Thursday, 3 June 2021

दोहे कविता चित्र पर लेखन। अग्निशिखा मंच ३/६/२०२१ चित्र पर दोहे_DR ALKA



अग्निशिखा मंच 
३/६/२०२१
चित्र पर दोहे 

अम्मा तौल कर दे रही 
भाजी का बाज़ार । 
बेटा घर मौज  करता 
माँ बेचती अचार ।।

तन मन थक कर चूर है 
बच्चे रहे सब मस्त ।।
हर दिन  बस काम करती 
जीवन होता अस्त ।।

झोला भर कर ला रही 
खेतों से है बीन 
 साथ देती कचोरियाँ 
पैसे लेती गीन  ।।

जीवन के कुछ दिन बचे 
फिर भी करती काम 
दिन भर मेहनत करती 
कभी नहीं आराम 
अलका पाण्डेय मुम्बई

कचरिया वाली अम्मा
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय_चित्र पर कविता
[Image 380.jpg]
पहचाना क्या इन्हें क्या हैं?
मैं बेचूं कचरिया ।
वन _फल है एक ये,
राम_लखन हैं चखिया ।
कान्हा जब धेनु चरावत,
खाए संग राधा_सखियां।१।
भोर भए खेतों में जाऊं,
चुन_चुन कचरिया लाऊं।
कसकर इन्हें पोटली बांधूं,
संग बाट_तराजू लाऊं।२।
यही करत बचपन बित्यो,
बीत गई जवानी,
बुढ़ापे की दहलीज पे आई,
ये परिश्रम की "रानी"।३।
मोहे देख दुखी मत होईयों,
मैं हूं बड़ी स्वाभिमानी,
अपने मन की रानी हूं मैं,
कर सकती हूं मनमानी।४।
बेटा_बहू पे शक ना करियों,
मैं तो रही सदा कंवारी,
पहले बहना,फिर मौसी,
अब अम्मा सबकी प्यारी।५।
अपने काम में बड़ी चतुर हूं,
ना करती बेइमानी,
आत्म_निर्भर रहती मैं,
गलत बात न मानी।६।
चूल्हे की मोटी भाकर खाऊं,
पियूं घड़े का ठंडा पानी,
कुटिया आगे खाट बिछाऊं,
झट आ जाए निंदिया रानी।७।
हर घड़ी जपूं नाम राम का,
उसका एक भरोसा,
जो वो दे दे,माथे से लगा,
खाऊं वो परोसा(थाली)।८।
ना चिंता कुछ खोवे की,
ना लालच कुछ पावे का,
ना मोह धन_दौलत से,
ना डर दुनिया छोड़ जावे का।९।
कोई नाही जगत में अपनो,
यही पुरानी रीति,
ले सको तो ले लियो,
मेरे जीवन से सीख।१०।
बहुत गई, थोड़ी रही,
ये भी बीत जाएगी,
मैं न रहूंगी पर......
तुम्हें याद बहुत आऊंगी।११।
 हैं न?
स्वरचित मौलिक रचना_
रानी अग्रवाल,मुंबई ३_६_२१.

अंग्निशिखा मंच
वर दे माँ वीणा वादनी
     ३/०६/२०
बिषय  चित्र आधारित
बुढी़ माई के बच्चे दिये जब माँ को छोड़।
 बुढी़ माई का दुःख से भीगने
  लगे नयन के कोर।
 माँ बैठी सोचन लगी ये कैसे मेरे बच्चे है।
इनके लिए मै अपना सब सुख  त्यागा है।
पढा़ लिखा कर बडा़ किया है।
 चार पैसा जब हाथ मे आया है।
तब इन्होंने हमको छोड़ कर नया घर बनाया है।
भूल गये दुलार हमारे  भूल गये मेरे कोख के जाये है।
 अब मै क्या करू फिर माँ  .
गई ठाकुर के खेत।
वहा से परवर लेके आई सिर पर धूप बहुत थी तेज।
मै सब्जी बजार मे बेच कर
मेहनत की रोटी खाऊँगी।
बच्चें क्या हमको छोडेगें
मै बच्चों को छोड़ जाऊँगी।
स्वरचित
   बृजकिशोरी त्रिपाठी

मैं अम्मा को समझाती
******************

वृद्धावस्था मे सूझे ना कुछ
बच्चों सी प्रवृत्ति हो जाती
जानता हर कोई ये बात
पर अम्मा बाजार चली आती।।

वो तो मूल्य से अधिक प्यार लुटाती
अम्मा को कहां पता दुनिया
लूट जाती
कहती अम्मा किस्मत ना लूट 
कोई पाऐगा
ये तो खाद्य पदार्थ है सच 
दो दिन तो कोई खाऐगा।

कोरोना के चलते गवाऐ अपने
कैसे भी कर बस पेट पालती
मानवता दुनिया दिखाऐ अम्मा संग
जो इंसानियत को ही पहचानती।।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************

बेबसी

कमर  है मेरी  झुकी  हुई ये, 
फिर भी काम  मैं  करती हूँ। 
सब्जियों  को   बेच-बेचकर, 
अपना यह पेट मैं भरती  हूँ। 

अपना दूध  पिला पिलाकर, 
जिनको  है मैंने बड़ा किया। 
निवाला निज मुंह का देकर, 
जिनको है मैंने खड़ा किया। 

आज  उनके  ही जीवन  में, 
 मैं   भार  बनकर जीती  हूँ। 
अमृत के बदले में  विष की, 
प्याली  आज   मैं  पीती  हूँ। 

कलयुग की  महिमा  कैसी, 
मात-पिता ही अब भार  है। 
जिसके  दो  दो  बेटे वे  भी, 
बेबसी   में    जार-जार   है। 

मात-पिता दस को है पाले, 
एक   पेट  नहीं   पलता  है। 
जिनको  दी जीवन-ज्योति, 
उनको  ही  वह  खलता  है। 

डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश

मंच को नमन 🙏चित्र पर आधारित रचना 🙏
दिन गुरुवार दिनांक ३/६/२१


जर्जर काया स्वाभिमानी,
 कर्म करती निरंतर, सुख-दुख इसके लिए,
 ना रखता कोई अंतर।

आत्मनिर्भरता जवाबदारी है,
 इसी में समझदारी है ,
हर कार्य में वफादारी है,
 करती इसमें इमानदारी हैl

धूप शीत का ना असर है,
 मेहनत जिसकी प्रखर है,
 हर दुख को विसारी है ,
आगे बढ़ती माई न्यारी है🙏
 
कर्म में लीन  है,
 ना यह दीन है,
 नयन में अश्रु भरे हैं, प्रभु को प्यारी है ,
यह माई निराली है

संदेश,,,


 हे नाथ ना कर अनाथ,
 कर्मठता से जूझते रहे ,
दुर्दिन के लिए मुद्रा बचा के रखे,
 हर पल स्वाभिमान से जीते रहे।🙏
 हे नाथ ना कर अनाथ ,।
🌹✒️✒️✒️✒️✒️🌹🌹🌹🌹
सुषमा शुक्ला इंदौर स्वरचित


मंच को नमन
विषय:-- *चित्र पर आधारित कविता*

कोरोना काल में, गांव में बाजार से
खरीददार नहीं जाते।
रास्ते में ही गांव की औरतें
टोकरी में लेकर या घूम घूम कर
सब्जी बेचती है।

एक अम्मा मेरे घर आती है,
मम्मी, अम्मा को निराश नहीं करती
जो भी लेकर आती है पूरा ले लेती है
पैसा लेने से पहले बहुत दुआ देती है।
सब्जी से ज्यादा आशीर्वाद देती है।

मेरी रानी बिटिया के लिए एक केला
अपने आंचल में बांध कर लाती है।
प्यार से  उसे खिलाती है।
पैसा नहीं मांगती।
 कहती हैं,मैं जो,
 मेहनत करती हूं 2 जून की रोटी के लिए
मम्मी 3 जून की रोटी के भरोसा देती है।
तब सब्जी से ज्यादा आशीर्वाद देती है।

मम्मी बोलती है जरूरतमंद को मदद करने से पुन ही पुन होता है।
हमें नहीं जाना है मोल ।

विजयेन्द्र मोहन।

नमन मंच,🙏🙏
आज की विधा-चित्र आधारित कविता

स्वाभिमान से तनी हुई 
आंखों में दृढ़ता बनी हुई,
 मैंने बूढ़ी माँ  को देखा ,
टोकरी ले सब्जी ले बैठी हुई।

घंटो बैठी  कपड़े सिलती।
सब से खुश होकर मिलती,
मैंने बूढ़ी मां को को देखा,
दुःख में भी मुस्कराते हुए।

 प्रभु चरणों में लीन हुई,
उनकी अनन्य सेविका हुईं।
  मैंने बूढ़ी माँ को देखा ,
प्रभु से कुछ बतियाते हुए।

चश्मा आँखों में लगाती हैं,
थोड़ा चलते थक जाती हैं।
कमर है इनकी झुकी हुई,
सब काम स्वयं ही करती हैं।

बेटे बहू के लिए बोझ हुई,
दो रोटी की मोहताज़ हुई।
अपना राह स्वयं निकाला।
आत्मसम्मान से जी रहीं।

रिश्ते कई स्वतः बन गए,
जब अपनों ने ठुकरा दिया।
मैंने बूढ़ी माँ  को देखा ,
लोगों को आशीष देते हुए।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
नई दिल्ली✍️✍️

छवि विचार 


कर्म ही जीवन है ,
 यह सन्देश दे रही अम्मा ,
खुद्दारी और स्वाभिमान की मिशाल है अम्मा ,
सबका रखती  है मान है अम्मा ,
खुद जीती है सम्मान से अम्मा ,
नहीं किसी पर बोझ है अम्मा ,
बुढ़ापे का ग़ौरव है अम्मा ,
उम्र ग़ालिब क्या चीज है ,
 मन का हौसला  और तन की फुर्ती ,
, सब संभव है ,
 ये बता रही  है अम्मा ,
मजबूत है जब मन ,
 तो उम्र बढ़ने का क्या गम , 
कह रही है अम्मा |

स्मिता धिरासरिया  बरपेटा रोड

$$ आत्मनिर्भर $$

हाँ मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
उम्र जरूर हो गई अस्सी 
चेहरे पर अभी भी है हंसी 
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
 सड़क पर बैठी हूँ
लेकर आई खेतों से काचरी 
ले जाओ मैं दे दुंगी सस्ती 
मुँह मे दांत नही पेट मे आंत नही
किसी की मुझे आस नहीं
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
हाथ मे जान नहीं
उठता मुझसे कांटा नही
फिर भी बेच रही  सब्जी हूँ
क्योंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ
नहीं किसी के सहारे हूँ
दिखे रास्ते मे कोई मेरे जैसी 
खरीद लेना तुम उससे कुछ भी
मान रह जायेगा उसका
तोड़ नही पायेगा कोई उसको
आत्मनिर्भर बनाना किसी को
होता है बड़ा पुण्य का काम
मत करो अनदेखा कहीं भी
सड़क किनारे बैठे किसी को

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

वीना अचतानी, 
चित्र पर आधारित  कविता ****
 मेरे पड़ौस में, 
रहती है एक बूढ़ी  अम्मा 
चान्दी से बालों वाली 
चान्द पे चरखा 
कातती सी लगती है अम्मा 
करोना में सब अपने गंवाए
फिर भी जीवन से 
न हारी अम्मा 
ओढ़े बूढ़े तन की चदरिया 
सिर पर गठरी लादे
घर घर तरकारी
बेचती अम्मा 
नहीं  करती कोई
मोल भाव
काँपते हाथों  से दे आशीष
सब्जी  तोल देती अम्मा 
हम बच्चों  पर प्यार  लुटाती
शाम होते ही फलों 
पर नमक लगा हमें  खिलाती 
माँ  ने कहा  तरकारी मत बेचो
हम करेंगे तुम्हारी रखवाली 
चेहरे पर गर्व  भरी मुस्कान से
मना करती रही  अम्मा 
हम सबकी कुछ भी नहीँ लगती
पर हमारे लिये  सब कुछ है अम्मा 
काँपते दिये की लौ सी 
आत्मविश्वास से 
भरपूर लगती है अम्मा  ।।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपर (राजस्थान)....

अ. भा. अग्निशिखा मंच
गुरुवार -3/6/ 2021

विषय- चित्र पर कविता


माँ की दुआ न जाती खाली।


सब्जी ले लो कोई भाई, 
मैया ने आवाज लगाई।
पहले सुख से सब थे रहते।
दो बच्चों का पालन करते।।

पति को रोग ले गया भाई।
रोते रहे बच्चे व माई।
कठिनाई से बेटे पाले।
रहते थे खाने के लाले।।

बाद में बन गए अधिकारी।
दिन बदले जब आए नारी।
शादी होकर बहु घर आई।
कठिनाई में हो गई माई।।

अलग हो गए दोनों बच्चे।
अपनी जगह दोनों थे सच्चे।
रह गई थी अकेली माई।
कैसे गुज़रे न थी कमाई।।

बूढ़ी अम्मा कभी न हारी।
विपदा से हारी कब नारी।
वह थोड़े से परवल लाई।
अल्प उठा सकती थी माई।।

धरती पर थी शाक बिछाई।
स्वाभिमानी बड़ी थी माई।
सालन इनसे खरीद ही लेना।
इनको कभी भी दुख न देना।।

माँ बच्चों का पालन करती।
बच्चों को माँ भारी पड़ती।
माँ की दुआ न जाती खाली।
कृपा प्रभु की होती आली।।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश

🌹चित्र पर आधारित🌹     (कविता)

जीवन चलता 
सांसों के बल
जीवन पलता 
पैसों के बल ।
इसलिए ये 
बूढ़ी अम्मा
तौल रही है
परवल की सब्जी।
पाकर पैसे चार
जो हैं उसके                      जीने का आधार ।
जला कर चूल्हा 
बुझाएगी पेट की आग।
जब तक सांस है 
तब तक आस है।
न पूछे बेटा 
न दे बहू खाना 
फिर कैसे जीना ?
ईश्वर उन्हें सुखी रखे 
न आए उनके          जीवन में कभीआंच 
ये है ,मेरे अंतर्मन का
आशीर्वाद ।
क्यों किसी के आगे 
हाथ फैलाऊं  ?
झुकी कमर है
ताकत भी कम है
पर हिम्मत की
कभी नहीं है ।
मान सम्मान से
जीने की शक्ति
अब भी है बाकी। 
इसलिए तो 
बैठ बाजार में 
बेच रही हूं सब्जी।
ये जमाना ऐसा ही है
नहीं पूछता सयानों को कोई ।
बोझ हैं ,समझे जाते 
दुत्कारे व घर से 
निकालें जाते ।
कल जब उनका
बुढापा आएगा 
तब अपनी भूल
समझ पाएगा ।
तब पछताए 
कुछ न हो पाएगा ।
********************
स्वरचित व मौलिक
डाॅ .आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
*******************

नमन  अग्निशिखा मंच 
आयोजन ---चित्राभिव्यक्ति
दिनाँक --3/6/2021
    🌹आत्मबल🌹
जज्बा तेरा अपरम्पार
नहीं थके तू नहीं रुके तू
मेहनत करती  तू हर बार।
स्वाभिमान है तेरी थाती
आत्मबल तेरा  गहना
इस वय में भी करती श्रम 
तेरी क्षमता अपरम्पार।।
तेरी मेहनत दे हौसला 
जीवन मे कुछ करने का 
पर जैसी संतान जो 
भूल गयी उपकार तेरा।
तू तो माँ है सब सह लेती
बच्चे भी अब सोचें  इक़ पल 
जिस माँ ने था  पाला पोसा 
रखें उसका भी ध्यान जरा।।
निहारिका झा।।🙏🙏🌹🌹

नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
प्रतियोगिता हेतु
दिनाँक-3/6 /2021
चित्र आधारित रचना

सब्जी ले लो, सब्जी ले लो बूढ़ी माँ ने बोला।
मैंने कहा मुझे दे दो काचरी 1 किलो तोला।।

कितने पैसे लोगी अम्मा मुझको यह बतला दो।
जितना तुम दे सकती हो मुझको तुम पकड़ा दो।।

स्वाभिमान से जीती बेटा नहीं हाथ फैलाती।
दूर-दूर खेतों में जाकर काचरी  तोड़ लाती।।

राजस्थानी सब्जी है, ज्वार बाजरे मैं उगती।
थोड़ी कड़वी थोड़ी खट्टी -मीठी स्वाद में यह होती।।

तुम  जो दोगी मैं ले लूंगी मेहनत की मेरी कमाई।
तोड़ते हुए हाथ दुखते चलते हुए पैर दुखाई।।

फिर भी पेट में भूख लगती घरवालों ने निकाला।
कम पैसे देकर चले जाते है मेरा निकालें दिवाला।।

रेखा स्नेहा' कहती सभी से मत कर ओछी हरकत।
दो पैसे तुम बचा लेते हो तो क्या होती उस से बकरक्त।।

किसी गरीब का हक मारी मत करना तुम भैया।
बहुत सारी भूखी रह जाती हमारे घर की मैया।।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

बच्चों के मां बाप  मर गये
कोरोना की भेंट चढ़ गये
उनके पेट की आग बुझाने
अम्मा बीच बाजार है बैठी
भेज रही है हरी सब्जियां ताकि लोग लेकर दे पैसे
उससे चावल दाल आटा ले
टीवी देखो लाल की जाती
दिन भर काम करके यह बूढ़ी अम्मा है थक जाती।
ममता नहीं मानती उसकी
नमस्ते जी है नहीं चुराती। भूख लगे आप पानी बरसे
रोज रोज बाजार है आतीअपने खेत की उगी सब्जियां विक्री 
करके काम चलाती।
इतनी बड़ी उम्र में भी वह दुनिया को है यही सिखाती।
साहस कभी न छोड़ो भैया
अपने जीवन से समझाती।
*******
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी

अग्निशिखा मंच 
विषय---चित्र पर आधारित 
शीर्षक---बूढ़ी अम्मा 
दिनांक---3-6-2021 

ना जाने कैसा यह वक्त है आया 
संगी साथी का साथ जो छूटा 
तो हर कोई हो गया पराया 
जिन बच्चों को जन्म दिया 
उन बच्चों को भी बोझ लगे 
अब मां की जर्जर बूढी़ काया ।

निकल पड़ी खुद धंधा करने 
स्वाभिमान जो मन को भाया
 जब तक सांसे हैं अपनी 
तब तक पेट तो भरना है
खेतों से ले आती सब्जी 
हर मौसम में मेहनत करती ।

 सर्दी गर्मी की परवाह इसे ना 
बारिश में भी कभी ना थकती 
शांत भाव से सदा है रहती
चेहरे पर मुस्कान है रखती
 लेने आता जो भी सब्जी 
इमानदारी से तौल है करती ।
फिर साथ-साथ दिल से जो
 बन आए ग्राहक उसके 
आशीषों से है झोली भरती ।

 हिम्मत और हौंसले से 
वक्त की मार को सहती
नालायक औलादों के लिए भी
हरदम दुआ मन से करती।
वक्त की पुकार,अपनी करो सम्हाल,
आश्रित रहना,आश्रय लेना दुष्कर काम 

 बस मन के अंदर एक दीया 
आस का रोशन करती और
 प्रभु से यही विनती करती 
हाथ पाँव में यूँ ही ताकत देते रहना
 बस जब तक साँसे हैं मेरी 
मोहताज किसी का ना बनने देना
 तेरी ही कृपा दृष्टि से यह 
जीवन गुजर जाएगा 
जीवन की अंतिम बेला में 'रानी'
 हे प्रभु तेरा सिमरन ही साथ निभाएगा ।

                       रानी नारंग

अग्निशिखा मंच
तिथि- 3-6-2021
विषय- चित्र पर कविता


एक दिन देखा मैने, बूढ़ी माँ बैठी सड़क किनारे
थकी सी वह दिखती, चेहरा उतरा भूख के मारे।


थोडे से तो परवल हैं और वो भी पीले पीले 
कौन लेगा इससे सब्जी ,सब उससे कहते।

कोई पास न रूकता ,सब्जी लेने जो जाते।
जिसके मुँह जो भी आता उससे कहते।

बूढ़ी माँ किससे कहे दु:ख अपना
बेटा बहू मरे कोविड से ,छोटा बच्चा रोता उनका।


मैने सारे परवल उससे तुलवाये।
और कोई ना खाये ,मेरी गाय को ये मन भाये।

मैने कहा कल फिर आना और सब्जी लाना।
अपने और अपनी गाय के लिये मुझे है सब्जी ले जाना।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबीवली 
महाराष्ट्र

अग्नि शिखा मंच
दिनांक 3.6.2021
वार गुरुवार
चित्र पर आधारित
सबसे पहले बूढी अम्मा जी कोप्रणाम करता हूं।
सिर पर उठाकर टोकनी,
सब्जी भाजी बेचने के ,
जस्बे को नमन करता हूं।
उम्र आराम करने की,
पर काम कर औरो का जस्बा भी बड़ा रही है।
काचरे को बेचकर,
रोजी रोटी कमा रही है।
बच्चे भले ही लायक ही,
लायक होगें
पर उन्हेभी कुछ सीखा रही है।
किसी के भरोसे जिंदगी न जीना,
यह सारे मानव समाज को सीख दे रही है।
कर्म की महत्ता बड़ा रही है।
मेहनत इस उम्र भी कर ,
स्वयं को बीमारी से दुर रख रही है।
सबसे बड़ी बात अपना स्वाभिमान कायम रख जिंदगी जी रही है।

दिनेश. शर्मा इंदौर
मोबाइल9425350174

स्वाभिमान ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
( चित्र पर आधारित कविता) 
माना आज मैं हूँ अकेला
उम्र मेरी अब ढल चुकी है
कुछ भी नहीं है पास मेरे
पर अपने हाथों के ले सहारा
जिन्दगी जीऊंगां मैं अपने ही बल पर....... 1
हांथ न फैलाया किसी के सामने 
न किसी के सामने सर ही झुकाया
नजरें न मैंने कभी झुकने दिया
न झूठ बोल कर कभी पैसा कमाया
जिन्दगी जिऊंगा मैं अपने ही बल पर........ 2
जब भी अपना हांथ है मैंने बढ़ाया
कुछ न कुछ देने के  लिए ही बढ़ाया
कभी सहारा तो दिखाया रास्ता कभी 
रोका है अन्याय को भी होते हुए
जिन्दगी जिऊंगा मै अपने ही बल पर...... ... 3
काम कोई भी हो छोटा होता नहीं
खुद के बल से जो भी है कमाया
केवल उसी पर होता अपना हक़ है 
सहारा दूसरों का मुझको  तो लेना नहीं
जिन्दगी जिऊंगा मैं अपने ही बल पर.......... 4
( यह मेरी मौलिक रचना है --- ओमप्रकाश पाण्डेय)

कविता

शीर्षक .चित्र आधारित

जिंदगी में हैं तोल के ही मोल है ,
बहुत ही अनमोल , मीरा ने कृष्ण को
" लियो तराजू तोल" यह जीवन है अनमोल, स्त्री पुरुष से प्रकृति दीखे , 
 कहां अजर है बेमोल, जीवन ज्ञापन करने भर को , 
तोले  है कचकोल, स्वर्ण कंगन हाथों में बाजे,
  खरीदे हैं भाव तोल, बूढ़ी लाचार तोलती, किस्मत के तराजू तोल,
 विघ्न हरण सुफल करण ,
दीजो भाव सुमोल,  जिससे  जी उठे यह चोल  , 
खुशहाली छाये चहुं ओर  , 
आए नहीं कभी भूडोल, 
 जीवन का सफल करो भूगोल , 
 छल कपट की खुल जाए पोल , 
दुनिया लाख हो गोलम-गोल , 
वचन भी बोलो तोल के मोल , 
जिंदगी में है तोल के ही मोल.

स्वरचित कविता रजनी अग्रवाल जोधपुर

गुरुवार दिनांक*** ३/६/२१
विधा***** कविता
विषय*** चित्राधारित रचना
                 ^^^^^^^^^^

ऐ  जिंदगी  कितना  तूने ।
       शर्मनाक काम किया ।।
एक   बूढ़ी  मां  का  तूने ।
       आराम  हराम  किया ।।१

जिंदा  रहने   के   लिए  वो ।
        बाजार सब्जी बेच रही ।। 
जीवन गाड़ी को  एक वृद्धा ।
         अकेले  ही  खेंच  रही ।।२

ऐ जिंदगी  वृद्ध तन पर तूने ।
  ज़रासा भी लिहाज़ न किया ।।
शुक्र मान उसका कि उसने ।
  तुझसे ज़िद जि़हाद न किया ।।३

जीवनमें कभी  किसीका भी ।
    ऐसी  दशा  बेहाल ना  हो ।।
ऐसाभी जीना क्या किसीका।
   जीते  जी  इंतकाल ना हो ।।४

अपने भी आज स्वार्थी हो गए ।
    चले गए सब साथ छोड़ के ।।
मोह  माया  में ऐसे फंसे सभी ।
     दूर  हुए सगे  मुंह  मोड़ के ।।५

मेहनत करती भीख नहीं मांगे ।   
  आज भी मां काम  कर रही ।।
देख दुनिया उसकी खुद्दारीको ।
  झुकके दुआ सलाम कर रही।।६


प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर 
        महाराष्ट्र ।

*अग्निशिखा मंच को नमन*
विषय ===
चित्र पर आधारित रचना

        °°°°°°°°°°

  मैं एक असहाय बूढ़ी मां ।
  नहीं काम करने मेरी  उमर।।
  पति बेटेकी जानली कोरोना ने।
  कर दिया  मेरा जीना दूभर ।।१

पेट भरने के लिए ।
  सब्जियां बेचती हूं मैं ।।
   किसी की कृपापर ।
    जीना नहीं मुझे।
      थरथराट हाथोंसे ।
        वजन तोलती हूं मैं ।।२

बूढ़ी जरूर हूं में मगर ।
 अपना पेट भरना जानती हूं ।।
भीख नहीं मांगती किसी से ।
स्वाभिमानसे जीना चाहती हूं।।३

 हां  मैं आज मजबूर  हूं ।
  अपनों से भी बहुत दूर हूं ।।
किस्मत ने भी साथ छोड़ा ।
  दुख दर्दसे  चकनाचूर हूं ।।‌४

आज भी हाथ मेरे सलामत है ।
और कितनी आनी कयामत है ।।        
मैं भी देखूं जरा उसकी जिद को ।
मुझमें आजभी लड़नेकी हिम्मत है।।५।।

कवि ==सुरेंद्र हरडे
                नागपुर महाराष्ट्र
दिनांक:-03/06/2021
दिन:-    गुरुवार

जय मां शारदे
***********
 अग्निशिखा मंच 
*************
दिन -गुरुवार 
दिनांक -3/6 /2021
चित्र आधारित रचना

लग रही है किसी की दादी,नानी ।
अवस्था कह रही है लाचार कहानी।
उम्र से भी अधिक तराजू का भार है ।
तौलना शौक नहीं पेट की दरकार है। 
कोरोना में खो दिया सारे अपनों को ।
विधाता ने तोड़ा इनके सुनहरे सपनों को ।
दो छोटे-छोटे पोता पोती को जिलाना है। 
इसलिए मुझे तराजू उठाना है ।
सुबह से शाम तक वजन ढोती हूं भारी ।
बाल सफेद हो गए पर छूटी नहीं खुद्दारी ।

रागिनी मित्तल 
कटनी मध्य प्रदेश

नारी शक्ति स्वाभिमान की
दर्द ‌सहती उफ़ तक नहीं करती
अपने स्वाभिमान को छूकने नहीं देती
जिन्दगी भर जिन हाथों ने मेहनत की है
ओ हाथ अब आखिरी पड़ाव ‌मे  कैसे रूकती
परिवार को अपने भरोसे 
अपने जिम्मेदारी में पाला है
 जिन्दगी की हर परीक्षा को पार किया है
 हर परिस्थितियो का डटकर मुकाबला किया है
अपने परिवार को अपने दम पर सींच कर  काबिल बनाया है सबकी जिम्मेदारी जिसने पूरी उम्र उठाई है
सिर्फ कुछ लम्हों के लिए अपनी जिम्मेदारी दूसरे को कैसे उठाने अशक्त दिखती हूं पर अशक्त हूं नहीं
अभी भी मेरे शरीर में शक्ति है
फिर मैं शक्ति हीन नारी कैसे बन बैठू
इसलिए अपनी जिम्मेदारी खुद से उठा रही‌ हूं 
स्वाभिमान से जिन्दगी शुरू की थी ।
 स्वाभिमान से ही जाऊंगी
दो वक्त की रोटी खाकर क्यों अपमान सहूगी
इसलिए अपनी हिस्से की मेहनत खुद कर रही हूं
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।

चित्र पर आधारित
यह हाथ मेरी आन बान और शान है
अपने जीवन का स्वाभिमान हैं
बूढ़ी अम्मा के हाथों है तराजू
हरी-भरी सब्जी को तौल रही है

अपना हाथ है जगन्नाथ
समाज को दे रही है संदेश
आश्रिता कभी ना बनना
कुछ ना कुछ करते रहना
हाथों में जब तक है दम
समाज परिवार में है मान

कभी लगता है परिस्थिति की विवशता
कभी लगता है आत्मनिर्भरता
कारण चाहे जो भी हो
दया भाव करुणा की नहीं है देवी
सम्मान के साथ जीने का हौसला
शारीरिक क्षमता हो जाए कम
हिम्मत साहस से है जीने का दम

कुमकुम वेद सेन

*चित्र आधारित*

लिए हाथ तराजू बूढ़ी मां
तौल रही थी स्वयं को आज
संस्कारों में कमी हुई कहां थी
जो संतानों के रहते है निःसंतान आज!

कितनी रातें जगकर बिताई थीं
कितने सपनो संग पाला था उनको
छोड़ गए आख़िर क्यूं वो एकाकी
हर दुखों से बचाकर रखा था जिनको

मां फिर भी मां है हार नही मानती
इज्जत की रोटी से पेट अपना भरती
तपती है वह दोपहरी के धूप में भले
पर सर ऊंचा कर वह तब भी रहती।

*मीना गोपाल त्रिपाठी*

नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु में मेरी कविता प्रस्तुत करती हूं।
चित्र पर आधारित रचना

विषय-  मा का साया

मैं जीते जी खुद को राजा समझता रहा
पर पता चला मैं राजा की तरह जीता इसलिए क्योंकि 
मुझपर मा का साया रहा।

मैं खुद को ही धनवान समझने लगा पर पता चला 
मैं धनवान इसलिए हू क्योंकि, 
मुझपर मा का हमेशा के
 लिए साया रहा।

मैं खुद को ही अच्छे इन्सान बनने का श्रेय देने लगा 
पर पता चला मैं अच्छा हू, इसलिए क्योंकि, मुझपर मेरे 
मां के संस्कार और 
हमेशा के लिए साया रहा।

मैंने यूही खुद में 
मा को संभालने की भावना 
मन में बिठा कर रखी 
पर पता चला 
मा नहीं बल्कि मैं ही
 उस पर बोझ 
बनकर जीता रहा क्योंकि, 
हमेशा के लिए मेरी मा का 
मुझपर साया रहा।

मा तो उसके
बूढ़ी उम्र में भी कुछ 
चंद पैसे मिलाकर मुझे आर्थिक और मानसिक आधार देती रही और हमेशा के लिए 
मुझपर उसका साया रखती रही।

धन्यवाद
पुणे
अग्निशिखा मंच 
विषय- चित्र आधारित रचना 
शीर्षक- आत्मनिर्भरता है मेरी पूंजी 

भरी दुपहरिया 
उमस है गहरी 
अम्मा बेच रही
सब्जी तरकारी।

एक दिन मैंने 
पूछा अम्मां से 
क्यों बेच रही सब्जी?
क्या घर में नहीं कोई 
कमाने वाला।

वह हंसकर बोली
क्या बताऊं बिटिया-
घर भरा पूरा है 
चार छः नाती पोते हैं 
पर अब कोराना से 
बीमार पड़े हैं।

मैंने कमाकर 
बेटों को रहने को 
घर बना दिए हैं।
आदमी शराबी 
उसे भी शाम को 
देती हूँ दमड़ी 
वह पीकर मस्त रहता। 
मैं जी रही हूं 
आत्मनिर्भरता से, 
जब तक सांस है 
तब तक आस है।
चाहती हूँ-- 
ठीक हो जाएँ पोते- पोती  
यही है मेरी आत्मनिर्भरता 
की मनचाही पूंजी।

डा अँजुल कँसल"कनुप्रिया"
3-6-21

वह बूढी थीगली अंगेछी में ,
व्यस्त थी सब्जी तोलने में।

व्यस्त है मगर स्वस्थ तन से,
बेचती तरकारी खुले मन से।

भूख मिटाने पाई कमाती हे
ईमान से प्रेम वह करती है ।

जरुर वह गरीब माँ होगी, ममता की कमी न होगी।

बोलती हैं अपने पोते से ,
सदा करो कर्म खुशी से।

दो रोटी की कमी न होती,
नेक कमाई तू कर पोती।

 हैं हरी ताजा अनेक सब्जी,
कहती सब को खाओ सब्जी।

खाओ भींडी करती निरोगी,
खिरा से बनोगी सुयोगी।

कहती, आओ भाई खरीदो,
जोश से बुलारही सब को।

वह स्वमभिमान की मूर्ति
बूढी माँ युवाओं की स्फूर्ति।

डाॅ० सरोजा मेटी लोडाय।

अग्निशिखा मंच की प्रस्तुति
 चित्र पर आधारित रचना 🙏🙏
    एक बूढ़ी मां

चार बेटों की अम्मा प्यारी ।
बेच रही घूमकर तरकारी ।।
सब्जी ले लो सब्जी ले लो ।
गलियों गलियों घूम रही है ।।

मेरा ऐसा समय आ गया ।
एक के जी कचरी तोल रही है।।
खेतों से चुन-चुन ले आती ।
ताज़ी ताज़ी मन को भाती ।। 

नहीं कोई है घर में इनके।
बेच रही सब्जी अम्मा है।। 
चार बेटे हैं पर इनके तो। 
सभी के सभी हैं एक निकम्मा।।

अपने बल पर अपने दम पर।
दो पैसों की करती जुगाड़ ।।
कमर झुकी की है बल हीन है।।
साल ओढ़ी है  लगता जाड़।

किसी तरह आत्मनिर्भर बनकर। बेच रही  सब्जी  बाजार।।
ले लो सब्जी ले लो ।
कोई नहीं  मिलता खरीदार। 

अच्छा मोल भाव नहीं मिल पाता। क्या करूं कुछ समझ आता आता।। 
मुश्किल से अपना पेट भरती।
अपनो का याद आ जाता ।।

उपेन्द्र अजनबी 
गाजीपुर उत्तर प्रदेश

चित्र आधारित रचना 
माई 
माई के तराज़ू जीवन धरा है 
न्याय गठरी कचकोल भरा है 
प्रकृति ने सुंदर उपहार दिया है 
अमीरी थाल संग साज सजा है 

माई के तराज़ू न्याय सजा है 
बेंटो के हिस्सों पे प्यार बटा है 
जीवन के पल अनमोल घड़ी है 
वक्त ने कैसा दिन ये दिखाया 

माई की खेती किसानी है   
करती घर रखवाली है 
रेघ में चलती जिंदगानी है 
कर्म ही पूजा धर्म बना है 

माई के हुनर से घर चल रहा है 
देखत नैनो से नीर बहे है 
संगी साथी सब छोड़ गये है 
माई की कुटिया जर्जर पड़ी है 

साग बेच कर घर चल रहा है 
जीवन ने अद्भुत खेल दिखाया 
अनिता शरद झा

🌹🙏अग्नि शिखा मंच को नमन🙏🌹
        🌹चित्र- आधारित  रचना🌹
           🌿दिनांक 3- 6-2021🌿
रचनाकार--डाॅ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार -
🌹
सब्ज़ी  वाली  आई   है-
देखो  क्या-क्या  लाई है!
सुबह सुहानी,आनी- जानी 
बुढ़िया है यह सबकी नानी।
      रोज  सबेरे  मंडी  जाती,
      हरी सब्जियां लेकर आती
      द्वार-द्वार पर घूम-घूमकर- 
      सब्जी की आवाज लगाती।
लाॅकडाउन के कठिन  समय में 
हम  सब  तो  बैठे  हैं  घर  में --
घर  बैठे  सब्जी  मिल  जाती ,
बदले  में  वह --- पैसे   पाती।
       हम सबको कितना सुख देती,
       कभी-कभी वह फल भी लाती
       आम, आँवला,  केले , लीची --
        सस्ते   दामो   में  मिल  जाती।
इसकी  तो  है  बूढ़ी  काया, 
घर  बैठना  नहीं   है  भाया,
देखो,कितना श्रम करती है-
दो  पैसा  अर्जन  करती है ।
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷स्वरचित एवं मौलिक रचना 
       रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार

अग्निशिखा मंच 
नमन मंच
विषय -- चित्र भी चित्र आधारित दिनांक-- 3/6/2021

चार बेटों की माता अम्मा
 बच्चों को कहती है खम्मा
 नाती पोतों के संग वह रहती
  बहुओं की मनमानी सहती !

 अपना दुख किसी से ना कहती  
 सदा खिलखिला कर हंसती रहती 
 कोरोना में सब मंद हो गए 
काम धंधे सब बंद हो गए!
 
अम्मा का परिवार बड़ा था
पापी पेट का सवाल खड़ा था
   बेटों ने अम्मा को खंगाला
कितना जमा किया है दल्ला कह डाला 
अपना-अपना दाना पानी 
तुम्हें भी उठाना होगा अम्मा !

स्वाभिमानी से उम्र गुजारी
 संकट आन पड़ा है भारी
सब्जी बेचकर पेट भरुंगी
दो पैसे दे बेटों की मदद करूंगी !

सुबह सबेरे सब्जी लेकर
स्वाभिमान को तौल रही थी 
यही पूंजी थी मेरी अपनी
कितना मोल है उसका देखूं !

स्वेद का पलड़ा था भारी 
तरकारी बिक गई  सारी
आज का धंधा अच्छा था
कोरोना तो बच्चा था! 

चंद्रिका व्यास
 खारघर नवी मुंबई

यहाँ कोई मुझे कोई माजी कहता कोई अम्मा,
बहु,बेटों ने घरसे निकाला,कहे लाचार निकम्मा,
बुढ़ी हो गई है उमर मेरी,पर हाथ,पैरों में दम है, सब्जी बेचकर दिखलाती नहीं हूं किसी से कम,

जिन बच्चों को पाला,पोसा,उन्हें बेसहारा किया,
मान के कमजोर इस बुढ़िया को ये इनाम दिया, 
मेहनत कश थी,मेहनत करने से,नहीं मै डरुगीं, 
नहीं फैलाउंगी हाथ सामने,मरते दम तक लडुंगी

ईश्वर से मै करुँ प्रार्थना,बस साथ सदा तुम रहना
मां हूं हर दुख सहलूंगी,मेरे बच्चोंको सुखीरखना   
*जनार्दन शर्मा*(आशुकवि लेखक हास्य व्यंग्य ) *अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर*
WhatsApp

1 comment: