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अखिल भारतीय agnishikha manch per padhiye chitra per Kavita डॉ अलका पांडे मुंबई


चित्र पर कविता 
-

जाग जा जाग जा हे मानव । 
ऋषि मुनियों की पावन धरा 
मत कलुषित कर मत कलुषित कर ....
हरे भरे जंगलों को मत काटना 
पर्यावरण बचाना , प्राण वायु देना ....
कल कल बहती गंगा को पावन रखना धर्म हमारा 
ओज़ोन परत का रखो ख़्याल 
मत करो तुम उसको नष्ट 
धरा बिलबिलायेंगी, खून के आंसू बहायेंगी ।।
पर्यावरण तार तार होगा 
आसमान भी रुठ जायेगा 
सोच तू मानव कहाँ जा रहा हैं 
क्या क्या कर  रहा हैं । 

तेरी ही नादानी से कोरोना ने पंख फैलाये .,,,
लाकडाऊन की त्रासदी सब पर है भारी .,,
तूफ़ानों से लड़ने की कर लो तैयारी ।
अभी भी वक्त है 
जाग जा जाग जा हे मानव 
पर्यावरण का दोहन बंद कर 
संरक्षण दो ....
पैँधों से हरित क्रांति लाओ ..
वसुंधरा को धानी चुन्नर पहनाएँ....
आओ आज हम प्रण कर ले
पेड़ों को लगाये धरा का सम्मान करें । 
प्राण वायु देने वालों का हम करे संरक्षण । ।
महामारी से जग को बचायें । 
जाग जा जाग जा हे मानव ।।

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई




आज के चित्र पर एक हल्की तुकबंदी 
----------------------------------------
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

अपनी आबादी पर कभी
नियंत्रण नही कर पाये
वन पहाड़ नदियों तक
शहरों के जाल बिछाये
थोड़े से स्वार्थ खातिर
अपनो को न प्यार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

अपने होते कौन हैं
नहीं कभी सोचा तुमने
जो देता जल जीवन वायु
उसे नहीं समझा तुमने।
प्रकृति के सीने पर तूने
निर्दयता से प्रहार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

आज आफत में दुनिया है
मौत के बादल छाये हैं
जिसे समझते तुम अपने
ये अपने नहीं पराये हैं।
जीवन रक्षक पालनहार
को नही स्वीकार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

मौत के बेरहम तांडव से
अब जग को बचाना होगा
पेड़ काटना छोड़कर
केवल पेड़ लगाना होगा।
दुनिया हो जायेगी सुंदर
अगर फुलवारी तैयार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।
----श्रीराम रॉय palolife.com ----





☘️☘️☘️☘️☘️☘️पर्यावरण दिवस पर सबको शुभकामनाएं,

पर्यावरण,,, कविता का शीर्षक

☘️पर्यावरण बचाओ मित्रों पर्यावरण बचाओ एक पेड़यदि कट जाए तो ग्यारह पेड़ लगाओ। पर्यावरण बचाओ मित्र पर्यावरण बचाओ🌷

हर पल रखें ध्यान हम,, 
पेड़ लगाना है हरदम।
 मातृभूमि की हरित चुनरिया
 ना होगी यह कभी भी कम है☘️

धरती के आभूषण हैं इनको हमें बचाना है💐
 नित पेड़ों को काट काट कर प्राणवायु नहीं गंवाना है👍👍

मातृभूमि की हरित क्रांति को हमें सदैव बचाना है
🌷 पल पल इनकी रक्षा करके देश को आगे बढ़ाना है।💐

सुषमा शुक्ला इंदौर


मंच को नमन
विषय:--- *चित्र पर आधारित कविता*

मैं हूं कुदरत का अनमोल उपहार,
प्राणवायु को जो करते हैं संचार,
वन उपवन से चहु ओर हरियाली,
बुलाकर बादलों को लाते हैं, शीतलता,
देते हैं फल ,फुल ,औषधियों, उपहार,
मुझे नहीं काटो , सोचो हजार बार,
सुनो.! पक्षियों की नींड़ से आती आवाज
देखो..! गिलहरियों के बसा संसार,
न भूलें किसान भाई मेरा परोपकार,
मुझे काटने पर तेरे घर में आएगा विकार,
याद करो उन आपदाओं को,
सागर की विशाल लहर, भूकंप का कहर,
तूफान हो या प्रदूषण का जहर,
हर वार मचाया इसने हाहाकार,
करो विनाश लीला पर विचार,
मैं कहता हूं.! फेंक दो हम पर उठाए औजार,
रोक दो उन पर स्वार्थवश किया वार ,
क्योंकि.! मैं हूं प्रकृति का अनमोल उपहार।

विजयेन्द्र मोहन।



प्रकृति और मानव का संबंध

****************
पंचतत्व से बनी है धरती, प्रकृति ने सुंदर संसार दिया,
 सूरज चंदा नदियां पर्वत,जीने का आधार दिया,
  रंग बिरंगे फूल खिला कर, हरियाली उपहार दिया,
 प्रकृति ने सब किया समर्पण ,जीवन को साकार किया।
 कल कल स्वर में नदियां बहती, मधुर संगीत सुनाती है,
 फल फूलों से लदी डालियां झुकना हमें सिखाती हैं ,
यह धरती भारत मां बनकर, सब को आश्रय देती है,
 अन्नपूर्णा बनकर हम सब का, लालन पालन करती है ।
सावन की रिमझिम बूंदे, घुंघरू की तान सुनाती है,
 पुरवइईया के मस्त झकोरे, कानों में बंशी बजाती है ।
वसंत आगमन पर ,रोम-रोम पुलकित हो जाता है,
 हरित वर्णों में लिपटी वसुंधरा, दुल्हन सी शर्माती है। 
प्रकृति को चुनौती देंगेतो, कुप्रभाव से ना बच पाएंगे,
बाढ़, तूफान, धरती हिलेगी, बादल भी फट जाएंगे अपने हाथों इंसान ने , जंगल , बाग़ उजाड़ा है,
 कृषि भूमि को रौंद दिया, पर्वत में सुरंग बनाया है वायु नभ मंडल दूषित है, दूषित नदियों का पानी निमंत्रण दे रहा मृत्यु को, मानव तू अभिमानी है। दीया और बाती का रिश्ता जैसे फूलों का खुशबू से ,
प्रकृति मानव का रिश्ता जैसे सांसों का धड़कन से जीवन जीना है तो प्रकृति को बचाना होगा ,
इस धरती को स्वर्ग से भी सुंदर हमें बनाना होगा संकल्प ले हम हरियाली से धरती का श्रृंगार करेंगे हरे-भरे वृक्ष लगाकर प्रकृति का सम्मान करेंगे।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश
 मोबाइल 8989409210



* पर्यावरण *
हरे भरे वनों की रक्षा अनुपम प्रकृति की संरचना ,
प्राणवायु हम इनसे पाते तभी स्वस्थ हम रह पाते !

हवा हो प्रदुषण मुक्त जीवन हो पंछियों सा उन्मुक्त,
प्राणवायु और गहरे श्वास रह सकते हम सब स्वस्थ !

जीव जन्तु ओर पंख पखेरू जल ,थल,नभ में रहते ,
पर्यावरण का संतुलन हम सब मिलकर के ही करते!

आधुनिकता के नाम पर जब से जीवन-शैली बदली ,
भोगवाद की लिप्सा ने पावन बसुधा मैली करदी !

गर ?जीव जगत सुरक्षित रखना है वृक्षारोपण हो ,
कंकरीट के जंगल में भी खड़े नीम ओर बबुल हो !

एक वृक्ष दस बेटों जितना पुरखे यूं ही नहीं कहते ,
जो प्रकृति का संरक्षण अपना फर्ज समझते !

धरती माता कल्पबृक्ष सम हम सबको सब कुछ देती ,
प्राणवायु,फल, फूल ,शुद्ध जल कोई कमी न रखती !

हम उसकी बिगड़ी संतानें नादानी कर बैठे ?
नंदन वन सी बसुधा से हम छेड़छाड़ कर बैठै ,

हर गलती सजा सुनिश्चित हमको भी मिल …...रही ,
कहीं भूकंप ,कहीं सुनामीं, कहीं सुखा कहीं पे आंधी!

अब पाप का घड़ा भर गया करोना का विकराल साया ?
आक्सीजन बिन जीवन में संकट घोर घिर - घिर आया !

ओजोन की परत में अब आ गई दरारें है !
पराबैंगनी किरणों से अब खुद को कैसे
 बचायेंगे ?

अब भी बाजी हाथ हमारे अभी भी कुछ नहीं है बिगड़ा ,
पेड़ और जल संरक्षण से मिट जायेगा सारा झगड़ा टंटा!

फिर हवा शुद्ध होगी ओर प्राणवायु भरपूर मिलेगी ,
आने वाली नस्लें हमारी पूर्ण स्वस्थ सुरक्षित होगी !

आओ मिल कर संकल्प करें सादा जीवन अपनायेगे ,
अपने बच्चों के समान ही वृक्षों की रक्षा कर पायेंगे !    

सरोज दुगड़ 
गुवाहाटी असम
🙏🙏🙏



हाथ मे ले कुल्हाड़ी कहा निकल पडे़।
क्या लकडी़ काटने नहीं नही अपनी श्वासो की डोर काटने।
अरे मूर्ख तुने ये कभी सोचा
तुने कितना पौद्धो को रोपा।

ऐसे तो धरती पर कंकरीट का ही जंगल होगा ।
कहा से हरियाली आयेगी
फिर कैसे तेरा मंगल होगा।
तुने फलदार पेड़़ लगया नही
कैसे फल खाँ कर स्वस्थ होगा।

तुने बाप दादा के लगाये पौद्धो को दोनो हाथो से लुटा।
कुल्हाड़ी ले कर काटा पेड़़ कर दिया बुटा बुटा।
कभी सोचा तेरे बच्चे कहा से आक्सीजन पायेगें।
बिना श्वास लिए तेरे बच्चे कैसे जी पायेगें।
क्या इतना भी तेरी समझ मे नही आता ओजोन फट परत फट जायेंगे।

सुन मानव पहले अपना कर्तव्य निभा पेड़ लगा।
कुल्हाड़ी नही कुदाल उठा कर हर जन्म दिन पर पौद्धा लगा।
धरती पर हरियाली लाकर अपना कर्तव्य निभा।


जब हरी भरी धरती हो धानी चुनर लहरयेगी।
तब आसमान से बादल भी अमृत बरषायेगा।
तब दुनिया होगी खुशहाल कोरोना भी नही आयेगा।
तेरे बच्चो को भी शुद्ध प्राण वायू मिल जायेगा।
स्वरचित
       बृजकिशोरी त्रिपाठी
  .....गोरपूर, यू.पी।



चित्रआधारित रचना 

दिल की दीवारों पर दरारें है 
कटते वृक्ष कहते है 
अब तो समझ जाओं 
जीवन प्राणवायु है 

इंसान हों इंसानियत है 
 क्यों करते आये पीछे से वार 
कुल्हाड़ी इंद्रदेव का वरदान है 
इंसानियत की कथा यही है

सत्य कर्म सीख कहती है 
नित नई कहानी है 
आसमाँ की लकीरें मिटा दो 
चमकाते सितारे अपना भाग्य है 
अनिता शरद झा रायपुर c .g







चित्र आधारित अभिव्यक्ति
💐💐💐💐💐💐💐

हे मानव! अब भी तू संभल जा, 
मत कर तू प्रकृति पर अत्याचार, 
बादल के भी दिल में हो गया है छेद, 
महामारी, मुसीबतों को अब तो न दे न्यौता,,,, 

पेड़ जो काटे, प्राण वायु को तरस जायेगा.
बादल भी बरसाये ऐसी हालत में प्रलय|


स्वतंत्र विधा
 ✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
 कुमारी चन्दा देवी स्वर्णकार जबलपुर मध्यप्रदेश



नमन मंच 
छवि विचार 

मुर्ख मानव , 
करके प्रहार ,
ढाया कहर प्रकृति पर ,
बनके भक्षक , 
अपनी ही सांसों को डराया ,
खाया जिस थाली में , 
उसी में छेद किया ,
जिसने दी सांसें 
उसी में जहर फैलाया ,
खेल रहा प्रकृति से ,
सांप ,सीढ़ी का खेल 
डस कर उसी सांप ने , 
ला दिया धरती पर ,
काटे पेड़ ,सुखायी नदियाँ 
फैलाया जहर हवाओँ में 
बन रहा अनजान ,
कल तक हमने 
 बाधां मुठ्ठी में , 
आज उसी ने हमें बांध दिया ,
हे मनुज 
अब तू संभल ,
अस्तित्व मेरा खो रहा ,
मैं बिन तुम नहीं , 
तुम बिन मैं नहीं ,
मुझमे ही अपने आप को पाओगे ,
वरना इस महाप्रलय में डुब जाओगे |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड


चित्र पर आधारित कविता

वृक्ष चीख कर रहा पुकार 
अरे मत करो हम पर प्रहार 
मनुष्य तू कितना है बेरहम
सीखो कुछ तो धर्म- कर्म। 

 कुल्हाड़ी से तूने वार किया 
आसमान को फाड़ दिया 
हरी भरी हरियाली देकर
जीवन में लाते सदाबहार।

औषधियों का हम भंडार 
बीमारी का करते उपचार
देते हम शुद्ध ऑक्सीजन
मिलता प्राणी को जीवन।

हरियाली से ही वर्षा लाते 
वर्षा से ही नवजीवन पाते 
नदिया नाले लबालब भरते 
जीवन को खुशहाल करते।

हम करते हैं सदा परमारथ 
नहीं रखते मन में स्वार्थ 
पर मनुष्य बड़ा स्वार्थी है 
 तूने हमको ही नष्ट किया।


 कुछ तो हम पर करो रहम 
 नहीं चाहते कुछ तुमसे हम
 फल फूल गए खुश होते हम  
 हम तो देते सब को उपहार।

आशा जाकड़


नमन मंच 
दिनांक -: 29/ 7 /2021
 विषय -: चित्र पर आधारित

   काट कुल्हाड़ी से मुझको
अब बादल फटने से क्यों डरते हो
    रोयेगी तो धरती माता
 अपनी ममता को मरते देख! 

पृथ्वी की ममता हर जीव में है 
प्रकृति का सौंदर्य हरित 
वृक्षों से भरे ये उपवन हैं 
गर उपवन से ही वृक्ष हट जाये
तो प्रकृति में सौंदर्य कहां सेआये !

   आज हर उपवन से 
  करूंण आवाजें आती हैं
 समय से पहले मत मारो
    मत काटो मुझको 
  काम तुम्हारे मैं आऊंगा 
   सांसो की हर डोर में मैं
   प्राणवायु बन पड़ा रहूंगा
  जल की आपूर्ति में भी मैं
  सदा मेघ बन खड़ा रहूंगा 
  सुखी लकड़ी बन कर भी 
   सदा काम तेरे मैं आऊंगा 
बस इतना ही कहना है मुझको 
इस बच्चे को उपवन में रहने दो 
प्रकृति की सुंदरता बन 
माँ की कोख में रहने दो 
मांँ की कोख में रहने दो !

चंद्रिका व्यास 
खारघर नवी मुंबई


चित्र देखकर रचना (कविता)

हरा भरा वन-उपवन देखने को मन तरसाया है
प्राणवायु हर पल मिले,बने स्वस्थ तन काया है। 

आकाश जल थल अग्नि वायु पंचतत्व हैं 
पर्यावरण संतुलन बनाना हमारा कर्तव्य है।

रे मानव तूने वृक्षों को काटा आरी-कटारी से
ओजोन परत में छेद हुए मानव के कर्मों से।

एक वृक्ष दस पुत्र समान पुरखे यही कहते हैं
पेड़ है कल्पवृक्ष फूल फल प्राणवायु देते हैं।

पेड़ों को कटने मत दो इक हूक सी उठती है
पेड़ रोते सिसकते हैं,नैनो अश्रु धारा बहती है।

अब हरियाले सावन, अवश्य करो वृक्षारोपण 
नन्हें नन्हें पौधों को रोपो, संवारो, करो संरक्षण।

रक्षाबंधन भाई-भाभी को,पौधों की सौगात दो 
पौधों की सुरक्षा का भाई को संकल्प दिला दो।

वृक्षारोपण प्रकृति को दे रहा अमूल्य उपहार
हरी चूनर ओढ़ कर,प्रकृति स्वागत को बेकरार।
 
डॉक्टर अंजुल कंसल" कनुप्रिया"
29-7-21


प्रकृति का कहर 
🍀☘️🌳🌲🌹🍀☘️🌳🌲
 आधुनिक परिवेश में प्रदूषण हमारी प्रमुख समस्या 
पर्यावरण सूरक्षित नहीं , नहीं सुरक्षित देश की प्राकृतिकता 

एक ओर तो चीखते रहते ,हम सब पर एहसान जता कर 
प्लास्टिक का विरोध दिखाते जहां तहां जुलूस निकाल कर

हर सरकार आती जाती अपने जलवे बिखेर के जाती
पर जो आवश्यक तत्व हैं उनपर उनकी नजर ना जाती 

जनता भी ना अपनाये पर्यावरण के स्वस्थ उपाय
स्वयं तो कुछ कर नहीं पाते एक दूजे पे उंगली उठाए

सरकार के साथ हमें भी स्वच्छता का मूलमंत्र याद रखना होगा 
गीला कचरा सूखा कचरा अलग रखने का पालन करना होगा 

पर्यावरण को बढ़ाने दोस्तो एक एक पेड़ लगाना है 
रास्ते गलियां घर चौबारो में शीतल बयार बहाना हैं

प्लास्टिक की मोहमाया को आज भी हम सब तज नहीं पाते 
यदा कदा डिस्पोज़ल कैरीबैग हम अपने काम ले ही आते

जो हम ध्यान ना रख पाए तो भुगतान हमे ही करना होगा
आपातकालीन परिस्थितियों से जूझने हेतु सबको तत्पर रहना होगा

बार बार चेतावनी देते धरती वायु अग्नि अम्बर
समझा रहे हमको बाढ़, भूकंप ,आग, सुनामी ला कर 

प्राकृतिक आपदाओं में जाने कितनी जाने चली जा रही 
फिर भी हम अक्ल के मारों को सद्बुद्धि नहीं ही आ रही

जानवरों को मार के खा रहे कोई पक्का तो कोई कच्चा ही खा रहे
गाय सुअर , साप ,कुत्ता कोई भी इनसे बच ना पा रहे 

चीन की गलती का खामियाजा आज हम सब भुगत ही रहे  
 कोरोनावायरस जैसी महामारी में अपनों को खो के सुलग ही रहे

अब भी सुनो और समझो प्रकृति हमसे क्या कहना चाह रही
धरती को स्वच्छ और स्वस्थ रखो बस इतना ही वह हमसे मांग रही

जो ना समझेंगे ना सुधरेंगे तो प्रकृति हमको सबक सिखायेगी  
तूफान,भूकंप ,महामारी से फिर अपना कहर बरसायेगी


शुभा शुक्ला निशा
रायपुर छत्तीसगढ़


जय मां शारदे
***********
 अग्निशिखा मंच 
दिन -गुरुवार 
दिनांक -29/7/2021 चित्र आधारित रचना

इंसान की अक्ल में पड़ गए पत्थर ।
प्रकृति से वो ले रहा टक्कर ।
कुल्हाड़ी मार पेड़ गिरावे। जबकि पेड़ ही से जीवन पावे ।
बिन पेड़ों के चले न जीवन ।
इनसे ही मिलती है ऑक्सीजन।
जब तुम पेड़ों को काटोगे।
फिर कैसे जीवन बाटोगे। ये प्रकृति से खेल रहा है ।
भारी विपदा झेल रहा है। 
अभी भी बात समझ ना आई। 
फिर पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाई। 
गिरते वृक्ष का दुख है भारी।
नभ के भी सीने चली कटारी। 
वृक्ष थाम उसने दुख बांटा।
मानव के फिर पड़ा तमाचा।

 रागिनी मित्तल
 कटनी ,मध्य प्रदेश



रे मानव सुन
अ. भा. अग्निशिखा मंच
विषय_चित्र पर कविता
"रे मानव सुन"
क्यों रहे इन पेड़ों को चीर?
क्यों फोड़ रहे अपनी तकदीर?
इतनी आपदाएं देखीं,
ना सीखा सबक,
कोरोना मुंह बाए खड़ा,
तीसरी लहर की लिए खनक।१।
हम मूक हैं,नहीं बेजान,
बता रहा है तुम्हें विज्ञान,
फिर भी बन करके अनजान,
आफत में डालते अपनी जान,
हम पर करते रहते प्रहार,
चाहे मच जाए हाहाकार।२।
प्रकृति हमारी साथी,देती रहती 
भंडार अक्षुण्ण हैं, न कमी होती,
जो देती ये,उसका सदुपयोग करो,
बंद शोषण,और दुरुपयोग करो।३
ये दाता है देती रहेगी,
मानव याचक है लेता रहेगा,
इसको दिल से प्यार करो,
बस इतना उपकार करो,
एक काटो चार उगाओ,
इस महामंत्र को अपनाओ।४।
इन वृक्षों से बनाओ फर्नीचर,
पर मत बिगाड़ो अपना फ्यूचर,
ले लो पर्याप्त सुविधा ले लो,
साथ खूब बीजारोपण कर लो,
संभालो ओज़ोन आवरण को,
बचा लो अपने पर्यावरण को।५।
मत होने दो उसमें छेद,
वर्ण खत्म जीने का भेद,
मत करना अति,
मारी जाए न मति,
प्रकृति है साथी हमारी 
याद रखना यही बारी _बारी।६।
बस फिर न कुछ कमी रहेगी,
कभी ना सूखा पड़ेगा,नमी रहेगी
चारों ओर छाएगी हरियाली,
पृथ्वी पर होगी सदा खुशहाली,
हम भी रहेंगे,पेड़ भी रहेंगे,
पखेरुओं के बसेरे भी रहेंगे।७।
प्रकृति_मानव साथ_साथ,
जिएंगे डाल हाथों में हाथ,
"जीओ और जीने दो"की पुकार,
सीखो हमसे तुम करना परोपकार
हम कहते"सब भली करेंगे राम",
तुम बोलो"जय जय श्री राम"।
स्वरचित मौलिक रचना_
रानी अग्रवाल,मुंबई,२९_७_२०२१.



चित्र पर आधारित

मैं एक कटा हुआ वृक्ष हूं
मेरी दर्द को तुम समझ नहीं पाए
कभी तुम करते थे मेरी पूजा
इतिहास को देखो पढ़ो
मेरा अस्तित्व सम्राट अशोक
का दिया हुआ अशोक नामक वृक्ष हूं
हाथों में कुल्हाड़ी लेकर तुमने
निर्ममता से मुझे दो भागों में काट डाला

सड़की हो गई सुनसान
कट रही है सारी वृक्षे
उदास होकर रो रहे राहगीर
पर्यावरण हो रहा विषैला
लेकिन सड़के हो जाएंगी चौड़ी

पक्षियों का टूट गया बसेरा
मुरझाई है वृक्ष की टहनियां
कर रही है सभी से एक ही सवाल
मुझे नष्ट कर क्या हो जाओगे आबाद

मुझसे ही मिलती है तुझको
शुद्ध वायु, औषधि और छाया
मैंने तेरा कभी कुछ नहीं बिगाड़ा
फिर भी तूने मुझ को काट डाला

वर्षा कैसे होगी इसे तू नहीं जाना
महामारी संसार में है फैला
सतर्क होकर संभल जाओ
नहीं तो हर दिन खरीदना
प्राकृतिक वायु हवा पानी


कुमकुम वेद सेन


मुझे न मानव अब मारो 
बहुत पछताओगे जानो
जन्म से मृत्यु तक नाता
हर पल तेरे काम आता
मेरी हत्या तुम न करना
सत्य वचन तुम मानना 
पर्यावरण महत्व जानो
काटना नही तुम मानो

डॉक्टर रश्मि शुक्ला 
प्रयागराज 
उत्तर प्रदेश



अग्निशिखा मंच को नमन
आज का विषय *चित्रपर आधारित रचना*

हे मानव अपने स्वार्थ के लिए
मत करो पेडो का कर्तन
प्रकृति मांग रही प्रतिदान
जन्मदात्री ने कोख में पाला।।१।।

धरती मां ने दिया है अनुपम उपहार, मीठे फल और मेवे खाकर, प्राणवायु इसी मिलता है
मत कर प्रकृति को दोहन।। 2।।

पेडो में ही होती है जिंदगी
खुद गर्मि, ठंड बारिश सहता है
मानव को देता है जीवन रक्षक।
क्यो काट रहा है तुम पेड़ों को।3।

कोरोना काल में प्राणवायु की हुयी
किल्लत, कुछ लोगों नहीं मिला प्राणवायु समय पर तो छोड गये
रोते, बिलखते परिवार को।।4।।

पेड़ों को तोडो मत, लगाओ घर घर मे,करो रक्षा पर्यावरण की धरती को हरी भरी करो यही संदेश देता सुरेन,नहीं तो पस्तायेंगा कल।।5।।

सुरेंद्र हरड़े कवि
नागपुर
दिनांक :-२९/०७/२०२१


।प्रकृत्ति। 
प्रकृति से यह अत्याचार, 
बहुत खतरनाक होता है। 
इंसान पेड़ को काटकर, 
अपना घर उजाडता है।। 
प्रकृति..................... 1 
बडे-बडे जंगल काटकर, 
कंक्रीट जंगल बना देता है। 
बारिश का कहीं पता नहीं, 
पानी बिना सब सूना होता है।।
प्रकृति...................... 2 
प्रकृति अपना रंग दिखाती, 
ग्लोबल ताप बढ जाता है। 
प्रकृति से यह खिलवाड़, 
इन्सान को भारी पडता है।। 
प्रकृति....................... 3 
प्रकृति प्रेम जब नहीं रहेगा, 
पेड़ बिना इंसान कैसे रहेगा।  
कहीं नहीं वारिश का जोर होगा, 
जमीन फिर बंजर होगा।। 
प्रकृति.........................4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।


मेरी रचना का शीर्षक है***
अत्याचार पेड़ों पर
^^^^^^^^^^^^^^^
प्रस्तुत है एक गीत***
हम कहाँ जा रहे हैं किधर जायेंगे
यह तो सच है जो देंगे वही पायेंगे
पेड़ काटने से भला क्या मिलेगा हमें
इस बड़ी भूल पर हम तो पछतायेंगे।
धरती माता का कर्जा अदा नाकिया
भूल बैठे उसे जिसने जीवन दिया
हम अपने लिए ही जियें क्यों भला
स्वार्थ करके इक दिन तो पछतायेंगे।
हम कहां जा-------
यह सच है इक-----
मां बहिनें हैं पूजें सदा वृक्ष को
मांगती हैं दुआ विश्व कल्याण की
उनकी श्रद्धा रही पेड़ो पर सदा
श्रद्धा उनकी भुना कर कहां जायेंगे।
हम कहाँ जा-------
यह तो सच है-------
मान रखा नहीं कुदरत का कभी
पंच तत्वों को हमने न पूजा कभी
अपनी नादानियों से उबर ना सके
कहर से उसके बच कर कहां जायेंगे।
हम कहां जा रहे हैं किधर जायेंगे
यह तो सच है जो देंगे वही पायेंगे।
मौलिक रचना---सादर समीक्षार्थ
   .... लीला कृपलानी


नमन अग्निशिखा मंच 
विषय ;--चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक;--29/7/2021
है ये प्रकृति माँ के जैसी
देती रही नेह दुलार।
निज स्वार्थ भाव मे रत रहकर 
क्यूँ करता मानव कटु प्रहार।।
पेड़ काट कर सड़क बनाता 
और बना देता है मॉल।।
कभी मोड़ता रुख नदियों के
और बनाता उन पर बांध।।
अपनी मनमानी से वो करता रहा सदा अन्याय।।
नहीं सोचता इक़ पल को भी
पेड़ नहीं तो हवा नहीं 
नहीं रहेगी शीतल छांव 
रुक जायेगी फिर ये वृष्टि
सूरज की किरणें फ़िर घातक 
धरती को कर देंगी तप्त
कवच सुरक्षा चोटिल होगी
प्रदूषण बढ़ जाएगा।।
अपनी करनी से मानव तू
सृष्टि को डस जाएगा।।
खतरे में ग़र होगी दुनिया
तू भी कहाँ बच पायेगा।।
अब भी वक्त है तौबा कर ले
ना काट हरित इन नीड़ों को
वरना दिन वो दूर नहीं 
जब सब कुछ खत्म हो जाएगा।।।
निहारिका झा।।🙏🏼🙏🏼🌴🌴



सम्भाल कर रखो इसे (पर्यावरण) --- ओमप्रकाश पाण्डेय
(चित्र पर आधारित कविता) 
ये हरे भरे झूमते वृक्ष
ये हर भरे घने जंगल
कितने शेर भालू बन्दर
हाथी व अनगिनत जीव जन्तु
रहते हैं इनमें शान्ति से
सम्भाल कर रखो इसे..... 1
पक्षियों के प्यारे प्यारे घोंसले
लटकती हैं इनकी डालियों से
एक पूरा संसार इनका मौज से
रहता है इन घोसलों में शांति से
अगर जंगल न रहे सोंचों फिर
सम्भाल कर रखो इसे........ 2
ये इठलाती नदियाँ हमारी
ये तैरती नाचती मछलियाँ
दिल खुशी से मचल जाता है 
साक्षात ये जीवन हैं प्राणियों का
अगर नदियाँ न रहीं सोंचों फिर
सम्भाल कर रखो इसे....... 3
ये पेड़ पौधे व लहलहाते खेत
ये नदियाँ तालाब व ये झरने
ये पर्वत पहाड़ियां व खाईयाँ
ये दौड़ते हुए पशु उड़ती हुई पक्षियां
अगर ये सब न रहे तो सोंचों फिर
सम्भाल कर रखो इसे.......... 4
ईश्वर ने जो भी दिया है हमें
बहुत सोंच समझकर दिया
उसकी बनायी ये श्रृष्टि सुन्दर
है सभी प्राणियों के लिए
क्यों नष्ट कर रहे हो तुम इसे
सम्भाल कर रखो इसे........ 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)



वीना अचतानी, 
विषय *चित्र पर आधारित कविता *
काँप रही हर दिशा 
प्रकृति का तन मन मुरझाया
हे मानव तुमने कैसा
आंतक मचाया 
हरे भरे वृक्षों को काट गिराया 
आज झरे जो कल थे हरे
पेड़ों को तुमने कैसे ज़ख्म दिये
नाभि में इनके अमृत था
आँधी आऐ तूफाँ आए
पेड़ वहीँ डटे रहे
तपती धूप में ठन्डी छाँव देते 
रखते हमें स्वस्थ और दीर्घायु 
कुदरत से मिली है सौगात हमें 
यह ईश्वर का वरदान हमें 
बड़ा अनमोल उपहार है
औषधि देते आक्सीजन देते
हे मानव तुमने कैसा ज़ख्म दिया 
धरती को ऊसर करने को 
क्यो मचल रहा
पहले जैसे नहीं रहे
हरे भरे जंगल
पक्षियों के रैन बसेरा
वृक्ष है धरती का गहना 
कटते हैं जब जंगल 
होता है अमंगल ।।।।।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी 
जोधपुर, ।। ।।



$$ चित्र आधारित कविता $$

काट काटकर वृक्ष 
कर दिया धरा को सुखा 
बादल है चहुं ओर पर 
दिखे न नीर की बूंद 
सिर्फ लेना ही सिखा मानव ने
पेड़ पानी ,कर दिये सारे खत्म 
प्रदुषण फैलाने की हद हो गई 
कर दिया आसमान मे छेद 
पाटना है इसको मुश्किल पर
लगना होंगे कई गुना पेड़
जब होगी धरती हरी भरी 
तब भरेगा आसमान का छेद 
छोड़ कुल्हाड़ी, पकड़ फावड़ा 
कर दे बीजों की बौछार 
सावन का महीना आया है 
धरती देगी वृक्ष अपार 
सेवा नित प्रति करके उनकी
गोद हरी करना धरा की 
तब छेद भरेगा आसमान का

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश



।गुरुवार दिनांक***२९/७/२१
विधा*****कविता
विषय******
  #***चित्र आधारित रचना***#
               ^^^^^^^^^^^

जीवनदाई पेड़ों को काटने की ।
            अगर तू गलती करेगा ।।
तो तू ही नहीं समस्त संसार का ।
            हर जीव जंतु मरेगा ।।१

ये पेड़ पौधे वृक्ष वल्लरी हमारे ।
                जीवन के आधार हैं ।।
इनसे मिले फलफूल पवन बिना ।
                 हम सब लाचार हैं ।।२

इन्हें काटकर तू खुद अपनों पे ।                   
                   वार कर रहा है ।।
इसकी गरजको न मान खुदका ।
                   संहार कर रहा है ।।३

पेड़ काटके तड़पेगा जिसके लिए ।
                   मिलेगी न वो पवन ।। 
ना होंगे पर्वत झरने फिजा बहारें ।
                  ना बहेंंगे गंगो जमन ।।४

मत काट है गुजारिश तुझसे इंसा ।
               पेड़ स्रिष्टी का दान है ।।
 ये समस्त मानव जीवन के लिए ।
               रब से मिला वरदान है ।। ५


प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर


अग्निशिखा मंच
29/7/2021 गुरुवार
विषय-चित्र आधारित रचना

हद हो गयी
इंसान की
हैवानियत की
जिन वृक्षों से
हमें जीवनदायनी
आक्सीजन मिलती है
जलाने को
ईंधन मिलता है
आज जो
हमारे घरों में
जो पलंग,सोफे
और ऐशो-आराम के
जो भी साधन है
हमें इन्हीं
वृक्षों से प्राप्त होता है
इन्हीं वृक्षों से
पर्यावरण का
शुद्धिकरण होता है
उन्हीं जीवनदायक
वृक्षो को
हम अपनी 
स्वार्थसिद्धि की
पूर्ति के लिए
निर्ममता से
काट रहे है 
जो करेंगे हम
प्रकति से
 छेड़छाड़ तो
हर्जाना तो
भुगतना ही पड़ेगा
वृक्षविहीन 
धरती पर
मुश्क़िल है जीना
देख कर
कटते वृक्ष
फट गया है
आसमान का भी सीना।
                  
                         तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)






ना करो मेरे रूह को आहत
***********************
  हे मानव! मत काटो ‌ मुझे
मेरे नाजुक अंग
 हे अधम ! क्यों बने अभिमानी
 दो वक़्त की रोटी के खातिर
काहे को करे मनमानी..?
मैंने कितना तेरा साथ निभाया
जन्म -मरण सा जितना
जब छोटा बच्चा था मैं इतना
 तेरे पिता और मैं संग-संग
दोनों हुए जवान
हमने मिलकर बांटे
सुख-दुख एक समान
घर पर दु:ख की जब-जब 
छाई बदरिया..? सुख -चैन की छाया मैंने ही दी
अपने सारे हाथ फैलाकर
 मीठे-मीठे फल देकर
 अपने पुत्र धर्म का निर्वाह किया
 तेरे पिता का जब विवाह हुआ
पतझड़ में खूब झूमा नाचा
तेरे जन्म पे मैंने अपनी बाहों में झूला बांधा
तुझ अबोध बालक का मां जैसा
पल-पल रखा मैंने ध्यान
 मैं निर्जीव तुझ सा खिलौना पाकर हुआ निहाल
मुझे मत काटो !मुझे बहुत दर्द होता है!

डॉ मीना कुमारी परिहार
 मंच को नमन 🙏
चित्र आधारित रचना
29/7/21



चीर वृक्षों का सीना
क्या तुम खुश रह पाओगे
मिलेगा वही करोगे जो
आज नहीं तो कल पछताओगे।।

आसमान से गिरेगी बिजली
पहाड़ो को भी ढ़हा पाओगे
टूट जाऐंगे सब ग्लेशियर
क्या तब तुभी तुम मुस्कुराओगे।।

जैसी करनी वैसी भरनी
मुहावरा सकारात्मक ही पाओगे
प्रकृति हूं तो क्या हुआ मैं
तुम मुझे यूंही बिन कारण सताओगे।।

अरे चीर हर एक वृक्ष तुम
कितने बंगले बनाओगे
बंगले तो बन जाऐंगे
पर प्राकृतिक भोज कहा पाओगे।।

वक्त हे अभी भी संभल जाओ
वरना मेरा नाश करने वाले मानव
अपना वज़ूद इंसा तुम भी सुनो
मेरे प्रकोप से मिटा हुआ पाओगे

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************


*काट के मुझे क्या मिला* 
जिंदगी लेने वाले,काट के मुझे तुझे क्या मिला।
मेरी छाया में पला,बड़ा,एसा दिया मुझे सिला।

चढ़कर मेरे दामन पर,कितने खेल थे खिलाये।
साथियों के साथ मिलकर,सालो तक फल खाये,

बैठ के मेरी छाया में, अपना बचपन है बिताया ।
जब थक जाता खेत जोत मेरीं छांव मे सुस्ताया।

कैसा मतलबी है तू मतलब निकल गया मुझसे हे मानव,
चलाके अपनी कुल्हाड़ी,मुझ पर आज तू बन गया दानव । 
अपनी करनी पर एक दिन, जरूर पछतायेगा ।
जिस हवा मे जिंदा है,उसे पानेको तरस जायेगा,
*उसे ही पाने को तू तरस जायेगा*
*जनार्दन शर्मा* (आशुकवि लेख़क व्यंग्य)
अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर



पर्यावरण
----------
 हरे भरे वृक्षों को 
यूं ना काटो ऐ इंसान।
क्या तू जानता नहीं
  वृक्ष जीवन रक्षक हैं तेरे
   प्राणदायिनी वायु प्रदान
     करते हैं यह तुझे।
 अभी अभी महामारी में
 क्या कुछ सीखा नहीं
 प्राण वायु के बगैर इन
लाखों ने जाने गवांई अपनी।
  प्रकृति नेयह सब मुफ्त दिया
 समझ ना आया तुझे
 पर तू अब तो समझ रहे ,मानव।
 रक्षा करो इनकी,
  ना काटो इन्हें,।
 पर्यावरण की रक्षा करें
 हाहाकार मचा था चारों ओर
बिना ऑक्सीजन के लिए
 जो कि प्रकृति मुफ्त देती है हमें।
 अब तो मूल्य पहचाने 
रक्षा करें पेड़ लगाएं
 ताकि चहुँ ओर खुशहाली छाये
 ना कोई बिछड़े अपनों से 
बिना प्राणवायु के।
 स्वस्थ रहे हम हमेशा
 ना रहे कहीं प्रदूषण
 धरती मां को नमन कर
 रक्षा करें हम इनकी
 शुद्ध वायु शुद्ध जल  
 शुद्ध से स्वास्थ्य 
हमारा फले फूले।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना


चित्र पर
पेड़ काटकर मानव 
प्रकृति को विरान बनाते हो
हरि भरी वादियों को उजाड़
पर्यावरण को दूषित बनाते हो
पेड़ों को उजाड़ धरती को बंजर बनाते हो
हरियाली देख आसमान भी ख़ुश होता है
पेड़ों के हरे हरे पत्ते देख बरसात करता है
पेड़ों को काटने से धरती सुखी होती है
खुले जगह में फिर बरसात भी नहीं होती है
बादल फटकर पृथ्वी पर हाहाकार मचा देता है
जो तुमने पेड़ काटकर वीरान बनाई थी जमी 
पानी उस पर बेहिसाब दौड़ता है
उसके क्रोध का कारण निर्दोष भी बनते हैं
सभी को अपने साथ बना लें जाता है
पेड़ नहीं है बाढ़ के पानी को रोकने के लिए 
क्योंकि तुमने तो पेड़ काट खायें है 
हे मानव सुंदर जा जो हमारी धरोहर ‌है 
उसे नुकसान ना पहुंचा ।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग जगदलपुर छत्तीसगढ़



. विटप की कसक
इक टीस सी उठती है, जब कोई पेड़ कटता है।
प्रकृति भी दुःखती है, जब कोई पेड़ कटता है।

विटप हमारी धरा की, अमूल्य धरोहर होते हैं। 
हमारे जीवन में यह, संपूर्णता प्रदान करते हैं।
प्राकृतिक रूप से जीवन को, पूर्ण कर देते हैं।
रुख़ भी ज़िंदा मानव से, कम नहीं तड़फता है।
इक टीस सी उठती है जब, कोई पेड़ कटता है।

कितने दरख़्तों को मार, बाईपास बना डाले।
ज़िंदा हरे पेड़ न जाने, कितने लाश बना डाले।
चिल्लाकर उसने दर्द, इंसा से बयाँ कर डाले।
उनके तन का हर अवशेष, रोता-सिसकता है।
प्रकृति भी दुःखती है, जब कोई पेड़ कटता है।
इक टीस सी उठती है, जब कोई पेड़ कटता है।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर



नमन पटल
आज की विधा-चित्र आधारित रचना
विषय-पर्यावरण


चारो तरफ व्याप्त पर्यावरण,
है असली संरक्षक हमारा।
इसके हरे-भरे परिधि में रहकर,
मिलता हमें जीवन सुख सारा।

प्रकृति माँ की ममतामयी गोद में
 हम पले ,खेले और बड़े हुए।
इसकी सुरभित शीतल वायु,जल,
पीकर तन मन से हृष्ट पुष्ट हुए।

इसके अद्भुत मेवा और फलों से
रसना को मिलती कितनी तृप्ति।
गोमाता का अमृत तुल्य दुग्ध,
पीकर मिलती परम संतुष्टि।

पर स्वार्थलोलुपता के वशीभूत हो,
इनका नैसर्गिक सौंदर्य क्षीण किया।
जंगल,पेड़ों को काट काट कर,
उसे व्यथित, अंगविहीन किया।

घरा का दोहन कर अति निष्ठुरता से
खनिज पदार्थ ,धरत्न,निकालते हो।
सरिता ,सागर में गोताखोर बिठाकर,
सारे मोती माणिक्य उगाहते हो।

पर्यावरण को प्रदूषित कर अब
खामियाज़ा भुगत रहे उसका ।
ऑक्सीजन को तरस रहे,
हुई विषैली गैसों की अधिका।

जन जन है आज पीड़ित, लाचार,
करता प्रायश्चित अपने कर्मों का,
संभवतः ले रही प्रकृति प्रतिशोध,
अपनी उस मर्मान्तक पीड़ा का।

आइये एक प्रण ले आज हम मिलकर,
सुधारेंगे त्रुटियां यही वक्त की पुकार।
करेंगे संरक्षित पर्यावरण को सप्रयास,
वृक्षों को रोपेंगे हर घर के उपवन द्वार।

प्रकृति को न व्यथित और करेंगे,
स्वार्थलिप्सा में अब न कभी फसेंगे।
प्रकृति माँ की अकूत संपदा का ,
अब और न दोहन, हरण करेंगे।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
नई दिल्ली



* अग्नि शिखा काव्य मंच*
    * चित्र देख कविता लिखो *
    * गुरूवार २८/ ७/ २०२१ 
    * बिषय - पर्यावरण *

हरे भरे वनों की रक्षा अनुपम प्रकृति की संरचना ,
प्राणवायु हम इनसे पाते तभी स्वस्थ हम रह पाते !

हवा हो प्रदुषण मुक्त जीवन हो पंछियों सा उन्मुक्त,
प्राणवायु और गहरे श्वास रह सकते हम सब स्वस्थ !

जीव जन्तु ओर पंख पखेरू जल ,थल,नभ में रहते ,
पर्यावरण का संतुलन हम सब मिलकर के ही करते!

आधुनिकता के नाम पर जब से जीवन-शैली बदली ,
भोगवाद की लिप्सा ने पावन बसुधा मैली करदी !

गर ?जीव जगत सुरक्षित रखना है वृक्षारोपण हो ,
कंकरीट के जंगल में भी खड़े नीम ओर बबुल हो !

एक वृक्ष दस बेटों जितना पुरखे यूं ही नहीं कहते ,
जो प्रकृति का संरक्षण अपना फर्ज समझते !

धरती माता कल्पबृक्ष सम हम सबको सब कुछ देती ,
प्राणवायु,फल, फूल ,शुद्ध जल कोई कमी न रखती !

हम उसकी बिगड़ी संतानें नादानी कर बैठे ?
नंदन वन सी बसुधा से हम छेड़छाड़ कर बैठै ,

हर गलती सजा सुनिश्चित हमको भी मिल …...रही ,
कहीं भूकंप ,कहीं सुनामीं, कहीं सुखा कहीं पे आंधी!

अब पाप का घड़ा भर गया करोना का विकराल साया ?
आक्सीजन बिन जीवन में संकट घोर घिर - घिर आया !

ओजोन की परत में अब आ गई दरारें है !
पराबैंगनी किरणों से अब खुद को कैसे
 बचायेंगे ?

अब भी बाजी हाथ हमारे अभी भी कुछ नहीं है बिगड़ा ,
पेड़ और जल संरक्षण से मिट जायेगा सारा झगड़ा टंटा!

फिर हवा शुद्ध होगी ओर प्राणवायु भरपूर मिलेगी ,
आने वाली नस्लें हमारी पूर्ण स्वस्थ सुरक्षित होगी !

आओ मिल कर संकल्प करें सादा जीवन अपनायेगे ,
अपने बच्चों के समान ही वृक्षों की रक्षा कर पायेंगे !    

सरोज दुगड़ 
गुवाहाटी असम
🙏🙏🙏


#अग्निशिखा मंच 🌹🌹🙏🙏
🌹🌹
*दिन गुरुवार*
*दिनांक 29 जुलाई 2021*
*विषय चित्र आधारित* *(पर्यावरण )*
*विधा कविता*

बेमोल दिया करती थीं जो सांसें
देने से वह भी अब कतराने लगीं
हमनें उजाड़ा स्वयं अपना घर , तो
वह भी सांसों की क़ीमत मांगने लगीं

क्या ग़लत किया प्रकृति ने..बोलो
हमनें ही तो यह दिन दिया..
सिर्फ़ कागज़ों में ही रखा वृक्षों को
धरा तो हमनें वृक्ष - विहीन किया

न चलाओ कुल्हाड़ी हम पर तुम!
बारम्बार देती रही प्रकृति चेतावनी!
मगर मनुज आकांक्षाओं का मारा
करता रहा सदा अपनी मनमानी!

देख लिया वृक्षों को काटकर
सबक कैसे सिखलाती है धरा
वृक्ष लगाओ, जंगल बनाओ...

महज़ नारों से नही सजती धरा!!

आइए हम सब अब प्रण लें
फिर, धरती हरी भरी बनाएंगे
जो छीना है प्रकृति से हमने
सादर उसे लौटाएंगे!!

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*अनुपपुर ( मध्यप्रदेश )*


*विषय -चित्र आधारित*

🌹मन के विचारों की लड़ी है
जिंदगी पर्यावरण पर खड़ी है,

क्या सोचे अब मानुष क्या देखे 
सब तेरी ही देन है सब ये देखे,

काट पेड़ों को नई दुनियां सवारे है 
फिर बाद में काहे तू पछताए है,

कैसा ये द्वन्द है विचारों में
सब उजाड़ क्यों दुख है मन में,

पर्यावरण संतुलन से जीवन हैं
यही मनन से सही जीवन है,

अब सुधर जा मानव क्या देखे है 
क्योंकि पर्यावरण से जीवन डोर है

हेमा जैन (स्वरचित )


🙏🌹अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹29/7/21🌹🙏
🙏🌹चित्र पर आधारित 🌹🙏
🙏🌹 *क्यों कांटे वृक्ष* 🌹🙏


कुल्हाड़ी लेकर खड़ा, मानवी तुम अज्ञात ।
औक्सीजन ढूँढें रहो , फिर करों अश्रुपात ।।

क्यों काटो तुम वृक्षको, मूरख मानव आज। 
एक लगाकर वृक्षको, रखने अपनी लाज।। 

सेवा करते झाड़ जो, संत खड़े है द्वार। 
तुम जब पत्थर मारके,फल फूल दे अपार ।।

प्राण वान यह वृक्ष है, बचे हमारी जान। 
हो जाते निस्तेज हम, रखलो उनका मान।। 

🙏🌹स्वरचित 🌹🙏
🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏


अग्निशिखा मंच
तिथि-२९-७-२०२१
विषय -चित्र पर कविता

हे! मूर्ख मानव ना कर यह मूर्खता, 
जिस डाल पर बैठा है ,उसे ही काटने चला।
ऐसा ही एक बार कालीदास ने किया था.
पर पत्नी के धिक्कारने पर मेघदूत लिखा था.
मोटी चमड़ी के मानव क्या कहें तुम्हें,
काटते जा रहे हो पेड़,कोई डर नहीं है तुम्हें
धिक्कार का भी असर पड़ता नहीं है तुम्हें.
आकाश में छेद किया,असर दिख रहा है 
ना काटो पेड़ ,पर्यावरण को नष्ट ना करो.
कहीं अतिवृष्टि कहीं अनावृष्टि को रोक लो.
नहीं तो प्यारी सी धरा खत्म हो जायेगी,
पेड़ लगाते चलो,धरा हरीभरी हो जायेगी.

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र


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2 Comments
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  1. बहुत ही सुंदर आयोजन व संकलन।सभी रचनाकारों को बधाई आ0 अलका दी को कोटिशः आभार संग नमन 🙏🏼🙏🏼🌹🌹

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