Thursday, 22 July 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज चित्र पर रचनाएं पढ़ें सभी रचनाकारों कीे उत्कृष्ट रचनाएं डॉ अलका पांडे मुंबई











चित्र पर 

आगे बढना ही नियती है 
नहीं मानना कभी हार 
पत्थर को चीर दिखाना है ।
तूफ़ानों से टकराराना है ।।
यह केली का पौँधा देखो 
चिर पत्थर का कलेजा 
अपना अस्तित्व बचाया 
फाड़ कर सीना पत्थर का 
निकल बहार आया ...
अपने फूलों से प्रकृति को हर्षाया ।
लाल फूल से धरा का श्रृगार किया 
नाज़ुक काया पाई है 
हौसले फ़ौलादी हैं 
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई



अ. भा. अग्निशिखा मंच
गुरुवार -22// /7/ 2021
विषय- चित्र पर कविता 
विषय-विपत्तियों पर विजय 

पाना है उन्नति और विकास, 
तो कंकरीले पथ से जाना होगा ।   
रखनी उन्नति की आकाँक्षा, 
तो पत्थर का सीना चीरना होगा।

खिन्नताओं व्यग्रताओं विषादों से, 
मुक्त जो हरदम रहता है।
हर परिस्थिति में किया कार्य, 
उन्नति-शिखर पर पहुँचता है।

नाजुक बीज से तुम सीखो, 
कैसे अंकुरित हो जाता है।
धरा का सीना न मिले तो, 
पत्थर चीर स्फुरित हो जाता है।  

संसार की प्रत्येक क्रिया, 
ईश्वरीय इच्छा से होती है उपलब्ध।
हतोत्साहित न होकर ईश्वर में, 
विश्वास अडिग होना चाहिए 

अनुकूलता व प्रतिकूलता का अंतर, 
उन्नति में होता है बाधक।
सम्भाव्य प्रतिकूलता को विचलित, 
करने वाला मानना चाहिए।

उन्नत मार्ग पर चलने हेतु, 
कठिनाइयाँ होती हैं स्वाभाविक। 
निम्नगामी की अपेक्षा ऊर्ध्वगामी, 
होना कठिन मानना चाहिए।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर


दाता तेरी कृपा जीस पर हो जाये।
तिनका भी तुफान से टकरा जाये।
केली का पौधा पत्थर का सीना चीर निकल आये।
तेरी ही कृपा से यह फूल खिलेगा।
हंस हंस के फूल तेरा गुण गान करेगा।
अपने लाल लाल फूलो से धरा का श्रीगांर करेगा।
तेरे करिश्मा से पत्थर पसीज जाये।
पत्थर पसीज कर सीला जीत कहाये।
तेरे दया से फूल हौसला दिखाये।
भौरे को भी कैद का मजा चखाये।
हम सब तेरी शरण है दया कर देना।
मेरे देश से रघुनाथ कोरोना भगा देना।
बृजकिशोरी त्रिपाठी


वीना अचतानी 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय***चित्र पर आधारित ****
 पत्थरों के बीच
  नन्हा फूल खिला
  जो भी मिट्टी मिली
   पनप गया
   जंगल का फूल है
    परवरिश बिना
    बढ़ता गया
    पर गमलो की
     नागफनी की 
      आँखों में 
      गड़ता गया
      पत्थरों में भी
      शान्ति सहित जीता
      आँधी आऐ तूफाँ आए
       नहीँ किसी से डरता 
       ये तो कुदरत 
       का नज़ारा है
       पत्थरों के बीच
       नन्ही टहनी में 
       एक फूल खिला
        हो गए सब इन्साँ 
        पत्थर आज के
          इस दौर में 
         कुदरत का करिश्मा 
          देखो एक नन्हा 
          फूल खिला
           पत्थरों के इस ढेर में ।।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।।।


🌺गुरुवार -22// /7/ 2021
🌺विषय- चित्र पर कविता
हर चित्र कुछ कहता है 

सख्त इरादे से लोहे के 
चने चबाए जा सकते।
अगर ठान लें, पत्थर पर भी 
फूल उगाए जा सकते।
#
अटक नदी थी चढ़ी हुई
सैनिक थे हिम्मत हार रहे।
जाना था उस पार उन्हें
पर खड़े सभी इस पार रहे।

रणजीत सिंह ने बोला, पहले
मन की अटक हटाओ जी।
मैं चलता हूं आगे, मेरे 
पीछे पीछे आओ जी।

आस नहीं थी जिसकी कोई
ऐसा एक कमाल हुआ।
पल झपकते सैनिक दस्ता
अटक नदी से पर हुआ।

चाहे जितना कठिन लक्ष्य हो
चाहें तो हम पा सकते।
अगर ठान लें, पत्थर पर भी 
फूल उगाए जा सकते।
#
नेपोलियन जा रहा था
दुश्मन का दर्प दलन करने।
गिरि अल्पस सामने आ गया
सैनिक सभी लगे डरने।

बोला योद्धा सैनिक दल से
मन मजबूत करो आगे।
है ही नहीं आल्पस मानो
हिम्मत करो बढ़ो आगे।

आगे आगे स्वयं चल पड़ा
पीछे पीछे सैनिक दल।
पार कर गए उस पहाड़ को
बड़ी समस्या कर ली हल।

जितना भी हो काम असंभव
संभव हमी बना सकते।
अगर ठान लें, पत्थर पर भी 
फूल उगाए जा सकते।
#
अगर सोचते रहते तो क्या
अंतरिक्ष में जा पाते?
चांद शुक्र और मंगल ग्रह के
चक्कर कहां लगा पाते।

किंतु चेष्टा करते करते
कहां कहां हम चले गए।
कितनी कठिन मंजिलें लांघी
किसको किसको दले गए।

आज कहां पहुंची है दुनिया
और कहां तक जाएगी।
एक दिवस आएगा जब
चंदा पर नगर बसाएगी।

अगर इरादे पक्के हैं तो
हर मंजिल हम पा सकते।
अगर ठान लें, पत्थर पर भी 
फूल उगाए जा सकते।
#
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंच को नमन
विषय:-- *चित्र पर आधारित कविता*

झूठी शान के परिंदे ही ही,
ज्यादा फड़फड़ाते है।
बाज की उड़ान में कभी आवाज नहीं होती, ईश्वर की कृपा जिस पर हो जाए।
ये चित्र को देखो! कैली का पौधा,
पत्थर का सीना चीर निकल आए।
ईश्वर की कृपा देखो इस 
में फूल भी खिल गए।
यह पौधा पर प्रभु की महिमा है
हौसला बुलंद है, नीयत ठीक रखा।
इंसान को सीख देती है,
जीवन में कभी ना रुको।
नीयत ठीक रखो आगे बढ़ते जाओ।
कभी नहीं रुकना होगा, आगे बढ़ते जाओ।


विजयेन्द्र मोहन।

नव जीवन

नवजीवन का अंकुरण कही और कैसे भी हो जाता है 
नदी नाला खंडहर हो या ताला वहीं पे फल फूल जाता है 

ऐसी ही है अद्भुत अलबेली सृष्टि
सब पर डाले सदा प्रेम भरी दृष्टि

उसकी नजर मे राजा रंक 
सब में भरता वो प्रेम का रंग 

 नाजायज ये मानव् की सोच
कुदरत प्रेम स्नेह भरा प्यारा लोक

नव जीवन को दुनिया में आने से कोई रोक नहीं सकता 
जिसे पैदा होना है जहां उसे यम भी रोक नहीं सकता 

 शुभा शुक्ला निशा रायपुर छत्तीसगढ़


चित्र पर आधारित कविता 

 🌹पुष्प पल्लवित हुआ पत्थर का सीना फाड के,
हर्ष, उल्लास प्रसन्नता से,,, खिलखिलाता ,,,,,,,,,पत्थर की आड़ से✒️

शून्य से आकाश तक सुगंध का प्रभाव है,
आशा की उम्मीद से दुखों का अभाव है 👍

राह का पत्थर भी न रोक पाया उन्नति,,, मेहनत से जीत ली हर प्रकार की अवनति✒️💦


खिलते हुए पुष्प ने सिखा दिया,
हर सकारात्मकता को जता दिया,
यही तो है मेहनत का फल
तू करता चल हर पल 👍🎉💦✒️✒️

स्वरचित रचना सुषमा शुक्ला💦🌹💦✒️


नमन पटल
आज का विषय-चित्राधारित रचना

सादर समीक्षार्थ प्रस्तुत

लौह से मजबूत इरादों की हार नहीं होती।
पत्थर में भी उर्वरा शक्ति आ जायेगी,
हरियाली चतुर्दिक लहरायेगी।
कठोर मेहनत कभी बेकार नहीं होती।

लक्ष्य बना लिया पौधे ने रास्ता बनाने का।
भले ही सामने पत्थर हो उससे निकल कर जाने का।
देह कोमल तो क्या हौसले मज़बूत हैं।
क्या फर्क पड़ता पत्थर है या शूल है।

खुल जाएंगे स्वयं ही अपरिमित रास्ते।
एक बार बस कोई लक्ष्य मजबूत बना ले।
सोच को अपने सही दिशा मिलनी चाहिए।
तकदीर को अपने कर्मों से बदलनी चाहिए।

कह दिया था गुरु ने पाणिनि से।
वत्स नहीं हाथ में रेखा विद्या की।
सुन गुरु की बात हो गए थे वे दुखी।
चाकू की धार से रेखा विद्या बना ली।

कठोर परिश्रम के बल पर
संस्कृत के प्रकांड विद्वान बने।
हो गई लेखनी अमर उनकी
अष्टाध्यायी के रचयिता बने।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'



नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;-चित्रआधारित लेखन
दिनाँक;-22/7/2021
तुमको आगे बढ़ना होगा
बाधाओं से न घबराना 
हरदम तुमको बढ़ना होगा
ग़र मन मे जज्बा सच्चा हो 
नए रास्ते सदा खुलेंगे
बंजर धरती पर भी 
चीर के पत्थर गुल खिलेंगे।।
इसी आस को मन मे रखना 
हार कभी तुम नहीं मानना
भले विषम हो सारी दुनिया
कर्म पथ पर सदा ही बढ़ना।
बिना थके बिना रुके 
हरदम तुमको बढ़ना होगा।।
निहारिका झा🙏🏼🙏🏼🌹🌹

जय मां शारदे अग्निशिखा मंच चित्र आधारित रचना 

कोई कितने भी रोडे अटकाए ।
जिसको बढ़ना है, वो बढ़ जाए।
भगवान की कृपा जिस पर है, वो अपनी मंजिल को पाएं ।
पत्थरों ने लाख अड़ंगे लगाए ।
पर केली का पौधा फिर भी निकल आए ।
फूल भी खिला उसमें, चारों ओर महक पहुंचाए ।
इससे यही सीख मिलती है हम सबको।
मुश्किलें भी तुच्छ हो जाती हैं, जो याद करें 
रबको ।
जिसमें हौसला और हिम्मत है ।
उसको कोई पत्थर नहीं रोक सकता ना हीं कोई दिक्कत है ।

रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश

जय मां शारदे
आदरणीय मंच को नमन
आज का विषय --"हर चित्र कुछ कहता है"
+++++++(
साहस कभी न खोना प्यारे पत्थर में भी फूल खिलेंगे आगे आगे बढ़ते जाना साथ बहुत से मीत मिलेंगे।।
वैसे तो हम सभी विश्व में एकाकी ही जीवन पाये,
 भाई माता पिता बंधु भगिनी भी जुड़े संभल हम पाए 
मत परवाह करो यह पथ में तीखे तीखे शूल मिलेंगे ।।
साहस कभी न खोना प्यारे पत्थर में भी फूल खिलेंगे।।

साहस कर जो चलता आगे लक्ष्य पास उसके आ जाता, अपनी बाहों को फैलाकर विजयी को सम्मान दिलाता, बहती और उफनती सरिता
 में प्रयास को फूल मिलेंगे ।।
साहस कभी न खोना प्यारे पत्थर में भी कूल मिलेंगे।।
#######
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी


 अग्निशिखा मंच
तिथि-२२-७-२०२१
विषय- चित्रपर कविता

  फूल हूंँ , बहुत कोमल होता हूँ मैं.
अपने रंग और रुप पर इठलाता हूंँ मैं.
कभी उंगली दिखाने से भी मुरझाता हूंँ मैं
अधिक धूप और गरमी नहीं सह पाता हूंँ मैं.
पर परिस्थतियां मुझमें हिम्मत भर देती हैं.
जब धरती सूखी सी हो जाती है .
पानी की भी कमी हो जाती है.
 पत्थरों के नीचे की नमी को पा कर
तब नन्हा सा पौधा अंकुरित होता हूँ मैं.
चट्टान के बीच से उपर निकलता हुआ
सूरज की किरणों को देखता हूँ मैं.
नन्हा सा पौधा हूंँ पर जीवट हूंँ मैं.

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र



$$ चित्र पर आधारित $$
        $$ जीवन $$

जीवन है अनमोल 
न जाने कोई इसका मोल
पत्थरों को तोड़कर भी बना लेते है अपना रास्ता राही 
भुख न देखती खाना कैसा है
नींद नही मांगती बिछोना कोमल
जीवन अगर शेष है तो 
कहीं से भी बना लेती है अपना रास्ता
कमी देखने वाले सिर्फ 
देखते है कमियाँ 
चलने वाले हरहाल मे 
बना लेते है अपनी राह
और तय कर लेते है अपनी मंजिल 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौडगढ़ राजस्थान


चित्र पर कविता

पुष्प सदा कंटक में खिलते 
 फिर भी मुस्कान बिखेरते
 रूप सौन्दर्य से खुशियां देते 
 सबको जीने का संदेश देते 


 पेड़- पौधे सर्वदा मौन रहते 
 अपनी राह स्वय हैं खोजते
 कोई गिला न शिकवा करते 
पत्थर में भी आशियाना ढूंढते 

 वर्षा, गर्मी , सर्दी चुप सहते 
 कंकर -पत्थर में खुश रहते
दीवाल मिले उसपे चढ़ जाते
वहां अपनी सुंदरता बिखेरते

कांटो में भी सदा हंसना सीखो 
चुनौतियों का सामना करना सीखो 
हर मुश्किल में राह बनाना सीखो
जीवन में संघर्ष करना सीखो



आशा जाकड़

चित्र अभिव्यक्ति 

प्रकृति हरियाली सहेज रही है 
अपना संरक्षण स्वयं करती है 
संवर्धन कर पौधे के रूप में 
निरंतर हंसती खिलखिलाती है। 

धरा की शान बहुत निराली है
प्रकृति की महिमा अपरंपार है
धरती देती परोपकार का संदेश 
वसुंधरा,भूमि इंसान की धरोहर है। 

ऊपर वाले की देखो अजब माया 
कठोर पत्थर में फूल खिला दिया 
हरी पत्तियों का ताना-बाना बुना 
सुंदर लाल फूल मुस्कुराता दिखा। 

प्रकृति हमसे कभी कुछ लेती नहीं
सदा फूल-फल अपार भंडार देती 
जीवन को देती अनमोल सौगात 
देख कर मन आनंदित हर्षित हुआ। 

प्रकृति दे रही संदेश इसे समझ ले बंदे 
बंजर भूमि पर फूल पत्ती खिल आए 
कठोरता में नम्रता का भाव पनप रहा
अपने रिश्तों को कोमलता से सहेजो।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
22-7-21


विषय -चित्र आधारित

हौसले बुलंद हो तो
तपते सेहरा में भी
फूल खिला करते है,

बेजान पत्थरों में
भी फूल खिल
जाया करते है,

नकारात्मकता में भी
सकारात्मकता आती है
 मजबूत दृढ़संकल्प से,

इसलिए सदा आशावादी
बने रहे हर हाल में
चाहे जो परिस्थिति हो,

रात के बाद कभी
सुबह नहीं हुई हो
ऐसा कभी नी होता,

बस जरुरत है
हिम्मत व लग्न की
अच्छा सोचने की

हेमा जैन (स्वरचित )

अग्निशिखा मंच को नमन🙏
चित्रपर आधारित रचना

आगे बढ़ने का हौसला हो तो 
 कोई रोक नहीं सकता। 
 हम जमीन पत्थर ही क्या?
 हम कहीं भी खिलते ,फुलते है
 हम को कौन रोक सकता।।१।।

हम गुलाब की तरह कांटों में खिलते हैं,हम सूरज की तरह अंधेरे में निकलते हैं रेत
 पहाड़ या बर्फ जंगल,हो,हम अपनी धुन बेडर चलते हैं।।२।।

जिंदगी में ठोकर पत्थर काटे ,आते है पर चलने वाले 
अपने दम पर आगे निकल 
जाते हैं।‌।३।।

संघर्ष ही जिंदगी का ,
नाम है दोस्तो हिम्मत वाले
सदा कठिनाई की डगर
पार कर जाते हैं।।४।।

गुलाब के फूल कांटों में
खिलते हैं , किन्तु अपने
खुशबु एवं सुन्दरता के
कारण,पहचाने जाते हैं।।५।।

सुरेंद्र हरडे कवि
नागपुर
दिनांक :- २२/०७/२०२१

चित्र आधारित कविता
शीर्षक-" फूल हूं मैं"

1. फूल हूं मैं सदा मुस्कुराता , 
  झोंके समीर को बहकाता ,  
चट्टानों के बीच भी खिलता ,
और छटा अपनी 
  बिखराता ,
  फूल हूं मैं,,,,,

2. लाल लाल लाली को लेकर , 
 प्रेम का प्रथम पाठ पढ़ाता , 
मन में एक उत्साह जगाता ,  
मधुर मधुर लय में कुछ गाता , 
फूल हूं मैं,,,,

3.कठिन कठोर राह में अपना , 
 कोमल सहज वर्चस्व फैलाता , 
 मकरंद और सुगंध में मिलता , 
 जन जन जीवन महका जाता , 
 फूल हूं मैं,,,,

 4. सभी जगत में हूं छा जाता , 
 ईश्वर ने जो जन्म है दिया ,
उसको सार्थक करके जाता , 
मैं कर्तव्य अपना निभा जाता , 
फूल हूं मैं,,,,,,,

5. हंसते-हंसते सब कुछ सहता ,  
हर हाल में मुझे खुश रहना , 
कांटा भी पथ में आ जाता , 
 उनके बीच सदा मैं सजता ,
  मैं फूल हूं ,,,,,

स्वरचित कविता
   रजनी अग्रवाल
     जोधपुर


चित्र पर
मेरी कविता
***********
कड़े पत्थरों के बीच आज खड़ी हूं।
बहुत मेहनत की तब जाकर आज बड़ी हूं।
 था मुझमें विश्वास आगे बढ़ने का।
हर हालत में हार नही‌ मानुगी ।अपने सुन्दर छवि को सबको दिखाऊंगी। 
धरती से निकली बढ़ी खुश होकर।
बीच में रोका कड़े पत्थरों ने।
कड़े पत्थरों को बीच से चीर कर निकलीं।
अपने आपको लोगों के सामने लाई।
आज मुझे देखकर खुश होते हैं लोग।
मेरी प्रसन्नसा करते हैं सभी लोग।
कहते हैं देखो पथरीला बंजर
 भूमि में फूल खिला‌ है।
कितना‌ सुन्दर कितना प्यारा लग रहा है।
आज मुझे अपने पर गर्व हो रहा है।
हिम्मत हार कर बाहर न निकालती ।
तो‌ मेरी प्रसन्नसां लोगों के बीच कभी न होती ।
 ये ज़िन्दगी हर कठिनाई में तू आगे बढ़ 
,हिम्मत न हार, हिम्मत दिखा ।
सफलता तुझे अवश्य मिलेगा।
अपने मन में बस विश्वास रख।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग सिविल लाइन जगदलपुर छत्तीसगढ़


नमन मंच 
विषय --: चित्राभिव्यक्ति
दिनांक--: 22/7/2021

केलि का यह पौधा 
यही हमें सिखाता है 
गर हौसले बुलंद हो तो 
चिर पत्थर का सीना
फूल भी खिल आता है !

थक कर ना बैठना संघर्षकर 
राह अपनी स्वयं ढूंढना 
हौसले बुलंद हो तो आगे
मंजिलें मिल ही जाएंगी !

जीवन एक संघर्ष है 
कबूल तुम उसको करो 
मार्ग स्वयं प्रसस्थ कर 
उन्मुक्त उड़ान तुम भरो !

केलि का यह पौधा 
यही हमें सिखाता है 
अगर हौसले बुलंद हो तो 
मंजिलें मिल ही जाएंगी !
    
         चंद्रिका व्यास
       खारघर नवी मुंबई


हौसला हिम्मत है बुलंद
कठिनाइयां रोक नहीं सकती
शिला को भी बना दूं धरती

यह सुंदर फूल मनोहर
संदेश दे रहा है सरल
घबराना नहीं रहना अटल

हिम्मत साहस से करो जतन
बंजर पथरीला भू बने उपवन
पत्थरों के अंश को करो नमन

पत्थरो मे भी हरियाली का अगन
कठोरता है इसका स्वभाव
कोमलता है इसका आंतरिक भाव

कुमकुम वेद सेन



गजब।
गजब यह प्रकृति की देन है,
कहीं भी जीवन देती संदेश है।
पत्थर निर्जीव लोग कहते है,
यह जीवन्त प्रकृति साक्ष्य है।। 
गजब.......................... 1 
प्रकृति हमारी एक धरोहर है, 
प्रकृति में छुपा हुआ अमृत है। 
प्रकृति जीवन का खजाना है, 
आजकल हम सबने जाना है।। 
गजब.......................... 2 
प्रकृति से परे मानो कुछ नहीं, 
प्रकृति जहां है जन्म वहीं है।
आओ प्रकृति को नमन करे, 
जीवन को मिल सफल करे।। 
गजब.......................... 3 
पत्थर में भी फूल खिलते है, 
वह जीवन की जमीन देते है।
ईश्वर की माया हम सब पाते है, 
सब मिल जीवन गीत गाते है।। 
गजब........................... 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।

🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
 🌹विषय: चित्र आधारित रचना🌹
           🌹विधा: काव्य 🌹
    🌹🌿दिनांक:22/7/21🌿🌹
*************************************
    * बिटप केली के *
🌹
हम केली के कोमल पौधे,
पर, मेरी सोच निराली है-
चीर के पत्थर के सीने को
हमने विटप उगा ली है ।
🌹
रक्त-पुष्प डंठल से निकला,
जीवन हर्ष - विभोर हुआ-
हो ,जब मन के अंदर चाहत
कोई काम ! कब रूका भला!!
🌹
तुम चाहो तो, पत्थर को भी-
पिघला सकते हो, दखो यारों !
मन के अंदर भरी हो उष्मा -
हैं साक्ष्य बनीं,दिशाएँ चारों !!!
🌹
****************************************
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-डॉ .पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर 
बिहार~
🙏

आओ अपने बल से आज, पत्थर में भी फूल खिलायें
---- ओमप्रकाश पाण्डेय
(चित्र पर आधारित कविता) 
क्या रोक सका है मानव को 
कोई नभ में विचरण करने से
सागर की उन्मादी लहरों पर भी 
इसने मनचाहा राज किया 
आओ अपने बल से आज
पत्थर में भी फूल खिलायें........ 1
जब जी चाहा तब इसने
झुका दिया मस्तक पर्वत का
रेगिस्तानों में भी इसने
सुन्दर मोहक बाग लगाये
आओ अपने बल से आज
पत्थर में भी फूल खिलायें.......... 2
एक बार निश्चय अगर कर लें
तो नहीं कुछ भी नामुमकिन 
अपने तपस्या के बल से
बुला लिया नारायण को भी
आओ अपने बल से आज
पत्थर में भी फूल खिलायें.......... 3
कितने आविष्कार किये 
अन्वेषण भी खूब किया
पृथ्वी की गति से लेकर
तारों के गति को नाप लिया
आओ अपने बल से आज
पत्थर में भी फूल खिलायें...... . . 4
भुजाओं में बल है इसके
मष्तिष्क में नित्य नये विचार
बस ध्येय निश्चित करना है
फिर ईश्वर भी साथ देता है
आओ अपने बल से आज
पत्थर में भी फूल खिलायें......... 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)


🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹22/7/21🌹🙏
🙏🌹चित्र पर आधारित🌹🙏


कंटक में महकता पुष्प,
पत्थर से गभराना नहीं,
 कोमल स्वरूप है तेरा,
उसको तुम ठुकराना नहीं,

हर मुश्कील में महेक देता,
पत्थर से प्रगट हो गया,
खुद के अल्प जीवन में,
मुस्कुराहठ तुं दे गया ,

पत्थर दिल में प्यार जगाया,
कोई मामुली बात नहीं है,
पत्थर के साथ साथ निभाना,
कोई आसान बात नहीं है,

कोमलता और महक दोंनो,
अपनी अदा में तूं खिलता है,
मस्तक चढाये,या पैरों में कुचले,
चूपचाप सब कुछ सहता है,

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏



नमन मंच 
छवि विचार 

 हो गर जज्बा कुछ कर दिखाने का ,
बस आगे बढ़ते जाना हो ,
लाख आये रोड़े राह मे ,
ठोकर मार चलते जाना है ,
हमें तो बस कर्तव्य अपना निभाना है ,
बहाना न कोई बनाना है , 
इस जग को महकाना है ,
सुन्दर इसे बनाना है ,
प्रकृति की रीत रही ,
सीख हमेशा ये रही ,
देख परेशानियों को न डरो ,
न रुको न थको , 
बस अपनी राह चलते चलो ,
मंजिल आसान हो जाएगी ,
सफलता हमारे कदम चूमेगी |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड




गुरुवार दिनांक २२/७/२१
विधा*** कविता
विषय****
     #***चित्राधारित रचना***#
                 ^^^^^^^^^

हम मिट्टी में कैद रह नहीं सकते ।
हम जुल्म संगके सह नहीं सकते ।।
तुम कर लो कोशिशे गिराने की ।
हम मगर कभी ढह नहीं सकते।।१

चाहे दबालो तुम मिट्टी के अंदर ।
या रख दो हमारे सीने पर पत्थर ।।
हम चीर के सीना दोनों का ही ।
हम खिल ही जाते सर उठाकर।।२

हम पत्थर हों या खार खिलते हैं।
हम दर्या सा समंदर से मिलते हैं ।।
हम रास्ता बना ही लेते हैं अपना ।
चिरके तमको सूरजसा निकलते हैं।‌।३

प्रा रविशंकर कोलते
   नागपुर



चित्र पर आधारित कविता

 हिम्मत, लगन से हम सब ,
 चुनौती को लक्ष्य बना सकते हैं ,
पत्थरों पर फूल खिला सकते हैं,
बस थोड़ी सी मिट्टी चाहिए,
 थोड़ी सी नमी चाहिए,
 सूरज की धूप चाहिए,
 मंद- मंद पवन चाहिए
 अगर नन्हा सा बीज,
 धरती का सीना चीर ,
बाहर आ सकता है ,
तो पत्थरों को छेदकर,
बाहर आ सकता है,
 उसे आगे बढ़ने से,
 कोई नहीं रोक सकता ,
ना हवाएं उन्हें गिरा सकती,
 नहीं परिस्थितियां हरा सकती।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश



गुरुवार
एम वी फाउंडेशन
गुरुपूर्णिमा
*********

गुरु आशिष से ही बढ़ी,,कलम चली हर ओर
नतमस्तक करूँ आज गुरु,, तुमही मेरी डोर।।

न छोड़ना साथ मेरा,,मेरी अर्जी गुरु सुन 
मैं हूं अभी भी अज्ञान, मुख पे हो हरी धुन।।

प्रयास करत है वीना,,दोहे लिखत सुनात
आज नहीं तो कल सही,,सफलता पा मुस्कात।।

दोहे होत कठिन मगर,,हार ना हम पाऐं
अपनी ही कलम की धुन,,लिखत-लिखत सुनाऐं।।

वीना आडवानी
नागपुर, महाराष्ट्र
*************


शीर्षक**पत्थर और फूल
नेक इरादे मन में हों तो
नभ में सुराख भी हो सकता है
असंभव भी संभव होकर
पत्थर मेंभी फूल उगा करता है।
नहीं करिश्मा कोई इसमें
पुरुषार्थ सदा बोला करता है
बाहों में अपने बल भर कर
पत्थर में भी फूल उगा करता है।
फौलादी हौसलों के आगे
मार्ग उन्नत हो जाता है
प्रभु की कृपा की छांव तले
पत्थर मेंभी फूल उगा करता है।
पथ की बाधाओं से विचलित हो
कर्मवीर नहीं रुकता है
धरती का सीना चीर फाड़
पत्थर में भी फूल उगा करता है।
मौलिक
 ........ लीजिये कृपलानी



चित्र आधारित रचना   
कैली का पौधा 

अपने सुर्ख़ रंग शबाब में 
धरती ममता की फुलवारी है 
शूल हिर्दय फाड़ निकला है 
ठोकर हिर्दय में लगती है 

कह उठता पत्थर दिल नही है 
ठोकरों से सावधान रहना है
मातपिता की सेवा में मेवा है 
मैया नैया पार लगा जायेगी ,

अपना स्वाभिमान जगायेगा
 सितारों में ध्रुव कहलायेगा 
चमक मानवता का जगाएगा कमजोर नादान नही है 

सत्य कर्म उसूलों पर चलना है
कठोर धरा की पहचान है 
सुन्दर पत्थरों के बीच रह 
कैली का सुन्दर पौधा है 

जीवन संग अद्भुत दर्शन है 
जब सीख मिली माँ से पुण्य प्रतापी कहलाएगा ।
वीराने में फूल खिला जग को चहका महका चाँद सूरज कहलाएगा ।
अनिता शरद झा


अग्निशिखा मंच
22/7/2021गुरुवार
विषय-चित्र आधारित रचना

भावों की
ये सृष्टि है,
जो जैसे
भाव जगायेगा,
वो वैसा ही
फल पायेगा।
भरोसा कर
खुद पर और
ईश्वर पर,
ईश्वर चाहे तो
सुई के छेद से
 निकाल सकता है
विशालकाय ऊंट,
कर सकता है
सागर का  
पानी मीठा,
खिला सकता है
पत्थरों में फूल,
बना सकता है चंदन
कदमों की धूल,
कुछ भी
असम्भव नहीं,
सब कुछ सम्भव है
अगर हौसला
हो बुलंद तो,
बदल सकता है
अपनी क़िस्मत
अपनी मेहनत से,
मेहनत ही
सफलता की
सीढ़ी है।
              तारा "प्रीत"
         जोधपुर (राज०)



अग्निशिखा मंच
 विषय---चित्र पर आधारित 
विधा----कविता 
दिनांक---22-7-2021 

पत्थरों में भी फूल देखो खिल जाते हैं 
राह दिखे ना कोई,तब खुद अपनी राह बनाते हैं । निकल आया नन्हा पौधा फूलों की खुशबू लिए
 कितने भी काँटे हो पर फूल सदा मुस्कुराते हैं ।
और अपने प्यारे स्वभाव के कारण 
समभाव से हर तरफ खुशबू फैलाते हैं ।

देते हैं सीख इंसान को भी कि 
ग़म से ना घबराना तू ।
टेड़ी मेड़ी डगर आ जाए जो जीवन में 
तो राह भटक ना जाना तू।
अपने साहस और विश्वास पर करना भरोसा
 अपने लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ाना तू ।
इक दिन मंजिल मिल ही जा
बस मेहनत से ना घबराना तू।

और फूलों जैसा समभाव भी रखना 
जग में सदा प्रेम फैलाना तू।
हर एक अंदर प्रभु समाया, 
बस इतना भूल ना जाना तू ।
मानव है तो मानव बन कर 'रानी'
 मानवता ही सदा दिखाना तू ।

                 रानी नारंग



हौसला बुलंद है
*************


चीर दूं पत्थर का सीना
हौसला बुलंद जो पाया है
देखो आज मैं गुलाब भी
पत्थर पे राज्य कर पाया है।।

चीर दूं पत्थर का सीना
हौसला बुलंद जो पाया है

जकड़ जिद्द और कठोरता
पत्थर की आज मैं..
देखो खुद की खुशबू से 
महकाया हूं।।

चीर दूं पत्थर का सीना
हौसला बुलंद जो पाया है।।2।।

खूब अड़चन डाली पत्थरों
ने ही मिल हौसले मे..
पर मैने हौसला कर ही तो
ठान हाथ बढ़ाया है..।।

चीर दूं पत्थर का सीना
हौसला बुलंद जो पाया है।।2।।

झुका दिया अपने प्रेम से
अपने इस पत्थर को..
यही फूल बन मैंने अपना
पताका स्वभाव से लहराया है।।

चीर दूं पत्थर का सीना
हौसला बुलंद जो पाया है।।2।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************

* अग्नि शिखा काव्य मंच *
२२/७/२०२१ गुरुवार 
बिषय - चित्र देख कविता 

पत्थरों में भी फूल खिलते ,।
ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं ,
मन में हो संघर्ष का जज्बा !
कहीं भी कभी खिल जाते हैं ,

थोड़ी सी हवा थोड़ी सी धुप ,
थोड़ी सी मिट्टी थोड़ा सा पानी !
मैं रुप कोमल दिखलाऊंगा ,
पत्थरों में खिल मुस्काऊंगा !

मना मेरा कलेवर कोमल ,
पर ईरादे मन में फौलादी !
चट्टानों से यारी करली मैनें ,
अपनी क्षमता दिखलाई मैनें !

सबको देता हूँ एक संदेश ,
जीवन राह बड़ी दूर्गम् ?
जिनके जज्बै फोलादी,
चट्टानें उनसे घबरा हारी !

मेरा अपना गुण ओर धर्म है ,
रंग रुप ओर सुगंध महक है ! 
बागीचे हो या पत्थर के मैदान ,
मैं तो खिलता मुस्काता हर बार !

सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम
🙏🙏🙏

*जिजीविषा ( चित्र पर आधारित )*

है मुझमें गर जिजीविषा तो मैं
कहीं भी पल्लवित हो सकती हूं
मिले प्रेम सौहार्द दुलार तो
पत्थर भी फोड़ निकल सकती हूं

नभ का नील गगन भी मुझको
देता संघर्षों से लड़ने का संबल
और धरा के कोमल स्पर्शों से
नवजीवन का होता मुझमें हलचल

राह के पत्थर भी चाहें , फिर
क्यूं न अड़चन बन जाएं
अपनी जिजीविषा से ही मैं
चट्टानों को भी भेद सकती हूं
मिले प्रेम सौहाद्र दुलार तो
पत्थर भी फोड़ निकल सकती हूं।

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*अनुपपुर ( मध्यप्रदेश )*
*22 / 7 / 2021*




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