Monday, 19 July 2021

अखिल भारती अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज पढ़िए बालगी गिल्ली डंडा के सभी रचनाकारों की रचनाएं डॉ अलका पांडे




Agnishikha manch 
19/7/ 2021

शीर्षक_गिल्ली डंडा(बाल गीत)

गिल्ली डंडा खेले आओ 
स्कूल की छुट्टी खूब मनाओं !!
गिल्ली डंडा हम को संयम सिखलाता है !
लक्ष्य को पाना बतलाता है !!
लकड़ी का यह गिल्ली डंडा 
गांव का है खेल निराला 
बच्चों को बहुत लुभाता 

ध्यान लगा कर चोट करो 
गिल्ली उछल के जायेगी दूर 
सोहन मोहन पकड़ न पायें 
हाथ से उनके छूट के भागी दूर 
तकते रह गये दोनों बेचारे 
गिल्ली झूले पेंड पर 
दौड़ पड़े सब उसे लपकने 
डंडा जिसके हाथ में 
गिल्ली उसके साथ में 
कभी न रह पाती !!
मैदान के हर चप्पे चप्पे से परिचित है , 
हरि हरि घास में वह छिप जाये फिर किसी के हाथ न आये ..!!
चून्नू  आ कर करता टंटा 
मिल कर सब सिखाते उसे मज़ा 
अम्मा सबको देती हुड़की  
बंद करो यह गिल्ली डंडा 
पढ़ने बैठो याद करो पाठ
काम न आयेंगा गिल्ली डंडा 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई




अग्निशिखा मंच
तिथि १९-७-२०२१
विषय- बाल गीत- गिल्ली डंडा

बढ़ई चाचा,बढ़ई चाचा गिल्ली एक बना दो.
डंडा तो है पास मेरे,बस उसे चिकना कर दो.
चुन्नू मुन्नू नीटू बबलू.सब के सब जल्दी आओ.
हम खेलेंगे गिल्ली डंडा .मैं मारुंगा गिल्ली को.
तुम सब कदम से दूरी गिनना.जिसकी गिल्ली दूर उछले,जीता वही समझना.
मार मार के गिल्ली कहां से कहां पहुंच जाऊं.
तुम सब मेरे पीछे आओ.जहां जहां मैं जाऊं.
गिल्ली डंडा में जीता ना कोई भी मुझसे.
गिल्ली डंडा हाथ जो आये,सब दौड़ते मेरे पीछे.

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र



मंच को नमन
विधा:-- बाल कविता
विषय:-- *गिल्ली- डंडा*

आज रविवार है,
स्कूल बंद है
दादू के संग चलो
रामू श्यामू मोहन,
खाड़ी में दादू बोले हैं
पेड़ से डंडा तोड़कर
गिल्ली- डंडा बना दूंगा
चलो भाई चलो भाई।
खाड़ी में गिल्ली -डंडा खेलने
गिल्ली डंडा हमको आदर्श सिखाता है।
जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने का
साथ साथ रहने का,
बड़े बुजुर्गों को आदर करने का
गांव का खेल है बचपन से सीखो
बच्चों बूढ़े को यह खूब लुभाता है।
दादु संग हम लोग हैं
मम्मी पापा कुछ ना बोलेंगे 
चलो भाई चलो भाई
देर न करो।
दादू बोले दस बजे लौट 
के आ जाएंगे पॉकेट में 
गुड-चूडा रख लेना मैं भी
रख लिया हूं चलो भाई चलो।
खेलेंगे गिल्ली डंडा।

विजयेन्द्र मोहन।



वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन, 
विषय **गुल्ली डंडा **बाल कविता 
खेल रहा मूर्त रूप 
भारत अब भी गाँव में 
जहाँ सुनाई देती 
बच्चों की किलकारी
अब भी गाँव में 
एक दूजे को बुलाते
आओ भोला, आओ
रघु और पंडा 
ले आओ अपना
गुल्ली डंडा 
अपने मैदान में 
आओ पहले एसा
नियम बनाए
मैदान को स्वच्छ बनाए
व्यर्थ खर्चे करते नहीँ हम
नहीँ जंरूरत हमें 
मंहगे सामान की 
नहीँ बैट की बाॅल की
नेट की क्रिकेट की
बस एक डंडा  
तुम ले आना 
उसमें से काट कर
गुल्ली बनाएंगे
खूब खेलेंगे खिलाएंगे
बच्चों में न रहा
ऊँच नीच जाति का भेद
लड़ते झगड़ते भी
खेले खेल
फिर आपस में 
हिलमिल जाते
गुल्ली-डंडा मे
एक दूसरे को 
खूब दौड़ाते
कैरम लूडो विडियो 
हैं मंहगे खेल
बैठे बैठै सुस्ती छा जाती
तोन्द निकल आती
सबसे अच्छा कसरत
करवाने वाला यह खेल
आओ रघु आओं  
भोला और पन्डा
खेले हम गुल्ली डंडा ।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।



कहता कोई जवाब 
ऊपर जाके देना पड़ता है..

हम कहते भग्वान 
सच हिसाब यहीं है लेता..

इंसान सोचता आज 
भी वो सत्य है और
सत युग मे रहता...

ये त्रैतायुग हे यारों 
भग्वान यही सजा दे
दिला है कहता।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************



*अग्नि शिखा काव्य मंच *
      १९/७/२०२१ सोमवार 
          विधा - लघुकथा 
            गिल्ली डंडा
 
   बच्चों का सबसे प्रिय खेल ,
   गिल्ली डंडे का सुंदर मेल !
  बागो मैदानों मे मचा है शोर ,
  कान्हा की गिल्ली का जोर !
  गोपी की फूटी गई मटकी ,
  पनघट पर में मच गया शोर !
 कंदम्ब डाल पे कान्हा मुस्काए,
 गोपिकाएं अपना भाग्य सराहे ,
जब जब खेतों में पकती फसलें!
कृषक पंछियों पर गुलेल चलाते ,
हुर्रे- हुर्रे की हाँक की हांँक लगाकर!
खेतों से पंछियों को उड़ा भगाऐ ,
बिल्लू के मन को गिल्ली डंडा भाए 
खाती बाबा मेरी गिल्ली बनादो !
मुझको निशाना लगाना सीखा दो !!
    
सरोज दुगड़
खारूपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏



19/7/21

नमन पटल
आज का विषय- गिल्ली डंडा

गाँव आज भी है प्रकृति की खान,
नहीं दिखावा न कोई अभिमान।
सब मिल आपस मे प्रेम से रहते,
उठते बैठते संग औ खेलते कूदते।
गिल्ली डंडा पकड़म पकड़ाई,
बच्चों के ये प्रिय खेल है भाई।
कुछ बच्चे हो गए जमा,
बन गया वहाँ खेल का शमा।
कुछ गुल्ली डंडा लेकर आये,
खेल खेल में धाक जमाये।
गुल्ली जिसकी जितनी दूर गई,
जीत उसकी उतनी ही पक्की हुई।
भाग भाग कर बच्चे जाते,
झट गुल्ली को ढूंढ कर लाते।
गुल्ली डंडे का मेल न भाई,
डंडा देता उसे दूर उड़ाई।
बच्चे जोर जोर चिल्लाते,
झगड़ा, टंटा भी फैलाते।
मेरा छोटा भाई प्यारा,
गुल्ली डंडा खेले न्यारा।
लाख जतन कर के थक जाये,
कोई उसे हरा नहीं पाए।
गुल्ली वह इतनी दूर उछालता,
जल्दी कोई पकड़ न पाता।
कहते उसे सब गुल्ली मास्टर,
वैसे वह है हर खेल में फास्टर।

स्नेहलता पाण्डेय'स्नेह'


गिल्ली डंडा

गिल्ली डंडा गांव का खेल निराला,
 बचपन में खेला करते थे,
 ऊंची- नीच का भेद न था,
 नहीं किसी से डरते थे ।

नैतिकता का पाठ पढ़ाता,
 एकता के बंधन में बांधता,
भाईचारा इससे आता,
 मिलकर रहना यह सीखना ।

पेड़ की टहनी तोड़ कर लाते ,
उसे छीलकर नुकीला बनाते ,
जमीन पर रखकर उछालते,
 डंडे की सहायता से दूर मारते।

 जो दौड़कर पकड़ लेते,
  वह जीत जाते था,
 जो नहीं पकड़ पाते,
वह दाम देते जातेथा ।

सबका मनपसंद खेल था,
बिना खर्च के खेला जाता है
 बचपन की यादें ताजा हो गई,
 गिल्ली -डंडा सबको भाता था।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी इंदौर



अ. भा. अग्निशिखा मंच
19/ सोमवार 2021
 विषय - गिल्ली डंडा (बाल गीत )
चौपाई

गिल्ली डंडा प्यारा प्यारा।
सब खेलों से न्यारा न्यारा।
गिल्ली डंडा मिलकर खेलें।
बेसबॉल का मज़ा भी लेलें।।

घर के आगे टेर लगाओ।
मेरे साथी आ भी आओ।
छोटा लम्बा गड्ढा करते।
उस पर छोटी गिल्ली रखते।।

गिल्ली डंडे से हिट करते।
गति चोट से इसमें भरते
उड़ती गिल्ली दूर है जाती।
दादा जी को बड़ा सताती।

बच्चे चारों ओर फुदकते।
मिले जो डंडा तो उचकते।
बड़ा लुभावना खेल होता।
हारा शैल बड़ा ही रोता।

डंडे से गिल्ली उचकाते।
बड़ी ज़ोर से एक जमाते।
गिल्ली को सब हैं लपकते।
साथी हारे तभी झपटते।।

हाथ से गिल्ली लपक लाता।
तब खिलाड़ी हार है जाता।
फिर दूजे की आती बारी।
तीन बार ये रहती जारी।।

गिल्ली डंडा पर्व मनाना।
कंचे को भूल नहीं जाना।
हँसते हुए चौकड़ी भरना।
इस खेल पर गर्व है करना।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर



गिल्ली डंडा,

बचपन का खेल है हर किसी से मेल है पक्का देसी मस्ती भरा,
है बिल्कुल खरा खरा

डंडे से गिल्ली को मारा ,
बहुत दूर तक इसे उछाला,
भाग भाग कर गिल्ली लाते,
एक दूजे पर दाम चढ़ाते

मुन्नू आओ चुन्नू आओ गिल्ली डंडा हमें खिलाओ,
मोहल्ले के वासी हैं हम सब भारतवासी हैं।

गिल्ली डंडा न्यारा न्यारा हम सबका है प्यारा प्यारा ,
भेदभाव को यह मिटा दे हम सबको भाईचारा सिखा दे🎉🎉🎉🎉🎉

स्वरचित रचना सुषमा शुक्ला इंदौर


।गिल्ली डंडा। (बाल गीत) 
गिल्ली डंडा का खेल,
बच्चों को बहुत प्यारा है।
बचपन के इस खेल ने, 
पुरानी यादों को संवारा है।।
गिल्ली डंडा................. 1 
हींग लगे न लगे फिटकरी,
रंग चोखा का खेल सारा है।
गिल्ली डंडा मिल जाती,
मजा बहुत आता प्यारा है।।
गिल्ली डंडा................ 2 
इस खेल की महिमा देखो, 
कही भी खेलो यह प्यारा है। 
जिसकी गिल्ली दूर है जाती, 
जीत का सेहरा मिले सारा है।। 
गिल्ली डंडा.................3 
यह संसार है खेल की भांति, 
बचपन में यह खेल प्यारा है। 
पुराने दोस्त सब याद आते, 
गिल्ली डंडा खेले प्यारा है।। 
गिल्ली डंडा.................. 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
19-07-2021


गिल्ली_डंडा
अ. भा. अग्निशिखा मंच
विषय_गिल्ली_डंडा
विधा_बालगीत।
आओ बच्चों इक खेल सिखाऊं,
गिल्ली _डंडा की मौज बताऊं।गिल्ली _डंडा का खेल था था वो,
दोस्तों के दिलों का मेल था वो।
इसमें एक लकड़ी की 
गिल्ली होती थी,
वो बीच में मोटी और,
दोनों छोर नुकीली होती थी।
एक होता था डंडा छोटा,
कभी पतला_सा,कभी मोटा।
जमीन में पतली सी गुल्लक खोदते,
उसपे गिल्ली रख डंडे से उछालते
चोट मारते लगा जोर,
यारों का मच जाता शोर।
दोस्त पकड़ने की कोशिश करते,
पकड़ी जाती तो आऊट हो जाते,
वरना गिल्ली पर चोट मारते,
गिल्ली उड़कर जाती दूर,
ऐसे तीन चोट के मौके मिलते,
गिल्ली पीटने को मजबूर।
फिर उस दूरी से गुल्लक तक,
डंडे फिर नापे जाते,
जिसके नाप में डंडे ज्यादा,
वो ही विजेता कहलाते।
बच्चों, ये खेल था बहुत पुराना,
खेले इसको हम,हमारे दादा_नाना
अब नई पीढ़ी गई इसे भूल,
न समझे इसकी यारी प्रेम का मूल
गिल्ली डंडा का अटूट साथ,
मिला के रहते हाथ से हाथ।
ये यादें हमारे प्यारे बचपन की,
खो गईं उम्र आते पछपन की।
आनंद इसका बड़ा निराला था,
खेलो तो जानो,कितना आला था।
कोई न मिले तो 
मेरे पास आ जाना,
गिल्ली_डंडा खेलने का,
खुली हवा में आनंद उठा जाना।।
स्वरचित मौलिक रचना_
रानी अग्रवाल,मुंबई,१९_७_२१.



गिल्ली डंडा ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
(बाल गीत) 
लकड़ी की गिल्ली 
लकड़ी का डंडा
चलो आज खेलें गिल्ली डंडा
रामू श्यामू बंटी बबलू
साथ में ले लो राधा मीरा को
गोलू तुम आओ मेरे साथ
आओ सब लोग चलें
खेलने आज गुल्ली डंडा..... 1
आम की बगियाँ में
तोड़े छोटा डंडा
मांग लो गिल्ली श्यामू के घर से
मैं रामू गोलू व राधा एक तरफ
श्यामू बंटी बबलू व मीरा 
तुम सब हो दूसरे गोल में
आओ सब लोग चलें
खेलने आज गुल्ली डंडा......... 2
पहली पारी मेरी होगी
राधा बोली सबसे पहले
नहीं आज खेलेगा गोलू पहले 
सबसे छोटा हममें है वो
एक एक कर खेलेंगे हम
जी भर कर के खेलेंगे हम
आओ सब लोग चलें
खेलने आज गुल्ली डंडा......... 3
बिन पैसे का खेल है ये
सदियों से खेला जाता है
न कोई जरूरत मैदान की
न कोई रेफरी ही होता
जब तक चाहो जी भर खेलो
जब चाहो बन्द कर दो
थोड़ी बहुत चोट भी लगती
पर बहुत मजा आता है इसमें
आओ सब लोग चलें
खेलने आज गुल्ली डंडा........... 4
(यह मेरी मौलिक रचना है..... ओमप्रकाश पाण्डेय)




बाल गीत 

गिल्ली डंडा
***********
बचपन की उन गलियों में ,
हम गिल्ली डंडे खेले थे।
जाति जो गिल्ली थी लग तो,
 लोगों की मार भी झेले थे।

धमाचौकड़ी करके हम ,
घंटों वहांँ बिताते थे।
 गिल्ली डंडा खेल-खेल के ,
थक कभी न पाते थे।

घर से बाहर रखते कदम,
यारों संग मौज मनाते थे।
खेल के गिल्ली डंडा हम,
 अक्सर खुश हो जाते थे।

बड़ा अनोखा खेल था यारों,
जिन संग हम बचपन बिताते थे।
हरा के एक-दूजे को अक्सर,
 हम भी खुश हो जाते थे।

आज भी जब हम साथी-संगी ,
उन बातों को दोहराते हैं।
मानव पंख लगा के हम ,
उस दुनिया में हो आते हैं।।

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल ☯️



अग्नि शिखा मंच
  १९/७/२०२१
  जय माँ शारदे
बिषय गुल्ली डंडा़
           बाल गीत

बचपन का खेल है प्यारा ।
गुल्ली डंडा जग से न्यारा।
मेरी गुल्ली चिकनी चमेली।
लगती है सुन्दर. अलबेली।
हम को जीत दिलाती है।
दूर दूर उड़ जाती है।
डंडे का साथ निभाती है।
डंडा मेरा गजब सजीला।
लेके उसको मै बहुत गर्वीला।
मुझको जीत दिलाता है
साथियों को बहुत दौडाता है
यही गाँव का अपना खेल।
करता सब बच्चों से मेल।
स्वरचित
     बृजकिशोरी त्रिपाठी
    .गोरखपुर, यू.पी


अग्नि शिखा मंच को नमन🙏
आज का विषय है**
बाल गीत---गिल्ली डंडा
आओ!बच्चों आज खेलें हम
गिल्ली डंडे का इक खेल
खेल खेल में हो जाता देखो
आपस में सबका मेल।
खेल में होती धमाचौकड़ी
पर आनंद बहुत ही आता है।
ताली बजा बजा सब हंसते
मन सबका हर्षाता है।
लकड़ी का डंडाजब सोनू
गिल्ली पर मारने है जाता
गिल्ली उछल दूर जा गिरती
मजा बहुत ही आता है।
बड़ा अनोखा खेल है बच्चों
खेलते रहना इसे सदा
खर्च नहीं कुछ करना तुम्हें है
जी भर हंसते रहना सदा।
स्वरचित***
      लीला कृपलानी



19 जुलाई 2921, सोमवार
आज की विधा – बाल कविता
विषय: गिल्ली डंडा

गिल्ली डंडा खेल निराला
होता सब खेलों से आला।

गिल्ली डंडा खेल है ऐसा
कुछ कुछ बेस बॉल के जैसा

एक गिल्ली एक डंडा लाओ
धरती पर एक गुच्च बनाओ

गुच्च पर तिरछी गुल्ली रख लो
डंडा से उसे दूर उछालो।

सब प्लेयर उसको रोकेंगे
डंडे वाले पर फेंकेंगे।

फिर वह डंडे से रोकेगा
डंडा मरेगा फेंकेगा।

कोई पदता कोई पदाए
खेल अगाड़ी बढ़ता जाए।

अम्मा जब आवाज लगाए
तब सब घर घर लौट के आए।

गुल्ली डंडा खेल पुराना
तुम भी जानो हमने जाना।

जो जो शहर गांव से आए
सब ही खेले और खिलाए।

इतने खेल आ गए अब तो
भूल चुके सब कोई इसको।

खेले सब मिल मस्त कलंदर
खेल बनाते स्वस्थ औ’ सुंदर
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता



गिल्ली डंडा
---------------
 वाह! बचपन के
 सब खेल निराले
 उस पर यह गिल्ली डंडा
 याद आ गया वह
 बचपन पुराना।
 मारो डंडे से गिल्ली
 उछलती जाती है 
 उसके पीछे हम 
सारे खिलाड़ी 
चलते रहते थे।
 दीदी भैया संगीसाथी
 दिनभर लिए फिरते थे
 हाथ में अपने गिल्ली डंडा
  ना धूप की चिंता ना खाने की।
 मम्मी जब भी गुस्सा होती 
है उसी डंडे से हमको धोती
 आज वह दिन याद करके
  बचपन आ गया आंखों में
 सभी यार दोस्तों को
 फोन मिलाया, बातें हुई 
 खूब गपशप हुई,
 इस गिल्ली डंडा ने
 वापस हम सबको
 फिर जोड़ दिया 
इस महामारी में भी
 याद किया हम सब ने
 खूब मस्ती हुई
 गिल्ली डंडा खेल 
धन्यवाद 
अंशु तिवारी पटना।



सोमवार दिनांक**** १९/७/२१
विधा"""""""""बालगीत
विषय""""#***गिल्ली डंडा***#
                     ^^^^^^^^

आओ बच्चों हम खेलेंगे गिल्ली डंडा ।
ग्यारह खिलाड़ी वाला क्रिकेटका फंडा ।।
बल्लेबाज़ तो होगा तभी बाद सुनो ।
पकड़ेंगे गिल्ली या उखड़ेगा जब डंडा ।।१

आज का क्रिकेट ही है खेल गिल्ली डंडा ।
चला क्रिकेट जो़रसे तो रुका गिल्ली डंडा ।।
फिरंगों ने बनाया गिल्ली डंडेको क्रिकेट ।
गरीब बच्चे आज भी खेलते गिली डंडा ।।२

ए टीम का बनेगा बबलू ही कप्तान ।
और बी टीम का होगा कप्तान सुल्तान ।।
टॉस जीता बबलूने करेंगा बल्लेबाजी़ ।
फील्डींग सजाएगा भी टीम का सुल्तान ।।३

है बड़ाई सस्ता खेल ये गिल्ली डंडा ।
खुले मैदान में खेलते सब गिल्ली डंडा ।।
गिल्लीके पीछे भागते हैं सब खिलाड़ी ।
मंषा क्रिकेटकी करें पूरी गिल्ली डंडा ।।४

दिनभर खेलेंगे आज स्कूल बंद है ।
गिल्ली डंडे के खेल में आता आनंद है ।।
भारतीय खेल का मजा ही कुछ और है ।
कभी मेल मिलाप कभी खिटफिट द्वंद है ।।५



प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर




$$ गुल्ली डंडा $$

 गुल्ली डंडा नाम सुनकर मन हर्षाया 
जा पंहुचा मन बचपन मे 
दोस्त जमा होते थे सारे लेकर डंडा एक और गुल्ली चार 
लकड़ी पेड़ से लेते तोड़
बढ़ई काका घिसघिसकर 
करते नुकीली दोनों ओर 
दाम कभी न लेते हमसे 
कहते मत लगाना चोट 
सुबह सुबह जब खेलोगे तो
कसरत रोज हो जाएगी 
सेहत रहेगी अच्छी 
पढ़ने मे मन लग जायेगा 
गुरूजी से मिलेगा आशीर्वाद 
बराबर की टीम बांटना
मत करना तुम झगड़ा 
नियम का पालन करके तुम 
नाम ऊंचा करना कुल का 
काका की बात बैठ गई मन मे
करते आज भी पालन
सब काम करते नियम से 
करते पालन संयम 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान




अग्निशिखा मंच
19/7/2021सोमवार
विषय-गिल्ली डंडा

छोड़ के दुनियाँ के झमेले,
आओ हम गिल्ली डंडा खेल।

आपस में तुम लड़ो-झगड़ो
दौड़ो जल्दी गिल्ली पकड़ो,
बहे चाहे पसीने के रेले
आओ हम गिल्ली डंडा खेले।

डंडे से मैं गिल्ली को मारु
जीतू सदा मैंकभी न हारू,
रामू-श्यामू मैदान में फैले
आओ हम गिल्ली डंडा खेले।

चारों तरफ़ जो देखे-भाले
डंडा मार के गिल्ली उछाले,
जीते वही जो मुसीबत झेले
आओ हम गिल्ली डंडा खेले।

स्कूल की कब छुट्टियां होगी
बच्चों की फिर टोली होगी,
लगेंगे फिर खुशियों के मेले
आओ हम गिल्ली डंडा खेले।

गिल्ली डंडा भूल गये सब
कब खेला था याद नहीं अब,
खेला करते थे हम पहले
आओ हम गिल्ली डंडा खेले।
                          तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)



अग्निशिखा मंच
 विषय---गिल्ली डंडा(बाल गीत)
 विधा---कविता 
दिनांक---19 7-2021

 कोरोना में हुए बंद घरों में बच्चों के चेहरे कुम्हलाये 
 पर अब जब सब ठीक हुआ तो चाहे कहीं बाहर जाएं । कहें वह अपने पापा से चलो बाहर कहीं ले चलो
 खुला मैदान हो जहाँ फिर साथ हमारे कोई खेल खेलो पापा भी सोचे मोबाइल पर इनका दिन बीते 
करें पढ़ाई इस पर ही फिर टीवी से रहें चिपके 
फिर कुछ सोचा और कहा......
सोनू मोनू हो जाओ तैयार चलते हैं आज खुले मैदान तुमको मैं एक खेल से सिखाऊँ अपने बचपन का ।
कभी नाम सुना ना, इर्द-गिर्द तुम्हारे हैं टीवी, मोबाइल
खुश हो बच्चे चले पापा के संग देखें नया रंग खेल का। ऐसा कौन सा खेल है जो हमें पापा दिखलाएंगे
ऐसा कौन सा खेल है जो पापा सिखलाएंगे।
 पकड़ा, डंडा गिल्ली पापा ने और कहा ज़ोर लगाओ गिल्ली के कोने पर मार डंडा इसको बहुत दूर भगाओ । जितनी दूर जाएगी गिल्ली उतना ही मन भाएगी
 जो मार सके ना तुम तो फिर हार तुम्हारी हो जाएगी । सोनू मोनू बारी-बारी गिल्ली पर ज़ोर लगाते 
 जितनी ताकत है उनमें इतनी दूर गिल्ली पहुंचाते ।
 नया खेल पापा संग खेल बच्चे हैं खुश हो जाते 
 और कहे 'रानी' चेहरे उनके फूलों से खिल जाते ।

         रानी नारंग






नमन मंच 
गुली डंडा 


आज बर्षो बाद याद आई ,
बचपन की वो कहानी ,
खेलते थे हम गुली डंडा , 
और करते थे शैतानी ,
छिप छिप का चलाते गुली डंडा ,
फोड़ देते किसी का मटका , 
और किसी अंडा ,
रामु ,श्यामु सीता गीता , 
सब मिल खेल रचाते ,
हसीं .ठिठोली संग भरपूर मजा उठाते,
 थे ये खेल बड़ा निराला ,
सबके मन को हर्षाता 
अमीर ,गरीब का भेद मिटाता ,
जो चाहे मौज उड़ाता ,
बिन पैसो के ये बन जाता ,
कसरत भी ये खूब करवाता ,
छोटे हो या बड़े ,
खेल यह सबको भाता ,
खेल ये सबको भाता 

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड




विषय गिल्ली डंडा

कितना प्यारा था बचपन
जब गुल्ली डंडा खेला करते
करते इकट्ठा दोस्तों को
मौज मस्ती पूरी करते ।

उचकाते गुल्ली दूर बहुत
भगा भगा कर खुश होते
न खर्च न मेहनत दिमागी
आपसी भेद भी न करते ।।

प्यारे से इस खेल में
मौज मस्ती हुआ करती
धूसर धूल भरे रहकर
खुशनुमा जिंदगी कटती।।

कल्पनाओं में आज भी
तस्वीरें मित्रों की दिखती
 खो जाते बाल जीवन में
अनोखी बातें मन मस्ती।
पदमा तिवारी दमोह मध्य प्रदेश
सर्वाधिक असुरक्षित यह रचना मौलिक और स्वरचित है



जय मां शारदे
***********
 अग्निशिखा मंच
 दिन -सोमवार
 दिनांक -19/7/2021 बाल गीत
प्रदत्त विषय- 
*गिल्ली डंडा*

घर के बाहर बैठे लाला बच्चों को चिल्लाते। 
परेशान हैं बच्चे सारे खुलकर खेल ना पाते। 
गिल्ली डंडा खेल है ऐसा, अंदर ना खेला जाता। 
खुला मैदान हो या हो बड़ा अहाता ।
एक दिन खेलने चल दिए चुन्नू मुन्नू पंडा। 
हंस-हंसकर के खेल रहे थे मिलकर गिल्ली डंडा। 
लाला जी बाहर बैठे थे खेल रहे थे बच्चे ।
सीधे साधे भोले भाले मन के सारे सच्चे। 
डंडा पड़ा गिल्ली पर उछल के वो भग गई। 
बैठे थे लाला उनके सिर में जा लग गई। 
गोल-गोल देखकर गुंबा बच्चे ताली बजाएं।
चिल्लाता है लाला और उसमें दवा लगाएं ।
तब से लाला का गुस्सा हो गया बिल्कुल ठंडा। 
भूलकर भी ना बाहर आता जब बच्चे खेले गिल्ली डंडा ।
 
रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश




गिल्ली डंडा

एक जमाना था
शहर हो या गांव
घर के आंगन हो 
या आगे का मैदान
सड़क हो या गली

शाम का समय
बच्चों से मिलना है
गिल्ली डंडा से खेलते मिलो
ना पैसे का है खर्च
ना किसी कोच की है जरूरत
बच्चे सब मिलजुल खेलें
गिल्ली डंडा का लाजवाब खेल

सही मायने में क्रिकेट का
यह बचपना अवस्था है
गिल्ली में है बौल या गेंद
डंडा बन गया है विकेट और बैट

हाथों और आंखों के बीच समानांतर संतुलन बन गया
खेल का मिल गया आनंद
खेल के माध्यम से सीखा समाजीकरण हारने और रोने पर नियंत्रण जीतने पर खुशियां
खेलने सिखाया हार जीत का नियम अनुभव से परिचय कराया


कुमकुम वेद सेन




नमन मंच अग्नि शिखा 
दिनांक -१९-७-२०२१
विषय -बाल गीत 
गाँव गलियन में शोर मची है
गिल्ली डंडा संग गोलू मोलू 
गिल्ली उछाल कर खेल रहे है 
शोर मचाती आई दादी नानी है 

पनघट से लौट रही सखियाँ है 
गिल्ली उछल मटकी पर लगी है 
गोलू मोलू संग होड़ लगी है 
किशन कन्हाई बन तोड़ी मटकी है 

डंडा ले भाग आई माई है 
हुई गोलू मोलू की ज़ोर पिटाई 
मोलू कहता गिल्ली मेरे पास है 
दे दो माई डंडा नही फोड़ेंगे हम 

बग़िया के मैदानी में खेलेंगे 
गिल्ली डंडा मटकी नही फोड़ेंगे  
किस्सु ,बल्लु संग खेलेंगे 
हमारी प्यारी यशोदा माई है 
अनिता शरद झा



नमन अग्निशिखा मंच 
दिनाँक;-19/7/2021
विषय;-गिल्ली डंडा
🌹गिल्ली डंडा🌹
आओ खेलें गिल्ली डंडा 
प्यारा लगता इसका फंडा।
लगता इसमें कोई न दाम।
खेले सारे खासो आम।।
जब ऊंची फिक जाये गिल्ली
मन हो जाता बल्ले बल्ले।
खेल खेल के गिल्ली डंडा
हो जाता है तन मन चंगा।
हम सबको अच्छा लगता है
साथ खेलना गिल्ली डंडा
सोनू मोनू नीटू आओ
आओ कोई जुगत जमाओ
लॉक बंदी को दूर हटाओ
कोई तो तरकीब लगाओ
फिर खेलें हम गिल्ली डंडा।।
 निहारिका झा🌹🌹🙏🏼🙏🏼


डॉ शैलेश वाराणसी 94 50 18 6712
आदरणीय मंच को नमन लेखन विषय गुल्ली डंडा
++++++++++++
ग्रामीण परिवेश में जब हम छोटे-छोटे थे, बिना पैसे का हम बच्चों को बहुत अधिक आनंद देने वाला खेल यदि कोई था वह था गुल्ली डंडा।
हम लोग प्राइमरी पाठशाला में पढ़ते थे। घर से चले जाते थे। अगर बस्ते में गेंद रखते तो मास्टर साहब को पता चल जाता और वह हम लोग का स्वागत हरि हरि बांस की छड़ी से करते थे ।इससे अच्छा था कोई भी सामान खेल का अपने साथ ना रखा जाए ।शाम छुट्टी होते ही 5:00 बजे शंभू आम के पेड़ पर चढ़ जाता वहां से एक छोटा शैतानी डंडा के रूप में काट लेता ।उसी में से थोड़ा हिस्सा काटकर गुल्ली बना ली जाती थी। अब हम लोगों का खेल शुरू हो जाता था। जो भी 8--10 लड़के होते थे। आपस की मेल मिलाप वाले 5:00 बजे से लेकर जब तक सूरज ना डूब जाए ।एक दूसरे के सहयोग करते हुए या खेल खेलते थे ।हारने वाली लड़के को। अंत में सारे लोग मिलकर के यह चोर है --चोरहै कहकर चिढ़ाते थे। वह मुंह लटकाए, अपने पीठ पर बसता लिए, घर को चला जाता था ।बाद में हम लोगों ने इस नियम को संशोधन किया। उसको सभी को एक-एक टाफी देनी होती थी। अधिक नहीं ,तब एक टॉफी एक पैसे की मिलती थी और 10 से 15 पैसे में काम चल जाता था।
मुंशी प्रेमचंद ने भी अपनी पुस्तक में एक कहानी में गुल्ली डंडा का उल्लेख किया है ।जहां अधिकारी बनने के बाद भी जब सेवानिवृत्त होकर एक ठाकुर का लड़का आता है ।अपने पुराने दोस्त जो किसी निम्न जाति का होता है ।उसके साथ गुल्ली डंडा खेलता है और अपने बचपन को यादों को तरा जा तरु ता जा कर लेता है। ऐसा ही सुंदर खेल। हमारे भारतीय जीवन में है जो हार जीत के बाद भी परस्पर प्रेम को टूटने नहीं देता और बिना किसी व्यय के अधिक से अधिक आनंद देता है, खेलने में।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी🙏🙏🏵️🏵️🏵️




💐💐 गिल्ली डंडा 

आओ सुनाएं तुम्हें 
बचपन की कहानी
 हम अपने भाइयों के साथ
 खेलते थे गिल्ली डंडा 
छोटी सी गिल्ली
10 गुना डंडा 
 छोटा सा बनाया गड्ढा 
उसमें रखी गिल्ली और डंडे से मारी ठोल
 गिल्ली उड़ी दूरी पर 
यदि हो गई कैच
जो हम गए हार
 देना पड़ेगा दाम 
और नहीं तो हमारी होगी जीत
 जितनी दूर गई होगी गिल्ली उसकी दूरी के मिलेंगे इतने डंडे
 ना आपके वह हो जाएगी हमारी कमाई 
यह है हमारे बचपन का गिल्ली डंडा का खेल 
आओ हम तुम्हें सिखाएं बच्चों तुमने ना सीखा होगा क्योंकि इस lock-down मैं तो सबको कर दिया है बेहाल
 नए बच्चे मोबाइल के आगे ना जानते हैं 
गिल्ली डंडा का खेल 
तो मैं तुम्हें सिखाती हूं
 यह खेल आओ हमसे छीन लो
 इस खेल को हमारे दादा ने बब्बा ने हम सब को सिखाया है
 हम भी तुम्हें सिखाते हैं
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 कुमारी चंदा देवी स्वर्णकार जबलपुर मध्य प्रदेश


अग्निशिखा मंच को नमन🙏
आज का विषय:- बालगीत
       *गिल्ली-डंडा*

चिंटू, पिंटू छोटू, सोनू आओ
जल्दी जल्दी गिल्ली डंडा खेलते 
चिंटू ने लायी गिल्ली, पिंटू ने 
लाया डंडा चिंटू था खेल में माहिर

घर के सामने के मैदान में खेल शुरू हुआ,देख रही चाची खेल हमारा, चिंटू ने मारी डंडे से गिल्ली को, खिड़कियां शीसा टूटा
 
चारों भागे अब चाची के गुस्से से
भगवान बचाना चारों को काम है
कठीन हमारा, फिर भी कोई राह
सूझाना,खेल ना नहीं गिल्ली-डंडा

चारों को पता है,माफी की अब
चाल नहीं है चलने वाली और
आंटी के आगे अब दाल नहीं गलनेवाली, बहाना नहीं चलना है।

 क्यु की फूटा काच खिड़कीका
कैसा भी हो गुस्सा उनका पर
अब तो सहना होगा चाची का गुस्सा सहना होगा, कान पकड़कर
माफी मांगना होगा।

चिंटू, पिंटू, छोटू, सोनू माफ कर दे
चाची अब नहीं खेलेंगे घर के पास
मैदान में ही खेलगे हम गिल्ली- डंडा गिल्ली देना हमारी। चाची ने
गिल्ली दे दी वापस पिंटू के मां ने आवाज लगाई आनलाइन कक्षा है तुम्हारी, कल मिलेंगे यह बोलकर चले गए पढाई करने।

सुरेंद्र हरडे कवि
दिनांक १९/०७/२०२१



बाल गीत 
शीर्षक -"गिल्ली डंडा"

1. आओ गिल्ली डंडा खेले ,
अपनी अपनी टोली ले ले ,
6,6 बच्चों की टोली बना ले, 
मिलकर के सब बारी ले ले , 
आओ गिल्ली डंडा खेले,,,,,,,,

2. पिट कर गिल्ली उछल पड़े हैं , 
दूर-दूर तक पहुंच पड़े हैं , 
 लपक ले कोई तो टीम आउट हुई , 
 दूजे की बारी अब आई , 
 आओ गिल्ली डंडा खेले , 

3. अपने अपने झंडे गाड़े , 
 अपनी अपनी टीम जिता लें , 
 भागे दौड़े गिल्ली पकड़े , 
 दूजी टीम को मिलकर हरा दे , 
 आओ गिल्ली डंडा खेले ,,,,,,

4. कभी-कभी गिल्ली की चोट झेले , 
  मिलकर दौड़े रैले के रैले , 
एक दूजे को नहीं 
ढकेलें , 
  खेल को खेल की भावना से खेलें , आओ गिल्ली डंडा खेले,,,,,,,,

स्वरचित बाल गीत
 रजनी अग्रवाल जोधपुर





अग्निशिखा मंच 

विषय- गिल्ली डंडा 

सोनू मोनू जल्दी आओ 
गिल्ली डंडा लेकर आओ 
छोटू मोटू पीछे पीछे आओ 
सब मिलकर खूब खेल खेलेंगे

सोनू ने पकड़ा डंडा 
मोनू ने गिल्ली रखी 
घास के मैदान में खेलेँ
बार-बार डंडे से गिल्ली मारें

अरे यह क्या दादा जी के 
बंगले के कांच फोड़ दिये
भागो सोनू भागो मोनू 
दादा जी हाथ में लाये डंडा

हम सबकी करेंगे धुनाई 
दादा जी ने कान पकड़ा 
क्यों रे सोनू?काँच फोडा़
चलो उठक बैठक लगाओ 
तुम सबको सिखाऊँ सबक 

बच्चों ने जल्दी से कान पकड़े 
उठक बैठक लगाई बार बार
राम-राम राम कर भाग लिए 
हाथ जोड़ दादा जी से माँगी माफी 
प्यारे दादा जी ने माफ कर दिया।

डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"
19-7-21



🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹19/7/ 2021🌹🙏

🙏🌹बालगीत /शीर्षक_गिल्ली डंडा🌹🙏

आज स्कुल की छुट्टी है, 
गिल्ली डंडा खेलते है,
चुन्नु मुन्नु बहार आजाना, 
छुट्टी का मजा लेते है, 

ध्यान रखना पढ़ाई में,
मां ने किया है एलान,
में आज नहीं आ सकता, 
आज कहा मेरा तुं मान,

तेरे बिना खेल कैसा ?
खेलेंगे घण्टा आधा, 
खेल गिल्ली डंडा का, 
लक्ष्य हमेसा सिखलाता ,
 
चुन्नु ने उछाली गिल्ली,
उछल के दूर है जाती, 
पकड़ने मुन्नु जो दौड़ा ,
फिसला पैर हाथ में आती ,

बच्चे हंसते जोर से,
मुँह पर लगी है मिट्टी, 
मुन्ना ने मुँह फेर लिया, 
सबसे कर दी है किट्टी, 

चुन्नु ने उसे कहा दोस्त,
दूर मार देना गिल्ली,
 हुई जीत तेरी पक्की, 
मुझ से आगे गई गिल्ली, 

डंडा से गिल्ली उछला,
लपक गई पतझड़ नीचे 
फिरसे झगडा शुरु हुआ, 
में आगे तुम हो पीछे,

तेरा मेरा हो गया शुरू
जोर से चिल्लाने लगे,
मेरी जीत तेरी हार, 
एक दूजा को मारने लगे, 

आधा घण्टा पूर्ण हुआ, 
कल फिर से हम खेलेंगे,
यही जगा, गिल्ली डंडा,
 यहाँ सब हम को मिलेंगे 
🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏



गिल्ली डंडा
     ************
आओ खेलें खेल
खेलों में खेल गिल्ली डंडा
मुझे लगता यह प्यारा खेल
आओ चुन्नु आओ मुन्नु
चलो चलें खेलने मैदान
चलो खेलें खेल गिल्ली डंडा
मुझे भाता इसका प्यारा फंडा
पहले बनाते हैं होल
फिर उसमें रखें गिल्ली
उठा डंडे से जोरों से मारी गिल्ली
हवा में लहराता दूर गिरा गिल्ली
जितनी दूर जाए मन हो जाए हर्षित
पकड़ने दौड़े गोलू मोनू
गिल्ली उठाकर ले मारा डंडे पे चोट
कभी होती जीत तो कभी होती हार
चाहे अमीर चाहे गरीब
 खेल यह सबको खूब भाता
खेल-खेल में कुट्टी करते 
फिर करते मेल
वाह ये गुल्ली डंडा
का अद्भुत खेल

 डॉ मीना कुमारी परिहार



अग्निशीखा मंच
विषय- गिल्ली डंडा (बाल गीत)
विधा -कविता
दिनांक -19-07-2021

  *आओ खेले*

आओ खेले सब मिलकर
गाँव की गली -गली में,
हँसते -गाते गिल्ली डंडा, 
लेले सब लोग दो डंडा।

बैठे हैं घर में सब उदास
सब के हाथ में है मोबाइल 
देख कर पढते हैं हम सब,
थोडा़ कदम बढाये हम सब।

गाँ के खेल देते हैं उल्लास,
टी वी से दूर रहते खेलेंगे,
योगासन का मजे़दार खेल,
छट्टी हैं,खेले गिल्ली डंडा खेल ।

राम -श्याम ,बंटु मिंटु सब हैं
हमारी टोली हैं बहुत बढिया,
कितने दिन बीते यह खेल खेले, 
चलो मित्र फिर गिल्ली डंडा खेले।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय



🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
🌹🌳विषय: * गिल्ली डंडा*🌳🌹
 🌹🌴विधा:* बाल कविता *🌴🌹
   🌹🌲दिनांक:19-7-21🌲🌹
        
*********************************
गुल्ली-डंडा, गुल्ली- डंडा 
आओ खेलें गुल्ली-डंडा, 
सभी खेलों से न्यारा है -
लगता कितना प्यारा है ।

बच्चे सब स्कूल से लौटे,
चलो गुल्ली - डंडा खेले-
सभी खेलों में अनोखा है ,
देता कभी न धोखा है ।

कोई -दौड़े कोई- भागे,पर 
गुल्ली- डंडा सबसे आगे ,
हम बच्चों की मस्ती है-
खेल भी इतनी सस्ती है ।

प्राकृतिक लकड़ी से बनती ,
नही कोई खर्चा, है करती -
गाँव का यह खेल निराला,
कितना सुंदर, कितना प्यारा !
 
*********************************
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता
 मुजफ्फरपुर
 बिहार --🌹



बालगीत
गिल्ली डंडा
**********
1...
सोनू बोला गिली डंडा
सर पे लगे जो बनेगा अंडा
इसको खेलने का भी होता एक फंडा
इधर आओ सिखाऊं फ्री मे 
नहीं ये कोई मेरा धंधा।।
हा हा हा हा हा हा...

2....
गिल्ली डंडा खेलो खेल
कभी बनाओ मिलके रेल
मां कहती सर पे लगाओ तेल
नहाओ अच्छे से तन पे कितनी मेल
हा हा हा हा हा ....

3....
गिल्ली डंडा लकड़ी से बनता
इस खेल को खेलती जनता
भारत का खेल खेलो स्वतंत्रता
हा हा हा हा हा...

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************



नमन मंच
विषय --: गिल्ली- डंडा (बाल कविता) 
दिनांक --: 19/7/2021

  मध्य भाग से मोटी होती 
  दो मुंह वाली गिल्ली होती
लकड़ी की गील्ली लकड़ी काडंडा
    आओ खेलें गिल्ली डंडा !

 कल का दांव बाकी है मेरा
 मोहन आज अव्वल मैं खेलूंगा 
 गिल्ली मेरी डंडा मेरा इसलिए 
 दांव भी होगा अव्वल मेरा !

आज खूब उड़ेगी मेरी गिल्ली
दौड़ेगा तू बनके भीगी बिल्ली 
  पदा पदा के दौडा़ऊंगा मैं
 खूब पदेगा दौड़ दौड़ के तू !

    डंडे से मैं लाल गिनूंगा
गिल्ली को मैं जोर से मारूंगा    
  जितने ज्यादा लाल बनेंगे 
    उतना ही तू दौड़ेगा !

   एक लाल के पांच डंडे
 जितने लाल उतने ज्यादा डंडे
     जितने डंडे उतने दांव
      उतने दौडे़ंगे तेरे पांव !

     खूब पदाऊंगा मैं तुझको
        पद पद के तू दौडे़गा
   मोहन आज अव्वल मैं खेलूंगा
         गिल्ली मेरी डंडा मेरा
इसलिए दांव भी होगा अव्वल मेरा

              चंद्रिका व्यास
             खारघर नवी मुंबई





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