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अखिल भारतीय अभिनेत्री का मंच का एक्सो और कवि गोष्ठी सम्मेलन संपन्न हुआ संवेदना विषय पर आयोजक डॉ अलका पांडे सभी रचनाकार अपनी रचना अग्निशिखा ब्लॉक पर पढ़ें



काव्य गोष्ठी 
२३/६/२०२१
विषय - संवेदनाय्ें 

-
संवेदना
संवेदना न होगी तो ,
वेदना का अहसास न होगा 
दोनो परस्पर बहने ही तो है 
संवेदना होगी तभी वेदना का एहसास होगा !
संवेदना दर्द को सहलाती हैं 
जख्मो पर मलहम लगाती हैं ।।
प्यार से अपना बनाती है संवेदनाये 
संवेदनायें तपते हदय में ठंडक पहुँचाती हैं ।।
मानव का धर्म है संवेदना 
संवेदना चेतनता  है 
नारी का नारीत्व है ,
माँ का ममत्व है 
आंखो की हया है 
करुणा की सखी है
वेदना से ही तो संवेदना जन्म लेती है 
और हमें बोध करा जातीहै 
वास्तविक कारणों का और मरहम बन जाती है संवेदना 
चेतनता का प्रतिक है वेदना व संवेदना 

डॉ अलका पाण्डेय -मुम्बई



आंसू की अदा
******************
 आंसू की अजब है अदा
 कभी ग़म के आंसू तो कभी खुशी के 
 यादें जब भी आती बीते दिनों की रूला जाती है
आंखों और आंसू का कुछ  
ऐसा ही है रिश्ता
आंसू रुकते नहीं
छुपाते छुपते नहीं
बस यूं ही बहते जाते हैं
  प्यार हो या धोखे का रिश्ता
कभी फरेबी भी हो जाते हैं आंसू
आंखों से झर -झर बहते हैं 
ये आंसू
 आंसू ही है जो जीवन भर हमारे साथ रहते हैं
जो भावनाओं के रूप में बहते हैं
 पर कभी सोचा न था इन अंखियों से निकले
आंसू एक दिन व्यर्थ हो जायेंगे
अब तो यूं लगने लगा है कि दिल जब भी तड़पता है तो
आंसू निकल ही जाते हैं
हर दुःख सह जाउंगी पर
इन आंसुओं को मैं कैसे समझाऊंगी
 लोग पढ़ लेते हैं
मेरे आंसुओं से मेरा दर्द
ना चाहते हुए भी
बयां कर जाते हैं मेरी मुहब्बत की दास्तां

 डॉ मीना कुमारी परिहार



भ्रूण-हत्या, 

तकनीकों का, दुरुपयोग हैं करते।
अल्ट्रासाउंड से, हमको हैं परखते।
हो बेटी तो भ्रूण की, हत्या हैं करते।
मुझे भी जीने का, हक़ दे जाते यारो।
बेटी-जीवन से क्यों, डरते हो प्यारो।

तुमने भी तो नारी से, जन्म है पाया।
बेटी जीव का महत्व, जान न पाया।
मुझे मारकर, अँधेरा भविष्य है पाया।
सोच और नज़रिया को, बदलो यारो।
बेटी-जीवन से क्यों, डरते हो प्यारो।

माँ लक्ष्मी-आराधना, समृद्धि के लिए।
माँ सरस्वती-उपासना, ज्ञान के लिए। 
माँ काली प्रसन्न, शत्रु-विजय के लिए। 
ये देवियाँ चित्रों में ही, सुख देती यारो।
बेटी-जीवन से क्यों, डरते हो प्यारो।

अपनी मुस्कान से, घर को महकाती।
दूर रहकर भी हरदम, पास वो रहती।
माँ, बेटी और बहन, बन सेवा करती।
बेजान मकां को, घर बनाती है यारो।
बेटी-जीवन से क्यों, डरते हो प्यारो।

बेटी अपने पापा की, दुलारी है होती।
पापा हेतु बेटी, सारी दुनिया है होती।
पापा रहें ख़ुश, यह ख़्वाइश है होती।
पापा की क़ुर्बानी, न बेटी भूले यारो।
बेटी-जीवन से क्यों, डरते हो प्यारो।

वैष्णो खत्री 'वेदिका'
रचना मौलिक एवं स्वरचित व सर्वाधिकार @ सुरक्षित है।
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संवेदना

संवेदना है उमड़ रही,
हाल सृष्टि का देखकर।
मन व्यथित अति हो चला,
दुखी जन की पीड़ा देखकर।

तप्त हृदय है व्यथित धरा,
मौन रहकर सबकुछ सहती।
छाती पर उसके मूंग दला,
अंतरात्मा है सिसकती।

दोहन कर लिया उसका,
हो वशीभूत स्वार्थ के।
छीन लिया सौंदर्य प्रकृति का,
अंगों को उसके काट के।

प्रकृति भी है सिसक रही,
अलंकरण अपने खोकर,
कोयल काली कूक रही पर,
 गाती है कुछ मद्धम स्वर।

वायुमण्डल भी सिसकता,
अनहोनी ये कैसी हो रही।
वायु जो है जीवनदायिनी,
प्रदूषण कितना फैला रही।

आज सिसक रही है नारी,
सवाल है उसके अस्तित्व का
है युगों से दबाई,सताई गई,
अंत नहीं उसकी वेदनाओं का।

मानवता भी सिसक रही है।
देखकर हाल आज के दौर का।
स्वार्थलोलुप मानव करता।
सौदा अपने ही ज़मीर का।

गरीब आज सिसक रहा,
आर्थिक तंगी की लाचारी से।
उम्मीदें सारी ध्वस्त हुईं।
कैसे जूझे इस महामारी से।

सब खड़े है दुखी ,स्तब्ध से,
समय का विराट रूप देखकर।
उर अंतर में हाहाकार मचा।
सिसकी रहे प्रिय को खोकर।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह
नई दिल्ली



"अलविदा खुशी "
 खुशी नाम था उसका  
  मासूम कोमल कली, 
  सब ग़मों से आज़ाद,
   चहकती बुलबुल, 
   रिश्तों में था ,
   उसका विश्वास, 
    मामा, चाचा,ताऊ,
    भईया अँकल, 
    सब लगते थे उसे अपने, 
    इसी नाम से, 
    पुकारती थी उन्हें, 
    पर एक दिन, 
    दुर्गन्ध आने लगी, 
     उन रिश्तों से,
     प्रश्न--चिन्ह,
     लग गए उन रिश्तों पर,
     हूक उठने लगी दिलों में, 
     बिजली कौंधने लगी ,
     दिलों में तड़प होने लगी, 
      वे रिश्ते, 
       सब बन गए हैवान, 
      जिस्म के सौदागर दरिन्दों ने, 
      उसके जिस्म को नोचा, 
      उसकी रूह को, 
      कर दिया घायल, 
      देख कर इतनी हैवानियत, 
      शर्मसार होकर बादलों में, 
       छिप गया चाँद, 
       मर गए बुलबुल के गीत, 
      और खुशी की, 
       पथराई खुली आँखे, 
       पूछ रही थी एक सवाल, 
       क्या कसूर था मेरा ??
       मुझ पर क्यों हुआ, 
       इतना अत्याचार ???
       मैं मासूम रिश्तों पर ,
       करती थी विश्वास ।।।
       और खुशी कर गई ,
       सारी दुनियाँ को शर्मसार ।।
       अलविदा खुशी ।।।।।
         वीना अचतानी ,
          जोधपुर (राजस्थान)....



मंच को नमन
विषय:--- *आंखे थकती नहीं*

खुली आंखों में जो अपना होता है।
बंद आंखों मैं वही सपना होता है।।

लगी जब चोट दिल पर आंखों में आंसू आ गया।
मुकद्दर ने रुलाया फिर भी आंखें थकी नहीं।।


तमना बहुत थी पर बिखर गई सभी अरमान।
बहे जब अश्क आंखों से तुम्हारा याद आ गया।

बरसो दिल नहीं संभाला फिर भी आंखें थाकि नहीं।
जब लिपटे तेरे सीने में आंखें से खुशी के आंसू निकल गई।।

तुम्हारा नाम याद आया तो आंखो से आंसू छलक गई।
तेरे चेहरे को याद करते करते आंखें थकी नहीं।।

दिल मचलता है ठंड के मौसम में।
आंखें थकी नहीं तुम्हारे इंतजार में।।


विजयेन्द्र मोहन। बोकारो झारखंड

मेरे बापू चले आओ
चले आओ चले आओ, मेरे बापू चले आओ।
कहां हो तुम, यहां आओ, मेरे बापू चले आओ।

बताया तुमने वैष्णव जन, पराई पीर जो जाने
वहीं अल्लाह वही ईश्वर, सही है, हम अगर मानें।

तुम्हारा चश्मा तो प्यारा, मगर दृष्टि कहां वो है
तुम्हारे नाम से पथ है, तुम्हारा पथ कहां वो है।

तुम्हारा चित्र नोटों पर छपाकर है दिया ऑनर।
दिलों के पृष्ठ हैं खाली नोट कर लेते गर उन पर। 

तुम्हारे हाथ की लाठी, पुलिस को है बहुत भायी।
तुम्हारी सर्व प्रिय गीता, कसम खाने के काम आयी।।

चढ़ाते फूल है तुम पर, समझते फूल है तुमको।
चरण की धूल लेते हैं, समझते धूल हैं तुमको।

इलेक्शन में पढ़ा पट्टी, जैसे भी हो लेना मत।
बाद में भोली जनता को, कोई भी लाभ देना मत।

दिखाई राजनैतिक राह, आंदोलन करें कैसे
भूख हड़ताल सत्याग्रह, देश हित हम लडें कैसे। 

मगर हम लड़ते आपस में, देश हित भूल जाते हैं
वतन से करके गद्दारी, दूध मां का लजाते हैं।

अतः हे बापू आ जाओ इन्हें सद्बुद्धि दे जाओ।
जरूरत फिर तुम्हारी है, स्वर्ग से फिर उतर आओ। 

डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता



नमस्ते में ऐश्वर्या जोशी
अग्निशका परिवार को मेरा नमन
प्रतियोगिता हेतु कविता प्रस्तुत करती हूं।
विषय - संवेदना

संवेदना के भाव 
मन पर करते हैं प्रभाव।

संवेदना के अनेक प्रकार
जिसको नहीं एक आकार।

संवेदना के अनुभुती से
हर एक उलझनों का 
मिले सवाल।

संवेदना से हमारे मन में
करुणा और दया के भाव
उत्तेजित होते हैं।

संवेदना के भाव 
केवल मानव को 
मानव से मानव 
नहीं जुड़ता बल्कि 
पशु-पक्षियों के लिए 
भी भाव उत्तेजित करता है।

धन्यवाद
पुणे


संवेदना
********
दुख -सुख जीवन के पहलू हैं
मनुष्य संवेदनशील होता है,
सुख में खुशियां मनाता है,
तो दुख में दुखी होता है।

खारा पानी नहीं है आंसू,
 संवेदना ओं का एहसास है,
 भावों की अभिव्यक्ति है,
 दुख -सुख का साथ है।

 दिल का घाव फूटता है जब ,
आंसू बनकर बह जाता है,
 पीड़ा को व्यक्त करने का,
 आंसू मध्यम हो जाता है।

 रोने से दिल हल्का हो जाता,
 खुशी जीवन की मुस्कान है ,
आंसू ही आंखों की सुंदरता,
 इसके बिना शुष्क और बेजान हैं ।

कभी किनारों पर ठहर जाती ,
कभी यह बह जाती है,
 दिल का मैल भी धोती है,
 हाल-ए-दिल बयां कर जाती है ।

जिंदगी के रंग निराले ,
आंसू को छुपाना पड़ता है,
 दिल में दर्द का लावा हो पर,
 फिर भी हंसना पड़ता है।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी
इंदौर मध्यप्रदेश
मोबाइल 8989409210


*संवेदना*

मन की संवेदना 
जता रही हूँ मैं सुमना
खिलती अपनी इच्छा से
तोडते है अपनी मर्जी से
पाते हैं सब अगाध संतोष
मुरझाने से उगलते है रोष
न एहसास किया मेरी आस
जरुरत पडे तो न आए पास
वाहरे कितना निर्दय नीच मन
सदा लालच भरा तेरे नयन
अंत न है तेरे कुकर्म का 
तडपा रोम -रोम तन का
तू तो एय्याशी झुम रहा है
पर मेरे स्वप्न लोक टूट रहा है
मेरी संवेदना ,संवेदना ही रही 
न प्रयास किया समझने ,मैं सिकुडते गयी ।

डाॅ सरोजा मेटी लोडाय ।



हमारी मानवीय संवेदनाएं

मानव मन को एक सूत्र में बांधती, 
मानव हृदय की गहराइयों में बसती
ज्ञानेंद्रियों की सुखद आकाशगंगा
सहानुभूति सौहार्द पूर्ण व्यवहार,
 करूण अभिव्यंजना हैं संवेदनाएं,  

 वैदिक रचनाओं, महाकाव्यों में,
अमर ग्रन्थों में अनुगुंजित,पल्लवित,
ऋषि मुनि महापुरुषो से पोषित
 धर्म संस्कृति,अध्यात्म,संस्कार 
 की प्रबल बोध हैं सम्वेदनाएँ,

 डिजिटल,तकनीकी विकास से
 कोमल भावनाएँ बिखर रही,
खोखलापन, अकेलापन दे रहीं
आधुनिकता से मिट रही अनुभूति
शिला बन रहीं मानवीय सम्वेदनाएँ

सामाजिक मानवीय प्रदूषण मिटाओ
 देश,समाज के प्रकाश स्तम्भ बनो,
संवेदनाओं को उकेर कर साथी बनो ,
 समाज मानव की पूर्णता है संवेदनाएं,
  पूजनीय हैं मन की मानवीय संवेदना



मानवता की तीव्र अनुभूति हो जब मन में
                 तो समझना तुम्हारी  मानवीय संवेदनाएं जिंदा हैं ।
किसी  के अकेलेपन का दर्द जब बाँटना चाहे मन
                              तो समझना संवेदनाएं जिंदा हैं ।
किसी गरीब बच्चे को जब शिक्षा देना चाहे मन
                      तो समझना संवेदनाएं जिंदा है ।
किसी नंगे को देख जब उसका तन ढकना चाहे मन
                        तो समझना संवेदनाएं जिंदा है ।
भूखे को पेट भरकर जब खिलाना चाहे मन 
                          तो समझना संवेदनाएं जिंदा है ।
मजबूर बाप की बेटी की जब डोली उठाना चाहे मन
                            तो समझना  संवेदनाएं जिंदा है ।
किसी के घाव पर जब मरहम लगाना चाहे मन 
                            तो समझना  संवेदनाएं जिंदा है ।
आदमी  किस स्वार्थपरता देख जब विचलित हो जाए मन
                             तो समझना संवेदनाएं जिंदा है ।
किसी रोते हुए को जब हँसाना चाहे मन 
                           तो समझना संवेदनाएं जिंदा है ।
ज़ुर्म के खिलाफ जब आवाज उठाने को चाहे मन 
                            तो समझना संवेदना जिंदा है ।
किसी की चोट देख तड़प उठे जब मन में 
                      तो 'रानी' समझना संवेदना जिंदा है
                                               मानव भी जिंदा है ।

                                    रानी नारंग ।
14-9-2020
                             

नमन मंच 
संवेदना 



माना ,दुःख तो सिर्फ मेरा है ,
संवेदना से मिलता एक सहारा है ,
 जब तुम दुःखी हुए ,
संवेदना मैंने दिखाई , 
जब मै दुःखी हुआ ,
संवेदना तुमने iदिखाई , 
माना ,आँसूं तो मेरे नयनों में है ,
संवेदना इसकी दया बनकर आयी ,
उचाट तो मन में थी सिर्फ मेरे ,
सत्य यह भी है ,
लफ्ज तुम्हारे संवेदन के ,
चित थोड़ा शांत कर गये ,
दुःख तो नहीं ले सकते ,
संवेदना से बाटें तुमने सारे ,
थोड़ी सी संवेदना तुम्हारी ,
गर प्रभावी हो जीवन पर , 
तो क्यूँ न लूँ संवेदना तुम्हारी 
क्यूँ न लूँ संवेदना तुम्हारी |

स्मिता धिरासरिया बरपेटा रोड

संवेदना

वेदना के दौर में,
 संवेदना हुई लुप्त है।

 स्वार्थ के इस होड़ में ,
रहस्य संवेदना का गुप्त है ।

 रिश्तों के अहसासों से हुई,
 संवेदना यूँ मुक्त है ।

स्पर्धा की दौड़ में हर कोई ,
भौतिकता में युक्त है ।

क्या बालक क्या प्रौढ़ सभी के भीतर,
 अब तो शुन्य संवेदनाएं नियुक्त हैं ।

 वेदना के दौर में ,
संवेदनाएं हुई लुप्त है ।


©️®️पूनम शर्मा "स्नेहिल"☯️
उत्तरप्रदेश गोरखपुर

नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
दिनाँक - 27/6 / 2021
 विषय- संवेदना

ओह -आह मत मारो छोड़ दो उसे
तुम कितने संवेदनहीन हो गए हो।

क्या तुम्हें थोड़ी भी दया नहीं आती,
उस मासूम को दौड़ा कर मारते हुए ।

वह निरीह पशु हैं  तुम उससे भी,
 ज्यादा  क्रूर पशु हो गए हो समझे।

जब तक दूध देती थी, तुमने उसे,
 पाला-पोसा दाना -पानी खिलाया।

अब तुम्हारे कोई काम की नहीं रही,
 बूढ़ी हो गई है बेचारी और तुम कैसे।

कब से तुम इतने निर्दई और निरंकुश,
 कैसे संवेदनहीन हो गए हो तुम।

उसमें भी प्राण है, हम इंसानों की तरह,
वह -वह कैसे छटपटा रही है दर्द से।

देखो रो रही,आँखों से गिरे आँसू  टप-टप,
इस आँसु की कीमत तुम चुका पाओगे।

तुम्हारी माँ के जाने के बाद इसी माँ ने,
 तुम्हें अमृत पान कराया था दुग्ध रूपी।

क्या तुम्हें पता हैं कितने क्रूर लगते हो,
इंसानी भेष में छुपे हुए भेड़िए की तरह।

तुम एकदम निर्दयी हो गए हो संवेदनहीन।
तुम्हारे भीतर की मर गई है सारी संवेदना।

और वह ठहाका लगाता हैं, हा- हा- हा,
हाँ - हाँ मर गई है मेरे भीतर की संवेदना।

सब कुछ मिटा डालूँगा तहस-नहस कर दूँगा,
नहीं है मेरे भीतर बची थोड़ी भी संवेदना।।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार


नमन मंच
दिनांक-23/06/2021
विषय- संवेदनाएं 
--------------------------------------
संवेदनाओं के ही 
नाम पर संवेदनाओं 
का कतल सरेआम 
होते देखा।

मानवता की 
संवेदनाएं जैसे मर सी
गई हैं,संवेदनाओं 
के ठेकेदार बने लोगों 
को संवेदनाओं पर
चर्चा करते देखा।

खेलों की बिसातों
पर षडयंत्रों से 
अपना बन जग
को छलते देखा। 

साथियों के ही कष्टों 
की दुआ मांगते, 
सज्जनों को शिखर
पर चढ़ते देखा।

हमदर्दी की आड़ में वाह हमदर्दों,क्या-क्या न
करते तुमको देखा।

अब बस भी करो 
जगत के दोगलों,
दोहरा चरित्र 
जग ने आंखों
से देखा।

रजनी वर्मा🌷 
भोपाल 🌷


संवेदना ----- ओमप्रकाश पाण्डेय
चौराहे पर भीड़ लगी
पूछ रहा हर व्यक्ति
हुआ क्या है इसको
क्यों यह पड़ा भूमि पर
बीच रास्ते पर मुर्छित
सबके झोले में पानी है
पर पिला रहा उसे न कोई
हर कोई केवल प्रश्न पूछ रहा 
संवेदना हताश खड़ी चौराहे पर ........ 1
घायल पड़ा है एक बेचारा
दवाखाने के दरवाजे पर
डाक्टर उतरा अपनी गाड़ी से 
नज़र नहीं डाली उस पर
सिस्टर बोली वह पड़ा सुबह से
आप कहो तो कर दूं मरहम पट्टी
डाक्टर साहब उखड़ कर बोले
पैसा क्या तेरा बाप देगा
यह दवखाना है मजार नहीं
संवेदना मर गयी वहीं पर ...... 2
एक बेचारी लिए बाप को
घूम रही हर दरवाजे पर
चिल्ला चिल्ला कर कह रही
दवा तो करा तो मेरे बापू को
छोटा हो या बड़ा अस्पताल
दरवाजा सबका था बन्द
किसी को नहीं पता चला
कब उड़ गए उसके पंख पखेरू
फटी फटी अपनी आँखों से
वह देख रही अपनी बापू को
उड़ गयी संवेदना आज शहर से ......... 3
नेता जी दौरे पर आये
लेने अपनी जनता का सुध
चेले चपाटी साथ साथ थे
एक एक से वे मिलते थे जब
एक अलौकिक मुस्कान तभी
उनके चेहरे पर उभरती बार बार
सबको वो बोध कराते थे
कि राम राज्य अब आ ही गया है
पर तभी नज़र पड़ी उनकी जब
खेलते कुछ अधनंगे बच्चों पर
बोले वे अपने चेलों से
भूखे नंगे बन कर लोग
बच्चों से भीख मंगवाते है
नंगी हो गई संवेदना वहीं पर......... 4
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)




अग्निशिखा मंच
रविवार दिनांक २७/६/२१
 विषय ****** 
      #**** संवेदना****#
            ^^^^^^^^^^^

ना होतीअगर मन को वेदना ।
तो ना होती कसक संवेदना ।।
   ना होता आगाज शुभ काजका ।
   ना होता किसी लक्ष्य को भेदना ।।१

बिन संवेदना के ना होता मन हैरान ।
न उपजा होता कवि न होता मधुर गान ।।
मिटाने विषमता कटुता और अदावतें ।
न होता वेद गीता रामायण का निर्माण ।‌।२

संवेदनासेहीकविलेखक कथाकार हुए ।
तुल्सी तुकाकबीर मीर काव्यकार हुए ।।
इनके बताए पथ पर चले देश सारा ।
समाज उपयोगी ज्ञान का ये भंडार हुए ।।३

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर 
          महाराष्ट्र


काव्य गोष्ठी विषय- संवेदना 

संवेदना दुख दर्द में 
सांत्वना बँधाती है 
वेदना गम-दुख को 
और बढ़ा देती है। 
संवेदना मलहम बन 
हौले से सहलाती है, 
वेदना आंसू बन 
आंखों से बह जाती है।

संवेदना बहन वेदना को 
देख धीरे से बोली- 
बहना, अब तू आ गई है
मैं कहीं और जा रही हूं
मैं किसी दुखियारी 
का किवाड़ खटखटाऊंगी 
उसकी पीर पर मलहम बन
सहलाऊंगी,थपथपाऊँगी,
उसके दर्द में भागीदार बन 
उसका जी हल्का कर दूंगी। 

तभी रुआँसी होकर
वेदना बोली- 
हम सौतेली बहने हैं-
जहां तू जा रही है
वहां मैं ना आऊंगी 
कसम खाती हूं, 
अब किसी को 
ना तड़पाऊंगी पर- पर 
मेरी नियति में तो 
सिर्फ दुख दर्द ही लिखा है 
स्वार्थ का सिलसिला है 
गमों का साया है
मेरा कसूर ही क्या है?
क्योँ कि मैं वेदना हूँ----
वेदना हूँ-----

डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"
23-6-21



अग्नि शिखा मंच को नमन 
माँ शारदे के चरणो मे मेरा
 .प्रणाम अर्पित है🌷🌷
पटल पर उपस्थित विद्वजन
को बृजकिशोरी त्रिपाठी का प्रणाम व सहभागियो को नमन सबको राधे राधे।
नशा मुक्ति दिवश पर।
      मेरी कविता।
**नशा मुक्ति दिवस**
        **पर कविता**
जीवन मिला है कुछ नेक काम कर मेरे भाई।
बडी़ मुद्दतो के बाद तुमने मानुष तन है पाई।
क्यों नशा करके अपना तन जलाते हो रोता परिवार और लुगाई।
जग मे तेरी थू थू होती है बेईज्जत कराते हो बाप और भाई।
माँ तो जीते जी मर जाती है तूने शराबी अपना नाम धराई।
तू तीन पुस्त दुःखी करता है बाप, बेटा,अरू भाई।
तेरा सरीर क्या था अब क्या हो गया है।
चलता फिरता दारू.का मका बन गया है
तेरे इस रहन से घर, घर न रह के बीरान हो गया है।
अब भी चेत ले क्यों जीवन बरबाद कर रहा है
साथी दोस्त नही ये तेरे जीवन के दुःशमन है।
जो काली घटा बन के तुम को घेरे है।
भूल जा जो तेरे दोस्त थे प्याले के।
नही भूल़ोगे तो तरस जाओगे एक निवाले के।
तब तेरा ये कोई साथी साथ ना निभायेगा।
ना बोल ही संवेदना के कोई बोल पायेगा।
 तब तू सिर धुन पछतायेगा।
कर ले प्रीत जसुदा के लाला से।
अपना मन हटा ले तू हाला के प्याला से।
घर बन जायेगा तेरा बृन्दावन।
मन हो जायेगा तेरा मधुबन।
सबसे मिट जायेगा अनबन।
तेरा मन बन जायेगा आनंद वन। 
 बृजकिशोरी त्रिपाठी
  गोरखपुर यू.पी।



संवेदना
अ.भा. अग्निशिखा मंच
ऑनलाइन कवि सम्मेलन
विषय_संवेदना।२७_६_२०२१.
कहां बची संवेदना?
"सं" आगे निकल गया,
रह गई पीछे सिर्फ वेदना,
अहसास को निगल गया।
"सं" का अर्थ संबंध था,
एक दूजे का बंधन था।
दूजे के दर्द को अपने सीने में,
महसूस करना था,
किसी की आंखों के आंसू को,
अपनी आंखों से बहाना था।
"सं" जो दिलों को जोड़ता था,
गलत से सही राह पे मोड़ता था
खो गया,कहीं चला गया,
बस वेदना को छला गया।
कहते हैं,ढूंढने से तो,
खुदा भी मिल जाता है,
तो कोई संवेदनशील,
साथी भी मिल जाता है,
हमारी भावनाओं का बाग,
फूलों से भर खिल जाता है,
खुशियों के तारों से आंगन, रोशन झिलमिल हो जाता है।

रखो संवेदना,बनो संवेदनशील
समझो दिल की ठेस,रखो दिल
यही इंसानियत का धर्म,
यही तुम्हारा_हमारा कर्म।
ईश्वर ने संवेदनशील बनाया,
अपना स्वरूप हममें बसाया।
करो संवेदना की उपासना,
यही हो अपनी "अमर साधना"
स्वरचित मौलिक रचना_
रानी अग्रवाल,मुंबई।२७_६_२०२१.


अग्नि शिखा
 नमन मंच
दिनांक --: 27/6/2021
विषय --: संवेदना

क्या अब मर चुकी है संवेदना
***********************

    क्यों खड़ी दुख की 
     मैली चादर ओढे़ 
  नयनों में अश्रुधार लिए
     किसको कहे है व्यथा 
       तु अपनी वेदना 
    क्या उसे जो बहन है
      तुम्हारी संवेदना ?
    अब जाग भी जाओ 
विश्वास करो मेरा वह मर चुकी है 
बंद करो अपना रोना गाना
शांत हो स्थिर हो जाओ 
ले आओ आत्मविश्वासऔर
    हौसले की चादर 
   चल पड़ो एक सशक्त 
      जीवन पथ पर 
छोड़ कृतज्ञ बनना किसी का 
स्वाभिमान संग आगे बढ़ो 
फिर न देखना पड़ेगा वेदना
 तुझे किसी संवेदना की ओर !!!

 चंद्रिका व्यास
 खारघर नवी मुंबई


       ।संवेदना।
संवेदना बहुत जरूरी है,
घर संसार चलना चाहिए।
इस कोरोना के काल में,
प्यार नहीं मरना चाहिए।।
संवेदना.................... 1 
संवेदना में वेदना होती है, 
दुख सहने की बात होती है। 
संवेदना जरूर होनी चाहिए, 
अभिनंदनीय भी यह चाहिए।। 
संवेदना.....................2 
आजकल संवेदना कम होती है, 
समाज में बहुत कम मिलती है। 
संवेदना में जजबात होती है, 
दुनिया में बहुत खास होती है।। 
संवेदना...................... 3
संवेदना उजियारा भी करती है, 
काम में बहुत सहायक होती है। 
संसार में प्रायः दुर्लभ होती है, 
यह कामयाबी सुलभ करती है।। 
संवेदना........................ 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।


प्रतियोगिता
विषय-संवेदना
दुनिया आगे बढ़ रही है 
ज़माने की तौर तरीके बदलते जा रहे हैं
व्यक्ति आगे बढ़ने की चाह में सब भूल रहा है
रिश्ते नाते इंसानियत खोता जा रहा है
मानवता कहा गयी पता नहीं
पाषाण युग की ओर बढ़ता जा रहा है
महिला बच्चे सुरक्षित नहीं चीर हरण के शिकार हुते जा रहे हैं
मानव में संवेदना कहा खो गयी
यही एक संवेदना उसे इंसान बनाये रखती है 
जो उसे दूसरे के दुख दर्द तकलीफ मान सम्मान का बोध कराती है 
संवेदना न हो तो इंसान जानवर बनकर लोगों पर अत्याचार अपराध करता रहता है 
फिर उसे कोई ‌कहा 
भगवान भी उसे अपराध करने से नहीं रोक सकता है । 
आखिर में हर अपराध जुर्म की सजा उसे भगवान ही देता‌ है ।
इसलिए कुछ दिनो के लिए आओ हो मेहमान बनकर
अपनी संवेदना को जगाओ
प्यार मोहब्बत अपनापन से दिन व्यतीत करो
खाली हाथ आए हो खाली हाथ ही जाओगे
कुछ समय के सुख के लिए 
लालच में पड़कर क्यों इंसानियत को खोते हो ।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लालबाग जगदलपुर छत्तीसगढ़


अग्नि शिखा मंच
दिनांक 27.6.2021
रविवार
विषय संवेदना

किसी परिवार मे गमी होने पर संवेदना प्रकट की जाती है।
ऐसी मुश्किल की घड़ी मे अश्रूपुरित श्रध्दांजली अर्पित की जाती है।
दुख की घड़ी मे धेर्यता के लिये सहानुभूति दी जाती है।
मुश्किल के वक्त से उभरने के लिये संवेदना दी जाती है।
संवेदना शब्द मे ही अपनापन का अहसास कराती है।
दुखी परिवार के लिये इसकी बहुत जरूरत होती है।
और संवेदना से परिवार को ढाढस दी जाती है।
संकट के समय सहारा देते रहो।
यह सहायता जिंदगी भर याद आती है।
मानवता भी इसे ही कहते है जहां संवेदना रखी जाती है।
आज हम कोरोना काल मे दुखी परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त कर ,
उन्हें हिम्मत देने की ईश्वर से प्रार्थना भी करते है।
जय हिंद ,जय भारत माता।

दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाइल 9425350174


अग्निशिखा मंच
२७/६/२१
आज का विषय - संवेदना
आज खो गई है संवेदना 
 भौतिकता के शून्य में
 परवेदना समझी नहीं
 उलझे रहे पाप और पुण्य में 
ना खुशी ही सांझा हुई ना गम ही बंटता यहां 

यूं तो हर घर गली और बाजार, में रौनक बड़ी है
 तथाकथित खुशियों की बाजार में कीमत बड़ी है पर हृदय में पर वेदना का भाग घटता यहां
 गिनती अगर करने चले तो
 सैकड़ों ही मित्र होते हैं यहां 
दिखावे के चटक रंग में रंगे 
भाव और संवेदना के चित्र होते हैं यहां 
जब से गया आंगन का चलन
दिखा दिलों में प्रेम भी घटता यहां

नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश


अग्निशिखा मंच नमन    
शीर्षक - संवेदना -ममत्व 
बेटा हर माँ की चाहत आरज़ू है 
जो हर दिन चाहत बढ़ाती है 
कोरोना को दूर भगा 
जीवन चाहत में चाहत माँ होती है 
आओ मिलकर दीप जलाये 
आशाओं का संचार जगाये 
रिश्तों की डोर को अनमोल बनाए
ममत्व के उदगारों से मंच को सजाये 
प्रेम भरी पाती ममत्व से भरी कहती है 
मेरी संवेदना ले क्या क़रोगे ?
भूख प्यास भय से आतंकित ना होना 
 ना अपने साहिसिक कदमों को रोकना 
सम्बल बनाये रखना ये तुम्हें रोकेगी नही?
बेकारी महामारी से तंग जग जीवन है 
इन हाँथों का कमाल तो देखो 
मेहनत से जी नही चुराते हैं ! 
एक प्याली चाय तो पीजिये इनके हाथों से ।
जब लोग हिकारक स्वार्थी देशद्रोही समझते 
तब लगती दिल में चोट तो सिहर जाते हैं ! 
पर कड़ी धूप में खड़े मेहनत से जी नही चुराते है
कभी - कभी समाज तुफान ले आते हैं 
अगर अब भी ना पहचाना हो तो देख लो जनाब 
आस पास आम जनता से प्यार बटोर कैसे ‘प्रधान’ बन जाते हैं ।जनाब
ममत्व की सीख प्यार भरी 
संवेदना ले आगे बढ़ जाते है जनाब
अनिता शरद झा मुंबई स्वरचित मौलिक सभी रचनायें


अग्निशिखा मंच
संवेदना आज कल मर ग‌ई‌ है ‌लोगों में,
कोई जिये कोई मरे,हलचल नहीं है ‌लोगों में।

आम जनता ‌या नेता हों, पक्ष या विपक्ष के,
एक दूसरे का गला काट रह हैं लोग।

जनता भले ही भूखे मर ‌जायें ,
पर काला ‌बा‌जारी से पीछे हट‌ते नहीं हैं लोग।

आया है ‌‌कोरोना संकट देश पर,
दवाई,आक्सीजन उंचे दाम पर बेचते है़ लोग।

युगों से सबकी से‌‌वा करना सीखा है हमने,
पर‌हित सम धरम नहींं यही लागू किया है हमने।

हमें ही सब को जा‌गृत करना होगा।
दूसरों से पहले स्वयं को बदलना होगा।

एक दूसरे की ध्यान रखना होगा ,
गर पड़ोसी दु:खी है,उसके‌आंसू पोछना हो‌गा

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली म
महाराष्ट्र


मंच को नमन❤️🙏🏻❤️
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विधा कविता 
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विषय संवेदना
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रचना नरेन्द्र कुमार शर्मा
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राज्य हि0प्र0 शिमला 
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✍️-----------संवेदना------------✍️

दिखता है जब कोई गरीब,असहाय और दुखी,तो मन में जागृत होती है संवेदना।
कैसे लिखी है तकदीर उस लेखक ने उनकी,तकदीर देख मन में होती है वेदना।।

न घर न ठौर-ठिकाना पैदा हुए हैं,फिर ये भी पता नहीं कि किधर है जाना।
वो पीड़ा सहते नन्हें बच्चे फुटपाथ पर,
देख उनको लगता है जीवन उनका खुशियों का खजाना।।
न पूछ सकता हूँ दर्द उनका,नहीं चाहता उनके ज़ख्मो को कुरेदना।
दिखता है जब कोई गरीब असहाय व दुखी,तो मन में जागृत होती है संवेदना।।

क्या चीज़ है ये संवेदना,आज तक न पहचान पाया हूँ मैं।
सोच क्यों पनपी है आखिर मेरे जहन में ऐसी,ये भी न जान पाया हूँ मैं।।
चाहता हूँ कि सबको मिले रोटी कपड़ा और मकान,चाहता हूँ सभी के दुखों को भेदना।
दिखता है जब कोई गरीब,असहाय व दुखी,तो मन में जागृत होती है संवेदना।।

किसी के जीवन में आपार दुख तो,किसी को खुशियाँ बिखेर देता है।
क्या सोच के लिखता है ये किस्मत,कोई गरीब तो किसी को अमीर बना देता है।।
सोच क्या है उस लेखक की,कईयों को लगाता है मरहम तो कई के दिलों को चाहता है छेदना।
दिखता है जब कोई गरीब असहाय व दुखी ,तो मन में जागृत होती है संवेदना।।

स्वरचित कविता 
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अग्निशिखा मंच को नमन
आज का विषय *संवेदना*

संवेदना के कारण चढ़े फांसीपर।
आजादी मिल गई हमें बीन बहांए रक्त।
मातृभूमि के पैरों की काटी बेड़िया।
ये शहीद देशभक्ति में लिप्त आश्वस्त।।१।।

संवेदनहीन नर पशुसा व्यवहार करते हिंसा, लूट ,अपहरण, बलात्कार करते।ऐसे मानव होते हैं समाज के दुश्मन
संवेदनहीन नर सदा दुराचार करते।।२।।

कोविड महामारी में स्वार्थी बन
 गया मानव,अस्पताल बने शमशान, चिकित्सक हो गए दानव।हवा दवा बिस्तर की दुष्टों ने की दलाली संवेदनहीन नर बने महाभारत के कौरव।।३।।

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर
दिनांक :-२७/०६/२०२१

माँ शारदे को वंदन 🙏
अग्नि शिखा काव्य मंच को नमन 
            " संवेदनाएं "

मानव मन में होती भिन्न-भिन्न संवेदनाएं ,
प्रेम, घृणां ,हास्य नफरत की भिन्न-भिन्न भावनाऐं !
यांत्रिक युग मेंं मशीनी हो गई संवेदनाएं ,
क्या मनुज के मन की मर रही कोमल भावनाएं !
बड़े बुजुर्गो के प्रति मर रही सम्मान की भावनाएं ,
आदर ,प्रेम दया की मर रही संवेदनाएं !
एक तरफ है भूख गरीबी और बिमाँरी ,लाचारी ,
एक तरफ अंतहीन वैभव की रोशनाई !
अमीरी- गरीबी की गहरी खाई कैसे शुन्य हुई संवेदनाएं !
पांच तत्वों का पूतला प्रकृति पर प्रहार करे ,
अपनें जीवन दाई पर वार करे मर चुकी संवेदनाएं !
बालश्रम, स्त्री शोषण है समाज की विडंबनाऐं ?
अपनी न कुत्सित लिप्सा से मर चुकी संवेदनाएं !
शिक्षा अब व्यवसाय बनी विकर्षक की मर चुकी संवेदनाएं,
मर रहा मरीज फीस पहले कठोर हुई डाॅ• की भावनाएं !
सत्ता के शीर्ष पर जो बैठे कितनी लालची इच्छाएं ,
आम आदमी पीस रहा नेताओं की मर चुकी संवेदनाएं ? 
सरोज दुगड़
गुवाहाटी
असम 
🙏🙏🙏


संवेदनाऐं
*********

कोरोना से पहले 
संवेदना थी क्या
मानव मे ये सवाल
खुद से कर जाती
जवाब खुद के 
अंतर्मन से पूछा 
तो जवाब कुछ
इसकदर मैं पाती।।
अंतर्मन कहता सुन वीना
मानुष्य माया का है भूखा
धार्मिक युग के जाते ही
दिखाया इंसान ने रुप अनोखा
महाभारत भी हुआ हुई रामायण
पात्र चाहे दुर्योधन हो या कैकई
सभी को थे बस राज्य प्यारे
सत्य को लताड़ संवेदना को मारे।।
अंतर्मन फिर समझाया मुझको
वीना पाप ना अधिक दिन टिक पाता
देख रामायण मे राम ही जीता
महाभारत मे दुर्योधन ही हारा
सत्य की संवेदना थी इनमें 
तभी तो धरा पे आज भी जग
इनको पूजे सारा।।

संवेदना ही इंसानियत का परिचय देती।।2।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
********************

संवेदनाएँ

आओ! सुषुप्त देवत्व को,हम सब जगाएँ
संवेदनाएँ ,चितन,देवो सा अपना हम बनाएँ।

सब प्राणियों में मानव ही श्रेष्ठतम किस लिए है,
क्योंकि संवेदन की भी वह संपदा लिए है।

क्योंकि संवेदनाएँ ही तो हमारे विचार जनक हैं,
बातें वही मनुज में व्यवहार की चमक हैं।

संवेदनाएँ-चरित्र-पहीए दोनों ही संतुलित हों,
जीवन का रथ न बहके,पथ भ्रष्ट न पतित हो।

ऐसे ही 'लोकसेवी' व्यक्तित्व निखरता है,
दुर्लभ मनुष्य हीजीवन, यूँ ही सँवरता है।

इस हेतु श्रेष्ठ संवेदनाएँ करते रहें सदा ही,
'सर्वे भवन्तु सुखिनः ' का मंत्र सर्वदा ही।

संवेदनशील का अभाव मानवता होता है,
विद्रूपता, विषमता का खेद वहाँ सदैव होता है।

डॉक्टर रश्मि शुक्ला 
प्रयागराज

मानव संवेदना
क्या कहूं मानव ह्रदय मैं
मर रही संवेदना
क्या कहूं मानव ह्रदय में 
मर रही संवेदना

मन के भीतर है बगुल
बाहर ही चोला संत का
जीना भी बौझिल हुआ
अब थक चुकी है चेतना
क्या कहूं मानव ह्रदय में
मर रही संवेदना

मन में दरारें पड़ गई
अब बढ़ गया है फासला
आंसुओं की अब झड़ी
पहले सी लगती नहीं
क्या कहूं मानव ह्रदय में
मर रही संवेदना

दूसरों की क्या कहें
औलाद अपनी ही नहीं
जरा अवस्था में उन्हें
जा आश्रम में छोड़ती
क्या कहूं मानव ह्रदय में
मर रही संवेदना

घुल रहा है विष फिजा में
घुट रही अब सांस भी
फड़फड़ा ते पर है पंछी
जिंदगी वीरान सी
क्या कहूं मानव ह्रदय में
मर रही संवेदना

तार वीणा के कहीं
अब छनकते हैं नहीं
साधना के स्वर भी रूठे
बेसुरी  है रागिनी
क्या कहूं मानव ह्रदय में
मर रही संवेदना

पाप और हिपाप को 
   लोग अब है पूजते
आराधना निराश हो
चुपचाप सब है देखती

अंजना रमेश चंद्र शर्मा
देवास जिला मध्य प्रदेश


*संवेदना कैसर मरीजों कै लिए* 
यह कविता उन सभी केंन्सर मरीजों के लिये समर्पित जो लड़कर आगे आये एवं धन्यवाद उन सभी चिकित्सकों को जिन्होंने नवजीवन दिया।
"Cancer" एक भयानक,डरावना सा शब्द जो सबको हिला देता है।
हर कोई जब सुनता हैं,बस स्तबध हो जाता है।
बीमारी सुनकर उस घर में कोई सों नही पाता है।
एक बोझ सा सबके दिल पर होता हैं, चिन्ता होती है।
उस परिवार के सदस्यो कि हर आँख आंसु रोती हैं।
एक अनजान सा भय,उन सबके दिलो को सताता है।
क्या होगा, कोई भी उस घर में सहज नही हो पाता है।
कैसे बताए उस मरीज को सबको यहीं दर्द सताता है।
मरीज तो सुनकर अपने में जीते जी ही मर जाता है।
उसके बचे जीवन के सारे सपने चूर चूर हो जाते हैं।
सिर्फ़ अस्पताल के चक्कर व डा.के चेहरे नजर आते है।
wफिर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे,चर्च, सब दर घुमे जाते है।
सबकी बताई दवा एवं नुस्खे भी आजमा लिये जाते हैं।
तन,मन,धन व परेशानी से हर परीवार लूट सा जाता हैं।
एक अच्छा खासा इसान,इसके इलाज से टूट जाता है।
पर धन्य है ईश्वर जिसने विज्ञान व कुशल चिकित्सकों,
के द्वारा इसके इलाज को आसान सा बना डाला।
कई मरीजो को जीवन देकर,जीवन रोशन कर डाला!
धन्य है वो सब डाक्टर्स व धन्य उनके सब सहयोगी है।
जिनके अथक प्रयासो से ठीक हो जी रहे लाखो रोगी है।
किसी ने भगवान को नहीं देखा, इन्हे ही भगवान कहते हैं।
सुख देते हैं कई जीवन को,तो कइयो के दर्द को सहते है।
सबकी दुआ है इन सभी को,इनका जीवन खुशहाल रहे।
करते रहे यू ही सेवा सुश्रुसा ,ईश्वर इन पर मेहरबान रहे।
शब्दों की भेट देता हैं " जनार्दन सबको मुस्कुराहट देने वालो 
आपके जीवम में भी खुशयो का बागबान रहे।
लेखक।
जनार्दन शर्मा



संवेदनाएं 


संवेदनाएं यदि नहीं होते 
तो मानव मानवता का पाठ सिख पाता
 संवेदनाएं ना होती तो कोई देश के नाम पर अपनी जानना लुटाता
 संवेदनाएं होती हैं तभी नारी की इज्जत बचाने वालों का सम्मान होता है 
संवेदना एं होती हैं तभी जीव जंतु अपना जीवन जी पाते हैं 
संवेदनाएं होती हैं तब बालिकाएं जीवन पाकर जीवन जीवित रहती हैं
 वरना गर्भ में मार दी जाती हैं 
संवेदना ओं से ही समाज बनता है

 संवेदना ओं सही व्यक्तित्व का विकास होता है 
जहां संवेदनाएं खत्म हो जाते हैं वहां पर मानवता भी नष्ट होने लगती है

संवेदना उसे जीवन में प्रखर का आती है 
और संवेदनाएं हैं तो मानव का अस्तित्व है 
संवेदनाएं ना होंगी तो मानव मानव ना होकर दानशहो जाएगा
 संवेदनाएं ही हमें विकास पथ पर ले जाती हैं 
संवेदना ही विश्व पटल पर हमारे देश का परचम लहराते हैं 
संवेदना उसे ही हम नव अविष्कारों की ओर बढ़ते हैं 
संवेदनाएं ही हमें मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर करती हैं
 संवेदनाएं हैं तो हम अपनी सभ्यता संस्कृति को चलाएं मान रख सकते हैं और 
संवेदनाएं हैं तो हम आप सब के दुख दर्द में हमदर्द बन सकते हैं
💐💐💐💐💐💐🙏🏻🙏🏻
कुमारी चंदा देवी स्वर्णकार


संवेदना

संवेदना की चंचलता देखें
इसने जीवन को जागीर बना ली
कभी सुख की दुनिया में भ्रमण करा देता
कभी दर्द का आइना दिखा दुखी कर देता
जीवन तो संवेदना ओं की गुलामी करता है

दिल सोचने को मजबूर हो जाता
आंखें छलक ही जाती
अश्क निकल ही जाता
अश्क का मिजाज देखें
कभी तो जीवन में मिठास भर देती
कभी शूल की तरह दर्द और चुभन से दिल को जख्मी बना देती

दिल सोचता है महसूस करता है
आंखें छलक ही जाती जुवां से
मीठे बोल निकल ही जाते

जलन जब होती है
कड़वाहट क्रोध की ज्वाला
शब्दों से तीर बन कर चुभ जाती


हाय रे संवेदना
तेरी गुलामी कर थक गई
अब तो थोड़ा रहम कर
उम्र बहुत हो गई है
चंचलता छोड़ दे
विश्राम लेकर मुझे सिर्फ
आनंद की दुनिया की सैर करा

कुमकुम वेद सेन



संवेदनाएं
-----------
 संवेदनाएं हैं तो 
मानवता भी हैं,
 संवेदनशील हृदय में
 ही ईश्वर बसते हैं,
  संवेदना विहीन इंसान भी 
कोई इंसान है भला,
 मृतप्राय है वो 
 सामाजिक है।
 सुख दुख सुख में
 साथ खड़े रहना
 ही जीवन है।
 जीवन मृत्यु,सुख-दुःख 
 तो आनी जानी है
 दो शब्द प्यार के बोल
  सुकून और राहत
 देताहै हमें,
 यूं ो वही होता है
 जो ईश्वर करता है
 कार्यों का लेखा-जोखा है
 तो चलता रहता है,
 पर किसी की 
संवेदना भरे शब्द
 साथ होने का एहसास
 ही काफी सुकून देता है।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना



🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
      🌿 शीर्षक: संवेदना 🌿
        🌴विधा: काव्य 🌴
(रचना एवं प्रस्तुति-- डाॅ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार )
🌹
संवेदना एक महा शक्ति -
है, भाव जगाती दिल में 
इसके बिना अधूरा मानव
पूर्ण नहीं जीवन में --

अपर दुख से द्रवित हो जाना
इसका एक परम गुण है --
भारत की संस्कृति ही ऐसी ,
जिसमें सत्य की सदा विजय है।
 
राम कृष्ण हों या कि बुद्ध हों
सब हैं ऐसे परम तपी --
देखा कष्ट दूसरों का तो ,
उमड़ आई , वेदना बड़ी ।

आज भी संकट की घड़ी में- 
है सम-वेदना दीख रही ,
मानव रत हैं , सेवा धर्म में 
होगी खुशहाल तुरत मही ।
🌹
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-- डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार ----



🙏🌹जय अम्बे🌹🙏
🙏🌹26/6/21🌹🙏

*सरसी छंद*
*रुक्मिणी की संवेदना* 

चाह नहीं थी पटरानी की, कृष्ण सदा हो साथ। 
धर्म निभाने जन्म लिया था, बने जगत के नाथ।। 

मुझको बाहों में लेते हो, आप नहीं थे साथ । 
पोंछ रहे आँसू दूजे के,पलभर बनी अनाथ।। 

प्यार दिखाना, गुस्सा करना, यह थी मन की चाह। 
साधारण सी में हूं नारी , करते तुम परवाह ।।

हर आहट पर दौड लगाई,आंसू बहते नैन।
बीता है पल पल युग जैसा, मन हो गया बेचैन।।

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏



संवेदनाएँ

मौन हो गई है संवेदनाएं 
क्षुब्धहो गई है व्यथाएँ

आखिर किस किस को रोएँ
अनचाही पीड़ा का बोझ ढोएँ
मौत तो एक आम बात है 
 पर आंसू गिराना खास बात है

कोरोना ऐसे अनोखे रंग दिखाए
जो कभी स्वप्न में भी न थे आए।। 
मानव सेवा को दोनों हाथ फैलाए
चोरबाजार -भ्रष्टाचार भी दिखाए।

कोरोना तूने ऐसी तबाही मचाई
देश में संक्रमण की सुनामीआई
जिंदगी जीने हेतु खड़े कतार में
मृत्यु के बाद मोक्ष की कतार में

जहांँ देखो दे रही दिखाई कतारें
एक नहीं दो तीन लगी है कतारें
हॉस्पिटल में खाली बैड भी नहीं
मरीजों को अब ऑक्सीजन नहीं

जिऩ्दगी वापसी हेतु जारी है जंग
सांँस हेतु मची ऑक्सीजन तरंग
रेमिडशिविर की होरही मारामारी 
कोरोना ने मचाया है ऐसा हुड़दंग।।

करोना तुझे कभी भूल ना पाएंगे
मेरे भाई को ही हमसे छीन लिया 
आई सीयू बैड की किल्लत ने ही
असमय उसका जीवन ले लिया

लगता रो रही हैं अब संवेदनाएं 
प्रभु मानवता के फूल खिला दो 
जो दुष्ट कालाबाजारी कर रहे हैं 
उन्हें सद्बुद्धि का मार्ग दिखा दो।।



आशाजाकड़


अग्निशिखा मंच अग्नि शिखा मंच की अध्यक्ष डॉ अलका पांडे जी ,कार्यक्रम उद्घाटन कर्ता श्री सुनील दत्त मिश्रा जी मुख्य अतिथि संतोष साहू जी ,जनार्दन सिंह जी संचालन संचालन कर्ता सुरेंद्र हरडे जी एवं शोभा रानी जी आप सभी का हृदय से वंदन अभिनंदन 
अलका जी का हृदय से आभार कि मुझे हमेशा अपने भविष्य का मंच पर आमंत्रित करती हूं करती हैँ औ आप लोगों से मिलने का अवसर देती हैं
आज का विषय संवेदनाएं बहुत ही सुंदर विषय है। जीवन की आपाधापी में ऐसा लगता था कि आज संवेदनाएं खो गई हैं लेकिन कोरोना की विभीषिका ने लोगों की संवेदनाएं को जगा दिया है और मानव सेवा के प्रति जागरूक कर दिया है ।कोरोना के कहर ने त्राहि-त्राहि मचा दी ।डॉक्टर, नर्स ,पुलिस कर्मचारी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक हो गए ।मानव सेवा भावना से दिन-रात सेवा में लगे रहे और दानदाताओं की ऐसी भीड़ मानव सेवा के लिए जुट गई कि उनको देखकर संवेदनहीन लोग भी सेवा करने के लिए तत्पर हो उठे। जगह-जगह लोगों को खाने का सामान वितरण किया गया ।बेघर को आश्रय दिया गया और आज कोरोना के कारण जो बच्चे अनाथ हो गए हैं आज उन बच्चों को गोद लेने के लिए बहुत सारी संस्थाएं, बहुत सारे लोग जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो गए हैं ।
कोरोना से हमने बहुत कुछ खोया लेकिन कोरोना से हमने बहुत कुछ पाया भी है ।लेकिन जहां दयावान और परोपकारी लोग रहते हैं उनके बीच में दुर्जन लोग भी हुए जिन्होंने ऑक्सीजन सिलेंडर को मंहगे दामों में बेचे। ईश्वर उन लोगों को सद्बुद्धि दें जो भ्रष्ट आचरण में जुड़ गए थे।
सभी ने रचनाएं अपनी संवेदना विषय पर सुनाई हैं ।सच में ऐसा लगता है कि सभी की संवेदनाएं जाग गई है सभी रचनाकारों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं बस इसी तरह स
नये विषयों पर रचनाएँ लिखते रहे आगे बढ़ते रहे
सभी को शुभकामना

आशा जाकड
 मुख्य अतिथि



"भ्रूण हत्या"

सुंदर सा संसार है बेटी! 
बेटों सा ही प्यार है बेटी!!

बेटी को जन्म लेने दो!
उसको संसार में आने दो!!

जीने का उसको भी हक है! 
न कोख में बेटी को मारे!! 

भ्रूण हत्या महापाप है! 
यह समाज पर अभिशाप है!! 

बेटियाँ तो सम्मान दिलाती है! 
कुल का नाम जगमगाती है !!

"आज़ाद"सोच को करे महान है! 
बेटे ,बेटियाँ एक समान है!! 

डा. महताब अहमद आज़ाद 
उत्तर प्रदेश



कविता का शीर्षक है,,
 संवेदनहीन मानव😢

मानवता को शर्मसार करने वाले मानव का ध्वंस हुआ आज के युग में ऐसा विध्वंस हुआ😢 शव को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले गया रास्ते में मिले कार दुपहिया वाले मिल गए,, रे मानव,
 मानव से कैसा त्रस्त हुआ,!!!!🤔

हाय रे मानव दयाहीन हो कर चला गया,, आज इस मानव को यह क्या हो गया?? इसका सारा प्यार पैसे में क्यों खो गया,, पैसे के चक्कर में सब की नैतिकता क्यों खो गई,, इंसान इंसान का खून चूसता अब तो हद हो गई🤔 इतनी स्वार्थ में अंधे हो गए हम,, अंदर तक संवेदनहीनता से भर गए हम😱

हमारे ऋषि-मुनियों में संवेदना ही थी।
 इसके बल पर राष्ट्री समाज को नई दिशा दी थी ।।आज अमान्य घटना भी विचलित नहीं करती🤔 संवेदना शून्य होकर मन में करुणा नहीं भर्ती

मानवीय संवेदना जीवन आधार है, पर आज यह निराधार है गरीब की जोरू सबकी भाभी कोई नहीं है रक्षक,, पैसों के चक्कर में रक्षक ही बन बैठे भक्षक।

है भारतवासियों, माननीय संवेदना को जागृत करो और देश समाज राष्ट्र के हित में आगे बढ़ो🌷

संदेश🌷

सोने की उस चिड़िया को वापस इस धरती पर लाएं🌷 धरती से अंबर तक अपना प्यारा तिरंगा लहराए प्यारा तिरंगा लहराए जय हिंद जय भारत🌷🌹💐🙂



अग्निशिखा मंच
संवेदना आज कल मर ग‌ई‌ है ‌लोगों में,
कोई जिये कोई मरे,हलचल नहीं है ‌लोगों में।

आम जनता ‌या नेता हों, पक्ष या विपक्ष के,
एक दूसरे का गला काट रह हैं लोग।

जनता भले ही भूखे मर ‌जायें ,
पर काला ‌बा‌जारी से पीछे हट‌ते नहीं हैं लोग।

आया है ‌‌कोरोना संकट देश पर,
दवाई,आक्सीजन उंचे दाम पर बेचते है़ लोग।

युगों से सबकी से‌‌वा करना सीखा है हमने,
पर‌हित सम धरम नहींं यही लागू किया है हमने।

हमें ही सब को जा‌गृत करना होगा।
दूसरों से पहले स्वयं को बदलना होगा।

एक दूसरे की ध्यान रखना होगा ,
गर पड़ोसी दु:खी है,उसके‌आंसू पोछना हो‌गा

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली म
महाराष्ट्र


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