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agnishikha manch क्या शब्द बिगड़ी बात बना देते हैं पर सब की रचनाएं पड़े डॉ अलका पांडे


अग्निशिखा मंच 
२३/६/२०२१

क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते है ? 

हाँ जी बिलकुल बना सकते है शतप्रतिशत बना सकते है ....
शब्द को  ब्रह्म कहा गया है । 
मीठे वचनों से पाषाण ह्दय भी द्रवित हो उठता है। 
बात बात पर क्रोध करने हर वक्त गाली गलौज करना , 
इंसान की प्रतिष्ठा गिरा देता है वह संतुलित व मिठे शब्द बोलता है तो लोगों को शंका होती है जरुर कोई मतलब होगा । 
ग़ुस्सा होने से बिगड़ा काम नहीं बनने बाला । हाँ अगर आप ने संतुलन बनाया व नाराज न होकर समाने बाले को समझा उसे समझाया तो भविष्य में वह और सतर्कता से काम करेगा , आप का सम्मान करेगा 
जीवन भर आपके प्रति कृतज्ञ रहेगा । 
आपके शब्दों द्वारा ही आप यह तो सम्मान पा सकते हैं या नफ़रत ....
मीठे शब्दों में बहुत शक्ति है वह असम्भ काम भी करवा सकता है आदमी में आत्मविश्वास भर सकतेहै । 
मधुर बोलने वाला हर जगह इज़्ज़त पाता है । 
और अपशब्द बोलने वालों से लोग दूर भागते है । 
हमेशा अपने आप को याद दिलाये कि नाराज़ हो कर हम बिगड़ा काम बना नहीं सकते 
परन्तु अच्छा बोल कर आप अधिक नुक़सान से बच सकते है 
जो हो गया वह हो गया , भविष्य में न हो इसका ध्यान रखें और ये आपके शब्द ही कर सकते है 
मज़ाक़ व हल्के फुलके मज़ेदार शब्द वातावरण कोखुशनुमा बना देते है , और माहौल अच्छा तो ....काम अच्छा । 
शब्द और शब्दों को बोलने का लहजा दोनों को ही हमें सम्भालना है । तभी हम बेहतर नेतृत्व कर पायेगा व लोगों में पापुलर भी होंगे 
मीठी बानी बोलिये ......मन का आपा खोल   
ओरों को शीतल करे आपो शीतल हो....    
हमेशा याद रखे 
शब्द एक बार जिव्हा से निकल  गया सो निकल गया ...    
तो बहुत तौल मौल कर बोले 
डॉ अलका पाण्डेय 🌷🌷

“अग्निशिखा मंच को नमन 
२३-६-२०२१
*“क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम भी बन सकता है*”
मन की शीतलता वाणी की मिठास से बिगड़ा काम बन सकता है । “मैया मोरी मैंने ही माखन ख़ायों “
घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। बाल लीला को 
सूरदास वाक्चातुर्य से बिगड़े काम को बनाने का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। 
जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है ।
तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा! तूने माखन खाया है क्या? तब बाल कृष्णा अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। कन्हैया बोले.. मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही बलात् मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। फिर बोले कि मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। इन छोटे हाथों से मैं कैसे छींके को उतार सकता हूँ। कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा रह गया था उसे पीछे छिपा लिया। कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन मुस्कराने लगीं और छड़ी फेंककर कन्हैया को गले से लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रह्मा को भी दुर्लभ है। श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) ने बाल लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्त्वपूर्ण है।
ये पौराणिक लीलाओं का वर्णन हम अपने माता पिता से सुन जीवन में ज्ञान अर्जित कर ब्रम्ह वाक्य बन गये । किसी के अप शब्द को अपने शरीर दिमाग़ में मत बिठाओ ।शब्द वाक्य बिगड़े काम को शरीर की मैल तरह साफ़ हो जाता है । और दिमाग़ में बर्फ़ रख 
वाणी की मधुरता से सम्बंधो को जीना आना चाहिये । 
इस तरह जीवन में बिगड़े काम बन सकते है मैंने यही समझा आप सभी से सज्ञान की अपेक्षा है ।
अनिता शरद झा मुंबई

अग्निशिखा मंच को नमन 
दिन : बुधवार 
दिनांक : 23/6/21 
विषय : *क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है* 
विधा : *लेख*

बात कड़वी है , पर उतनी ही सच्ची भी । शब्द ही हैं जो अनजान को अपना और अपनों को पराया बना देते हैं।

 अक्सर इंसान अपने अभिमान में यह भूल जाता है कि , उसे कौन सा शब्द इस्तेमाल करना चाहिए और कौन से नहीं । अपने अभिमान को संतुष्ट करने के लिए वह ऐसे शब्दों को इस्तेमाल कर देता है जिससे किसी के स्वाभिमान को ठेस पहुंँच सकती है।

 शब्द के घाव कभी नहीं भरते जबकि और जख्मों के घाव किसी न किसी रूप में कभी ना कभी आवश्य भर जाते हैं। परंतु शब्द के घाव जीवन प्रयत्न उतने ही दुख और तकलीफ प्रदान करते हैं। इसलिए हमें शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना चाहिए।

_*ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय*_

शब्दों का प्रभाव इतना प्रभावशाली होता है कि वह मृत्यु के समीप जा रहे व्यक्ति को भी वापस लौटने की शक्ति प्रदान कर देता है , और कभी जीते हुए इंसान की भी जिंदगी मौत से बदतर बना देता है।

प्रोत्साहन के चंद शब्द इंसान के अंदर कार्य करने के जोश को दुगना कर देते हैं, जबकि अवहेलना के बोले हुए शब्द उसकी मनोबल को और तोड़ देते हैं और उसकी कार्य करने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

*सच ही कहा है किसी ने कि मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है जबकि कड़वा बोलने वाले का गुण भी रखा का रखा रह जाता है*।

*अपने जीवन में शब्दों का चुनाव सोच समझ कर करें क्योंकि शब्द एक ऐसा तीर है जो एक बार आप के मुख से निकलने के बाद सिर्फ अपना प्रभाव दिखाता है लौट कर कभी नहीं आता।*

_*आप के बोले हुए शब्द सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव डाल सकते हैं। सकारात्मक प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के मन और मस्तिष्क पर आपकी एक अमिट छाप छोड़ जाता है ।जबकि नकारात्मक प्रभाव उसके मन मस्तिष्क को चोटिल कर जाता है ।जो कि वह अंतिम सांस तक नहीं भूलता।*_

🌷🌷🌷🌷

_*सुन मधुर वाणी तेरी ,हृदय हुआ फकीर।*_
_*देखन को तेरी सूरत, मन ये हुआ अधीर ।।*_

🙏🙏🙏🙏🙏

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️
 उत्तरप्रदेश गोरखपुर

बुधवार -23/6/2021
विधा - समीक्षा 
✍️✍️✍️👍👍👍👍👍
विषय : सुरेश चन्द्र शुक्ल(नॉर्वे) की कहानी //लाहौर छूटा, अब दिल्ली न छूटे// की समीक्षा
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//लाहौर छूटा, अब दिल्ली न छूटे// कहानी का कथानक लाहौर से लेकर दिल्ली तक के क्षेत्र को समेटे हुए है। इसमें तीन प्रमुख पात्र हैं- अमृता, अमृता की दादी कौशल्या और पड़ोसन कमला।
कौशल्या और अमृता के मध्य जनरेशन गैप स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कौशल्या पुराने खयालों की महिला है, उसे आजकल के गीत संगीत पसंद नहीं हैं। वह तो उस जमाने की है जब रेडियो ही एकमात्र मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। अमृता जब दादी को पुराने दिनों की याद दिलाते हुए छेड़ती है तब 90 साल की झुकी कमर वाली उस बूढ़ी दादी में एक नयी शक्ति का संचार हो जाता है। वह अमृता को अपने जमाने की बाते बताने लगती है. वह बताती है कि वह भी अपने जमाने में कम शौकीन नहीं थी। तब जो मन में होता था वही जुबान पर होता है। कोई दुराव छिपाव नहीं था, अब तो दिल्ली में दिल की बात जुबान पर ही नहीं ला पाते। अमृता जब दादी को छेड़ते हुए अपने जमाने की मौज मस्ती के बारे में पूछती है तो बुढिया बताती है। बुढ़िया अतीत के खयालों में डूब जाती है। उसे लाहौर में बिताए जवानी के दिन याद आने लगते हैं। कैसे उसके पति यानी अमृता के दादा जी उसे फूड मार्केट में ले जाते थे, जहाँ मेला लगता था, जो रातभर चलता था। वहां वे दाल खाते थे और ग्वाला की दुकान की लस्सी पीते थे। अमृता दादी से आज की दिल्ली की सुख सुविधाओँ की चर्चा करती है। अब तो यहां भी बड़े बड़े रेस्टोरेंट और मॉल हैं जहां एक ही छत के नीचे सब कुछ उपलब्ध हो जाता है। और फिर घर बैठे भी सब कुछ मंगाया जा सकता है।
उसी बीच दूरदर्शन पर पर खबर आती है कि लाहौर के अनारकली बाजार में बम फटा है। वहां कर्फ्यू लगा दिया गया है। और धमाकों के पीछे आतंक बादियों का हाथ बताया गया है। लाहौर की इस खबर को सुनकर कौसल्या की पुरानी यादें ताजा हो जाती है। इसी अनारकली बाजार में उसके बाऊ जी की कपड़ों की दूकान थी। वह और विस्तार से खबरें जानना चाहती है। वह बम फेंकने वालों की निंदा करती है. आज भी उसे अपने शहर लाहौर से वहुत लगाव है। जहाँ उसने अपना आधा जीवन बिताया था, कितने त्यौहार मनाये थे, उसे अपनी सखियों की याद भी आती है. जिनके साथ न जाने कितने खेल खेले थे।
कौशल्या को देश के बंटबारे के दिन भी याद आते हैं, जब लाहौर में सब कुछ छोड़कर दिल्ली में आना पड़ा था। उसके दो बेटे भी वहीं छूट गये थे, उनकी आज तक कोई खबर नहीं । वह एक बेटा ही अपने साथ ला पाई थी जिसकी बेटी अमृता है। उसे महसूस हो रहा था कि जैसे बंटवारे की आग अभी भी सीमाओं पर जल रही है। जिसका परिणाम आये दिन आतंकवादी घटनाओं में मिलता है। 
तभी पड़ौसन कमला भी वही खबर देने आती है। जब अमृता कहती है कि यह बहुत बुरी बात है तो कमला कहती है कि बुरा क्या है । लाहौर में आग लगी है कोई दिल्ली में तो नहीं। किन्तु अमृता कहती है कि जब पड़ौस में आग लगती है तो दूसरे पड़ौसी को दुख होता ही है, क्या पता उसका प्रभाव यहां भी आ जाए, आग और पानी का क्या भरोसा। कमला कहती है कि सीमा पार तो हमारे दुश्मन है, फिर उनसे हमारी हमदर्दी क्यो।
अमृता आधुनिक विचारधारा की लड़की है। उसका सोचना है कि समस्या चाहे किसी भी देश की हो वास्तव में पूरे समाज की समस्या है। आज स्थानीय समस्या वैश्विक समस्या भी है। ग्लोबलाइजेसन का जमाना है।
वह बताती है कि आतंकवाद एक बीमारी की तरह है यह अज्ञानता और धर्मान्धता के वायरस से समाज में फैलती है। इसे रोकना बहुत जरूरी है।
अगर हम अपना कूड़ा पड़ौसी के दरवाजे पर डालेंगे तो वह अपने द्वार पर ही उड़कर आता है। अर्थात पड़ौसी का घर साफ नहीं है तो हमारा घर कैसे साफ रह सकता है।
तभी दूरदर्शन पर पकड़े गये आतंकी को दिखाया जाता है। आतंकी बताता है कि उसे आतंकवादी शिविर में कहा गया था कि यदि वह हमले करेगा तो उसे जन्नत मिलेगी और वहाँ की कुंवारी लड़कियों से विवाह होगा। उसके परिवार को 5 हजार डॉलर भी मिलेंगे।
कौशल्या बोलती है- अपनी मां को अनाथ और अपनी पत्नी को विधवा बनाकर स्वर्ग जाएगा। मारूंगी दो सोटी। ये लोग क्या जाने माँ का दर्द. अपने दो बेटे खोकर मैंने कैसे जीवन विताया है, मुझसे पूछो।
इन्हें चाहिए कि मेहनत मजदूरी करके इज्जत की जिन्दगी जिएँ। वैसे ही आम आदमी के लिए गुजारा करना कठिन है। ये अधर्मी लोग भोले भाले बच्चों को फुसलाते हैं। ये फुसलाने वाले अधर्मी हैं, पाखंडी हैं, आदमी की शक्ल में चंडाल हैं। ये अधर्मी इन आवारा, कामचोर युवाओं को सब्जबाग दिखाकर आम जनता का खून चूसने के लिए छोड़ देते हैं। और ये अपने ही भाई बहनों का खून करने में नहीं हिचकते। कौशल्या को बहुत गुस्सा आता है।
अमृता ने दादी को बताया कि सीमाओं पर सेनाओं की हलचल होने लगी है। कौशल्या कहती है- कहीं युद्ध न छिड़ जाए। फिर हमारे मुल्क हथियार खरीदेंगे। देश की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा। आधी जनता तो पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव झेल रही है। वही पैसा अब युद्ध में लगेगा। कौशल्या बुद्धि जीवियों की तरह बात करती है।
अमृता हंसते हुए चुटकी लेती है- दादी तुम्हें तो नेता होना चाहिए। दादी बोलती है- सभी नेता बन जाएंगे तो घर कौन संभालेगा। बड़ी मुश्किल से तो दिल्ली में यह घरोंदा तैयार किया है.
कमला को लाहौर की बातों में कोई रुचि नहीं है। वह कहती है हमारी दिल्ली...हमारा चाँदनी चौक सबसे अच्छा है। हम मरते दम तक यहाँ रहेंगे।
कौशल्या भी यही कहती है- लाहौर छूट गया पर अब दिल्ली नहीं छोड़ूँगी।
अंत में अमृता कमला से सरसों का साग और मक्की की रोटी खाने का अनुरोध करती है। इसमें दादी के लाहौरी हाथों की गंध है।
इस कहानी में बंटवारे का दर्द, आतंकबाद की समस्या, युद्ध की समस्या, आदि पर चर्चा है। बहस भी है। नई पुरानी पीढ़ी का संघर्ष भी है। //जहाँ रहो सोई सुंदर देशू // की बात भी है. मातृ भूमि से प्यार की बात भी है, अपनी संस्कृति अपने खान पान का भी जिक्र है। तथाकथित धर्मांधों के प्रति रोष भी है। युद्ध से होने वाली हानि की ओर संकेत भी है। आतंकवादियों के प्रति रोष और दया भी है।
कहानी अंत तक जाते जाते शीर्षक पर जा टिकती है। लेखक ने पंजाबी भाषा का पुट भी बहुत अच्छा दिया है। पात्रों के अनुकूल भाषा है। कुल मिलाकर यह एक सफल कहानी है।
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© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन, 
विषय**क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है ****
        शब्दों की सृजना से वैसा ही सम्बन्ध है, जैसे शरीर का आत्मा से सांसों से ।शब्द वही सार्थक माने जाते हैं, जो ज़ख्मों पर मरहम का काम करे । श्रद्धा, क्षमा, दया ,कृपा समता शब्दों के श्रृंगार हैं ।जब कोई अपना भिल जाता है ,दो मीठे शब्द बोलता है ,ह्रदय प्यार से भर जाता है ।कोमल और सुन्दर शब्दों से बिगड़े काम बन जाते हैं, रिश्तों में मधुरता आ जाती है ।शब्दों से जीवन का रिश्ता आदिम युग से है ।मन मस्तिष्क की धधक से और ठन्डी फुहार से ।शब्दों का रिश्ता कलाओं के लालात्य से भी गहरा अटूट है ।
         शब्द हैं अनमोल तोल तोल के बोल ।शब्द अनन्त आकाश गंगाओं को धरती पर आने हेतु निमन्त्रण देते है, शब्द हरी भरी धरती को बंजर बना देते हैं ।हर एक दुखी इस धरती पर सुन्दर शब्दों की आस लिये ।
शब्दों के मोती ढूँढा करता है ।सुन कर प्रमुदित हो लेता है । 
           जब शब्दों में अंहकार का अट्टहास होता है तो बहुत कोमल नज़दीकी रिश्ते धराशायी हो जाते हैं ।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी 
जोधपुर (राजस्थान)।।

नमन मंच
आज का विषय - शब्दों से बिगड़े काम बन सकते हैं
जी हाँ ! शब्दों से बिगड़े काम बन सकते हैं ।
हमारे मुंह से निकल हुए शब्दों का खुद के और सामने वाले के ऊपर बहुत प्रभाव गहरा प्रभाव पड़ता है।
कई बार तो शब्दों का सामने वालों के ऊपर इतना गहरा असर पड़ता है कि उसकी पूरी जिंदगी ही बदल जाती है।
हमारे कहे गए शब्द किसी के जीवन को सुधार सकते हैं,खुशियाँ दे सकते हैं ।
ये जरूरी नहीं कि हमें केवल मीठे शब्द ही बोलने चाहिए। माता -पिता या अभिभावक -गुरु,मित्र अपने बच्चों को ,छात्रों को मित्र को सही राह दिखाने हेतु कड़बे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं
विद्योतमा ने कालिदास से मीठी वाणी में तो नहीं कहा होगा कि "अब तुम विद्वान बनकर घर लौटना!"लेकिन उनके शब्दों का कालिदास की दिमाग और ह्रदय पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह महाकवि बनकर ही घर लौटे ।
नारद मुनि ने रत्नाकर डाकू से उपदेशात्मक शब्दों में कहा-"जाओ और अपने परिवार से पूछकर आओ कि वे लोग तुम्हारे पापों के भागीदार बनेंगए या नहीं।"
उनके शब्दों ने एक डाकू को महाकवि वाल्मीकि बना दिया।
 अच्छी शब्द सामने वाले के हृदय और दिमाग दोनों जगह गहरा प्रभाव डालते हैं।
लेकिन जो बुरे या स्वार्थी शब्द होते हैं वह सामने वालों के मस्तिष्क पर ही प्रभाव डालते हैं वे बातें दिल तक नहीं जाती हैं। क्यों हमे युगों की ,शताब्दियों की महान पुरुषों द्वारा कही गई बाते यैद हैं, हम उनकी आज भी चर्चा करते हैं, अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि उनकी बातें हमारे जीवन की धरोहर हैं ,किसी की जिंदगी बदल सकती हैं। महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी,विवेकानंद इत्यादि महापुरुषों ने कितने ही दींन दुखियों के जीवन मरण आशा का प्रकाश फैलाया।

मधुर और शीतल वाणी बंजर में बर्फ के सोते की तरह काम करती है,पतझर में वसंत जैसी प्रतीत होती है।
अमावस्या में पूर्णिमा का प्रकाश फैलाती है।
मधुर वाणी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है बशर्ते उसके भाव निष्कपट और निःस्वार्थ हों।
इसके विपरीत हम बड़े बड़े नेताओं की बाते कुछ समय बाद भूल जाते हैं। आजकल के अवसरवादी नेतागण इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं।
आजकल व्यवसाय के क्षेत्र में भी अवसरवादी शब्दों का बहुत चलन है।
आजकल कुछ लोग मीठे मीठे लेकिन तीखे शब्द बोलकर सामने वाले का सीना छलनी कर देते हैं।
इसका मतलब ये नहीं कि हमें सदा कटु ही बोलना चाहिए।
मीठी किन्तु हितकारी वाणी जो सामने वाले जे मन और मष्तिष्क दोनों जगह समा जाए ऐसे शब्द बोलने चाहिए।
हमें अपने शब्दों को हमेशा नापतोल कर बोलना चाहिए।
बहुत ज्यादा व्यर्थ शब्द बोलने से अच्छा है कि हम कम शब्द बोले किन्तु सार्थक बोलें।
मीठी वाणी की तो हमारे वेद,पुराणों और कवियों की रचनाओं में भूरि भूरि प्रशंशा की गई है।
ये श्लोक एक पुस्तक से लिया है:-
एक श्लोक के साथ अपनी लेखनी को विराम देना चाहती हूँ:---
      "न तथा शीतलम सलिलं,न चंदन रसेन शीतल छाया।
       प्रहलद्यति च पुरुषं, यथा मधुर भाषिणी वाणी।"
अर्थात:-
   जिस तरह से मधुर वाणी किसी के हृदय शीतल करती है, उस तरह से न तो चंदन के रस शीतलता न ही शीतल छाया शीतलता प्रदान करती है।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

मौलिक एवम स्वरचित

माँ शारदे को वंदन 🙏
अग्नि शिखा- काव्य मंच को नमन 🙏 
" क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ काम बन सकता है "

जी हाँ शब्दों के द्बारा बिगड़े काम बन सकते हैं! शब्द तो व्यक्तित्व का आईना होते हैं ! बोली से इन्सान का आन्तरिक 
व्यक्तित्व का पता चलता है ! जहाँ कड़वे शब्द आत्मप्रदेशों में आग लगा देते हैं वहीं मीठे शब्द आत्मांँ में उतरकर इन्सान को गदगद कर देते हैं !

वाणीं ऐसी बोलिये मन का आपा खोए , 
औरन को शीतल करे आप ही शीतल होय !

मौन शब्द से ज्यादा मुखर होत है !
कहते हैं कमान से निकला तीर ओर मूँह से निकले बोल कभी वापस नहीं आते ! इस लिये शब्दों का प्रयोग सोच समझ कर तोल कर करना चाहिए !
पुरखे कहते बोली ऐसी बोलो जो हीरों के बराबर तोली जा सके आर उसका मोल हो ! 
जीभ को इसी लिए दो होठों के कपाट में बंद रखा गया है कि उसका अनावश्यक प्रयोग ना हो !

दुनियां के आधे झगड़े, बोलने से होते हैं ,
बोलकर बनाते इज्जत ,बोलकर ही खोते हैं !
है सही पहचान वाणीं ,बोल क्यों गंवाता है ,
तोल करके शब्द बोलो ,मौन शक्ति दाता हैं !

समझदार इंसान वक्त पड़ने पर कहते भी हैं !

सतसैया के दोहरे ,ज्यूं नाविक के तीर ,
देखन में छोटे लगे ,घाव करत गंम्भीर !

तलवार का घाव तो फिर भी मिट जाता है मगर बोली का घाव कभी भी नहीं मिटता !
जो व्यक्ति मीठा और सकारात्मक भाषा का प्रयोग करता है वह परिवार और समाज दोनों में इज्जत पाता है !
पति -पत्नी,सास- बहू , देवरानी-जेठानी सभी रिश्तों के पोषणं में मीठी बोली अपना असर करती है और रिश्ते मजबूत बनते हैं! ।
एक सफल अधिकारी वहीं होता है जो अपनें अधिनस्थ कर्मचारियों से मधुर व्यवहार करता है!
एक सफल डाॉ• वहीं होता है जो मरीज को मीठे शब्दों में आश्वासन देता है और अपनें मरीज की आधी पीड़ा हर लेता है !
एक नेता अपनें मघुर शब्दों में अपनीं बात जनता तक पहूँचा सकता है !
बोली से हमारी जाति ओर औकात का पता चलता है !  
सोहार्द मघुर व्यवहार सभी को अपना बना लेता है ! मीठी बोली उलझी गांठों को खोल देता है ! मीठे शब्दों से बिगड़ा काम बन सकता है !

कागा किसका लेते हैं ? कोयल किसको देते ?
बोली ही के कारणें जग अपनों कर लेत! 

मित्रों अपनी व्यवहार और शब्दों को मघुर बनाइए और अपनें बिगड़े काम संवारिये !
संसार में एक बोली ऐसी चीज है जिसके पैसे नहीं लगते ?
सोच समझ कर किये गये शब्दों का प्रयोग अमूल्य होता है !
मित्रों अपने शब्दों से अपने साफ हदय का बिम्ब दिखाइये !!

सरोज दुगड़
खारूपेटिया , गुवाहाटी
असम 
🙏🙏🙏


**अग्नि शिखा मंच*
      **जय माँ शारदे**
   **२३/०६/२०२१**
**क्या शब्दों से बिगडा़** **काम बन सकता है**
ये बात सोलहो आने सत्य है कि **बाते हाथी पाईये, बाते हाथी पाव** किसी कवि ने अच्छा लिखा है। पर बात खरी है। एक शादी की सच्ची घटना है। पुर्वांचल में शादी के पहले एक रश्म होती है जीस मे भसुर यानी लड़के बड़े भाई। जो जेवर और कपडे़ के साथ आते है।
जो की काफी महत्व रखता है।उससे हैसियत नापी जाती है।
इस शादी मे भसुर जी ताम झाम लाव लश्कर के साथ आये।स्त्रियां भसुर जी गाली देने लगी जो की गाया जात है उस गाली औरते भसुर जी को गरीब बना दी **भसुर जी जेवर लाये** **जेवर तो हल्के है।इनके** **घर बिटिया ना ब्याहिब** **भसुर जी कंगले है**।भसुर जी को लौटा दो बरात ले के। बस भसुर जी सुने उनके साथ उनके दोस्त आये ओ भी सुने वे सब कहने कैसे रिस्तेदार है जो आप को गरीब कह रहे है।और कह रहे है बरात वापस जाओ। उठिये चलिए सामान उधर का नाऊ उठा रहा था। तब तक ईधर की नाउन उसका हाथ पकड़ ली। बोली **तुहरे पर ए नाऊ मनवा** **मोर लोभाईल हमहु चलबे** **तुहरे साथे**। सब बरात वाले इसकी नौटंकी देखने लगे इतनी देर मे लड़की का भाई आ गया अनजान बनते हुए पूछा क्यों बाबू आप लोग खडे़ क्यौ है तो भसुर जी बोले हम गरीब है तो आपकी बहन से शादी कैसे करे ।हम लोग बरात ले के वापस जा रहे है।वह बोला ये बात कहा से आई *तो फिर वही नाउन बोली** **एक बापे क होइब त बिअही** **के जइब**** **दुई बापे क होइब†* **त भागी जइब**।सब लोग हंसने लगे अब माहौल हल्का हो गया था। लड़की का बड़ा भाई नम्रता से बोला हमारे यहां परिहास होता है।अगर बुरा लगा हो तो माफ करिये
अब ऐसा नही होगा औरते जब माजरा समझी वह भी हाथ जोड़ सामने आगई। एक उम्र दराज बोली बाबू हम लोग मजाक कर रही थी आप कहे तो उठक बैठक कर दें।भसुर जी बोले अरे नही हम भी मजाक कर रहे थे इस प्रकार नाऊन की मीठी बात से बात बन गई।
कुशल पुर्बक शादी सम्पन हूई।सब लोग नाउन के हाजीर जबाबी का सराहना कर रहे थे।
भोज पुरी शब्दो के अर्थ।
तुहरे पर। -तुम्हारे पर
लोभाईल। -मोहीत होना 
बिअही। .. . शादी
जइब। जाना
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरखपुर यू.पी

"नमन अग्निशिखा मंच
विषय -;गद्य लेखन(आलेख)
प्रदत्त पँक्ति;-"क्या शब्दों द्वाराबिगड़े काम भी बन सकते हैं।।""
  "आलेख""
शब्दों की महिमा निराली होती है।।शब्द ही वो होते हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति या तो दिल मे उतर जाता है अथवा दिल से उतर जाता है।।
कहते हैं न कि मुंह से निकले शब्द व कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आता।।इसी लिए हम सभी को सोच विचार कर के बोलना चाहिए।
शब्दो के द्वारा बनी बात बिगड़ जाती है तो बिगड़ी बात बन भी जाती है।।शब्दों व वाणी का माधुर्य ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचायक होता ।इनके द्वारा ही मनुष्य का परिवेश व परवरिश परिलक्षित होती है।। 
सनातन काल से ही हमारी संस्कृति में अनेक उदाहरण ऐसे दर्शित होते हैं जिनमे वाणी का माधुर्य बड़े बड़े क्रोधी जन का क्रोध शांत कर बिगड़ी बात को बना देता था जैसा कि श्री राम स्वयंवर में प्रभु श्री राम ने शिव धनुष तोड़ने पर क्रोधित हुए ऋषि परशुराम की क्रोधाग्नि जो लक्ष्मण जी के वचनों से बढ़ती जा रही थी उसे अपने मधुर शीतल वचनों से शांत कर दिया व समस्त जनता को ऋषि के शाप से बचा लिया।।
वर्तमान में भी हम सभी के जीवन मे अनेक ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं जहाँ हम अपने धैर्य ,सहनशीलता ,व संतुलित शब्दों में मधुर बोल के द्वारा बिगड़ी बात बना लेते हैं।।
अंत मे मै अपनी बात निम्न पंक्तियों से समाप्त करना चाहूंगी। 
"कोयल काको देत है ,कागा कासे लेत 
मीठी बोली बोलि के जग अपना कर लेत।।

निहारिका झा।।।🙏🙏

क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है?
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 आज का विषय बहुत ही अच्छा है, कि क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है?
जी हां यह शब्द या वाणी ही है, जो अपनों को पराया और पराया को अपना बना देता है ।जब भी आप किसी से बोलते हैं, तो वाणी में अहंकार नहीं होना चाहिए। जो भी आपको बोलना है, तो उसके पहले तोल -मोल कर देख लेना चाहिए, कि सुनने वाले के अहम् को चोट तो नहीं पहुंचा रहा है, या सुनने वाले के दिल में घाव तो नहीं कर रहा है ।यह शब्द ही है जो जिंदगी को या फिर स्वभाव को परिवर्तित कर सकती है। शब्दों का इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि, चोर उचक्का भी अच्छा इंसान बन जाता है और अच्छा इंसान भी बुरा काम करने लगता है ।अच्छी वाणी को सुनकर मनुष्य, पशु- पक्षी सभी खुश हो जाते हैं। शब्दों का प्रयोग ऐसा करें जैसे कि गागर में सागर हो। 
शब्दों को जोड़ दें, भावों की अभिव्यक्ति हो,
बिगड़ा काम बन जाए, शब्दों में इतनी शक्ति हो।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी ,
619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210

अग्निशिखा मंच को नमन 
दिन : बुधवार 
दिनांक : 23/6/21 
विषय : *क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है* 
विधा : लेख

मधुर वचन तें जात मिटै, उत्तम जन अभिमान।
तनक सीत जलसों मिटै, जैसे दूध उफान।

तुलसी दासजी के इस दोहे में ऐसे कहते हैं कि जैसै दूध उफानते समय थोडा ठंडा छिटकने से उफान कम होता है उसी तरह घमंडी आदमी का अभिमान तोडने हेतु मधुर वचन से बोलना है।इससे उत्तम लोगों की दोस्ती मिलेगी।
भाषा मनुष्य के विचार व्यक्त करने मात्र बल्की कडुवी बातों से किसी का दिल दुःखाने नहीं। अक्सर कठोर वचन से ही घर -परिवार में झगडे होते हैं। बिना सोचे बोले बातों से रिश्तों में दरार आ जाती है। माँ -बाप से बच्चे दूर हो जाते हैं पति से पत्नी दुर हो जाती या दोस्ती टूट जाती है।इसलिए सम्भालके बात करना जरूरी है। बात ऐसी होनी चाहिए खुद को भी अच्छा लगे और औरन को अच्छा लगे।कबीरदास जी अपने दोहे में जिक्र किया है। 
 जिस तरह हिंदी साहित्य मेध दोहा है उसी तरह कन्नड साहित्य में वचन एक विधा है।कन्नड के वचनकार श्री बसवेश्वर अपने वचनो में ऐसे कहा है कि बोली ऐसी बोलनी चाहिए हमारी बातों से लिंग (ईश्वर ) उठकर हाँ ..हाँ..बोलनी चाहिए। 
बातों एक शक्ति है उससे बात बिगड भी जाती है और बनती भी है। सदैव हमें सोच समझकर बोलनी चाहिए। हाँ जरूर जिस तरह हमारी बातों से बात बिगडती भी है उसी तरह बात बन भी जाती है।एक -एक बात तीर की तरह किसी का दिल नहीं चुभना नहीं है दिल खिलना है। दरारा बंद करने की बात होनी चाहिए।आनंदित परिवार में नमक छिडकने का काम नहीं करना है। 
  हमारे शब्दों के द्वारा बिगड़ता काम जरूर बन सकता है।लेकिन बातों से दो दिलों को जोड़ने का काम होना चाहिए। अक्सर लोग अभिमान से कठोर वचन बोलकर घाव भरजाते है। पर चसी घाव पर मरहम न लगा दिया तो नासूर बन जाता है। इसलिए नासूर बनने के बाद आपरेशन करने के पहले ही छोटी सी करोंच को भी इलाज कर सकते हैं। प्रेमचंद जी की कहानी *बडे घर की बेटी* कहानी में आनंदी को उसका देवर कडवी बातें बोलकर प्रत्येक घर बसाने तक बात बिगड जाती है। पर आनंदी के बडप्पन के कारण देवर क्षमा कर फिर दोनो भाई को मिला देती है।बिगडी हुई बात को बना दूती है। महाभारत में दुर्योधन की बातों के कारण महाभारत 
युद्ध हो जाता है। कैकेयी वचनों से राम वनवास जाता है वहीं भरत की वाणी से कैकेयी का मन में परिवर्तन हो जाता है। इसलिए शब्द ऐसे प्रयोग होना चाहिए उससे बिगडे काम बन सके।
रहिमन जाह्वा बावरी ,कहि 
गइ सरग पाताल ।
आपु तो कहि भीतर रही ,जूती खात कपाल।।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय।


।बुधवार दिनांक**२३/६/२१
विधा****लेख
विषय**
    #**क्या शब्दों द्वारा
               बिगड़ा काम 
                   बन सकता है ?**#
       
    मित्रों,
         इस सवाल का उत्तर हां है । क्योंकि शब्द तीर की तरह होते हैं जो सीधे दिल को चुभते हैं । इसलिए कहीं कुछ बोलने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है ।
बोले हुए शब्द वापस नहीं आते ।एक बार यह शब्द रूपी बाण चले तो लौट के नहीं आते ।
     मधुर शब्द संबंध जोड़ते हैं दुश्मन भी मीठी कोमल वाणी से मित्र बन जाता है । मगर कटु और कटु शब्द संबंध खराब करते हैं । पास के दूर चले जाते हैं । अनाप-शनाप बोलने वालों से लोग मिलने से कतराते हैं ।
      द्रोपदी ने दुर्योधन से कहा था के अंधे का बेटा अंधा है इसलिए गिर पड़ा । इन्हीं कठोर शब्दों से महाभारत का युद्ध हुआ ।
       मधुर शब्दों से रिश्तों के मधुर महल खड़े होते हैं । कठोर कटु वचन वाणी से बने बनाए रिश्तो के शिखर टूट के बिखर जाते हैं ।
          शब्द ब्रह्म भी कहलाते हैं ।
इसलिए शब्दों का प्रयोग हमेशा मधुर ही हो । हमारे ग्रंथ गीता रामायण और संत महंत, हमको प्रेम की भाषा सिखाते है ।
          प्रेम से बड़े बड़े काम होते हैं बस हमारी वाणी कोमल मधुर प्रेममय हो ।
हे मनुज तू सदाही, 
        मीठी वाणी बोले ।।
 प्रेमकी फिजामें जहर,
        नफ्रत का न घोले ।।
 बना लें अपना किसी को,
        या किसी का होले ।।

प्रा रविशंकर कोलते
       नागपुर 
          महाराष्ट्र

🌺बुधवार -23/6/2021
🌺विषय - क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते है 

शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्द में बड़ी शक्ति है। युद्ध करा सकता है… यह शांति स्थापित कर सकता है। इससे लाठी गोली चल सकती है, सांप बिच्छू का जहर उतार सकता है। 
शब्द हंसा सकता है, रुला सकता है, जोश दिला सकता है। बातें हाथी पाइए बातें हाथी पांव। शब्द आपको पुरस्कार दिला सकता है, दंड फीला सकता है। शब्द क्या नहीं कर सकता। वो शब्द ही था जिसके कारण महा भारत का युद्ध हुआ। वह शब्द ही थे जिसके कारण बाल्मिक डाकू से महर्षि हुए। वह शब्द ही थे जिनसे अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हुआ। वह शब्द ही थे जिनके कारण एक मूर्ख कालीदास कवि बना। वो शब्द ही थे तुलसी दास महान कवि बने। और कवियों के पास शब्द ही होते हैं कि उनकी एक कविता और जन लूटा देते हैं। 
जब भी कभी किसी समस्या को सुलझाना हो तो शब्दों की अहम भूमिका होती है। शब्द बिगड़े कामों को बना लेते हैं। शब्द में बड़ी ताकत है। और अंत में शब्द ब्रह्म की जय। 
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© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अग्निशिखा मंच
तिथि-२३-६-२०२१
विषय-क्या श‌ब्दों से बिगड़ी बात बनाई जा सकती है


जरुर बनाई जा सकती है।ऐसे ही किसी ने थोड़ी बो‌ला है-
तोल ‌मोलकर बोलिये,
‌ये‌ शब्द बड़े अनमोल
एक शब्दघाव करे
एक बढ़ावै मोल
 क‌ई‌ बार जब बात ब‌हुत बिगड़ जाती है तो किसी बड़े ,अनुभवी, और शांत आद‌मी को बात करने के लिये ‌भे‌जा जाता है क्यों कि जब सोच समझ कर शांतिपूर्वक कोई बात कही ‌जाती है तो उसका प्रभाव स‌कारात्मक होता हैऔर बिगड़ती बात बन जा‌ती है।

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र

अ. भा. अग्निशिखा मंच

🌺बुधवार -23/ 6/2021
🌺विषय - शब्दों से बिगड़ी बात बनाई जा सकती है।

वाक शक्ति एक कला है यह विचारों का आदान प्रदान करती है जीव्हा सब को मिली है पर बोलना बहुत कम लोगों को आता है। इस कारण वाणी के द्वारा हम किसी को भी जीत सकते हैं इसे मैं एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करती हूँ। एक बार राजा अपने मंत्री और सेवक के साथ शिकार खेलने गया। रास्ते में राजा को प्यास लगी। उन्हें सामने एक झोपड़ी दिखाई दी। राजा ने अपने सेवक को झोपड़ी से पानी लाने के लिए भेजा। वह गया और उसे झोपड़ी में एक महात्मा जी दिखाई दिए जोकि देख नहीं सकते थे। उसने आवाज लगाई "अरे! अंधे पानी मिलेगा क्या?" महात्मा जी ने कहा कि मैं सेवक को पानी नहीं दूंगा। वह रास्ते में उसको कोसता हुआ राजा के पास गया और कहा कि महाराज उसमें पानी देने से इनकार कर दिया।
 फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने मंत्री को भेजा।
 मंत्री ने कहा, हे अंधे बाबा! पानी मिलेगा क्या? महात्मा जी ने कहा कि मैं मंत्री को पानी नहीं दूंगा। वह भी खाली हाथ लौट आया और उसने राजा को सारी बातें बता दीं। राजा कुछ सोचते हुए स्वयं पानी लेने झोपड़ी पर गए और कहा कि महात्मा जी मुझे प्यास लगी है पानी देने की कृपा करेंगे क्या? महात्मा जी ने कहा-आइए राजन बैठिए मैं पानी लेकर आता हूँ। तब राजा ने कहा एक बात बताइए आपको कैसे पता लगा कि पहला सेवक था दूसरा मंत्री था और मैं राजा हूं। महात्मा जी ने कहा कि उनकी वाणी से। इससे पता लगता है कि वाक शक्ति के द्वारा आप किसी को भी अपना या पराया बना सकते हैं।
 बोली में ही इंसान को जिंदा करने की ताकत होती है।रुप में वह जादू नहीं जो बोली में होता है।
वनप्रिया (कोयल) का रुप भद्दा है, मगर हर आदमी उसकी बोली का कायल है। बोलने का तरीका आकर्षक होना चाहिए। मीठी बोली वह जादू है, जिससे मनुष्य उनके भक्त बन जाते हैं। अमीर, गरीब, पदाधिकारी कड़वी जबान किसी को भी नही भाती।
इससे पता चलता है की बोली के द्वारा किसी को भी अपना बनाया जा सकता शब्दों से बिगड़ी बात बनाई जा सकती है।

वैष्णो खत्री वेदिका


विषय ,,

✒️शब्दो से बिगडी बात बनाई जा सकती है✒️

*शब्दों से ही बिगड़ी बात बनाई जा सकती है यह बिल्कुल सत्य और यथार्थ है सारा खेली शब्दों का है* शब्दों के द्वारा बिगड़े काम की बर्फी जम सकती है, मुलायम सुंदर मीठी।
 और इन्हीं शब्दों के द्वारा मोतीचूर के लड्डू की भांति बिखराव भी हो सकता है।

उदाहरण,,,, एक बार राजा अकबर के दरबार में एक ज्योतिष आए, राजा को देखकर कहने लगी कि है,राजन तुम्हारा पूरा खानदान तुम्हारे सामने खत्म हो जाएगा ,राजा को गुस्सा आया उसने दंड दे दियाl

पुनः दूसरे दिन दूसरे दिन दूसरा ज्योतिष ने आकर अपनी किस्मत आजमाई और कहा,,
 हे राजन तुम्हारे खानदान में तुम्हारी बहुत लंबी आयु है
मतलब सारे खानदान की लोगों की मृत्यु राजा के सामने हो जाएगीl
देखिए मतलब वही था पर शब्दों के हेरफेर ने एक को सजा दी तो एक को इनामl

शब्द कहां और कैसे और किस ट्रिक से बोलने ही बहुत मायने रखता है। शब्द तो ले जाते हैं टटोले जाते हैं ।

इस प्रकार शब्दों के द्वारा ही कोई तीखी मिर्ची बाजार में भी बेच आता है,,
  या गंजे को कंघी बेच आता है।
और यदि शब्द सही नहीं है तो बाजार में मधु (शहद ) बेचना भी बहुत कठिन हैl

 *शब्द औषधि भी है घाव भी है शब्द के सुधरने से जीवन निखरता हैl शब्दों से मुस्कुराहट आती है और शब्द खिल जाते हैं* 
ताव देते, लड़ते झगड़ते शब्दों से सब डरते हैं ,, सिहरते हे, और कार्य बिगड़ जाते हैंl
 शब्दों को सोच समझकर बोले बिन सोचे बोले नहीं,

*

*संदेश*

 *शब्दों में विनम्रता होनी चाहिए* *घेगीयाहट, या कमजोरी नहीं* 
*तभी कार्य बनते हैं*

 सुषमा शुक्ला इंदौर स्वरचित

अग्नि शिखा
नमन मंच
दिनांक --: 23/6/2021
विषय--: क्या शब्दों से बिगडी़ बात बनाई जा सकती है ?

अवश्य बनाई जा सकती है! 
शब्द एक मायाजाल है... 
समय, स्थान और स्थिति के अनुसार शब्दों का व्यवहार करना चाहिए ! वैसे भी कहा जाता है कि नाप तौल कर बात करनी चाहिए चूंकि --
शब्द ही मल्हार है,शब्द ही तलवार
शब्द शब्द में फर्क है
एक दे प्यार दूजा करे प्रहार !

इसीलिए हम कहते हैं कि क्रोध आने पर अपनी
जबान पर लगाम कसनी जरुरी है चूंकि कमान से निकले तीर का घाव तो भर जाता है पर निशान छोड़ जाता है! 

मुख से पहले निकले शब्द
       ध्यान रहे सदा
जो कटु वाणी बन निकले शब्द
       बन जायेगी सजा! 

अतः यदि मनमुटाव हो गया हो और बात बहुत बिगड़ जाती है तो नीरजा जी ने सही कहा है कि किसी अनुभवी और शांत आदमी को भेजा जाता है चूंकि उम्र के साथ अनुभव को जो शब्द मिलते हैं वह अपनी मर्यादा के अनुसार नाप-तौल के होते हैं! कब, कहां, किससे क्या बोलना है उन शब्दों का चयन अपने और सामने वाले के स्वभाव के हिसाब से होता है! 
इसका प्रभाव सकारात्मक और गहरा होता है ! बात बिगड़ने से पहले बन जाती है! 

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई

क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बन सकता है? --- ओमप्रकाश पाण्डेय
ऐसी बानी बोलिये 
मन का आपा खोये
दूजे को शीतल लगे
आपहूॅं शीतल होये
यह रहीम दास जी का प्रसिद्ध रचना है. हर व्यक्ति ने अपने जीवन में यह अनुभव किया होगा अगर आप किसी से कोई आग्रह करे और केवल " कृप्या या अंग्रेजी भाषा में प्लीज " शब्द का उपयोग सामनेवाले को सम्बोधित करते हुए सबसे पहले कर दें तो कम से कम वह आपकी बात को ध्यान से सुनेगा जरूर.
आपके द्वारा किये गए शब्दों का चयन व , उसका सही ढंग से व विनम्रता के साथ उसे उपयोग करके, यदि आप अपनी बात कहेंगे तो आपके बातों का प्रभाव काफी सकारात्मक होगा. कभी कभी ऐसा भी होता है कि आप अनावश्यक ही अपनी बात को इस ढंग से कहते हैं व ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं कि सामनेवाले को बुरा लगता है या वह आपके बातों को अन्यथा ले लेता है, जिससे कि आपका जो काम होनेवाला है वह भी नहीं होता या विलम्ब से होता है.
इस कारण से यह आवश्यक है कि जब आप किसी से कोई बात कहते हैं ( अगर कोई बिपरित परिस्थिति है तो बात दूसरी है) तो अपनी बात उचित शब्दों का उपयोग करें और उसे जहाँ तक हो सके विनम्रता या उचित ढंग से कहे, क्योंकि सही ढंग से नहीं कहने पर काम बिगड़ जाने की सम्भावना काफी रहती है.
( यह मेरी मौलिक रचना है -- ओमप्रकाश पाण्डेय)

नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु मैं मेरी कथा प्रस्तुत करती हूं।
विषय- शब्दों के द्वारा भी बिगड़े हुए काम बन जाते हैं।

शब्दों द्वारा भी बिगड़े हुए बातें अच्छी बन जाती है क्योंकि हमारे जीवन में शब्द ही सबसे अनमोल रत्न है। शब्द तलवार की धार जैसे होते हैं। शब्दों के घाव दिल पर तलवार की घाव की तरह चुब जाते हैं। इसीलिए हमें हर एक शब्द मुह से निकलने से पहले हजार बार सोचना चाहिए, और हमारे शब्दों से किसी भी‌ ह्रदय को चोट नहीं पहुचने चाहिए, यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।
 
" भले ही चोट लगे शरीर पर वह भी मिट जाए पर दिल को लगी शब्दों की चोट कभी ना मिट पाए"
    
   कई सारे लोग होते हैं जो बिना विचार करते ही अपने कठोर वाणी से दूसरी आत्मा को ठेस पहुचाते हैं, लेकिन हमेशा के लिए मीठी वाणी होनी चाहिए, जिससे हमारे जिव्हा से निकले हर एक शब्द में मधुरता, आत्मीयता ,दूसरों के प्रति प्रेम, आदर ,यह भाव दिखना चाहिए।    

     हम भले ही हर एक व्यक्ति का दुख मिटा ना सके, पर हम हमारे वाणी से हर एक को, दो पल की खुशी तो दे सकते हैं। इसीलिए हमारे "मुंह में हमेशा के लिए शक्कर और सिर पर बर्फ रखना चाहिए "। 
मीठे शब्द हमेशा के लिए सुख की खान की तरह होते हैं और विषमता के शब्द /कठोर वाणी हमेशा के लिए दुख की ढेर होती है, कड़वाहट पैदा करती है। 
    शब्द या तो रिश्ते को महका सकते है ,या तो रिश्ते को बिखरा सकते हैं। अब हमें ही शब्दों को चुनना होगा ।
 शब्दों को काटो के चुभन सा तड़पाना है, या प्यार भरे भावनाओं के साथ शब्दों को पिरोना है। 
    मुझे तो यह कहना है " हम हमारे प्यारे शब्दों से ही हमारे आत्मा से जुड़े हैं, दूसरे आत्मा से जुड़े हैं, और भावनाओं के साथ शब्द अगर जुड़े रहेंगे तो हर एक संबंध में, रिश्ते में निस्वार्थ प्रेम बहता रहेगा।

धन्यवाद
पुणे


एक गीत आज के विषय पर
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वाणी जीवन का अलंकार
--------------
जब चाहे यह पावक बरसे जब चाहे दे जगती को प्यार।
वाणी जीवन का अलंकार।।
वाणी से सब कुछ मिलता है सूखा उपवन भी खिलता है
मरुथल को देता यह सँवार।।
वाणी जीवन का अलंकार।।
दूसरे पास आ जाते हैं
अपनापन सहज निभाते हैं
मिट जाता है मन का विकार।।
वाणी जीवन का अलंकार।।
देवता धरा पर आते हैं
वैभव सुख सब दे जाते हैं
सुनकर जगजीवन की पुकार।।
वाणी जीवन का अलंकार।।
++++++
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी

अग्निशिखा मंच
विषय---क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बन सकता है? 
विधा---लेख 
दिनांक 23-6-2021 

             यह बिल्कुल सच है कि शब्दों द्वारा हम बिगड़ा काम बना सकते हैं । और हमारा काम शब्दों के कारण ही बिगड़ भी सकता है । इसलिए तो कहते हैं हमेशा बोलने से पहले सौ बार सोचना चाहिए । क्योंकि एक बार शब्द बाहर निकले तो वह वापिस तो किसी भी हाल में नहीं आएंगे । पर इसके कारण कभी गृहस्थी, कभी धंधे , कभी मित्रों में दरार आ जाती है । अगर भूलवश कभी हमसे कुछ शब्द गलत कहे गए हों तो हमें माफी मांग कर सुधार कर लेना चाहिए । क्योंकि माफी मांगने से कोई छोटा नहीं होता । लेकिन इससे रिश्तो में और मजबूती आ जाती है ।
              आज के भौतिक युग में अधिकतर लोग एक दूसरे की टांग खींचने में ही लगे रहते हैं । किसी को आगे बढ़ता देख उन्हें सुहाता नहीं । पर मेरा मानना है कि हमें टाँग खींचने की बजाए हाथ पकड़कर साथ साथ चलना चाहिए । एक दूसरे के विचार के भले अलग हो, पर हमें एक दूसरे की भावना को समझना होता। कभी-कभी छोटी-छोटी सी कहीं बातें घर परिवार की खुशियाँ बिखेर देती है । कहा जाता है कि जैसा व्यवहार हम दूसरों से चाहते हैं वैसा व्यवहार हमें भी सब के साथ करना चाहिए । अपनी वाणी में हमेशा मिठास रखनी चाहिए, कभी-कभी हम किसी की बात को समझने की भूल भी कर जाते हैं,या कभी कोई हमारी बात नहीं समझता चाहे हमारी मंशा किसी को ठेस पहुंचाने की नहीं होती पर बात को ना समझने के कारण बात बिगड़ जाती है । कभी-कभी तो दूसरों की नज़रों में अच्छा बनने की ख़ातिर कोई हमें किसी के अच्छे व्यवहार को भी गलत रूप में पेश करता है । और अगर हम उसे जानते हैं तो हमें इतना विश्वास तो होना ही चाहिए की यह बात वह इंसान कर सकता है या नहीं । किसी भी हाल में बातों के कारण ना तो रिश्तों में दरार आनी चाहिए ना मित्रता में । क्योंकि हम जैसा बोलेंगे वैसा ही तो काटेंगे मेरे ख़्याल से अगर हम अपनी वाणी में हमेशा मिठास रखें और दूसरों का भला करें तो बात कभी बिगड़ ही नहीं सकती ।
                   रानी नारंग

विषय।  क्या शब्दों के द्वारा बिगड़े काम बन जाते

शब्द का अस्तित्व बहुत ही मूल्यवान है यह अस्त्र भी है शस्त्र भी है औषधि भी है और दुआ भी है।
तुलसी मीठे वचन दे
सुख उपजत चहुं ओर
वशीकरण यह मंत्र है
तज दे वचन कठोर

जिन शब्दों से किसी को चोट पहुंचाई है गहरे घाव दिए हैं या काम बिगड़ गया हो उन्हें मीठे शब्दों या माफी के शब्दों के माध्यम से सरल तरीकों से काम बनाया जा सकता है। शब्द बखिया भी उघेडते है साथ ही शब्दों से ही तुरपाई भी की जाती है।
शब्द होते हैं तीर समान घाव करते हैं गंभीर लेकिन मीठे वचनों से मरहम पट्टी दवा भी शब्द ही करते हैं
बिगड़े रिश्ते सुधरते हैं अनबन झगड़े सब सुलझते हैं। शब्दों में अहंकार की भावना नहीं होने चाहिए। शब्दों के चयन में मिठास हो बोलने की ध्वनि में मधुरता हो तो बिगड़े काम आसानी से सुलझ जाते हैं
फीकी पे निकी लगे ज्यों विवाह में गारी।

कुमकुम वेद सेन


अग्निशिखा मंच को नमन 
आज का विषय आलेख
          *क्या शब्दो से बिगड़ी बात बिगडे काम बन जाते हैं*।

     आदिमानव के पास कोई भाषा नहीं थी। वह केवल इशारे से या कुछ आवाज निकाल कर अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करते थे। हर पशु पंछी की एक भाषा होती है इसलिए कहा गया है कि खग की भाषा खग जाने।
     मानव का सभ्यता संस्कृति से परिचय होने लगा कुछ भाषा तैयार हुई सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत देववाणी भाषा संवाद देवलोक संस्कृत में भावनाएं व्यक्त करते थे। भारत में अनेक भाषा वेशभूषा पंत धर्म अनेक है। इसलिए कहते हैं "विविधता में एकता, यह भारतीय संस्कृति है मानव को भाषा का वरदान मिला है मानव जनम ८४ योनि के बाद मिलता है ‌। इसलिए मानव ने अपनी भाषा शब्द मोल माप से इस्तेमाल करना चाहिए।  
     "जैसा कमान से निकला तीर फिर वापस नहीं आता वैसे ही शब्द बोलने के बाद वापस नहीं होते! यही कारण है इसके गंभीर परिणाम जिंदगी भर मानव भुगत ते रहता है। शब्दों के घाव बड़े गहरे होते हैं वह ताउम्र हो भूल नहीं पाता है किसी ने कहा है"*शब्द नच किमपि दरिद्रेण*"
अपनी भाषा शब्दों का प्रयोग शालिनता , विनम्रता से करना चाहिए। एक छोटी सी उदाहरण देता हूं बाजार में दो तोते बेचने के लिए आए। एक तोता पंडित जी पुजारी ने खरीदा और दूसरा तोता डकैत क्रूर आदमी ने खरीदा। कुछ दिन के पश्चात देखने में आया जो तोता पंडितजी खरेदी था वह राम राम बोलने लगा और जो तोता डकैत के पास था मारो पीटो मारो यह कहता इसका मतलब जैसी संगति वैसी भाषा शब्दों में बिगड़ी बात बनने की संभावना होती है। इसकी सच्ची घटना मैं आपको दोहरा रहा हूं ट्रेन में बहुत भीड़ थी एक सीट पर तीन आदमी बैठे थे चौथे आदमी को बैठने की गुंजाइश नहीं थी मैंने कहा भाई साहब थोड़ी जगह देते विनम्रता से कहा तीनों यात्री थोड़े सरकने, मेरे लिए जगह बन गई यह होता है भाषा में शक्ति, यही मैं कहा था जोर से कहता सर को तो मुझे जगह नहीं मिलती एनी मेरा काम बन नहीं बनता।
ऐसी वाणी बोलिए।
मन का आपा खोए।
औरौ को शीतल करे
आपहु शीतल होय।
      मधुर भाषा सबका मन जीत लेती है। एक बार मुझे कार्यालय जाना था 10:30 बजे जाना था ग् इलेक्ट्रिक बिल भरने के लिए लंबी कतार थी , फिर क्या करते एक बहनजी का नंबर तिसरा था।
मैंने ,बड़ी शालीनता से कहा"बहन जी मुझे कार्यालय जाने में देरी हो रही है मेरा इलेक्ट्रिक का चेक आप जमा कर देना, बहनजी ने बील और चेक लिया । मैं कार्यालय पहुंचा ही था की मोबाइल में संदेशा आया आपका इलेक्ट्रिक बिल जमा हो गया यह होती है शब्दों की जादू, शब्दों के घाव कभी नहीं भरते इसीलिए भाषा का उपयोग संयम से करना चाहिए जिस से संबंध भी अच्छे बनते और बिगड़े काम भी बनाए जाते हैं।

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर
दिनांक २३/०६/२०२१

मंच को नमन 🙏
23/6/21
विधा- लेख

क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते हैं....?
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,"शब्द को संभलकर बोलना चाहिए
शब्द के नहीं हाथ, नहीं पांव
एक शब्द में है औषधि का गुण
और एक शब्द में है असहनीय ज़ख्म"
 जी हां, शब्द अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त साधन है जिसे हम नकार नहीं सकते। भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषिक शब्द ही है,अंत: शब्द को असीमित शक्ति के कारण ही इसे परमब्रह्म माना गया है। जब हमारे शब्द सकारात्मक होंगे तो घर-परिवार, समाज,देश एवं विश्व में मंगलमय वातावरण बनेगा अन्यथा नकारात्मक शब्द गाली-गलौज, जीवन मूल्यों के विपरीत शब्द बोलने से तो अमंगल ही बढ़ेगा तथा द्वंद्व की स्थितियां बन जाएंगी।
कबीरदास ने इसको बहुत ही सुन्दर ढंग से यह संदेश दिया है---
"वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा खोए
औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय।"
   इसी प्रकार से हमें ध्यान रखना होगा कि हमारे शब्दों से द्वन्द की स्थिति ना बन जाए , क्योंकि गलत शब्दों के इस्तेमाल से हर बिगड़ी बात का संभालना मुश्किल हो जाता है। शब्दों का प्रयोग कर सकने की योग्यता भी मनुष्य को ही मिली है। ऐसे में ईश्वर की श्रेष्ठ रचना मनुष्य का दायित्व और भी अधिक बढ़ जाता है कि वह बुद्धि, विवेक और योग्यता से शब्दों का सम्मान कर उनका प्रयोग करें। शब्दों का सही प्रयोग अच्छे व्यवहार के साथ हो तो न होनेवाले, बिगड़े हुए काम भी चुटकियों में सुलझ कर हो जाते हैं। इसके विपरित गलत शब्द, खराब और अक्खड़ व्यवहार होनेवाले,,हुए काम को भी सदा के लिए अटका देते हैं। मेरे जेहन में एक प्रसंग आज भी प्रासंगिक लगता है-मेरे पड़ोस में ही भाभी और देवर परिवार संग एक ही घर में रहते थे। स्थितियां अलग-अलग हैं भाभी का एक पैर एक्सीडेंट में कट जाता है । बाहर से देवर आया और बोला.... लंगड़ी भाभी!मुझे पानी पिला। भाभी बोली..... पानी,!और तुम्हें.....!अब दूसरी स्थिति में.....
मेरी प्यारी भाभी..! पानी पिला...अब भाभी..... पानी पिये तुम्हारा दुश्मन!अभी लाई मैं आइसक्रीम और मिठाई!तो यह है शब्दों की ताकत। शब्दों का अच्छे व्यवहार से मेल सोने पे सुहागा।करके। तो देखिए, चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिलेगा।अब चुनाव हमारे ही हाथ है प्यार से बिगड़े काम बनायें या अपने खराब व्यवहार से बिगड़े को सदा के लिए बिगाड़ दें कि अच्छा होने की संभावना ही खत्म कर दें।

डॉ मीना कुमारी परिहार

अग्नि शिखा मंच ।
दिनाँक : 23-06-2021
क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम बना सकते हैं।
जरूर, शब्दों द्वारा बिगड़ा काम बना सकते है।
रमेश मिस्त्री बिजली का काम अच्छा करता था। उसमें एक कमी थी कि यदि उसके काम मे मीन-मेख निकाल दिया तो बिगड़ जाता था। एक बार रमेश को प्रदीप सेठ ने अपने नये फ्लैट में बिजली के काम के लिए बुलाया।प्रदीप सेठ की सेठानी फ्लेट में चल रहे काम को देखने आई। उन्होंने रमेश के काम में मीन मेख निकालना चालू किया। इससे रमेश भडक गया और काम छोड़ कर फ्लेट के बाहर निकल गया। बाद में प्रदीप सेठ उसको मना कर लाये। उन्होंने सेठानी की तरफ से माफी मांगी और कहा कि आप सेठानी की बातो का बुरा न माने, उनको बिजली के काम के काम के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। प्रदीप सेठ की बातों से रमेश मिस्त्री का गुस्सा शांत हुआ और वह वापस उसी फुर्ती से फ्लेट मे काम करने लगा। इस प्रकार सेठजी के शब्दों द्वारा बिगड़ा काम बन गया। 
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।

नमन मंच 


क्या शब्दों से बिगड़े काम सुधार सकते है ? जी हाँ सुधार सकते है 
मीठा बोलें*
शब्दों में इतनी धार और शक्ति है जिससे सम्पूर्ण जीवन प्रभावित होता है मीठे शब्द एक रोगी के लिए दवा का काम करते है 
ऐसी वाणी बोलिए,मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे,आपहुँ शीतल होय।।

महान संत कबीरदास रचित उपरोक्त दोहा को हम सभी को अमल करना चाहिए हमारी वाणी हमारे मित्र और शत्रु बनती है ऐसे शब्द प्रयोग करना चाइये जो हमारा और सुनने वाले के चित आनंदित और प्रफुल्लित करे ,

मीठी बोली होत है, सौ औषधी समान।
बिन डॉक्टर बैद्य ही,कर दे रोग तमाम।।

           शब्द में इतनी शक्ति होती ह जिसके वजह से जिंदगी सॅवरती और बिगड़ती है इसलिए बहुत ही सोच समझ कर बोलना चाहिए ,ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए जो किसी के मन को आघात पहुँचाएं |मीठी वाणी खुद को और हमारे इर्दगिर्द रहने वालों के जीवन में सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करती है |मीठी बानी से पराये भी अपने हो जाते है वही अगर हम गलत शब्दों का प्रयोग करेंगे अपने भी दूर हो जाते है , और एक हम अकेले रह हो जाते है 

कागा ने किसीका का क्या बिगाड़ा और कोयल ने किसको क्या दिया लेकिन सिर्फ मधुर वाणी की वजह सब कौए को भगा देते और कोयल का संग चाहते है |
         

             अगर हम मीठा सुनना पसंद करते है तो हमें अपनी वाणी को मधुर रखना पड़ेगा 
मानव जीवन अनमोल रे ,
मीठा सबसे बोल रे 
अब जो मिला फिर न मिलेगा 
कभी नहीं कभी नहीं रे 

       प्रेम की भाषा से इस अनमोल जीवन को सार्थक बनाये यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए 

स्मिता धिरसरिया ,बरपेटा रोड

🙏अग्निशिखा मंच 🙏


लेख --क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है

कलम की ताकत व शब्दों के प्रभाव से कार्य बन भी सकते है बिगड़ भी सकते है, क्योंकि शब्द मन भेद सकते है तो मनभेद मिटा भी सकते है बस सही शब्दों का सही जगह उपयोग जरुरी है इसलिए बोला भी गया है की पहले सोचो फिर बोलो, आवेश में आकर बोले गए शब्द सिर्फ काम ही ख़राब नहीं करते बल्कि रिश्ते भी ख़राब कर देते है जैसे तीर या कांटा चुभने पर उसे निकालने के बाद भी घाव तो रह जाता है उसी प्रकार बुरे शब्द तो गुस्से में इंसान बोल देता है लेकिन उसका असर ये होता है कि इंसान को वो बातें बार -बार याद आती है और मन खट्टा कर देती है ऐसी बातें.. इसलिए जीवन में अगर कोई काम बिगड़ गया है तो आपके प्रेम भरे शब्दों से उसे सही करने का भरपूर प्रयत्न करे,कहते भी है कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती 🙏

हेमा जैन, इंदौर

शीर्षक-" क्या शब्दों द्वारा बिगड़े काम भी बन सकते हैं"

हां शब्दों द्वारा बिगड़े काम भी बन सकते हैं शब्द ब्रह्म है और शब्द शक्ति ब्रह्म शस्त्र। कबीरदासे जी कहते हैं "ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय. एक बार की बात है मैं बहुत जल्दी में थी और रेड लाइट पर मैं भूल से अपनी काइनेटिक चलाकर पार कर ही रही थी ,तभी एक पुलिस वाला दौड़ता हुआ आया और बहुत ही क्रोधित होकर मुझे रोक करके डांटते हुए बोला- क्या बदतमीजी है मैडम !मैं पहले तो मुस्कुरा दी ,फिर बोली भैया ध्यान से चूक हो गई। क्षमा करो! उसने तुरंत मुझे जाने दिया और बहुत ही प्यार में बदल गया उसका व्यवहार ,उसका गुस्सा आइंदा ध्यान रखिएगा मैडम!

स्वरचित घटना
रजनी अग्रवाल जोधपुर

विषय-क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते हो?

 शब्द बहुत धारदार होते हैं वह कभी भी घाव कर सकते हैं, और कभी भी मरहम लगा सकते हैं।अतः कबीर की साखी सदा याद रखें-
 
मीठी वाणी बोलिए मन का आपा खोय 
औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होय 

अर्थात मधुर मीठा रसदार बोलने से कई बार बिगड़ी बात भी सहज हो जाती है। कालिदास अंगुलिमाल तुलसीदास का बोले हुए शब्दों से हृदय परिवर्तन हुआ और महान विभूतियां बने। इसके विपरीत महाभारत में कई बार पढ़ा है कि द्रौपदी दुर्योधन को देख कर बोली थी-" अंधा का बेटा अंधा" कहते हैं इस शब्दबाण की जड़ ही महाभारत है।अतः बत्तीस दाँतों के बीच जीभ वह करिश्मा दिखा सकती है, जो दांत नहीं दिखा सकते हैं।बहुत सोच समझकर सावधानीपूर्वक बोलें,सामने वाले का हृदय जीत लें।
 वीरगाथा काल में शब्दों की ओज वाणी द्वारा ही कविगण राजाओं और योद्धाओं के अंदर देश प्रेम का संचार कर देते थे, वाणी बहुत बहुमूल्य है। इसका बहुत असर होता है।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
23-6-21

🌹🙏नमन मंच 🙏🌹
विषय: * क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है *
विधा: लेख 
🌹
      शब्द हमारी भाषिक संपदा है। यही 
अंतस की भावनाओं को वाणी द्वारा दूसरों ,तक प्रेषित करता है जिससे हम
खुश या नाखुश होते हैं ।
      कहा भी गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति 
कुछ बोलने से पहले सोचता है ,और मूर्ख 
बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देता है, 
जिसका असर सीधे- सीधे मानव के मन पर पड़े बिना नहीं रहता । 
    क्षेत्रीय बोली मे यह कहते हुए प्रायः सुना जाता है कि-- *यही मुँह लात खिलावे,यही मुँह पान खिलावे- अभिप्राय 
यह है कि बोली के द्वारा बना काम बिगड़
सकता है और बिगड़ा हुआ काम भी बन सकता है । कबीरदासजी की चर्चित पंक्तियाँ भला किसे याद नहीं है--
 *ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय
 अपना मन शीतल करै,औरन को सुख होय-* इतना ही नहीं उन्होंने कर्कश वाणी पर नियंत्रण रखने हेतु यह भी संदेश दिया है--
* साधु भया,तो क्या भया ,बोले नाहि विचार।हतै परायी आतमा जीभ बाँधी 
तलवार ।। *
  बोली मे माधुर्य होना चाहिए, यदि ऐसा होगा तो हम किसी भी बिगड़े काम को बना सकते हैं । मनुष्य तो क्या पशु भी प्यार की भाषा बखूबी और जल्दी समझते हैं । 
        दूसरी बात,यह भी है कि किसी को 
समझाना है तो डांट और फटकार की भाषा न बोलकर उसे ,प्यार से प्रोत्साहित 
करते हुए, शब्दो के जादू से बिगड़ी बात को बना लिया जा सकता है ।
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स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार --

शब्दों से ही काम बनते या बिगड़ते
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संवेदनाओं से जुड़े रिश्ते नाज़ुक धागों की तरह होते शब्दों के आहट से ही टूट जाते शब्दों में तौल मोल हो संवेदना हो प्यार हो अपना फन हो तभी तो टिक पाते हैं ऐसे रिश्ते।।शब्दों में ही यदि शिथिलता होगी।संवेदनाओं में कहा उठापन होगा।बने रिश्ते भी तिनके तिनके बिखर जाते।जब संवेदनाओं पे शब्दों का प्रहार होगा। शब्दों के तीखे बाण ही सब काम बिगाड़ देते और शब्दों के मीठे व्यवहार ही सबका दिल दित हर राह सुगम करते जाते हैं।अतः शब्द ऐसे निकले मुंह से जो किसी की संवेदनाओं को आहत न करें बल्कि सभी के दिल में एक जगह बनाएं।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
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अग्निशिखा  मंच को नमन🙏
लेख: क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम बना सकते हैं?
हां बिल्कुल बना सकते हैं।
मनुष्य प्रेम का पुजारी है। हर जगह से वह प्रेम व प्यार चाहता है । सामने वाले व्यक्ति की वाणी प्यार भरी सुनकर अमुक व्यक्ति खुश हो जाता है क्योंकि शब्द में अपनापन प्यार देखकर अनजान व्यक्ति भी उस व्यक्ति को अपना लेता है। उसके वाणी से ही व्यक्ति को सम्मान तथा समाज में प्रतिष्ठा भी मिलती है। समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जीवन यापन करना है तो हर एक के साथ मीठे बोल बोलना अति आवश्यक है। हमारे अनेक साहित्यकारों   ने मिठे शब्दों पर उनकी लेखनी चलाई है। शब्द बिगड़े हुए काम को पूरा कर सकते हैं। जैसे कि आधुनिक युग में पुरानी पीढ़ी और  नई पीढ़ी  के विचार में अंतरता होती है। खास तौर पर सास बहू में अक्सर आए दिन छोटी छोटी बातों पर झगड़े होते हैं। जिसके कारण परिवार में मनमुटाव ,दिलों में दरारें आ जाती है ।परिवार में रहकर भी अजनबी की तरह रहना पड़ता है । कड़वे शब्दों से व्यक्ति मानसिक तौर पर घायल हो जाता है। इस घाव को दवा दारू नहीं की जा सकती। मगर दो मीठे बोल से इसे ठीक किया जा सकता है। कुछ साल पहले मैंने एक आलेख पढ़ा था जिसमें जापान के एक व्यक्ति ने यह साबित किया है कि वाणी से सकारात्मक तथा नकारात्मक भावना से मनुष्य और वस्तु में  किस प्रकार प्रभाव पड़ता है। एक उदाहरण के माध्यम से बताया है। उस व्यक्ति ने दो कटोरियों में चावल और पानी डाल कर रखा था, हर दिन पहली कटोरी के पास जाकर कहता था कि आई लव यू, दूसरी कटोरी के सामने कहता था कि आई हेट य।  हर दिन इसे दोहराता था ।15 दिन तक यह क्रम चलता रहा। 15 दिन के बाद दोनों कटोरी के चावल को देखता है पहले वाली जिसे आई लव यू कहता था चावल अच्छी
और सुगंधित  थी ।दूसरी कटोरी की चावल जिसे आई हेट यू कहता था वह खराब हो गई थी । इससे पता चला कि जिस प्रकार हम भावना रखते हैं और बात करते हैं उसी प्रकार वस्तु और व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है। यह सत्य घटना थी।

डॉ गायत्री खंडाटे
 हुबली कर्नाटक।

लेख_शब्दों का प्रयोग
अ. भा.अग्निशिखा मंच
विषय_क्या शब्दों द्वारा बिगड़े काम बन सकते हैं?विधा_लेख
     आज का विषय एक प्रश्न स्वरूप है,इसका उत्तर हां में है।जी, हां जरूर, अच्छे शब्दों से बिगड़े काम जरूर बन सकते हैं।इसमें कोई दो राय नहीं है।हम में से हरेक ने इसका अनुभव कभी न कभी, कहीं न कहीं किया ही होगा।हम(मनुष्य)एक सामाजिक प्राणी है।हम अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।शब्द भी इस पूर्ति का एक माध्यम हैं।
    आशा है आज के विषय से हम सब कलमकार भाई_बहनें बहुत कुछ सीखेंगे।जिन्होंने भी यह विषय चुना उनको साधुवाद।
     देखिए हमेशा क्या कहा(यानि कौनसे शब्द प्रयोग किए) से ज्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि कैसे कहा?इसलिए उचित शब्दों के चयन के साथ_ साथ हमें अपने बोलने के अंदाज पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए। उदा.किसी से माफी मांगे तो ये लगना चाहिए कि दिल से मांग रहे हैं। वरना कई लोग तो माफी भी ऐसे मांगते हैं जैसे लट्ठ मार रहे हों।
     यह बात सर्व विदित है कि शब्दों के घाव भरते नहीं क्योंकि वे तीर की तरह सीधे मन पर असर करते हैं जब कि शरीर के घाव मरहम पट्टी से भर जाते हैं।
इसलिए शब्दों का प्रयोग बड़ी सावधानी पूर्वक करना चाहिए।
     हमें मधुर,अर्थपूर्ण,भावनापूर्ण,महत्वपूर्ण,सही,उचित,कर्ण प्रिय,हृदय प्रिय,विवेकपूर्ण,बुद्धिशाली, समयानुकूल,परिस्थिति अनुकुल,संबंध अनुकुल आदि शब्दों का ही उच्चारण करना चाहिए।देखिए,जिन शब्दों में इतने गुणों को भरना हो वो काम सरल तो न होगा।पर हम अपनी विवेक बुद्धि से जग जीत सकते हैं तो अपने द्वारा बोले जाने वाले शब्दों का चयन प्रयास करके , इन पर निश्चित ही विजय प्राप्त कर सकते हैं।
     धन्यवाद।
स्वरचित मौलिक लेख____
रानी अग्रवाल,मुंबई द्वारा।
२३_६_२०२१.

अग्नि शिखा मंच 
दिनांक-23/06/2021
विषय- क्या शब्दों से बिगड़ी बात बनाई जा सकती है।
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वाणी ही हमारे 
व्यक्तित्व की पहचान है। मधुर वाणी से हम सबके दिलों पर राज कर सकते हैं।
"ऐसी वाणी बोलिए,मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।"
हमारे शब्दों की महिमा बहुत निराली है। व्यक्ति के दिल में शब्दों के माध्यम से उतरा जा सकता है,और दिल से भी उतरा जा सकता है।
मुंह से निकले शब्द शस्त्र का काम करते हैं। इसलिए कहा जाता है, "तोल मोल के बोल।"
शब्द हमारे तीर कमान के समान होते हैं। एक बार गलत शब्द बोले तो वापिस नहीं आते। अपशब्द बोलने वालों से लोग सदा दूर ही रहते हैं।
हमेशा अच्छे आचार- विचार रखें। किसी से कुछ भी बोलते समय शब्दों पर नियंत्रण करें। यदि कोई बात शब्दों द्वारा बिगड़ भी जाती है तो उसे कोशिश करें, मीठी वाणी द्वारा समझाया जाए।
मीठे शब्दों से ही किसी का भी दिल जीता जा सकता है। वाक पटुता आपकी अपनी कला है।

रजनी वर्मा🌷 
भोपाल 🌷

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 शब्दों के द्वारा भी बिगड़े हुए काम बन जाते हैं🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

लघु कथा बात एक मध्यम वर्गीय परिवार की है जिसमें 4 संतान थी एक संतान पढ़ लिखकर उच्च पद पर पहुंच जाती है और वह अब पूरे संभ्रांत परिवार के नाम से अपने आप को एक छात्र लेता है और इस तरह से बातें करता है कि उसके आगे सब होने हैं परिवार के तीन जिलों और बेटे हैं वह कहीं पर न तो शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं ना कोई अच्छी सर्विस मैं जा पाते हैं दो जैसे तैसे कहीं छोटा-मोटा काम धंधा करने लगते हैं और छोटा बच्चा जो है वह सूज भुज कर सबकुछ जानबूझकर इस तरह के कार्य करता है कि सब उसकी बुद्धि का लोहा मानते हैं बड़े बेटे की कमी के कारण अनेकों जगह जो कार्य बिगड़ गए थे इस छोटे बच्चे ने इस तरह से अपना मान सम्मान व्यवहार अपनत्व संवेदनशीलता समाज में फैलाई के उसके जो भी काम होते थे वह सब बनने लगे सभी उसको देखकर यह कहते थे कि शब्दों के द्वारा बिगड़े हुए काम बन जाते हैं यह हुनर इस बच्चे को आता है एक बार पूरा परिवार बहुत बड़ी विकट परिस्थिति में फस गया उसका कोई निराकरण नहीं निकल रहा था लेकिन इस बच्चे ने जब अपनी सूझबूझ के माध्यम से अपनी बात रखी तो सभी बात को माना और इन सब की समाज में पहले की तरह अच्छी प्रतिष्ठा बन गई कहते हैं ना "बातन हाथी पाइए बातन हाथी पाव""

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
  कुमारी चन्दा देवी

अग्निशिखा मंच
२३/६/२१
आज का विषय -
*क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है*
विधा - लेख

भावों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है शब्द शब्दों के लिए तो कहा जाता है कि अगर शब्द सोच विचार कर ना बोले जाएं तो मनुष्य को ऐसा घाव दे सकते हैं जो जीवन भर ना भरे। क्योंकि शरीर पर लगा हुआ घाव तो भर जाता है लेकिन मन पर लगा हुआ घाव कभी नहीं भरता । इसलिए शब्दों को सोच समझकर ही बोला जाना चाहिए। जिस प्रकार से नकारात्मक और कठोर शब्द व्यक्ति को आहत करते हैं और आप के बने बनाए काम को बिगाड़ सकते हैं ,उसी प्रकार अच्छे सकारात्मक और मधुर शब्दों का भाषण हमारे बिगड़े हुए कामों को बना भी सकता है। क्योंकि शब्द बहुत ही शक्तिशाली होते हैं ।शब्दों का अनुचित प्रयोग ही महाभारत की कई घटनाओं के लिए उत्तरदाई था ।या यूं कहें कि पूरा महाभारत ही शब्दों के अनुचित प्रयोग के कारण हुआ।
 अगर शब्दों का सही प्रयोग किया जाए तो बिगड़ा हुआ काम भी बन जाता है लोग आप से शत्रुता भूल आपके मित्र हो जाते हैं ।शब्दों में वह ताकत होती है कि वह आपके दुख को दूर कर करुणा का संचार करते हैं।
नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश

क्या शब्दों के द्वारा बिगड़े काम को सुधारा जा सकता है?
 शब्दों से ही भावों की अभिव्यक्ति होती है। शब्दों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है अतः शब्द हमेशा मुंँह से सोच समझकर निकालना चाहिए क्योंकि एक बार मुंँह से निकला हुआ शब्द फिर वापस नहीं आता जैसे कि कमान से निकला हुआ तीर ।"मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर"। वाणी में तो इतनी ताकत है कि कोई भी आपसे प्रभावित हो जाए आपकी प्रशंसा करें, आप को सम्मानित भी कर सकता है और जीवन भर आप के गुणगान कर सकता है ।अतः शब्द हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। शब्दों में ही तो वह माधुर्य है जो लोग आपसे आकर्षित होते हैं, आप से बातचीत करना पसंद करते हैं और आपको मित्र बनाना पसंद करते हैं और आपके कदमों पर चलना चाहते हैं।
ऐसी वाणी. बोलिए मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होय।।
बड़े बड़े महान व्यक्ति अपने शब्दों के चमत्कार से ही तो पूजे जाते है। महापुरुषों की वाणी सुनकर ही लोग प्रभावित होते हैं और उनकी जय-जयकार करते हैं। मधुर वाणी वही बोल सकता है जिसके मन में सभी के प्रति प्रेम की भावना हो ,इंसानियत की भावना और सब को अपना बनाने की भावना हो ।जो अहंकार से दूर रहता है और हमेशा विनम्र रहता है वही अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हैं। अतः अच्छे ,मधुर शब्दों के द्वारा बिगड़े काम को आसानी से सुधारा जा सकता है।

आशा जाकड़


क्या बिगड़ा हुआ काम शब्दों से ठीक हो सकता ‌है
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हां बिगड़ा हुआ काम शब्दों से ठीक हो सकता है ।
आज-कल जमाना बदल गया है 
सब पैसे और प्यार के भूखे हों ग्रे है । 
 हर काम को सफल पूर्ण करने के लिए भष्टाचार के इस ज़माना में पैसे के बिना कोई काम सफल नहीं होता । यदि सामार्थ नहीं होने पर हम अपनू शब्दों को प्यार और सहज रूप से इस्तेमाल कर बिगड़े काम को फिर से सही कर सकते हैं।
रानु की सांस जरा तेजतर्रार थी और रानु की‌ मां शांत । रानु की सास का स्वभाव तेजतर्रार होने के कारण रानु की मां भी कभी सुना देती थी लेकिन जब‌ देखती थी कि मेरे बोलने से मामला और बीगड गया तो फिर रानु और उसकी मां प्यार और अपनेपन से अपने कहे शब्दों को ठीक कर लेती थी
और मामला संभल जाता था ।दोनों परिवार में आपसी प्रेम बना रहता था ।
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग जगदलपुर छत्तीसगढ़

🌺बुधवार -23/6/2021
🌺विषय - क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते है 

शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्द में बड़ी शक्ति है। शब्द युद्ध करा सकता है… यह शांति स्थापित कर सकता है। इससे लाठी गोली चल सकती है, सांप और बिच्छू का जहर उतारा जा सकता है। 
शब्द हंसा सकता है, रुला सकता है, जोश दिला सकता है। बातें हाथी पाइए बातें हाथी पांव। शब्द आपको पुरस्कार दिला सकता है, दंड फीला सकता है। शब्द क्या नहीं कर सकता। वो शब्द ही था जिसके कारण महा भारत का युद्ध हुआ। वह शब्द ही थे जिसके कारण बाल्मीकि डाकू से महर्षि हुए। वह शब्द ही थे जिनसे अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हुआ। वह शब्द ही थे जिनके कारण एक मूर्ख कालीदास कवि बना। वो शब्द ही थे जिनसे तुलसी दास महान कवि बने। और कवियों के पास शब्द ही तो होते हैं कि उनकी एक कविता जन जन को पसंद आती है। 
जब भी कभी किसी समस्या को सुलझाना हो तो शब्दों की अहम भूमिका होती है। शब्द बिगड़े कामों को बना लेते हैं। शब्द में बड़ी ताकत है। और अंत में शब्द ब्रह्म की जय। 
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© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अग्निशिखा मंच को नमन
सभी कलमकारों को सादर नमस्कार👏👏👏👏👏🌹
मेरे प्यारे प्यारे बहनों, एवं भाईयों
आज तो,*शब्दो द्वारा बिगड़ा काम भी बन जाता है।
वाणी में हो मिठास।
कठीण काम हो आसना।
सामने वाला इंसा गुस्से
में सुनने भाई साहब क्या
गलती है मेरी, माफ करना
यह बोल वचन लड़ाई झगड़ा
नहीं होगा।
*क्या शब्दो द्वारा बिगड़ा काम कैसा काम भी बना सकते हैं*
यह विषय बहुत ही बढ़िया था
आज भी 41कलमकारो ने मिठास भरी लिखाण से आज अग्निशिखा मंच शब्दोका भंडार
सुसंपन्न हुआ।
    आदरणीय चंदा डांगी ने सभी आलेखों की सविस्तर समिक्षा कर ने के लिए तहेदिल से अग्निशिखा मंच तहेदिल शुक्रिया अदा करते
आदरणीय अलका पांडेय जी ने आज का विषय इतना बढ़िया देकर सभी हौसला अफजाई के लिए उनका भी आभार
आप सभी कलमकारों ने बेहतरीन आलेख लिखने के लिए आभार आभार आभार🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏👏👏🌹
  कल मिलेंगे चित्रपर आधारित रचना के साथ🙏
शुभरात्रि🙏🌹
Good Night🙏🌹

$$ क्या शब्दों द्वारा बिगड़े काम भी बना सकते है $$

यह बात 100% सच है कि हम शब्दो द्वारा बिगड़े काम बना सकते है ।पर मेरा मानना है कि सिर्फ मीठा बोलकर ही नही कभी कुछ काम बनाने के लिए हमे कुम्हार की तरह कठोर भी होना चाहिए। माता पिता या गुरूजी बच्चों की भलाई के लिए ही कठोर बनते है पर उसके पीछे भावना अच्छी होती है इसलिए कभी भी बच्चों को बुरा नहीं लगता है । कभी कभी कार्यालय आदि मे भी इसी तरह से अपनी बात रखना पड़ती है पर हाँ उसमे आक्रोश नहीं होना चाहिए हमारी वाणी से किसी का हृदय नही दुखना चाहिए। 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

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