चुना जाये यह जानना कभी कभी कठिन हो जाता है।कभी ऐसा अवसर आता है जब बहुजन हिताय अपने मौलिक विचारों को भी तिलांजलि देनी पड़ती है।"
   परंतु आजाद जैसे व्यक्तित्व ने तो देश हित में न केवल अपने मौलिक विचारों को तिलांजलि दी अपितु स्वयं को ही न्यौछावर कर दिया।
 .मध्यप्रदेश के आलीराजपुरा जिले के भाबरा गाँव में माता जगरानी और पिता पंडित सीताराम तिवारी के इस लाडले ने23जुलाई1906में इस भारत धरा पर जन्म लिया।उनका बचपन भाबरा गाँव के भील सखाओं के साथ व्यतीत हुआ और वहीं उन से धनुर्विद्या का अचूक निशाना साधने की कला सीखी।आगे चलकर वे गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुए।उनमें राष्ट्र भक्ति की भावना का बीज बोने वालों में थे उनके साथी विश्व नाथ वैशवपायन तथा उनके प्रमुख संगठन"हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन"के बैनर तले देश को आजाद कराने के कार्यों में उनके साथ शचीन्द्र नाथ सान्याल, बटुकेश्वर दत्त, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव जयदेव और अशफाक उल्ला आदि अन्य क्रांतिकारी थे।
  ..निर्भीकता और हाजिर जवाबी में तो उनका कोई मुकाबला नहीं था।अंग्रेजों के विरुद्ध गतिविधियों के कारण एक बार जब उनको मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया तो जब उनसे उनका नाम पता पूछा गया तो निडर होकर उन्होंने जो जवाब दिया वह था--
मेरा नाम आजाद मेरी माँ का नाम धरती मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल खाना साथ ही अपना संकल्प भी दोहरा दिया,"मैं आजाद हूँ आजाद रहूंगा और आजाद ही मरूंगा, अंग्रेजी सरकार मुझे जीवित नहीं पकड़ सकेगी।वहीं हुआ।24वर्ष5मा ह की अल्पायु में अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने पर उनसे वीरता से लड़ते हुए अपनी ही बंदूक की गोली से अपनी इहलीला समाप्त कर मां भारती को समर्पित हो गए और जाते जाते कह गये----
"सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिंदगी ही हवन है वतन के लिए
हम जिये तो जिये सदा वतन के लिए
अब करके जाते हैं नमन वतन के लिए।"
और इस क्रांतिकारी युवा का नाम भारतके इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया।
     जय हिंद-जय भारत
मौलिक लेख
           लीला कृपलानी



🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे,🌹 28/7/21🌹🙏
🙏🌹 *क्रांति कारी चंद्रशेखर आजाद* 🌹🙏

*परिचय* : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक एवं लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। उनके पिता ईमानदार, स्वाभिमानी, साहसी और वचन के पक्के थे। यही गुण चंद्रशेखर को अपने पिता से विरासत में मिले थे। 
 
*विवरण* : चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जहां उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को उनका निवास बताया।

       जज ने उनको, 15 कोड़े लगाने की सजा सुनाई. ये वो पल था जब उनकी पीठ पर 15 कोड़े बरस रहे थे और वो वंदे मातरम् का उदघोष कर रहे थे. ये ही वो दिन था जब देशवासी उन्हें आजाद के नाम से पुकारने लगे थे. धीरे धीरे उनकी 
चंद्रशेखर आजाद की निशानेबाजी बचपन से बहुत अच्छी थी. दरअसल इसकी ट्रेनिंग उन्होंने बचपन में ही ले थी. सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के कई नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया. जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गए.

चंद्रशेखर आजाद ने 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था. आजाद रामप्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. उन्होंने सरकारी खजाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया. उनका मानना था कि यह धन भारतीयों का ही है जिसे अंग्रेजों ने लूटा है. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी कांड (1925) में सक्रिय भाग लिया था
                  चंद्रशेखर आजाद, इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और अपने एक अन्य और मित्र के साथ योजना बना रहे थे. अचानक अंग्रेज पुलिस ने उनपर हमला कर दिया. आजाद ने पुलिस पर गोलियां चलाईं ताकि उनके साथी सुखदेव बचकर निकल सकें. पुलिस की गोलियों से आजाद बुरी तरह घायल हो गए थे. वे सैकड़ों पुलिस वालों के सामने 20 मिनट तक दिलेरी से लड़ते रहे.

आखिर में उन्हेांने अपना नारा आजाद है आजाद रहेंगे अर्थात न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी को याद किया. इस तरह उन्होंने पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी.हमने ऐसे कई वीर रत्न की बहादुरी से आजादी पाई है, 
*चंद्रशेखर आजाद को*
*शत शत नमन*

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल पुणे🌹🙏



अग्नि शिखा मंच
२८/०७/२०२१
विधा लेख
**बिषय** **चन्द्र शेखर**
              **आजाद*
    
भाँवरा गाँव मे माँ जगरानी देवी ने २३/७/१९०६ को पुत्र
रत्न को जन्म दिया।भाँवरा गाँव डालला १३वर्ष के उम्र मे
देश का डालला बन गया।
स्वतंत्रता के लिये जूलुस निकला था।उसको तीतर वितर करने के लिए अग्रेजो ने लाठी चार्ज करवा दिया उसी मे किसी के हाथ झन्डा गिर रहा था जीसको चन्द्र शेखर ने गिरने पहले ही पकड़ लिया।सिपाहियों ने चन्द्र शेखर को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर किया।
मजिस्ट्रेट ने पूछा तुम्हारा नाम क्या है।
चन्द्रशेखर ने बोला। आजाद
घर कहा है। जेलखाना
मजिस्ट्रेट ने पूछा उम्र
  आजाद बोले। १३वर्ष
मजिस्ट्रेट ने १३ बेत की सजा सुनाया।
आजाद ने हर बेत पर भारत माँ के नारे लगाये।और उस दिन से भाँवरा का लाल क्रांतिकारी **चन्द्र शेखर आजाद** बन गया।
आजाद ने राज गुरू भगत सिंह के साथ मिलकर संध्या के समय लाहौर मे पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और जे.पी.सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर सायकिल से निकला तिनो क्रांतिकारी गोली मार कर वही ठंडा कर दिये उस के अंगरक्षक को भी मार दिये।इस प्रकार आजाद अग्रेजो को खटकने लगे उन को पकड़ने के अग्रेजो ने मुखबिरों लगया था लेकिन आजाद कभी भी उनके हाथ नहीं आये।
तीनो क्रांतिकारी भेष बदल कर लाहौर से निल लिए।आजाद जी भेष बदलने मे माहिर थे।वे छुपने के लिए कानपूर आये थे।मुखबिर से अग्रेजो को पता चल गया।जीस घर मे छुपे उसको सादे पोसाक मे सिपाही घेर लिए थे।मगर आजाद तो आजाद साड़ी पहनकर घर से निकल लिए।आजाद का शरीर बलिष्ठ और लम्बा था साड़ी छोटी पड़ रही थी पर सिपाहियों ने ध्यान नहीं दिया और आजाद कानपूर से निकल लिए। ऐसे जाबांज थे देश भक्त क्रांतिकारी चन्दशेखर आजाद।
देश मे तब दो चार गद्दार थे जिनके मुखबिरी से आजाद अग्रेज सिपाहियों के द्वारा अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद मे घेर लिए गये तब आजाद ने उनका मुकबला पेड़ का आड़ लेकर अपने पिस्तौल से करते रहे जब एक गोली बची थी वह अपने को मार लिया।
जब पेड़ के पिछे से आवाज आनी बन्द हो गई तब सिपाही आगे बढ़ कर आजाद के पास गये।आजाद चिरनिद्रा मे सोये थे पिस्तौल अब भी उनके हाथ मे थी।
     इस तरह अपने देश की ही गद्दारी से एक देश भक्त सहीद होगया वह मनहूस दिन २७/२/१९३१/था भाँवरा का लाल माँ जगरानी के कलेजे का टुकड़ा देश पर कुर्बान हो गया।
जैहिन्द जय भारत ।
बन्दे मातरम्।
**स्वरचित** 
 **बृजकिशोरी त्रिपाठी**
   .. **गोरखपुर ,यू.पी**
मैने अपनी सिमीत जानकारी केअनुसार आजाद जी के बारे लिखी हूं त्रुटि हुंई हो तो क्षमा करे सही जानकारी से अवगत कराये।बृजकिशोरी।



चंद्रशेखर आजाद के जयंती पर एक प्रस्तुतीकरण

देश प्रेम वीरता और साहस के विशाल श्री चंद्रशेखर आजाद जिन्होंने 25 वर्ष की उम्र में भारत माता के प्रति शहीद होने वाले महापुरुष थे जिन के विषय में लिखने के लिए लेखनी भी छोटी पड़ जाती है।

यह एक चमत्कारी सत्य है भारत भूभाग पर ऐसे योद्धाओं का अवतरण हुआ था
उन्नाव जिले का एक गांव जिसका नाम बदरका संसार में मशहूर हो गया क्योंकि चंद्रशेखर आजाद का उस गांव से संबंध था।
असहयोग आंदोलन से इनके मन में जागरण का जोश आया और सत्याग्रह यों के साथ निकल पड़े।
क्रांति की जितनी योजनाएं बनी सभी के सूत्रधार आजाद थे

27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर अंग्रेज घिर गए। अंग्रेजों के हाथों मरने की वजाय खुद अपनी गोलियां से आत्महत्या कर ली

चंद्रशेखर आजाद के विषय में यह कहावत चरितार्थ है कि चिंगारी बनी शोला आजाद जिंदाबाद।

आज से 100 वर्ष पहले वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े थे गिरफ्तार भी हुए थे और जज के सामने अपना परिचय देते हुए यह बताया था उनका नाम आजाद है पिता का नाम स्वतंत्रता और निवास जेल

अपनी सजा में हर बार वह वंदे मातरम और महात्मा की जय का नारा बुलंद किया था
ऐसे क्रांतिकारी नेता श्री चंद्रशेखर आजाद को शत-शत नमन करते हुए हर भारतवासी उनकी जयकारा कर रहा है

कुमकुम वेद सेन



*#अग्निशिखा मंच* 🙏🙏🌹🙏🙏दिन बुधवार
दिनांक 28 जुलाई 2021
विषय चंद्रशेखर आजाद ( गद्य )

*जनमानस में अंकित चंद्रशेखर आजाद की तस्वीर का सच*

भारत देश के गौरव रहे चंद्रशेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के पवित्र गांव भाबरा में 23 जुलाई 1906 में हुआ था। "आजाद" उपनाम उन्होंने स्वयं रखा था। इस शपथ के साथ कि वे आजाद हैं आजाद ही रहेंगे और कभी अंग्रेजों के गोली के शिकार नही होंगे।
          काकोरी कांड के बाद आजाद काफी दिनों तक अंडरग्राउंड थे।वह झांसी में अपने एक क्रांतिकारी मित्र रुद्रनारायण के घर मे छिपकर रहे।वहीं उनके मित्र ने उनसे तस्वीर खिंचवाने को कहा। आजाद नही चाहते थे परन्तु उन्होंने अपने मित्र का आग्रह मान लिया। आजाद की मूछों पर ताव देती, जनेऊ धारण वाली वही तस्वीर आज जन - जन के मन में बसी है। इस तस्वीर के लिए उनके मित्र ने उन्हें काफी लंबे समय तक एक ही पॉस्चर में खड़ा रखा था।परन्तु कुछ समय बाद ही आजाद को यह भान हो गया कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। क्योंकि उनके सर पर हमेशा खतरे की तलवार लटकती रहती थी और इस तस्वीर की वजह से वह लोगों को पहचाने जा सकेंगे।
          अपनी इस आशंका की वजह से उन्होंने अपने क्रांतिकारी मित्र विश्वनाथ वेशवपायन को रुद्रनारायण के पास यह कहकर भेजा कि वे उनकी उस तस्वीर को नष्ट कर दें। रुद्रनारायण ने विश्वनाथ जी से कहा कि वे आजाद की आशंका को समझते हैं। मैंने यह तस्वीर इसलिए ली है कि जब भारत आजाद होगा तब इस देश की पीढ़ी आजाद के बारे में पढ़े।उनके इतिहास को जाने और लोग यह जाने की आजाद ने देश के लिए किस तरह से आजादी की लड़ाई लड़ी। जब लोग उनके बारे में पढ़ें तब वह यह महसूस करें कि आजाद भी उन्हीं की तरह एक आम इंसान थे और अपने अदम्य साहस की वजह से उन्होंने अंग्रेज़ो को नाके चने चबवाये थे। आप जाएं और आजाद से कह दें कि मैंने सारे नेगेटिव और तस्वीरे जला दी हैं। और मैं इन तस्वीरों और उनके नेगेटिव को दीवार में चुनवा दूंगा। और यह वादा करता हूं आपसे कि आजाद के जीते जी कभी यह तस्वीर अंग्रेजों के हाथ नही लगेगी। 
        27 फरवरी 1931 में चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद ही यह तसवीर जारी की गई थी जो भारत के जन - जन के मानस पटल पर अंकित है।
            *मूंछों पर ताव, कांधे पर जनेऊ*
            *कमर में पिस्टल, शेर सी शख्शियत*
            *वो याद थे, वो याद हैं, वो याद रहेंगे*
            *आजाद थे, आजाद हैं, आजाद रहेंगे!!*
*अमर शहीद श्री चंद्रशेखर आजाद को इस मंच का शत- शत प्रणाम* 🌹🌹🙏🙏🌹🌹

  *मीना गोपाल त्रिपाठी*
   *अनुपपुर ( मध्यप्रदेश )*
     *28 / 7 /2021*



कविता का शीर्षक- 
चंद्रशेखर आज़ाद 
दिनांक-23/07/2021
विधा का नाम-काव्य   
---------------------------------------
शत शत नमन उन 
वीरों को। जो शहीद 
होकर भी आज़ाद 
होते हैं। 
असहयोग आंदोलन
का वो प्रणेता था।
भारत की स्वतंत्रता 
का वो चितेरा था।

जोशो जवानी 
उसकी शिराओं में दमकती थी। 
उसने कहानी 
युद्ध के भीषण 
कहर से लिखी थी। 
उसको कभी ना 
अहिंसा का पाठ 
भाया। 
उसने सुकून 
खून के पथ पर 
ही पाया।

मौत से आंखें 
मिलाकर वह बात
करता था।
अंगदी व्यक्तित्व 
पर जमाना नाज 
करता था।
इतिहास कुछ भी
कहे लेकिन जानता
है। हर हिन्दुस्तानी,
बिना आजाद के
आजादी हरगिज़ 
नहीं आई होगी।
 
माँ भारती की लाज 
का वो पहरेदार था। 
इस धरा पर, अब 
दिलों की बोलियां 
जलने न दूंगा।
चंद्रशेखर आज़ाद 
आज़ाद थे, आज़ाद हैं, और आज़ाद रहेंगे।


वीना आडवानी
नागपुर, महाराष्ट्र
*************



मंच को नमन
विधा:--- लेख
विषय:--- *क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद*।

*परिचय*:--- भारतीय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी एवं माता के नाम जगदानी देवी था। उनके पिता ईमानदार , स्वाभिमानी,साहसी और बच्चन के पक्के थे। यही गुण चंद्रशेखर को विरासत में मिला।
*विवरण*:--- चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई शुरू की। 1920 - 21
वर्षों में गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार भी हुए और जज के सामने प्रस्तुत हुए। जहां अपना नाम *आजाद*, पिता का नाम *स्वतंत्रता*
माता का नाम *धरती* *निवास स्थान जेल* बताएं। 15 कोड़े की सजा दी गई।
हर कोड़े के बाद *वंदे मातरम और महात्मा गांधी की जय* का बुलंद स्वर किया। इसके बाद सार्वजनिक रूप से *आजाद* कहलाए। क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जन्म स्थान भावारा *आजाद नगर* के रूप से जाना जाता है।

जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ तब
*आजाद* उस तरफ मुड़ कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट आर्मी से जुड़ गए। राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद कोकरी
 षड़यंत्र 1925 मैं सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर फरार हो गए।
17 दिसंबर 1928 को चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के कार्यालय को घेर लिया। ज्यों ही जेपी सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर निकले तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी जिसके कारण सांडर्स के हाथ में लगा मोटरसाइकिल से गिर पड़ा फिर भगत सिंह आगे आकर 5 गोलियां दागकर उसे पूरा ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं लाहौर में जगह जगह पर चिपका दिए गए जिस पर लिखा था लाला लाजपत राय की मृत्यु के बदला ले लिया गया है।

*उपसंहार*:-- आलफ्रेंड पार्क इलाहाबाद में 1931 में रूस की बोल्शेविक क्रांति के तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आवाहन किया उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी पकडे नहीं जाएंगे और ने ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी।
पूरा करने के लिए 27 फरवरी 1931 इसी पार्क में अपने को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राण की आहुति दे दी।
जाते जाते कह गए:--
*मेरा हर सुमन है वतन के लिए*,
  *हम जिए सदा वतन के लिए* ,
    *अब हम करके जाते हैं* ,
* *नमन वतन के लिए*।

विजयेन्द्र मोहन।


बुधवार****** २८/७/२१
विधा*******लेख
विषय******
     #**चंद्रशेखर आजाद**#
                ^^^^^^^^^
     अगर चंद्रशेखर आझाद नहीं होते तो हम आज़ाद नहीं होते ।
स्वतंत्र संग्राम के इस महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले चंद्रशेखर आजाद भाबरा गांव झाबुआ , (म प्र) पैदा हुए । 23 जुलाई १९०६ में जन्मे और 27 फरवरी 1931 तक, (आ आखरी सांस तक )देश की सेवा करते रहें ।
       मित्रों केवल 14 वर्ष की आयु में आजाद सहकार आंदोलन में सक्रिय हुए । गांधी जी ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था । और बड़े निर्भीकता, निडरता से आंदोलन में आजाद कूद पड़े और आखरी सांस तक वे अपनी देश भक्ति करते रहे । गांधी जी के कार्यों से, अहिंसात्मक विचारों से वे बहुत प्रभावित हुए थे । गांधी जी के साथ रहे । बचपन में ही उन्होंने कोड़े खाए थे । फिर भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ । दिल में देशभक्ति की मशाल और धधकती गई । अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब दिया ।
     8 अप्रैल 1929 को दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया ।
17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह राजगुरु ने संध्या समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेरा, जे पी सैंड्रेस को राजगुरु ने पहली गोली मारी वह मोटरसाइकिल से नीचे गिरे और आजाद ने फिर उन पर गोलियां बरसा कर मार डाला ।
            आंदोलन में गिरफ्तारी के बाद ,बड़ी बहादुरी से ,निडरता से, अपनी जान की परवाह ना करते हुए जिस बेबाकी से न्यायाधीश को जो जवाब दिया वह उनके हौसले का परिचय था , काबिले तारीफ था ।
          अझाद ने कहा था, मेरा नाम आझाद है , पिता है स्वतंत्रता , मेरा पता है जेल ,
    और तभी से वे प्रसिद्ध हुए आझाद नाम से । भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को जब फांसी हुई तो उन्होंने उनकी जान बचाने अपनी जान की बाजी लगा दी ।
        आजाद, अल्फ्रेड पार्क में अपनी सभा कर रहे थे, किसी ने जाकर उनकी गद्दारी की तो अंग्रेजों ने उसे घेरा और उसके बाद आजाद ने खुद अपनी पिस्तौल कनपटी में लगाकर अपनी जान देदी ।
          तो ऐसे थे हमारे बहादुर, निडर ,देशभक्त चंद्रशेखर आजाद जिनको आज भी इस मिट्टी का कण कण याद करता है और जब तक चांद सूरज है तब तक याद करते रहेगा । 
ऐसे जांबाज़ शहीद देशभक्तो चंद्रशेखर आजाद को
 मेरा कोटि कोटि वंदन ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर



💐💐💐💐 विधा लेख💐💐💐💐

 विषय चंद्रशेखर आजाद

भारत भूमि अमर सैलानियों के उत्सर्ग से भरी पड़ी है यदि यूं कहा जाए कि देश को आजाद कराने सैलानियों का पदार्पण ना हुआ होता तो आज भी हम विदेशी शासन सत्ता में पड़े होते अगर चंद्रशेखर आजाद नहीं होते आजाद हूं आजाद थे आजाद रहूंगा का नारा देकर यह ज्योति ना जलाते तो शायद आजादी का परचम इस तेजी से इस धरा पर नहीं फैलता जिस तेजी से उस दौरान फैला ता स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अनेकों महान हस्तियां हुई हैं जिसमें से एक महान हस्ती इस महायज्ञ में जो हमारे बीच में अपना कृतित्व और व्यक्तित्व समर्पित करके गए हैं उनका नाम है आजाद चंद्रशेखर इस महायज्ञ में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी चंद्रशेखर आजाद मध्य प्रदेश के होनहार व्यक्तित्व का जन्म भाबरा गांव झाबुआ में हुआ 23 जुलाई सन 1980 को जन्मे और 27 फरवरी 1931 तक अपने अंतिम क्षण कर देश की सेवा करते रहे और उन्होंने किसी भी तरह से देश की आजादी पर आंच ना आने दिया और सदा आजाद रहने का परिचय दिया उनकी आयु 14 वर्ष का बालक विद्यार्थी जीवन को ही सब कुछ जानता है वह उस दौरान अपने गुरुजनों से अपने प्रेरणादायक ओं से प्रेरणा लेकर आजाद सेना में आंदोलन में शामिल हो गए और गांधी जी ने जो आंदोलन का नेतृत्व किया था उसे बड़ी निर्भीकता से आंदोलन मैं कूद गए और देशभक्ति का अपना जो जज्बा था उसे समाज में लाकर दिखाया गांधी जी के जो कार्यशैली थी वह हिंसात्मक विचारधाराओं से परिपूर्ण थी क्योंकि गांधी जी के साथ रहकर उन्होंने देश की आजादी के लिए जो अपना पदार्पण किया बचपन में तो उन्होंने कई कूड़े भी खाएं और फिर जब उनका जज्बा कम नहीं हुआ तो देश में उन्होंने देश भक्ति की मशाल जलाने के लिए आगे बढ़ते चले गए दिल्ली के फैमिली में बम फेंका 8 अप्रैल 1929 का दिन था हमारी दादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रभादेवी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोकुल प्रसाद सराफ सदा बतलाया करते रहते थे कि किस तरह से उन्होंने देश के लिए बिल्कुल सीना तान के अपना दायित्व निभाया दादी बतलाया करती थी कि जब 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह राजगुरु ने समझा कि समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक को दफ्तर में गिरा था तो उसी समय राजगुरु पहली गोली मारी पर मोटरसाइकिल से नीचे गिरे आजाद ने फिर उन पर गोलियां बरसा कर उन्हें मार डाला कहते हैं इससे ब्रिटिश शासन बौखला गई थी और हर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पकड़ पकड़ कर आने को यातनाएं दी थी आंदोलन मैं जिसकी भी उस दौरान गिरफ्तारियां हो रही थी उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जा रही थी ऐसे में आजाद ने बहुत निडरता के साथ अपना परिचय दिया और वह सदा यह कहते थे मेरा नाम आजाद है मेरा पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा पता यदि कोई पूछे तो उससे बता देना जेल है उन्होंने माता-पिता को यह कह दिया था कि अब मेरा जीवन देश के लिए हैं और मैं अपने देश के लिए ही करना चाहता हूं चाहे तो मेरे प्राणों की बलि क्यों न जाए जब भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई तो उन्होंने उन्होंने अपनी जान की बाजी देश को आजाद कराने में लगा दी आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सभा कर रहे थे तो उस समय भी अनेकों गद्दारों के कारण देश की आजादी को सफलता मिल नहीं मिल रही थी ऐसे ही किसी गद्दार ने जाकर अंग्रेजों को इसकी सूचना दे दी और अंग्रेजों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया ऑल फ्रेंड पार्क मैं जहां आजाद थे वहां से उन्होंने अनेकों जगह पेड़ों के पीछे छिपकर अंग्रेजों का मुकाबला किया किंतु जब उन्होंने देखा कि किसी भी तरह से यहां से नहीं निकल पा रहे हैं तो उन्होंने अपनी ही पिस्तौल से एक बहादुर निडर देशभक्त का परिचय देते हुए मिट्टी को याद किया भारत माता को सलाम किया और मिट्टी को उठाकर अपने माथे से लगाया और भारत माता को सलाम किया और अपने ही पिस्तौल से अपनी कनपटी पर लगाकर अपना बलिदान देश को दे दिया और यही अंतिम क्षण उनका संदेश था कि मैं आजाद हूं आजाद रहूंगा और आजाद था भारत माता को अब हमारे आने वाले साथी आजाद करा कर रहेंगे उनका उद्घोष था जो भारत की जनता को कार्य करने के लिए प्रेरणा दिया और आज हम अपने देश में आजादी में सांसे ले रहे हैं 
जय हिंद

 जय भारत 


भारत माता की जय

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
 कुमारी चंदा देवी स्वर्णकार जबलपुर मध्य प्रदेश



नमन पटल
विधा -आलेख
विषय-चंद्रशेखर आजाद

चंद्र शेखर आजाद माँ भारती के सच्चे सपूत थे।भारत की आजादी के लिए अपने सुख की परवाह न करते हुए,देशभक्ति का अमृत दिल मे समाए अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ देश में क्रांति की मशाल जलाई।
 उनका बचपन मध्यप्रदेश के एक आदिवासी इलाके झाबरा में बीता था। 
रामप्रसाद बिस्मिल, राजगुरु और भगतसिंह के साथ मिलकर इन्होंने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे।
उन्होंने गांधी जी के साथ असहयोग आंदोलन में भाग लिया था किंतु उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया औऱ जज के सामने पेश किया जहाँ उन्होंने अपना परिचय आज़ाद के रूप में दिया तथा मां का नाम धरती और पिता का जेल तथा जेल को अपने निवास की जगह बताया।
कोड़ों की सजा खाते रहे और भारत माता की जय, महात्मा गांघी की जय के नारे लगाते रहे।अंग्रेज उनके अंदर देशभक्ति की प्रज्ज्वलित आग को देखकर दंग थे।
अल्फ्रेफ पार्क इलाहाबाद में ,किसी मुखबिर ने मुखीबीरी कर दी और आज़ाद अंग्रेज सिपाहियों द्वारा घेर लिए गए। आज़ाद ने बहुत देर तक उनसेमुकाबला किया लेकिन अब उनके पास एक ही गोली बची उसे उन्होंने अपने सीने में उतार लिया और कभी अंग्रेजों के हाथ न आने के अपने सौगन्ध को पूरा किया। यह मनहूस दिन 27/231 था जिस दिन माँ वसुधा ने अपना प्यारा लाल खो दिया था।

भारत माँ के इस सच्चे सपूत को शत शत नमन

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'



अ. भा. अग्निशिखा मंच
बुधवार -28/7//2021
विषय - क्रांति कारी - चंद्रशेखर आज़ाद 
विधा - लेख 

स्वतंत्रता संग्राम के महानायक चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी एवं माता जगदानी देवी थीं।

चंद्रशेखर जी को ईमानदार, स्वाभिमानी, साहसी और वचन के पक्के होने के गुण पिता जी से विरासत में मिले थे। 
 
चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु मे संस्कृत पाठशाला बनारस में पढ़ाई की। वहीं उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया और वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से भी जुड़े। वहीं पर वे गिरफ्तार हुए और उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को उनका निवास बताया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, 'वन्दे मातरम्‌' और 'महात्मा गांधी की जय' का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। 

बाद में वे 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी' से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया और फरार हो गए।

 17 दिसंबर, 1928 को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने जे.पी. साण्डर्स पर गोलियाँ दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। 

 फिर इन्होंने लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों द्वारा खूब सराहा गया।
 
अलफ्रेड पार्क, इलाहाबाद में 1931 में उन्होंने समाजवादी क्रांति का आह्वान किया। उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी। इसी लिए उन्होंने 27 फरवरी, 1931 को इसी पार्क में स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर



चंद्रशेखर आजाद

चन्द्र शेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा में हुआ था ।उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में क्रांति का रास्ता चुना ।आजादी को लेकर चंद्रशेखर आजाद में ऐसा जज्बा था, कि वे पीठ पर कोड़े खाते रहे और वंदे मातरम का उद्घोष करते रहे ।चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद प्रारंभ किया गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े ।आजाद की शहादत से 16 वर्षों बाद 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान की आजादी का सपना पूरा हुआ ,किंतु वे उसे जीवित ना देख सके। उन्होंने संकल्प किया था कि वह कभी पकडे नहीं जाएंगे, और न ही ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी ।

शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश



क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव में जन्मे चन्द्रशेखर आजाद जब संस्कृत शिक्षा के लिए बनारस आये तो उस समय किसी ने सोंचा भी नहीं होगा कि यह छोटा लड़का आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महान व अमर सेनानी होगा और ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला देने में सक्षम होगा.
लेकिन यही हुआ. बनारस उस समय क्रांतिकारीयों का गढ़ था और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सन्यास व योगेशचन्द्र चटर्जी जैसे महान क्रांतिकारी बनारस में अपना केन्द्र बनाये थे. चन्द्रशेखर आजाद उन लोगों के सम्पर्क में आये और आजादी के आन्दोलन में सक्रिय हो गये. गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया. पकड़े जाने पर इन्होंने अपना नाम आजाद बताया और तभी से देश इनको आजाद के नाम से ही पुकारने लगा.
गांधी जी के अहिंसक आन्दोलन से मोहभंग होने पर आप ने अन्य क्रांतिकारीयों के साथ मिलकर क्रांतिकारी संगठन हिन्दुस्थानी प्रजातांत्रिक संघ स्थापना सन् 1924 में की. महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय को एक जलूस का नेतृत्व करते समय पुलिसवालों ने वहाँ के पुलिस अधीक्षक सेन्डर्स के कहने पर लाठियों से पीटते पीटते मार डाला. इस घटना की पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और क्रांतिकारीयों ने इसका बदला लेने का निश्चय किया. 1928 में चन्द्रशेखर आजाद ने लाहौर में उसकी हत्या करके लाला लाजपत राय के हत्या का बदला ले लिया. क्रांतिकारी गतिविधियों में पैसे की जरूरत को पूरा करने के लिए आपने सुखदेव और रामप्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर 1925 में काकोरी में रेलवे के खजाने को लूट लिया.
27 फरवरी, 1931 को ये जब सुखदेव के साथ अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में अपनी भावी योजना के बारे में गुप्त वार्ता कर रहे थे तो उसी समय एक देशद्रोही की सूचना पर अंग्रेज़ी पुलिस ने इन्हें चारों ओर से घेर लिया. सुखदेव तो बच कर निकल गए, लेकिन इस महान क्रांतिकारी को चारों ओर से घेर कर पुलिस ने गोली चलाना शुरू कर दिया. इस महान क्रांतिकारी ने अंग्रेजों का काफी देर तक अकेले ही मुकाबला किया, लेकिन अन्त में यह लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ.
यह देश चन्द्रशेखर आजाद और उनके जैसे लाखों क्रांतिकारीयों का हमेशा ऋणी रहेगा.
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)


🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️
🌺बुधवार -28/7//2021
🌺विषय - क्रांति कारी - चंद्रशेखर आज़ाद 
🌺 विधा - लेख 
चंद्रशेखर आजाद
🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️
चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई सन 1986 को भाबरा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता जी सीताराम तिवारी उन दिनों मध्य प्रदेश रियासत में नौकरी करते थे। यहीं बालक चंद्रशेखर का बचपन बीता आदिवासी क्षेत्र में उन्होंने भील बालकों के साथ धनुष बाण चलाना एवं निशानेबाजी सीखी जो आगे चलकर उनके बहुत काम आए।
बड़े होने पर इनका मन देश प्रेम की ओर मुड़ गया। वह देश को आजाद कराने के लिए सशस्त्र क्रांति का सहारा लेने लगे। आगे चलकर वे हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ नाम के दल में सम्मिलित हो गए।
उन्हें जब पहली बार गिरफ्तार किया गया तो 15 कोड़ों की सजा मिली उन्हें नंगा करके कोड़े लगाए गए। एक एक कोड़े पर वे तब तक भारत माता की जय बोलते रहे जब तक कि बेहोश नहीं हो गये। 

कुछ दिनों तक वे झांसी के पास ओरछा के जंगलों में रहे और वहां निशानेबाजी सीखते रहे और सिखाते भी रहे। 
वहां वे पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से जाने जाते थे। 
राम प्रसाद बिस्मिल सचिंद्र नाथ सान्याल योगेश चंद्र चटर्जी आदि के साथ मिलकर इन्होंने हिंदुस्तानी प्रजातांत्रिक संघ का गठन किया।धन जुटाने के उद्देश्य से यह पैसे वाले लोगों के यहां डकैती डालते थे किंतु किसी औरत पर हाथ नहीं उठाते थे। एक बार किसी औरत ने इनके हाथ से पिस्तौल छीन ली। तब से इन्होंने गांव में डाका डालना बंद कर दिया और वह सरकारी प्रतिष्ठानों को लूटने लगे। ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। इस कांड में पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। 

४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा।भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।

चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था। इस काण्ड के फलस्वरूप क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए। केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया। वे न्यायालय को अपना प्रचार–मंच बनाना चाहते थे।

चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। 

अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद के बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। 
🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️🕊️
कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️



नमन मंच ब
दिनांक 28 /7/ 2021 
विषय -: चंद्रशेखर आजाद 
       विधा-: लेख

23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर आजाद का अवतरण हुआ था! भाबरा गांव की धरा भी इस दिन मुस्कुराई थी! पिता सीताराम तिवारी एवं माता जगदानी थी! 

नाम के अनुरूप सदा आजाद ही रहे ! 14 वर्ष की अल्पायु में ही असहयोग आंदोलन से जुड़े ! आजाद नाम अपना दिया और पिता को स्वतंत्रता नाम दिया ! सजा के 14 कोड़े जो पडे़ वे शौर्य बनकर ही खड़े थे ! तन पर कोडे़ बरस रहे थे पर उनके मुंह से वंदे मातरम का उद्घोष हो रहा था ! गांधी के अनुयायी जरूर थे किंतु अहिंसा का पाठ वे नहीं पढ़ पाये उनकी शिराओं में तो गर्म लहू दौड़ रहा था अतः वे तीव्र क्रांतिकारी के रुप में उभर कर आये ! उनमें जोश बहुत था और वे किसी के द्वारा दी गई यातनायें नहीं सहन कर सकते थे यही कारण था कि उन्होंने गांधी को अपनाया किंतु अहिंसा के अनुयायी नहीं बन पाये! 
उन्होंने बलिदान का रास्ता अपनाया! गुलामी को नेस्तनाबूद कर आजादी दिलाने का फौलादी संकल्प था उनका! वे असहयोग आंदोलन के प्रणेता भी थे! देश की आजादी के वे सशक्त हथियार थे! अपने प्राणों की आहुति देकर भी देश की आजादी के फौलादी संकल्प को लेकर अंत तक अडे़
 रहे! 
उन्होंने अपने नाम को सार्थक किया....! नाम से आजाद थे और आजाद ही रहे....! 

                चंद्रिका व्यास
             खारघर नवी मुंबई



🙏माँ शारदा को नमन 🙏

🙏महान क्रान्तिकारी भारत के सपूत चन्द्र शेखर आजाद को नमन करते हुए आज सुअवसर मिला है कि मैं आप द्वारा चन्द्र शेखर आजाद जी पर लिखे लेख की समीक्षा करूँ। 🙏
1) @⁨रामेश्वर गुप्ता के के⁩ जी
लाहौर मे पुलिस अधीक्षक को और उनके अंगरक्षक को घेरा और मारकर उन्होंने ये साबित कर दिया था कि अंग्रेजो को वो ज्यादा दिन भारत पर राज नही करने देंगे ।🙏
2) @⁨वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽⁩ जी आपने कहा कि आजाद जी भगत सिंह जी के सलाहकार के रूप मे उस पीढ़ी को देश को आजाद कराने के लिए प्रेरित किया ।और अंत समय तक वो अंग्रेजों के हाथ नही आये । और अंतिम गोली स्वयं को ही मार दी । 🙏
3) @⁨लीला कृपलानी🍑जोधपुर⁩ जी आपने उनके देश प्रेम के सिद्धांत को रखा कि मैं आजाद हूँ,आजाद रहूंगा और आजाद ही मरूंगा और अन्ततः यही हुआ। उनके लिए धरती माँ ही सबकुछ थी ।और उसी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए 🙏
4)@⁨👑पदमाकाक्षी शुक्ला⁩ जी चन्द्र शेखर आजाद जी गांधी जी के साथ असहयोग आन्दोलन से जुड़े थे पर जब गाँधी जी ने आन्दोलन वापस लिया तो नाराज होकर हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संघ मे शामिल होकर देश को आजाद कराने मे महान भुमिका निभाई । 🙏
5) @⁨😇ब्रीज किशोर⁩ जी बिल्कुल सही भाँवरा का लाल माँ जगरानी जी के कलेजे का टुकड़ा थे चन्द्र शेखर आजाद जी ।
6)@⁨कुम कुम वेद सेन⁩ जी
25 वर्ष की कम उम्र मे भी चन्द्र शेखर आजाद जी ने देश के लिए अपने को न्यौछावर कर दिया ।ऐसे महान देश भक्त क्रान्तिकारी थे वे ।🙏
7)@⁨👑मीना त्रिपाठी⁩ जी
मूंछो पर ताव,कांधे पर जनेऊ 
कमर मे पिस्टल, शेर सी शख्सियत 
वो याद थे,वो याद है,वो याद रहेंगे 
आजाद थे,आजाद है,आजाद रहेंगे 
खूबसूरत पंक्तियाँ 🙏
8)@⁨वीना अडवानी 👩⁩ जी आपने सुंदर कविता के माध्यम से अपने भाव रखे पर आज लेख होता तो अच्छा रहता ।🙏
9)@⁨विजेन्द्र मोहन बोकारो⁩ जी
गांधी जी से अलग होकर चन्द्र शेखर आजाद जी राम प्रसाद बिस्मिल जी के साथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी मे जुड़कर देश को आजाद कराने मे महत्वपूर्ण भुमिका निभाई। 🙏
10)@⁨रवि शंकर कोलते क⁩ जी
सही कहा आपने आदरणीय चन्द्र शेखर आजाद नही होते तो हम आजाद नही होते ।🙏
11)@⁨+91 93990 45214 कुमारी चंद्रा सुवर्णकार 🧑🏿‍🦽⁩ जी
अपने गुरूजी की प्रेरणा से कम उम्र मे ही चन्द्र शेखर आजाद जी ने सदा के लिए अपने को अमर कर दिया ।🙏
12)@⁨स्नेह लता पाण्डेय - स्नेह⁩ जी
माँ भारती के सच्चे सपूत चन्द्र शेखर आजाद ने जो क्रान्ति की मशाल जलाई कि अंग्रेजो को देश को आजाद करना ही पड़ा 🙏
13)@⁨वैष्णवी Khatri वेदिका⁩ जी
ईमानदारी,स्वाभिमानी,साहसी और वचन के पक्के होने के गुण चन्द्र शेखर आजाद जी को अपने पिताजी पंडित सीताराम तिवारी जी से विरासत मे मिले इसी की बदोलत वो महान क्रान्तिकारी बने ।🙏
14)@⁨शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर⁩ जी चन्द्र शेखर आजाद जी जैसा महान क्रान्तिकारी जिन्होंने कोड़े खाकर भी देश की स्वतन्त्रता की आस लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए ।

आप सभी ने महान क्रान्तिकारी देश भक्त चन्द्र शेखर आजाद जी के बारे मे बहुत सुंदर चित्रण किया है पर आप सभी से अनुरोध करती हूँ कि अपनी आलेख को एक बार पढ़कर पोस्ट किया करे,कभी कभी टंकण की अशुद्धि से भावार्थ तक बदल जाते है जो कि उचित नहीं है ।🙏

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश



आजाद एक युवा क्रांतिकारी
************************
    भारतीय क्रांतिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद एक बहुत प्रसिद्ध नाम है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया।
चन्द्रशेखर आज़ाद भारत में जन्मे एक बहादुर और क्रांतिकारी व्यक्ति थे, जिन्हें उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए हमेशा याद किया जाता है। अपने साहसिक गतिविधियों के कारण वो भारतीय युवाओं में एक हीरो के रूप में जाने जाते हैं।अपने नाम के अनुरूप ही वो अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ की गई क्रांतिकारी गतिविधियों के बाद भी ब्रिटिश कभी उन्हें पकड़ नहीं सके। बहुत कम उम्र में भाग लेने के लिए प्रेरित हुए। केवल 15 वर्ष की उम्र में आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए एक युवा के लिए बहुत कम उम्र है लेकिन आजाद ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए यह लड़ाई लड़ी। सन् 1922में गांधीजी के द्वारा असहयोग आंदोलन को खत्म करने के बाद, आजाद राम प्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आए। चन्द्रशेखर आजाद को मोतीलाल नेहरू जैसे बहुत सारे दिग्गज नेताओं का समरथ प्राप्त था।
          27फरवरी 1931 को आजाद जब इलाहाबाद के आजाद पार्क में छिपे थे। वीरभद्र तिवारी नाम का एक पुराना साथी पुलिस का मुखबिर बन गया और आजाद के वहां होने की सूचना पुलिस को दे दिया। पुलिस के साथ भिड़ते हुए आजाद ने अपने कोल्ट पिस्टल से गोलियां चलातीं, लेकिन जब उसमें केवल एक गोली बची थी, तो उन्होंने खुद को गोली मारी ली। वे अपने नाम के अनुसार 'आजाद'ही मर गये। आजाद अपने साथियों से कहा करते थे कि वो कभी पकड़े नहीं जाएंगे और हमेशा आजाद ही रहेंगे, वास्तव में वे गिरफ्तार होने कु स्थिति में एक अतिरिक्त गोली अपने साथ रखते थे,ताकि वे खुद को मार सकें।
"वर्षों पहले गुलामी में जकड़ा था,
ये मेरा तिरंगा प्यारा
कायरों के झुण्ड ने रचा था ये खेल सारा
पर ज्योंहि सिंह ने दहाड़ लगाई
गूंजा था ये विश्व सारा
अंग्रेज थर-थर कांपे थे
क्रांतिकारियों ने जो थि एक कदम उठाया
भगत सिंह फांसी पर झूल ग्रे
किन्तु एक क्षण भी पलकों को न झुकाया
आओ मिलकर इनको नमन करें


डॉ मीना कुमारी परिहार




क्रांतिकारी चन्द्र शेखर आजा़द

क्रांतिकारी चंद्रशेखर थे महान 
आज हम करें उनका गुणगान 
देश प्रेम था उनकी रग रग में 
प्रभु का चन्द्रशेखर को वरदान।

 23 जुलाई को भावरा में जन्मे
 जगरानी कोख को धन्य किया 
 पिता ईमानदार व स्वाभिमानी 
 पितृ गुणों को आत्मसात किया।

14 वर्ष मेंअध्ययन हेतु बनारस 
गांधी के आंदोलन में लिया भाग
अंग्रेजों ने किया उन्हें गिरफ्तार 
चंद्रशेखर ने बताया नाम आजाद।

तब 15 कोड़ों की मिली सजा 
हर वार पर बोला वंदे मातरम 
और बोला गांधी जी की जय 
आजाद नाम से हुआ विख्यात।

काकोरी कांड में लिया थाभाग
आँख में धूल झोंक फरार हुआ 
लाजपत राय का लेनाहै बदला 
आजाद ने जोश से प्रचार किया।


27फरवरी अंग्रेज सिपाहियों ने 
घेर लिया उन्हेंअल्फ्रेड पार्क में 
पेड़ पीछे पिस्तौल से वार किया 
शत्रु द्वारा न मरने का वादा किया।
 
अंग्रेजों ने पेड़ को छलनी किया 
पर हाथ ना आए उनके आजाद
अन्तिम गोली बची जब पिस्टल
आजाद ने स्वयं पर वार किया।

दुश्मन उनके शौर्य से अचंभित
समीप जाने में हुए थे भयभीत
क्रान्तिकारी मरकर अमर हुआ
देशभक्त ने शत्रु पर पाई जीत।।


आशा जाकड़


आजाद चन्द्र शेखर बोस
****************
आजाद चन्द्र शेखर बोस
ने आजादी की‌ लडाई लगी थी
देश को अंग्रेजों के चंगुल से बचाया था
निडर होकर दुश्मनों का सामना किया
यातनाये सही पर हार नहीं मानी
देश से प्यार था
मातृभूमि की रक्षा करनी की ठानी थी 
देश की जनता पर हो रहे अत्याचार उन्हें मंजूर नहीं थी ।
देश को अंग्रेजों की गुलामी से छुड़ाने चाहते थे
देश को स्वतंत्रता दिलाकर माने
अपने जीवन की परवाह नहीं किते
ऐसे देशभक्तों से ही हमें आजादी मिली है
जो एक इंसान नहीं पूरे देश की जनता की प्राणों की रक्षा की 
अब तो व्यक्ति स्वार्थी हो गया है देश की जनता क्या एक व्यक्ति की भी‌ प्राणों की रक्षा के लिए आगे नहीं आते 
जो आजादी दिलाकर अपना नाम ही आजाद चन्द्र शेखर बोस हो गया ।
ऐसे वीर पुरुष के आजादी को याद रखना है
उन्हें संत संत नमन करना है
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।


अग्निशिखा मंच
28/7/2021 बुधवार
विषय-चंद्रशेखर आजाद (लेख)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 27जुलाई1906 में उत्तरप्रदेश के भाभरा गांव में हुआ।इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी व माता का नाम जगरानी था।उनका बाल्यकाल आदिवासियों के मध्य भाभरा गांव में बिता आदिवासियों की संगत में उन्होंने धनुष-बाण चलाना सिख लिया।उच्च शिक्षा के लिए उन्हें वाराणसी के सँस्कृत पाठशाला में भेजा गया।बचपन से ही उनके अंदर देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी।महज़ चौदह वर्ष की आयु से ही चंद्रशेखर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
वे अंग्रेज अफसरों के दिल को दहलाने वाले क्रांतिकारी थे। काकोरी ट्रेन डकैती,विधान सभा में बम फटने की घटना व लाला लाजपत रॉय की हत्या का बदला लेने के लिए वो लाहौर में अंग्रेज महानायक पुलिस अधीक्षक जॉन पॉइंट्स सांडर्स की हत्या जैसी घटनाओं में शामिल हो गए।वह क्रांतिकारी स्वतंत्र भारत का दर्पण था। महात्मा गांधी द्वारा चलाये गए "असहयोग आंदोलन" में वह शामिल हो गये ।बहुत ही कम आयु में वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। समाजवाद में विश्वास करते थे।उन्होंने 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएसन'पार्टी का गठन किया।
'चौरा-चौरी' की घटना के कारण महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया 'असहयोग आन्दोन' के निलंबन के कारण वह गरम दल में बदल गया।
पहली सजा के रूप में पन्द्रह कोड़ो की सजा सुनाई गयी।उस समय उनकी उम्र सिर्फ़ चौदह वर्ष की थी।इस घटना के बाद उन्होंने 'आज़ाद' की उपाधि धारण कर ली।वे अंग्रेज सरकार के लिए आतंक का पर्याय बन गए।
27 जनवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क इलाहबाद में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया था।उन्होनें बहादुरी से उनका मुकाबला किया।दूसरा कोई रास्ता न मिलने के कारण उन्होंने अपने आप को गोली मार दी।
चन्द्र शेखर आज़ाद की कही कुछ स्मरणीय बाते-

1. दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,आज़ाद ही रहे हैं,आज़ाद ही रहेंगे।

2. मेरा नाम आज़ाद है मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा घर जेल है।

3. अगर आप के लहू में रोष नहीं है,तो वो पानी है जो आपकी रगों में बह रहा है।ऐसी जवानी का क्या मतलब अगर वो मातृ भूमि के काम न आये।

4. मैं ऐसे डेम को मानता हूं जो स्वतंत्रता,समानता और भाईचारा सिखाता है।

5.दूसरों को खुद से आगे बढ़ते हुए मत देखो,प्रतिदिन अपने खुद के किर्तिमान तोड़ो,क्योंकि सफ़लता आपकी अपने आप में एक लड़ाई है।

6.चिंगारी आज़ादी की सुलगती मेरे जिस्म में हैं,इंकलाब की ज्वालाएँ लिपटी मेरे बदन में हैं। मौत जहाँ ज़न्नत हो यह बात मेरे वतन में हैं,क़ुर्बानी का जज़्बा जिंदा मेरे क़फ़न में है।
 ऐसे क्रांतिकारी देश भक्त को मेरा शत-शत नमन🙏🏻
                  🇮🇳 जय-हिंद🇮🇳
         
                        तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)


चंद्रशेखर आजाद - लेख 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चंद्रशेखर आजाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनका मूल नाम चंद्रशेखर तिवारी था।वे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी क्रांतिकारियों में से एक थे और उनके नाम से बड़े बड़े अंग्रेज पुलिस अधिकारी तक कांपते थे।
 बाल्यावस्था में ही उन्होंने पुलिस की बर्बरता का विरोध प्रकट करते हुए एक अंग्रेज अफसर के सिर पर पत्थर दे मारा था। अपने क्रांतिकारी जीवन में आजाद ने कदम- कदम पर अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी थी।उन्होंने सुखी जीवन का त्याग करके कंटीला रास्ता चुना और अपना जीवन देश पर बलिदान कर दिया।
 भले ही वे अपने जीवन में आजादी का सूर्योदय ना देख पाए, लेकिन गुलामी की काली घटा को अपने क्रांति तीरों से इतना छलनी कर दिया कि आखिरकार उस काली घटा को भारत की भूमि से दुम दबाकर भागना पड़ा।चंद्र शेखर आजा़द वास्तव में "आजा़द"थे।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
28-7-21


अग्निशिखा मंच को नमन🙏

आज विषय लेख *चंद्रशेखर आजाद* 

 *शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा*

   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ऐसे महान सपूत का जन्म 27 जुलाई 1906 में उत्तर प्रदेश में भाबरा गांव में हुआ उनके पिता पंडित थे सीताराम तिवारी जी और माता का नाम जगरानी था उनका बाल्य काल भाभरा गांव में बिता। उनकी पढ़ाई बनारस संस्कृत पाठशाला में भेजा गया बच्चन फैंसी विनायक दामोदर सावरकर मदन लाल धींगरा इनकी कहानी सुनते थे अंग्रेजों के अत्याचार 1919 में जलियांवाला हत्याकांड से उनके मन में देशभक्ति की ज्वाला प्रबल हुई। स्वतंत्रता आंदोलन में भगत सिंह सुखदेव राजगुरु के साथ कूद पड़े काकोरी लूटपाट में उनका बड़ा हाथ था। इतना ही नहीं असेंबली में बम फेंकने वालों में उन्होंने बहुत सहयोग किया ऐसे महान स्वतंत्र संग्राम सेनानी जब अंग्रेजों ने पकड़ा तब उनका नाम पूछा गया उन्होंने कहा चंद्रशेखर आजाद आजाद उसका नाम नहीं था। उनका असली नाम पंडित तिवारी। चंद्रशेखर आजाद पूजा पाठ नहीं करते जब लाला लाजपत राय की अंग्रेजों ने लाठी मारकर लहूलुहान किया और उसमें मौत होगी तो उनकी स्वतंत्रा की ज्वाला तीव्र गति से प्रकट हुई। उनका जीवन जंगलों में आदिवासियों के साथ बिता इसी वजह से धनुष्यबाण चलाना पिस्तौल चलाना सीखा दिखने में बड़े सुंदर थे। स्वतंत्रता कारण उम्र के 14 साल में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेज महानायक सांडर्स की हत्या जैसी हत्याओं में उनका नाम आ गया है। गांधी द्वारा चलाया गया असहयोग आंदोलन में वह शामिल हो गए चौरा चौरी की घटना के कारण महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया असहयोग आंदोलन निलंबित गरम दल में बदल गया। सजा के रूप में क्योंकि अंग्रेजों ने सुनाई थी 15 कोडो की सजा उस समय उनकी उम्र केवल 15 वर्ष की थी इस घटना से उन्होंने अपने नाम के आगे आजाद उपाधि धारण कर ली थी और अंग्रेज सरकार के लिए उनको ढूंढना बड़े मुश्किल हो गया था।
      घूमते घूमते वह इलाहाबाद में अल्फ्रेड रसल पार्क में गए उस समय किसी जयचंद की जैसे अपनी आदमी ने खबर कर दी आजाद यहां पर छुपी हुई है और उनको अंग्रेजी में घेर लिया क्या कर ली है उनको अंग्रेजों के हाथों से कुत्ते के समान नहीं मरना था इसी वजह से जो आखरी गोली बची थी अपने माथे में डालकर शहीद हुए वह दिन था अपनी 27 फरवरी 1931 को इस महान सपूत को शत शत नमन करता हूं।
     अब आल्फ्रेड पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम जे जाना जाता है वहां जाने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।  
      जय हिन्द - जय भारत

सुरेंद्र हरडे
नागपुर
दिनांक :- 28/07/2021



नमन मंच 
चंद्रशेखर आजाद 

चंद्रशेखर आजाद एक निडर और महान स्वत्रंता सेनानी थे उनका जन्म जुलाई 190 १९०६ को मध्यप्रदेश के भाभरा गांव में हुआ था |उन्होंने अपनी पढाई वाराणसी में पूरी की | वे एक क्रांतिकारी नेता थे ,15 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में वे गरिफ्तार हुए |1925 में काकोरी ट्रेन की डैकती में शामिल थे | कोड़े खाते भी उनकी जुबान पर बन्दे मातरम ही निकलता था किसी भी माध्यम से वे स्वतंत्र भारत चाहते थे | 
वे समाजवाद में बिश्वास रखते थे |उ २७ फ़रवरी 1931 में इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मरकर उन्होंने मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड

$$ लेख $$
   $$ चन्द्र शेखर आजाद $$

आजादी के दीवानों के बारे मे कुछ लिखुं उतना मेरी लेखनी मे दम नही । हमारे देश को अंग्रेजो की 200 साल की गुलामी से मुक्त कराने मे करोड़ों लोगो ने तन,मन, धन सब कुछ लगा दिया ।जिसका ही परिणाम है कि आज हम आजादी की सांस ले पा रहे है । अब हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम उनके बलिदान को व्यर्थ न जाने दे ।क्योकि कई मामलो मे हम पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर हमारे देश को गुलाम बनाने मे लगे है ।
अब आती हूँ आज के विषय पर ।
चन्द्र शेखर आजाद जिन्होंने पहले गांधी जी के साथ अहिंसात्मक आन्दोलन मे साथ दिया जब उन्हें महसूस हुआ कि देश को आजाद कराने के लिए खून का खोलना जरूरी है तब गरम दल का साथ देकर अंग्रेजो से दो दो हाथ किया । पेड़ के पीछे छुपकर लाहौर मे पुलिस अधीक्षक और उनके अंगरक्षक को मार गिराया ।तथा जो वादा उन्होंने देश से किया कि कुछ भी हो जाए पर वो अंग्रेजो के हाथ नही आएंगे तब खुद को गोली मारकर अपनी देह से आजाद हो गए। 
मध्य प्रदेश के भांवरा का लाल माँ जगरानी और पिता पंडित सीताराम तिवारी जी की आंखो के तारे चन्द्र शेखर आजाद 25 वर्ष की अल्पायु मे देश को आजाद कराने की बीड़ा उठाकर नवयुवकों मे देश भक्ति का जज्बा जगाकर अन्तिम समय तक आजाद ही रहे ।उन्हे शत शत नमन 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश


🙏🌹अग्नि शिखा मंच 🌹🙏
विषय: ** चन्द्र शेखर आजाद **
विधा:* लेख *
दिनांक:28-7-2021
**********************
आज हम सभी आजाद देश में साँस ले पा रहे,,,,ये सब इन वीरो की कुर्बानी की
कहानी है। देश को अंग्रेजों की दासता से से मुक्त कराने में कितने वीरों ने अपने प्राण गँवाए ।
   चन्द्र शेखर आजाद भी इन वीरो मे से एक हैं,,,इनके साहस और वीरता की कहानी बड़ी ही अद्भुत है।माता जगरानी
देवी और पिता सीता राम तिवारी के घर इस वीर बालक ने जन्म लिया ,,,,छोटी उम्र 
से ही देश भक्ति का जज्बा इनके अंदर भरा था ,,,अपने नाम के आगे इन्होंने जानबूझ कर आजाद लगा रखा था ।
महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन - मे शामिल हुए लेकिन इनका मार्ग अहिंसा का न था।ये सुभाष चन्द्र बोस की धारा गरम दल से प्रभावित हुए । 
      अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने में इनका जोड़ न था। अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने से पूर्व अपने को गोली मार ली, और आजाद नाम को सार्थक किया ।
ऐसे वीर- जवानो को हमारा शत- शत नमन !!!!!!
            ******************
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार~


नमन मंच
विषय;-चंद्रशेखर आजाद
(क्षमा कीजियेगा आज गद्य लेखन था किंतु मैं नहीं दिन में लिख पायी अतः मै अभी उनकी आदरांजलि स्वरूप चन्द पंक्तियां निवेदित कर रही हूं।।क्षमा याचना के संग।।🙏
जन्म हुआ जिनका था 
कुलीन विप्र कुल में 
पिता थे सीता राम।
माता जगरानी थीं।
बचपन सेमिली सीख
देश पर कुर्बानी की।
चल पड़े थे बांध कफ़न
आजाद हो भारत मेरा
दूर हों फ़िरंगी ये 
खुशहाल हो देश मेरा।
नाम था आजाद जिनका
जज्बा कूट कूट भरा
दिल मे देशभक्ति का 
आजाद थे आजाद हैं 
आजाद ही रहेंगे सदा
थे निडर नहीं डरे 
दमन नीति से सदा
हंसते हंसते खाई सजा 
बेंत शतक की उनने 
फिर भी दिल से भक्ति 
जज्बा न कम हुआ।।
मशाल आजादी की।ले
घूमते थे देश भर 
जाने कैसे उन फ़िरंगी को।
लग गयी खबर 
घेर लिया अल्फ़्रेड पार्क को
चहुँ ओर से।
आजाद ने जब जान लिया
मै जिया आजाद हूँ 
मरूंगा आजाद ही 
देश हो सलामत 
जान की फिक्र नहीं 
जय हिंद नारे के संग 
खुद को गोली मार ली।।
सारे राज सीने में दफन कर 
वो चल दिये।।
उनकी जांबाजी से 
मात अंग्रेजों को मिली।
छोड़ के ये देश 
अंग्रेज फिर चले गए।।
उनकी वीरता का  
ऋणी सारा हिंदुस्तान है।
उस पार्क का नाम 
'"आजाद ही विख्यात है। 
निहारिका झा।।🙏🏼🙏🏼


*चंद्रशेखर आजा़द*

भारतीय स्वातंत्र्य सेना के सेनानी का पूरा चंद्रशेखर तीवारी। उनका व्यक्तित्व सदा आजादी के मंत्र जाप करता था। अपने उपनाम को भी *आजा़द* रखा था। तन -मन में भारत माता को बंध मुक्त करना चाहते थे। चंद्रशेखर आजा़द। रामप्रसाद बिस्मिला और वीर युवावों को पलायन करने में मदद किए थे। पर सफल नहीं हो पाय ।काकोरी काण्ड में बिस्मिला बंधी बन जाता है। आंदोलन पूरे देश भर फैल गया था। गाँधीजी के असहयोग आंदोलन पीछे लेने हेतु आजा़द जी नाराज़ होकर *हिंदुस्थान सोशियल रिपब्लिक एसोशियन* एक नया पार्टी की स्थापना कर भारत को आजाद करने लगातर लडा़ई जारी रखे। अंग्रेजों ने चंद्रशेखर जी को ढूंढने 700 पूलीस को तैनात किया था। आजाद जी किसी के हाथ में नहीं लगे। आजाद रहे अंत तक ।स्वाभिमान के शेर सदा राजा ही रहे। जय हिंद ,जय भारत।

डाॅ.सरोजा मेटी लोडाय



WhatsApp

No comments:

Post a Comment