Monday, 28 June 2021

अग्निशिखा मंच पर लघुकथा_doctor Alka Pandey

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बाललघुकथा

*ना जीता ना कोई हारा*
     
       चिंटू खरगोश बड़ा दुखी था
ना कुछ खाता ना कुछ पिता, अपने मन  में सोच रहा मैं गोलू कछुआ से कैसा हार गया हूं। काश मैं रास्ते में सोता नहीं तो मैं हारता नहीं था ।लग रहा था तालाब में डुबकर मर जाऊं।
     फिर लगा , मेरे छोटे छोटे बच्चों को हरा हरा घास कौन खिलाएगा? चिंटू खरगोश अपने दादा के पास गया , दादा मैं गोलू कछुआ से रेस में हार गया हूं।
दादा ने कहा कोई बात नहीं तू  नींद एवं अतिआत्मविश्वास  रेस  हार गया,। अब तू फिर से रेस लगा के गोलू कछुआ को हरा देना हिसाब बराबर,
     चिंटू बड़े खुशी खुशी गोलू कछुआ के पास आया और बोला एक बार फिर से रेस लगाऐगे ,गोलू कछुआ ने नहीं नहीं
मैं नहीं लगाऊंगा, फिर गोलू कछुआ ने मैं कल बताऊंगा यह कहकर गोलू कछुआ अपने दादा से मिलने तालाब में गया, गोलू को देखकर,  साठ साल के दादा ने कहा, क्या बात है गोलू, गोलू ने कहा दादाजी चिंटू फिर से रेस लगाना चाहता। मैं क्या करूं ? रेस लगाता हूं तो मैं हार जाऊगा यह बात तय है।"कहा  राजा भोज, और क्या गंगु तेली, फिर अपने तजुर्बे के साथ कछुए के दादा ने कहा रेस लगाओ, बीच में नदी है,उसके बाद जो नदी के दुसरे किनारे जो आम पेड़ है उसके पास जो पेड़ है । उसके पास जो पहले पहुंचेगा वह जीत जायेंगा
     यह सुनकर जब दुसरे दिन चिंटू खरगोश ने पूछा, रेस लगाएंगे 
गोलू ने कहा , नदी के दूसरे किनारे जो आम पेड़ है वहां पहले जो पहुंचेगा वह जीत जाऐगा। चिंटू को जीतने के जीद के आगे किसिका ख्याल नहीं आया,
  सब खरगोश एवं सभी कछुऐ 
रेस की जगह आ गये चिंटू खरगोश बड़ा खुश था हार का बदला लेने का समय आ गया
रेस शुरू हुयी चिंटू खरगोश हवा से बाद करते तेजी भाग गया,
बेचारा गोलू कछुआ धीरे धीरे दौड़ रहा था। जब नदी के किनारे चिंटू खरगोश पहुंचा तो नदी में पानी देखकर घबराए किनारे पर बैठ गया पानी से चिंटू खरगोश बहुत डरता था समझ नहीं रहा क्या करें। 
     तभी देखा धीरे धीरे गोलू कछुआ नदी के किनारे आ रहा है 
जब नदी के किनारे दोनों आये
क्या बात है चिंटू , कुछ नहीं नदी में बहुत पानी है आम पेड़ नदी के दूसरे किनारे हैं "हंसते हंसते गोलू कछुऐने चिंटू खरगोश को बोला, "कोई बात नहीं मेरे पीठ पर बैठ जा,यह सोचकर चिंटू गोलू के पीठपर बैठ गया । जैसा ही दुसरे किनारे के पास पहुंचा तो चिंटू ने उतर कर भाग रहा था, तब गोलू ने चिंटू आवाज दी रूख जा ,
चिंटू रुक कर क्या बात है गोलू
तू पानी से डरता था यह बात मुझे मेरे दादा ने बतायी, है ना कोई हारा ना कोई जीता, तब से चिंटू खरगोश एवं गोलू कछुआ अच्छे दोस्त बने।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक 28/06/2021
[28/06, 19:26] Alka: बाल कथा
निर्दोष को सजा क्यो ?             
     कथा- अलका पाण्डेय 

एक शिकारी शिकार के लिये निकला कुछ दूर निकलने के बाद उसे सुस्ती आने लगी उसने विचार किया थोड़ा विश्राम कर लेता हू फिर आगे जाता हू !
और उसने एक छायाकार पेड के नीचे लेटकर चादर ओँढ ली पेड की शीतल हवाओ ने उसे सुला दिया वह गहरी नींद में सो गया तभी एक कौवा डाल परबैठा और बीट कर दी बीट ने शिकारी की चादर गंदी कर दी कौवा तो उड़ गया थोड़ी देर मे वहाँ पर उसीजगह एक हंस आकर बैठ गया  तभी थोड़ी देर मे शिकारी नींद से जागा उसने अपनी चादर गंदी देखी व ऊपर हंस को बैठे पाया अब आव देखा न ताव झट से गन उठाई व हंस पर दाग दी हंस वही ढेर हो गया , पास में एक संत ध्यान में मग्न थे , उन्होने शिकारी की तरफ देखा और उठ कर उसके पास आये , बोले बेटे आपने क्रोध में आकर एक निर्दोष प्राणी की हत्या कर दी है आपका गुनाहगार तो कौवा था जो थोड़ी देर पहले यहाँ आया था उसने ही बीट किया और हंस का अपराध यह था कि बेचारा उसकी जगह पर आकर बैठा था और कौवे की सजा पा गया ,पर में आपसे कहता हूँ यह जगह पक्षी की है आपने उनके क्षेत्र का अतिक्रमण किया और बिना कुछ जाने जान ले ली निर्दोष की 
अब शिकारी को बहुत पछतावा होने लगा और उसने एक सबक़ भी सीखा की कौवे जैसे दुष्ट जीव की जगह पर बैठने मात्र से हंस जैसे सीधे साधे पंछी को जान गँवानी पड़ी !
इसका मतलब यह हुआ की दुष्ट लोगो की संगत से दूर रहना चाहिये उनके साथ एक जगह बैठना भी नही चाहिये वर्ना निर्दोष होकर भी हंस की तरह सजा पा सकते हो !
शिकारी संत के क़दमों में गिर कर माफी माँगने लगा और उसने प्रण कर लिया की आज के बाद शिकार का शौक़ को तिंलाजली दे देगा ,संत ने उसे आशिर्वाद देकर विदा किया 
अलका पाण्डेय - अगनिशिखा 
9920899214


*अभिलाष*

" मेडम.. मेडम आपको प्रिन्सिपाल बुला रहे हैं ?" चपरासी ने बताया तो तुरंत प्रिन्सिपाल के तरफ आगे बढी। सर किसी के साथ बात कर रहे थे। मुझे देखते ही -"आईए मेड़म बैठिए , ये पेरेंट्स दुबैई से आये हैं इनका लड़का आठवीं कक्षा की अडमिशन के लिए यहाँ आये।" मैं भी उधर ही रखी कुर्सी पर बैठी ,लड़का थोडी दूर में बैठा था। *मेड़म लड़के का नाम है अभिलाष, पहली बार रेसिडेन्सियल स्कूल में पढने आया है आप इस पर थोडा़ ध्यान दे।" अभिलाष के पिताजी बोले। तब हमारे प्रिन्सिपाल  उनको उत्तर देते हुए बोले." आप चिंता मत कीजिए सर्,  मेड़म हमारी पाठशाला में सिनियर मेड़म हैं और बच्चों के साथ ज्यादा लगाव हैं ,प्रेम से बच्चों की मनोबल बढाती हैं।" पेरेंट्स  प्रिंसीपाल की बात पर खुश होकर- "ठीक हैं सर् हम हम चले जाते हैं ।" पेरेंट्स निकल रहे थे ।माँ  तो पत्थर की मूर्ति सी खडी़ थी ।पिता ही बेटे के कंधे पर हाथ रख कर उसे सा़त्वन करने बाहर गये। मुझे तो अजीब लगा ,मैं ने कितने पेरेंट्स को देखा  था,उनमें माँ  बच्चों जैसी रोती रहतीं थीं। बच्चों से बिछुडना बहुत मुश्किल हो जाता था।पर यहाँ माँ मौन ही नहीं चेहरे पर कोई  दुःख की भावनाएँ नहीं दिख रहीं थी। मुझे और काम  था इसलिए वहाँ से निकली। अडमिशन होकर चार दिन हो गये थे। शाम के समय मैदान में सभी बच्चें खेल रहे थे।मैं और मेरी सहउद्धोगी के साथ चाय पीने जा रही थीं। नज़र उस तरफ पडी़ जहाँ अभिलाष अकेले एक राॉक पर  बैठे आसमान के तरफ देख रहा था।मैं चाय पीने से पहले अभिलाष के तरफ बढी, चेहरे पर उदास छा गया था। अभिलाष ..अभिलाष बुलाई तो उसका ध्यान मेरे तरफ नहीं आया ।फिर मैं ही उसके कंधे पर हाथ रखी तो ,"साॅरी मिस ,आई एम वेरी साॅरी "। नज़रे जमीन पर पडी़    आँखों में दुःख स्पष्ट दिखायी दे रहा था ।"अभिलाष क्या हुआ ? बताओ क्यों अकेले उदास यहाँ बैठे हो ? सब खेल रहे हैं न  ? तूम भी जाओ ,बोली तो रोने लगा,मैं ने उसे सांत्वना करते माँ की याद आई क्या पूछा तो माँ है ही नहीं मिस सिर्फ पिता है,उसकी बात पर मैं चौंक गयी ।"अभिलाष उस दिन तुम्हारी माँ आई थी ।"नहीं मिस मेरे पिताजी दुसरी शादी की है ,मेरी माँ को मैं ने देखा ही नहीं ।"उसकी आँखे भर आई। बोला कि पिताजी मुझे बहुत प्रेम करते
 थे ,अब ये माँ आने के बाद मुझे इधर आना पडा़ ,क्योंकि वो माँ को मैं पसंद नहीं है।" और अब से मैं दुबई नहीं जाता छुट्टि में चाचा या ताऊ आकर ले जाते हैं। मुझे माँ की याद बहुत आ रही है मिस इसलिए आसमान में ढूंढ रहा था।" सिसकने लगा ।मेरी आँखे भी नम हुई उसे हाथ पकडकर चाय पीने गयी। मेरे तरफ अभिलाष माँ की ममता पा रहा था लगा।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय।



🌹🙏नमन मंच🙏🌹
  🌴लघु बाल कथा🌴
🌿दिनांक 28/6/21🌿
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रचनाकार -डॉ पुष्पा गुप्ता, मुजफ्फरपुर बिहार -
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    बच्चों  के स्कूल जाने  समय  माँ  टिफिन पैक करने के लिए टिफिन बॉक्स 
ढूँढ  रही थी,,मिल ही नही रहा था।सोनी का तो था, लेकिन पिन्टू का गायब था।
 माँ ने पिन्टू को आवाज लगाई, --" बेटा  
पिन्टू तुम्हारे  बैग में  टिफिन बाॅक्स नही दिख रहा है , जल्दी  दो, स्कूल बस आ जाएगी ।"
       माँ  ने सोनी का टिफ़िन थमाते हुए,,
बेटे के लिए दूसरे डब्बे का इन्तजाम कर रही थी । दूसरा टिफिन धोने में समय लग रहा था । फिर भी धो - धाकर दूसरा टिफिन बाॅक्स  माँ ने  उसे दिया और पूछा कि वह टिफिन बाॅक्स कहाँ  छोड़ दिए हो?
   पिन्टू ने डरते-डरते माँ से बोला कि "आज मै उस टिफिन  बॉक्स को भी लेता आऊँगा , बात यह थी न, मम्मा मेरा दोस्त है न ,राजू -उसका टिफिन  गिर गया था ,
तो मैंने अपना  खाना उसे दे दिया था ।"
      माँ  ने बड़े  प्यार से उसे समझाया  कि यही बात तुम्हें कल ही कह देनी चाहिए थी
 , यह तो तुम ने अच्छा किया।"
    इतने मे,  स्कूल बस आ गई ,,,,,दोनों
भाई- बहन स्कूल बस में सवार  हो गये, बस चल दी ।
    माँ  मन ही मन मुस्कुरा रही थी ।
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स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार -डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार --


अग्नि शिखा मंच 
दिनांक 28/07/2021
विषय- स्वैच्छिक 
बाल लघुकथा 
पत्थर और मिट्टी 
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एक बार दो दोस्त यात्रा कर रहे थे। एक दिन रास्ते में झगड़ पड़े। एक ने दूसरे को तमाचा लगा दिया। जिसे तमाचा मारा उसे गाल से ज्यादा दिल पर चोट लगी। 
  उसने जाकर मिट्टी पर लिखा,आज मेरे प्रिय दोस्त ने मारा। इसके बाद भी दोनों दोस्तों ने यात्रा जारी रखी। दोनों एक नदी किनारे पहुंचे,दोनों ने नदी में नहाने का फैसला किया। तभी अचानक दूसरा दोस्त (जिसे पहले वाले ने मारा था) नदी मैं डूबने लगा।

  दोस्त को डूबता देखकर उसे बचा लिया।जान बचने के बाद इस बार उसने पत्थर पर लिखा, आज मेरे दोस्त ने मेरी जान बचाई।
   दूसरा दोस्त बोला जब मैंने तुम्हें मारा तो तुमने मिट्टी पर लिखा,और जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तो तुमने पत्थर पर 
लिखा।तब दोस्त ने जवाब दिया जब तुम्हें कोई तकलीफ पहुँचाये तो मिट्टी पर लिखो।ताकि माफ़ी की हवाएं मिटा सके। लेकिन जब कोई तुम्हारे लिए कुछ अच्छा करें। तो तुम उसे पत्थर पर लिख दो। ताकि वह हमेशा के लिए बना रहे।

रजनी वर्मा 
भोपाल


बाल लघु कथा_चिड़ियाघर की सैर। अ. भा. अग्निशिखा मंच
विषय_बाल लघुकथा।
_चिड़िया घर की सैर_
श्रीमती उषा रानी का पोता ६_७ वर्ष का हो गया था।वे उसे बहुत प्यार करती थीं।एक दिन बोलीं 
चल तुझे रानीबाग दिखाकर लाऊं।उषा जी ने सोचा ये जानवरों को देख लेगा,उनके बारे में जान लेगा,इसका मनोरंजन भी हो जायेगा।उषा जी रिटायर्ड स्कूल प्रिंसिपल थीं इसलिए यहां से भी शिक्षा ग्रहण करने का उद्देश्य सामने आ गया।
    वे अपने पोते गुड्डू को लेकर रानी बाग पहुंच गईं। दादी ने मुन्नू को बताया यहां अनेक प्रकार के जानवरों को पिंजरे में रखा जाता है।सबसे पहले वे भालू देखने गए।काला,मोटा,खूब बालों वाला भालू अपने पिंजरे में यहां से वहां घूम रहा था ।मुन्नू भी बाहर भालू के साथ साथ दौड़ने लगा।फिर वे नटखट बंदरों को देखने पहुंचे जो एक डाल से दूसरी डाल पे कूद रहे थे, किर _किर कर रहे थे।दादी ने मुन्नू से कहा बंदर को देखकर सअपनी कमर खुजाओ,उसने ऐसा ही किया उसे देखकर बंदर भी अपनी कमर खुजाने लगा,ये देखकर मुन्नू भी तालिया बजाने लगा।इतने में उन्हें शेर की दहाड़ सुनाई दी,वे उस तरफ दौड़े,देखा तो वनराज सिंह मजे से टहल रहे थे,उन्होंने एक गर्जना और कर दी मुन्नू डरकर दादी से लिपट गया।दादी बोलीं डरो मत देखो _कितनी बड़ी दाढ़ी,मजबूत शरीर,छोटी पूंछ ,पर ये जंगल के राजा कहलाते हैं।
      दादी बोलीं चलो अब पंछी देखेंगे। वे सबसे पहले मोर देखने पहुंचे। बाड़े में कई मोर_ मोरनी थे।सबसे बड़े मोर ने नाचना शुरू कर दिया,जब उसने अपने पंख खोले तो सबने तालियां बजा दीं,ये देखकर मुन्नू ने भी तालियां बजा दीं।फिर उन्होंने अगले पिंजरों में तोते,कबूतर,चिड़िया, गौरैया,लव बर्डस देखे।
     अंत में वे पेंगुइन का घेरा देखने गए।नन्हें _नन्हें पेंगुइन को विदेश से लाया गया था,उनके लिए विशेष ठंडे तापमान का कांच का कमरा जैसा बनाया गया था ।उसमे एक छोटा सा तालाब बनाया था पेंगुइन उसमें जा_आ रहे थे।उनकी चाल देखकर मुन्नू को बहुत मजा आया।
    शाम हो चली थी।मुन्नू को भूख लग आई।दादी ने घर से लाए हुए नमकीन,बिस्किट खिलाए,पानी पिलाया ।
    दादी ने मुन्नू से कहा "देखो जैसे हम इस पृथ्वी पर रहते हैं वैसे ही इन पशु_पक्षियों को भी रहने का पूर्ण अधिकार हैं,हमें इन्हें हानि नहीं पहुचानी चाहिए।"मुन्नू ने ऐसे सिर हिलाया जैसे सब समझ गया हो।फिर वे घर की ओर लौट चले।
     इस प्रकार मुन्नू की जानवरों से मुलाकात हो गई।मुन्नू आज भी उस दिन को याद कर खुश हो जाता है।हमें बच्चों को ऐसी सैर करानी चाहिए।
स्वराची मौलिक बाल लघुकथा
रानी अग्रवाल,मुंबई द्वारा लिखित।२८_६_२०२१.

नमस्ते में ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु मैं मेरी लघु कथा प्रस्तुत करती हूं।
विषय- बाल लघु कथा।

डॉली नामक एक लड़की थी। उनके घर पालतू प्राणी बहुत पसंद थे। और उस डाली को भी लव बर्ड्स यानी कि प्रेम पंछी बहुत पसंद थे। डॉली ने अपने घर वालों को जीद कर कर लव बर्ड्स/प्रेमा पंछी लाने के लिए कहा। डॉली की ज़िद्द देखकर उसके पिताजी ने घर पर पालने के लिए प्रेम पंछी लाए। 
    डॉली उन पंछियों का बड़ा ख्याल रखती थी। बहुत सा समय उनके साथ बिताती थी। वह उनकी हर एक बात को ध्यान से देखती थी। उसे बहुत ही ताज्जुब और विस्मय होता था,कि कैसे यह दोनों पिंजरे में इतने प्यार से रहते हैं, सदा के लिए एक दूसरे का ख्याल रखते हैं, और हमेशा एक दूसरे की चोंच से चोंच मिलाकर रहते हैं। उसे लगता था हम सब मिलकर घर में रहते हैं तब भी एक दूसरे के साथ लड़ते हैं पर यह दोनों प्रेम पंछी कितने प्यार से रहते हैं वह दोनों एक दूसरे के सिवाय रह भी नहीं सकते। 
    डॉली ने अपने प्रेम पंछी को एक प्यारा सा नाम दिया था जैसे कि उनके स्वभाव के समान, राजा- रानी यह नाम से वह उन्हें पुकारती थी। और वह दिखने को भी बहुत अच्छे थे । उन दोनों पर डॉली का बड़ा ही दिल बैठा था। 
उन्हें कुछ हुआ तो डॉली परेशान होती थी। 
    एक दिन उन पंछी को बच्चे होने वाले थे। इसीलिए उनमें से एक पंछी यानी कि रानी को उसने थोड़ा सा पिंजरे से बाहर निकाला। निकालते समय  पंछी राजा भी बाहर निकल कर आया और वह घर से बाहर सवार हो गया फिर बाद में घर वापस नहीं आया। इसीलिए वह बचे एक पंछी वह भी अकेला रह नहीं पाया। दोनों में इतना प्यार होने के कारण पंछी राजा चले जाने के बाद पंछी रानी भी दाना पानी नहीं ले रही थी। और ऐसे करते उसकी भी जान चली गई। और यह सब देख कर डॉली को भी बड़ा दुख हुआ वह भी अपने पापा के सामने रो रही थी। वह कहने लगी मेरे प्यारे पंछी मुझसे दूर हो गए। बहुत पसंद थे । और वह पंछी जाने के बाद 8 दिन तक गुमसुम ही बैठने लगी। 
     फिर बाद में घर वालों ने उसको कहा कि एक ना एक दिन बेटा उन्हें जाना ही था, यह तो प्रकृति का नियम है आने के बाद एक न एक दिन जाना ही पड़ता है। 
     और उन्होंने कहा की वह पंछी भी तुझे याद करते होंगे, कहीं से देख रहे होंगे। तो डॉली को थोड़ा सा अच्छा लगा, और उसने अपने पिता को कहा कोई बात नहीं पिताजी मैं अभी नई रोऊंगी, हम फिर से नए पंछी लाएंगे। 

धन्यवाद
पुणे


दिनांक   28/06/2021
   विषय:- शिक्षा का महत्व
    लेखक:-नरेन्द्र कुमार शर्मा 
                हिमाचल प्रदेश  
मंच        अग्निशिखा 

गर्मी के दिन दोपहर की तपती धूप,गांव में पानी के लिए कोहराम मचा था।सरपंच साहब ने सबको शांत करते हुए कहा।"सुनो गांव वालों",आज पानी की समस्या से निजात पाने के लिए कलेक्टर साहब कुछ देर बाद गांव में पहुंचने वाले हैं ।आज हम सभी मिलकर गावँ वाले उनसे पानी की मांग करेंगे।
ये सब बातें गांव के सबसे गरीब धनकु का बेटा भी सुन रहा था।धनकु का बेटा हाल ही में शहर के स्कूल से इंटर मिडीयट की पढ़ाई करके गांव आया था।
कलेक्ट साहब जैसे ही गांव पहुंचे सरपंच साहब उनके सम्मान में खड़े हो गए।कलेक्टर साहब थे तो अधिकारियों का उपस्थित होना स्वाभाविक था।सरपंच साहब ने पानी की समस्या पर प्रकाश डाला ही था कि कलेक्टर साहब ने आंगल भाषा अध्यापकों कुछ बतियाया।उन्हें मालूम था कि गांव में कोई भी अंग्रेज़ी समझने वाला कोई नहीं।सो अधिकारी गण कलेक्टर को गुमराह करने की कोशिश कर रहे थे।धनकु का बेटा उनकी चालाकी देख रहा था।
जैसे ही वे कलेक्टर साहब को अपनी बात कहकर समाप्त हो रहे थे,वैसे ही गांव वालों के बीच से एक पुराने कपड़ों के नौजवान खड़ा हो गया।वह अंग्रेजी में एक अधिकारी से कहने लगा।कि आप कलेक्टर को गुमराह कर रहे हैं,साहब को अगर हम सब पर विश्वास नहीं तो पानी के स्रोत पर चलें।कलेक्टर साहब को समझते देर न लगी।स्रोत पर पहुंच कर कलेक्टर साहब ने कहा कि इस लड़के ने अपनी बात वैसे समझाई है जैसे गागर में सागर।आज से ये लड़का सुपरवाईजर के पद पर तैनात किया जाएगा।
धनकु आज बेटे की तारीफ़ से तो खुश था ही पर सरकारी नौकरी के मिलने से उसकी खुशी का ठिकाना न था।और गांव वाले भी खुश थे चूंकि उन्हें अब हर रोज़ पानी आने की उम्मीद थी।

(लघुकथा)

सोमवार-बालकथाहाथ बंटाना
कोरोना में सभी को पस्त करके रख दिया था। बेबस और असहाय सब घर के अंदर लाकडाउन का पालन सभी के लिए अनिवार्य हो गया था । क्योंकि कोराना महामारी जानलेवा बिमारी है । इसलिए सभी को सुरक्षित रखने इससे बचाव के लिए लाकड़ाउन कर दिया गया था । अमीर तो किसी तरह रोजगार बंद होने पर अपना गुजारा कर लेते थे । लेकिन रोज की दिनचर्या वाले रोज कमाकर खाने वाले  की आफत हो गयी थी । बिन काम के रोजी रोटी की व्यवस्था बडी मुश्किल से करते थे ।कोरोना मे सबसे बड़ी समस्या गरीबों को थी । बच्चे बड़े कठिनाई से थोड़े से खाने में सब्र  कर  रहे थे  । लाकड़ाउन खुला तो मैं बाज़ार  सब्जी लेने गयी । बहुत दिनों से बिन सब्जी के खाना खाया नहीं जा रहा था । बाजार में देखी एक‌ दूबला पतला लडका अपनी मां के साथ सब्जी बेच रहा था।  उसे देखी तो मुझे दया आ गई। कि जिसकी उम्र  खेलने कुदने की है  वह अपनी मां के साथ जिम्मेदारी  का बोझ उठा रहा ।वह चिल्ला चिल्ला कर सब्ज़ी के भाव बता रहा था ।मैं उसके पास जाकर मटर के भाव पूछी ।वह 50 रू बताया और बाजू में  सब्जी वाले की ओर देखा फिर मेरी ओर मुंह करके धीरे से कहा ले लो दीदी कम लगाकर दे दूंगा ।मैं उससे मटर ले ली । और पास थे उन्हें भी लेने को कहा ।की ये बच्चा आज अपनी मां साथ सब्जी बेचने आया है कितने अच्छे से अपनी मां के काम में हाथ बटा रहा है कितने खुश होकर बड़ी उम्मीद से आज अपने सामानों को बेचने आया है ।उसके सामान खरीदने से उसे ख़ुशी होगी । कार्य के प्रति उसकी रूचि जागेगी ।नहीं तो निराश होकर घर में रहेगा  और खाली समय में कुछ कार्य न होने पर  गलत संगती और गलत काम में फसकर  बुरा व्यक्ति बन जायेगा ।ऐसा मेरे कहने पर सभी उसे देखे और कहा सही कह रही है आप । कहकर सभी उसके पास से पूरा मटर ले लिये । वह बहुत ‌खुश था । वह पैसे गिन रहा था ।मानो आज उसे बहुत बड़ी  सफलता मिली हो ।ताकि दूसरे दिन फिर वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाकर अपने मां के कामों में हाथ बंटाने के लिए बिल्कुल तैयार था 
यदी अपने आप से कोई कोशिश करता है आगे बढ़ने के लिए उसे बस थोडी सी मदद कर देनी चाहिए बाकी वह खुद आगे अपनी सिंढिया खुद से  चढ़ने लगेगा ।
नहीं तो दुनिया की रूसवाई से वह उम्मीद ही छोड़ देगा और सारी उम्र भटकता रहेगा ।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग जगदलपुर छत्तीसगढ़


लघु बाल कथा
शीर्षक-"बचपन "

रिमझिम मात्र 3 साल की थी। नर्सरी में पढ़ती थी। अभी अभी उसके पेंसिल रबड़ का काम शुरू हुआ था। वर्णमाला के काफी शब्द अच्छे से बना लेती थी ।क्लास में उसके पास ही उसकी सहेली याशिका बैठा करती थी। एक रोज रिमझिम ने उसके पास रंगीन रबड़ देखा ।उसे बहुत पसंद आया तो उसने उठाकर पहले तो उसे चारों तरफ से देखा फिर अपने पेंसिल बॉक्स में रख लिया। अब जब याशिका को रबर की आवश्यकता हुई तो वह चारों तरफ ढूंढने लगी अपना रबड़ ।तभी तपाक से रिमझिम ने अपना रबड़ निकाल कर उसे दे दिया ।याशिका पहले तो मना करती रही ,नहीं !मैं अपनी वस्तु ही काम में लेती हूं! आखिर कर ना मिलने पर हार कर उसे रिमझिम का रबड़ काम में लेना पड़ा ।काम करके वापस देते समय थैंक्यू भी दिया। वहअंतिम पीरियड था। छुट्टी की घंटी बजी सभी अपना अपना बैग उठाकर घर को चल पड़े। घर पहुंच कर नाश्ता दूध लेने के बाद रिमझिम की मां ने उसे पढ़ने बिठाया। लिखते लिखते उसे रबड़ की आवश्यकता पड़ी, तो वह बड़ी शान से वही रंगीन रबड़ निकालकर मिटाने लगी ।जैसे ही उसकी मां की नजर पड़ी तो वह तुरंत पूछ बैठी रिमझिम यह रंगीन रबड़ कहां से ले आई? रिमझिम ने बिना लाग लपेट के पूरा किस्सा मां को सुना दिया ।मां रेखा ने कहा यह तुमने अच्छा किया क्या? रिमझिम समझ गई कि यह मैंने अच्छा नहीं किया है ।मां कुछ कह नहीं रही है, पर मुझसे यह भारी गलती हो गई है ।थोड़ी देर खामोश रहकर रिमझिम मां से रोनी सूरत में बोली -सॉरी मां! मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी है और फिर कभी भी किसी की चीज नहीं लाऊंगी। कल मैं याशिका से क्षमा मांगते हुए उसका रबड़ लौटा दूंगी। मां ने कुछ देर खामोश रहकर ताली बजाते हुए रिमझिम के इस बदलाव को प्रशंसा में बदल दिया कैसा होता है बचपन. अच्छे बुरे की प्रेरणा बचपन से ही मिलती है ।इसलिए बचपन की करी गई गलतियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

स्वरचित लघु बाल कथा
स. स.11405/2020




अग्निशिखा मंच को नमन🙏
आज का विषय :-बाललघुकथा
*ना जीता ना कोई हारा*
     
       चिंटू खरगोश बड़ा दुखी था
ना कुछ खाता ना कुछ पिता, अपने मन  में सोच रहा मैं गोलू कछुआ से कैसा हार गया हूं। काश मैं रास्ते में सोता नहीं तो मैं हारता नहीं था ।लग रहा था तालाब में डुबकर मर जाऊं।
     फिर लगा , मेरे छोटे छोटे बच्चों को हरा हरा घास कौन खिलाएगा? चिंटू खरगोश अपने दादा के पास गया , दादा मैं गोलू कछुआ से रेस में हार गया हूं।
दादा ने कहा कोई बात नहीं तू  नींद एवं अतिआत्मविश्वास  रेस  हार गया,। अब तू फिर से रेस लगा के गोलू कछुआ को हरा देना हिसाब बराबर,
     चिंटू बड़े खुशी खुशी गोलू कछुआ के पास आया और बोला एक बार फिर से रेस लगाऐगे ,गोलू कछुआ ने नहीं नहीं
मैं नहीं लगाऊंगा, फिर गोलू कछुआ ने मैं कल बताऊंगा यह कहकर गोलू कछुआ अपने दादा से मिलने तालाब में गया, गोलू को देखकर,  साठ साल के दादा ने कहा, क्या बात है गोलू, गोलू ने कहा दादाजी चिंटू फिर से रेस लगाना चाहता। मैं क्या करूं ? रेस लगाता हूं तो मैं हार जाऊगा यह बात तय है।"कहा  राजा भोज, और क्या गंगु तेली, फिर अपने तजुर्बे के साथ कछुए के दादा ने कहा रेस लगाओ, बीच में नदी है,उसके बाद जो नदी के दुसरे किनारे जो आम पेड़ है उसके पास जो पेड़ है । उसके पास जो पहले पहुंचेगा वह जीत जायेंगा
     यह सुनकर जब दुसरे दिन चिंटू खरगोश ने पूछा, रेस लगाएंगे 
गोलू ने कहा , नदी के दूसरे किनारे जो आम पेड़ है वहां पहले जो पहुंचेगा वह जीत जाऐगा। चिंटू को जीतने के जीद के आगे किसिका ख्याल नहीं आया,
  सब खरगोश एवं सभी कछुऐ 
रेस की जगह आ गये चिंटू खरगोश बड़ा खुश था हार का बदला लेने का समय आ गया
रेस शुरू हुयी चिंटू खरगोश हवा से बाद करते तेजी भाग गया,
बेचारा गोलू कछुआ धीरे धीरे दौड़ रहा था। जब नदी के किनारे चिंटू खरगोश पहुंचा तो नदी में पानी देखकर घबराए किनारे पर बैठ गया पानी से चिंटू खरगोश बहुत डरता था समझ नहीं रहा क्या करें। 
     तभी देखा धीरे धीरे गोलू कछुआ नदी के किनारे आ रहा है 
जब नदी के किनारे दोनों आये
क्या बात है चिंटू , कुछ नहीं नदी में बहुत पानी है आम पेड़ नदी के दूसरे किनारे हैं "हंसते हंसते गोलू कछुऐने चिंटू खरगोश को बोला, "कोई बात नहीं मेरे पीठ पर बैठ जा,यह सोचकर चिंटू गोलू के पीठपर बैठ गया । जैसा ही दुसरे किनारे के पास पहुंचा तो चिंटू ने उतर कर भाग रहा था, तब गोलू ने चिंटू आवाज दी रूख जा ,
चिंटू रुक कर क्या बात है गोलू
तू पानी से डरता था यह बात मुझे मेरे दादा ने बतायी, है ना कोई हारा ना कोई जीता, तब से चिंटू खरगोश एवं गोलू कछुआ अच्छे दोस्त बने।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक 28/06/2021

अग्नि शिखा मंच, 
।बाल कथा। 
।फुर्र-लघुकथा।
गोलू एक भोला भाला लडका था। उसके घर में एक सुन्दर तोता था। वह तोते को पिजरे मे रखकर रोज उसको दाना पानी देता था। धीरे धीरे गोलू की दोस्ती उस तोते के साथ बहुत बढ गई। अब वह तोता गोलू के अलावा, घर के अन्य किसी सदस्य के हाथ से खाना नहीं खाता था। गोलू की उस तोते से इतनी दोस्ती बढ गई कि गोलू तोता को पिजरे के बाहर बुलाकर उसे खाना खिलाता था और वह तोता खाना खाकर वापस पिजरे में चला जाता था। तोता और गोलू का यह सिलसिला रोज नियम से चल रहा था। एक दिन गोलू ने तोता को खाना खिलाने के लिए पिजरे के बाहर बुलाया। तोता कटोरी में रखा खाना खाता था और इधर उधर मुह करके देख था। अचानक वह तोता पिजरे में वापस जाने के बजाय फुर्र से घर के बाहर उड गया।
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।


मासूमियत
   नीरु के घर में पापा के दोस्त रमेश अंकल और आंटी आये हुए थे। मम्मी और दीदी दोनों उनकी आवभगत में लगे हुए थे। उसकी सहेलियाँ बाहर खेल रही थी।नीरु  का मन हुआ कि बाहर जाकर खेले परन्तु मम्मी  से डर रही थी कि अगर बिना बताये चली गयी तो मम्मी बहुत मारेगी। मम्मी बहुत गुस्सेल थी।जरा सी गलती पर बहुत मारती थी फिर चाहे हाथ  में कुछ भी आ जाए डंडा, झाड़ू या चप्पल। बाहर से सखियों के खेलने की आवाज बार बार लुभा रही थी। अनु उसे अनेक बार बुलाने आ चुकी थी। 
नीरु ने सोचा कि जब तक मम्मी मेहमानों के साथ है वह  वापस आ जाएगी वैसे भी मम्मी मेहमानों के सामने तो कुछ नही कहेगी और खेलने बाहर आ गयी। थोड़ी देर बाद नीरु अन्दर आयी तो मम्मी गुस्से में थी, आंखें दिखा रही थी, धीरे से बोली, "जरा मेहमानों को जाने दे तब तेरी खबर लेती हूँ। " नीरु बहुत डर गयी थी। बार बार भगवान से प्रार्थना करती "हे  भगवान कुछ ऐसा करो कि मेरी मम्मी मुझे मारे नहीं। " सारी रात सो भी नहीं पायी।सुबह मम्मी उठी ही नहीं, दीदी मम्मी  को हिला डुला रही थी। उन्हें दौरा पड़ा था, वे बेहोश थी। डाक्टर को बुलाया, लगभग तीन घंटे बाद  वे सामान्य स्थिति में आयी।नीरु रोये जा रही थी। मम्मी ने उसे अपने पास बुलाया, "बेटे मैं बिल्कुल ठीक हूँ मत रो।" "मम्मी!  आपकी ये दशा मेरे कारण हुई। मैंने भगवान से कहा था कि कुछ ऐसा करो मम्मी मुझे मारे नहीं। इसलिए भगवान ने आपको बीमार किया।  मैं बहुत गन्दी हूँ, मुझे माफ कर दो। " "नहीं बेटा ऐसा कुछ नहीं है ।"उसकी मासूमियत पर सभी को हंसी आ गयी। 


यह मौलिक रचना है

डा. साधना तोमर
बडौत (बागपत)


लघु बाल कथा
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 गाड़ी सिग्नल पर रुकी ही थी, कि किसी ने फटाफट गाड़ी पहुंचना शुरू कर दिया, ध्यान से देखा तो समझ आया एक 6 -7 साल का बच्चा अपनी शर्ट उतारकर गाड़ी पोछ रहा था। मैं कुछ कहती इसके पहले ही ड्राइवर ने उसे डांटते हुए कहा जरूरत नहीं हैइसकी, चल भाग जा। ने कहा कि मैडम इसके शर्ट के बटन से स्क्रैच पड़ जाएगा और इससे कोई साफ नहीं होती गाड़ी,। मुझे उस मासूम से चेहरे को देखकर दया आ गई, मैंने उसे अपने पास बुलाया और ₹100 का नोट पकड़ाया, तो बोले नहीं रहा था काम किया ही नहीं तो पैसे क्यों?
 मेरे समझाने पर उसने पैसे ले लिए, चेहरे पर जो खुशी हुई उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकती थी, सुमन कह रहा था आज मैं पूरे घर के लिए खाना लेकर जाऊंगा और भरपेट खाऊंगा मुझे धन्यवाद दिया उसने। खुशी और संतुष्टि के जो भाव उसके चेहरे पर दिखे वह मुझे शायद कभी नहीं हुई थी, बड़ी-बड़ी बड़ी संस्थाओं में लाखों रुपए दान देकर के इतनी बड़ी खुशी कभी नहीं मिली।
 सच ही कहा है किसी ने-- भगवान को खुश करना है तो किसी बच्चे की मुस्कुराहट का कारण बनो।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना




मंच को नमन
विधा:- *बाल लघु कथा*
शीर्षक:- *गोलू* *के बचपन की यादें*

जब गोलू का जन्म हुआ उसकी नानी के गोद में आया उसी समय देख कर नानी ने गोलू नाम से संबोधन करने लगी। छः महीने के बाद नामकरण करने के समय भी इसी नाम की पुष्टि भी की गई।आज ४० साल हो गया अभी भी गोलू नाम से मशहूर है। ऑफिशियल विवेक है। लेकिन गोलू नाम से ज्यादा प्रभावित होता होता है।
उसके बचपन के कहानी बता रहा हूं। करीब 9-10 महीने का था धीरे धीरे घर मे चल कर रसोई घर से कुछ ना कुछ मुंह में डाल लेता और बहुत चाह से खाते रहता था। गोलू के मां इस बीच घर का काम निपटारा कर लेती ।एक दिन की बात है मरा हुआ छीपकीली चूस रहा था। अचानक उसकी मां और दादी देखें कर सोची मुंह में क्या है देखें जब पता चला की तब तुरंत कैजुअल्टी लेके चली गई। किसी तरह से अपने पति को ऑफिस में खबर कर दी।पति भी ऑफिस से छुट्टी लेकर अस्पताल पहुंचे। तब तक डॉक्टर दवा दे कर उल्टी करा चुके और सोने की दवा दे दिए। २४ घंटे ऑब्जर्वेशन में रखें। जब सब कुछ ठीक-ठाक रहा अस्पताल से रिलीज कर दिया गया। लेकिन एक सप्ताह के बाद इस तरह से पेट खराब हुआ की कोई दवा सूट नहीं कर रहा था। अंत में एक होम्योपैथिक डॉक्टर के पास लेकर ग्रे जन्म से पूरी बात आज तक यानि दो साल तक जानने के बाद दबा दिए जिससे फायदा हुआ और आज चंगे है।
विवेक अपने बचपन का उदाहरण बहुत चाव से अपने मित्रों को को सुना कर रोमांचित होते हैं।

विजयेन्द्र मोहन।

अग्निशिखा मंच 
विषय : लघु कथा

शरमाई सकुचाई सी रहने वाली विमला अक्सर लोगों के बहकावे में आ जाया करती थी । लोग उसकी सीधे पन का बहुत फायदा उठाते थे। वहीं उसकी सखी सुकन्या नाम से बिल्कुल विपरीत थी। उसे किसी की भी गलत बात बर्दाश्त नहीं होती थी ।
वह अक्सर विमला को समझाने की कोशिश करती थी कि तुम थोड़ी सा अपने आप को बदलो नहीं तो लोग तुम्हारा फायदा यूंँ ही जिंदगी भर उठाते रहेंगे । सुकन्या ने नाराजगी व्यक्त करते हुए विमला से कहा । विमला ने कुछ ना बोलते हुए मुस्कुरा दिया। विमला की इन्हीं आदतों की वजह से विमला के भाई बहन भी उसका मजाक बनाते थे । इसको तो कुछ भी बोल दो । इसे कुछ समझ नहीं आता। सारे कार्य इसके ऊपर छोड़ दो तो भी यह ऐसे ही करती रहेगी ।तो हमें क्या जरूरत करने की। इसी को करने दो सारे काम । हम आराम से बैठेंगे। ऐसा कहते हुए उसके भाई-बहन उसके ऊपर हंस दिए। सुकन्या को यह बात तनिक भी अच्छी नहीं लगी । उसने विमला से नाराजगी जताई। तो विमला ने मुस्कुराकर बात को टाल दिया।

 कुछ समय के बाद सभी एक रिश्तेदार के घर पहुंँचे । सुकन्या भी उनके साथ गई थी। वहांँ भी अपनी आदत के अनुसार विमला सभी कार्य में हाथ बटाती रहती थी, क्योंकि काम करने की वजह से हर काम में दक्षता हासिल कर ली थी ।

सभी ने विमला को हर कार्य करते हुए देखा । तो उसकी प्रशंसा करने लगे । यह बात उसके भाई बहनों को बिल्कुल भी अच्छी नहीं लग रही थी। उन्हें बहुत बुरा लग रहा था।  
वहांँ जाकर के भी विमला सारे कार्य कर रही थी जोकि सुकन्या को अच्छा नहीं लग रहा था। उसने विमला को कहा। तू यहांँ भी नहीं मानेगी ना सभी आराम से बैठे हैं। और तू सिर्फ काम ही में लगी रह। हर समय विमला ने सुकन्या के कान में धीरे से कहा यहांँ जो लोग बात कर रहे हैं थोड़ी देर बैठ कर उन बातों को सुनो । मैं आती हूंँ, और विमला काम करने के लिए चली गई । सुकन्या जब थोड़ी देर उन लोगों के बीच में बैठी तो उसने देखा कि सभी की जुबान पर सिर्फ और सिर्फ सुकन्या का नाम है । यह कितनी अच्छी लड़की है ना । सारे काम को कितनी खूबसूरती से और जल्दी निपटा देती है । सभी की जुबान पर सिर्फ विमला का ही नाम आ रहा था, तभी सुकन्या ने विमला को देखा । 
वह काम करके वापस आ गई। सुकन्या ने विमला के पास जाकर बोला- तो इसलिए तू सारे काम करती रहती है ।विमला ने कहा नहीं ,इसलिए नहीं ।

हम कोई भी काम करने के लिए अगर उसमें जुटते हैं ,तो वह निखार हमारे भीतर आता है ।हम किसी कार्य कोशिश करें तो उसमें परिपक्व हो जाते हैं। किसी भी काम को सीखना कोई गलत बात नहीं है। विमला ने मुस्कुराते हुए- सुकन्या को कहा , और फिर दोनों सखी गले मिली और एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए। फिर दोनों वहांँ से भीतर की ओर चली गई।

दोस्तों हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य हमें कोई ना कोई सीख दे जाता है, और अगर कुछ नहीं करता तो भी कम से कम उस कार्य को पूरा करने का हुनर सिखा कर चला जाता है ।।

धन्यवाद

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️ उत्तरप्रदेश गोरखपुर


💐 कक्षा तीन में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच में एक सुनीता नाम की बच्ची भी अध्ययन करती थी वह अपने आप में 6 मई से नहीं रहती थी लेकिन कुछ कारण समझ में नहीं आता था 1 दिन शिक्षिका ने देखा तो प्रत्यक्ष उस बच्ची को कुछ ना कहकर उसने जब मैदान में सभी बच्चे एक साथ खेलते थे और शिक्षिका अपने निर्देशन में खिलाती थी उस दौरान उस बच्ची को अज्ञात रूप से कुछ ऐसी टाइप कर दिए जो उसे खेल के दौरान करना पड़े तब वह कुछ जिसकी शरमाई और अपनी बातों कहने में डगमगाए शिक्षिका ने उसे पुनः दूसरा प्रयास करने का मौका दिया और इसके पश्चात कुछ और कुछ नहीं कहा 3 दिन के पश्चात उन्हें जब खेल खेल रहे थे बच्चे शिक्षिका उस दिन दूर से देख रही थी तो उसने देखा कि आज वह बच्ची खुलकर खेल रही है और अच्छे से सभी के साथ अपनत्व का भाव भी रख रही है इसका ने उसके परिवार के विषय में जानना चाहा तो पता चला कि उसके घर में उसकी मां का स्वर्गवास हो चुका था और बड़ी मां एवं दादी इत्यादि के बीच में वह बच्ची पल रही तो उनके कड़े शुभावी कारण उसके बाल मन में दहशत में अपना घर बना लिया था जिससे कि वह खुल नहीं पा रही थी उसको मौका प्रदान किया गया तो वह अन्य बच्चों के साथ खेलने लगी और सबसे हिल मिलकर रहती है एक दिन ऐसा भी आया जब एक बच्चा पेड़ पर झूला झूलते झूलते गिरा तो उसने उसे उठाया और उसकी देखरेख की तथा उसे पानी भी पिलाया और उसे सांत्वना देती रहेगी तुम्हें कुछ नहीं होगा तुम अच्छे हो जाओगे अभी डॉक्टर आने वाला है उसके हमदर्दी के शब्दों को सुनकर सभी बच्चों में एक नई प्रेरणा संचार होने लगी यह कच्ची उम्र की उसके भाव थी जो स्थान बनाती जा रही थी एक प्रयास से उसको कुंठा में जाने से बचाया जा सके

पुण्य का काम ( बाल कथा) ------ ओमप्रकाश पाण्डेय
दीपू बेटा यह क्या कर रहे हो? राजाराम जी ने अपने पौत्र दीपू, जो घर के सामने के लान में शीशम का एक नन्हा पौधा लगा रहा था, उससे पूछा. दीपू अपने बाबा के प्रश्न को अनसुना करते हुए बोला दादा जी पहले आप एक जग में जरा पानी ले आइये, इस पौधे में डालना है. राजाराम जी मुस्कुराये और अन्दर से पानी और एक जग ले आये और बोले दीपू बेटा पानी जरा धीरे से डालना और थोड़ा ही डालना और देखो पौधे के चारों ओर की मिट्टी कस कर मत दबाना , धीरे धीरे मिट्टी भरना. दीपू ने वैसा ही करके पौधे के चारों तरफ पानी डाल दिया.
अपना हाथ धोते हुए दीपू बोला दादा जी आप एक बात जानते हैं. राजाराम जी बोले बताओ बेटा. कल हमारे स्कूल में मास्टर साहब कह रहे थे कि हम लोग जिस कुर्सी और मेज पर बैठ कर पढते हैं न, उसका पेड़ किसी आदमी ने पचास- सौ साल पहले लगाया होगा और तब जाकर हमें आज यह लकड़ी मिली है. एक बात और बताऊँ दादा जी, जैसे अनाज केवल खेत में ही पैदा होता है वैसे लकड़ी केवल पेड़ से ही मिलता है और पेड़ केवल जमीन में ही होता है. अच्छे, राजाराम जी ने दिखावटी आश्चर्य से कहा. फिर राजाराम जी ने पूछा कि दीपू बेटा आपको इतनी अच्छी जानकारी किसने दिया. दीपू बोला दादा जी हमारे स्कूल में हमारे टीचर ने यह सब बताया है और यह भी कहा कि जिसके पास जितनी भी जगह है या अगर जगह नहीं है तो गमले में ही सही , कोई न कोई पौधा उसे अवश्य ही लगाना चाहिए.
बहुत अच्छे तुम्हारे टीचर हैं बेटा, यह बहुत ही पुण्य का काम है. अगर हमें इस दुनिया को विनाश से बचाना है तो हम सबको यह पुण्य का काम करना ही चाहिए.
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)

आदरणीय मंच को नमन युग परिवर्तन
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बेटा सुनील अमेरिका से लौटकर आया। पिता ने उसे बहुत पढ़ाया लिखाया था ।अपनी योग्यता के कारण उसे एक बड़ी टेक्निकल कंपनी में आमंत्रण दिया। और वह टेक्सास में गया। वहां सर्विस किया ।दो बेटे भी हुए ।बहू ने कहा-" पिताजी को माताजी को जाकर ले आइए।" बेटा आया। उसे लगा बेकार में यह लोग यहां पड़े हुए हैं। इन्हें हमारे साथ चल कर रहना चाहिए ।इतने बड़े घर की उपयोगिता इन के लिए क्या है ?ठीक से झाड़ू पोछा हो पाता है ।इसकी व्यवस्था ठीक हो पा रही है। उसने एक ग्राहक बुलाया और बातचीत किया ।आप मेरे साथ चल रहे हैं अमेरिका। "छोड़कर नहीं जा सकता मैं अपनी जन्मभूमि ।"बेटे ने कहा-" छोड़िए मैंने इस मकान को बेचने का निर्णय लिया है"। पिता ने कहा -+"तुम्हारी जो इच्छा "बेटे ने उन दोनों को वृद्ध आश्रम में रखवा दिया ।मकान बेच दिया प्रति महीने वृद्ध आश्रम को कुछ सहयोग दे दिय करता था। यह कृत्य करने के बाद वह अमेरिका चला गया पत्नी से बताया। वह कुछ ना बोली हंस कर चुपचाप रह गई। वृद्ध आश्रम में बहुत सारे वृद्ध थे ।सभी को अच्छा लगा एक मित्र और आ गया, किंतु रामनरेश अपनी पत्नी के साथ दुखी थे ।यह बेटे का कैसा विचार ,जो हमारी सेवा करने के लिए स्वयं तो हमारे साथ नहीं रह सकता था ,हमें हमारे घर से भी बेघर कर दिया।
*****
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी


सोमवार दिनांक**२८/६/२१
विधा**** स्वतंत्र
विषय ***बाल लघु कथा
         
 #** पराक्रम और प्रार्थना**#
              ^^^^^^^^^

     शिवलाल और लीलाबाई सामान्य लोग रोज अपनी सब्जी भाजी की दुकान लगा कर अपना जीवन गुजारा करते हैं । उन्हें दो पुत्र है ।एक है गणेश और दूसरा शाम । एक की उम्र है 8 साल और दूसरे की है 6 साल । आमदनी कम है फिर भी हंसी खुशी से यह परिवार जीता हैं । घर में खाने पीने की कोई कमी नहीं ।बच्चें स्कूल जाते हैं, खेलते हैं ,शरारत भी करते, आपस में लड़ते झगड़ते भी है । एक दिन यह हुआ कि त्यौहार के दिन मां ने बूंदी के लड्डू बनाए । बढ़िया खाना पीना हुआ और मां ने बचे लड्डू डब्बे में रखे और डब्बा ऊपर रख दिया । सामान्य परिवार में ऐसा होता है कि घर में जो चीज बनती है उसे दो-चार दिन खाते है। 
एक दिन यह हुआ कि बच्चों को लड्डू की याद आई । मगर उसे कैसे खाया जाए, मां ने तो उसे ऊपर रख दिया जहां उनका हाथ नहीं पहुंचता । घर में मां भी नहीं
        जब तक मां नहीं आएगी तब तक लड्डू नहीं खाए जा सकते । बड़े बेटे गणेश को तरकीब सूझी वो स्टूल पर खड़ा हुआ और डिब्बे से दो लड्डू खाकर संतुष्ट हुआ । गणेश ने छोटे को लड्डू नहीं दिया और वह चला गया खेलने । छोटा वैसे ही रह गया । उसे रोना आया । मगर उसको याद आया और मां के मुंह से सुना भी था कि जब तक हम भगवान की प्रार्थना नहीं करते तब तक हमे कोई चीज मिलती नहीं । उसने मन ही मन भगवान की प्रार्थना की हाथ जोड़कर और भगवान ने उसकी सुनली । उसकी प्रार्थना का परिणाम देखो कि मां पानी लेने के लिए घर में आई दुकान से ।
उसने रोते-रोते मां से लड्डू की फरमाइश की और मां ने मत रो कहकर उसे लड्डू दिए ।
      शाम ने लड्डू खाए, पानी पिया और खेलने चला गया ।
    दोनों को लड्डू मिले । गणेश ने (मेहनत से ) पराक्रम से और शाम ने प्रार्थना से लड्डू हासिल किए ।

प्रा रविशंकर कोलते
      नागपुर
          महाराष्ट्र


तिरंगा   (लघुकथा)

"सोनू क्या बात है, आज बहुत खुश नजर आ रहे हो ?तुम्हारा सारा सामान बिक गया क्या? इतनी जल्दी ?।"
सोनू बोला-" हां हां, आज मेरा सामान बहुत जल्दी बिक गया है।"
" वह कैसे?" मोनू ने पूछा।
" अभी तक तो तुम सड़क पर सामान लिए बैठे रहते थे,"
 सोनू हंसा और बोला-" मोनू भैया आज मैंने एक तरकीब सोची, और वही कामयाब हो गई।"
" वह कैसे ?" मोनू ने आश्चर्य से पूछा।"देख मेरा सामान तो अब तक वैसा का वैसा पडा़ है, सुबह से बोनी भी नहीं हुई।"
 सोनू खुश होते हुए बोला-" मोनू भैया, मैंने अपने सामान पर एक तख्ती लगा दी, जिस पर लिखा था "चाइनीज़ माल नहीं, स्वदेशी अपनाएं"। फिर उसके पास ही एक तिरंगा भी लगा दिया और कुछ तिरंगे बेचने के लिए रख लिए।बस क्या था? देखते ही देखते सारा माल बिक गया और चीजों के साथ लोग झंडे भी खरीद कर ले गए।आज गणतंत्र दिवस है ना, मेरा भारत महान, मेरी अच्छी आमदनी भी हो गई"।
मोनू रुआँसा होता हुआ बोला-"यार मुझे भी ये तरकीब बता देता"
सोनू ने जयहिंद करके सैल्यूट किया,खुश होता हुआ आगे बढ़ गया।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
23-1-21

माँ शारदे को वंदन 🙏
अग्नि शिखा काव्य मंच को प्रणाम 🙏
 सोमवार २८ /६/२०२१ 
विधा- लघुकथा 
 रोहन के पापा पुलिस आफीसर है ! उनका बहुत बड़ा सरकारी बंगला है ! जिसमें वो अपनीं माँ के साथ रहता है ! 
इतनें बड़े घर में उसके साथ खेलने वाला कोई नहीं है!
एक दिन गाँव से माली काका की बेटी दमयंन्ती आती है ! उसके साथ उसका बेटा शामु भी था ! अब रोहन और शामु की दोस्ती हो जाती है! दोनों साथ-साथ खेलते हैं!खेल - खेल में शामु बताता है की उसे पढ़नें का बहुत शोक है पर उसके गाँव से पाठशाला दस किलोमीटर दूर है ! वो छोटा है इसलिए जाना संभव नहीं हैं? एक दिन शामु बताता है कि उसे गाँव जाना है ! 
यह सुन रोहन उदास हो जाता है और मन ही मन सोचता है क्या अच्छा हो अगर ये यहीं रह जाए !
वह अपनीं माँ से कहता है करता शामु हमेशा के लिए यहीं रख लो !
रोहन की माँ माली काका से बात करती है की शामु को वो पढानां चाहती है ! रोहन और शामु एक साथ पढ़ेंगे ! माली काका गदगद स्वर में कहते हैं मेरे शामु के तो भाग ही खुल गये ! 
कहानी का सार - रोहन को साथी मिल गया ओर रोहन का भविष्य संवर गया !

सादर समीक्षार्थ 🙏

सरोज दुगड़
गुवाहाटी
असम 
🙏🙏🙏


अग्नि शिखा 
नमन मंच
दिनांक --: 28/6/2021
विषय --: बाल लघुकथा

मां
***
मां... मां करती हुई रश्मि रोते हुए घर में प्रवेश करती है! रश्मि की रोने की आवाज सुनते ही सावित्री रसोईघर से पल्लू से हाथ पोंछते हुए बाहर आती है! अरे क्या बात हुई बेटा... क्यों रो रही हो ?

आठ - नौ वर्ष की रश्मि न ज्यादा समझदार थी और ना ही नासमझ! सावित्री ने कहा! क्या हुआ बेटा आज फिर नीता से कट्टी हो गई! 
नहीं मां आज नीता ने मुझे कहा क्या मां मां गाय के बछडे की तरह करती है, मम्मी नहीं कह सकती! पढी लिखी गंवार ..
सावित्री हसते हुए कहती है बस इतनी सी बात! 

मां क्या अंग्रेजी पढने वाले , पैसे वाले मां को मम्मी कहने से समझदार कहलाते हैं ? 
 नहीं बेटा... 
 बछडा जब भी गाय से बिछुडता है तो क्यों मां मां करता है ?

सावित्री ने कहा बेटी मां शब्द इतना पावन, अनमोल और मीठी होने के साथ साथ उसमे इतनी शक्ति होती है की कितनी भी कठिनाईयां आये पल में उसका समाधान कर देती है ! प्रभु द्वारा निर्मित मां की यह महत्वपूर्ण रचना इंसान, जानवर, पक्षी सभी रूप में कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों के लिये संजीवनी का काम करती है! 
मां अपने सभी बच्चों को बराबर प्यार करती है! 

तभी रश्मि ने कहा हां मां नीचे जो डोगी है वो अपने सभी बच्चों को चाट रही थी और दूध भी पिला रही थी !
मां की ममता को बच्चे न समझे पर मां की ममता उनके रक्षण के लिये परछाई बनकर उसके इर्द गिर्द घूमती रहती है! 
कहना यही है बेटा ठोकर खाते हुए भी मां अपने बच्चों को खमा खमा कहती है! 

आखिर मां तो मां है

और मम्मी ? रश्मि ने भोलेपन से पूछा ...सावित्री हस पडी! 


चन्द्रिका व्यास
 खारघर नवीमुंबई


****संस्कार****

पौ फटते ही भाभी के कमरे से आवाज आई,"सुनो जी, "आकाश बहुत बिगड़ गया है। बात-बात में ज़बाब देता है,किसी काम का नहीं है, और न ही पढ़ता-लिखता है, आप तो कुछ करते ही नहीं, बिगाड़ के रखा है...?"
             "शोभा! तुम तो शिक्षिका हो, कैसे बच्चों को सीखाती हो,अपना बच्चा हुआ नहीं संभाल पा रही हो...? बच्चे तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं, जैसा चाहो बना डालो, शिक्षा और संस्कार तो तुम्हें ही देने हैं,वो तो बच्चा है।"
         मैं कहते हुए पति बाहर निकल ग‌ए.......
ठीक है मैं ही चाक बनूंगी और आकाश को सांचे में डालूंगी, बड़ों का सम्मान और सभ्यता की चाक पर संस्कारों की उंगलियां होंगी। मैं ही आकाश को दिशा देने में भूल कर बैठी,अब नया सबेरा होगा।

डॉ मीना कुमारी परिहार
मंच को नमन 🙏
 विधा -बाल कहानी
28/6/21


लघु कथा 

नायरा बहुत ही होनहार लड़की थी वो अपने माँ बाप की आज्ञाकारी बेटी थी आज वो उदास थी ,उसका सहपाठी मोहन उसे स्कूल में बहुत तंग करता था , अरे ओ लड़की क्या है तेरे टिफिन में ये कहते हुआ मोहन ने उसे जोर से धक्का दिया ,
तभी राजा नीलू सीता तीनो ने नायरा से कहा .. तुम भी उसे धक्का दो नहीं नहीं मैं नहीं दूंगी पापा ने मन किया है वे तीनो उसके बहुत अच्छे दोस्त थे | यूँ ही सिलसिला चलता रहा उसके पापा समझाते मोहन किसी बात से परेशान है उसके पास तेरे जैसे दोस्त नहीं होंगे और उसके माँ बाप उस पर ध्यान नहीं देते होंगे इसी चिड़चिड़ापन में वो ये सब करता है |एक दिन मोहन साइकिल से गिर गया और उसे गहरी चोट आयी मदद के लिए पुकार रहा था ,वही से नायरा गुजर रही थी उसने जैसे ही देखा झटपट उसके पास गयी उसे उठाया और पास के क्लिनिक में जाकर महरम पट्टी करवायी, ये सब देखकर मोहन ग्लानि से भर गया और उसने नायरा से माफ़ी मांगी और भविष्य में कभी भी किसी के साथ बुरा व्यवहार न करने की कसम खायी, अब मोहन पूरी तरह बदल चूका था और नायरा का अच्छा दोस्त बन गया | आज नायरा सोच रही पापा कीबात मानकर उसने किसी की जिंदगी सुधारने का नेक काम किया |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड


$$ लघुकथा $$
कोरोना और बच्चे
बात मई महीने की है, कोरोना का कहर जोरों पर था डर के मारे घर से बाहर नहीं निकल रहे थे, पर कुछ जरूरी काम से हमें बाज़ार जाना पड़ा तभी देखा कि दो तीन बच्चे बाज़ार में गुब्बारे बेच रहे थे| हमनें सोचा बच्चों के लिए तीन चार गुब्बारे खरीद लेते हैं इन बच्चों की मदद हो जायेगी, हम गुब्बारे खरीद कर तो ले आये पर हमने वो गुब्बारे बच्चों को नहीं दिये क्योंकि हम बच्चों को कोरोना से बचाने के लिए बाहर की वस्तुएँ नहीं दे रहे थे | पर फिर खयाल आया कि जो गुब्बारे बेच रहे थे वो भी तो बच्चे थे |
चन्दा डांगी रेकी ग्रेण्डमास्टर चित्तौड़गढ़ राजस्थान


लघु कथा
                    रंगोली

 8 वर्ष की रंगोली ने देखा उसकी माँ को गाँव का सेठ दबोच हुए हैं।
वह जितना छटपटाती है सेठ उतना ही जोर जोर से हँसता है।
रंगोली की माँ एक गरीब मजदूर है,
वह सेठ के खेतों में काम करती थी!
रंगोली ने बड़ा सा पत्थर उठाया और सेठ के सर पर दे मारा!
सेठ एक तरफ हाय हाय करते गिर गया!
और ज्यादा लहू बहाने के वजह से उसकी मौत हो जाती हैं। 
रंगोली और उसकी माँ वहाँ से भाग जाती है।
पुलिस आती है छानबीन करती है,
देखती है रंगोली की माँ की चप्पल टूटी चूड़ियाँ पड़ी है!
 तब रंगोली के घर जा उसकी माँ को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर देती है!
रंगोली की माँ सारा इल्जाम अपने सर पर ले लेती है!
रंगोली अपने दोस्त राजू के पास जाती है! सारा किस्सा राजू को बताती हैं! राजू के पिता एक बहुत बड़े वकील थे! राजू अपने पिता को रंगोली से मिलाता है!
राजू के पिता एक बहुत ही धूर्त किस्म का वकील था!
वह रंगोली की माँ का केस लड़ता हैं!
और उसे छुड़ाने के बदले उसे फसा देता हैं!
तब रंगोली राजू से कहती है!
राजू रंगोली के साथ मिलकर एक योजना बनाता हैं!
राजू अपनी छत के सबसे ऊपर मुंडेर पर खड़ा हो जाता है।
और जोर जोर से चिल्लाता है।
घर के सारे लोग नीचे इकट्ठा हो जाते हैं!और उसे नीचे उतरने को कहते हैं,
तब राजू कहता है, अगर रंगोली की माँ को नहीं बचाया तो मैं कूद जाऊँगा।
तब उसके पापा कहते हैं ठीक है बेटा तुम नीचे आओ मैं इसकी माँ को छुड़ा कर लाता हूँ। 
रंगोली की माँ को राजू के पिता थोड़ी देर में छुड़ाकर ले आते हैं।
और राजू छत पर से नीचे आ जाता है,
रंगोली दौड़ कर अपनी माँ से लिपट जाती है।।

           🌹🙋‍♀️समाप्त🌹🙋‍♀️

तो दोस्तों फिर मिलेंते हैं यूँ ही चलते-चलते किसी मोड पर
 किसी लधुकथा या कहानी के साथ। 
कैसी लगी कृपया कमेन्ट कर के बताएँ। 🙏🏻

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

🙏🏻 दायित्व🙏🏻

 कोरोना कॉल में दीनदयाल जी अपने आप को असहाय महसूस कर रहे थे क्योंकि उनको एक दिन हल्की सर्दी और खांसी हुई तो उनके बेटा बहू और नाती पोता ने उन्हें नीचे वाले कमरे में शिफ्ट कर दिया और बाकी सारे के सारे मेंबर ऊपर रहने लगे और वही से उन्हें चाय और भोजन दे देते थे|अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया कर लेतेथे| 4 दिन तक वह ठीक रहे फिर उनको तेज बुखार होने के कारण नीचे वाले कमरे मेंकर लिया जब उन्हें तेज बुखार हो गया और वह करासते हुए आवाज देते हैं बेटा मुझे सर्दी जुखाम के बाद बुखार भी हो गया है कोई दवा ला दो या डॉक्टर को दिखा दो ?लड़के ने जब यह आवाज सुनी तो अपनी पत्नी से कहा कि _"बाबूजी की लगता तबीयत ठीक नहीं है "तो पत्नी तत्काल बोलती है "अरे !कोरोना फैला हुआ है उनकी जांच करवाओ यदि वह पॉजिटिव है तो उन्हें तत्काल यहां से हटाओ और अस्पताल पहुंच जाओ? नहीं तो हमें हमारे बच्चों को और यदि हमारे पति को कोई प्रॉब्लम हो गया तो मैं क्या करूंगी ?कैसे देखरेख करूंगी उनका क्या है ,,,वह तो हॉस्पिटल में अपनी पड़े रहेंगे |लड़के ने भी सोचा बिचारा और हॉस्पिटल में फोन लगाया कि "मेरे पिता फीवर से ग्रस्त हैं कृपया उनकी जांच करवाना तो वहां से जवाब मिला ठीक है ,अभी टीम आ रही है वह जांच करेगी तो लड़का कहता है जाँच जब आएगी रिपोर्ट आती रहे आप इन्हें अभी ले जाए यह वहां रहकर इलाज पाएंगे तो इनका स्वास्थ्य ठीक होने लगेगा |पिता ने कहा__" बेटा मुझे अस्पताल नहीं जाना है हल्का बुखार है मैं यही ठीक हो जाऊंगा ,किंतु बेटा बहू नहीं माने और जबरदस्ती उन्हें हॉस्पिटल भेजिए वहां संक्रमित व्यक्तियों के बीच में जाकर अपने आप को अत्यंत ही ग्लानि से परिपूर्ण पा रहे थे कि जिस बेटे को मैंने अपना सब कुछ लुटा के पढ़ाया लिखाया आज उस बेटाने मुझे जबरदस्ती यहांँ अस्पताल पहुंचा दिया 3 दिन पश्चात जब उनकी रिपोर्ट आई तो वह नेगेटिव थे उन्हें किसी तरह की कोई संक्रमण नहीं था |उन्हें जब अस्पताल से छोड़ा गया तो वह वहां से चुपचाप निकल कर एक अज्ञात गंतव्य की ओर चले गए घर में जब मालूम हुआ कि पिताजी पॉजिटिव नहीं थे उन्हें छुट्टी मिल गई तो इन्होंने ढूंढा प्रारंभ किया पत्नी कहती है जल्दी जाओ उन्हें ढूंढ के लाओ उन्हें मासिक ₹30000 पेंशन मिलती है वह हमारे बहुत काम की है यदि हम 10000 उन पर खर्च भी कर तो हमें ₹20000 की फिर भी बचत होगी और ऐसे पेंशन होल्डर व्यक्ति को घर से बाहर कहीं मत जाने दो हमारी आय का साधन एकदम से खत्म हो जाएगा बेटी ने लाख कोशिश की किंतु अपने पिता को ना कुछ पाया और पिता आराम से एक वृद्ध आश्रम में रहकर अपनी सेवाएं देते हुए हरी भजन कर रहे थे क्योंकि उन्हें अब अपने दायित्व का बोध हो गया था कि अब मुझे क्या करना है

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्््ृृ कुमारी चन्दा देवी💐💐💐💐💐


नमन पटल
28/6/21
आज का विषय - लघु कथाचाय के रंग का दूध

राधा अपने बेटे को बोर्नविटा वाला दूध पीने को कहकर टी. वी देखने लगी । थोड़ी देर बाद उसने देखा दूध वैसे ही पड़ा है और राहुल वीडियो गेम खेल रहा है।
वह बड़बड़ाने लगी" " आजकल के बच्चे भी न खेलने के आगे खाने पीने की सुध नहीं रहती है।"
" राहुल जल्दी से दूध फिनिश करोगे तो आज मैं तुम्हें रिमोट वाली कार दिलाऊँगी।"
तब जाकर कहीं राहुल ने दूध खत्म किया।
मीना ये दूध का गिलास ले जाकर धो दो उन्होंने अपनी काम वाली बाई मलिया से कहा।
मलिया के साथ उसकी 4 साल की बिटिया भी आती थी रोज उसके साथ।
वह रोज मालकिन के बच्चे को दूध पीने के नखरे को देख करती थी और सोचती थी वो इतने स्वादिष्ट दूध को पीने से मना क्यों कर देता है।माँ तो मुझे कभी ऐसा दूध पीने को नहीं देती। एक दिन मालिकन राहुल भैया को दूध देकर नहाने चली गई थी। वह दूध को गिराने जा रहे थे , मैंने उनसे कहा भैया -"भैया मैं पीलूँ दूध तब उन्होंने मुझे दे दिया और कहा कि आन कप मत बताना।"
ये चाय के रंग वाली दूध बहुत बढ़िया लगती है पीने में
आज भी वह टुकर टुकर देख रही थी राहुल को बोर्नविटा वाला दूध पीते हुए कि आज भी मालकिन नहाने चली जातीं और भैया मुझे दूध पीने को दे देता।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'


एकता की भावना

स्पेशल चाइल्ड के संबंध में एक कहानी प्रस्तुत कर रही हो।
बच्चों का एक समूह है जिन पर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया प्रतियोगिता का विषय था 100 मीटर की दौड़ जिसमें सभी स्पेशल चाइल्ड की भागीदारी करवानी थी और उन्हें प्रेरित करना था एक विद्यालय में इस कार्यक्रम को रखा गया जब कार्यक्रम की शुरुआत हुई पहले उन बच्चों से करवाया गया जो उम्र में 12 से 15 थे दूसरे राउंड में 9 से 12 उम्र वाले बच्चों के बीच यह प्रतियोगिता की जय दोनों बच्चों के प्रतियोगिता में बहुत अंतर देखने को मिला 9 से 12 उम्र के प्रतियोगिता वाले बच्चे जब 100 मीटर की दौड़ में दौड़ना शुरू किए तो अचानक एक बच्चा अपने कमजोर पैर के कारण तेजी से नहीं दौड़ सका और गिर गया अन्य बच्चे तो आगे बढ़ गए लेकिन दो ऐसे उसके सहपाठी थे वह रुक गए और उसे उठाते हुए उसका हाथ अपनी कमर में डालकर दौड़ लगाई प्रथम तो नहीं आए पर उनकी भावना देखकर मन आनंदित हो गया बच्चों का सहयोग और एकता की भावना का यदि विकास हो गया है तो फिर वैसे बच्चे पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे यह बच्चों की प्रेरणा बन गए रास्ते में अगर कोई तुम्हें गिरा हुआ मिलता है तो उसकी मदद करो सहयोग करो एकता में बल है

कुमकुम वेद सेन


आज विषय - स्वैच्छिक 
लघु बाल कथा 
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बल से बढ़कर बुद्धि
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शुभम और शिवम दो चचेरे भाई है। लगभग समान उम्र के हैं और एक ही स्कूल और एक ही क्लास में पढ़ते है। 
शिवम शरीर से मजबूत है और शुभम थोड़ा कमजोर। शिवम अक्सर शुभम को परेशान किया करता है। 
परेशान होकर वह चिंता किया करता है कि ऐसा क्या करूं कि शिवम को शर्मिंदा होना पड़े। 
अचानक उसे ध्यान आया कि सर ने बताया था कि बुद्धि का बल शरीर बल से अधिक होता है। 
उसने सोचा कि शिवम भले ही बलवान हो किंतु बुद्धि में तेज नहीं है। उसने मन ही मन कुछ तय किया और खेलने चला गया।
थोड़ी देर बाद शिवम भी वहां पहुंचा। उसने एक बड़ा सा उठाया और दूर पर फेंक दिया । शुभम शर्मिंदा हुआ। उसने शिवम से कहा ठीक है रुमाल फेंक दो तो जानूं। शिवम खूब ठहाका मारकर हँसा। इसमें क्या है अभी लो। 
उसने रुमाल की गेंद सी बनाकर फेंका किंतु हवा में जाकर रुमाल खुल गया और बहुत दूर नहीं जा सका।
शुभम ने कहा देखो मैं अभी दोनों को फेंककर दिखाता हूं। 
उसने एक पत्थर उठाया और रुमाल में लपेट कर फेंक दिया। पत्थर में लिपटा हुआ रुमाल काफी दूर जा गिरा। शिवम शर्मिंदा हुआ। शुभम उसे बुद्धि से पराजित करके खुश हुआ।    
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© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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अग्नि शिखा मंच
तिथि२८/०६/२०२१
बिषय लघु कथा
मै कान्हा अपनी मैया का दुलारा हूं गोकुल मे सबके आँखो का तारा हूं नन्द बाबा हमे कन्हवा बुलाते है दादू हमे कान्हू बुलाते है।सब लोग हमे प्यार करते है बस मथुरा के राजा कंस मामा न जाने क्यौ हमे मारना चाहते है।
       अब देखो न उस दिन जीस दिन मेरा जन्म उत्सव मनाया जारहा था एक गोपी आई मुझे दूध पिलाने लगी मै भी पी रहा था आकाश का सैर भी कर रहा था अब ओ गोपी मइया दुध पीलाते निचे गिर कर मर गई मुझे बडा दुःख हुआ ओ मेरी दूधी माँ थी न
        .अभी मै बहुत छोटा हूं पैर मार कर खेलता हूं अब मैया सकट मे पालना मे टांग गई थी मै पैर मार कर खेल रहा था पैर सकट (बैलगाड़ी) मे लगा सकट टूट गया सब लोग दौड़ के आये मैया गोद मे उठा के रोने लगी। बोली मेरे लंल्ला ने न जाने इन राक्षसों का क्या बिगाडा़ है मेरे लल्ला के पिछे पडे़ है कुल देवता की कृपा से सब मर जाते है।लग रहा है गोकुल पर राक्षसों का राज होगया है।
हम गोकुल छोड़ देगें।
  बाबा ने सबको बुला कर कहां मेरे कन्हवा पर दो बार राक्षस आक्रमण कर चुके है
मुझे मालूम हुआ है यह सब राक्षसों का उतपात है तो मै गोकुल छोड़ रहा हूं जीसको मेरे साथ चलना हो तो कल भोर मे तैयार रहे।
आज हम लो बृन्दावन जारहे है छकडो (सामान ढो़ने वाली गाड़ी )पर सामान लद चुका है खाने का और जरूरत के बाकी बाद मे जायेगा।
अब दोस्तो बृन्दावन की कहानी बाद मे मिलते है राधे राधे बोलो ना
        🌷 तुम सब का प्यारा🌷 
              🌹कान्हा🌹
स्वरचित बृजकिशोरी त्रिपाठी
             गोरखपुर यू.पी


राम रतन
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राम और रतन बहुत ही गहरे मित्र थे।ये दोनों जब भी अपने मोहल्ले के जिस भी गली से निकलते लोग कहते रामरतन जा रहे ।ऐसा लगता जैसे एक ही नाम हो दो बच्चों का।दोनों ही कक्षा के होनहार विद्यार्थि थे और साथ ही घर पे भी दोनों मिलकर पढ़ते थे कभी राम अव्वल आता तो कभी रतन ।परंतु दोनों मे कभी भी एकदूसरे को गिराने की भावना कभी ना आती बल्कि जब कभी कोई अव्वल आता तो खुश हो एक दूजे के बारे मे सभी को खुश हो बोलते मेरा मित्र अव्वल आया।उनकी इसी दोस्ती की मिसाल सभी एक दूजे को देते थे।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर,महाराष्ट्र
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अंगदान
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 दीपक बहुत ही उदास था ,क्योंकि दादी को अड़ोसी -पड़ोसी मिलकर अस्पताल ले जा रहे थे। दीपक मन ही मन भगवान से दादी मां के स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहा था ।दीपक की जिंदगी में दादी के अलावा और कोई नहीं था ।बचपन से ही मां बाप भगवान को प्यारे हो गए थे। दादी ने ही उसे पाल पोस कर बड़ा किया। वह दूसरों के घर में बर्तन साफ करती थी ।दीपक कक्षा नवमी में पढ़ता था। कुछ समय से दादी बीमार थी, जब उनका टेस्ट करवाया तो पता चला दादी को कैंसर है, वह भी अंतिम स्टेज पर है। बहुत दिनों तक दादी अपनी बीमारी छुपाती रही, वह नहीं चाहती थी कि ,दीपक परेशान हो ।अस्पताल के कमरे में जब दीपक दादी के साथ बैठा था, तो बता रहा था कि दादी स्कूल में अंगदान के बारे में बताने बाहर से कुछ लोग आए थे। मैं अंग दान करूंगा मैं तो फॉर्म भी ले आया हूं। दादी ने कहा चल पगले अभी तेरी उम्र ही क्या है ?तेरी उम्र पढ़ने-लिखने की है। दीपक उस फॉर्म में मेरा नाम लिख देना ,क्योंकि मेरे जाने का समय, नहीं -नहीं दादी ऐसा मत कहिए। दीपक ने कहा आपके जाने के बाद तो मैं अनाथ हो जाऊंगा ।बेटा मौत पर किसी का वश चलता है क्या ?मेरा जो अंग काम का होगा ,बेटा दान कर देना, ताकि मरने के बाद भी मैं दूसरों के दिल में आंखों में त्वचा में जिंदा रहूंगी। बस इतना कहना था कि दादी की मृत्यु हो गई ।दीपक ने दादी की अंतिम इच्छा पूरी की ।दादी की कही हुई बातें उसके कानों में गूंज रही थी ,और आंखों से अश्रु धारा अविरल बह रही थी।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट ,खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210

कान्हा

कान्हा बहुत गरीब घर का बच्चा था। उसके पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। वह गुरुजी के पास पढ़ने जाता जहाँ पर सारे अमीर बच्चे पढ़ते थे। सब कुछ ना कुछ गुरुजी के लिए लेकर आते रहते थे। एक बार गुरु जी ने कहा कि सब दूध की एक-एक मटकी लाएँगे। विद्यालय में खीर बनाकर सबको परोसी जाएगी और जो नहीं लाएगा उसे मार पड़ेगी। कान्हा डर गया था। घर गया और माँ से कहने लगा कि कल मुझे भी मटकी भर दूध ले जाना है। अगर नहीं लेकर गया तो मुझे मार पड़ेगी। 

माँ ने कहा-"बेटा हमारे पास कहाँ है? हमने तो तुम्हें भी आटे का घोल देकर पाला है।"  

नहीं माँ, दूध ले जाना ही पड़ेगा नहीं तो मुझे मार पड़ेगी।

तब कुछ सोचकर माँ ने कहा कि तुम गोपाल से माँगो। वे तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकते हैं।

कान्हा ने पूछा-"माँ गोपाल कहाँ मिलेंगे?"
माँ ने कहा कि जंगल में।
कान्हा-"मुझे क्या करना होगा?"
माँ-"वन में जाकर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाना, गोपाल आ जाएँगे तब तुम जो भी माँगोगे तुम्हें दे देंगे।"

वह नन्हा-सा बच्चा वन में जाकर ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगा। गोपाल! गोपाल! मुझे दूध की मटकी चाहिए। गोपाल मुझे दूध की मटकी चाहिए। मेरे विद्यालय में गुरु जी ने मंगाया है वह रो-रो के पुकारने लगा।

 बहुत पुकार के बाद गोपाल आए और एक छोटी-सी मटकी दूध की गई दे गए। जब मटकी लेकर कान्हा विद्यालय पहुँचा तो सब उसका मज़ाक उड़ाने लगे। मास्टर जी ने कहा-'इस छोटी-सी मटकी से क्या होगा?"

खैर सबसे पहले उसी की मटकी का दूध डाला गया। यह क्या! दूध खत्म ही नहीं हो रहा था। सारे पात्र भर गए पर दूध फिर भी बच गया। 

गुरुजी-"दूध कहाँ से लाए।"
कान्हा-"गोपाल ने दिया।"
गुरुजी-"कहाँ रहते हैं?"
कान्हा-"वन में।"

गुरुजी गोपाल की करामात समझ गए। उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी भविष्य में ऐसा न करने का निर्णय लिया।
सच ही कहते हैं कि जिसका कोई नहीं उसका प्रभु है यारो।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर

वीना अचतानी
अग्निशिखा मंच को नमन 
बाल लघुकथा ।।।
********समाधान ****
राजू बहुत ही शरारती था ।कक्षा में सब बच्चों को बहुत तंग करता ।निशाना लगा कर बच्चों पर चाॅक फेंकता, पड़ौसियों की खिड़कियों पर गुलेल से निशाना लगा कर उनके काँच तोड़ डालता ।स्कूल से आते ही रामू काका के बगीचे में चला जाता पेड़ों पर लगे आम और अमरूद को अपने गुलेल से गिरा देता ।आए दिन पड़ौसियों की शिकायत से तंग आकर राजू के माता पिता स्कूल के प्रिन्सिपल के पास गए, शायद वे कोई समाधान निकाल सकें ।प्रिन्सिपल ने क्लास टीचर को बुलाया, उन्होंने सब बातें सुनकर राजू के माता पिता से कहा आप निश्चिंत रहे मैं कोई समाधान निकालता हूँ ।क्लास टीचर ने देखा राजू निशाना बहुत अच्छा लगाता है उन्होंने उसे स्पोर्ट में निशाने बाजी वाली टीम में शामिल कर दिया, अच्छी निशानेबाजी के कारण उसे टीम का कैप्टन बना दिया ।अब राजू का सारा ध्यान अपनी टीम में रहता ।वह शरारतें करना भूल गया ।सालाना प्रतियोगिता में राजू की निशानेबाजी के कारण उसके स्कूल को प्रथम पुरस्कार मिला ,और राजू को सब प्यार करने लगे । । 
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी,  
जोधपुर (राजस्थान). .


मंच को नमन बाल लघु कथा

नीता और रीटा दो पक्की सहेलियां कक्षा पांचवी में पढ़ती थी, नीता पढ़ाई में होशियार पर रीता कमजोर थी । सभी विषयों में बहुत अच्छे नंबर लाती थी किंतु गणित में उसको किनारे पर अंक मिलते थे, इस बात का सभी टीचरों को भी दुख होता था क्योंकि पढ़ाई में अव्वल होने के बाद भी गणित विषय भी उसको क्लियर करना था। सभी अध्यापकों की लाडली एक बार उसको गणित में बिल्कुल जीरो आयाl अपने घर की तरफ दोनों सखियां स्कूल से लौट रही थी, रास्ते में वहां के कोई बहुत बड़े मैनेजर अंकल उनको मिलते हैं उनके हाथ में रिपोर्ट कार्ड देख कर रिपोर्ट में गणित में जीरो नंबर देख कर पूछते हैं इसमें बेटा आपने मेहनत नहीं की? रीटा जवाब देती है कि मेरी टीचर ने जीरो दे दिया शायद गलती से एक अंक लगाना भूल गई, यह बात सुनकर मैनेजर अंकल के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है वे कहते हैं ठीक है कल सुधरवा लेनाl दूसरे दिन रीटा जीरो के पहले एक लगा देती है ,और वह रिपोर्ट कार्ड अंकल को दिखा देती है, उस समय में वे अंकल सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाते हैं और कहते बहुत बढ़िया बेटा ऐसे ही 10 में से 10 नंबर लाओ।
 रीटा और नीता अपनी जीत पर हंसते हुए घर चली जाती है और कहती हैं कि आज अंकल को क्या बुद्धू बनाया ,
किंतु वे अंकल सिर्फ इसलिए मुस्कुरा दिए कि किसी भी बच्चे में आत्मग्लानि ना आए, यह बात बहुत दिनों बाद उन सखियों को पता चलती हैl
 तो वह स्वयं ही आत्मग्लानि का शिकार हो जाती हैंl

 देखिए बालमन क्या-क्या नहीं करवाता है 😀

संदेश

 किसी बच्चे की कमी को समझा देना बहुत अच्छी बात है पर उनको फटकार देना आत्मग्लानि को बढ़ावा देना है।

*जब कार्य समझाइश से हो जाए ,तो फटकार की जरूरत कहा है?*


स्वरचित,
 सुषमा शुक्ला इंदौर

दिनांक 28/06/2021
   विषय:- शिक्षा का महत्व
    लेखक:-नरेन्द्र कुमार शर्मा 
                हिमाचल प्रदेश  
मंच अग्निशिखा 

गर्मी के दिन दोपहर की तपती धूप,गांव में पानी के लिए कोहराम मचा था।सरपंच साहब ने सबको शांत करते हुए कहा।"सुनो गांव वालों",आज पानी की समस्या से निजात पाने के लिए कलेक्टर साहब कुछ देर बाद गांव में पहुंचने वाले हैं ।आज हम सभी मिलकर गावँ वाले उनसे पानी की मांग करेंगे।
ये सब बातें गांव के सबसे गरीब धनकु का बेटा भी सुन रहा था।धनकु का बेटा हाल ही में शहर के स्कूल से इंटर मिडीयट की पढ़ाई करके गांव आया था।
कलेक्ट साहब जैसे ही गांव पहुंचे सरपंच साहब उनके सम्मान में खड़े हो गए।कलेक्टर साहब थे तो अधिकारियों का उपस्थित होना स्वाभाविक था।सरपंच साहब ने पानी की समस्या पर प्रकाश डाला ही था कि कलेक्टर साहब ने आंगल भाषा अध्यापकों कुछ बतियाया।उन्हें मालूम था कि गांव में कोई भी अंग्रेज़ी समझने वाला कोई नहीं।सो अधिकारी गण कलेक्टर को गुमराह करने की कोशिश कर रहे थे।धनकु का बेटा उनकी चालाकी देख रहा था।
जैसे ही वे कलेक्टर साहब को अपनी बात कहकर समाप्त हो रहे थे,वैसे ही गांव वालों के बीच से एक पुराने कपड़ों के नौजवान खड़ा हो गया।वह अंग्रेजी में एक अधिकारी से कहने लगा।कि आप कलेक्टर को गुमराह कर रहे हैं,साहब को अगर हम सब पर विश्वास नहीं तो पानी के स्रोत पर चलें।कलेक्टर साहब को समझते देर न लगी।स्रोत पर पहुंच कर कलेक्टर साहब ने कहा कि इस लड़के ने अपनी बात वैसे समझाई है जैसे गागर में सागर।आज से ये लड़का सुपरवाईजर के पद पर तैनात किया जाएगा।
धनकु आज बेटे की तारीफ़ से तो खुश था ही पर सरकारी नौकरी के मिलने से उसकी खुशी का ठिकाना न था।और गांव वाले भी खुश थे चूंकि उन्हें अब हर रोज़ पानी आने की उम्मीद थी।

(लघुकथा)


नमन अग्नि शिखा मंच 
  आज - बालकथा 
लघुकथा 
* “लड्डू गोपाल “*
मम्मी कहती है लड्डू - गोपाल कहा हों ? मै कब से ढूँढ रही हूँ , 
सारे घर ढूँढ परेशान हूँ । ज़रूर ये दोनो दादी के पलंग पर छुपकर बैठे होंगे ।जब भी शरारत करते है । दादी उनकी ग़लतियों को नजर अन्दाज़ कर बचा लेती है । 
बड़ बड़ करते आवेश में हाथ में छड़ी लिये पहुँच कहा - 
माँ कहाँ है ? लड्डू -गोपाल  
माँ ने कहा -ये क्या ? आज छड़ी लिए पहुँच गई ,उन्हें पिटने आख़िर क्या किया ? इन्होंने  
लड्डू -गोपाल की मम्मी ने कहा - आपकी गणपति पूजा के लड्डू बनाई वो सारे लड्डू चोरी करते नीचे 
गिरा दिये , अब मुझे फिर से बनाना होगा । दादी ने कहा - छड़ी मुझे दो ये दोनो पलंग के नीचे छुपे है । आज मै इनकी धुनाई करती हूँ 
सास बहु दोनो पिटाई करने लगे ।
तभी लड्डू -गोपाल के पापा पहुँच गये ।और कहा इन नादान बच्चों को क्यों पिट रहे हो । लो ये ५१ मोती चूर के लड्डू मेरा प्रमोशन हुआ है सारे कालोनी में बाट देना । 
लड्डू गोपाल कहते - पापा आपने हमें बचा लिया , मम्मी कह रही थी हर बार संक़ष्टी में घर पर २१ लड्डू बना परेशान हो गई हूँ ।
हमसे से धोखे से बाल लगी ,और सारे लड्डू गिर गये । 
पापा ने माँ और मम्मी से कहा - जब लड्डू गोपाल नही आये थे ।इस दुनिया में ? दोनो विनायकी और संकष्टी में लड्डू बना बना कर गणपति को चढ़ाया , 
अब लड्डू गोपाल घर में है । इनकी गलती माफ़ नही कर सकते । माँ और दादी ने लड्डू गोपाल को दोनो को गले से लगाया ।
अनिता शरद झा

अग्निशिखा मंच
तिथि-२८-६-२०२१
विषय- लघु बालक‌था ‌
 
                मै ‌ कान्हा 
      आज मैं ६ माह का हो गया। ‌मुझे आप ने 
पहचा‌ना नहीं मैं हूंँ आपका कान्हा।।‌मेरी मम्मा का नाम है रुनझुन और पापा‌‌का नाम है पुनीत ।मेरी ‌नानी का नाम नीरजा ठाकुर है।
 देखो दादा जी नहा के आ गये ,नहा‌ने के बाद उनको चाय चाहि‌ये ‌ होती है, किचन में कौन है उनको ‌चाय दो ।तभी ‌पापा आ गये और कहने लगे - ‌क्या भई क्या ‌हाल है और मुझे गोद में उठा लिया। आज मेरा नामकरण संस्कार है ‌। ये बुआ भी ना, मेरे कान के पास आ कर जोर से बोलती है "इसका नाम युवान रखेंगे ।इतने जोर से बोलने की क्या ‌जरुरत थी।मम्मा और पापा ‌मु‌झे प्यार से नानू ‌बोलते हैं। ‌जिसको भी देखो 
ना‌नू को भूख लगी है इसके लिये ‌दूध गरम हो गया ? दूध ,,,दूध ‌लेकिन आज तो आलू का पराठा बना है ना। बुआ ‌का ‌तो ‌ये तीसरा पराठा है और दा‌दी नानी कितनी गीली पप्पी ले‌ती हैं ,आने ‌दो‌‌ मेरे दांत जोर से काटूंगा। अपना दुख किससे कहूं ,आपसे ही कहता हूँ। नानी को समझाओ ना ,कितने जोर से लोरी ‌गा‌ती है,मैं कैसे सोउं।
   ओ हो मम्मा आ गई , उनकी गोद में ‌ लेट कर उनकी ‌चेन से खेलने में बहुत मजा आता है।‌‌मैं मम्मा को लात से कितना मारता हूं फिर भी ‌वो मुझे ‌कितना प्यार कर‌ती है‌ क्यों आप बता सकते हैं।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोम्बिवली 
महाराष्ट्र
         
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