Tuesday, 20 July 2021

अखिल भारती अग्निशिखा मंच के ब्लॉग पर आज पढ़िए अंगूठी का नगीना शीर्षक से लघु कथाएं अनेकों रचनाकारों के डॉ अलका पांडे मुंबई



२०/७/३०२१
शीर्षक-अंगूठी में नगीना 
लघु कथा - अगूंठी का नगीना 

आस्था जब से घर ब्याह कर आई है उसने घर का कायाकल्प ही कर दिया 
सबका ध्यान रखना , आदर सम्मान बड़ों का म्रदुल व्यवहार से सबका मन जीत लिया  पढ़ी लिखी सब कहतें यह तो आकाश की अंगूठी का नगीना है , 
जिसने आकाश जैसे आवारा बेफ़िक्र लडके को अपनी सद् व्यवहार और सेवा से बदल दिया आज आकाश एक जवाब दार और सब का ध्यान रखने लगा है , 
सुबह पड़ोस की चाची की तबियत बिगड़ गई उनके घर में कोई नहीं था , 
चाचा ने जब बताया आकाश ने ऑफिस से छुट्टी ली और चाची को अस्पताल ले गया अपने पास से पैसे भी लगा दिया आस्था ने खाना बनाकर अस्पताल में चाचा जी को आर आकाश के लिये ले कर गई तो चाचा जी रो पड़े और कहने लगे आस्था बेटा तुम अंगूठी का नगीना हो तुम ने आकर हमारे मोहल्ले का और हम सब लोगों का जीवन ही नहीं बदला हमारे विचारों में भी परिवर्तन लाया है देखो आकाश को जो कभी किसी से सिधे मूँह बात नहीं करता था वह आज लोगों की मददत करने लगा है वह भी तन - मन - धन से बेटी मैं आज तुम्हें पा कर धन्य हुआ हमेशा ऐसी ही रहना सब को ऐसे ही प्यार करना । तुम्हारी जैसी बहू हर घर में आ जाये तो परिवार न टूटे लड़के न बिगड़ें । काश मेरे पास भी तुम्हारी जैसी बहू होती । आस्था क्या चाचा जी मैं क्या आप की बहू नहीं हूँ ….
ऐसा कह कर आप मुझे पराया कर देते हैं क्या आकाश आपका बेटा नहीं है । 

चाचा जी झेंपते हुये नहीं बेटा तुम मेरी बहू ही नहीं बेटी हो हम सब की अंगूठी का नगीना हो , भला इतने किमती नग्में को मैं खोने की गुस्ताकी कर कर सकता हूँ । नहीं बेटा कभी तब तक आकाश दवाई ले कर आया और कहाँ चाची अब ठीक है दो घंटे बाद घर ले जा सकते है  । सभी रिपोर्ट सामान्य आई है चिंता की बात नहीं है बी. पी बढ़ गया था अब सब सामान्य हैं ।।

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

नमन मंच
विषय --: अंगूठी का नगीना
दिनांक --: 21/7/2021

साहु जी गांव में रहकर कुछ नहीं कर पा रहे थे किंतु गांव में रहकर ही शहर को ही गांव में कैसे लाया जाय इसकी उधेड़ बुन में अवश्य लगे रहते थे ! उन्होंने ऐग्रिकल्चर में पीएचडी की थी किंतु गांव में साधन की असुविधा के चलते साथ ही लोगो में शिक्षा का अभाव होने की वजह से वह कुछ नहीं। कर पा रहे थे! उन्हें एक युक्ति सुझी! शहर में उनके मित्र हमेशा कहते थे यार गांव में आकर हमें वहां की शुद्ध हवा लेना है कभी हम लंबे समय के लिए तेरे गांव आयेंगे! 
 साहु जी ने अपने मित्रों को आने का निमंत्रण तो दिया साथ ही कहा बेशक तुम सभी आओ किंतु केवल शुद्ध हवा खाने नहीं यहां अपनी शिक्षा का दान करना होगा अर्थात गुरु बन बांटना होगा 
तभी तो शिक्षा सार्थक होगी! दोस्त मस्ती में कहने लगे सीधा बोल ना रहने का भाडा़ चाहिए ....यही सोच ले सभी हस पड़े !

साहु जी ने कहा यदि गांव में खेती की समस्या नई तकनीकी के आने से सुधर जाती है तो देश की खाद्यान्न समस्या दूर हो सकती है!

यदि प्रगति के तरीके (शहर ही) गांव में आ जाये तो गांव को शहर जाने की जरुरत ही नहीं है! 

यार साहु तू तो "अंगूठी का नगीना निकला " हमने तो केवल अपना सुख देखा किंतु तुमने हमारी आंखें खोल दी! अपनी डिग्री गांव को समर्पित कर गांव को आगे बढा़ अपने देश को उन्नति कीओर ले जाते हुए अपना जीवन सार्थक करना है! 

साहु ने कहा आज तुम सभी अंगूठी के नगीने बन गये हो! 

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंब

🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
विषय:अंगूठी का नगीना होना
अभिप्राय: मूल्यवान होना
दिनांक:20-7-21
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     शालिनी की शादी हुए,,,अभी लगभग
दो महीने होने वाला है,,,ससुराल से पहली वार , वह अपने मायके आई थी,घर में पूरा
चहल-पहल था, क्योंकि दूल्हे राजा भी तो
साथ में आए थे ।
      घर में मम्मा-पापा तो खुश थे ही,,,,
,लेकिन बड़ी भाभी और छोटी बहन सीमा 
की खुशी के क्या कहने ,,,!!! पूरा घर सजा - सजाया,,,सभी चहक रहे थे,खुशियाँ बरस रही थी ।
     वैवाहिक संबंध जब बहुत अच्छा होता है,तब दोनों पक्ष को अपने- अपने ढंग की खुशी मिलती है , वही बात यहाँ भी थी ।
      सबने डायनिंग टेबुल पर साथ बैठकर 
डिनर किया,,,,अब मम्मी - अपने कमरे में 
गये और ये चारो ड्राइंग- रूम में ।हँसी-
 ठहाके, और मनो विनोद का बाजार गर्म 
था ,,,,भाभी ने शालिनी से दूल्हे राजा के विषय में जानना चाहा ,,,," शालू जी इतना 
तो बताईये कि मेरे ननदोई जी आपको
कैसे लगे ,,,,,,?
      शालू ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा
 -- " अरी भाभी ,,,वो तो अंगूठी का नगीना है,,नगीना !!!
       पूरा हाॅल खिलखिलािहटों से गूँज गया,,,,दूल्हे राजा मन ही मन प्रफुल्लित हो रहे थे ,,,,,,!!!
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स्वरचित एवं मौलिक रचना
 रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता 
मुजफ्फरपुर
 बिहार 
🙏

अंगूठी का नगीना 

भगवती बाई के दो बेटे थेlउन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा दोनों बेटों को पढ़ाकर कमाने लायक बना दियाlबड़ा बेटा था तो मेहनती, पर उसे अपनी मेहनत पर बहुत गर्व था। छोटा बेटा अपनी मां बहन का ध्यान रखता था और सुख दुख का साथी था।
 भगवती बाई के घर एक दिन उनके भाई भाभी आए। छोटा बेटा अपनी मां की सेवा कर रहा था, सिर दबा रहा था और बहन को पढ़ने में मदद कर रहा था। कटोरी बाई का भाई छोटे बेटे को देखकर बोला-" दीदी आपका यह बेटा रितेश अंगूठी का नगीना है। बड़ा वाला सतीश तो बहुत अभिमानी है पर यह छोटा आपका बहुत ख्याल रखता है। इसने घर संभाल लिया है, आप सुख से रहेंगी। भगवती बाई बोली-" हां भैया यह दोनों मेरी अंगूठी के नगीने हैं। जुग जुग जिए मेरे दोनों लाल।"

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
20-7-21

मंच को नमन 🙏
विधा-लघुकथा
20/7/21

     अंगुठी में नगीना
    ***************
बहुत दिनों से बीमार चल रही शांता जी ने आवाज लगाई......
बहू मेरी दवाईयों की शीशी जरा देना....जी मां जी!आजकल तुम कहां बिजी रहती हो..... मेरे कपड़े अभी तक प्रेस नहीं हुआ....अब क्या पहन कर जाऊंगा आंफिस के लिए। मैं आई बाबा...इतने में बेटा रोहित ने आवाज लगाई.. मम्मी मेरे लंचबॉक्स और वाटर बोतल ...... मैं कैसे स्कूल.. ?
जल्दी-जल्दी बप्रिया ने सारे काम निपटा कर आंफिस निकल गई। प्रतिदिन प्रिया की यही दिनचर्या....
एक दिन बहुत परेशान हो पति सुधीर ने पत्नी से कहा- डार्लिग!तुम दिन से रात इतनि काम करती हो...अपने लिए तो समय ही नहीं...? "क्यों न हम मां को वृद्धाश्रम छोड़ आएं".....काम का बोझ भी कम हो जाएगा....
प्रिया....सुधीर को अपलक आंखों से देखती रही..फिर बोली"-मैं मां जी को क्यों.... मैं ये जांब छोड़ दूंगी..?बगल के कमरे से मां जी ने सब सुन लिया था...... वो दिल से बहू को दुआएं दे रही थी। बेटे को बुलाकर कहा- बेटा मेरी बहू अंगुठी में नगीना है मैं ऐसी देवी रूप में बहू को पाकर धन्य हो गई।

डॉ मीना कुमारी परिहार

अग्निशिखा मंच को नमन🙏
लघुकथा *अंगूठी में नगीना*
       वल्लभ वकील साहब बड़े असमंजस में थे। उनकी पत्नी मृत्यु शैया पर थी वकील साहब उनकी सेवासुश्रुषा करने गांव में आए थे।शहर में हत्यारे का मुकदमा लड रहे थे उधर मुकदमे के पेशी पर जाना जरूरी था। करे तो क्या करें ? बडी असमंजस्य स्थिती में थे।
      पत्नी झांवराबेन ने कहा", आप मेरी चिंता न करें आप पेशी पर जरूर जाए, भगवान सब अच्छा करेगा! वकील साहब बड़े दुखी मन से शहर चले गए, मुकदमा पेश हुआ! सरकारी वकील ने अपनी दलीलें देकर यह साबित करने की कोशिश की कि मेरा मुलाजिम कसूरवार है! और उसके लिए फांसी से कम कोई सजा हो ही नहीं सकती। वकील साहब बचाव पक्ष की ओर से जवाब देने के लिए खड़े हुए वह बहस कर ही रहे थे कि उनके सहायक ने एक तार लाकर उनके हाथ में दे दिया वकील साहब थोड़ी देर रुक गए तार पढाऔर पढ़कर अपनी कोट के जेब में रख दिया। उनका मुवक्किल निरपराध है और फिर बहस करने लग गए। अपनी बहस से उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनका मुवक्किल निरपराध है और उसे रिहा किया जाए। बहस के बाद
मैजिस्ट्रेट ने अपना फैसला सुनाया अपराधी निरपराध है और उसे छोड़ दिया जाए।
     वह मुवाक्किल उसके साथी और दूसरे वकील मित्र अदालत के बाद बधाई देने वकील साहब के कमरे में गए।वकील साहब ने अपने मित्रों को वह तार दिखाया जो उन्होंने अदालत के बहस के दौरान मिला था तार पढते ही मित्रों का खून सूख गया। तार में लिखा था आपकी पत्नी का देहांत हुआ उसके बाद वकील साहब ने सारी बात बता दी तब मित्रों ने कहा आप पत्नी को छोड़कर नहीं आना था। इस तरह मुवकिक्ल के लिए वकील साहब *अंगूठी की नगीना *हो गए जो सजा से बरी हुआ था वह वकील साहब के पैर पड़ने लगा और वह वकील साहब थे लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल उन्होंने कहा ,"कर्तव्य निभाने से ही असली सुख प्राप्त होता है।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक २०/०७/२०२१

अंँगूठी का नगीना

महेश और राधा मध्यम वर्ग के दम्पति थे।महेंद्र और राधा का एक बेटा दीपक था ।छोटा सा परिवार , सुखी परिवार। महेंद् किसी कंपनी में क्लर्क थे और उनकी पत्नी घर पर सिलाई का काम करती थी इस तरह दोनों मिलकर अपने परिवार को खुशी -खुशी चला रहे थे ।उन्होंने अपने बेटे को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाया और वे उसकी उसकी पढ़ाई का बहुत ध्यान रखते थे ।बेटा भी पढ़ने में होशियार था और संस्कारी था ।वह अपने माता पिता के समान ही विनम्र था।वह मेहनत करके इंजीनियर बन गया ।वह जैसे ही इन्जीनियर बना उसके लिए रिश्ते आने लगे। संयोग से उसके लिए बहुत अच्छे घर से रिश्ता आया। लड़की भी इंजीनियर थी और खूबसूरत भी ।दीपक की शादी भी खूब धूमधाम से हुई लड़की वालों ने बहुत शानदार शादी की । सभी रिश्तेदार और मित्रगण शादी में आए तो लड़की (बहू)के माता -पिता ने सभी को उपहार दिए सभी मेहमान लड़की व के माता-पिता के व्यवहार से बड़े खुश हुए और राधा से कहने लगे "राधा अब तो तेरे भाग्य जाग गए हैं तेरी बहू सच में अंगूठी का नगीना है।"

आशा जाकड़

विषय -अँगूठी में नगीना 
अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति 
“ प्रेम समर्पण की अर्पण भावना “

नैन्सी लुईस अपने प्यार का इज़हार अँगूठी पहनाकर ‘ किसी होटल या क्लब में ना कर ,अनजान शहर अनजाने लोग के बीच रेड -रोज़ सिग्नल पर चाकलेट खिला कर करना चाहा।
 बीच चौराहे जैसे गाड़ियाँ रुकी ? एक दूसरे को अँगूठी पहनाकर उन्मुक्त अपने प्यार का इज़हार किया ।
लोगों ने उत्साह से हाथ हिला कर फ़्लाइंग किस दिया । 
सफ़ेद लिबास में सजे सँवरें ,चाँद के ठीक नीचे अनुपम छबि कैमरे क़ैद हों गई । 
भारत और मालनी जो उन्हें देख अपनी कार में उसी गंतव्य तक जा रहे थे ।
प्रेम की अदभूत प्रस्तुति वर्णन अपने अपने शहरों से दूर विदेश में देख आत्म विभोर हों , गंतव्य की ओर बढ़ उसी टूरिज़म में रुके थे ।
नदी के किनारे बने टुरिस्ट प्लेस पर रुके , कार से टेंट का सामान निकला । 
नैन्सी अवाक देख सोच रही थी ! ये प्रिंस ख़ानदान का सपूत है । नैन्सी ,सिंड्रेला बन महलों में राज करेगी । प्रेम की झूठी माया जाल में नैन्सी फँस गई । 
तभी लुईस ने कहा -अब हमें इसी टेंट हाउस में रह अपना नया जीवन शुरू करना होगा । मेरे पास जो धन है , उससे पिज़ा बर्गर की शाप तो खुल सकती हैं । 
नैन्सी ने हामी भरी , और लुईस का हाथ बढ़ा दैनिक दिनचर्या में लग गई । अपने केंटिन शाप की दुनिया में रात दिन लगे रहते ,दोनो सोचते रहते थे ।
ये रेस्तराँ बड़ा हो जाये तो अपना सुखद वैवाहिक जीवन नये आने वाले प्यार प्रेम के उमंगों तरंगों के साथ शुरू करेंगे । हुआ भी ऐसा 
लुईस नैन्सी को अँगूठी का नगीना ही समझाता था । 
समय ने ऐसा करवट बदला परिस्थियाँ बदल चुकी थी । नैन्सी के हाथ में वो हुनर था ।
पास बने टूरिष्ट के मालिक ने नैन्सी को लालच दिखा अपने रेस्तराँ चलाने की अनुमति दे दी , और नैन्सी को अपने प्रेमजाल में फाँस लुईस से तलाक़ ले अपने रेस्तराँ फ़िलिप की मलिका बना लिया था । 
आज उसी जगह पुनः अपनी शादी दसवी सालगिरह मनाने आये थे । 
भारत -मालनी डाइनिंग हाल में लुईस के साथ दो बच्चे को , और नैन्सी को दो बच्चों के साथ देखा ,सामना प्यार अभिवादन से कर कहती है मैंने लुईस जैसे मेरी अँगूठी में लगे हीरे को पहचानने में भूल की आप दोनो से मिल सभ्यता संस्कृति की पहचान हुई आप हिंदू रीति रिवाजों से विवाह करवा दीजिये । 
लुईस ने उनकी झेंप मिटाते कहा - इफ़ यू ड़ोंट 
माईड , नैन्सी अपनी ईगो के कारण डाईवोर्स ले ली थी 
फ़िलिप के साथ लिविंग रिलेशनशीप में रहते दो जुड़वा बच्चे की मदर बन गई थी । 
अब अपने बच्चे जिसे लुईस के प्यार के साथ छोड़ आई थी । 
पुनः प्यार का इजहार कर , नैन्सी मालनी का हाथ पकड़ कर कहती है । मैंने ये लाल साड़ी दुल्हन का लिबास आप मुझे तैयार कर हिन्दु रीति रिवाज से सात फेरे जो सात जन्मो तक रहे । विवाह कर घर वसुद्धेव्य कुटुम्ब की तरह घर बसाएँगे । हमें अपनी ग़लतियों का एहसास हो गया । आप अतिथि देव भव की तरह हमारी मदद कीजिये । 
अनिता शरद झा 
रायपुर छत्तीसगढ़


$$ अंगूठी का नगीना $$

नगीना अंगूठी की शोभा होता है ।इसीतरह वो इन्सान जो समाज का सिरमौर हो । बंशीलाल जी बसेर सरकारी विद्यालय मे पढ़ाते थे फिर भादसोड़ा माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य बन कर रिटायर हुए। भदेसर गाँव के बच्चों को शुरू से किसी न किसी तरह मदद करते रहते थे ।रिटायर्ड होने के बाद वो अपने पैतृक गांव भदेसर के सीनियर सेकेंडरी विद्यालय, माडल स्कूल भदेसर और कन्या विद्यालय भदेसर मे 80 वर्ष की उम्र तक निस्वार्थ नियमित कक्षाएँ लेकर उन्होंने ये साबित कर दिया की उन्हें बच्चों के भविष्य की कितनी परवाह है । गाँव मे सब उनकी बहुत इज्ज़त करते हैं और कहते है ये तो हमारे गाँव के अंगूठी के नगीने है ।

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान


लघु कथा शीर्षक *अंगूठी में नगीना*

*मित्रों यह एसी बहू की कहानी है जिसने वाकई में अंगूठी में जड़े नगीने का काम किया*

मोहनलाल जी का समृद्ध परिवार जिसमें, पत्नी और दो बेटे, बहुत सुख पूर्वक जीवन यापन करते हैं। दोनों बेटों की शादी हो जाती है उनकी पहली बहु हर्षिता मानवीयता, संवेदनाओं से भरी हुई होती है,l

 परंतु वह कहते हैं कि सब दिन एक जैसे नहीं होते हैं समय बीता जाता है दूसरी बहू मंजरी अपन रंग दिखाना चालू करती है, और घर का बटवारा हो जाता है ,अब माता-पिता कभी बड़े बेटे सोहन के साथ तो कभी छोटे बेटे मोहन के साथ रहने लगते हैं, बड़ी बहू के पास माता पिता बहुत आनंद से रहते हैं यह देखकर छोटी बहू ईर्षा से जल भून जाती हैl जब माता-पिता उसके पास रहने घर में आते हैं तो उसका व्यवहार इतना खराब हो जाता है कि वह माता पिता के दुखों का कारण बन जाती हैं।😢 माता-पिता सोचते हैं कि अब एक ही बेटे पर भार बनके ना रहे तो अच्छा है,
 यहां पर छोटी बहू मंजरी उनको वृद्ध आश्रम में छोड़ कर आ जाती है, बड़े वाले बेटे बहू ने समझा कि चलो माता पिता छोटी बहू के पास है,,
 उनको कुछ पता नहीं होता है ,पर जब उनके घर जाने की बारी आती है तब सारी पोल खुलती है और मंजरी बताती है कि माता-पिता को *सास ससुर* को वृद्धाश्रम छोड़ आई बड़ी बहू रोती रोती जाती है ,बेटा तो सबका होता है अच्छा,,, किंतु बहू इतनी शानदार हो ग्रहलक्ष्मी हो, जो वह रोते-रोते माता पिता के चरण पकड़ कर अपने घर उनको वापस लेकर आती है और आजीवन उनकी सेवारत रहती है ,
*धन्य हो ऐसी बहू जो किसी सोने की अंगूठी में नगीना बनकर जगमगाती है*

*हर प्रकार के लोग होते हैं बहू भी हर प्रकार की होती हैं* *पर जब ऐसी बहू हो तो जीवन क्या किसी स्वर्ग से कम होगा*

*हर्षिता बहू, अंगूठी में नगीना बन कर जगमगाती है* *और दुआओं का आशीर्वादो से आजीवन तृप्त और भरी पूरी रहती है*


स्वरचित,
 सुषमा शुक्ला

**अग्नि शिखा मंच**
**२०/०७/२०२१**
**अँगूठी का नगीना**
  **महत्वपूर्ण होना**
एक जमींदार साहब थे।अपने गाँव से लेकर आस पास के लोग बहुत मानते थे मानना लाजमी था कारण यह की वे 
सबके दुःख सुख मे सब से पहले उसके दरवाजे पहूंच थे
पैसा अनाज से मदद करते थे।सबसे बड़ी बात की बिमार मरीज का सेवा भी करते थे। जीस मरीज को कोई छूता नही उसका बदन पोछना मल मुत्र साफ करना सब अपने करते थे।
वह इस लिए भी महान थे की गाँव के नामी ब्राह्मण पहले अपने खेत पर और घर पर काम करने वाले मजदूर को सामने बैठ के खाना खिलाते थे जो खाना परिवार के लिए बनता वही मजदूर भी खाते।
उनका.कहना था जो हमे पंसद नही वह हम मजदूरो को कैसे दे सकते है 
कपडा़ जो पहने है अगर किसी के पास नहीं तो उसको भी उतार कर दे देते थे। ऐसो को उदार जग माही।
      बिन कारण द्रवे दीन पर।
      राम सरीस कोउ नाही। 
उन का जब देहांत हुआ गाँव के आस पास के लोग भी आये बाबा का अंतिम दर्शन करने।बहुत भीड़ थी गाँव से सरयू नदी के तट तक
देख कर लगता था कोई संत महात्मा संसार छोडे है जीनके लिए लोग बिकल है।
आज भी उस गाँव और क्षेत्र मे लोग उनका नाम बडे आदर से लेते है ऐसे गृहस्थ संत को शत शत नम है।

**बृजकिशोरी त्रिपाठी**
**गोरखपुर, यू.पी**

अंगूठी में नगीना ---- ओमप्रकाश पाण्डेय

सुधा , जो रोज सुबह आठ बजे से पहले बिस्तर से नहीं उठती थी आज सुबह छ बजे ही उठ गयी. उसने सबसे पहले पूरा घर डस्टिंग किया, झाड़ू - पोछा लगाया और घर के सारे सामान को करीने से ठीक किया. सेन्ट्रल टेबल का क्लाथ बदला और फूलदान में फ्रिज से निकाल कर ताजे फूल सजा दिये. यह करते करते सुबह के नौ बजे गए. वह इसके बाद नहाने चली गई. नहा कर उसने बहुत ही अच्छे कपड़े पहने और हल्का सा मेकअप भी किया. फिर वह किचन में रोज की तरह अपने पति सुबोध के लिए नास्ता बनाने चली गयी.
सुबोध बाबू मार्निंग वाक करके जब लौटे तो अपना ही घर देख कर चौक परे! अरे यह उनका ही घर है क्या? रोज से एकदम अलग. ऐसा नहीं कि पहले घर साफ नहीं होता था, लेकिन इतना सुबह नहीं. रोज जब सुबोध बाबू टहल कर आते थे, तो सुधा और वे लाने में बैठ कर एकसाथ चाय पीते थे. फिर सुबोध बाबू अपना अखबार पढने में लग जाते और सुधा घर के कामों में. जब से वे रिटायर हुए हैं, उनका सुबह का यही क्रम बना है. बच्चे अपने अपने नौकरी में दूसरे शहर में रहते हैं.
खैर सुबोध बाबू यह सब सोंच ही रहे थे कि सुधा चाय लेकर आ गयी. सुबोध बाबू से रहा नहीं गया और उन्होंने पूछ ही लिया कि क्या बात है सुबह सुबह तुम भी सजी हो और घर भी, कोई खास बात है! सुधा मुस्कुराते हुए बोली पहले चाय पी लो फिर बताती हूँ. चाय पीने के बाद सुधा ने कहा कि खास बात यह है कि आज मेरे घर नवीन सर आ रहे हैं. मेरे जीवन में नवीन सर का सबसे अधिक महत्व है. मेरे बौद्धिक विकास में, नवीन सर का बहुत महत्व है. मैं पहले पढने में कुछ खास नहीं थी. बस किसी तरह हर साल परिक्षा पास कर लेती. एक साल , जब मैं कक्षा नौ में थी, नवीन सर मेरे कक्षाध्यापक हुए. उन्होंने सब क्षात्रों में व्यक्तिगत रुचि लेकर, कैसे पढना है, यह बताया. कक्षा के विषयों के अतिरिक्त और भी विषय क्यों पढनी चाहिए, इसकी आवश्यकता हमें बताई. लगातार एक वर्ष तक उन्होंने यह किया. ईश्वर की कृपा से उनके मार्गदर्शन से मुझे जीवन में एक नयी दिशा मिली और मै पढाई में काफी अच्छा करने लगी. एक साल के बाद हम सब कक्षा दस में आ गए और वे कक्षाध्यापक नहीं रहे , लेकिन उनके बताये गये नियमों को मैंने हमेशा याद रक्खा और इसी कारण नवीन सर को मैंने अपने अंगूठी के नगीने की तरह मष्तिष्क और दिल में संभाल कर रक्खा हुआ है. स्कूल पास करके मैं कालेज में आ गयी. उनसे कभी कभार ही बाजार या किसी पुराने सहपाठी के यहाँ भेंट हो जाती थी. फिर शादी के बाद मेरा शहर ही छूट गया. इधर वर्षों से उनकी कोई खबर नहीं थी. लेकिन परसों ही राव से पता लगा कि वे अपने बेटे के पास यहाँ आये हैं, तो मैंने राव से अनुरोध किया कि नवीन सर को लेकर मेरे घर भी आओ और नवीन सर आज ग्यारह बजे के आस पास हमारे यहाँ आयेगें. इसलिए मैंने सोंचा कि आज सबसे पहले घर ही ठीक कर लेती हूँ. 
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)

आदरणीय मंच को नमन
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लघुकथा--" अंगूठी का नगीना "
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श्यामलाल के तीन बेटे ।पहला, बड़ा होकर पास के शहर में नौकरी करने चला गया ।पति पत्नी दोनों अपने एक छोटे से बच्चे के साथ दिन बिताने लगे। दूसरा बेटा क्रिकेट का अच्छा प्लेयर वह देश विदेश ही खेल के संदर्भ में डालता रहता तीसरा बेटा सबसे छोटा उसका नाम अनुज था। अनुज हाई स्कूल में पढ़ता था स्कूल जाने से पहले और स्कूल जाने के बाद माता-पिता को कोई परेशानी ना हो ,उनके लिए खाने पीने की वस्तुएं, सब्जियां, दाल, साबुन और कुछ दवाएं लौटते समय बाजार से लेता आता था ।रात को सोते समय मां दिन भर काम करने के बाद थकी रहती थी और कराती थी तो ,अनुज उनका सिर और पैर दबाने के बाद ही सोता था। माता-पिता दोनों की यथासंभव सहायता करता था ।सेवा करता था। वह अपने माता-पिता के लिए अंगूठी का नगीना था ।वे उसे आशीर्वाद देते थे। खूब आगे बढ़ो ,तुम्हें कभी भी सुख की कमी ना हो।


डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वारा

अग्निशिखा मंच
20/7/2021 मंगलवार
विषय-अंगूठी में नगीना

राजेश के पड़ौस में आज जयपुर से पोस्टिंग होकर मिस्टर विनोद सारस्वत जो बैंक में मैनेजर है, उनके साथ उनकी पत्नी नीलम और उनकी दो बेटियां है,रहने आये हैं। पड़ौसी के नाते राजेश और उनकी पत्नी नीरू चाय नाश्ता लेकर उनके घर गए।डोर बेल बजाने पर मिस्टर विनोद ने दरवाज़ा खोला।राजेश ने नमस्ते करते हुए कहा कि हम आपके पड़ौसी है।विनोद ने हाथ जोड़ते हुए राजेश व उनकी पत्नी को अंदर आने के लिए कहा।विनोद ने अपनी पत्नी को बुलाते हुए कहा- नीलम जरा ड्राइंग रूम में आइये,हमारे पड़ौसी हमसे मिलने आये है।नीलम ने किचन से बाहर आते हुए,मुस्करा कर राजेश व नीरू को नमस्ते की। नीलम ने चाय व नाश्ता टेबल पर लगाते हुए कहा,प्लीज आइये चाय नाश्ता कीजिये।विनोद और नीलम ने कहा अरे!ये इन सब की क्या आवश्यकता थी।नीरू ने चाय कपो में डालते हुए कहा,पड़ौसी के नाते ये तो हमारा फ़र्ज़ है।चाय नाश्ते के बाद राजेश और नीरू अपने घर आ गए।
                 दूसरे दिन राजेश के घर की डोर बेल बजी,नीरू ने दरवाज़ा खोला सामने नीलम को देखते हुए,अरे आप आइये अंदर आइये।नहीं आज नहीं फिर कभी,आज मेरे घर आज सुबह दस बजे सत्संग है,आप जरूर आइयेगा।जी मैं जरूर आऊंगी कहते हुए नीरू ने दोनों हाथ जोड़ दिए।नीलम मुस्कराते हुए अपने घर की ओर चल दी।दस बजे नीरू नीलम के घर पहुँची तो मौहल्ले की कुछ महिलाएं वहाँ पहले ही बैठी थी।नीलम ने गुरु की वाणी का ऑडियो सुनाया फिर एक मन को मुग्ध करने वाला भजन सुनाया। सत्संग के बाद नीलम ने बताया कि मैं नियमित रूप से सत्संग में बैठती हूँ, आप सब भी आया कीजिये।नीरू ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा कि रोज तो नहीं हां हम कभी-कभी जरूर आ जाया करेंगे।कुछ दिनों बाद जब नीरू नीलम जी घर गयी तो वो गुरु वाणी सुन रही थी,नीरू ने भी सुनी उसके मन में गुरु वाणी उतर गयी।अब तो नीरू रोज नीलम जी के वहाँ सत्संग जाने लगी।
नीलम जी ने बताया कि वो ब्रह्मज्ञानी गुरु की शिष्या है।नीरू के मन में भी गुरु के दर्शन करने के भाव जागृत हुये। और एक दिन नीरू नीलम जी के साथ गुरु दर्शन के लिए प्रयाग पहुँच गयी। गुरु के समक्ष बैठकर जब नीरू ने पहली बार गुरु के मुख से वाणी सुनी तो जैसे निहाल हो गयी।
सच्च में ऐसा सत्य बताने वाले गुरु बहुत कम होते है। ऐसा सतगुरु पाकर नीरू बहुत खुश थी। धीरे-धीरे गुरु ज्ञान से उसका मन निर्मल होता गया। 
उसके मन में करुणा के भाव जागृत होने लगे।नीरू मौहल्ले वालों के दुख सुख को अपना समझने लगी। नीलम और नीरू ने मौहल्ले में घर घर जाकर महिलाओं को उनके कर्तव्यों के साथ-साथ उन्हें उनके अधिकारों के प्रति भी सजग किया। नीलम व नीरू के प्रयासों से महिलाओं के नीरस से जीवन में सरसता आने लगी।जब गुरु ज्ञान से महिलाएं जागृत हुई तो घरों में में भी सुख समृद्धि बढ़ने लगी। आज गुरु कृपा से शहर में हमारा मोहल्ला एक आदर्श मोहल्ला कहलाता है।ज्ञान के बगैर हम सब का जीवन जैसे बिना नगीने की अंगूठी जैसा था। गुरु हमारे सूने जीवन रूपी अंगूठी में क़ीमती नगीना बन कर आये।बहुत भग्यशाली है हम जो हमारे जीवन में ऐसा सद्गुरु है।
                     तारा "प्रीत"
                   जोधपुर (राज०)
मंगलवार दिनांक°°°°२०/७/२१
विधा****"लघुकथा
विषय ******
  #****अंगूठी में नगीना****#
               ^^^^^^^^^

मित्रों, अब मैं ऐसे शख्स की कहानी बताने जा रहा हूं जो सचमुच अंगूठी के नगीना थे ।
         रामटेक तहसील का एक छोटा गांव जिसकी लोकसंख्या 5000 के लगभग थी । गांव का भला करने वाले उस भले इंसान का नाम था वामनराव बोलेवार ।
          इस वामन राव जी ने गांव में आदर्श विद्यालय नाम से एक स्कूल खोली थी । जिस स्कूल में मैं भी पढ़ा हूं । ऐसे कई छात्र उस स्कूल से पढ़कर अनेक शहरों में अच्छे-अच्छे नौकरी पर लगे। और आज भी वे कामयाब इंसान भारत के अच्छे नागरिक बन अपना जीवन गुजार रहे हैं केवल उस वामनराव जी के बदौलत ।
           वामन राव जी आजीवन अविवाहित रहे । वह हमेशा कहते थे मेरे गांव के गरीब बच्चे ही मेरी संतान की तरह है । मैं इन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाऊंगा , उनको अपने पैर पर खड़ा करूंगा यही मेरी इच्छा है ।
          मेरा जीवन लोगों के लिए है,, यही मेरी ईश्वर पूजा है । जैसा वह सोचते थे, कहते थे वैसा ही वह कर गए और हम जैसे हजारों गांव के गरीब बच्चों का उद्धार कर गए । 
            उन्होंने आखरी सांस तक महात्मा की तरह अपना जीवन गुजारा । महात्मा वह नहीं कि जो भगवे कपड़े पहन कर, माला पहन कर, माथे पर तिलक लगाकर समाज में घूमते फिरते हैं,। बिना स्वांग किए ही समाज में ऐसे लोग हैं जो पूरे समाज का उधर कर जाते हैं ।
             वामनराव जी उन्हीं में से एक थे जिन्होंने हम जैसे गरीब, असहाय बच्चों को नया जीवन दिया । वे एक मसीहा से कम नहीं थे ।
              इसलिए , वामनराव जी हमारे लिए , पूरे गांव के लिए सचमुच अंगूठी के नगीना थे । 
         आज वह इस दुनिया में नहीं है । उनकी दिवंगत आत्मा को हम सबका शत शत नमन ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर ।
लघु कथा-


 शीर्षक-" अंगूठी का नगीना"
रानी और संदीप के एक ही बेटा राजीव शादी के 4 वर्ष बाद पैदा हुआ। सो सारे घर की रौनक बना हुआ है। सबके लाड़ प्यार में वह बहुत कुछ सीख रहा है ।सबका सहयोग करना, एक दूसरे को प्यार करना, अपने कर्तव्य और व्यवहार को समझना। उठने बैठने और खाने-पीने के तौर तरीके ।कुल मिलाकर पूर्णतया व्यवहारिक होता जा रहा है एक कुशल व्यक्तित्व उसमें पनप रहा है ।सभी कुछ ना कुछ सिखाई देते हैं प्यार से ।स्कूल जाने से पहले की तैयारी भी सब ने मिलकर करवा दी है। स्कूल में भी उसका व्यवहार सबसे साथ बहुत नम्र है। पढ़ाई में भी वह सबसे अधिक होशियार भी है ।सब को उस पर नाज है। कहते हैं सभी अलग अलग तरीके से, आपका बच्चा तो अंगूठी का कीमती नगीना है ।इतना प्यारा इतना व्यवहारी ,सच में ईश्वर ने नायाब नगीना ही दिया है राजीव के रूप में ।
वंदे वंदे वंदे मातरम!

स्वरचित लघु कथा-
  रजनी अग्रवाल
    जोधपुर


अंगूठी में नगीना( लघु कथा)
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 रीना जी के तीन बेटे थे ,पड़ोस में रहती थी मेरे। अच्छी बनती थी हमारी, मुझसे काफी बड़ी थी लेकिन उन्हें दीदी, भाभी, आंटी या कुछ और कहलवाना पसंद नहीं था तो मैं उन्हें रीना जी ही कहती थी। क्या कहती थी जरूरी नहीं हर किसी के साथ कोई रिश्ता हो तभी संबंध अच्छा होगा यह बात मेरे कभी नहीं आती थी फिर भी हमारी दोस्ती काफी अच्छी थी।
 सुख-दुख बांटते थे हम शॉपिंग मस्ती
 खूब करते थे साथ में।
   बेटियां बेटों की शादी हो चुकी थी 5 पोते पोतीयां थे, चार पोते और एक पोती।
 अपनी पोती को बहुत प्यार करती थी , सिर्फ इसलिए क्योंकि कल को पराए घर चली जाएंगी तो इतना प्यार कोई देगा या नहीं, असल में सारे अधिकार और आस पोतों से ही थी, पढ़ाई में भी पोती जबकि सभी में अच्छी सबसे ज्यादा अच्छी थी फिर भी हमेशा कहती थी कौन सा इसे हमें अफसर बनाना है बस शादी ब्याह अच्छे से हो जाए ग्रेजुएट हो जाए ताकि इसके ब्याह में कोई अड़चन ना आए।
 इसके विपरीत पौधों को हमेशा कहती थी यही हमारा नाम रोशन करेंगे यह हमारे परिवार रूपी अंगूठी के असली नगीने हैं,
 जबकि पौधों को पढ़ने लिखने से ज्यादा सरोकार नाथा समय बीतता गया उनके दो पुत्र थे तो जैसे तैसे पढ़कर क्लर्क की नौकरी पर लग गया परंतु दोनों छोटे पोतों को तो गलत धंधों से ही फुर्सत नहीं मिलती, इधर होते ही पढ़ लिखकर कलेक्टर बन गई थी।
 एक बार दोनों को किसी चोरी के जुर्म में पुलिस पकड़ कर ले गई जैसे ही बहन को पता चला तुरंत फोन किया थोड़ी सी नसीहत देकर पुलिस ने छोड़ दिया।
 बहन ने भी घर जाकर समझाया जिससे दोनों गलत काम छोड़कर सही रास्ते पर आ गए रीना जी ने अपनी गलती मानी, पौधों की हरकतों से नाराज होते हुए कहा जिन्हें में अंगूठी का नगीना समझती थी वह तो पत्थर निकले, परिवार रूपी अंगूठी का नगीना है।
 मुस्कुरा रहे थे सभी।
 धन्यवाद 
अंशु तिवारो

अंगूठी का नगीना होना
अ. भा.अग्निशिखा मंच
विषय_अंगूठी का नगीना होना
विधा_लघु कथा।
     मेरी सहेली सुमन महाविधालय में प्राध्यापिका है।उसके पति सरकारी अफसर हैं।उनका इकलौता बेटा सौरभ है।
सौरभ का जन्म हुआ तो वो गुलाब के फूल जैसा लगता था।गोरा_चिट्टा रंग,लंबी नाक, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ, मोटी_
मोटी काली आंखें ,घुंघराले बाल,कुल मिलाकर बहुत ही खूबसूरत।
     जैसे_जैसे वह बड़ा हुआ ,उसका रूप निखरता गया।आज वो २४साल का है।उसने इंजीनियरिंग, एम. बी. ए.किया है।ऊंचे पद पर अच्छे पैकेज से कार्यरत है।
    वह स्वभाव से विनम्र,हंसमुख,
ईमानदार,परिश्रमी,संयमी,स्वस्थ,अपने परिवार को चाहने वाला,बड़आदर करनेवाला, परोपकारी चित्त वाला और सदाचारी है।संस्कार तो उसे मां_पिताजी से विरासत में मिले हैं ही।वो जिस किसी से मिलता है या बात करता है उस पर अपनी सुंदर,प्रभावी छाप छोड़ता है। यानि वो एक "अंगूठी के नगीने के समान "है।वो जिस अंगूठी में फिट होगा उसकी शोभा बढ़ जायेगी।
     एक से बढ़कर एक रिश्ता आ रहा है,शीघ्र ही वो परिणय_सूत्र में बंध जाएगा।सभी कहते हैं कि*हमारा सौरभ तो अंगूठी के नगीने जैसा है।"
     भगवान ऐसा सुपुत्र हर किसी को दे।
स्वरचित मौलिक लघुकथा_
रानी अग्रवाल,मुंबई,२०_७_२१.

🌺मंगल वार - 20// 7/ 2021
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🌺विषय -अँगूठी का नगीना-
अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति 
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अनुराग अपने भाइयों से सबसे छोटा था। कहते है छोटी संतान मां को बहुत प्यारी होती है। अनुराग भी अपनी मां का बहुत दुलारा था। 
एक दिन अनुराग को एक हीरानुमा कोई टुकड़ा पड़ा हुआ मिला। उसने घर आकर मां को दिखाया। मां को कुछ समझ में नहीं आया। उसने एक जौहरी को दिखाया तो पता चला वह हीरा ही था। 
दिन बीतते गए, बात आई गई हो गई। अब अनुराग एक बैंक में काम करने लगा था। उसने सोचा नौकरी मिलने की खुशी में कुछ करना चाहिए। 
एक दिन अनुराग ने मां से वह हीरा मांगा। मां ने भी बिना कुछ पूछे हीरा उसे दे दिया। 
एक सप्ताह बाद ही मां का जन दिन था। केक काटा गया। सभी भाइयों ने मां को कुछ न कुछ दिया। अनुराग ने एक अंगूठी दी जिसमें वही हीरा चम चमा रहा था। 
मां ने कहा तू खुद ही मेरी अंगूठी का नगीना है। मुझे यह मत दे। अब तू शादी कर ले और हीरे सी एक बहु ले आ। और ये अंगूठी उसी को देना। 
अनुराग कुछ शरमा गया और बोला मां तू इसे रख ले जिसे देना हो दे देना। 
अनुराग की शादी भी हो गई।बहु घर आई तो मां ने वह अंगूठी बेटे को देते हुए कहा ले इसे अपनी बहु को मुंह दिखाई दे देना। 
जब वह पहली बार अपनी पत्नी से मिला और वह अंगूठी दी तो वह बोली– दे रहे हो तुम्हारा पहला नजराना मानकर ले ले रही हूं किंतु मेरी अंगूठी के नगीने तो तुम्ही हो। तुमसे बड़ा नगीना भला और क्या होगा।
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© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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अंगूठी का नगीना लघुकथा

रामशरण जी समाजसेवी थे, उन्हें अनाथाश्रम, में जाकर बच्चों को पढ़ाना और उनके साथ समय व्यतीत करना अच्छा लगता था ,वे वृद्धाश्रम में भी जाते थे तो खाली हाथ कभी नहीं जाते थे।हर बार उनके लिए नये कपड़े,फल, सब्जियां बिस्कुट , मिठाई लेकर जाते । उन्हें हर बूढ़ी औरत में अपनी मां नज़र आती थी।
रामशरण जब रिटायर हुए तो उन्हें जो रुपए मिले उसमें से चार लाख वृद्धाश्रम में और चार लाख अनाथाश्रम में दान दे दिया। एक बार उनकी पत्नी रमा ने कहा ...कि तुमने इतने रुपये
 वहां दे दिए , समय का कोई भरोसा नहीं है , हम भी बूढ़े हो रहे हैं, कल को कुछ हो जाता है,या हम भी बीमार पड़ जाएंगे ,तो हमारी मदद कौन करेगा? रिश्तेदार भी तभी पूछेंगे, जब हमारे पास रुपए होंगे ।रामशरण ने कहा.... तुम चिंता मत करो ,हमें कुछ नहीं होगा ,और यदि होगा तो हमारी मदद करने वाला ईश्वर है ना ।रमा चुप हो जाती थी । वृद्धाश्रम के लोगों अपनो से भी बढ़कर रामशरण जी को मानते थे , उन्हें अंगूठी का नगीना समझते थे।वर्ष के अंत में वार्षिक उत्सव होता था तो लोग उन्हें मुख्य अतिथि के रुप में बुलाते थे,और वे भी खुशी -खुशी निमंत्रण स्वीकार कर लेते थे। मोहल्ले में ,समाज में उनकी बहुत इज्जत करते थे तथा उनसे प्रभावित होकर वे भी समाजसेवा में हाथ बंटाने लगे।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश

अंगूठी का नगीना

डॉक्टर साहिबा का परिवार घर में सास ससुर ननंद देवर देवरानी आ और चाचा चाची से भरा पूरा परिवार पहली बहू जो डॉक्टर थी भव्य स्वागत हुआ।
डॉक्टर साहिबा का नाम नगीना था और अपने नाम को अपने काम एवं व्यवहार से सार्थक कर दी थी मधुर भाषी मान सम्मान जरा सा भी घमंड नहीं चाहे दूर का रिश्तेदार हो या करीब का रिश्तेदार है किस की क्या जरूरत है कितना समय देना है कितना मदद करना है चाहे पैसे से मदद हो चाहे शरीर से चाहे अपनी विद्या से हर वक्त याद रहे डॉक्टर साहिबा कुछ ऐसी घटनाएं उनके जीवन की मैं सुना रही हैं कुछ ऐसे दंपत्ति रहे जिन्हें सुख का औलाद नहीं था लेकिन उनके सहयोग से यह दंपति को सुख का और लाभ प्राप्त हुआ और वह दंपत्ति जीवन भर उनके इस ऋण से मुक्त नहीं अपने आप को कर सका यह तो एक छोटा सा उदाहरण कितने ऐसे गांव हैं जहां पर की महिलाएं बहुत ही दयनीय अवस्था में जीवन को गुजार रही लेकिन उनके सहयोग से उनके प्रोत्साहन से उनका आत्मबल आत्मविश्वास बढ़ा और आत्मनिर्भर होकर के आज स्वावलंबी योजना में जुड़ी हूं कहने को तो वही डॉक्टर साहिबा हैं डॉक्टरी के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में उनकी जो रुचि रहे वह काबिले तारीफ रहे परिवार का हर लोग यही कहता है कि नगीना अपने नाम को सार्थक कर दें परिवार की नगीना है इसे अंगूठी का नगीना भी कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जहां किसी को नहीं मदद मिलती वह उस डॉक्टर साहिबा के पास चली जाती और वह कोई ना कोई उपाय लगाकर उनकी मदद अवश्य करती हूं उनकी यही स्वभाव उन्हें नगीना बना दिया नाम से नगीना काम से भी नगीना हाथों की अंगूठी की नगीना नहीं बल्कि परिवार के नगीना बनी रही और अभी बनी हुई हैं

कुमकुम वेद सen
20/7/20
नमन पटल
आज का विषय-अंगूठी का नगीना

रमेश के घर के आगे आज बहुत भीड़ लगी हुई थी।
घर पर जाकर पता चला रमेश अब इस दुनियाँ में नहीं है।
सुनकर दिल को बहुत बड़ा झटका लगा।
रमेश को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता था। वह बहुत ही विनम्र, सुशील और शांत स्वभावऔर कुशाग्र बुद्धि का लड़का था। उसके प्रतिभा की सभी लोग प्रशंसा करते थे।जो एक बार उससे बात कर लेता उसके व्यक्तित्व का कायल हो जाता। वह कुछ गाँव के लड़कों के लिए आदर्श बन चुका था।अन्य युवा भी उसका अनुसरण करना चाहते थे।
उसके प्रतिभा के कारण उस गाँव का नाम बहुत लोग जान गए थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद वह एक बड़ा अफसर बन गया था। उसने एक गरीब से बिना दहेज विवाह करके आज के समाज के समाने एक उच्च आदर्श भी स्थापित किया।
एक बार गाँव में महामारी फैली थी तब उसने कुछ युवाओं को इकट्ठा करके लोगों का हर सभव मदद किया। लोग उसको बहुत आशीर्वाद देते थे। कहते नहीं थकते थे कि रमेश इस गाँव की अंगूठी का नगीना है किंतु दैव को भी अच्छे लोग ही पसंद आते हैं और उन्हें अपनी सेवा में बुला लेते हैं। सुनने में आया था कि उसे कोई गंभीर बीमारी हो गई है। गाँव के लोग उसके लिए दुवा ,प्रार्थना कर रहे पर आज यह दुखद समाचार सुनने को मिला।
मैं सोच रहा था कि आज इस गावँ और समाज ने एक अमूल्य नगीना खो दिया है और वह नगीना परमधाम को आलोकित कर रहा है।

स्नेहलता पाण्डेय'स्नेह'


अ. भा. अग्निशिखा मंच
मंगल वार - 20// 7/ 2021
विषय -अँगूठी का नगीना-
अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति 
विधा - लघुकथा 


देवेंद्र जी आप के प्रेरणा स्रोत कौन हैं? उन्होंने बड़े गर्व से उत्तर दिया-"मेरे पिता श्री सुरेंद्र ठाकुर जी" इतना बोलते ही वे पुरानी यादों में गोता लगाने लगे। 

क्या समय था? पिताजी अंगूठा छाप थे, लेकिन फिर भी हम सब भाई-बहनों के प्रेरणा स्रोत रहे क्योंकि उनकी सख़्ती के कारण ही आज सब ऊँचे ओहदे पर आसीन हैं। सुरेंद्र ठाकुर जी उनके लिए अंगूठी का नगीना हैं। 
भगवान ऐसे बच्चे भी सबको दे जो अपने माता-पिता का इस सख़्ती को अपने मन में ना बिठा कर उस से होने वाले लाभों से खुद भी और दूसरों को भी अवगत करा सकें। 

विजेंद्र सिंह बहुत कड़क लेकिन अंदर से उतने ही नर्म बिल्कुल नारियल जैसे। बच्चे सारी सुविधाओं से भरपूर लेकिन यदि वे पढ़ाई से मुँह चुराते तो पानी के टब में डूबा-डूबा कर मारते थे। पढ़ाई में ज़रा-सी भी कमी बर्दाश्त नहीं करते थे। उस समय तो बच्चों को बड़ा बुरा लगता था। वे सोचते थे हमारे पिताजी बहुत कड़क हैं लेकिन बाद में उसका लाभ हुआ। 

वे सब अपने दमदार और रूखे पिता को ही अंगूठी का नगीना मानते हैं और श्रद्धा से सिर झुका लेते हैं क्योंकि उन्हीं के कारण हो इतने अच्छे अच्छे पदों पर बैठे हैं।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर



अग्निशिखा मंच
तिथि-२०-७-२०२१
विषय - अंगूठी में नगीना
विधा-लघुकथा

          प्रतिष्ठित

राजेंद्र जी शहर के प्रतिष्ठित आदमी हैं.
राजनीतिज्ञों के गुट में भी उनकी अच्छी पहुॅंच है. अपनी पहचान का फ़ायदा वो सबके काम करवा कर उठाते हैं और कहना ना होगा ,कि उनको तो फायदा होता ही है, इस काम में जिन राजनीतिज्ञों की सहायता वो लेते हैं उनको भी अच्छा खासा फ़ायदा होता है.
   उनके एक रिश्तेदार मुकुल हैं, जो समाज सेवी हैं.समाज के गरीब और असहाय वृध्दों के लिए मुकुल एक वृध्दाश्रम बनवा रहे है़.काम पूरा हो गया था अंतिम में पैसों की कमी हो रही थी. उन्हे कुछ सहायता चाहिये थी. मुकुल राजेंद्र जी के पास अपनी समस्या ले कर गये. राजेंद्र जी को पता था इससे उन्हे कुछ भी फ़ायदा नहींं होने वाला है इसलिए उन्होने टका सा जवाब दे दिया.
        राजेंद्र जी को विश्वास था कि वृध्दाश्रम के शुभारंभ समारोह के मुख्य अतिथि वही होंगे.उन्होने टीवी समाचार में देखा .मुकुल को स्टेज में बुला कर फूलों का हार पहनाकर "अंगूठी में नगीना " नाम से सम्मानित किया जा रहा जा रहा था.

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र


वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन,
विषय***अँगूठी का नगीना ****
 अरविंद जी मेडिकल कालेज में प्रोफेसर थे।उनका एक छात्र अशोक बहुत ही मेहनती, पढ़ाई में होशियार और मृदुभाषी था, कक्षा में भी उसे सब चाहते थे,हर समय दूसरों की मदद करने को तत्पर । परन्तु उसकी आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीँ थी,इसलिए अरविन्दजी आए दिन उसकी मदद कर दिया करते थे।अरविंद को अशोक में भविष्य में सफल होने की सम्भावनाऐं दिखती थी, वे चाहते थे कि उनकी बेटी रीमा का विवाह अशोक से करवा दें, परन्तु रीमा ने यह कहकर इन्कार कर दिया, जिसे आप आर्थिक सहायता करते हैं, वो मुझे क्या दे सकता है ।कुछ वर्षों बाद रीमा की शादी किसी अमीर घर में हो गई, परन्तु उसके ससुराल वाले बहुत लालची थे ,आए दिन उसे दहेज के लिये तंग करते, मारते,।आखिर रीमा ससुराल छोड़ पिता के घर रहने आ गई ।
            अरविंद जी रिटायर हो चुके थे, रीमा के ससुराल वालों की मांगे पूरी कलते करते आर्थिक रूप से भी कमज़ोर हो गए थे ।एक दिन शाम को अपने गार्डन में बैठे थे, उस समय एक शानदार कार उनके गेट के सामने आ कर रूकी, उसमें से एक सुदर्शन युवक उतरा, और पास आकर अरविन्दजी के पैर छुए ।अरविंद जी बोले ,बेटा, मैने तुम्हें पहचाना नहीं ,कौन हो तुम? वह युवक विनम्रता से बोला सर, मैं आपका छात्र अशोक, जिसे आप हमेशा आर्थिक मदद करते थे, सर मैने नया अस्पताल बनवाया है, उसका उद्घाटन आपके हाथों करवाना चाहता हूँ, और हास्पीटल की सारी जिम्मेदारी आपको सौंपता हूँ ।चलिये सर मैं आपको लेने आया हूँ ।
           और दूर खड़ी रीमा सोच रही थी, अशोक तो अँगूठी का नगीना निकला । काश , मैं उस समय पापा की बात मान लेती ।।।।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी, 
जोधपुर ।।।।



मंच को नमन
विधा:-- लघु कथा
विषय:-- *अंगूठी का नगीना*

मोहन नाम का 18 बरस की उम्र में ही बोकारो स्टील प्लांट में शुरुआती दौर में प्रारूप विभाग में प्रारूप सहायक पद पर नियुक्ति उसे मिली। वह अपने कार्यरत होते हुए कुशल नेतृत्व में अपने बुद्धि और स्वभाव के साथ एक होनहार व्यक्तित्व का परिचय दिया। विभागाध्यक्ष के नजर में होनहार व्यक्तित्व विकास परियोजना साबित हुआ जिसके कारण मोहन की ट्रांसफर विभाग के अनुभाग में होते रहा।
विभागाध्यक्ष जब मोहन के काम से संतुष्ट हो गये समय-समय पर पदोन्नति मिलता गया जब अपने पास सहायक के रूप में पद से रहने के हो गया तब अपने कार्यालय में ट्रांसफर पैनल में आयोजित कर रख लिए । मोहन के आने के बाद विभागाध्यक्ष के मुख से कहना सही में आप इस विभाग के नगीना है। आप मेरे पास है मैं अब निश्चित हूं सभी काम सुचारू रूप से आप देखभाल करेंगे और उसी प्रकार हमें जानकारी देंगे। उनके साथ मोहन का टियूनिंग बहुत अच्छा बन गया और भरोसा भी हो गया।
जब वे सेवानिवृत्त हो रहे थे तब अपने भाषण मे पदभार लेने वाले समकच्छ को बताते हुए बोले आप आ रहे हैं नए विभाग में लेकिन आप को मैं मोहन जी को आपके साथ छोड़कर जा रहे हैं किसी भी समस्या का यह समाधान करने में कामयाब होगा ऐसा मेरा विश्वास है सचमुच अंगूठी का नगीना यानि इस विभाग का अनोखा व्यक्ति है इसे समय-समय पर पुरस्कार देते रहे यह लड़का भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है। जो कुछ भी है सेल्फमेड है।
नए विभागाध्यक्ष के साथ मोहन का भी उसी प्रकार का संबंध रहा जिस प्रकार पुराने लोग के साथ था। जब मोहन जी का सेवानिवृत्त का समय आया विभागाध्यक्ष
अपने भाषण में यह बोलकर संबोधन किए आज विभाग का नगीना अपने जीवन के दूसरी पारी मैं जा रहे हैं उनका स्वस्थ जीवन का कामना करते हैं। विभाग नगीना विहीन हो रहा है विभाग में दूसरा व्यक्तित्व को खोजना है मोहन जी जैसे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व जैसा। धन्यवाद।
उसके बाद जलपान की व्यवस्था की गई
उसकी भी देख रहे अंतिम समय में मोहन जी ही किए थे।
मोहन जी आपने विचार प्रकट किए मैं इस विभाग में छोटे पद पर आकर अपने कार्य कुशलता से यहां तक आए सभी बड़े अधिकारी के नजरों में मोहन जी अश्रु भरते हुए बोले आप लोग के बीच से जा रहा हूं कोई भी गलती हो उसे माफ कर देना। बड़ों को प्रणाम छोटे को आशीष।

विजयेन्द्र मोहन।



* अग्नि शिखा काव्य मंच *
     २०/७/२०२१ मंगलवार
     विषय - अंगूठी मे नगीना  

आज मै जिनका पावन स्मरण कर रही हूँ वो है मेरे बाबोसा स्वर्गीय चन्दन प्रकाश जी कोठारी ।महान शिक्षा विद् ,ओजस्वी वक्ता जात पात ,रूढी वाद के घोर विरोधी ओजस्वी व्यक्तितव के धनी थे ।
उनके जीवन की एक घटना साझा कर रही हूँ । बात 1960 के दशक की है। शरदारहर मे घनघोर बारिश हुई ।हमारे घर के सामने बिजली का खंभा था । दुर्भाग्य वश एक 15 बर्षिय किशोर करंट की चपेट में आ ।वो छुआ छुत का जमाना था ।कोई शव ढोने को तैयार नहीं था ।उस समय शव वाहिनी भी नही थी।अदम्य साहस के धनी बाबोसा को ये बात सहन नहीं हुई ।उनका पोरूष जाग उठा ?
उन्होंने उस किशोर के शव को अपने कंघे पर लादा ओर हरिजन बस्ती की तरफ चल दिये।ऐसा देख सैकड़ो लोगों का काफिला उनके पीछे चल पङा 
ओर उस किशोर का शव उसके घर वालों को सोंपा ?
उनपर गांधीजी के विचारों का बङा प्रभाव था ।वे जाति भेद ,छुआ छुत आदि बातें नहीं मानते थे !
वैष्णव भजन तो तैने कहिये 
जे पीर पराई जाने रे । उनके उच्च विचार और जीवन मूल्यों के प्रति उनका सर्मपण उन्हें आम से खास बनाता था ! वो हमारे परिवार की अंगूठी में जड़े नगीने की तरह थे !
आदरणीय बड़े पापा हमेशा हमारे प्रेरणा श्रोत ओर आर्दश रहेंगे ! मुझे 
सात्विक र्गवॆ की अनुभूति होती है कि मैं उनकी बेटी हूँ ! हमारे पूरे परिवार पर 
बाबोसा के दिये संस्कारों की छाप दिखती है ! 

सरोज दुगड़
खारुपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏




लघुकथा**अंगूठी का नगीना
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कहने को तो अमृतलाल जी कस्बे की एक प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर थे परंतु उनका मृदुल व्यवहार, शिष्टता, जीव दया का भाव, प्रकृति से प्रेम, हर जरूरत मंद की सहायता के लिए सदैव तत्पर और उनके धार्मिक विचारों के कारण सभी छोटे बड़े उनका सम्मान करते थे।
    आज अमृतलाल जी ने अपनी तीस वर्ष की सरकारी नौकरी की सेवानिवृति के अवसर पर सबको अपने यहां रात्रिभोज पर निमंत्रित किया था।भोज के समय उनके सम्मान की सारी औपचारिकता पूर्ण होने के बाद उनहोने सभी मेहमानों को भोजन करने का अनुरोध किया।अमृतलाल जी स्वयं सबके पास जा जा कर कुछ और लेने की मनुहार करते रहे।
     मेहमानों को विदा करके जब वह वापस आये तो डस्टबिन में इतनी अधिक मात्रा में जूठन देख कर अन्न की बर्बादी पर उन्हें बड़ा दुख हुआ।
    बस उनके मस्तिष्क में एक विचार आया और उन्होंने कुछ बिंदुवत संदेश कागज पर लिखे---/
*थाली में जूठन छोड़ना महापाप है।
*थाली में उतना ही लें जितनी आवश्यकता हो।
*आवश्यकता होने पर बाद में लिया जा सकता है।
*आपके द्वारा अन्न की बचत अन्य भूखे लोगों की क्षुधा पूर्ती कर सकती है जो आपके हाथों किया गया एक पुण्य का काम होगा।
अंत में उन्होंने लिखा आपसे अनुरोध है कि इस पुनीत कार्य में सहभागी बन कर पुण्य लाभ लें।
    अब जहां कहीं भोज का आयोजन होता अमृतलाल जी शामियाने के बाहर बैठ जाते और हर आगंतुक को पत्रक हाथ में देते।
   .. अन्न की बर्बादी रोकने की युक्ति की उनकी इस पहले से उनका सम्मान और भी बढ़ गया और वे सच्चे अर्थों में अंगूठी का नगीना 
           ^^^^^^^^^^^^^^
साबित हुए।
स्वरचित लघुकथा***
          लीला कृपलानी






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