Wednesday, 2 June 2021

यात्रा वृतांत ।अग्निशिखा मंच २/६/२०२१ यात्रा वृतांत।अद्भुत संग्रह_Dr Alka Pandey

अग्निशिखा मंच 
२/६/२०२१
यात्रा वृतांत 
मेरे अनुभव 

गर्मी की छुट्टी में शिमला भ्रमण 
अलका पाण्डेय 

शिमला , जो कि भारत के हिमाचल प्रदेश की राजधानी है , एक प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल है। गत वर्ष मुझे मेरी सहेलियों के साथ शिमला घूमने का सुअवसर मिला। भोगोलिक दृष्टि से देखे तो शिमला , हिमालय पर्वत शृंखला के निचले भाग मे स्थित है। शिमला शहर भी एक पर्वत पर वसा हुआ है। पर्वतीय स्थल होने के कारण शिमला का मौसम सभी ऋतुओं मे बहुत सुहावना होता है। यहाँ का कुफ़री पर्वतीय स्थल काफी ऊंचाई मे स्थित होने के कारण सैलानियों के लिए बहुत मनभावन होता है । 
यहाँ के पर्वतो पर पहुँच कर मुझे ऐसा लगा जेसे कि मैं प्रकृति की गोद मे आ गयी हूँ। शांत एवं मनमोहन वातावरण से मेरे अंदर एक स्फूर्ति आ गई थी हम सारी सहेलिया एक अदभूद एहसास कर रहे थे  अविस्मरणीय 
ग्रीष्म ऋतु होने के कारण , मेरी यात्रा के दोरान शिमला बर्फ़ नही जमी थी यहाँ शीत ऋतु में शिमला बर्फ़ से ढक जाता है । तापमान बहुत कम था ऐसे मे भ्रमण करना बहुत रोमांचक था। यहाँ के पर्वतो पर पहुँच कर मुझे ऐसा लगा जेसे कि मैं प्रकृति की गोद मे आ गयी हूँ। शांत एवं मनमोहन वातावरण से मेरे अंदर एक स्फूर्ति आ गई। कुछ छोटे तो कुछ ऊंचे पहाड़ो ने मन को मोह लिया।थकावट महसूस ही नही हो रही थी । ताजगी हमेशा बनी रहती 

शिमला के प्रसिद्ध स्थान रिज पर, जो कि बहुत ऊंचाई पर है , शाम के समय सैलानिओ का जमावड़ा लग जाता है। शिमला का जाखू पर्वत भी काफी लोक् प्रिय है।वहाँ एक हनुमान मंदिर भी है जिसमे एक बहुत ऊंची प्रतिमा स्थित है। 
शिमला के पर्वतो की यात्रा मेरे जीवन की सबसे यादगार यात्राओ मे से एक है जिसने हम लोगो को प्रकृति और पर्वतो से जुडने का अवसर दिया !

२) नैनीताल 

नैनीताल एक पर्वतीय स्थल है । पर्यटन की दृष्टि से यह भारत के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक है । चारों ओर हरे-भरे पहाड़ों व सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से घिरा यह स्थल सभी का मन मोह लेता है । ग्रीष्म ऋतु में यहाँ की ठंडी हवाएँ सभी को ताजगी पहुँचाती हैं । यहाँ की झील में नौका विहार का आनंद ही कुछ और है ।और बहुत लोग वोट में रहना पंसद करते है शिंकारा कहाँ जाता है पानी के अंदर शिकारा में रहना बहुत ही सुखद व सुदर पल 
पहाड़ी मार्ग के किनारे गहरी सुंदर घाटियों का दृश्य अद्‌भुत लगता है । रास्ते में पहाड़ों से निकलकर बहते झरनों का दृश्य तो इतना मनमोहक लगता है कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं । ऊँचाई पर एक जगह बादल हमारी बस की खिड़कियों से अंदर प्रवेश करते है कार में प्रवेश करते है । उस समय सचमुच ऐसा लगता है । जैसे हम स्वर्ग का सुख प्राप्त कर रहे हैं । 
यहाँ पर लोग अमरनाथ बाबा के दर्शन करने आते है बर्फ़ ही बर्फ़ देखने को मिलती है बेहद खुबसूरत सेब के बगान देख मन खुश हो जाता है पहाण बर्फ़ हरियाली का अदभूत संगम यहाँ दृष्टिगोचर होता है 
अलका पाण्डेय - मेरे अनुभव मौलिक

🙏🏻🌹अग्नि शिखा मंच, 🌹🙏🏻
🙏🏻🌹जय अम्बे🌹२/५/2021🌹🙏🏻
🙏🏻🌹वैष्णो देवी यात्रा का संस्मरण🌹🙏🏻

        1985 की बात है, हम दोनो अमरनाथ भोलेनाथ के दर्शन के लिये गये थे, जम्मू से रविवार को दोपहर 12/बजे की मुंबई वापस आने की गाड़ी थी, आज शुक्रवार था, मन में माता रानी वैष्णो देवी के दर्शन की तीव्रता बढ़ती गई, हम तो बस से निकल गये, शुक्रवार रात को हम कतरा पहुंचे, 
      दूसरे दिन घोड़ा चढ़ने, और उतरने के लिये भाडा पर किया, पांच बजे निकले, 10,बजे तो पहुंच गए, हमने सोचा पांच बजे वापस नीचे उतर जाने से रात को पहुंच जाएंगे, रात की बस से जम्मू चले जाना है, प्लान बनाया, घोडेवाला ने आधी रकम मांग लिया, कुछ खरीदने  है, ओर खाना भी है,विश्वास रखकर बक्षीस भी देकर पैसे दे दिए, और कहा, पांच बजे निकलेंगे, 
     मां के दर्शन किये, तृप्ति नहीं हो गई ,फिर दर्शन को मन तरस रहा  था, लाइन में  खड़े रह गये, वो दिन माँ की कृपा से लाइन ज्यादा नहीं  थी, प्रेम से माँ के दर्शन करके, कुछ खाना खाकर हम ने घोडे वाले को ढूँढना शुरू किया, देखा कोई घोडे वाले नहीं  थे, एक आदमी को पूछा, तो बोला वो सब नीचे चले गये, अंधेरा होने लगा, बैटरी भी नहीं  थी, 
        हमने एक दूसरे  का हाथ पकड़ा, और नीचे उतरने लगे, घना  अंधेरा, नीचे उतरना खतरे से खाली नहीं था, पहुंचने की चिंता, गिरने का डर, ठंडी, ओह, जगदंबा ने, परीक्षा शुरू कर दी थी, हम एक दूसरे को हौसला बनाये आगे बढ़ते जा रहे थे, 
        अचानक बिजली चमकना शुरू हो गया, हमको लगा आज बिजली, डूबते को तिनके का सहारा बनकर हमें रास्ते दिखा रही थी, माँ की कृपा मील रही थी, हमारी उतरने की झड़प हमने बढ़ाई  मानो, दौड़  लगाई, कैसे रास्ता खत्म हो गया, पता नहीं चला, 
               रात को, 3/बजे होटल में जैसे पहुंचे, बारिश जोरदार  से आने लगी, आज बिजली के स्वरूप में, मां जगदंबा ने हमारी नैया पार करवा दी, और बारिश भी होटल पहुँचने के बाद आई, नहीं तो, इतनी ठंड,ऊपर से बारिश, कैसे नीचे उतर पाते, सुबह पांच बजे की बस से जम्मू पहुंच  गए , 
       हर मोड़ पर माँ की कृपया मिल रही थी, और आज भी हमें मां की कृपा का अहसास हुआ, 
🙏🏻🌹पद्माक्षि शुक्ल 🌹🙏🏻

$$ यात्रा संस्मरण $$

वैसे तो आप सभी ने अनेक यात्राएँ  की होगी और कितने ही अनुभव आपकी यात्रा के रहे होंगे ।
ऐसे ही मैंने भी अपने जीवन मे कई यात्राएँ की ओर अलग अलग अनुभव भी हुए ।
कभी खुशी का अनुभव हुआ तो कभी दुर्घटना का भी सामना करना पड़ा और उन दुर्घटना से सकुशल बच कर भी निकले ।
ऐसी ही एक यात्रा का विवरण आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ और उस यात्रा से हमे क्या सीख लेना चाहिए ये आप सभी के लिए छोड़ रही हूँ।

बात अगस्त 1986 की है , हम दोनो माउंट आबु की यात्रा पर निकले अपनी एक साल की बेटी को उसके ननिहाल भदेसर छोड़कर।उन दिनो अपने साधन तो इतने हुआ नही करते थे तो पहले हम बस से उदयपुर के लिए रवाना हुए उसके बाद उदयपुर से माउंट आबु की बस पकड़ी। हम बस की पहली सीट पर बैठे थे ।हल्की बुंदा बांदी से मौसम बहुत सुहाना लग रहा था ,बीच मे एक बस स्टाप पर ड्राइवर महोदय नीचे उतरे और शराब पीकर आ गए। थोड़ी देर तो हमे कुछ पता नही चला पर बाद में जब बस बार बार हिचकोले खाने लगी तो मुझे कुछ शंका हुई, मैने अपने पतिदेव को धीरे से बोला ड्राइवर नशा करके आये है पर उन्होंने मेरी बात का विश्वास नही किया और हमारा सफर ऐसे ही चलता रहा हम मौसम का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते रहे पर     तभी एक झटका लगा और हमने देखा  हमारी बस बनास नदी के पानी मे तिरछी खड़ी है ।सभी यात्रियों के होश उड़ गए। बस थोड़ी भी हिली तो पानी मे बहने का डर नदी का बहाव भी बहुत तेज था । तभी मेरे पतिदेव अजय डांगी जी ने कहा हम अपना सामान यहीं छोड़कर ड्राइवर सीट से नीचे कुद जाते है चुंकी  हमे तैरना आता था और बस मे कुछ आसपास के गांव वाले भी थे उन्होंने भी साथ दिया की हम सब को ऐसे ही कूदना है पर ध्यान रहे सब आपस मे एक दूसरे का हाथ पकड़कर रखेगा ।
सबसे पहले हमने पानी मे छलांग लगाई उसके बाद धीरे धीरे सभी लोगों ने बस से छलांग लगा दी ।हमने आठ आठ दस दस लोगो ने एक दूसरे का हाथ पकड़कर नदी पार की ओर किनारे पर पंहुच कर चैन की सांस ली ।फिर गाँव वालो ने सलाह दी की हम सामान लेकर आते है तब उनकी  मदद से पुरूष यात्री फिर बस तक गए और सारा सामान लेकर आये ।
एक जयपुर का परिवार था कुल पांच सदस्यों का उनके पास जम्बो सूटकेस था वो भी बिना पहिये वाला और हमे चलना था तीन किलोमीटर । 
जैसे तैसे बस कंडक्टर और गाँव वालो की मदद से अगले चौराहे तक पहुँच कर दूसरी बस से  आबु रोड़ पंहुचकर आराम किया।
अभी कोरोना काल भी ने भी हमे यही सीखाया की हम अपनी आवश्यकताएं कम रखे तो जीवन आसान रहेगा। 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

यात्रा संस्मरण -आरकेलॉजिकल टूर 
Archaeological tour

यह सन 1971 की बात है, जब मैं Archaeology में एम ए कर रही थी लखनऊ में। हमारे विषय में आर्कलॉजिकल टूर जाता था, उसमें मैं भी गई थी। हम 50 विद्यार्थी थे, 2 बी एन श्रीवास्तव हमारे सर,उनकी पत्नी और चार अन्य व्यक्ति थे। उसमें दो कुक और दो सामान उठाने के लिए नौकर थे।अतः कुल 56 लोग थे।हमारी को एजुकेशन थी, अतः लड़के लड़कियां साथ साथ गए थे।
 सबसे पहले ट्रेन विदिशा में रुकी वहां उतरकर सांची का स्तूप देखा। इतना विशाल बुद्ध की प्रतिमा देख कर बहुत अच्छा लगा। उन दिनों ना ए सी डिब्बे होते थे, ना ही रिजर्वेशन होता था। हम सब अपना अपना सामान उठा कर भागते और डिब्बे में चढ़ जाते थे। फिर अजंता एलोरा गुफाएं देखीं और गीत गाया पत्थरों ने पिक्चर को खूब याद किया। मोबाइल लैपटॉप नहीं होते थे। हम लोग बाम्बे में रुके, एलिफेंटा देखने गए और कन्हेरी गुफाएं मुंबई में देखीं। रात में मरीन ड्राइव पर घूमते हुए सर ने बताया, कि इसे क्वीन्स नेकलेस कहते हैं। समुद्र की लहरों में हम सब खो गए, उस समय ज्यादातर बाम्बे की शूटिंग होती थी। 56 लोगों का खाना बनता था, तो बड़े पतीले में चावल आलू डालकर बनाया जाता था और सलाद खा कर ही खुश हो जाते थे। उस समय होटल कोई नहीं जाता था, जो साथ में चार लोग  थे वह खाना बनाते थे।आज से 50 साल पहले,लड़के लड़कियाँ टूर पर जा रहे हैं, बहुत एडवांस समझा जाता था।बाम्बे में हमलोगों ने मराठा मंदिर में जानी मेरा नाम पिक्चर देखी थी।खूब मस्ती की थी।वह यादें ऐसी बसी हैं कि आज यात्रा संस्मरण लिखने में मैंने कलम उठाई और लिख दिया, याद कर के।वह दिन वह मस्ती जीवन में दोबारा कभी नहीं आई ।लखनऊ यूनिवर्सिटी के दिन भी क्या खूब थे।वाह!सुनहरी यादों में खो जाती हूँ।अलका जी को धन्यवाद, आज 50 साल पुराना यात्रा संस्मरण लिख दिया।

डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"
2-6-21

यात्रा संस्मरण
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय और विधा_यात्रा संस्मरण     ईश्वर की कृपा से मैने देश_विदेश की अनेकों यात्राएं की हैं।विश्व स्तर पर यूरोप के दस देश फ्रांस,जर्मनी, यू के,इटली,वेनिस आदि,अमेरिका तीन बार,कनाडा,सिंगापुर मलेशिया आदि।यात्रा में अच्छे_बुरे अनुभव मिलना सामान्य बात है।
     दरअसल मन में उमंग उत्साह हो तो हर यात्रा यादगार बन जाती है हिम्मत हो तो सोने पे सुहागा।भारत में कश्मीर,शिमला,डलहौजी,पंजाब,राजस्थान,गुजरात,नॉर्थईस्ट,अंडमान निकोबार,लेह लद्दाख होते हुए १६००० फिट ऊंचे पेनगंग लेक,देहरादून ,हरिद्वार,कढ़ी बनारस इत्यादि सब जगह देखी हैं।
     मेरी यात्रा यादगार रही है।मुझे नाचने ,गाने,बजाने,खेलने का शौक है।जब भी यात्रा में २_४घंटे का बस से सफर होता था तो मैंने ग्रुप को अंताक्षरी खिलाई,गेम्स खिलाए ,यहां तक कि हम बस में नाचे भी।खूब मस्ती ली।समय कैसे गुजर जाता पता भी न चलता।
     हर जगह का अपना प्राकृतिक सौंदर्य होता है।जैसलमेर का रेगिस्तान तो कश्मीर का गुलिस्तान सभी कुछ देखा है।बर्फीले पहाड़,हरे भरे पर्वत,सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला सभी के दर्शन किए हैं।कलकल करती बहती नदियां देखी हैं।
     मैं घूमने की शौकीन,जेबऔर शरीर भी अभी तक तो साथ दे रहा है सो मैं घूमने जाती रहती हूं।अभी इस "कोरोना भाई"ने रोक रखा है।जैसे टूरिज्म खुलेगा मैं निकल पडूंगी देश_विदेश की यात्राओं पर।
     आपसे अनुरोध करना चाहती हूं कि जब भी घूमने निकले तो मन में उमंग,उत्साह,हिम्मत भर के चलो तो हर सफर अविस्मरणीय हो जाएगा।
"जिंदगी एक सफर है सुहाना,
यहां कल क्या हो किसने जाना।"
इसलिए स्वस्थ रहो,मस्त रहो
घूमने में व्यस्त रहो।।
स्वरचित मौलिक लेखन_
रानी अग्रवाल,मुंबई।
२_६_२०२१.
नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी
अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन

विषय- यात्रा संस्मरण

मुझे अभी भी याद है मैं कॉलेज मैं होती तब दूसरे वर्ष में हमारे कॉलेज की यात्रा निकली थी। वह यात्रा यह इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन कॉन्फ्रेंस थी। 
  इस यात्रा में हम ट्रेन से गए थे महाराष्ट्र अहमदनगर से हमारी ट्रेन निकली और वह ट्रेन मदुराई में रुक गई। मेरे जीवन का पहला सफर ट्रेन में था और वहां 30 घंटे तक चला। 
    मदुराई में हम रात को पहुंचे उस वक्त हम होटल में रुके। सुबह होते ही स्नान करके हमने मदुरई के मीनाक्षी टेंपल में दर्शन किया।
बाद में हम सब ने मिलकर नाश्ता किया और उस देर बाद हम अगले ट्रेन में बैठ कर हम रामेश्वर में जाने के लिए निकले। रामेश्वर में हमने समुद्र में नहा कर शिव जी का दर्शन किया और उसके बाद हम रामेश्वर के सभी मंदिरों का दर्शन किया और चेन्नई एक्सप्रेस मूवी में जिस फूल की शूटिंग हुई वहां पर पहुंचे, और वह देखकर हम रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। हमारी ट्रेन आने में बहुत देर था हम दो-तीन घंटे स्टेशन पर ही रुके और उसके बाद हम कन्याकुमारी को जाने को निकले और कन्याकुमारी पहुंचते ही हम हमारे होटल में पहुंचे और रात को रुके और दूसरे दिन सुबह ही हम कन्याकुमारी के समुद्र के किनारे पर गए । और उस बीच पर हमने सब ने मिलकर बहुत आनंद लिया। 
    कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद का स्मारक देखने के लिए हम जहाज से गए और स्मारक देखा। उस वक्त हमने बहुत सारे फोटो खींचे और हमने वहां पर बहुत सारी जानकारी पाई। वह होने के बाद हमने जात से फिर किनारों पर आ गए। बाद में हम हमारे होटल में पहुंचे वहां से हमारे सामान बैग लेकर हम आगे की यात्रा को निकले स्टेशन पर पहुंचे और हम ट्रेन में बैठ कर हमारे मूल स्थान पर पहुंचे जहां हमें कॉन्फ्रेंस में जाना था वह तिरुमला ,तिरुपति आंध्र प्रदेश में।
     और हम हमारी कॉन्फ्रेंस के लिए तिरुपति बालाजी में 8 दिन रूके वहां हमें साइंस के बहुत सारे सायंस के लेक्चर सुनने को मिले। 
  सभी राज्य के लोग विद्यार्थी वहां आ गए थे पहले दिन हमारे देश के पंतप्रधान मोदी जी का हमें भाषण सुनने को मिला। और वहां अनेक राज्य के लोग आने के कारण हमें अलग अलग भाषा भी सुनने को मिले कुछ भाषा हमने तो सीखने को भी मिली। 
     आंध्र प्रदेश के कुछ शब्द हमने नोट कर भी लिखें। जैसे कि सॉरी को सारी सारी कहते हैं, पागल को पायटीएम कहते हैं, ऐसे कई और रोमांचक शब्द हमें सुनने को मिले सीखने को मिले। वह दिन भी बहुत अच्छे से और यादगार गए। 
    तिरुमला में हमने तिरुपति बालाजी का दर्शन लिया। उस दर्शन में भी बहुत देर तक लाइन में खड़े होकर जब बालाजी का दर्शन लिया तो दिल को सुकून मिला और बड़ा आनंद आया। 
   उसके बाद हमने प्राइवेट ट्रैवल्स में जो ट्रैवल्स चेन्नई को जा रही है उस में बैठकर हम लक्ष्मी के दर्शन को गए। 
  वहां पर हमें अलग ही देखने को मिला लक्ष्मी के दर्शन को आने वाले सब महिलाओं ने लाल रंग की साड़ियां पहनी थी। वहां के लोग बड़ी भक्ति से दान धर्म करते थे। उस मंदिर में एक प्रथा थी हमारे मन में जो आए वह सोना पानी में फेंकते थे, पानी में पैसा और सुना बहुत कुछ देखने को मिला। उसके बाद हम जहां रुके थे वहां पहुंचे हम तिरुपति यूनिवर्सिटी में रुके थे वहां हॉस्टल में हम जाकर हमने हमारा लगेज बैग पैक किया क्योंकि अब हमें आकर 8 दिन हो चुके थे और हमें अभी फिर से निकलना था। 
और हम जिस हॉस्टल में रहते थे वहां के अनेक लोगों की मुलाकात हो चुकी थी उनके नंबर हमने लिए। 
     और हमें वह खाने के भी बहुत सारे पदार्थों मालूम हुए। हमारे महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के पदार्थो के बारे में जानकारी मिली। और हम यह सब हमारे दिल में लेकर हम हमारे लौटने के यात्रा को निकले ट्रेन में बैठकर हम हमारे महाराष्ट्र में पहुंचे।
   वह यात्रा भी बहुत ही मजेदार गई। और वह यात्रा हमेशा के लिए यादगार बनी।

धन्यवाद
पुणे

*बादलों के छत पर*

उस दिन मैं हवा उड़ रही थी। मेरी सखी और एक मेड़म के साथ शिलांग जाने की अभीलाषा पूर्ण होने का समय नज़दीक आया था। मध पुलकित, तन रोमांचित , सब तयारी कर दी थी। रेल की यात्रा के लिए आरक्षण कर दिया था।
रेल में हुब्बल्ली से तीन दिन की यात्रा । शिलांग ,मेघालय की राजधानी बहुत सुंदर शहर ,मेघों का आलय सब को अपने तरफ आकर्षित करता है।शिलंग ,पूर्वोत्तर राजधानी मनोहर है ।शिलांग की राजस्थानी सभा भवन में तीन दिनों के साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।दो दिन कविगोष्टी ,संगोष्टी और सांस्कृतिक कार्यक्रम का बढिया आयोजन किया गया था। एक दिन शिलांग घुमने का योजना भी थी। 
 शिलांग के पास एलिफंटा फाल्स, चिरापुंजी -मौसिनराम जहाँ दुनीया के सबसे अधिक बारीश होनेवाली जगह और नजदीक मौसीनराम गुफा, बंग्लादेश बार्डर , झील , मेघों का आलय ,एक से बढकर एक सुंदर जगह देखनेलायक हैं।
 ब्रह्मपुत्रा नदी का बहाव की कशिश हमें बांध लिया था।

   वहाँ के लोग खासी और अंग्रेजी भाषा बोलते हैं। साफ -सुथरा, अनुशासन से परे लोग,जहाँ देखे वहाँ फूलों की बागिया।मैं तो आसमान में तैर रही थी।ऊपर -ऊपर चढते ही मेघ स्पर्ष होने का अहसास , कोहरा ,पत्तों को शबनम का हल-चल ,बहुत ही आकर्षित। सेवन सिस्टर फाल्स, वहाँ की स्वच्छंद ,निर्मल सरिताएँ !वहाँ से हिलने मन नही हो रहा था।

डाॅ.सरोजा मेटी लोडाय।

*यात्रा संस्मरण ( जिम कॉर्बेट की यात्रा )*


वैसे तो हमने कई यात्राएं की और कई यात्राओं के संस्मरण  आज भी मन के चलचित्र में यथावत अंकित हैं। परन्तु आज मैं यहां अपनी जिम कार्बेट की रोमांचक यात्रा के बारे में बात करूंगी। बात कुछ वर्ष पहले की है। हमलोग छुट्टियां मनाने नैनीताल गए थे।और जिम कार्बेट हमारी छुट्टियों का सबसे मुख्य बिंदु था। तीन  दिन नैनीताल, रानीखेत आदि आसपास के जगहों को घूमने के बाद चौथे दिन हम नेशनल पार्क जिम कॉर्बेट के लिए निकल गए ।जहाँ हमें दो दिन रहना था। हमने अपने ट्रिप के लिए एक जिप्सी की थी ।ड्राइवर ही एक तरह से गाइड की भूमिका भी अदा कर रहा था।वह बहुत कुछ उस जंगल के बारे में बताते भी जा रहा था।बच्चे भी काफी उत्त्साहित थे ।टाइगर देखना उस दिन का हमारा प्रथम लछ्य था। शाम 4 बजे तक ही वहां घूम सकते थे ।परंतु उस दौरान हमने आराम फरमाते टाइगर को और विभिन्न प्रजातियों वाले जानवर पंछी आदि देखा। और पहले दिन की हमारी यात्रा बहुत ही सुंदर ढंग से पूरी हो गई। रात्रि हमने वहीं कॉटेज में विश्राम किया और दूसरे दिन सुबह ही चाय नाश्ते के बाद हम बाकी के अपने जंगल के सफर पर निकल गए। जब भी बच्चे अति उत्साह में किसी जंगली जानवर को देखते तो चिल्लाने लगते जिसे बार बार हमारा ड्राइवर मना करता कि जंगल मे सफर के दौरान बिल्कुल शांत होकर ही सफर करिए वरना कई बार जानवर हमला कर देते हैं। बार बार वह हमें बच्चो को शांत रखने के लिए बोलता।अब बच्चे तो बच्चे ही हैं थोड़ी देर बाद वह फिर अपने उत्साह में आ जाते। 
        खैर..अभी हम कुछ दूर ही गये थे कि हमारी जिप्सी के आगे आगे एक मदमस्त हाथी..जिसके कानों से मद बह रहा था अपने ही मस्त चाल में चला जा रहा था। बच्चे उसे देखकर ज्यों ही चिल्लाए..वह हाथी भी आवाज सुनकर पीछे की तरफ पलटकर देखा। ड्राइवर ने फिर शांत रहने का इशारा किया और धीरे धीरे उससे कुछ दूरी बनाकर धीरे धीरे चलता रहा।सब शांत थे..पर पता नही अचानक हाथी को क्या हुआ.. वह एक बारगी पीछे की ओर पलटा और हमारी जिप्सी को ही हमले की दृष्टि से दौड़ाना शुरू किया। हमें काटो तो खून नही..बच्चों को हमने कसकर खुद से चिपकाया और ईश्वर का नाम लेना शुरू किया। ड्राइवर ने बिना आवाज के रहने की हिदायत दी और कहा कि वह किसी को कुछ होने नही देगा..बस आप लोग शांत रहें। पतिदेव तो शांत ही थे पर हम तीन लोग ....।
ड्राइवर गाड़ी बैक ही बैक में बहुत दूर तक ले गया..और हाथी भी ऐसा ज़िद्दी निकला कि उसने भी हार नही मानी और कई किलोमीटर तक हमें दौड़ाया। जब हाथी को यह आभास हो गया कि अब उसके एरिया  से हमलोग बाहर हो गए हैं तब यह वापस लौटा । हम भी एक सुरक्षित दूरी बनाकर फिर अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। वह अब भी हमारे  रास्ते मे था या यह कहिए कि.. हम उसके रास्ते मे थे। हमारे काफी दूर रहने के बाद भी वह एक बार फिर हमारी तरफ पलटा और फिर उतनी ही तेजी से चिंघाड़ता हुआ हमारी ओर लपका। शायद ड्राइवर हमेशा इन सब चीज़ों से दो चार होते होंगे, इसलिए वे बहुत सतर्क रहते हैं। उसने सफारी फिर बैक ही भगाना शुरू किया। मैं यहां यह बताना भूल गई थी कि ड्राइवर के बैक में ही भगाने का कारण क्या था...एक तरफ घने जंगल थे और दूसरी तरफ कई फ़ीट नीचे खाई... हम जंगल के अंदर जा नही सकते थे और गाड़ी को मोड़ने के लिए पर्याप्त जगह भी नही थी।
थोड़ी भी गाड़ी हड़बड़ी में डिसबैलेंस होती तो हम कई फ़ीट नीचे होते ।जहां से हमारा कोई अस्तित्व नही मिलता।  खैर भगवान उस ड्राइवर का भला करें जिसने हमें उस अचानक आई आपदा से सुरक्षित घर पहुंचाया।
    और इस तरह से जिम कार्बेट का वह खूबसूरत सफर हमारे लिए बहुत रोमांचकारी बन गया।
  *मीना गोपाल त्रिपाठी*
    *2 / 6 / 2021*
     *बुधवार*

संस्मरण

आज से तीस वर्ष पूर्व जब हम प्रथम बार  ग्रामीण क्षेत्र में सर्विस के लिए गये
साथ मे फोल्डिंग छाता, पैरों मे सेंडिल
रोड से आफिस तक का पैदल रास्ता,, पैदल चल ही रहे थे कि जोर से हुई वारिस, गीली मिट्टी पानी पड़ने से फिसलने लगी,, मैंने तुरंत ही छाता खोला
,,,, हवा में छाता पलटकर ऊपर और सेंडिल गीली का मिट्टी के अंदर,,,,,, और हम पानी से तरबतर   ,,,,,,, 

गाँव की महिलाओं ने जी भर कर उड़ाई हँसी,,,,,,, 

न भूलेगोऐ

शीर्षक-यात्रा संस्मरण

बात उन दिनों की है जब मैं लायंस क्लब इंटरनेशनल क्लब ओम मैत्री जोधपर की अध्यक्षा थी ।हमें कान्फ्रेंस में दिल्ली जाना था, और भी अनेक क्लब की सदस्याएं भी यात्रा पर हमारे साथ थीं । लेकिन हमारे ग्रुप में हम आठ जो एक ही वोगी 3 टायर में सवार थी । दोपहर 12:10 पर ट्रेन ने प्रस्थान किया। सभी एक शोर  के साथ जयकारे लगाने लगीं । एक चहल-पहल भरा माहौल हो गया। धीरे-धीरे रेल ने रफ्तार पकड़ी । इधर हम सब सखियां अपनी अपनी गुफ्तगू में मगन हो गई। तभी एक सखी उषा ने सुझाव दिया कि अपन अंताक्षरी खेलते हैं ।
4 -4 की ,2 टीम बन गई। म से शुरुआत होकर अनेक रंगीन रोमांटिक गानों की बौछार होने लगी ।तभी नीलम का नंबर ठ से आया ।कुछ देर तो वह सोचने लगी। फिर गाते हुए ठुमकने लगी -" ठाड़े रहियो ओ बांके यार रे" उसका नृत्य देख कर सब को बहुत आनंद आया और सभी ने ताल में ताल और स्वर में स्वर मिलाकर बड़ा मनोरंजक कलात्मक वातावरण पैदा कर दिया ।अब तो जिस का भी नंबर आता वह ठुमक कर ही गीत गाती ।इससे कार्यक्रम बड़ा ही मनोहारी बन गया ।पता ही नहीं पड़ा कि कब 4:00 बज गए ।अब तो सब सुस्ताने लगी ।फुलेरा स्टेशन भी आ गया। चाय लो चाय की आवाजें एवं अनेक खाने पीने की चीजों की आवाजें आने लगी। हम लोगों ने आठ खुल्लड़ चाय मंगवा ली और सभी अपने अपने नाश्ते के डिब्बे निकालकर खोल चुकी। कोई मठरी ,नमकीन ,मिठाईफल वगैरा ।सब ने चाय की चुस्कियों और चुटकुले या मनोरंजक घटनाओं के साथ नाश्ते का आनंद लिया।
 ट्रेन फिर से रवाना हो चुकी थी। हमारी गपशप के बीच जयपुर भी आ गया ।फिर वही आवाजें चाय गरम चाय या  ,,,,,,,,,,,हम लोगों ने एक दौर और चाय का  लगाया ।बातों का सिलसिला परवान चढ़ता गया। गाड़ी फिर रफ्तार से चल पड़ी। पता ही नहीं पड़ा कब शाम से रात हो गई। रात्रि के 8:00 बजे फिर सब के पेट में चूहे कूदने लगे और सभी के खाने के टिफिन खुल गए। अब मिलीझुली खुशबू से बोगी महक रही थी।  कोई अचार- नींबू, मिर्ची, कैरी का कोई सब्जी करेला ,आलू, गोभी ,पत्ता गोभी, गट्टे ग्वार ,फली आदि।सभी तरह-तरह के व्यंजनों का आनंद ले रही थी । खाने के संग एक-दो घंटे तक बातों का दौर चलता रहा ।  10:00 बज चुके थे। मैंने चौंकते  हुए समय बताया ।सभी ने फटाफट अपने अपने टिफिन संभाले और अंदर रख दिए ।वाश- वेशन पर हाथ धो कर आ गई और अपने अपने बिस्तर खोलकर अपनी अपनी बर्थ पर पसर गईं ।फिर लेटे लेटे ही बातों का दौर चल पड़ा ।हंसी मजाक होती रही ।पता ही नहीं पड़ा, धीरे-धीरे सब की आंख लग गई। सुबह 6:00 बजे बोगी में हड़कंप हुई,कुली की आवाजें आने लगी, दिल्ली आ चुका था। हम सब ने भी अपने-अपने सामान समेटे और उतर पड़े स्टेशन पर ।पता ही नहीं पड़ा इतने आनंदपूर्ण वातावरण में कब दिन-रात बीते और भोर हो गई ।इस वृतांत को मैं आज भी याद करके बड़ी आनंदित होती हूं। वे अविस्मरणीय दिन अनेक बार रोमांचित कर जाता हैं।

स्वरचित संस्मरण रजनी अग्रवाल जोधपुर

यात्रा संस्मरण

बहुत छोटी यात्रा संस्मरण की चर्चा कर रही हूं। मेरी जन्मभूमि बिहार के गया जिले में है।

गया जिले की विशेषता यह है कि मृत्यु के बाद फल्गु नदी पर श्राद्ध करने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा हमारे वेद समाज और संस्कृति की मान्यता है
गया शहर के बीचोबीच मेरा निवास स्थान है वहां से फल्गु नदी 6 किलोमीटर की दूरी पर है फल्गु नदी के किनारे प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर है।
देश विदेश के लोग इस मंदिर को देखने और फल्गु नदी पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करने आते हैं गया वासी इसलिए बहुत पूजनीय माने जाते हैं।
40 50 साल पहले की यात्रा लिख रही हूं अपने घर का यह रिवाज था कि महीने में एक बार विष्णुपद मंदिर अवश्य जाना है और हम लोग सभी रिक्शे पर बैठकर विष्णुपद मंदिर जाया करते थे उस मंदिर के एक छोर परीक्षा वाला उतार देता था उसके बाद आपको पैदल जाना है क्योंकि कोई सवारी उसके भीतर नहीं जाती है करीब एक डेढ़ किलोमीटर भीतर जाने के बाद भव्य मंदिर है उस मंदिर में विष्णु जी का पैर पद स्थापित है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन घड़ी सीमेंट की बनी हुई है जिस पर सूर्य की किरणें पढ़ती रहती हैं और समय का बोध दिलाती रहती है बड़ा ही मनोरंजक और आश्चर्यजनक कृति है उसका आनंद हम लोग खूब लिया करते थे मंदिर से सटे ही फल्गु नदी है फल्गु नदी की यह विशेषता है कि यह एक पहाड़ी नदी है जिसमें पानी कभी नहीं रहता है और आराम से आप नदी में डाल सकते हैं लेकिन जब चाहे तब आप बालू हटाएंगे तो पानी मिल जाएगा कीचड़ कहीं नहीं मिलता है।
विशेषकर छठ व्रत में पूरी नदी में सूर्य की पूजा होती रहती है इस नदी का कोई किनारा नहीं है और बड़े आसानी से आप एक जगह से दूसरी जगह नदी में टहलते हुए जा सकते हैं।
इसकी एक और विशेषता है राजा दशरथ जी के मृत्यु के बाद सीता जी ने यहां पर उनका श्राद्ध किया था।
इस श्राद्ध की भी पौराणिक कथाएं हैं राजा दशरथ जी के मृत्यु के बाद जब यह सूचना भगवान श्री राम लक्ष्मण और सीता को मिली तो उन्होंने वन गमन के रास्ते में फल्गु नदी पर राजा दशरथ जी का श्राद्ध किया शाद के निमित्त सामानों को लाने हेतु भगवान श्री राम और लक्ष्मण नदी से दूर चले गए रात होने को हुई वे लोग लौट नहीं सके तो ब्राह्मणों के अनुसार रात में श्राद्ध नहीं होती है इसलिए समय सीमा में श्राद्ध करना अनिवार्य है।
इस उद्देश्य से सीता जी ने गाय पर्वत और नदी को साक्षी मानकर श्राद्ध कर दिया। भगवान श्री राम और लक्ष्मण के वापस आने पर सीता ने इन तीनों को गवाह के रूप में उनके सामने प्रस्तुत किया पर यह तीनों मुकर गए। उस क्रोध से सीता ने तीनों को श्राप दिया यह कहा कि नदी में कभी पानी नहीं रहेगा यहां के पर्वत कभी हरे नहीं होंगे और गाय मिष्ठा खाएगी।
यह धार्मिक स्थल पर यात्रा कर बचपन का आनंद उठाई हूं और उसे आज इस यात्रा संस्मरण में वर्णन कर रही हूं

कुमकुम वेद सेन

9450186712
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
यात्रा संस्मरण-भीमताल
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मैं  पहाड़ियों की ओर देखता ही रह गया। इतना अच्छा दृश्य । हिमालय पर पड़ी हुई बर्फ की पर्त। बस धीरे-धीरे पहाड़ की चढ़ाई चल रही थी दाहिनी तरफ हरी-भरी घास के साथ ही लंबे लंबे चीड़ और देवदार के वृक्ष अपना मस्तक खिलाते हुए दिखाई दे रहे थे और बाएं तरफ वह घाटी थी जिसे हम गड्ढों का नाम देते हैं कुछ लोग अपनी आंखें मूंदे हुए थे किंतु मैं सामने की सीट पर बैठा था सुरम्य दृश्य देखकर मेरी आंखें खुली की खुली रह गई। प्रकृति कितनी सुंदर है ।हम समाचार पत्रों में, पत्रिकाओं में ,पोस्टरों में देखते हैं। उससे कई कई गुना सुंदर अपना गिरिराज। चढ़ाई शुरू हुई। उपत्यका में बसे हुए गांव को देखते देखते हमें अपना भी गांव याद आया जो नदी के कगार पर बसा है। नीचे प्रवाह मान गोमती और उसका बहता   विमल जल। खाते हुए बरगद और पीपल के वृक्ष,। इसी प्रकार पर्वत की उपत्यका के गांव जहां वृक्षों के बीच में जाते हुए छोटे-छोटे घर ऊपर से लोग तो चीटियों की तरह दिखाई दे रहे थे जानवर भी कुछ इसी शक्ल में दिख रहे थे इतना अद्भुत आनंद आ रहा था। उसी समय बस के चालक ने एक चट्टी पर चाय पीने के लिए बस को रोक दिया। कुछ लोग चाय पीने के लिए उतर गए सामान्य बाजार की दर से ही इतनी ऊंचाई पर भी चाय और खाने की वस्तुएं मिल रही थी जिसको जो भी लेना था ले लिया। यात्रा पुनः प्रारंभ हुई दूर से ही देखने में नव कुचिया ताल, भीमताल ,और नल दमयंती ताल सामने से गुजरे। उनका नीला जल उसमें जागते हुए छोटे-छोटे पर्वत शिखर, दो- चार नौकाओं का धीरे-धीरे संतरण करना बहुत ही आनंददायक लगा लोगों ने बताया-- सेब का बाग है, साथ मे आडू (पहाड़ी खट्टा फल) और खुबानी भी खाने को मिलती है ।यह चीजें जो मैदानी इलाके में महंगी मिलती हैं, उनका यहां उनकी यहां कम कीमत देनी पड़ती है। कुछ समय बाद अपना गंतव्य भीमताल आ गया।
     वहां भी बस ने जहां छोड़ा वहां से कुछ दूर पर अपने लिए एक विद्यालय का आवास था जो कम से कम 200 फीट ऊंचाई पर था किसी तरह एक पहाड़ी व्यक्ति से बात की गई वह सामान ऊपर ले गया मजदूरी पर पूछने पर उसने कहा बाबूजी जो इच्छा हो दे दीजिए सन उन्नीस सौ छिहत्तरमें50रूपये मैंने उसे दिए। उसने कहा-" मेरे पास टूटे नहीं है कि मैं आपको ₹30 लौटा दूँ।"
मैं ने कहा--"रख लो भैया"। उसने कृतज्ञता पूर्वक हाथ जोड़ा और नीचे चला गया।
कुछ दिन बाद मैं खंड विकास अधिकारी के यहां जा रहा था अपने आवास से नीचे उतरने पर उस पहाड़ी आदमी जिसका नाम परमेश्वर था मिल गया।" बाबूजी कहां जाएंगे"?।
 मैंने कहा--" ब्लॉक जाऊंगा ।वहां के अधिकारी से मिलना है। अपने स्कूल की टीम को बुला कर वहां वृक्षारोपण कराना है ।"
आज ही जाइएगा" ?।
 "हां मामला पहले तय कर लूँ।"
"गरीब के घर कब आइएगा?"
"कल तुम जब भी आ जाओगे तुम्हारे साथ ही चलूंगा।"
दूसरे दिन बाद 10:00 बजे के लगभग आया। मैं पहले तो नीचे उतरा और दूसरे पहाड़ की चोटी के बीच में उसका अपना घर था। जहां सात आठ घरों की बच्ची थी। मुझे चढ़ने में कठिनाई हो रही थी। लेकिन वह लगता था जैसे बिना प्रयास का दौड़ते हुए चला जा रहा है। आवाज से उतरते ही मैंने कुछ चॉकलेट के पैकेट ले लिए थे उन्हें चुपचाप अपने पाकिट में रख लिया था। पहुंचा परमेश्वर का पूरा परिवार जैसे भगवान आए हो ।हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। उसके दो छोटे छोटे प्यारे बच्चे और एक बेटी थी ।बच्चों ने भी अपनी मुस्कान से स्वागत किया। मैंने चॉकलेट के पैकेट बच्चों को पकड़ा दिया थोड़ी देर बैठने के बाद काली चाय पीने को मिली ,खा रे बिस्कुट के साथ। चाय में ना जाने क्या मिला था मेरे शरीर की सारी थकान निकल गई। आधे घंटे तक बच्चों के साथ उनकी पढ़ाई, उनका नाम, स्कूल कब जाते हो? क्या क्या पढ़ते हो? पूछता रहा।
थोड़ी देर में उसकी पत्नी ने कहां -"चलिए भोजन कर लीजिए "।मैंने कहा-" रहने दीजिए। बाद में नीचे खा लूंगा होटल में ।उसने कहा--" नहीं, मेरे यहां ही खा लीजिए।" पीढ़ा पर बैठा। सामने एक छोटी सी चौकी के ऊपर भोजन और पानी का गिलास या दिया गया। मैंने परमेश्वर से कहा-" भैया आप भी अपना भोजन ले आइए साथ-साथ खाएंगे।"शर्माते हुए हो अपना भोजन ले आया। मोटी मोटी मक्के की रोटी, लहसुन और मिर्ची की चटनी, एक कटोरी में लाल लाल गरम-गरम गाय का दूध जिसमें गुड पड़ा हुआ था। बहुत अच्छा लगा जैसे भोजन नहीं मैं अमृत पी रहा हूं।
थोड़ी देर बाद वह मुझे मेरे आवास तक छोड़ गया।
पन्द्रह दिन बाद जब मैं वापस जाने वाला था,  वह कृतज्ञ भाव से आया। मेरा सारा सामान बस स्टेशन तक पहुंचाया। लौटते समय मैंने उसे ₹200 दिए। उसका प्रेम आंखों से छलक आया। बस चल दी बहुत दूर तक जब तक वादी बस देखती रही वह बस को निहारता रहा जब वह ओझल हुआ तो मैंने भी अपना सिर बस के अंदर कर लिया किंतु परमेश्वर का प्रेम उसके परिवार का आदर बच्चों की आत्मीयता आज भी नहीं भूल पाया।

दूसरी बार जब मैं सन 90 में भीमताल गया, लोगों से पता चला-- सरेनी गांव का विनाश हो गया, बादल के फटने से। कोई भी जीवित नहीं बचा ।अब मेरी आंखों से अनवरत टप टप टप आंसू गिर रहे थे। उन समस्त परिवारों  को याद करके ।वहां केवल परमेश्वर के परिवार ने ही नहीं अपना प्रेम नहीं दिया सारे गांव के लोग आए थे‌ बाबूजी- बाबूजी कहके मिले थे। सभी ने आग्रह किया था-" चलिए मेरे घर चाय पी लीजिए"। पर मेरे पास समय कहाँ था और आज जब समय लेकर आया, जो लोग नहीं थे........।
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*मेरी मनपसंद यात्रा संस्मरण* 
 😊😊 चलो मै भी कोशिश करता हूं आपको निजामो के शहर *हैदराबाद* कि यात्रा करवाने कि तो यह बात हैं आज से कुछ वर्षो पहले कि जब मेरे साले साहब जो वहा कि एक बड़ी कंपनी JVK जो प्लेन और बड़े हाईवे बनाती हैं में प्रोजेक्ट इंजीनियर थे और बार,बार वहा आमंत्रित कर रहे थे और लंबी रेल यात्रा के कारण हम जा नहीं पा रहे थे,, पर कहते है यात्रा के योग भी संयोग से ही बनते हैं, तो एसा ही कुछ हुआ अचानक इंदौर से पहली बार हैदराबाद हवाई यात्रा का शुभारंभ हुआ और मैने उसमे चार टिकट १५ दिन के बाद के बुक करवा दिये । और यात्रा के दिन नजदीक आ रहे थे बच्चो का मामा से और श्रीमतीजी को भाई से मिलने का उत्साह चरम पर था सब तैयारियाँ पूर्ण हो रही थी पर कभी,कभी यात्रा में कुछ उतार,चढ़ाव नहीं हो तो मजा ही क्या एसा ही मेरे साथ हुआ उन दिनो में एक बड़े हास्पिटल में GM. पद पर नया हि ज्वाइन किया था हर रोज मिटींग,प्लानिंग चलती रहती थी और जाने वाले दिन भी एसा ही कुछ हुआ मेरी फ्लाइट ६ बजे कि और मिटिंग का टाइम लंबा ५ बजे तक मेरे चेहरे पर तनाव बढ रहा था कब पहुंचुंगा या नहीं क्या होगा अचानक एक मेसेज ने मुझे राहत दी आपकि फ्लाइट एक घंट लेट मैने भगवान का धन्यवाद किया और बोस को बोल कर तेजी से घर आये और हम भागे एयरपोर्ट कि और स ४५ मिनिट का सफर था तो रास्ते से गरमागरम इंदौरी समोसा कचौरी भी वहा के लिये पेक करवा लिये जो वहा कि सिक्यूरिटी को नागवार गुजरे पर थोड़ी सी request के बाद क्लियरंस हो गया और हम सब प्लेन के अंदर बच्चो कि पहली हवाई यात्रा थी तो काफी रोमांच था पर बात करते में हम इतनी जल्दी हैदराबाद पहुंच गये समझ ही नहीं पाये एयरपोर्ट के बाहर साले साहब ने स्वागत किया और उनकी कार से घर कि और,,,रास्ते भर नया हैदराबाद जो बड़ी, बड़ी कंपनियों का IT हब मे तब्दील हो चुका था उनकी बड़ी,बडी इमारतों का लुत्फ लेते आये क्योंकि एयरपोर्ट से ये शहर का सफर भी एक घंटे का था।
 घर पहुँच कर सबको जो गरमा,गरम इंदौरी नाश्ता खिलाया सब खुश हो गये एक दो दिन सबसे मिलने  के बाद बाद फिर शुरुआत करी हैदराबाद घुमने कि सबसे पहले विश्व प्रसिद्ध चार मिनार को देखने गये थे कि पुराने हैदराबाद कि शान था बहुत ही उंची और शानदार मिनारे जो मुगल काल कि याद दिलाती हैं और आस पास वह शहर आज भी पूरी तरह मुस्लिम बहु आबादी का हि हिस्सा हैं वही घुमते हुये मीनारो के अंदर उपर जाकर उसकी खूबसूरती का पूरा लुत्फ लिया सुल्तान कुतुब शाह ने सन १५९१ मे इसे बनवाया था पर साड़ेचार सौ साल बाद भी वह वैसी ही खड़ी हैं यह बहुत आश्चर्य कि बात थी,,इसके चारो और चार दरवाजे हैं जहा अब चारो तरफ बडे़ बाजार  हैं जहा हैदराबाद के प्रसिद्ध मोतीयो के एक से एक नायाब गहने मिलते हैं । इसचार मिनार के बारे में यह भी बताया जाता हैं कि उन दिनो भी एक कोरोना जैसी आपदा वहा आई थी पर वहा के राजा ने उसे बहुत जल्दी रोक लिया था तो उसके प्रतिक के रुप मे इसे बनवाया था खैर दिन भर वहा गुजरने के बाद मोतीयो के बाजार में घुमते हुये घर आ गये दुसरे दिन फिर सुबह नाश्ता करके अगले दिन कि यात्रा वहा के प्रसिद्ध गोलकुंडा फोर्ट कि करी विशाल एतिहासिक किले को देखकर ही दंग रह गये १३ वी शताब्दी का वह किला यादव राजवंश में बना था और बाद मे मुगल सम्राटो के अधीन रहा इसकी एक खूबी बहुत ही अच्छी लगी वो थी वहा कि इको साउंड यदी वहा आप ताली बजाओ तो उसकी आवाज वहा से १ किमी दूर बाला हिसार फोर्ट तक सुनाई देती हैं ये उस समय कि अद्भुत तकनीक है। वहा का शाही महल और दीवारे काफी खूबसूरत थी दिन भर वहा घुमते हुये कब शाम हो ग,ई पता ही नहीं चला किला तो बहुत बढिया था पर वहां कि सरकार के रखरखाव के अभाव में बहुत बड़ा हिस्सा खंडहर में भी तब्दील हो गया था । वहा से थके हारे फिर घर कि और जो सोये तो सब की नींद ११ बजे खुली  तो बाहर घुमने का प्लान स्थगित कर उस दिन दोपहर बाद वहा के IT हब को देखने का प्लान बनाया जहां गुगल,माइक्रोसॉफ्ट, डेलाइट,एसेचर और दुनिया की तमाम बड़े ग्रुप के २५० से ३०० आफिसेस हैं उन्हे देखने को तो एक दिन क्या एक महीना भी कम हैं कहते हैं वहां के एक मुख्यमंत्री रेड्डी जो स्वयं IT पास आउट थे उनके प्रयासो से करीब २५० एकड़ में ये नया हैदराबाद बसाया जहां सब कंपनियों में देशभर के बच्चे काम करते हैं। अद्भुत बसावट देखकर दंग रह गया। फिर वहाँ से निकलने के बाद हैदराबाद कि सबसे प्रसिद्ध पैराडाइज़ कि प्रसिद्ध बिरयानी का लुत्फ लिया जिसे लेने के लिये लाइन में लगना होता था  और फिर घर कि और प्रस्थान । यात्रा का रोमांच हर दिन एक न,ई जगह देखकर बढ़ता जा रहा था ।पर अगला जो दिन था वह बहुत ही शानदार यात्रा का रहा हम निकल पड़े थे साउथ की प्रसिद्ध फिल्म सिटी  रामोजी सीटी जहां आये दिन हिन्दी और साउथ कि फिल्म कि शूटिंग चलती रहती हैं बच्चो के लिये बड़ा रोमाचंक स्थान जो१६६६ एकड़ में फेला हुआ एशिया का सबसे प्रसिद्ध स्थान और वहा के प्रसिद्ध हीरो रामाराव के नाम से इसका निर्माण हुआ जिसका नाम गिनिज बुक में दर्ज हैं। जिसमे देखने के लिये वहा एक से एक सेट बने हुये थे वहा हमने एक गाइड के जरिये उस स्थान को घुनमा चालू किया, और उसने जब गोविन्दा,सलमान खान,अक्षय कुमार व क,ई वालीवुड फिल्मो की शूटींग के बारे में बताया तो बड़ा ही आनंद आया और वो दृश्य आंखो मे घुमने लगे उसने और भी क,ई बाते और किस तरह फिल्मे बनती हैं कैसे बड़े खतरनाक दृश्य जिन्हें आप परदे पर देखते हैं किस साधारण तरीके से केमरे कि मदद से दिखाया जाता हैं जानकर विस्मित हुए,,,,, बहूत सुंदर नजारा रहा वहाँ कि बस से पुरा दिन भर का सफर कहां गुजर गया और रात हो ग,ई वहां कि जगमाहट देखने लायक थी और वाक,ई देखने लायक सपनो का शहर लग रहा था, उस रात वही होटल में विश्राम किया और अगले दिन पूनः फिल्म सिटी का नजारा लिया जब एक जगह कुछ भीड़ देखी तो गाइड से पूछा तो उसने हमे सलमान कि फिल्म रेडी कि शूटींग के बारे मे बताया फिर क्या था बच्चो ने उसे ही देखने का मन बनाया और काफी दूर से वो नजारा देखने को मिला जिसमे कुछ गाने और सीन शूट हो रहे थे जिन्हें देखना बहुत ही अच्छा लगा पर बाद में वो दृश्य जब फिल्म में देख कर एक उत्साह भी रहा और वास्तविकता से कितना अलग दिखाया यह देखकर हंसी भी आई इस तरह दो दिन रामोजी सीटी का आनंद लिया पर जैसा कि होता हैं बच्चो का मन नही भरता हैं,और कुछ देर वहा रुकने के बाद  शाम को घर कि और आये घर याने सालेजी के यहां 😊😊
अगले दिन वहाँ का नेहरू जूलॉजिकल पार्क देखा जहां बहुत ही सुदंर चिड़ियाघर विभिन्न प्रकार के जानवरों से भरा अभ्यारण्य हैं ३०० एकड़ में फैला देखने लायक हैं ।बच्चो ने उस दिन बहुत ही मस्ती कर चिड़ियाघर  लिया आनंद लिया। अगला दिन वहां के सालारजंग म्युज़ियम को देखने में गुजारा एशिया सबसे बड़ा व विश्व का तीसरे नंबर का यह अद्भुत म्युज़ियम देखने लायक बनता हैं जिसे देखने में ही करीब ५ घंटे से ज्यादा समय लगता है,जिसे १९५१ मे स्थापित किया गया था इसमे २ शताब्दी से लेकर २० शताब्दी तक के दुनिया के विभिन्न देशो कि प्राचीन घड़ीया,शस्त्र, कवच मुर्तिया जानवरो के जिवाश्म शानो शौकत का सामान व अन्य ढेरो एसी कलाकृतियाँ देखने को मिली जो हमारी कल्पना से परे हैं और उन सब का यहा वर्णन करना भी असंभव है। वो देखकर ही हम दंग रह गये की किस तरह से इन्हे यहा जुटाया होगा आप जब भी जाये तो इसे देखना ना भूले। अब अगली यात्रा हमारी कुछ धार्मिक थी हैदराबाद से १७५ किमी दूर १२ ज्योतिर्लिंग मे से एक श्री शेलेशेमल्लिकाअर्जुमन यानी श्रीसेलम स्थित हैं उसे देखने का मन बनाया और एक बडी गाड़ी कर सुबह जल्दी उठकर वहाँ से निकले रास्ते भर उंचीनीची पहाड़ियों के रस्ते से गुजरते हुये प्राकृतिक मनोहारी दृश्यों का आनंद लेते हुये हुये विशाल भोलेबाबा के दरबार पहुँच कर उनका सुखद यात्रा के लिये आशीर्वाद लिया बहुत ही सुदंर प्रकृति कि गोद मे बसा यह स्थान मन को शांति देता हैं और फिर वहां से पूनः हैदराबाद कि और रास्ता सुनसान कुछ जंगल सा था क,ई जंगली जानवरों को गाड़ी कि लाइट मे देखा  पर बाबा की कृपा से रात को सब सकुशल पहुँच गये। अगला दिन वापस हमारे इंदौर लौटने का था पूनः शाम की फ्लाइट पर वो १० दिन कहां गुजर गये पता ही नहीं चला पर दोपहर में वहां कि एक खास बेकरी जिसके बिस्कुट बहुत ही प्रसिद्ध हैं और एक व्यक्ति को एक ही पैकेट देते हैं उसकी इतनी अधिक मांग हैं शुद्ध घी से निर्मित दो बिस्कुट ही खाने का अहसास करा देते हैं पर फ्लाइट के टिकट दिखाये तो वो हमे ज्यादा मिल गये जिन्हें हम इंदौर तक लाये और उसी दिन शाम को पूनः निजाम के शहर से निकल होल्कर के शहर यानी अपने घर ईशकृपा से सकुशल आ गये क,ई दिनो तक इस यात्रा को हम भुला नहीं पाये आज जब में लिख रहा हूँ तो चलचित्र कि भांती सब पूनः दृश्यमान हो गया।
तो एसी रही हमारी यादगार
 *मेरी मनपसंद यात्रा* जो देखा सो लिखा आप सबसे विदा लेता हूँ 
*जनार्दन शर्मा* (आशुकवि लेखक हास्य व्यंग्य)
अध्यक्ष मनपसंद कहानियों का स्वागत है मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर

यात्रा संस्मरण --- ओमप्रकाश पाण्डेय

यही आज से कोई चालीस साल पहले की बात है, मेरी पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक के डालटनगंज शाखा में हुआ और मुझे दूसरे दिन ही वहाँ ज्वाइन करना था. वैसे मै पटना में भारतीय स्टेट बैंक के प्रधान  कार्यालय में रिपोर्ट कर दिया था. मै उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का रहने वाला, मुझे डालटनगंज कहाँ है और कैसे जाया जाता है, कुछ पता नहीं था. खैर आफिस में पूछने पर पता चला कि गांधी मैदान के बगल में राज्य सरकार की बस डीपो है, वहाँ से बस जाती है. बस डीपो गया, वहाँ पता चला कि रात में दस बजे एक बस जाती है. लोगों ने बताया कि आप अभी ही सीट बुक करवा लो, नहीं तो रात में बैठने की जगह नहीं मिलेगी.
मैंने पांच रूपए अतिरिक्त देकर मैंने अपना सीट बुक करवा लिया. यह चौदह दिसम्बर, 1981 की बात है. जाड़े का समय था. जब बस पटना शहर से बाहर निकला तो जबरदस्त ठंडी हवा लगने लगा. हालांकि मैंने काफी गर्म जैकेट , स्वेटर पहना हुआ था और मफलर भी बांधे था, लेकिन पता लगा कि बस की खिड़कियों पर सीसे के जगह तिरपाल वाले कपड़े लटक रहे थे, जो हवा में उड़ जा रहे थे. मैंने बाकी यात्रियों को देखा, उन्हें शायद पहले से ही यह सब पता था तो वे कम्बल व ऊनी चादर लपेटे थे. ठंड से मेरी हड्डी कांप रही थी. मैंने कन्डक्टर से अनुरोध किया कि वे बस थोड़ी देर के लिए रोक दें और ऊपर रखे होल्डार से कम्बल निकाल कर ओढा, तब जाकर ठंड से कुछ राहत मिली.
करीब रात के एक बजे, जबकि चारों ओर गहरा अंधेरा छाया था, दो पुलिस के कांस्टेबल बस में चढ़े और उन्होंने बस के चालक से कहा कि आगे एक  गाड़ी को डकैतों ने लूट लिया है, तुम कहीं भी बस रोकना मत. यह सुन कर हम सब एकदम से भयभीत हो गये. खैर बस के चालक ने बहुत तेजी से बस चलाया और सबसे बोल दिया कि वह कहीं भी रास्ते में,  गया  के पहले बस नहीं रोकेगा और लोग चुपचाप बस में बैठे रहें. उसने बस तेजी से भगाया. एक जगह डकैतों ने पेड़ काटकर रोड पर रख दिया था. पर चालक ने बगल से काटकर बस निकाला और एक भी पल के लिए बस की चाल धीमी नहीं की.
चार बजे भोर में बस गया पहुंची, तब जाकर हम लोगों के जान में जान आयी.
( यह मेरी मौलिक रचना है --- ओमप्रकाश पाण्डेय)

बुधवार दिनांक**** २/६/२१
विधा*** लेख
विषय***" यात्रा संस्मरण
        
   #***मेरी चार धाम यात्रा***#
                ^^^^^^^^^^
        मित्रों, मैं  2011 में चार धाम यात्रा के लिए गया था। मेरे जीवन का सबसे सुंदर वे वे दिन रहे हैं । सबको चार धाम यात्रा नसीब नहीं होती । लेकिन यह सुनहरा अवसर मुझे मिला क्योंकि मैं किस्मत वाला हूं ऐसा मैं मानता हूं क्योंकि ईश्वर ने मुझे यह दीया ।
       जीवन के कुछ पल ऐसे होते हैं जो इंसान कभी भूलता नहीं । उसी तरह मैं भी ये चार धाम यात्रा कभी भूल नहीं सकता ।
        हम नागपुर से लक्ष्मी ट्रैवल एजेंसी के बस द्वारा निकले । पहले हम नागपुर से रेलवे से दिल्ली पहुंचे और वहां से बस से निकले ।  दिल्ली से हरिद्वार और  हरिद्वार से निकले ऋषिकेश के लिए । जीवन में हम पहली बार बस द्वारा पहाड़ी रास्तों से गुजर रहे थे  बड़ा मजा आ रहा था ।
         हरिद्वार और ऋषिकेश में प्रेक्षणीय स्थल देखते हुए आगे बढ़े । जीवन में यह पहला पहला अनुभव था । रोमांच था, हर्ष उल्लास मौज मस्ती थी ।
         उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से गुजरते हुए जोशीमठ श्रीनगर और इससे आगे बढ़ते हुए पहुंचे । कुछ स्थल तो याद भी नहीं मगर हमने गंगोत्री, यमुनोत्री बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा की । 
वे  पहाड़ों के रमणीय दृश्य कितनी मनोहारी है । पल-पल बादल का उमड़ना , पल में बादलों का घिरकर आना और बरसना , वहां की ठंड का भी बहुत अनोखा अनुभव रहा है । 
          बद्रीनाथ के महाराष्ट्र सदन में हम रुके थे ,पांच पांच कंबल ओढ़ने है के बाद भी ठंड नहीं जा रही थी । क्योंकि ऐसे ठंड का हमें बिल्कुल अनुभव नही था । 
        14 किलोमीटर का लंबा , संकीर्ण  रास्ता तय करने हमने  घोड़े पर सवारी की । 
          बस इसी का हमें बहुत आनंद है कि हम अपने जीवन में सबसे कठिन यात्रा कर पाए । भगवान सबको ऐसा मौका दे सब एक बार जरूर जाए और अनुभव करे क्या होती है पहाड़ी यात्रा ।
         ऐसा लगता है कि हमने चार धाम यात्रा करके  गंगा नहा लिए ।

 प्रा रविशंकर कोलते
       नागपुर 
          महाराष्ट्र

यात्रा वृतांत
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याद है आज भी वो बचपन की यात्रा जब हमारा पापा हमें पचमड़ी ले गये थे ऊंचे पहाड़ गहरी खाईयां देख कर बहुत ही डर लग रहा था मुझे।शिव की का वो मंदिर जहाँ लाखों त्रिशूल भक्तों ने मन्नत पूरी होने पे चढ़ाऐ थे।इतनी ऊंचाई से गिरता झरना सब नहाऐ झरने मे पर मैं बिल्कुल ना गई ।फिर एक मंदिर जो आज भी मेरी समृण मे है जिसे देख सबसे ज्यादा डरी थी मैं बहुत बड़ी गुफा जैसे मंदिर मे जब ऊपर की ओर देखा तो बहुत बड़ा एक पत्थर जैसे गिर रहा हो और उसे दो बड़े पत्थर जकड़े हुए हैं जैसै वो कह रहे हैं हम तुझे गिरने नहीं देंगे।उफ्फ बीस मिनट तक मैं रोती रही थी पर उसके नीचे से नहीं निकली आखिर पापा ने बड़े लाड से गोद मे लिया और आंख बंद करने को बोला जब आंख खोली तो खुद को उस गिरते पत्थर नुमा गुफा के दूसरी ओर पाया।यही मेरी बचपन की यात्रा का अनुभव है।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
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🙏🙏।जय माता दी। 🙏🙏

मां वैष्णो की यात्रा ( संस्मरण)

सन 2015 की बात है । मैं और मेरा पूरा परिवार मां वैष्णो की यात्रा के लिए रवाना हुए । हमने लोकल ट्रेन से भदौरा स्टेशन से मुगलसराय के लिए मैं, मेरा बेटा उज्जवल बेटी बंदना और पत्नी उर्मिला देवी के साथ मैं मुगलसराय स्टेशन पहुंचा । 
और वहां से जम्मू तवी एक्सप्रेस से मां वैष्णो की यात्रा प्रारंभ किया ।
उस ट्रेन में हमारे कुछ साथी मित्र जो बिहार से थे और यूपी से थे हम लोग सब मिलाकर 20 आदमी औरत थे। वह सब मंडली के साथ हरमोनिया, ढोलक तबला , वगैरा लेते हुए माता रानी का भजन गाते हुए उस गाड़ी से हम लोग सफर कर रहे थे। बहुत आनंद आ रहा था। मैं भी गीत गाता हूं ।हम भी गीत गाया कुछ हमारे मित्र भी गीत गाए जो उसमें हम सभी के साथ लेडीज भी थी माता रानी का भजन वगैरह गाया ऐसा लग रहा था कि पूरा ट्रेन जो हम लोगों की बोगी थी । पूरा भक्ति मय  लग रहा था फिर 24 घंटा अंतराल के बाद हम सभी जम्मू स्टेशन पहुंचे। और वहां से बस द्वारा हम सभी लोग को
रास्ते में बहुत कुछ मनोरम दृश्यों का दर्शन करने को मिला। ऊंची ऊंची पहाड़ियां हरा भरा खेत खलियान बहुत नीचे की तरफ खाई , सब अच्छा लग रहा था। हम लोग सफर का आनंद लेते हुए। कटरा पहुंचे।

वहां पर जाने के बाद मेरे कुछ दोस्त होटल में रहने के लिए चले गए । हमारे ही गांव के एक मित्र का घर था। वहा से कुछ दूरी पर था । हम सब परिवार वहां चले गए । परिवार में 8 लोग थे।

वहां नहाने खाने के बाद शाम को हम लोग मां वैष्णो के मुख्य गेट पर पहुंचे। और वहां से शाम 7:00 बजे के लगभग सब का पर्ची बनवाने के बाद चढ़ाई करने लगे । वहां से माथे पर बांधने वाली पट्टी डंडा लेकर सब लोग एक साथ माता रानी का नाम जपते हुए चल रहे थे। कुछ दूर जाने के बाद मेरी पत्नी को लघुशंका करने की इच्छा हुई हम सब परिवार साथ ही में चल रहे। थे। परिवार में दो छोटे-छोटे बच्चे मेरे भाई का लड़का बहू मैं और मेरा बेटा और बेटी मेरी पत्नी सब साथी में चल रहे थे।
रास्ते में लघुशंका करने के लिए मेरी पत्नी रुक गई। और मैंने बोला सभी को की आगे कहीं पर रुक जाना । लेकिन वह सब रुके नहीं रास्ते में बहुत काफी भीड़ थी । वह सब रुके नहीं आगे निकल गए वहां से आगे जाने के बाद दो रास्ते पड़ते हैं । एक रास्ता जो रोड बना था । उस पर घोड़े डोली वाले टेंपो खच्चर सब जाते रहते हैं । और एक रास्ता हाथी मत्था कि तरफ जाता है । जब वहां हमारे परिवार के लोग नहीं दिखाई दिए तो हम बाई रोड वाला रास्ता पकड़ लिए हम समझे कि यही रास्ता पकड़े होंगे वे सब हाथी मत्था वाला रास्ता पकड़ लिया ।

कुछ दूरी जाने के बाद बहुत तेज आंधी तूफान चलने लगी। मेरा और मेरी पत्नी का दिल धड़कने लगा। मेरा परिवार भी साथ में नहीं था । उन सभी का कपड़ा मेरे पास था । सभी का संग छूट गया था। मेरे भाई का बहू बेटा का भी संग छूट गया जो पहली बार गए थे । मैं तो  दो तीन बार जा चुका था। अब मुझे समझ में नहीं आ रहा था। कि मैं क्या करूं बहुत ऊंचा चढ़ाई चढ़ने के बाद आंधी पानी लिए हुए बड़े-बड़े पत्थरों का गिरना प्रारंभ हो गया। ठंडी हवा चलने लगी तूफान से सारी लाइटें बंद हो गई थी। ऐसा लग रहा था कि बहुत बड़ा तूफान आने वाला है। हम  लोग बहुत डर गए थे। यह सोच कर कि मेरे बाल बच्चे बहू उनके दो छोटे छोटे बच्चे कैसे होंगे किस जगह होंगे क्या करते होंगे हम लोग रात भर नहीं सो पाए । चलते रहे चलते रहे ऐसा लग रहा था कि मेरे पैरों में पंख लग गए हो , रात भर हम और मेरी पत्नी रोते रहे। खोजते रहे चिल्लाते रहे। लेकिन कहीं से आवाज नहीं आ रही थी। मेरा मन घबराने लगा बड़ी-बड़ी चटाने गिरने शुरू हो गए। पहाड़ टूट कर गिर रहे थे । बहुत बड़ा भयंकर तूफान आया हुआ था। माता रानी का नाम को जपते हुए हम लोग आगे बढ़ रहे थे। फिर भी कहीं से कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही थी । सब माता रानी का नाम लेते हुए जय माता दी । जय माता दी की आवाजें गूंज रही थी। चारों तरफ की लाइटें बंद हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि पूरा रास्ता अंधकार से भरा है । कोई किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।

छुटपुट सब पहाड़ों के नीचे जो ऊंची ऊंची पहाड़ी थी । उसी के नीचे सब दबे हुए थे । चिपके हुए थे । अगर थोड़ी सी और तेज हवाएं चलती तो हम सभी लोग एकदम खाई में गिरते लेकिन मां की कृपा हम सभी पर बना रहा ।

एक डेढ़ घंटे के बाद तूफान शांत हुआ सब लोग फिर चलने लगे। लेकिन मैं एकदम बेचैन था। घबरा रहा था। कि मेरा परिवार के साथ छूट गया था ।  दूसरों से लेकर फोन किया एक लड़के का  नंबर था फोन किया लेकिन कुछ पता नहीं चला बहुत खोजबीन करने के बाद ढूंढने के बाद  दोपहर 1:00 बजे के करीब जहां पर लोग स्नान कर रहे थे । हम लोग वहां पहुंचे तब जाकर मेरे परिवार के साथ मुलाकात हुई। 

आज वह दिन हमें याद है ऐसा दिन भगवान किसी को ना दिखाएं हम लोगों का रोते-रोते बुरा हाल हो चुका था। आंखें सूज गए थे। कभी रास्ते में कभी होटल के करीब धर्मशाला में जो लाइन लगी थी माता रानी का दर्शन करने के लिए जो लाइन में लगे थे उसमें देखा ।अलाउंस भी कराए लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चला ।
मैं एकदम बेचैन होकर पागलों की तरह इधर-उधर भटकता रहा रोता रहा रात भर लेकिन कुछ पता नहीं चला ना कुछ खाए ना स्नान किए 1:30 बजे के बाद हम लोग जब संग मिला खोजते खोजते तब जाकर हम लोग स्नान किए फिर दर्शन किए माता रानी का वहां से फिर दर्शन करने के  बाद हम सभी लोग काल भैरव का दर्शन करने के लिए 4 किलोमीटर की चढ़ाई की फिर वहां से हम लोग दर्शन करने के बाद नीचे उतरे फिर हम लोग जहां ठहरे हुए थे । बस द्वारा यहां पर आए। बारिश झमाझम हो रही थी। एक रिजर्व टेंपो करके हम लोग वहां पर पहुंचे रात को सोए फिर सुबह में नाश्ता खाना खाने के बाद शाम को गाड़ी थी रिजर्व वहां से हम लोग फिर जम्मू स्टेशन आए स्टेशन आने के बाद 4 घंटे गाड़ी लेट थी  । फिर गाड़ी पर बैठे और हम सभी सकुशल अपने गांव पहुंचे माता रानी की कृपा से हमारा बिछड़ा हुआ परिवार मिल गया । हमें बहुत खुशी हुई लोग कहते थे कि यहां से कोई निराश नहीं जाता तो हमें मानना पड़ेगा कि मां की कृपा हम सभी पर सदा बनी रहे मां के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम करते हुए आप सभी को तहे दिल से नमन।।🙏🙏

उपेंद्र अजनबी 
गाजीपुर उत्तर प्रदेश

वीना अचतानी, 
यात्रा  संस्मरण ***
*******मेरी  पहली  हवाई यात्रा ***
      हर तीज त्यौहार  पर भैया  दुबई  से जोधपुर  आते हैं,  इस बार उन्होंने  तय किया  कि इस रक्षाबंधन  पर मुझे दुबई  जाना  पड़ेगा ।जयपुर  एयरपोर्ट से  जाना हुआ ।एयरपोर्ट पर  मेरे  पति और रिश्तेदार छोड़ने आए थे,साथ  ही सब अपनी तरफ से instructions  दे रहे थे ।मै अकेली  हवाई  सफर करने जा रही थी, वह भी पहली  बार इसलिए  थोड़ा डर और उत्सुकता  भी थी । अन्दर जाते ही पुलिस  वाले ने मेरा आई डी, पासपोर्ट  और टिकट चैक किया  । हैल्प डेस्क  वालों  से सहायता  लेकर टर्मिनल पर  गई  जहाँ  से मेरी फ्लाइट  जाने वाली  थी ।प्लेन में  बैठ कर थोड़ा  डर भी लग रहा था, परन्तु  उत्सुकता और  खुशी भी अधिक  थी ।जैसे  ही प्लेन  तेज़ आवाज़  करता हुआ  उड़ने लगा मै बहुत  डर गई,  और मन हीमन हनुमान चालीसा  पढ़ने लगी ।धीरे धीरे  भय कम हुआ, बाहर देखा बादलों  की इतनी मोटी पर्ते, सफेद  धुएं  से स्लेटी और काले बादलों  को देख कर बहुत  अच्छा लगा । प्लेन अब दुबई  पहुंचने  वाला  था  ।बुर्ज खलीफा  दूर से ही दिखाई  दे रहा  था,  ढाई घन्टे में  दुबई  पहुँच गई ।वहाँ  का एयरपोर्ट  बहुत बड़ा और शानदार  था ।बाहर निकल कर देखा  भैया  इन्तज़ार  कर रहे थे ।हम उनके विला में  गए ।रात हो गई  थी,थकान  भी थी, इसलिए  दूसरे दिन दुबई  देखने का प्रोग्राम  बनाया  ।
            दूसरे दिन सवेरे  जल्दी  तैयार हो कर हम गुरुद्वारे  गये, जिसका उद्घाटन भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने किया  था।गुरुद्वारे  की भव्यता  कारीगरी  सफाई सेवादारों की कर्मठता देख कर मैं  तो दंग रह ग्ई।मत्था  टेक प्रसाद  ग्रहण  कर जैसे ही हम बाहर आए , एक सरदार युवक बड़ी सी कार में  आए।गुरुद्वारे में मत्था  टेक वे वहाँ  गए जहाँ  जूते चप्पल रखे जाते हैं,  वहीं  ज़मीन पर बैठ सबके जूतों  की पालिश करने लगे, भैया  ने बताया  ये दुबई  के माने हुए उद्योग पति हैं  और रोज आकर सेवा करते हैं ।मेरा  मस्तक  उनके प्रति  श्रद्धा  से झुक  गया  ।उसके बाद हम डेज़र्ट सफारी में  तनूरा और बैले डान्स देखने गए ।दुबई में  बुर्ज़ खलीफा  सबसे  बड़ी बिलडिन्ग है।जिसमें  148 floor हैं  जो दुबई  माॅल के पास है , इतनी बड़ी बिल्डिंग  देख कर बहुत  आश्चर्य  हुआ ।इसके  बाद कर्मश: हमने ग्लोबल विलेज जहाँ  हर देश की प्रसिद्ध  वस्तुऐं मिलती है,झूमेरा बीच, आबरा बोटिंग, डाल्फिन शो, और बर दुबई  में  म्यूजिम देखने गए, वहां  तरह तरह की प्राचीन  सभ्यता  की वस्तुएँ  रखी हुई थी । दुबई  मे माॅल मे बहुत  बड़ एक्वेरियम  बना हुआ था ।
          दुबई में  बहुत  बड़ा गोल्ड मार्केट  है जच गोल्ड सुक के नाम से प्रसिद्ध  है ।इसलिए  दुबई  को गोल्डन सिटी भी कहते हैं ।यहाँ  के नागरिक  कानून का सख्ती से पालन करते हैं । सात दिन कैसे निकल गए पता ही नहीँ  पड़ा । और हाँ  वहाँ  आइस गेम भी बहुत  खेला।अब बहुत  सारा अनुभव,  बहुत  सी मधुर  यादें  और साथ ही ढेर सारे गिफ्ट्स  के साथ अपने जोधपुर आ गए।
मौलिक, 
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)...

*यात्रा संस्मरण*

 मैं बोकारो में रहता हूं अकेला हो गया हूं। बच्चे सब अपने- अपने जिम्मेवारी के साथ बोकारो से दूर महानगर में तथा, विदेश में है।
२०१९ के अगस्त माह में इच्छा जागी की  देवघर जाकर बाबा का दर्शन करू।वहां होटल में ठहरे हुए थे अचानक बोकारो के ही मित्र से मुलाकात हो गई ,हम दोनों काफी खुश हुए उनका अपना निजी मकान देवघर में ही है। अतः होटल छोड़ने के लिए विवश किए और उनके साथ उनके घर चले गए। घर बहुत बड़ा है। वर्मा जी पत्नी के साथ रहते हैं, उनके भी बच्चे बाहर है। एक दिन शाम को चाय पी रहे थे। बातचीत के दौरान केरल घूमने की इच्छा जाहिर किए।  इसी बीच हमलोग के  मित्र दास का काल आ गया उनसे जानकारी लेना चाह रहे थे केरल में कहां-कहां घूमना है।उनका अनुरोध हुआ आने का आप लोग मेरे पास आ जाए।मैं सब  इंतजाम कर दूंगा। बस बोकारो में एल.पी.ट्रेन में आरक्षण कराले सीधे  पालकर स्टेशन पर उतारना है वहां हम मिल जाएंगे। सिर्फ आने के तारीख़ खबर कर दे। 
पालकर से निजी कार से मदुरई गए मीनाक्षी टेंपल देखने के बाद रात में होटल में रूके, खाने में साउथ इंडियन डिश ही मिला। सुबह रामेश्वरम गए। रास्ते में प्राकृतिक दृश्य हम लोग झारखंड वासियों को मन मोह लिया।हरे भरे वृक्ष प्राकृतिक झरना ऊंचे पर्वतों की देख कर मन प्रसन्न होते रहा ।थकावट नाम की कोई चीज नहीं। रामेश्वरम में सात कुए के पानी से स्नान करने के बाद ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए।धनुष्कोटी जहां राम ने लंका जाने के लिए पुल बनाया था। अब वह टूट गया है और समुद्र के अंदर चला गया  लेकिन तैरता हुआ पत्थर जिस पर राम लिखा हुआ का दर्शन हुआ। रात में रामेश्वरम में ही होटल में विश्राम किए। दूसरे दिन कोडाईकनाल गए रास्ते में मनोरम दृश्य को देखते हुए बॉटनिकल गार्डन देखें फूल बाजार देखें वहां तरह तरह के फूल देखें। कोडाईकनाल में  3  दिन रूके। वहां का मौसम इतना सुहाना था की आगे जाने की इच्छा नहीं होती फिर भी कन्याकुमारी गए। शाम को पहुंचे पहले से ही होटल बुक था इसलिए कहीं परिशानी नहीं हो रहा था। रात में कन्याकुमारी शहर घूमे। सुबह में  पद्धनाभम स्वामी के दर्शन किए, मुत्थुर ब्रिज देखने के बाद तिरपु झरना भी देखें मोटर बोट से स्वामी विवेकानंद स्मारक जो समुद्र में स्थित है वहां एक पत्थर देखें जिस पर बैठकर स्वामी विवेकानंद जी साधना किए थे। चलते चलते गांधी मडपम भी देखें जहां तमिल के बहुत प्रख्यात कवि के स्मारक बना हुआ है। 2 दिन रुक कर सन राइज और सनसेट देखें। उसके बाद कार से ही रात के रूकते हुए पालकर लोटे। यह यात्रा दो परिवारों के साथ बहुत ही सुखद रहा कहीं पर कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि मिस्टर दास वहीं के रहने वाले है और पूरी की पूरी जानकारी रखते हैं। 4 दिन पालकर में रुक कर बोकारो एलेप्पी ट्रेन से लोटे। यात्रा की सुंदर स्मृतियां अभी भी मस्तिष्क में अंकित है जब कभी विडियोकॉल से बातचीत  होती है तो दूसरे जगह चलने का प्रोग्राम बनता है। मैं मेरे दो मित्र एक देवघर से दूसरे केरल के तीनों परिवार में टियूनिंग बहुत सुंदर बन गया है इसके कारण आगे भी प्रोग्राम बन रहा है। कोरोना काल खत्म होने के बाद कहीं ना कहीं जाएंगे।

विजयेन्द्र मोहन।

अग्निशिखा मंच को नमन🙏
   *यात्रास्मरण*

मेरी पहली विदेश यात्रा! 

     बात 2018  मई का महिना था। नागपुर की गर्मी सभी भारतवासी को पता ही उसको निजात पाने के लिये निकल गये नेपाल, नेपाल देखने की  बचपन से बहुत इच्छा थी जब भुगोल पढता  था तब से नेपाल का पशुपति नाथ मंदिर, गौतम बुद्ध की जनम स्थली लुम्बिनी  मुझे देखने के लिए आकर्षित करती  थी। 
     आदिकाल से मानव और प्रकृति का गहरा सम्बन्ध है! प्रकृति ने नानारुपो ने मानवमन  को आर्कर्षित किया है! पर्यटन से मानव को  ज्ञान अर्जित होता हैं वहां संस्कृति, सभ्यता बोल भाषा कुदरत नजदीक देखने का आंनद कुछ अलग ही है! पर्यटन से घुमने फिरने मानव ताजा तवाना होकर नये उत्साह से अपने काम में लग जाता है! 
     नागपुर से गोरखपुर एक्स्प्रेस  हमारा सारा समुह डाॅ. सुनील अत कर , मनोहरभाई उनके साथ सात परिवार के लोग सामिल थे रेलगाड़ी झांसी, कानपुर, लखनऊ होते हुये गोरखपुर दुसरे दिन पाच बजे पहुंचे! उसके बाद बस से गोंडा होते हुई नेपाल सीमा पहुंचे! उसके बाद होटल में रात को रुके! 
     सुबह बस से सबसे पहले गौतम बुद्ध की जनम स्थली लुम्बिनी देखकर मन हर्षित पुनीत हुआ! दोपहर को खानपान के साथ नेपाल पशुपति नाथ मंदिर के लिए रवाना हुऐ रास्ते पहाड़ी झरने वहाँ देखने से लगता नेपाल हिंदू राष्ट्र है! रात को काठमांडू 
होटल में रुके सुबह उठकर पशुपति नाथ मंदिर दर्शन करने गये मंदिर का अनुशासन देखकर बड़ा अच्छा लगा सब लोग अपने बारी-बारी से दर्शन कर रहे थे मैंने जानबूझकर मोबाइल से फोटो लेने का प्रयास किया सुरक्षाकर्मी ने मेरे तरफ ध्यान देखकर मेरा मोबाइल जप्त कर दिया बाद में चार-पांच घंटे के बाद वह मोबाइल लौटा दिया तब से मैंने एक  सबक सीख लिया जी की फोटो निकालना मना है वह फोटो नहीं निकालना चाहिए नेपाल के दर्शन स्थल देखकर वहां पहाड़ी पहाड़ झरने मन बड़ा प्रसन्न हुआ उसके बाद वहां के दर्शनीय स्थल काठमांडू त्रिभुवन हवाई अड्डा देखने को मिला बहुत बड़ी एक बगीचे में शिव जी की मूर्ति स्थापित की थी वह भी देखी उसके बाद हम हरे राम हरे कृष्ण की शूटिंग कहां हुई थी वह शूटिंग स्थल देखने के लिए चल पड़े इस तरह हमारी नेपाल की विदेश यात्रा समाप्त हुई! 
     बस से ही आने बिहार राज्य होते  हुई कोसी नदी बहुत बड़ी विशाल बांध डैम देखने को मिल गया उसके बाद रात को हम सीता के पिता जनक राजा की जनकपुरी नगरी गए। शाम के समय सीता मैया सीतामढ़ी के मंदिर गए वहां का विशाल मंदिर देखने से सच में जनकपुरी नगरी लग रही थी वहां के मंदिर बांधकाम पुराने उस नगरी जैसा लग रहा था! 
    दार्जिलिंग गए कब लगा हमारी भारत माता में कितनी सुंदर है । है इसका पता हमें दार्जिलिंग जाती हुई दिखाई पड़ा दार्जिलिंग का सूर्यास्त और देखकर हमारे साथ हजारों पर्यटक को देखने के लिए आए थे वह देखकर मन बड़ा प्रसन्न हुआ इस तरह का सुर्योदय  कभी नहीं देखा था दार्जिलिंग की छोटी सी हो ट्रेन हमारे होटल के सामने सी गुजरती थी तब वह देखने के लिए सब लोग इकट्ठा होते थे सामने बाजार में लोग बेचने वाली भी रहते थे। जब ट्रेन आती तो बजार हट जाता था, ऐसा नजारा शायद भारत में कहीं पर भी नहीं होगा दार्जिलिंग के बाद हम सिक्किम की राजधानी गंगतोक के लिए निकल पड़े रास्ते में फल खाने पीने के सामान लिखें अपना गुजर निर्वाह करते हुए लोग नजर आते थे हमारे साथ खानसामा था इसके वजह से जहां होटल में रुकते थे वही वह खाना बनाता था घर जैसे खाने का स्वाद मिलता था जाते-जाते हमको तीस्ता नदी को देखने का मौका मिला यह सी बड़ी नदी है तीस्ता का प्रवाह काफी तेज है उसमें आसपास की हरियाली बड़ा सुंदर दृश्य लगता   गंगा टोंक समुद्र तल से करीब 58 फीट ऊंचाई पर है यही सिक्किम की राजधानी इस पहाड़ी शहर ने अपनी स्थिति दर्शक को मनमोहन लेना यहां की वायु में कितनी मादकता और शुद्ध सबको लगता था विशाल बुद्ध की प्रतिमा और महात्मा गांधी मार्केट में लोग खरीदारी करते नजर आते थे सिक्किम छोटा राज्य होने के बावजूद साफ सुथरा भारत की संस्कृति की धरोहर है ऐसा बोला तो अतिशयोक्ति नहीं होगी वहां के चाय छोटी-छोटी खेती के टुकड़े और स्कूल जाते हुए बड़े सुंदर सुंदर बच्चे नजर आते थे उसके बाद वहां से 50 किलोमीटर दूर बाबा हरदेव जो कि सैनिक चाइना बॉर्डर पर वहां देखने का मौका मिला ऊपर शिवजी शिव मंदिर की प्रतिमा ऊपर पहाड़ी पर चढ़कर वहां का आनंद लिया, फोटो निकाले उसके बाद वापस आये। जलपाईगुड़ी से रेलवे में बैठकर नागपुर के लिए रवाना हुए ऐसी थी मेरी पहली विदेश यात्रा और भारत की धरोहर सिक्किम दार्जिलिंग गंगतोक! 

धन्यवाद

सुरेन्द्र हरडे कवि लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक ०२/०६/२०२१

अग्निशिखा
यात्रा संस्मरण
दिनांक --: 2/6/2021

नेपाल यात्रा --

टेलीफोन की घंटी बजी ! मैंने फोन उठाया सामने दीदी थी ... वह हैदराबाद में रहती है उसने कहा चंद्रिका तुम नेपाल पशुपतिनाथ चलोगी कुछ सीट खाली है तो तुम आ सकोगी ? बस यही से समझो मेरी नेपाल यात्रा प्रारंभ हो गई ! मेरे दिलो-दिमाग में नेपाल के पशुपतिनाथ बस गए मैंने झट से हां कह दी ...फिर तो दीदी ने सभी नियम कायदे बताएं जिसके अनुसार मुझे अपने दो फोटो पासपोर्ट साइज के आईडेंटिटी के लिए आधार कार्ड और पैन कार्ड भी भेजने को कहा मैं तो बल्लियों उछलने लगी क्योंकि मुझे पशुपतिनाथ जो की ज्योतिर्लिंग है के दर्शन करने मिलेगा !

कहीं किसी कोने से डर लगने लगा कि कहीं पति महोदय ने ना कर दी तो ... किंतु पूछने पर परमिशन मिलते ही मैं भावुक हो गई और मेरी आंखों से अश्रु धारा बह चले ! वातावरण गमगीन होते देख पति महोदय ने कहा आप वहां पुण्य कमा लेना और हमारे पाप धोते आना  वातावरण में हंसी के फव्वारों के फूटने के साथ हल्कापन आ गया !

टूर हैदराबाद से जा रहा था मेरी तैयारियां चालू हो गई थी आखिर वह दिन भी आ गया और मैं हैदराबाद के लिए निकल पडी़ दीदी ने मुझे ₹100 की नोट लेने को कहा था वहां 2000की नोट नहीं चलती नेपाल की करेंसी से हमारी करेंसी का मूल्य अधिक है 100 के एवज में हमें ₹160 मिलते हैं  ! दूसरे दिन हैदराबाद में   
बैंक से मैंने 100-100 और 500 के नोट निकालें !
इंतजार की घड़ी आ गई दूसरे दिन हम प्रातः 6:00 बजे गोरखपुर के लिए रवाना हुए गोरखपुर रात 10:00 बजे पहुंचे वहां नेपाल से छोड़ा गया बाढ़ का पानी भर गया था बिना बारिश के बाढ़ आ गई थी ! होटल में 36 घंटे की थकान उतार हम सुबह 6:00 बजे निकलकर 10:00 बजे नेपाल बॉर्डर पर पहुंचे यहीं से बस में हमारी नेपाल यात्रा शुरू हुई !

बस में बैठकर नेपाल घूमने को ले मेरा मन बल्लियों उछल रहा था! गाइड नेपाल के बारे में छोटी छोटी बातें बताते जा रहा था किंतु मैं तो नेपाल की घाटियों में चल रही बस के दोनों ओर जो पर्वत और पर्वतों की खोह से निकले पानी के छोटे बड़े झरने हरियाली और नदियों को देखने में खो गई थी ....

 क्या प्रकृति इतनी सुंदर है अगर कश्मीर को देख कहा जाता है कि स्वर्ग है तो यही है यही है और यही है तो मैं सोचती हूं कि प्रकृति का सौंदर्य कहीं भी कम नहीं है!  प्रकृति का सौंदर्य और नारी का सौंदर्य दोनों में एक ही समानता है कि वह पूर्ण रूप से ऋंगारित है ! किसी ने खूब कहा है कि किसकी कल्पना ने प्रकृति और नारी का ऋंगार किया है ! नेपाल में प्राकृतिक सौंदर्य कूट-कूट कर भरा है मैं खेतों की हरियाली और वक्त पर ही जन्म लेने वाले उन वृक्षों को जोहर छोटे-मोटे पक्षी को आश्रय प्रदान करने के लिए तत्पर थे उसके करीब से ही पर्वत से निकली छोटी-बड़ी धारा या यूं कह लो झरना घूमे धर्मों का खनखन करता वह मधुर संगीत मुझे बहुत ही रोमांटिक कर रहा था बस में समय पसार करने के लिए कोई अंताक्षरी खेल रहा था और कोई आंखें बंद कर आगे ईश्वर के दर्शन की लालसा में डूबे थे सभी अपने अपने हिसाब से टाइम पास कर रहे थे बीच-बीच में गाइड जानकारी के अनुसार कुछ स्थानों का वर्णन कर हमें अवगत कराते जा रहा था! नेपाल में बाढ़ आने की वजह से सफर काफी खतरनाक और भयानक  हो गया था.... ड्राइवर ने अपनी जिम्मेदारी  बखूबी निभाई... लैंड स्लाइड्स भी हो रही थी... सफर डरावना था!  सबसे बड़ी बात यह थी कि गाडी  रिवर्स नहीं हो सकती थी ऐसी अवस्था में ड्राइवर ही भगवान था! आंख बंद कर पशुपति भगवान को सबने अपनी डोर थमा दी थी..!. काठमांडू होटल पहुंच सबने चैन की श्वास ली! वहां उम्र के हिसाब से फ्लोर दिये गये .... मजे की बात यह थी सभी सीनियर सिटीज़न थे! सभी के पैर हाथी पांव की तरह फूल गये थे आखिर 19 घंटे का सफर था (मानसिक तनाव भरा) 

सुबह 10 बजे पशुपति नाथ दर्शन को पैदल निकले! मंदिर होटल के पास था! मंदिर के परिसर में पहूंचते ही गाइड ने जानकारी दी! 
कहां जाता है कि महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने परिजनों ,गुरु ,और भीष्म पितामह सभी का वध किया था जिसके प्रायश्चित के लिए वे भगवान विष्णु के पास जाते हैं और विष्णु ने उन्हें शंकर के पास जाने को कहा !  भगवान शंकर को मालूम था कि वे यही आ रहे हैं अतः शंकर भैंसे का रुप ले भैंस के झुंड में आ जाते हैं ! भीम शंकर भगवान को पहचान जाते हैं भगवान भागते हैं ...भीम ने उनकी पूछ कसकर पकड़ ली भगवान का पीछे का भाग केदारनाथ में रह गया और उनका आगे का भाग जमीन में समा गया ! भीम दुखी हुए तभी प्रभु शंकर ने कहा कि मैं कुछ समय पश्चात प्रकट होऊंगा .... कहते हैं कि इस जगह सभी गाय अपना दूध छोड़ देती थी जिनकी गाय थी उन्होंने कहा आखिर दूध रोज कौन ले लेता है पीछा करने पर सभी गाय एक ही जगह दूध छोड़ने लगे यह देख सभी ने वहां खोदा तो वहां पशुपतिनाथ की मूर्ति निकली और वहां ईश्वर को मंदिर में स्थापित किया गया !कहते हैं केदारनाथ में पिंड का दर्शन कर पशुपतिनाथ के भी दर्शन करते हैं तो यात्रा पूर्ण होती है पशुपतिनाथ के दर्शन से माना जाता है कि सभी ज्योतिर्लिंग के दर्शन हो गए ! रुद्राभिषेक वहां करने से प्रसाद के रुप में रुद्राक्ष की माला दी जाती है! मंदिर के परिसर में फोटो लेना वर्जित है !

मंदिर में स्त्री-पुरुष की विविध भंगिमाओं की कुछ ऋंगारिक शिल्प कला थी उनकी शिल्पकला खजुराहो की मूर्ति की याद दिलाते हैं किंतु सभी पशुपतिनाथ के दर्शन में इतने खो जाते हैं कि किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता यह बहुत बड़ी विशेषता है! 

दूसरे दिन पोखरा पहुंचकर हमने मोती और छोटी मोटी बच्चों की खरीदी की नेपाल में मोती अच्छे मिलते हैं !

लुंबिनी के लिए निकलने से पहले  हमने शेषनाथ पर लेटे विष्णु जी की विशाल मूर्ति के दर्शन किए जो पानी में थी उसकी विशेषता यह है कि वह एक ही पत्थर से बनी है इतनी खूबसूरत कि सभी सोचने पर मजबूर हो दांतो तले उंगली दबा देते हैं कि कैसे और किस शिल्पकार ने बनाया होगा .... बहुत खूबसूरत हां !  मंदिर टूट चुका है भूकंप के समय ! रोप वे से मनोकामना मंदिर जो 1350 फुट की ऊंचाई पर है वह भी ध्वंस हो चुका है...  काफी धरोहर ध्वंस हो चुकी है! नव निर्माण  हो रहा है! 

सेतु झरना जो दूध की तरह सफेद बहता आता है और एकदम से अंधेरे कूप में अंडर ग्राउंड हो जाता है !वहां कई झील है एक झील में तो हम वोट में बैठकर वाराही माता के मंदिर भी गए थे ..... तत्पश्चात गुपतेश्वर गए जहां शिव के ऊपर शेषनाग के पांच मुख दिखाई देते हैं मंदिर एकदम नीचे है! डेढ़ सौ सीढ़ियां उतरकर मंदिर है!  सीढ़ी 
काफी ऊंची ऊंची है वहां भी काम चालू है वैसे भूकंप में नेपाल की बहुत से ऐतिहासिक जगह को नुकसान पहुंचा है !

लुंबिनी

 लुंबिनी में हमने बुद्ध की मूर्ति देखी जिसमें एक मूर्ति में राजा के रूप में जो उनके ऐश्वर्य को दर्शाता है दूसरा गृहस्थ जो भोग को और तीसरी सन्यासी के रूप में जो उनके त्याग को दर्शाती है..... साथ ही वहां बड़े-बड़े घंटे के आकार के छोटे-बड़े गुंबज थे जो सोलार से घूमते हैं ! 
चितवन सफारी में ओपन गाड़ी सैर की!  नेपाल में गैंडा और हाथी ज्यादा दिखे हिरण और बंदर भी जंगल में दिखे कुछ खास नहीं किंतु जंगल में जाने का आनंद लूटा !

रात्रि होटल के पास ऑडिटोरियम था जहां हमने नेपाल का कल्चरल प्रोग्राम देखा अंत में हम सभी ने उनके साथ डांस किया..... भारत और नेपाल दोनों की संस्कृति का मेल वाह क्या नजारा था दोनों का समन्वय दोनों देशों के आपसी एकता को दर्शा रहा था !

दूसरे दिन दिनांक 26 /9/ 2017 को हमारी यात्रा यही पूर्ण हुई !  नेपाल की हर यादों को साथ लिए  रात्रि 9:40 को हम गोरखपुर वहां के शिव मंदिर पहुंचे जहां खाने-पीने का प्रबंध भी वहीं था तब सभी ने प्रभु के दर्शन कर अपनी पेट पूजा की ..... वैसे वहां योगी जी का शासन है  पुलिस की व्यवस्था अच्छी थी और क्यों ना हो आखिर नेपाल का बार्डर जो है !

आज भी नेपाल यात्रा संस्मरण  लिखते लिखते मैं रोमांचित हो आपसे शेयर करने को आतुर हो गई! 

                चंद्रिका व्यास
             खारघर नवी मुंबई

विधा -संस्मरण 


वो 10दिन की अनोखी यात्रा का वर्तांत मै कभी नहीं भूल पाती.. 2बरस पूर्व की बात है लगता है कल की बात हो हमने दिल्ली चंडीगढ़ कुल्लू मनाली शिमला हिमाचल आगरा आदि जगह की योजना की.. चुकी मै खुश भी थी और कुछ दुखी भी क्योंकि मेरी  बर्फीली वादियों मे सफर करने का सपना सच होने वाला था किन्तु भय भी था के मार्च मौसम मे बर्फ देखने को मिलेगी या नहीं फिर भी  सोचते करते पैकिंग की चल दिए सफर की और वो टेड़े मेढे पहाड़ियों के रास्ते चैन से बैठने भी नहीं दे रहे थे कुछ देरी मे उल्टी आने लगी मुझे मै खिड़की तरफ थी तो परेशानी नहीं हुई किन्तु ये क्या.. कुछ देर बाद पतिदेव को भी आने लगी अब खिड़की पर वो आ गए रास्ते भर यही सिलसिला चलता रहा 😄सुहाना सफर की मुश्किल थी ये डगर जो भी हो नियत समय हम होटल पहुंच निकल गए गाड़ी कर कुल्लू मनाली के लिए... तब भी रास्ते भर यही कश्मकश रही बर्फ होंगी या नहीं क्योंकि अभी तक तो रास्ते मे दिखी नहीं किन्तु भगवान ने जैसे मन की बात जान ली कुछ दूर चलते ही ठण्ड के कपड़ो के लिए गाड़ी रोकी और बर्फ गिरना स्टार्ट हो गयी मै तो बच्चों की तरह ख़ुशी के मारे बेटे के संग बच्ची बन नाचने लगी वीडियो बनाने लगी फिर क्या   गरम कपडे पहन आगे गए.. सोलांग वैली.. क्या नजारा हर तरफ सफेदी छायी बर्फीली वादिया ऊपर से हलकी हलकी बर्फ गिर रही लग रहा कोई फ़िल्मी सीन देख लिया हो पल भर तो भरोसा नी हुआ ये सपना है या सच तभी बेटे ने खेलते हुए बर्फ का गोला फेका मेरी और तब इस सपने का सच होने का अहसास हुआ बहुत मजे किये फोटो लिए ठण्डी मे गरमा गरम मैग्गी भुट्टे खाये किन्तु नीचे उतरते वक़्त हसबैंड स्लिप हो गए ऊँगली मे चोट लगी पर बहुत मज़े किये बस 10दिन  निकल गए हसीं ख़ुशी सब  निर्धारित जगह घूमते  हुए  घर आकर डॉ को दिखाया  पतिदेव को तो पता चला फैक्चर है पट्टा चढ़ा 😔फिर सारी ख़ुशी काफूर हो गयी ऐसी थी ये खट्टी मीठी यात्रा मेरी🌹



हेमा जैन (स्वरचित )

यात्रा वृतांत


लेखक नरेन्द्र कुमार शर्मा 
भाषा अध्यापक,
हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग 


माघ का महीना और तत्तापनी का वो माघी स्नान।परिवार के साथ हम भी चल दिये।यूँ तो इस माह हिमाचल प्रदेश में बर्फ़ पड़ती है और यातायात व्यवस्था बाधित हो जाती है।इस बार का मौसम हिमपात के बाद साफ़ था फिर वाहनों के लिए सड़क सेवा भी सुचारू थी।
सुबह के माघी स्नान के लिए पहुँचना था तो हम परिवार के साथ पहले दिन ही घर से निकल लिए। बर्फ़ सड़क के दोनों ओर थी।प्रकृति ऐसे प्रतीत हो थी मानों ठण्ड से सफेद चादर ओढ़े ऐसा सोच रही हो कि इस बार कोई मेरी नई सफेद चादर को देखे।
हम अपने वाहन में सवार थे तो प्रकृति संघ सेल्फ़ी भी हो रही थी।उस सेल्फ़ी के में प्रकृति की सफेद चादर ऐसे लग रही थी जैसे वो हमसे शर्मा रही हो।बच्चे कभी बर्फ़ के गोले बनाते और कभी बर्फ़ को मुँह में डालते।
चलते -चलते हम हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल कुफरी और उसके बाद नालदेहरा होते हुए तत्तापनी पहुंचे।
प्रात: काल की शुभ बेला में माघी स्नान करना था।सो परिवार सहित हम सतलुज नदी के तट पर पहुंचे।वहां जब स्नान करने लगे तो बच्चे अचंभित हो उठे कि सतलुज नदी के शीतल जल के साथ गर्म पानी कैसे आया होगा।
बच्चों की जिज्ञासा थी तो कहना पड़ा।गर्म को स्थानीय भाषा में तत्ता कहा जाता है।यही कारण है कि इस स्थान का नाम तत्तापनी पड़ा।सल्फर युक्त इस गर्म पानी में ज्यादा समय तक नहीं रह सकते और अगर सोने अथवा चांदी के जेवर पहन रखे हैं तो उसे उतार कर ही नहाना चाहिए।क्यूंकि जेवर अथवा गहनों का रंग भी काला हो जाता है।
हिमाचल प्रदेश में यह स्थान शिमला से मात्र 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
मौज मस्ती के साथ हमारी यह यात्रा बेहद रोमांचकारी स्मृतियों से भरी हुई थी।

🌹🌹मेरी मनपसंद यात्रा, के कुछ संस्मरण🌹🌹
       मित्रो, मेरा मानना है कि यात्राएं भी संयोग से होती है, यह यात्रा आज से दस वर्ष पहले भी हो जाती पर अम्बाला से वापस आ गए और हिमाचल में घूमने की हसरत मन में रह गई,,, वो समय अब आया और अपनी हसरतों में हिमाचल का रंग भर दिया।
     चंडीगढ़ तक फ्लाईट में जिसमें रोमांच तो है पर दिखता नहीं, न कोई ओवरटेक ना कोई ट्रैफिक,ना कोई चोराह आ ना कोई सिग्नल,बल्कि ऐसा लगता है कि ये जहाज तो खड़ा है आसपास कुछ नहीं बस कभी कभी बादल दिखते है,,, पता नहीं ये चंडीगढ़ केसे पहुचंता है,,,।
     यहां से अम्बाला वहां एक शादी थी जिसमे शरीक हुए, दिन भर रहे,,, दूसरे दिन उठाई अपनी कार,, और चल पड़े अपने हिमाचल की और,,,लगभग सौ किलोमीटर के बाद याने चंडीगढ़ के बाद आई हिमाचल की सर्पिली सड़के जो कही सीधी नहीं होती,,, नागिन सा मिजाज है उनका,, और तेवर उंट की पीठ जेसे ऊंचे नीचे उतार चढ़ाव,, बाई तरफ हजारों फिट की खाई और दाई तरफ हजारों फिट ऊंची पर्वत ओ को चोटियां,,,,,, कुछ समय तो ऐसा लगा कि हमने शेर के मुंह में हाथ डाल दिया है अब निकालेंगे केसे,,।
     खैर दिन के तीन बजे तक शिमला पहुंचने को हुए पहली समस्या गाड़ी पार्क करने की ,वहा कोई जगह समतल नहीं और ना इतनी गुंजाइश और ना ही परमिशन वहां एक ritjj ban rkha he पार्किंग के लिए जो कई मंजिल नीचे बेसमेंट में है वहा पार्क करना होता है,,,, हम दोनों मिया बीबी कार से उतरे बेटा गया पार्क करने,,, ।
     वहीं शिमला का माल रोड है जहां शेलानियों की भीड़ है छोटी छोटी सजीली दुकानें शाल, स्वेटर, लांग कोट,, पश्मीला को वहां की विशेषता है,,लेना कुछ नहीं पर मन नहीं मानता,,।
     वहीं पर सामने चूंकि शिमला हिमाचल की राजधानी है इस कारण से शानदार सरकारी कार्यालय है ,,, दिवंगत प्रधानमंत्री इंद्रागांधी,, अटल बिहारी बाजपेई,की विशाल मूर्तियों से सजा परिसर उसमे खूबसूरत बगीचे,,, यहां तक हम काफी थक चुके थे,,, पर बैठने को मन नहीं करता,, कुछ हल्का फुल्का नाश्ता कर हिम्मत जुटाई,, थोड़ा नीचे उतरे पता किया उस हनुमान मंदिर का जो शिमला की सबसे ऊंची चोटी पर है,,,, दुकानदार ने वहीं सामने बता दिया,,,, इतना सरल नहीं था पैदल ऊपर च ढना था,, झिग झेग सी chdhai कभी पूरब में कभी पश्चिम में उपर से आने वाले एक जवान जोड़े से पूछा कितने और chdhna है वो बोले अब यहां तक आ ही गए हो तो थोड़ी मेहनत और हैं आप chdh जाओगे,,,इसके बाद लिफ्ट से जाना था,,, पच्चीस रुपए पर हेड दे कर लिफ्ट में,,, उसने दो मंजिल लेे जा कर उतार दिया फिर बाए पैदल दूसरी लिफ्ट उसने तीन मंजिल लेे जा कर छोड़ दिया,,, उसके बाद आया बाबा के यहां जाने का झूला, जिसमें दो ट्रॉली जाने वाली दो आने वाली,,५५०₹ पर हेड उसमे सवार होना था,,, में बोला बाबा कितनी उपर बैठे हो,,,वहा से उस झूले से नीचे देखने में ही चक्कर आ जाए,  बाबा के दरबार में पहुंचे तो बाबा स्वयं इतने ऊंचे की उनकी शक्ल देखने में सीढ़ी भी कम पड़ जाए,,बाबा वहा से पूरी शिमला का नजारा करते है,,,वहा उनका सुंदर स्थान बना हुआ है,,, उनके संगी साथी भी वहा ढेर है,,, उनकी समझ में आ जाए तो आपका चश्मा उतार ले और समझ में आ जाए तो आपके हाथ का हेंड बेग लेजाए,,, पर ये उनकी मर्जी पर है एसा वो कुछ करते नहीं पर भय फेला रखा है,,,
       यहां तक कि यात्रा में अपनी भी बेट्री daun होने को आ गई पर बात अभी खतम नहीं हुई, अभी उसी झूले और लिफ्ट से वापस उसी पार्किंग पर पहुंचना है,,, आप अंदाजा लगाए कितना श्रम है,,,
        हमारी होटल शिमला से ग्यारह किलोमीटर दूर सरोवर पॉर्टिका है,, गाड़ी में सवार उन्हीं सर्प जैसी सड़कों पर हो कर होटल पहुंचे,,,शाम के ७ बज चुके थे,,,
    दूसरे दिन शिमला से भी उपर कुफ्री जाने का प्रोग्राम बनाया,,, सुबह होटल से भरपूर नाश्ता इडली,,सैंडविच,डोसा, बफे में को समझ में आया खाया और बढ़े अपने गंतव्य पर,,, रास्तों का वहीं मिजाज,, और पर्वतों काभी,,,वहा बर्फ के दीदार हुए,,,बर्फ की मस्ती,,, और याक की सवारी,,साथ में जिंपिग चेन की हवाई उड़ान,,।
  तक पहुंचने में हमारी कार वहीं पार्क कर फॉर व्हील जिप्सी से १० किलो मीटर chdhna हुआ,,, जंहा पथरीली chddhai है,,,फिसलन है , उपर से बर्फ पिघलती हुई उस कच्चे रोड पर फेल जाती है,, वहा जिप्सी वाला दूसरी जिप्सी के हवाले कर चलता बना ,,फिर पैदल नीचे उतरे,,, और चौथी नीचे की सड़क पर वाह जिप्सी मिली,,, जो हमे हमारी कार पहुंचाती है,,
  इस प्रकार कुफरी का आनंद लिया,,,
        वहां ज्यादातर यंग कपल,,,, कॉलेज के युवान लड़के लड़कियां होती हैं,,,जिनके बीच हम भी अपनी उसी उम्र के अंदाज को महसूस करने लगे,,, और एक नया जोश और उमंग का अनुभव प्राप्त हुआ,,,, रहा सवाल थकान का तो वो तो हर उम्र के साथ है जो हमारे भी साथ रही,,,
    इस प्रकार शिमला पूर्ण होता है,,, अब कल मनाली के लिए निकलेंगे।
      जय हिन्द जय भारत
🙏🙏🌹🌹😃😃🌹🌹✌️✌️✌️

यात्रा संस्मरण

दोस्तों में अपना बहुत पहले का संस्मरण बताती हूँ, शायद मेरे जीवन में  होश संभालने के बाद की पहली घटना है! मैं अपनी नानी के घर पर रहकर पढ़ाई करती थी! जब मैं तीसरी कक्षा में थी तब हमारे घर में एक नए नन्हे मेहमान का आगमन होने वाला था! मैं उस समय 9 साल की थी !नानी का घर बिहार में  सनौली कटिहार के पास था! मेरे पापा हरियाणा से  मुझ से छोटी बहन के साथ  आए मुझे लेने! मैं बहुत खुश हुई क्योंकि बहुत छोटी थी, इतनी समझ नहीं थी,  पहले के समय बच्चों को हर समझ से दूर रखा जाता था! मैं खुशी-खुशी पापा के साथ नाना-नानी को प्रणाम कर निकल गई! उस दिन 2 अक्टूबर गांधी जयंती थी, यह बात 1981 की है! जैसे ही ट्रेन  प्लेटफार्म पर आई  उसमें इतनी भीड़ थी  चढ़ना ही मुश्किल हो रहा था ! पता नहीं पापा ने हम सब को कैसे चढ़ाया याद नहीं !!हम जैसे ट्रेन में चढ़े ट्रेन में बहुत भीड़ होने की वजह से हमें कहीं सीट नहीं मिली खड़े होने तक की जगह नहीं थी! क्योंकि गांधी जयंती होने की वजह से उस दिन ट्रेन फ्री थी कोई टिकट के पैसे नहीं देने थे!! मेरे पापा  किसी तरह ट्रेन के टॉयलेट तक पहुँचे और उसे धोकर अच्छी तरह साफ किया, अपने हाथों से और पूरी की पूरी टॉयलेट सीट साफ कर उस पर एक लकड़ी का पटरा डाल दिया और चट्टी पहले बोरा आता था सुतली का बना हुआ, उसे उस पर बिछा कर पापा वहीं पर समान जमाया और हम दोनों बहनों को लेकर टॉयलेट के भीतर से बंद करके बक्से पर बैठ गए! इसी तरह हम दिल्ली तक पहुँचे, रास्ते भर खिड़की से हम दोनों बहने देखते  आते जाते प्लेटफार्म, हमारे साथ-साथ भागते दिन में सूर्य और रात में चाँद इसी तरह दिल्ली पहुँचे, पापा वहाँ से हमें कश्मीरी गेट से होते हुए हरियाणा की बस में बैठे और चल पड़े हम वहाँ से अपने घर की तरफ! नारनौल आते आते ऊँचे-ऊँचे पहाड़ एक पहाड़ी खत्म होती  दूसरी शुरू हो जाती कहीं-कहीं तो लंबी -लंबी खाई बहुत ही रोमांचक सफर आज भी हम जाते हैं तो बहुत अच्छा लगता हैं! 2 महीने बाद एक छोटी बहन का जन्म हुआ! इस तरह से मेरी यह पहली यात्रा आज भी सुखद संस्मरण हैं।।

              🙏🏻 समाप्त🙏🏻

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

अग्निशिखा मंच
तिथि- 2-6-2021
विषय- यात्रा वृतांत

बहुत पहले की बात है ,मेरी जीजी जीजाजी घूमने निकले। साथ में जीजी के सास ससुर भी थे। वो लोग बस किये थे । कई जगह घूमते हुए सब जबलपुर भेड़ा घाट पहुँचे। यहाँ नर्मदा नदी में जहाँ पानी कम है वहाँ पत्थर बहुत होने के कारण भंवर बन जाते हैं । मेरी जीजी को तैरने का बहुत शौक है वो पानी में तैरने उतर गई।थोड़ी देर बाद उसे लगा की वह तैर तो रही है पर वहीं वहीं गोल गोल और उस गोले से निकल नहीं पा रही है किनारे पर उसकी सास खड़ी आवाज़ लगा रही थीं कि अब निकलो भी। उनके पास खड़ी एक महिला बोली अरे वह भंवर में फंसी है डूब रही है। अब वो घबराईं और चिल्लाई कि मेरी बहू डूब रही है कोई बचाओ। फिर तो कई लोग बचाने कूद पड़े , बचाने वाले ने हाथ दिया और खींचा जीजी भंवर से बाहर आ गई और तैर कर किनारे आ गई। बाद में उन्होने कहा अच्छा हुआ मुझे भंवर का ध्यान नहीं आया ,इस लिये मैं गोल गोल तैरती रही। अगर ध्यान आ जाता तो मैं डर के मारे वहीं मर जाती।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबीवली 
महाराष्ट्र
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