Wednesday, 21 July 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज पढ़िए "दादी मां "सभी रचनाकारों के अपने विचार और आनंद लीजिए डॉ अलका पांडे मुंबई


दादी माँ 
मेरे पापा नौकरी की वजह से उत्तरप्रदेश से मध्यप्रदेश आ गये तो मैं दादी के साथ बहुत समय नहीं बिता पाई । पर जब हम छुट्टीयों में रामनगर जाते तब 
मुझे दादी मां के साथ रहना बहुत अच्छा लगता है। मुझे दादी मां के साथ बहुत अच्छा अनुभव होता था दादी मां मुझे कई बार अपने बचपन की बातें भी सुनाती है और इसके साथ ही मेरी दादी मां मुझे हमेशा राजा रानी की कहानियां, मजेदार चुटकले, पौराणिक कहानियां, जैसी और भी कई सारी चीजें सुनाती है। मुझे उनकी कहानियां सुनना बहुत अच्छा लगता है और मेरी दादी मां मुझे हर समय अच्छे अच्छे काम करना सिखाती है। दादी मां मेरी सबसे अच्छी मित्र हैं। वह हर समय मेरा मार्गदर्शन करती है। जादूगरनी की कहानियाँ दादी की आज भी मुझे याद आती है । 

आज मुझे लगता है जिन बच्चों को जयदादी-दादी का प्यार मिलता है , 
उन बच्चों का विकास अच्छा हैं 
उनके घर में हर समय खुशियां छाई रहती है और हमेशा परिवार में हर रिश्ते का सम्मान होता है। उस घर के सभी सदस्यों में संस्कार भरे होते हैं। यदि बच्चे के जीवन में उनके दादा-दादी का प्यार नहीं मिलता तो उनका बचपन पूरी तरह से अधूरा रह जाता है। दादी के प्यार का जिस बच्चे को मिला है वही दादी मां के प्यार के महत्व को समझ सकता है।
मेरी दादी मां हमारे परिवार में सबसे पहले उठती थी और वह सुबह जल्दी गाय का दूध दूह कर एक गिलास कच्चा दूध मुझे पीने को देती थी । फिर स्नान करके पूजा पाठ करने बैठ जाती साथ में मुझे भी पास बैठाती ।
मुझे कुछ धार्मिक कथा सुनाती
हम दादी को अजिया कह कर बुलाते थे दादा को बाबा कहते थे । 
दादी के पास रहने से धार्मिक चीजों का ज्ञान मिला जो मेरे विद्यार्थियों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण रहा । 
दादी ने हर रिश्तों के महत्व को अच्छे से समझया था । 
सभी से प्रेम भाव से रहने का तरीका दादी से सिखने को मिला । 
दादी मुझे बतासे खाने को देती थी । माँ से छिपा कर । 
सभी बच्चों को अच्छे संस्कार दादी से ही मिलते हैं।
जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती रहती है।
दादी के पास रहने से अनुशासन के साथ साथ मौज मज़ा करने को खूब मिलता हैं । प्रेम की भावना जाग्रत होती हैं । 
हमेशा ही दादी मेरे पैरों की मालिश करती थी खेल कर थक गई होगी ।
मैं परेशान न रहू , जो माँगूँ वह अपनी सामर्थ के अनुसार हमेशा देती थी 
मेरे दिल में मेरी अजिया का बहुत 
सम्मान है । 

उनके द्वारा बताई गई हर बात का अनुसरण करना चाहती हूँ
मेरे और दादी मां के बीच का रिश्ता बहुत ही गहरा और खट्टा मीठा था। हमारा रिश्ता हमेशा से ही मधुरता से भरा रहता था । मैं दादी को अपने मन की हर बात बता देती थी । 
आज मेरी दादी हमारे साथ नहीं पर उनका मुस्कराता चेहरा आशिष भरा हाथ आज भी सर पर महसूस करती हूँ । मेरा मानना है 
दादा-दादी के प्यार के बिना हर बच्चे का जीवन अधूरा ही होता है।
दादी जादू का पीटारा थी मेरे लिये दादी की जादू की छड़ी घूमती और हमारा काम बन जाता । 
मैं दादी को बहुत याद करती हूँ 
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

अग्निशिखा मंच
तिथि-२१-७-२०२१
विषय - लेख -दादी मां-

                दादी मां

मेरी दादी मां है घर की रानी.उस कहना सब मानते हैं. मेरी मम्मी अक्सर उनसे कहती मां आप इतना सब कैसे मेनेज कर लेती हैं. सुबह थोड़ा काम निपटा के मैं तो अफिस चली जाती हूंँ . मेरे पीछे से सब आप ही देखतीं हैं.फिर शाम का काम हम दोनो मिल कर देख लेते हैं.
दादी कहतीं -अरे बेटा अगर तुम सर्विस करती हो तो मुझे तुम्हारी सहायता करनी ही चाहिए.
पापा कहते हैं- मैं बहुत भाग्यशाली हूँ जो मेरी मां और पत्नी में तालमेल बहुत अच्छा है. मेरे कई सहकर्मी ऐसे हैं जिनके घर सास बहू में खींचा तानी होती है और वो किसी की तरफ भी नहींं बोल पाते.
दादा जी कहते हैं - तेरी दादी सब कुछ अच्छे से संभालती है पर रौब दिखाने के लिए मैं कभी कभी नाराज हो कर बोलता हूंँ , घर पर हमेशा तुम्हारी ही नहींं चलेगी पर बाद में मैं उनका कहना मान लेता हूँ.
   रह गया मैं मुझे तो दादी बहुत प्यार करती हैं. जब मैं पढ़ता नहीं तो ही मुझे डांटती हैं नहींं तो सारे दिन मेरे नखरे उठाती हैं.

  मैं अपनी दादी को बहुत प्यार करता हूंँ

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र

*अग्नि शिखा काव्य मंच * 🙏
बुद्ध वार -२१/७/२०२१ 
बिषय - दादी माँ 
 विधा - लेख 

आज मैं आपके साथ अपनी दादी माँ के बारे में बात करती हूं ! रुप- रंग ,संस्कार ,संयम सुंदर रुप थी !ओर पर्यावरण के प्रति उनकी जागरूकता अनुकरणीय थी !
उनका आहार संयम बेजोड़ था ! पानी भी माप कर पीती थी ! उन्होंने अपने जीवन के पचास वर्ष तक सूर्यास्त के बाद अन्न जल का प्रयोग नहीं किया !
प्रात: ब्रहम मुहूर्त में उठकर सामायिक , स्वाध्याय में रत हो जाती ! विवेक पूॆवक चलना ,बोलना उनके हर क्रिया में एक संयम और साधुत्व परिलक्षित होता था ! इतने बड़े परिवार की मुखिया होकर भी र्निलिप्त भाव से रहती 
  जै समदृष्टि जीवड़ा कर कुटूम्ब प्रतिपाल ,
अंतरंग न्यारा रहै जिम धाय रमांवै बाल !
र्निलिप्त कमल सा उनका जीवन प्रेरणादाई था ! आप बाहि्य ओर आंतरिक सौन्दर्य की अप्रतिम् प्रतिमांँ थी !
गोरवणॆ ,इकहरा शरीर , गुलाबी रंगत ,तीखे नयन नक्श आर साँचे में ढला शरीर के साथ एक अभिजात्य पन उनके पूरे व्यक्तित्व में परिलक्षित होता था ! 
अकूत संम्पदा की स्वामिनी होते हुये भी आपका संयम अदभूत था ! अपनें बेटों को सब कुछ सोंप कर र्निभार होकर शांत ओर सात्विक जीवन जीती थी !
आप कहती थीं साधु जैसी मौत चाहिए तो ग्रहस्थ में भी साधुत्व का पालन हो ? आहार- विहार दिनचर्या सात्विक हो !
आपके साथ यही हुआ ! रात को अच्छी तरह सोई ! प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में माला फेरते फेरते आंँखों की पुतलियाँ पलट गई ?
इतनीं शांति की मौत ? 
जो शांति उनके भावों में थी और दैनिक के क्रियाकलापों में थी वही उनकी मौत के समय परिलक्षित हुई !
आज का बुढ़ापा और जीवन का अंत समय देखती हूँ तो मन में आता है कि काश सब संयमित जीवन जी पाते !
जीवन में संयम और धर्म का महत्व समझ पाते ?
मेरा अहो भाग्य था कि मुझे उनका स्नेह मिला !

सरोज दुगड़ 
खारूपेटिया 
असम
🙏🙏🙏

🌺बुधवार -21// 7//2021
🌺 विधा - लेख
🌺विषय - दादी मां 
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मां की सास पिता की माता
यह रिश्ता दादी कहलाता।
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दादी का जिक्र आते ही दिल ओ दिमाग में कुछ ऐसी तस्वीर बनती है– झुकी हुई कमर, हाथ में लाठी या डंडा, पोपला मुंह, सफेद बाल, सफेद साड़ी, आंखों पर चश्मा, झुर्रियों भरा चेहरा। 
दादियों के पास जीवन के गहन अनुभव होते हैं। तीज हो, त्योहार हो, उन्हें सब की विधियां ज्ञात होती हैं। अपने बेटे की बहु भले उनको महत्व न दे क्योंकि घर का जोगी जोगना, … किंतु आस पड़ोस की महिलाएं उनसे सलाह लेकर ही सारे विधि विधान समझती हैं और तदनुसार तीज त्योहार, व्रत आदि का पालन करती है। 

शादी विवाह में कब–कब, क्या–क्या करना है, कैसे–कैसे करना है, क्या–क्या सामान खरीदना है, कब कौन सा सामान लगेगा, कहां–कहां कौन–कौन से गीत गाए जायेंगे, दादी को सब पता रहता है। वे सामने उपस्थित रहकर सब काम अपने हिसाब से संपन्न कराती हैं, गलती होने पर दोषी को मीठी झिड़की भी देती हैं। 

घर में किसी की तबियत खराब हो जाय, कोई हवा–बात का चक्कर हो, किसी को चेचक निकल जाए.. दादी के पास हर समस्या का हल रहता है। हर बीमारी के नुस्खे रहते हैं। किस बीमारी में दवा खिलाना है और किस बीमारी में पूजा पाठ करना है, उसे सब पता रहता है। कई कई बीमारियां तो माथे पर भभुति लगाकर ही ठीक कर देती है। कई रोगों में पानी पढ़कर पिला देती है। कब कैसे पथ्य देना है। बीमार को क्या खिलाना है, कैसे खिलाना है, कब कैसे नहलाना है। दादी को सब पता है।

दादी है तो नाती पोतों को सोते समय कहानियां सुनने को मिलती हैं। नाती पोतों में घुल मिलकर दादी खुश रहती है। 

घर में दादी है तो खुशियां हैं, निश्चिंतता है। आराम है, आनंद है। 

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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मंच को नमन
विधा:-- लेख
विषय:---- *दादी मां*

अब मैं खुद दादा बन गया हूं। फिर भी मेरी दादी मां का आशीर्वाद प्राप्त है। उनके सुविचार का यादगार अपने पोते- पोती पर प्रयोग करते हुए बच्चों को कहते हैं मेरी दादी- दादा के बहुत दुलारे थे, इस पर मेरी पोती बोलती है क्या हमलोग आप के दुलारे नहीं है? मैं हंसकर बोलता हूं तुम लोग मेरी जान से भी ज्यादा प्रिय हो। खुशी से दोनों गले में लटक जाते हैं।
    हमारे दोनों बेटे अपने शहर से छोड़कर एक विदेश में, दूसरे छोटे पुत्र मेट्रो शहर में है। हम लोग का घर है,अपने कर्मभूमि पर छोटा सा आशियाना बनाकर रहते हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद अधिकांश समय अपने छोटे बेटे -बहू के पास रहता हूं। प्रत्येक दो-तीन साल पर हम लोग सपरिवार बड़े पुत्र के पास जाते हैं कभी-कभी बड़े पुत्र सपरिवार आकर साथ रहने का आनंद उठाते हैं। दोनों के दो-दो बच्चे हैं।आपस में खूब मिलजुल कर घूमते रहते हैं। जब कभी प्यार से डाटते हैं, तो बच्चे कहते हैं ठीक है दादू हम लोग शांत रहेंगे। इसमें आप खुश हैं तो हम लोग भी खुश रहेंगे। मेरी पत्नी यानि बच्चों की दादी मां धीरे से कहते हैं खूब मस्ती करो दादा जी डाटते नहीं है प्यार करते हैं। खूब मस्ती करते रहो।
 दादी मां से पुरानी कहानियां राजा रानी की कहानियां रात में पैर में तेल लगवाना साथ में दादी मां को लेकर सोना बहुत अच्छा लगता है। दादी मां के साथ सुबह उठकर नित्य क्रिया कर्म से निपट कर पूजा के लिए मंदिर जाना उधर से जिलेबी लेकर आना
हलवाई को पैसा ना देना , शान से दोस्तों को कहना, हलवाई काकू जिलेबी हम लोग को मुफ्त मे देते हैं पैसा नहीं लेते हैं। लेकिन शाम को दादाजी जाकर पैसा दे आते हैं।
हम लोग की दादी मां घर का पूरा काम देखती है मेरे मम्मी पापा कंपनी में अच्छे पद पर हैं। घर की पूरी जिम्मेवारी दादी मां- दादा रखते हैं साथ में हम लोग का भी ध्यान रखते हैं जीवन में अगर सीखें है तो अपने दादा -दादी से सीखे हैं, ईश्वर सबको मेरी दादी मां दादा ऐसा दे। जो जान जाय देश मे संयुक्त परिवार क्या होता है। अभी तक हमारे देश में बुजुर्गों की प्रति स्नेह तथा लगाव है। जो संस्कारी परिवार है वो इसका मूल्य समझते हैं।
मेंटेन करने की प्रवृत्ति भी है।

विजयेन्द्र मोहन।


दादी मां

 दादी का जिक्र आते ही हमको ऐसी छवि दिखाई देती है, सफेद बाल ,झुकी कमर, आंखों में चश्मा, हाथ में डंडा । जिस घर में दादी मां होती हैं, वह घर जन्नत होता है, वहां खुशियां ही खुशियां होती हैं, क्योंकि दादी मां तो भानूमति का पिटारा होती हैं, जिसमें हर चीज उपलब्ध होती है। अनुभव तो इतना कि डॉक्टर, वैज्ञानिक ,भी फेल हो जाएं। दादी बच्चों को सभ्यता और संस्कृति की घुट्टी पिलाकर बड़ा करती हैं, अच्छी-अच्छी कहानियां और कविताएं सुनाती हैं, जो बच्चों के चरित्र निर्माण में सहायक होता है।अपनी बहुओं को अपने अनुभव के ज्ञान से लाभान्वित करती है। शादी हो त्यौहार हो , उन्हें कार्यक्रम के बारे में पता होता है,कि किसके बाद कौन सी रिति, रिवाज है। बच्चों को दादी मां से बहुत लगाव होता है। वह घर खुशियों से भरा होता है , जहां बड़े बूढ़े रहते हैं। दादी मां वह वटवृक्ष की तरह है जहां लोग अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं।

 दादा दादी से खुशियां जीवन में,
वर्ना उदासी के साए हैं ,
उनसे ही व्यवहार समाज में ,
वर्ना अपने भी पराए हैं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी इन्दौर म.प्र.


लेख***दादी माँ
"मेरी दादी घर की रानी
कर ना पाते हम मनमानी
अनुशासन बस उनको भाता
साफ सुथरा घर उन्हें सुहाता।"
जी हां मित्रों!दादी शब्द वह शब्द है जिसके उच्चारण मात्र से ही मन में एक असीम आत्मीयता का आभास होने लगता है।आत्मीयता भी ऐसी जो मर्यादा, अनुशासन, सहयोगी भाव, सहिष्णुता, संवेदना, प्यार, मैत्री और मिठास आदि इंद्रधनुषी रंगों से रंगी होती है।
 घर का आधार स्तंभ ,,जो घर की रानी महारानी से कम न थी lउनके हुक्म की तामील की जाती थीl मेरी दादी धार्मिक महिला और एक संभ्रांत परिवार की बेटी व बहू,,थी l बहुत उनका गांव में बहुत सम्मान था l लगभग 80 वर्ष पूरे किए lकर्मठ लगन शील प्रतिभावान और हर कार्य को करने का जज्बा रखती थी दक्ष कुशल नेतृत्व की लगन थी, हिम्मत वाली और प्रेम मई थीl
 पर गलतियों पर बेझिझक डांटने में भी सक्षम थी l उनके अनुभवों ने सही मार्गदर्शन दियाl और उनके घरेलू नुस्खे बीमारी तीमारी में कारगर रहै ।
नियम धर्म को मानने वाली तथा शाम की भजन मंडली की शोभा भी बढ़ाती रही।
 उनके साथ कई बार धार्मिक स्थलों की सैर भी मैंने की अच्छे बुरे के बारे में समझाते हमारे रीति रिवाज त्योहारों की महिमा भी बताती l हमारी जिंदगी का हिस्सा थी ,
दादी दादाजी मंदिर से आकर साथ-साथ चाय पी के मजेदार किस्से भी सुनाते l आज उनका आशीष शुभकामनाएं हमें आगे बढ़ाती है,l
 घंटों बातें करते थे अपनी सफलता विफलता की,, परिवार के कल्याण का ध्यान रहता था।।

*जिस तरह से मां शीतल छाया का एहसास कराती है* *उसी प्रकार दादी मां प्यार भरी मीठास घोलती रही*


सुषमा शुक्ला 🙏🏼💦💦💦💦



वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन 
विषय *****दादी *****
बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिये संयुक्त परिवार व्यवस्था सबसे अच्छी होती है ।और इसके मुखिया होते हैं दादा दादी ।खासकर दादी हमारे वृक्ष रूपी परिवार में जड़ के रूप में जानी जाती हैं ।दादी का नाम सुनते ही एक शालीन, सौम्य, शान्त झुर्रियों भरा चेहरा याद आ जाता है ।दादी सवेरे जल्दी उठ कर काम करते करते मधुर स्वर में भजन गुनगुनाती रहती थीं ।उन्हें धार्मिक कार्य कर्म में हिस्सा लेना अच्छा लगता था ।रोज सवेरे नहा कर भगवद् गीता का पाठ करतीं ।दादी अधिक पढ़ी लिखी तो नहीँ थी, परन्तु उनके अनुभव किसी महाग्रंथ से कम नहीं थे,तीज त्यौहार रिती रिवाज, के बारे में अक्सर हिदायतें देती रहतीं।घर में कोई समस्या हो,कोई बीमार हो दादी चुटकियों में हल कर देती ।एसा लगता था उनके पास कोई जादू का पिटारा है ।दादी बहुत अच्छा खाना बनाती थीं ।उनका कहना था घर से कोई भी अतिथी बिना भोजन किये नहीँ जाए ।जो भी आता बड़े स्नेह से भोजन खिलाती ।
           दादी मेरी बहुत अच्छी मित्र थी, और समय समय पर मेरी समस्याओं को हल करतीं, मुझे समझाती ।आज हमारे बीच दादी नहीँ हैं, परन्तु उनके आदर्श हमारे साथ हैं, उन्हीं के आदर्शों पर चल कर ही तो मुझे अपने ससुराल में मान सम्मान और स्नेह मिला । 
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।



अ. भा. अग्निशिखा मंच
बुधवार -21// 7//2021
विषय - दादी मां 
 विधा - लेख 


मेरी दादी जी देवी के समान हैं। उनके जीवन ही सेवा और बलिदान है। वे सम्मान की हकदार हैं।

मेरी दादी जी सबसे व्यस्त और परिवार का महत्वपूर्ण पहिया थी। वे एक धार्मिक महिला थी। मेरी दादी जी मुझे बहुत प्यार करती थी। सबसे पहले उठ कर स्नान आदि करके भगवान की पूजा करने बैठ जाती थी। सुबह-सुबह उनकी आरती और घंटियों की आवाज़ सुनकर धीरे धीरे सारा घर आलस त्याग कर उठ जाता था। दादी सुबह उठकर मुझे भी उठा देती थी। मैं भी उनके साथ मंदिर जाती थी और उनको देखकर पूजा करती थी। यह काम दादी जी हमेशा करती थीं। मुझे पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती थी और मैं बैठकर पढ़ती थी। दादी जी हमेशा सुबह गीता पढ़कर मुझे सुनाती थी।
मैं उनसे बहुत प्यार करती थी। मैं उनके साथ बाज़ार और बाहर घूमने भी जाती थी। रात को दादी जी हम सबको राजा-रानी की कहानियाँ, पहेलियाँ, चुटकुले, पौराणिक कथाएँ और दृष्टांत आदि भी सुनाया करती थी।

उनकी हमेशा से एक ही इच्छा थी कि हम सब उत्तम संस्कारों वाले अच्छे नागरिक बनें और पढ़ाई कर दुनिया को प्रकाशित करें। उनके आशीर्वाद की परिणति है ही है जो मैं आज यहाँ तक पहुँची। परिवार वाले भी उनसे अत्यधिक प्यार करते थे। उनका सब सम्मान करते थे। 
आखिर वह मनहूस घड़ी भी आ गई जिसमें दादी जी ने साथ छोड़ दिया और वे अनन्त सफ़र के लिए चली गईं। आज भी उनकी बहुत याद आती है और उनकी कमी भी बहुत महसूस होती है। दादी जी आपको हम सब की ओर से पैरी पोणा। 

पोता-पोती और दादी मां के बीच का रिश्ता बहुत ही गहरा और मीठा होता है। इनका रिश्ता हमेशा से ही मधुरता से भरा रहता है। आज की युवा पीढ़ी को उनकी तरफ ध्यान देने की जरूरत है। अपने बच्चों को संयुक्त परिवार में न रखकर उन्हें दादा और दादी के प्रेम से वंचित नहीं करना चाहिए।

अब इन रिश्तों की मधुरता नहीं बची। आजकल एकाकी परिवार होने के कारण दादा-दादी, नाना-नानी और संयुक्त परिवार सब दूर की बातें हो गई है।

बच्चे उद्दंड हो गए हैं इतने कि उन्हें अच्छा नागरिक भी नहीं कहा जा सकता, जो घर के सुरक्षा कवच हैं उनके लिए नए-नए वृद्धाश्रम खोल दिए हैं। फिर भी माता पिता इन रिश्तों के महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं कि बच्चों को संभालने में बड़ों का कितना रहा है। इस कारण अपराध भी कम होते थे और बच्चों की सुरक्षा भी हो जाती थी। आज बच्चे नौकरों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और समाज द्वारा कई प्रकार के शोषण का शिकार होते जा रहे हैं। यह सब परिवार विछिन्न करने की सजा है। तो भुगतो।
 वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर




नमन पटल
आज की विधा - लेख
विषय- दादी माँ

आज का विषय देखकर मैं बहुत खुश हो गई । आज मुझे पुनः अपने अतीत में झांकने का अवसर मिला। लेख थोड़ा बड़ा हो जाये तो क्षमा चाहती हूँ🙏🙏
मैंने अपनी दादी माँ को तो नहीं देखा है। माँ बताती थीं कि उनकी शादी के पहले ही वे परलोकवासी हो गई थीं। 
जब मैं अपनी ससुराल आई तो वहाँ पर दो-दो दादी माँ मिलीं।मेरे ससुर जी की माँ और चाची माँ।उनलोगों के अपार स्नेह से मैं अभिभूत हो जाती थी। वे लोग रात 4 बजे से ही जगकर भजन गाने लगतीं। बैठे बैठे ढेर सारे मटर छील डालतीं। अपने जीवन की ढेर सारी किस्से कहानियां सुनाती।
मैं उन्हें बहुत ध्यान से सुनती तो वे बहुत खुश होतीं
तीज त्योहार पर तो उनलोगों का उत्साह देखते बनता था। अपने रिवाजों के प्रति एकदम सजग सचेत।
मेरे बारे में कहती- बहुरिया कम बोलेलिन,(कम बोलती है)
 ढेर पढ़ लिख के नीक- नीक(अच्छी अच्छी) बात सीखले बाटिन।"
उन्हें लगता था कि मैं बहुत पढ़ी लिखी शहर की लड़की हूँ तब भी कम बोलती हूँ। ये बात उन्हें बहुत अच्छी लगती थी।
जब मेरी बिटिया का जन्म हुआ तो वे दोनों लोग बहुत खुश हुईं।
कुछ समय बाद जब बिटिया अपनी तोतली भाषा में गाना गाती थी-डम डम डिगा डिगा ,मौसम भीगा भिगा तो चाची ,दादी सास भी उसके साथ साथ गाकर खुश होती थी।
मेरे पति बताते हैं कि उनलोगों ने बहुत दुख और अभाव से अपने दोनों बच्चों और चाची दादी सास की चार बेटियों को पाला था क्योंकि ससुर जी के पिताजी और चाचा जी की असमय मृत्यु हो गई थी। बड़ी दादी घर का काम संभालती और छोटी दादी खेत -खलिहान का काम देखती थीं।पुरुष प्रधान समाज में दो विधवा महिलाओं ने अपनी संतानों को कैसे पाला होगा ,बहुत लंबी कंहानी है फिर कभी............मेरे ससुर और चाचा ससुर दोनों एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे और सभी लोग उनकी विद्वता का प्रशंसा करते और उन्हें भरपूर इज़्ज़त देते थे।
एक बात और याद आ गई वे लोग अपनी दवाइयों की पहचान दवा के पैकिंग के रंग से करती थीं दूसरे रंग की पैकिंग में या कंपनी का नाम बदल जाता था तो उन्हें लगता था कि उनकी दवाएं दूसरी आ गई हैं।
वे कहतीं- "पहिले हमार दवाई के पत्ता नीला रंग क रहल अबकी एकर रंग पीयर बाय" ...बाद में कहतीं-"दवाइया बदल गइल एहि से फायदा नाहीं भइल" । उनलोगों की मासूमियत को याद करके अब भी मन एक मधुर अहसास से भर जाता है।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'




दादी माँ 
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      दादी मां शब्द ही अपने आप में ही बहुत सूखद शब्द है। पिता ी की मां,
 पोते पोतियो से खूब लाल लड़ाते हैं,
 इस कारण हमारे माता-पिता से भी कहा- सुनी हो जाती है।
 मेरी गलती पर मम्मी पापा ने डांट दिया
 बस फिर क्या था दादी अनशन और मौन व्रत धारण कर ली, बाद में पापा ने उनको समझाया लाड प्यार के साथ डांट भी जरूरी है आपने भी तो यही किया तभी तो मैं अच्छा बन पाया। तब जाकर कहीं मामला रफा-दफा हुआ।
 मेरी दादी बिल्कुल गौर वर्ण छोटा कद,
 चमकता चेहरा सफेद सिल्की बाल हम लोग उन्हें भारत माता कहते थे।

 चाहिए उनके बहुत लाडली थी उनके साथ ही खाना पीनारहना सोना, कोई भी सामान लेकर आती कुछ ज्यादा ही बड़ा हिस्सा होता था मेरा। इसको लेकर भाई बहन बहुत चिढ़ाते थे मुझे।
 पर हां लाल के साथ-साथ एक और उनसे मुझे उनसे विरासत में मिला था, उनकी लंबाई। घर में छुपी सभी लोगों की लंबाई ज्यादा होने के बावजूद मेरी कम थी मुझे दादी से अपनी विरासत में ही मिली थी ऐसा कह कर के सभी मुझे चिढ़ाते थे।
 दादी के साथ रहने पर अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त होने से समय नहीं दे पाते हैं तब बच्चे अपने आप को सुरक्षित महसूस करते थे दादी के दिए हुए संस्कार उनकी जिंदगी में फलीभूत होते।
 कहानियां किस्से सुनकर समस्त चाहते थे या वह कहानियों के माध्यम से बहुत सारी चीजें हमें सिखा जाती थी।
 से तो बहुत हैं पर एक ही दिन में कितने सुनाऊँ। 
 परिवार का फैशन हो गया है दादा दी तथा नाना नानी और बच्चे दोनों ही पक्ष
 बहुत ही कमी महसूस करते हैं।
 हमारे बच्चों के लिए वह जमाना फिर से लौट आए।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना




नमन मंच 
बिधा ..लेख 
विषय ..नानी का घर

नानी का घर सुनते बचपन की वो शरारतें ,सुनहरी यादेँ मानस पटल पर चल चित्र से घूमने लगती है ,
मेरी नानी का घर एक छोटे से गाओं में है ,स्कूल की छुटियाँ होते ही मन कूदने लगता ,बड़े ही जोश से नानी के घर जाने की तैयारियां शुरू हो जाती |
वहाँ ट्रेन नहीं जाती है तो पहले बस से जाया करते थे |
पहुँचते ही सबसे पहले नानी की बाड़ी (कमरा ) में जाकर वहाँ रखे अचार ,खटाई ,आम पापड़ पर हाथ साफ करती फिर नानी की गोद में सोकर कहानियां सुनना सच बडा मजा आता था |
वहाँ मेरे दो ममेरे भाई और बहने थी सब सुबह उठकर अमिया चुनते और कासिन्दा के साथ चटकारे लेकर खाना आते ही आज भी मुंह में पानी आता है ,आम के पेड़ में झूला बांधकर झूलना ,गांव के हाट बाजार से चने बहुते लेकर खाना सच में क्या मस्त दिन थे |
मुझे आज भी याद मामी की आलू प्याज की सब्जी ,कढ़ी गरम गरम पराठो के साथ चूल्हे के पास बैठकर ही खाना ,उस खाने के स्वाद की सोंधी सी महक आज भी आती है जो अब नहीं है ,
ऐसी न जाने कितनी सुनहरी यादें जो आज भी मन की गुदगुदा जाती है |

स्मिता धिरासरिया बरपेटा रोड



एक विचार अपना अपना दायरा
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एक मित्र का फोन प्रातः काल ही आया। उसने कहा--" क्या आप मिर्जापुर के चंचल जी को जानते हैं"। मैंने कहा --"नहीं"। वह मेरे ऊपर लाल पीला हो गया ।अरे !इतने सुप्रसिद्ध साहित्यकार को आप नहीं जानते!" मैंने भी उससे पूछा--" क्या आप कृष्णावतारा ही जी को जानते हैं ?"उसने कहा --"यह कौन है "?इसके बाद मैंने और भी कई साहित्यकारों का नाम जो उसके ही जिले के हैं,। पूछा उसने कहा --'अरे न जाने किन -किन लोगों का नाम आप पूछ रहे हैं? मैं ऐसे सामान्य लोगों को नहीं जानता "।मैं अवाक रह गया।" भाई जब आप ऐसे लोगों को नहीं जानते ,जिनको मैं जानता हूं, तो आपके परिचय के किसी एक व्यक्ति को यदि मैं नहीं जानता तो इसका अर्थ हुआ कि मैं अज्ञ हूं।। और मुझे कुछ नहीं आता। क्या ऐसा कोई इस संसार में है जो सब कुछ का ज्ञाता हो ।हर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिचय हो ।जो स्थिति है आपकी, वही मेरी भी है। उसने कहा --"मैं तो जानता था कि आप सारे लोगों को जानते हैं"। मैंने कहा--" इतने बड़े संसार में कोई भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि मैं हर प्रमुख व्यक्ति को जानता हूं, हर साहित्यकार को जानता हूं, हर संगीतकार को जानता हूं, हर कलाकार को जानता हूं ,यह आपके मस्तिष्क का भ्रम है ।कृपया आप इस बात से अवगत होने की कृपा करें कि हर किसी के परिचय का चित्र सीमित होता है ।।अपने ही उस परिधि के अंतर्गत लोग व्यवहारिक और विशिष्ट जानकारियां एकत्रित कर एक दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं ।प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी सीमा है और वह अपने उसी सीमित दायरे में स्वयं को रखकर जीवन के प्रत्येक समस्या का निदान ढूंढता है।" धन्यवाद !कह कर मैंने फोन काट दिया।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी 9450186712



$$ मेरी दादीजी $$

मेरी दादी जी ऐसी थी ,जिनको मैं तो क्या हमारा पुरा गाँव उनके स्वर्गवास के 38 साल के बाद भी याद करते हैं ।कर्मठ, सेवाभावी सबको बहुत प्यार करती थी हमारी दादी ।
विद्यालय नही गई पर घड़ी देखना और अखबार पढ़ना आता था ।
किसी को भी मोच आ जाए तो चुटकियों मे मालिश कर ठीक कर देती । हमे रोज किस्से कहानियाँ सुनाना गरमागरम खाना खिलाना उनका नियम से करती थी ।
उनको याद किये बिना एक दिन भी नहीं बितता है ।
हमारी माताजी नहीं थी तो हम भाई बहनो के लिए तो सब कुछ हमारी दादीजी ही थी ।
सादर नमन 🙏

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान



अग्नि शिखा मंच ।
दादी माँ - लेख।
सुरेश के घर दादीमा है। सुबह चार बजे वह बिना एलार्म के उठ जाती है। उठते ही उसका सुबह का काम चालू हो जाता है। पूरे घर पर जाडू से सफाई के बाद तब कोई दूसरा काम हाथ लेतीं है, उस समय घर के ज्यादातर लोग सोते रहते है। उनका कहना है कि सुबह सुबह लक्ष्मी जी सबके घर की तरफ आती है। जिस घर में सफाई और लक्ष्मीजी का स्वागत होता है, उस घर में लक्ष्मी जी रहती है। उसके बाद दादीमां का नहाना एवं पूजापाठ होता है। उनका पलग हाल में रखा है। वहीं से बैठकर पूरे घर की निगरानी करती है। घर में यह रिवाज है कि कोई अगर कोई बाहर से घर मे आता है तो वह पहले दादीमां के पैर छूता है और आशीर्वाद लेता है। दादीमां वहीं से बैठे बैठे पूरे घर की निगरानी करती रहती है। पोते पप्पू को नास्ता मिला कि नहीं? बेटा निखिल आफिस गया कि नहीं, वगैरह वगैरह। दादी मां पूजा करते सयय लड्डू गोपाल का मुह देखा करती है। एक दिन लड्डू गोपालजी का मुख देखकर दादीमां बोली कि लगता है कि लड्डू गोपाल को बुखार है। दादी मां ने घर में तूफान मचा दिया कि लड्डू गोपाल के लिए डाक्टर बुलाओ। दादीमां का मान रखने कि लिए डाक्टर बुलाया गया। दादीमां के कहने पर डाक्टर ने लड्डू गोपाल की आला लगाकर धडकन चेक किया तो डॉक्टर को चक्कर आ गया क्योंकि लड्डू गोपाल की धडकन चल रही है।
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।



बुधवार दिनांक २१/७/२१
विधा*** लेख
विषय**** #*** दादी मां***#
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       आज दादी मां पर लेख लिखते समय बहुत सी बचपन की स्मृतियां जाग उठी है । कितना प्यारा था वह बचपन जब हम दादी के साथ दिन रात खेला उठा बैठा करते थे । कभी उसकी पीठ , कंधों या कभी गोदी में लेट जाया करते थे । कभी हम दो-चार दिन पापा के साथ शहर घूमने चले जाते थे तो दादी को नींद नहीं आती थी । कितनी आत्मीयता अपनापन था जिसे बयां करना मुश्किल है ।
               कभी मन में यह सवाल आता है कि क्या सब की दादी ऐसे ही होती होगी जो मेरी है । मुझ अबोध बालक को इसका उत्तर नहीं मिला मगर मुझे ये मालूम है कि मेरी दादी अच्छी है ।
              दादी बच्चों को संस्कार देने वाली एक निस्वार्थ पाठशाला होती है। वह अपने पोतों का हमेशा भला चाहती है । दादी हमें अक्सर शाम को जब आसमान में चांद खिलता था उस समय दादी चंदामामा की कहानियां सुनाया करती थी , जिसे हम सुनते सुनते सो जाते थे ।
              दादी हमेशा शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई ,अहिल्याबाई, जैसे शूर वीर राजा रानी की, कभी रामायण , महाभारत की कभी गांधी, तिलक, सुभाष चंद्र, भगत सिंह आजाद, की कहानियां भी सुनाया करती थी जिसके कारण हमें ज्ञान, शौर्य,धैर्य , त्याग अहिंसा , देश भक्ति और पराक्रम की सीख देकर हमारा सर्वांगीण विकास करती थी जिसका फायदा आज हमें मिल रहा है ।इन संस्कार गुणों का जो खजाना हमें हमारे दादी ने दिया वो बाकी के सांसारिक भौतिक दौलत से बहुत बेशकीमती है । ये खजा़ना हम अपने पोतों को दे रहे हैं ।         
            यह ऐसा धन है, जिसे आप चाहे जितना लुटाओ कम नहीं होता । हर बालक इससे मन हृदय से हष्टपूष्ट होकर समाज और देश का एक अच्छा नागरिक बनके तैयार होता है ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर ।




विषय दादी मां

आज का विषय अतीत में जाने का एक अवसर प्रदान किया है अगर अपनी जिंदगी से कहानी लिखूं अपने अनुभव लिखूंगी। हालांकि मैं भी दादी नानी दोनों बन चुकी हूं और दोनों का आनंद भी उठा रहे हो यह कैसा आनंद है जिसको शब्दों में बांधा नहीं जा सकता।
मेरा जीवन तो एक दादी नहीं तीन तीन दादियां के साथ बीता है अपनी दादी मनचली दादी और परदादी यह संबोधन था।
जिंदगी के कुछ ऐसे लम्हे याद आते हैं जैसे रसोईघर जिसे ब
भंसा कहा जाता था वहां जाने के लिए बहुत नियम का पालन करना होता था एक दादी पूछती थी हाथ धो ली है चप्पल उतार के जाओ सखरी है इस हाथ से दूसरे चीज को नहीं छुआ। समझ में नहीं आता था यह सखरी क्या होता है।
हमारे घर में मंदिर घर के बाहर में बना हुआ था जिसमें प्रतिदिन पूजा आरती और भोग लगाया जाता था वह खाना दादी खाया करती थी हम लोग को भी प्रसाद के रूप में कटोरी में मिलता था बड़ा स्वादिष्ट लगता था वह आनंद अब जीवन में नहीं है तीनों दादिया मिलकर मंदिर के कपड़े की सिलाई किया करती थी मंदिर के कपड़ों की सिलाई में 24 मीटर कपड़ा लगता था और लगातार यह लोग हाथ से सिलाई करती थी थोड़ी जब बढ़ी हुई तो हम लोग को भी सिलाई करना सिखाया गया और करने में आनंद भी आता था गोटा लगाना तो बड़ा अच्छा लगता था दादी का भजन दादी के साथ सोना आनंददायक था क्योंकि दादी लगातार अपने हाथों से पंखा चलती रहती थी लाइट नहीं रहता था और हाथों से पंखा जल पर सुलाया करती थी इसके लिए भाई बहनों में लड़ाई हो जाया करता था कौन दादी के साथ सोएगा छोटी छोटी सी यादें पड़े मन को मोह लेती है। दिन में 3:00 से 4:00 के समय में दादी मोहल्ला घूमने जाती थी और हम लोग भी साथ में जाते थे इस लालच में की वहां चाय और नाश्ता मिलेगा।
मोहल्ले की सारी कहानियां फिर घर में एक दूसरे को सुनाया जाता था उसमें भी खूब आनंद उठाते थे।
अब तो वह जिंदगी ही बदल गई अब न मोहल्लाह ना दादी है दादी है अभी तो ग्रैंड मां हो गई है। जिंदगी का पहलू बिल्कुल उलट गया है।
फिर भी दादी बनने का आनंद कुछ और है जब पोता पोती पुकारता है दादी तो बहुत ही मन खुश हो जाता है पता नहीं कितना मिठास है।

कुमकुम वेद सेन



अग्नि शिखा मंच
२१/०७/२०२१
दादी माँ लेख
दादी माँ तो घर की जान होती है।जैसे धरती एक चाँद सुरज एक वैसे घर की सर्वे सर्वा एक दादी दादा जी भी कोई काम हो तो दादी से ही पुछते भाग्यवान यह काम हो जाय तो।
हमारे पिता जी चार भाई थे सब एक साथ रहते थे।दादी हमारी पढ़ी लीखी नही थी लेकिन रामायण भागवत उस जमाने के कवि जैसे सूर तुलसी सब के दोहावली उन्हे यादँ था पैसा रूपया सबका हिसाब पंक्का रखती थी शादी ब्याह का खर्च सब वही करती हम बच्चो को जीतना अनुसासन मे रखती उतना प्यार भी करती थी पिता जी के गुस्से से दादी ही बचाती थी।
दादी के देवर उनको राज रानी कहते थे लेकिन हम बच्चो की गुल्लक थी।
रामायण पढ़ कर सुना दो गरी छुहारा पा जाओ।सब लोग उनकी ईज्जत करते थे
गाँव वाले ईया कहते थे।किसी को जरूरत हो दादी के पास हाजिर।जब दादी थी सब इकट्ठा थे।उनके मरने
के बाद सब अलग रहने लगे अनाज भी कम होने लगा।घर के दरवाजे की रौनक दादी के साथ ही चली गई पहले पाँच लोग शान से बैठते थे मेरी दादी घर की लक्ष्मी थी मेरा घर मन्दिर था जहाँ प्रेम से सब लोग रहते थे। दादी के बिना हमे अच्छा नहीं लगता है।उनके जैसा प्यार कौन दे।
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरखपुर।




नमन मंच 
विषय --: दादी 
 दिनांक --: 22/ 7 / 2021

दादी ! जब मैं छोटी थी स्कूल में सभी लड़कियां अपनी दादी के बारे में कहती थी ....आज मैं दादी के साथ बाहर गई थी, दादी मां ने आज मुझे गुड़िया बनाकर दी, दादी मां रोज कहानी सुनाती है आदि आदि किंतु मेरी तो दादी नहीं थी ! दादी का प्यार हमने देखा ही नहीं था हम बार-बार अपनी मां से पूछा करते थे मां हमारी दादी कैसी थी ? तब मां हमें बताती थी.... तुम्हारी दादी मां बहुत अच्छी थी! मां की शादी नौ साल की थी तभी हो गई थी ! सदियों पहले से ही बाल-विवाह की परम्परा चली आ रही थी! जमाना बदल गया है! आज बाल विवाह पर कानून की सख्त पैरवी है किंतु गांवों में गैर कानूनी तरीके से यह प्रथा अभी भी देखी जाती है! खैर... बात मेरी दादी की हो रही थी! 

            मां कहती थी दादी उससे काम भी लेती थी, सामने रसोई में अपने सामने बैठा खाना बनाना भी सीखाती थी ! पिताजी के बड़े भाई यानी मां के जेठ का एक बेटा भी था जो मां का हम उम्र था! मां कहती दादी हम दोनों को  
शाम को खेलने के लिए बाहर जाने देती थी और एक रुमाल में काजू बदाम ऐसे ड्राई फ्रूट्स भर देती थी .... समय पर आने के लिए कहती थी यदि देर हो जाए तो डाटती थी दोनों को ! देर होने पर कभी-कभी मार भी खानी पड़ती थी दोनों को ! दादी.. मां को बहुत प्यार करती थी! खानदान में लड़की ही नहीं थी! जेठानी भी लड़का छोटा था तभी स्वर्ग सिधार गई थी अतः मां और अपने बड़े बेटे के बेटे को बहुत दुलार से रखती थी! सारे कामकाज अपनी देखरेख में सिखाती थी! सुबह जल्दी उठना, नहा कर ही रसोई में जाना, खाना बनाना ,चक्की में गेहूँ पीसने से लेकर मसाला कुटना पीसना सब! प्यार तो करती थी पर काम के समय सख्त रहती थी!रिती रिवाज, पारंपरिक नियम, प्रथा सभी सिखाया! दादी से जो संस्कार मां को मिले वहीं संस्कार मां ने हम बच्चों को दिये! मां कहती हम सास बहू नहीं मां बेटी थे ! 

वही प्यार मां ने अपनी बहुओं को दिया! सभी प्रकार की छूट दी है मर्यादा के अंदर! आज मां को गुजरे दो साल हो गये किंतु उनकी बहुएं यानी मेरी भाभीयां उन्हें दिन में एक बार तो अवश्य याद करती हैं! मां ने भी उन्हें वही संस्कार और प्यार बेटी बनाके दिया जो विरासत में उनकी सास ने उन्हें दिया था! आज मेरी भाभीयां भी पीढ़ी से मिले संस्कार को बांटते हुए बहु और पोते पोतियों के साथ परिवार को बांधकर सम्मान की जिंदगी जी रही है ! 

परिवार में बड़े बुढ़ो का होना बहुत जरुरी है ....परिवार में हल्की सी भी दरार आती है वह उसे अपने प्रेम एवं अनुभवों से भर देती है !

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई



नमन।अग्निशिखा मंच 
विषय-;दादी माँ (लेख)
दिनाँक 21/7/2021
🌹दादी माँ🌹
दादी माँ नाम से ही एक स्नेहमयी प्रभावशाली व्यक्तित्व की छवि नजर में झूल जाती है।।मेरी दादी माँ ऐसी ही थी ।बुलंद व्यक्तित्व की स्वामिनी।।वे अपनी समाजिक कार्यकारिणी की अध्यक्ष भी थीं ।उनके 5 बेटे व 2 बेटियाँ,सभी अपने अपने क्षेत्र में कार्य कुशल।उनके बेटे क्रमशः कॉलेज के प्रोफेसर, हाई स्कूल व्याख्याता ,विधायक, एस डी ओ,एडिटर थे जिनका दर्प सदा उनके चेहरे पर रहता था।हमेशा एक मुस्कान चेहरे पर सजी होती।अधिक पढ़ी तो नहीं थी किंतु झलकने नहीं देतीं थीं अपनी इस कमी को।कोई भांप भी न पाता। हम सबभाई बहनों को बहुत प्यार करतीं थीं।बहुत दिलेर व निडर थीं।।बहुत सुंदर गीत भजन रामायण,व कई ग्रन्थ उनके द्वारा हमने बचपन में सुनते व उनमें डूब ही जाते कई भजन तो आज भी याद हैं जो मन को आनन्दित कर देते हैं।
उन्हीं से सम्बंधित एक घटना जब हम लोग सागर में रहते थे , हमारे नए घर के गृह प्रवेश में सभी बड़े पापा ,चाचाजी के साथ वो आईं और यहीं रुक गयीं।कुछ दिन तो बढ़िया लगा फिर उनको अपने शहर (राजनंदगांव) की याद सताने लगी जिद करने लगीं जाने की पाया को छुट्टी नहींमिली अतः कार्यालयीन कर्मचारी के साथ उनको भेज गया।।दादी नियम धर्म की एकदम पक्की पूजा के बाद तुलसी दल डला जल व चाय ग्रहण करने के बाद ही उनके दिन का प्रारंभ होता था।ऐसे में जब उन्हें ले जाना लंबे सफर पर बड़ी दुविधा का विषय !क्योंकि एक बार ट्रेन भी बदलनी पड़ती थी।वैसे ही जब सुबह हुई व दूसरी ट्रेन मे बैठना था,।दादी माँ वेटिंग हाल में रेडी होकर अपने भगवान (जो हमेशा उनके साथ ही चलते थे)को आसन में बिठाया व घन्टी बजा कर पूजा करने लगीं,कि ट्रेन आ गयी यदि वह छूट जाती तो अगले दिन ही मिलती अतः वो अंकल जो दादी माँ को ले जा रहे थे उन्होंने बैग टांगा व एक हाथ मे भगवानजी व दूसरे में दादी माँ को उठा कर ट्रेन की ओर दौड़ लगा दी।।गनीमत ट्रेन मिल गयी।।पर वो सफर व दादी माँ की बातें सदा के लिए यादगार ही रह गईं।।वो आखिरी बार ही घर सेबाहर निकलीं थीं।।उसके कुछ समय बाद जब मै कक्षा 8 में थी इंदिरा गांधी के निधन के 8 दिन बाद ही उनका भी निधन हो गया।।पर दादी माँ सदा हम सबकी स्मृतियों में जीवंत रहेंगी।।
निहरिका झा🙏🏼🙏🏼🌹🌹



अग्निशिखा मंच
21/7/21बुधवार
विषय-दादी (लेख)

हमारे समय में दादी माँ एक सशक्त व सम्मानीय रिश्ते का नाम था।दादी माँ घर की धूरी मानी जाती थी। जिसके आधार पर पूरा परिवार चलता था।वे घर की मुखिया मानी जाती थी।घर में कोई भी कार्य उनकी मर्जी के बिना नहीं होता था।उनका निर्णय ही सर्वोपरि माना जाता था। हमारा सयुक्त खुशहाल परिवार था। मां और बाऊजी दादा- दादी का बहुत आदर करते थे।दादी अलसुबह उठ कर स्नान करती फिर पूजा अर्चना के लिए मंदिर जाती।मंदिर से आकर वो हम सबको प्रसाद देती। दादी घर में अनुशासन के साथ -साथ हम सब को प्यार भी बहुत करती थी। दादी की छोटी-छोटी कहानियां हमारा मनोरंजन के साथ-साथ हमें कुछ न कुछ सीख भी देती थी। दादी ने हमें प्यार के साथ संस्कार भी दिए।दादी पढ़ी-लिखी तो नहीं थी पर उन्हें अनुभव का ज्ञान बहुत था। वो आंगन में आती धूप देखकर समय बता देती थी। उनके घरेलू नुस्ख़े मौहल्ले भर में आजमाएं जाते थे।उनके आँचल की छांव तले हम सब अपने को सुरक्षित समझते।
दादी हम बच्चो के साथ बच्चा बन जाती थी।दादी मेरे लिए कपड़े की गुड़िया तो मेरे भाई के लिए कपड़े की गेंद बनाती तो कभी तरह-तरह के पकवान बना कर हमें खिलाती।आज भी हम सब परिवार वाले जब इकट्ठे होते हैं तो दादी को बहुत याद करते हैं।
                   आज जब हम अपने आस-पास देखते हैं तो अधिकतर घरों में दादा-दादी एक उपेक्षित सा जीवन जी रहे हैं।एकल परिवार में अब उनके लिए कोई स्थान नहीं है।दीपावली पर मेरी सहेली की फैमली मेरे घर आयी।जब मैंने उनकी चार साल के बेटी से पूछा कि--बेटी हैपी फैमली का क्या अर्थ है तो तपाक से बोली,हैपी फैमली मतलब मम्मी- पापा,मैं और मेरा भाई।मैं उसका ज़वाब सुनकर अवाक रह गयी।आज परिवार में दादा-दादी का कोई स्थान नहीं हैं।घरों में जब बड़े ही बुजर्गो का आदर नहीं करते तो भला बच्चों से क्या उम्मीद करें।अपने पड़ोस में तो हमनें देखा कि वो अपने बच्चो को दादा-दादी से बात भी नहीं करने देती। उनके अनुसार दादा-दादी के प्यार में बच्चे बिगड़ जाएंगे। आज परिवार में बुजर्ग उपेक्षिति जीवन जी रहे हैं। आदर-सम्मान तो दूर की बात है,उन्हें समय पर भोजन भी नसीब नहीं होता। कुछ महारथी बेटों ने तो उन्हें वृद्धआश्रम का रास्ता दिखा दिया। बिना दादा-दादी के प्यार के बगैर बच्चे संस्कारहीन हो रहे हैं।परिवार टूट रहे हैं।रिश्तों की मज़बूत दीवारें स्वार्थ के कारण ढह रही हैं।
भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए हमें अपने घर के बुजर्गो को मान देना होगा।हमें अपने बच्चो को दादा-दादी के रिश्ते की अहमियत समझानी होगी।
                                तारा "प्रीत"
                            जोधपुर (राज०)


दादी माँ ---- ओमप्रकाश पाण्डेय

हर भारतीय परिवार में दादी जी परिवार की एक बहुत ही अभिन्न सदस्य होतीं हैं. दादी जी हर परिवार की रीढ़ होती हैं. ये चार पीढ़ियों, अपने पिता, अपना स्वयं,अपने बेटे और अब अपने पौत्र का अनुभव रखती हैं. परिवार को समय समय पर ये अपने अनुभवों के आधार पर मार्गदर्शन भी करती रहती हैं.

बच्चों के लिए तो दादी एक बहुत ही महत्वपूर्ण रिश्ता है. बच्चा रोये तो दादी चुप कराये, नाराज हो जाये तो दादी मनाये, रात में रोली गा कर बच्चों को दादी सुलाये . एक प्रकार से कहा जाये तो बिना दादी के बच्चों के लिए घर सूना रहता है. अगर कभी किसी बच्चे को उसके माता या पिता में से किसी ने डांट दिया तो तुरन्त दादी के पास बच्चे शिकायत ले कर जातें हैं और दादी से उनको डांट पड़वाते हैं. दादी जब डांट देती है तो बच्चे खुश हो जाते हैं.

अगर कोई चीज बच्चों को चाहिए तो वे सबसे पहले दादी से ही धीरे से कहेंगे कि वे पापा या मम्मी को बिना उसका नाम लिये कहें या दादी जी खुद ही मगां कर या खरीद कर उन्हें दे दें और दादी हमेशा अपने बच्चों की मांग पूरी कर देतीं. इसलिए कभी कभी यह भी कहते कि अपने अधिक लाड़ प्यार से दादी अपने बच्चों का मन बढ़ा देतीं हैं.
एक प्रकार से दादी बच्चों को मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करतीं हैं.
 लेकिन आज के स्वार्थ एवं छोटे परिवार के कारण दादी का महत्व धीरे धीरे कम होता जा रहा है. आज की पीढ़ी बूढ़ों को एक बोझ व अनावश्यक रिश्ता समझने लगे हैं और अगर वह बूढ़े आर्थिक रूप से कमजोर है, तो उसकी परिवार में उपेक्षा होती है. उसके सलाह का मजाक उड़ाया जाता है. कुछ परिवारों में तो आज कल बच्चों को बूढ़ों के पास नहीं जानें दिया जाता और उनकी अवस्था बड़ी दयनीय होती है. यह ठीक नहीं है लेकिन यही हो रहा है. 

इसका असर बच्चों पर हो रहा है. आज दादी की जगह बच्चों को मंहगे खिलौने और मोबाइल दिये जा रहे हैं. माँ बाप दोनों नौकरी कर रहे हैं और बच्चा या तो दाई पालती है या वह बच्चा पालने के स्कूल में डाल दिया जाता है, लेकिन दादी को घर में नहीं रखा जाता. यह दुखद स्थित है लेकिन आज का एक कठोर सत्य है. मानवीय सम्बन्धों के जगह पैसे को काफी महत्व दिया जा रहा है.
यही कारण है कि आज बच्चें मानसिक रूप से दृढ नहीं होते और हमेशा वे अभाव की भावना से ग्रस्त रहते हैं. अन्त में मैं यह कहना चाहूंगा कि दादी सबके जीवन में एक महत्वपूर्ण रिश्ता है.
( यह मेरी मौलिक रचना है --- ओमप्रकाश पाण्डेय)



विषय-दादी मां
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*दादी की दोस्ती*
निरज की दादी मां अनुभवी थी बहुत सारे उतार चढ़ाव उसने अपने जीवन में देखी थी।निरज 5 साल का था । हर बात अपनी मां या पिता से नहीं पूछता था ।अपनी दादी से क्योंकि उनके माता-पिता के पास निरज के लिए समय‌ही नहीं था । इसलिए निरज और निरज की दादी आपस में मिलकर दोस्ती कर ली थी ।दोनो का समय अच्छे से बीत रहा था ।दादी निरज को घुमाने ही नहीं शिक्षा और धर्म एवं आस्था से भी जुड़ी हर बात सिखाती थी । दादी निरज की एक अच्छी गुरु बन गई थी।
छुट्टी के दिन निरज आज जल्दी उठ गया ।उसने गुरु पूर्णिमा के दिन अपने घर के मंदिर को सुंदर सजाया और भगवान दादी साथ भगवान की पुजा की ।तथा दादी द्वारा बनाया प्रसाद चढ़ाया।एवं आज दादी द्वारा सिखाये श्लोक बोला ।निरज का श्लोक सुनकर निरज के माता पिता भी आ गये और निरज को इस प्रकार श्लोक और पूजा करते देख बहुत प्रसन्न हुए । उन्हें निरज का दादी साथ रहना थोड़ा भी नाकवार नहीं लगा। बल्की उन्हें अच्छा लगा की घर में ही निरज के लिए एक अच्छी केयर टेकर और टिंचर मिल गयी है । निरज के माता-पिता आगे आकर निरज की दादी का पैर छुआ और निरज ने अपनी दादी का ।दादी ने निरज को उठाकर गले से लगा लिया । निरज ने कहा मेरी अच्छी दोस्त मेरी प्यारी दादी । हमेशा मेरा साथ तुम ऐसे ही रहना ।
मेरी दोस्त और गुरु बनकर ।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग जगदलपुर छत्तीसगढ़।


मंच को नमन 🙏
विधा-दादी मां पर लेख
21/7/21
     दादी मां
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"दादी तेरी ममता की छांव में न जाने कब
मैं बड़ी हुई, लेकिन आपका प्यार और दुलार आज भी बहुत याद आ रही है।"
        मुझे आज भी याद हैं मेरी दादी मां। मेरी दादी मां मुझे बहुत प्यार करती थीं। वह सुबह जल्दी उठ जाती थी। उठने के बाद स्नान करके भगवान की पूजा करती थी। दादी मां जब सुबह उठतीं तो मुझे भी उठा देती थीं और पढ़ने के लिए बोलती थीं।
       दादी मां हमेशा सुबह-शाम गीता और रामायण पढ़ती थीं और मुझे सुनाती थीं। मुझे पौराणिक कहानियां, राजा -रानी की कहानियां, परियों की कहानियां और भूत-प्रेत की कहानियां भी सुनाती थीं। कभी मेरे स्कूल भी मुझे छोड़ने जाती थीं। उनके साथ क‌ई बार बाजार भी जाती थी।
    उनकी हमेशा से एक ही इच्छा थी कि मैं एक अच्छे से पढ़ाई करूं और एक अच्छा इंसान बन जाऊं। आज दादी मां के आशीर्वाद से ही जहां भी हूं गौरवान्वित महसूस करती हूं,उनका आशीष मुझ पर ऐसे ही बना रहे।
     दादी मां का महत्त्व हर किसी के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है। मां का प्यार जितना शीतल होता है,उतना ही दादी मां का प्यार मीठा और मधुर होता है।
दादी मां के प्यार में मिठास भरी होती है। दादी मां के रिश्ते से अपने पोते-पोतीकी भावात्मक भावनाएं जुड़ी रहती हैं।उनके बीच प्रेम और बन्धन बहुत अधिक होता है।
    "दादी के बिना "घर"सुना लगता है,
दादी बिन "दोपहर" सुना लगता है,
दादी गाथा है, कहानी है,
दादी बचपन की एक अनमोल निशानी है।"


 डॉ मीना कुमारी परिहार




लघु कथा -
 शीर्षक -"दादी मां"

राजेश्वरी के तीन बेटा- बहू और 3 पोते और एक पोती कनिका है। सारा परिवार सुखी परिवार है।पूरी कॉलोनी वाले राजराजेश्वरी को दादी
 मां ही कहा करते हैैं। क्योंकि वे किसी न किसी प्रकार से सबकी मदद को तैयार रहती हैं। घर के बाहर एक बड़ा घना पीपल का पेड़ है ।उसके नीचे अपनी खटिया दिनभर बिछाए रहती हैं। कभी-कभी तो रात के 11:00 बजे तक बच्चे और बड़े उन्हें घेरे रहते हैं ।वे किस्से कहानियां सुनाती और बच्चों को गीत कविताएं भी सिखाती और उनसे सुनती भी रहती हैं। कभी कभार सरप्राइस प्रतियोगिताएं करवा के गिफ्ट भी देती और सुबह शाम तरह-तरह के भोग लगाकर प्रसाद भी देती हैं। बच्चों की मधुर मनोरंजन का ही नहीं बड़ों के भी खुशी का केंद्र होती हैं ।क्योंकि वह एक शिक्षिका और रिटायर्ड स्कूल इंस्पेक्टर भी रही हैं। सो उनके हर काम में निपुणता झलकती है। पेंशन का काफी हिस्सा तो वे बच्चों पर खर्च कर देती हैं ।उनके पोते पोती कनिका भी बहुत होशियार हैं, और वे अपनी दादी मां को बहुत प्यार करते हैं। वे अपने खाने-पीने व्यायाम ,योगा ,घूमना भी नियमित सुबह तड़के ही कर लेती हैं। वे अपने और सब के स्वास्थ्य के प्रति बहुत सजग है। उनके बेटे बहुएं भी बहुत आज्ञाकारी और आदर्श शील और व्यवहारिक है। एक बार दादी मां के सिर में दर्द हुआ। तब उन्होंने यूकेलिप्ट्स के 4 पत्ते तुड़वा कर पानी में उबालकर उस की भाप से ही पूरा आराम प्राप्त कर लिया। वे प्रकृति चिकित्सा भी जानती है ,और सभी को उसका फायदा भी देती हैं। एक दिन सब ने मिलकर बड़ी धूमधाम से 26 जनवरी का झंडा रोहण दादी मां से करवाया और एक सांस्कृतिक प्रोग्राम भी रखा। उसमें एक बड़ा प्रीतिभोज भी रखा गया। सभी ने अपने अपने तरीके से दादी मां का स्वागत, सत्कार उपहार देकर सम्मानित किया। कितनी प्यारी सबसे न्यारी दादी मां!

  स्वरचित रचना
     रजनी अग्रवाल  
       जोधपुर



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3 comments:

  1. बहुत ही सुंदर संग्रहनीय अंक आ0 अलका दी।आपकी कार्यक्षमता व लगन कोनमन🙏🏼🙏🏼🌹🌹

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  2. अग्निशिखा मंच का कोटिशः आभार।।,,जो मेरी रचना को स्थानदिया🙏🏼🙏🏼🌹🌹

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