Sunday, 13 June 2021

anshika munchkin dwara aayojit laghu Katha pratiyogita ke parinaam aur samman पत्र

🌺अग्निशिखा मंच द्वारा आयोजित 🌺लघुकथा प्रतियोगिता के परिणाम 
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1) प्रथम-- वीणा अचतानी 
 2) द्वितीय-- कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड 
 3) तृतीय-- आशा जाकङ 
  4) चतुर्थ--  सुरेन्द्र हरङे 
सांत्वना पुरस्कार 
 5) शोभा रानी तिवारी 
  6) पूनम शर्मा 
   7) नरेन्द्र कुमार शर्मा 
   8) नीरजा ठाकुर 
     9) चंदा डांगी 
     10) चंद्रिका व्यास 
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  निर्णायक ---
1) डाॅ पुरुषोत्तम दुबे-- इंदौर 
 2) सेवा सदन प्रसाद-- नवी मुंबई 
सौजन्य--  अग्निशिखा मंच
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आदरणीय डॉ पुरुषोतम दुबे जी और आदरणीय सेवा सदन प्रसाद जी का बहुत बहुत अभार व धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻


🙏🏻समय शाम तीन बजे से  3 बजे से 
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🌺रविवार- 13/6/2021
🌺 लघु कथा प्रतियोगिता 🙏🌹सम्मान समारोह समारोह और काव्य पाठ 
विषय - स्वैच्छिक
🌹कार्यक्रम उद्घाटन आदरणीय राम राय बिहार
🌸सरस्वती वंदना
🌺 मुख्य अतिथि 
🌹डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे इंदौर 
🌺कार्यक्रम समारोह अध्यक्ष 
🌹आदरणीय सेवासदन प्रसाद जी🌹 विशेष अतिथि 
🌺आदरणीय-सतीश शुक्ला मदन
आदरणीय 
🌺आदरणीय-आशा जाकड
🌺आदरणीय डॉ रामस्वरुप साहू 
🌺समय -3 बजे से 

संचालक - डॉ अलका पाण्डेय 
🌺सुरेन्द्र हरड़ें नागपुर 
🌸वल्लभ अंबर  इंदौर

🌺आभार 

🌺चंद्रिका व्यास

🌺प्रति भागी 🌺

१) राम राय जी 
२) कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड 
३) सुनिल मिश्रा 
४) आशा जाकड
५) रानी अग्रवाल 
६) नीरजा ठाकुर 
७) शोभारानी तिवारी 
९) श्रीवल्लभ अम्बर
१०) सुरेन्द्र हरड़ें 
११) अलका पाण्डेय 
१२) वीना आडवाणी"तन्वी"
१३) सुषमा शुक्ला
१४) बृजकिशोरी त्रिपाठी गोरखपुर
१५) प्रो. रविशंकर कोलते नागपुर
१६) रेखा शर्मा स्नेहा मुजफ्फरपुर बिहार
१७) पूनम शर्मा स्नेहिल उत्तर प्रदेश गोरखपुर
१८) हीरा सिंह कौशल हिमाचल प्रदेश 
१९)वीना अचतानी  जोधपुर  
२०)हेमा जैन
21)  ओमप्रकाश पाण्डेय 
22) वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश
23) डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"इंदौर
24)स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड
25) रजनी अग्रवाल
26) नरेन्द्र कुमार शर्मा हिमांचल प्रदेश
27) दिनेश शर्मा 
28) आशा लता नायडू
29) विजयेंद्र मोहन 
30) कुमकुम वेद सेन 
31) ऐश्वर्या जोशी  कापरे 
32) चंदा डांगी 
33) डॉ रश्मि शुक्ला 
34) डाॅ सरोजा मेटी लोडाय
35) अंशु तिवारी पटना 
36) कल्पना भदौरिया "स्वप्निल "उत्तरप्रदेश 
37) ममता तिवारी 
39) रानी नांरग 
39) अनिता झा 
40) चंद्रिका व्यास 
41) डॉ मीना कुमारी परिहार
42) डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
43) नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश
४४ सरोज दुगड़ खारूपेटिया , गुवाहाटी असम
४५) अर्चना पाठक
46.डा.महताब अहमद आज़ाद
उत्तर प्रदेश
47/डा. साधना तोमर---------
48/रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
49) स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह' नई दिल्ली
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच 
संयोजक 
अलका पाण्डेय मुम्बई



विशेष. अतिथि ःउद्बोधन

अग्निशिखा मंच पर उपस्थित अग्निशिखा मंच कीअध्यक्ष डा.अलका पांडे जी  , कार्यक्रम उद्घाटन कर्ता श्री रामराय बिहारी जी, मुख्य अतिथि डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबेजी, विशिष्ट अतिथि सतीश चंद्र जी एवं श्री रामस्वरूप साहू जी संचालक गण सुरेंद्रहरडे व श्रीवल्लभ अम्बर जी एवं  श्रोताओं  का बहुत-बहुत वंदन अभिनंदन।
आदरणीय डा. अलका जी आज आपने लघु कथा सम्मान प्रतियोगिता के सम्मान पत्र दिए हैं यह सभी लघुकथा कारों के लिए एक बहुत बड़े सम्मान की ,गर्व की बात है आपके  मंच ने 1 साल में बहुत लंबी दूरी तय कर दी है ।आपके मंच ने 25 मार्च 2020को शुरुआत की थी और आज आपकी मंच ने बहुत प्राप्त करनी है यह आपके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। आप  कथाओं के अलावा काव्य विधा ,चित्र विधा पर काव्य विधा रखती है और साथ ही मुहावरों पर जो लघु कथाएं रखती है वह अपने आप में एक नई पहल है कि मुहावरों पर भी आपने बहुत अच्छी कलम चलवाई है इस सब का श्रेय आपको ही जाता है।  सभी लोगों ने  मुहावरों पर बहुत अच्छे अच्छे लघु कथाओं की रचना की है । मैं यही शुभकामना देती हूँ सभी खूब अच्छा लिखे हैं आगे बढ़े और आगे बढ़ते ही रहें।आज भी सभी रचनाकारों ने अपनी  स्वैच्छिक रचनाएं शानदार प्रेषित की है मैं अस्वस्थ होने के कारण अभी पटल पर उपस्थित हुई हूँ। आपका अग्नि शिखा मंच दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति के शिखर पर बढ़ता रहे जो युवा कलाकार है वह लेखन क्षेत्र में नए कदम रख रहे हैं  वे भी खूब आगे बढ़ते रहें साहित्य की गद्य पद्य सभी विधाओं में सभी की लेखनी खूब चले और पूरे भारत में अग्नि शिखा मंच की पताका लहराये। जिन रचनाकारों ने प्रशस्ति पत्र प्राप्त किए हैं उन सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं

यह मेरी शुभकामनाएं  हैं
💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌

 आशा जाकड़
 विशेष  अतिथि

कोरोना को भगाएँ
 
आओ हम सब मिलकर कोरोना को भगाएँ।
धैर्य, संयम ,सहयोग से कोरोना को भगाएँ।।

गले नहीं मिलेंगे , हम हाथ नहीं  मिलाएँगे,
हाथ जोड़के करें नमस्ते हँसके मुस्कराएगे।अपनी पुरानी संस्कृति को फिर से अपनाएँ।।

साफ - सफाई हम रखेंगे हाथ खूब धोएँगे,
भीड़ - भाड़ से दूर रहेंगे ,साथ नहीं बैठेंगें।
एकान्त में विचरणकर शुद्ध हवा अपनाएँ।।


कॉलेज ऑफिस बंद होगए घर से काम करो,
आना -जाना बंद हुआ अब घर विश्राम करो।
घर पर रहकर बच्चों को गीता ज्ञान सिखाएं।।

आशा जाकड़
9754969496





अग्नि शिखा मंच को नमन
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
लघु कथा प्रतियोगिता
13 जून 2021
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विधा: लघु कथा
शीर्षक : सज्जन
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सज्जन
कोलकाता पुस्तक मेला…. लिटिल मैगजीन पेवेलियन… साहित्य त्रिवेणी पत्रिका का स्टॉल...। संपादक कवि मार्तंड जी सुबह से बैठे मक्खी मार रहे थे। पूरे पेवेलियन में एक मात्र हिंदी पत्रिका… । अधिकतर ग्राहक बांग्ला भाषी...। स्टॉल पर एक सरसरी नज़र डालते हुए आगे बढ़ जाते और आगे बढ़कर बांग्ला पत्रिकाओं के स्टॉल से पत्रिकाएं खरीदते। संपादक जी बैठे बैठे हिंदी पाठकों को कोसते रहते। इसके अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे। 
अचानक एक सज्जन स्टॉल पर पधारे। उलट पलट कर एक एक अंक को देखने लगे और प्रशंसा करने लगे। वाह! मुखपृष्ठ बहुत सुंदर है… रचनाओं का चयन भी समझदारी से किया गया है। संपादकीय भी बहुत विद्वता पूर्ण है। वाह! वाह!! सब एक से बढ़कर एक। 
पत्रिका की इतनी प्रशंसा सुनकर संपादक महोदय फूले न समा रहे थे। पत्रिकाएं इतनी अच्छी हैं ये तो उन्होंने खुद भी कभी नहीं सोचा था। 
उन सज्जन के बारे में अधिक जानने की उत्सुकता जगी। उन्होनें आग्रह पूर्वक उन्हें पास में बैठा लिया। चाय पिलाई। बातचीत से पता चला वे किसी विद्यालय में हिंदी भाषा के प्रोफेसर हैं.. उनकी पत्नी भी किसी विद्यालय में हिंदी की शिक्षिका है..  और उनकी बेटी भी हिंदी विषय लेकर एम ए कर रही है। आशा लगी कि शायद ये कुछ अंक अवश्य खरीदेंगे। 
उन्होंने कई अंक उठा लिए और चलने को हुए। ये अंक मैं ले रहा हूं। संपादक जी ने खुश होते हुए उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर आधा मूल्य बताया। 
उन सज्जन ने कुछ इस तरह ताका जैसे संपादक जी से बहुत बड़ी गलती हो गई हो।
उन्होंने तुरंत पत्रिकाएं टेबल पर फेंकी और खड़े हो गए। अरे छोड़ो किसके पास इतना समय है कि इन्हें पढ़े। बेकार घर में कूड़ा ही बढ़ेगा। 
और हां, आप भी किस चक्कर में पड़े हैं, छोड़िए ये कल्पना की दुनिया.. व्यर्थ समय गंवा रहे हैं। कुछ काम धाम करिए। 
इतना कहकर वे सज्जन सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए भीड़ में खो गए। समादक जी उनकी सज्जनता के बारे में सोचते हुए धम्म से कुर्सी पर बैठ गए। 
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© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता



"नया सवेरा आएगा"
नया सवेरा  अभी आयेगा,
खुशियां ही खुशियां लायेगा,
आनंद का प्रकाश छायेगा,
हर शख्स खुशी से गाएगा,
और गायेंगे हम ।।१।।
न रहेगा कोरोना का डर,
खुलेंगे सब बंद बाजार _घर,
गाड़ी,हवाईजहाज का सफर,
ले साथ मित्र और हमसफर,
चलेंगे विश्व_भ्रमण पर हम।२।
न लगाना होगा मुंह पर मास्क,
न रखनी होगी दो गज की दूरी
न होगी मिलने से मजबूरी,
हमारे यहां आयेंगे अतिथि,
और अतिथि बनेंगे हम।३।खुलेंगे मंदिर_गुरुद्वारे,
मस्जिद_गिरिजाघर सारे,
खूब होगी सब जगह पूजा,
प्रभू से प्यारा न कोई दूजा,
उसको पुकारेंगे हम।४।
सब होगा,नौकरी धंदा व्यापार,
सब कमाएंगे धन दौलत अपार
हर हाथ को काम"व रोजगार,
 होंगे देश_विदेश खुशहाल,
खुशहाल होंगे हम।५।
आयेगी लाली नवभोर की,
कल्लोल _गुंजन के शोर की,
ईश्वर की लीलाओं का,
             नहीं हमें पूरा ज्ञान,
कौन जाने ये कोरोना,
              सिद्ध हो वरदान।६।
रचयिता___रानी एस.अग्रवाल
उम्र ६५ वर्ष।
ये मेरी स्वरचित मौलिक रचना है।
पता_E_73Rustomjee Regal,J.S.Road.Dahisar West,Mumbai_400068.
mobile_9324342825.



"ग़ज़ल "
मुझसे देखी नहीं जाती किसी की जुदाई ।
शाख़ पै बैठे परिन्दों को उड़ाऊॅ कैसे ।
लोग पढ़ लेते हैं दिल की जुबां नज़रों से ।
एसे आलम में दिल का राज़ छुपाऊॅ कैसे ।
मुझको हर ख्वाब-ए-ताबीर से डर लगता है ।
भीगी पलकों पे कोई ख्वाब सजाऊॅ कैसे ।
खबर है किसे मर्ज़ ए-इश्क लगा है मुझे ।
अपने  आँसुओं का सबब बताऊँ कैसे 
आग सुलगती है दिल में उसकी बेरूखी से ।
इस दिल की तपिश को अश्कों से बुझाऊँ कैसे ।
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)



*कविता**लहू की होली*

टुकड़े टुकड़े हुए मेरे जिस्म के
कोई ,गिरा इधर ,कोई गिरा उधर।
मेरा किसी ने रास्ता रोखा,
मालूम नहीं मुझे क्या हुआ अचानक आंखों के सामने अंधेरा छाया।।१।।

जोर से धमाका हुआ कुछ सुनाई नहीं दिया।
जब आप ही नहीं रही
कैसे देखूं मां तुझे,।।२।।

मां तेरा वजूद ही नहीं रहा,
तेरे कलेजे का  टुकड़ा ही नहीं बचा।
तेरी आंखों का तारा ही बुझ गया,
तो फिर कैसे तुझे मिलता मां?।३।

रोज सुनता था समाचार,
कही,इक्का दुक्काजवान शहीद हुए,किंतु मैं खुद ही आतंकियों के खुद निशाने पर था,।।४।।

जिन्होंने तेरी लाडले बेटे , का वध किया,मां मैं मरा नहीं, बल्कि देश के लिए  मेरा तन कुर्बान हुआ।
मां मैं जिस्म के रूप में नहीं मिल सकूं मगर मेरी आत्मा सदा तुम्हारे पास रहेंगी।।५।।

मां तुझ से मोबाइल पर बात की होली पर जरूर आऊंगा रंगों का त्योहार खूब मौज मस्ती के साथ बनाऊंगा तेरे हाथ की भुजिया खाऊंगा। देश की सुरक्षा के लिए लहू की होली खेली , मां मैंने।।६।

आंखें भर आयी, कविता लिखते,
दिल बैठा जा रहा था।
कलम थरथरा रही थी।
अल्फाज भी निकल नहीं रहे थे।
शायद वह कहीं गुम हुए लगता था।।७।।

*आंखों में नमी थी*
*दर्द की जमी थी*
*सबके तेरे पास*
*बस मेरी यह कमी थी*
*मां तुझे सलाम*
   *जय-हिंद*

सुरेंद्र हरड़े कवि
नागपुर महाराष्ट्र





* हल्दी धाटी *

सिशोदिया कुल वंश मेवाड़ी आन महारणां प्रताप पौरूष की पहचान
अकबर महाराणां  से घबराता था रणंभूमि में प्रताप  का सामना करने से डरता था !
हल्दी घाटी में युद्ध हुआ अकबर ने बहलोल खां को भेज दिया ,
हाथी जैसा बदन था जिसका जिसके सामने न घोड़े भी छोटे लगते थे ?
हल्दी घाटी में युद्ध हुआ वीरों की तलवारें चमकी- खनकी !
 नर पिचाश बहलोल खां को देख सामने  राणां की भुजाऐं फड़कीं  ,
बहलोल खां की अफीम के नशे में डूबी आंखें , राणां की तेजोदिप्त आंखों से टकराई !
महाराणां प्रताप का पोरुष देख- देख समर भवानीं भी  थरथराई ?
 महाराणां प्रताप  की आंखों में रक्त उतर आयाऔर हल्दी घाटी में भीषण संग्राम हुआ 
कुछ देर महाराणां प्रताप  नें खेला खेल ....बहलोल खान
बिलाव को खूब छकाया था ,  
फिर अपनीं तलवार से एक ही वार से बहलोल खां को चीर दिया ?
ऐसा फाड़ा बहलोल खां को आधा इधर आधा उधर गिरा ?
हल्दी घाटी में महाराणां प्रताप  के साथ ८५,०००  भील सैनिक थे ,
अकबर के ८५,०००पर बिजली बन कर के टूटे थे !
हल्दी घाटी की मांटी में अब भी तलवारें पाई जाती है ,
गली-  गली कूचे- कूचे प्रताप की गाथाएं गाई जाती है !
जब एब्राहँम लिंकन भारत में आने वाले  था ?
माँ भारत से तुम्हारे लिए क्या तोहफा लाऊं ?
ला सको गर मेरे लाल उस महान देश से  हल्दी घाटी की पावन मिट्टी ले आनां !
माँ की मांग सुनकर एब्राहम लिंकन भी चकराया था ,
धन्य- धन्य मेवाड़ राजवंश ,धन्य - धन्य सिसोदिया कूल दीपक !
जिसके हाथी रामप्रसाद  नें नहीं खाया
अकबर का दाना पानी ,
एक अकेले हाथी को काबु करने को  आताताई हारे थे !
रामप्रसाद को काबु करनें में कितनें हथकंडे अपनाए थे , 
जिसके हाथी - धोड़े भी नाम अमर कर जाते हैं !
अकबर का सपना सच ना हुआ हम याद करते रामप्रसाद चेतक की स्वामिभक्ति !
जिसकी वीरता के किस्से कहते हल्दी घाटी की पावन माटी !!

सरोज दुगड़ 
खारूपेटिया, गुवाहाटी
असम
 🙏🙏🙏


“अग्नि शिखा मंच का अभिवादन अभिनंदन करते मै अनिता शरद झा अपनी हिंदी और छत्तीसगड़ी में रचना प्रस्तुत है 

लघुकथा 
थोथा चना बाजे घना “
   प्रकृति हरियाली नव रूप शृंगार किया है 
शबरी की कुटिया का रूप निखर आया है 
गाँव में सोनी, मोनी के नृत्य, गीत की बहार थी। उनके बिना गाँव का कोई भी मंगल उत्सव निरर्थक लगता,भले ही उनकी गिनती 'नाच ना आये आँगन टेंढ़ा में होती।' 
शगुन में उन्हें जो भी मिलता जीवन यापन चलता।
 सोनी मोनी हिजड़े जो थे, पर नायक नायिका का रोल बखूबी करते।
एक दिन गाँव में 'थोथा चना बाजे घना' फ़िल्म की सूटिग़ हो रही थी। फिल्म के निर्माता, निर्देशक ने सोनी, मोनी के नाच- गम्मत देख उन्हें अपने साथ ले जाने का विचार बना लिया। 
"अब हमें ना कहना -नाच ना आये आगंन टेढ़ा, देखो हमें हीरो- हीरोईन का रोल दे रहे हैं।" 
तभी गाँव के वृद्ध ने कहा - “घुरवाँ के दिन बहुर गे।" 
अनिता शरद झा मुम्बई
"ग़

*विषय- मेरा मन ( कविता )*

मन मेरा था जो सच्चा था
सुनता सबकी रहा सदा...
मेरा मन,बस मेरा न होकर
सबका होकर रहा सदा...

मेरे अंतर्मन में जाने
कितने भाव उमड़ते है
कितने सपने जिंदा हैं ...
कितने सपने अधूरे हैं...

पर,मन को इतनी फुर्सत कहां
जो अंतर्मन से पूछे मन...
सबकी खुशयों में वो खुश 
सबके मन सा रहता मन...

कभी ढोता शब्दों की गरिमा
कभी शब्दों से ही बिंधता रहा
पर, कहने से सकुचाता ऐसे
जैसे हो किसी दुल्हन का मन...

मन की व्यथा ,मन ही जाने
मन पीर पराई कहता रहा सदा
मेरा मन, बस मेरा न होकर
सबका होकर रहा सदा..

         *मीना गोपाल त्रिपाठी*
        *कोतमा, अनुपपुर,(मध्यप्रदेश)*
         *स्वरचित*


कैसे 



गीत प्रीत के गाऊँ मैं

श्रृंगार रस की धारा कैसे, हृदय में बहाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी कैसे गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
               समय नहीं मधु गीतों का, 
               जब आग लगी हो सीने में। 
               भारत माँ अपनी रोती हो, 
               कैसे सूझे मधु पीने में? 
चूड़ी, कंगन, महावर के फिर, कैसे गीत सुनाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                जब महामारी ने आकर, 
                अपना जाल बिछाया हो। 
                 डरा-डरा सा सहमा सहमा, 
                 हर मन जब भरमाया हो। 
कैसे सूझे आलिंगन की, कैसे प्राण रिझाऊं मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                जब फूल टूटते उपवन से, 
                आंखे नम हो ही जाती है? 
                प्राणों से प्राण बिछुड़ते जब
                 सुध- बुध खो ही जाती है। 
बसन्त बहारें मलय पवन में, आंचल कैसे लहराऊं मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                  मधुर मधुर संगीत सुहाना, 
                  मुझको भी तो भाता है। 
                  पर जब माटी सिसके अपनी, 
                   दिल मेरा भर आता है
फिर भी तुम कहते हो मुझसे, गीत खुशी के गाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 

      
डा. साधना तोमर   
 बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश


'बहार '
बहार बन के आयी तू मेरी जिंदगी में 
अनदेखे सपने पल्लवित हुये मुझ में 

मन में अनोखा आनंदानुभव 
अनुयायी हूँ अनुरक्त तुझ में 

प्रेम राग गाया पपिहा तेरेलिए 
पयोद देगा प्रेय -पयाम तुझे

परेवा देगा पन्नी में लिखा प्रेम खत 
पलिका अंबर में बैठ के आ जा 

मिलेंगे दोनों शशि किरण में 
चहल -पहल, करते अगल -बगल में 

चारु -चंद् की शीतल रश्मि बुला रही है 
ओ मेरे चंद्रिका हो जाये जलवा! 

डा सरोज मेटी लोडाया 'आश्विन '
ज़ल "
मुझसे देखी नहीं जाती किसी की जुदाई ।
शाख़ पै बैठे परिन्दों को उड़ाऊॅ कैसे ।
लोग पढ़ लेते हैं दिल की जुबां नज़रों से ।
एसे आलम में दिल का राज़ छुपाऊॅ कैसे ।
मुझको हर ख्वाब-ए-ताबीर से डर लगता है ।
भीगी पलकों पे कोई ख्वाब सजाऊॅ कैसे ।
खबर है किसे मर्ज़ ए-इश्क लगा है मुझे ।
अपने  आँसुओं का सबब बताऊँ कैसे 
आग सुलगती है दिल में उसकी बेरूखी से ।
इस दिल की तपिश को अश्कों से बुझाऊँ कैसे ।
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)



मैं गीत खुशी के गाती हूं 
************************************
मैं गीत खुशी के गाती हूं,
चाहे जैसा भी मौसम हो ,
हर मौसम को सह जाती हूं,
 हूं मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

हमेशा कष्टों से बचाता ,
हमारा यह परिवार है ,
बट वृक्ष ही परिवार के ,
मूल का आधार है ,
प्यार पनपता है जहां ,
मिलता हमें संस्कार है ,
कुम्हार हाथों से देता ,
घड़ों को आकार है ,
सबके सपनों को साकार करने ,
आशा के दीप जलाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

माला के बिखरे मोती को ,
एक सूत्र में मैं बांधूंगी,
 प्रेम की माटी से नफ़रत की,
 खाई को मैं पाटूंगी ,
  उगी हुई है बेल विषैली ,
उनको भी मैं छांटूंगी ,
औरों के ग़म को लेकर मैं,
 अपनी खुशियां बाटूंगी ,
मर्यादा की चादर ओढ़े,
अपना फर्ज निभाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

संकल्पों के पंख लगाकर ,
हम नई चेतना लाएंगे ,
चुनौतियों को लक्ष्य बना ,
आगे ही बढ़ते जाएंगे ,
स्वर्ण रश्मियों के संग,
हम नया सवेरा लाएंगे,
 समय की साक्षी बनाकर,
 नया इतिहास रचाएंगे ,
मन की वीणा में सरगम की,
 झंकार भरती जाती हूं,
 मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी
619अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक,
 इंदौर म.प्र. मोबाइल 8989409210



अग्निशिखा 
नमन मंच
दिनांक --13/6/2021

इंद्रधनुष (हर रंगों की अपनी कहानी)
******* 

रवि की किरणे पड़ती अंबर पर
 विचरते पानी के छल्लो पर जब
 छल्लो से विचरता रवि का प्रकाश
 सप्त रंगों में बट जाता है तब 
 सात रंगों की माला में गुथ
अंबर में इंद्रधनुष बन जाता है !

    समीर नीर अंतरिक्ष
      सब होते रंगहीन   
      जीवन में प्रकाश 
     करता है हमें रंगीन !

  इंद्रधनुष की कथा पुरानी 
  सुनने में लगती प्यारी 
एक माला में गुथी हुई पर
 हर रंगों की अपनी कहानी!
जीवन में रंगों का प्रभाव 
    इस कदर है छाया 
    हर जीवो के अंदर 
   उत्साह और उमंग लाया !

    उमंग की हवा में बहकर
     सपनों को है सजाता 
  तीज त्योहार का आनंद ले
 खुशीयों को है रंगीन बनाता !

     होली के हुड़दंग में 
    लाल पीले रंगों के संग 
   खुशियां देता और बटोरता
   भावनाओं के रंग में बहता! 

   लाल रंग खतरे की घंटी
    लाल रंग उर्जा भी देता
    दोनों गुण संग लेकर भी
   जीवन को है रंगीन बनाता! 

  पीली पीली सरसों जब खिलती      
   प्रकृति भी खिलकर उठती
  पीली हल्दी का महत्व है अपना
       हर कार्य में पवित्र 
       और शुभ कहलाती !

    मन को शीतलता दे जाता
         रंग हरा ऋंगार दे
   सौभाग्यवती नारी का सौंदर्य बढ़ा
   ऋंगारित कर नारी मन को 
       आनंदित करता ! 

   नीले रंग का अपना महत्व है

  रत्नाकर और अंबर भी नीला
   नयनों को सुख देता है जब
   नीर भी लगता है नीला मानो
     अंबर आया है धरा पर! 
  
श्वेत रंग शांति का प्रतीक 
 सहज सरल विचार है लाता
 मन को हमारे शांत करके
 सात्विकता हममे भरता! 

था गोकुल का कान्हा काला 
बरसाने की राधा गोरी 
भावनाओं का रंग सच्चा हो तो
  प्रेम पुष्प खिल आते हैं फिर,
  
अपशकुन कैसे कहलाए रंग काला !

 रंगो का महत्व लिखने बैठूं तो
      कई रंग मिल जाते हैं
    शब्दों के रंग, भावों के रंग
   मेरी कविता में बस जाते हैं! 

            चंद्रिका व्यास
          खारघर नवी मुंबई




हाल ए दिल (मेरा गीत)

मुस्का रहे हैं लव ये,
फिर आंँखें नम सी क्यों है ।
लगती हर खुशी अब ,
ना जाने कम सी क्यों है ।

कोई यहांँ है अपना ,
ये तो बस भरम है ।
कर ले जतन कोई भी ,
दर्द होता नहीं ये कम है ।

लगता है मानो अब तो,
सांँसे रही ये थम है ।
खुले राज न लबों से ,
तुझको मेरी कसम है ।

चुभती है रोशनी ये,
भाता मुझे तो तय है ।

शिकवा ना तुझझे कोई ,
न गिला कोई सनम है ।
मिलता है सबको वो ही ,
जिसका भी जो कर्म है ।

कोई यहांँ है अपना ,
ये तो बस भरम है ।
मुस्कान रहे हैं लब ये ,
यह फिर आंँखें नम सी क्यों है।

लगता हर खुशी अब ,
न जाने कम सी क्यों है।
लगता हर खुशी अब ,
न जाने कब से क्यों है।।

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️


विषय... जिंदगी
दिनांक...13/6/2021

जब से रहा न साथ तेरा जिंदगी के साथ।
दिल का सुकूँ भी खो गया लब हँसी के साथ।।

जो चल रहा था साथ कभी साये की तरह।
कल वो मिला है मुझको किसी अजनबी के साथ।।

झूठी मुहब्बतों के उजाले न दो मुझे।
मैं खुश बहुत हूँ अपनी इसी तीरगी के साथ।।

तुमको तो रास आ गयी महलों की रोनकें।
मैं जी रहा हूँ अब भी मगर बेबसी के साथ।।

आज़ाद जिसके वास्ते सब कुछ गंवा दिया
मुझसे मिला है वो भी बडी बेरुखी के साथ।।
*डा.महताब अहमद आज़ाद*
उत्तर प्रदेश


🌸🌸🌸🌸 एक रचना
******  
बेटी नहीं मात्रकाया है ,
वह ममता का दृश्य रूप है।।
 कठिन सर्द की ठिठुरन में वह 
सुखदाई कुनकुनी धूप है।। बेटी नहीं मात्रकाया है।।***

 मां के वक्षस्थल से लगकर दुख उसका वह हर लेती है झांक पिता के विवश नयन में,
 सारी स्थितियां पढ़ लेती है,
 अंतर्मन की पीर समझती 
करुणा का पावन स्वरूप है ।।
बेटी नहीं मात्र काया है 
वह ममता का दृश्य रूप है।।1
 बप्पा मां के लिए दौड़ कर पीहर से मैं के आती है 
आना जाना कठिन काम है,
 फिर भी अनुपम सुख पाती है 
उसे पता है प्यार बिना यह मानव जीवन अंधकूप है।। बेटी नहीं मात्र का आया है वह ममता का दृश्य रूप है।।2
 पूजा घर में जली धूप सी, घर आंगन महका जाती है कैसे हैं व्यतीत करना दिन माता को समझा जाती है सुन लेती दोशब्द नेह के पा जाती थाती अनूप है।।
 बेटी नहीं मात्रकाया है ।।3
पति के मां को मां कहती है बाबा को बाबा कहती है सरस नदी की तरह कगारों बीच नित्य कलकल बहती है ,
जीवन की वह सेतु सुघर है,
 कहीं नहीं कुछ भी कुरूप है।।
 बेटी नहीं मात्रकाया है।।4
🌸




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