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agnishikha manch per shabd har bigadi baat banaa dete Hain aap sab ki rachnaen per_Hain


अग्निशिखा मंच 
२३/६/२०२१

क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते है ? 

हाँ जी बिलकुल बना सकते है शतप्रतिशत बना सकते है ....
शब्द को  ब्रह्म कहा गया है । 
मीठे वचनों से पाषाण ह्दय भी द्रवित हो उठता है। 
बात बात पर क्रोध करने हर वक्त गाली गलौज करना , 
इंसान की प्रतिष्ठा गिरा देता है वह संतुलित व मिठे शब्द बोलता है तो लोगों को शंका होती है जरुर कोई मतलब होगा । 
ग़ुस्सा होने से बिगड़ा काम नहीं बनने बाला । हाँ अगर आप ने संतुलन बनाया व नाराज न होकर समाने बाले को समझा उसे समझाया तो भविष्य में वह और सतर्कता से काम करेगा , आप का सम्मान करेगा 
जीवन भर आपके प्रति कृतज्ञ रहेगा । 

आपके शब्दों द्वारा ही आप यह तो सम्मान पा सकते हैं या नफ़रत ....
मीठे शब्दों में बहुत शक्ति है वह असम्भ काम भी करवा सकता है आदमी में आत्मविश्वास भर सकतेहै । 
मधुर बोलने वाला हर जगह इज़्ज़त पाता है 
। 
और अपशब्द बोलने वालों से लोग दूर भागते है । 
हमेशा अपने आप को याद दिलाये कि नाराज़ हो कर हम बिगड़ा काम बना नहीं सकते 
परन्तु अच्छा बोल कर आप अधिक नुक़सान से बच सकते है 
जो हो गया वह हो गया , भविष्य में न हो इसका ध्यान रखें और ये आपके शब्द ही कर सकते है 
मज़ाक़ व हल्के फुलके मज़ेदार शब्द वातावरण कोखुशनुमा बना देते है , और माहौल अच्छा तो ....काम अच्छा । 
शब्द और शब्दों को बोलने का लहजा दोनों को ही हमें सम्भालना है । तभी हम बेहतर नेतृत्व कर पायेगा व लोगों में पापुलर भी होंगे 
मीठी बानी बोलिये ......मन का आपा खोल   
ओरों को शीतल करे आपो शीतल हो....    
हमेशा याद रखे 
शब्द एक बार जिव्हा से निकल  गया सो निकल गया ...    
तो बहुत तौल मौल कर बोले 
डॉ अलका पाण्डेय 🌷🌷

मंच को नमन
विषय:-- क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते हैं ? 
यह कटु सत्य है जो आपके मुख से शब्द निकलती है वह ब्रह्मा की लकीर हो जाती है। जैसे तीर से कमान निकलना। तीर कभी भी कमान में लौट के नहीं आता है। लेकिन सामने वाले को कष्ट दायक शब्दों से पीड़ा हुआ है तो मीठे शब्दों से उनके सामने गलती महसूस कर यह महसूस कराएं तो शायद कुछ दिनों में पाषाण ह्रदय भी पीघल जाएगा। हर इंसान को अपने को आंकलन कर के ही शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। बात बात में क्रोध करना अपशब्द बोलने से इंसान की प्रतिष्ठा गिर जाती है। अगर हर इंसान संतुलन कर के शब्दों का उच्चारण करें यानि मधुर शब्द से अपना व्यक्तित्व का परिचय दें तो उसे समाज में इज्जत मिलेगा। अपशब्द बोलने वाले व्यक्ति से समाज दूर भागता है।हमेशा अपने आप को याद दिलाएं कि नाराज होकर हम बिगड़ा काम बना नहीं सकते हैं परंतु अच्छा बोलकर आप अधिक नुकसान से बच सकते हैं। 
अभी हमारे देश में विपक्ष के नेता जनता के साथ वार्तालाप करते हैं तो सत्ता पक्ष के नेता को अपशब्द बोलकर अपना प्रतिष्ठा गिरा दे रहे । अब समाज अशिक्षित नहीं है । शिक्षित की ओर कदम बढ़ा चुके हैं अतः जनता समझती है शब्द और शब्दों की बोलने का तरीके को । इसीलिए विपक्ष को संभालना होगा तभी हम बेहतर नेतृत्व कर पाएंगे। 
महाभारत में देखें कौरव समूह बराबर अप्रिय शब्दों का प्रयोग किए। और पांडव समूह जो भी शब्द के प्रयोग करते थे मीठे शब्दों का इसलिए उनकी प्रतिष्ठा बनी रही।

हमारे प्रिय आदरणीय मोदी जी पूरी दुनिया में इतने पॉपुलर क्यों है? 
क्योंकि कभी भी किसी के साथ अपशब्द प्रयोग नहीं करते हैं।वह समझते हैं एक बार अपशब्द मुंह से निकल गया वह लौट कर न आएगा, इसीलिए अपने शब्दों को बहुत तौल मौल कर बोलते हैं। 
इसलिए मीठी वाणी बोलते हुए........ मन का आपा खोलते है। और पूरे दुनिया में पॉपुलर हो गए हैं।
अगर किसी को पॉपुलर होना है अपना आपा शीतल रखें। सब के साथ आदर पूर्वक शब्द का प्रयोग करें।🌹🌹

विजयेन्द्र मोहन।

विजयेन्द्र मोहन।

“अग्निशिखा मंच को नमन 
२३-६-२०२१
*“क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम भी बन सकता है*”
मन की शीतलता वाणी की मिठास से बिगड़ा काम बन सकता है । “मैया मोरी मैंने ही माखन ख़ायों “
घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। बाल लीला को 
सूरदास वाक्चातुर्य से बिगड़े काम को बनाने का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। 
जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है ।
तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा! तूने माखन खाया है क्या? तब बाल कृष्णा अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। कन्हैया बोले.. मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही बलात् मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। फिर बोले कि मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। इन छोटे हाथों से मैं कैसे छींके को उतार सकता हूँ। कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा रह गया था उसे पीछे छिपा लिया। कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन मुस्कराने लगीं और छड़ी फेंककर कन्हैया को गले से लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रह्मा को भी दुर्लभ है। श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) ने बाल लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्त्वपूर्ण है।
ये पौराणिक लीलाओं का वर्णन हम अपने माता पिता से सुन जीवन में ज्ञान अर्जित कर ब्रम्ह वाक्य बन गये । किसी के अप शब्द को अपने शरीर दिमाग़ में मत बिठाओ ।शब्द वाक्य बिगड़े काम को शरीर की मैल तरह साफ़ हो जाता है । और दिमाग़ में बर्फ़ रख 
वाणी की मधुरता से सम्बंधो को जीना आना चाहिये । 
इस तरह जीवन में बिगड़े काम बन सकते है मैंने यही समझा आप सभी से सज्ञान की अपेक्षा है ।
अनिता शरद झा मुंबई


मंच को नमन,
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प्रदत्त विषय:-
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क्या शब्दों द्वारा बिगड़ा काम भी बना सकते हैं?
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विधा आलेख
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लेखक नरेन्द्र कुमार शर्मा
          हिमाचल प्रदेश 
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          यद्यपि उपरोक्त विषय के संदर्भ में गंभीरता से चिंतन किया जाए तो ऐसा लगता है कि शब्द ही तो है जो हमारी पहचान है।हमारे शब्द ही हमारी व्यवहार कुशलता का परिचय देते हैं।यही शब्द हैं जो हमारे अच्छे-बुरे का मूल्यांकन करने में सहायता प्रदान करते हैं।
हमारे मुख से निकलने वाली हर सार्थक ध्वनि ही शब्द है।शब्दों का चयन ही मानव को अर्श पर पहुंचाती है और यही मनुष्य को फर्श पर पहुंचाती है।
अत: किसी भी कार्य को अमलीजामा पहनाने के लिए शब्दों का बड़ा महत्व होता है।इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी वाणी या हमारे शब्द किसी भी बिगड़ रहे कार्य को बना सकते हैं और बनाते हुए काम को बिगाड़ भी सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर मैं एक वाक्या प्रस्तुत कर रहा हूँ,मामला अपने ही पड़ोस का।रामू काका की धनु चाचा से अनबन रहती थी।चूंकि एक दूसरे से जमीन पर झगड़ते रहते थे।अब रामू काका का बेटा पढ़ा लिखा था।वो जब भी धनु चाचा से मिलता तो धनु चाचा को शर्म महसूस होती थी।उसका व्यवहार ही ऐसा था कि गांव के सभी लोग भी उसका उदाहरण देते।
एक दिन धनु चाचा ने ज़मीन के बारे उससे बात कर ही ली।रामू काका के बेटे ने बड़े अदब से कहा कि ज़मीन तो यहीं छूटेगी ऐसे में झगड़ना कोई विकल्प नहीं।हमें ज़मीन की पैमाइश करवानी चाहिए।जो आप की ज़मीन है वो आप ले लो,और जो हमारी ज़मीन है वो हम लें।
धनु चाचा को बात जंच गई।पैमाइश हुई और ज़मीन का झगड़ा सदा के लिए समाप्त।
यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि शब्द की एक ऐसा मापदंड है जो हमारे कामों की सफलता के लिए सहायक सिद्ध होता है।इसलिए हमें शब्दों अथवा वाणी को समय और स्थिति के अनुरुप सुधार की आवश्यकता है।

मौलिक रचना 
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अग्निशिखा मंच को नमन 
दिन : बुधवार 
दिनांक : 23/6/21 
विषय : *क्या शब्दों के द्वारा बिगड़ा काम बन सकता है* 
विधा : *लेख*

बात कड़वी है , पर उतनी ही सच्ची भी । शब्द ही हैं जो अनजान को अपना और अपनों को पराया बना देते हैं।

 अक्सर इंसान अपने अभिमान में यह भूल जाता है कि , उसे कौन सा शब्द इस्तेमाल करना चाहिए और कौन से नहीं । अपने अभिमान को संतुष्ट करने के लिए वह ऐसे शब्दों को इस्तेमाल कर देता है जिससे किसी के स्वाभिमान को ठेस पहुंँच सकती है।

 शब्द के घाव कभी नहीं भरते जबकि और जख्मों के घाव किसी न किसी रूप में कभी ना कभी आवश्य भर जाते हैं। परंतु शब्द के घाव जीवन प्रयत्न उतने ही दुख और तकलीफ प्रदान करते हैं। इसलिए हमें शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना चाहिए।

_*ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय*_

शब्दों का प्रभाव इतना प्रभावशाली होता है कि वह मृत्यु के समीप जा रहे व्यक्ति को भी वापस लौटने की शक्ति प्रदान कर देता है , और कभी जीते हुए इंसान की भी जिंदगी मौत से बदतर बना देता है।

प्रोत्साहन के चंद शब्द इंसान के अंदर कार्य करने के जोश को दुगना कर देते हैं, जबकि अवहेलना के बोले हुए शब्द उसकी मनोबल को और तोड़ देते हैं और उसकी कार्य करने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

*सच ही कहा है किसी ने कि मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है जबकि कड़वा बोलने वाले का गुण भी रखा का रखा रह जाता है*।

*अपने जीवन में शब्दों का चुनाव सोच समझ कर करें क्योंकि शब्द एक ऐसा तीर है जो एक बार आप के मुख से निकलने के बाद सिर्फ अपना प्रभाव दिखाता है लौट कर कभी नहीं आता।*

_*आप के बोले हुए शब्द सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव डाल सकते हैं। सकारात्मक प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के मन और मस्तिष्क पर आपकी एक अमिट छाप छोड़ जाता है ।जबकि नकारात्मक प्रभाव उसके मन मस्तिष्क को चोटिल कर जाता है ।जो कि वह अंतिम सांस तक नहीं भूलता।*_

🌷🌷🌷🌷

_*सुन मधुर वाणी तेरी ,हृदय हुआ फकीर।*_
_*देखन को तेरी सूरत, मन ये हुआ अधीर ।।*_

🙏🙏🙏🙏🙏

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️
 उत्तरप्रदेश गोरखपुर

बुधवार -23/6/2021
विधा - समीक्षा 
✍️✍️✍️👍👍👍👍👍
विषय : सुरेश चन्द्र शुक्ल(नॉर्वे) की कहानी //लाहौर छूटा, अब दिल्ली न छूटे// की समीक्षा
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//लाहौर छूटा, अब दिल्ली न छूटे// कहानी का कथानक लाहौर से लेकर दिल्ली तक के क्षेत्र को समेटे हुए है। इसमें तीन प्रमुख पात्र हैं- अमृता, अमृता की दादी कौशल्या और पड़ोसन कमला।
कौशल्या और अमृता के मध्य जनरेशन गैप स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कौशल्या पुराने खयालों की महिला है, उसे आजकल के गीत संगीत पसंद नहीं हैं। वह तो उस जमाने की है जब रेडियो ही एकमात्र मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। अमृता जब दादी को पुराने दिनों की याद दिलाते हुए छेड़ती है तब 90 साल की झुकी कमर वाली उस बूढ़ी दादी में एक नयी शक्ति का संचार हो जाता है। वह अमृता को अपने जमाने की बाते बताने लगती है. वह बताती है कि वह भी अपने जमाने में कम शौकीन नहीं थी। तब जो मन में होता था वही जुबान पर होता है। कोई दुराव छिपाव नहीं था, अब तो दिल्ली में दिल की बात जुबान पर ही नहीं ला पाते। अमृता जब दादी को छेड़ते हुए अपने जमाने की मौज मस्ती के बारे में पूछती है तो बुढिया बताती है। बुढ़िया अतीत के खयालों में डूब जाती है। उसे लाहौर में बिताए जवानी के दिन याद आने लगते हैं। कैसे उसके पति यानी अमृता के दादा जी उसे फूड मार्केट में ले जाते थे, जहाँ मेला लगता था, जो रातभर चलता था। वहां वे दाल खाते थे और ग्वाला की दुकान की लस्सी पीते थे। अमृता दादी से आज की दिल्ली की सुख सुविधाओँ की चर्चा करती है। अब तो यहां भी बड़े बड़े रेस्टोरेंट और मॉल हैं जहां एक ही छत के नीचे सब कुछ उपलब्ध हो जाता है। और फिर घर बैठे भी सब कुछ मंगाया जा सकता है।
उसी बीच दूरदर्शन पर पर खबर आती है कि लाहौर के अनारकली बाजार में बम फटा है। वहां कर्फ्यू लगा दिया गया है। और धमाकों के पीछे आतंक बादियों का हाथ बताया गया है। लाहौर की इस खबर को सुनकर कौसल्या की पुरानी यादें ताजा हो जाती है। इसी अनारकली बाजार में उसके बाऊ जी की कपड़ों की दूकान थी। वह और विस्तार से खबरें जानना चाहती है। वह बम फेंकने वालों की निंदा करती है. आज भी उसे अपने शहर लाहौर से वहुत लगाव है। जहाँ उसने अपना आधा जीवन बिताया था, कितने त्यौहार मनाये थे, उसे अपनी सखियों की याद भी आती है. जिनके साथ न जाने कितने खेल खेले थे।
कौशल्या को देश के बंटबारे के दिन भी याद आते हैं, जब लाहौर में सब कुछ छोड़कर दिल्ली में आना पड़ा था। उसके दो बेटे भी वहीं छूट गये थे, उनकी आज तक कोई खबर नहीं । वह एक बेटा ही अपने साथ ला पाई थी जिसकी बेटी अमृता है। उसे महसूस हो रहा था कि जैसे बंटवारे की आग अभी भी सीमाओं पर जल रही है। जिसका परिणाम आये दिन आतंकवादी घटनाओं में मिलता है। 
तभी पड़ौसन कमला भी वही खबर देने आती है। जब अमृता कहती है कि यह बहुत बुरी बात है तो कमला कहती है कि बुरा क्या है । लाहौर में आग लगी है कोई दिल्ली में तो नहीं। किन्तु अमृता कहती है कि जब पड़ौस में आग लगती है तो दूसरे पड़ौसी को दुख होता ही है, क्या पता उसका प्रभाव यहां भी आ जाए, आग और पानी का क्या भरोसा। कमला कहती है कि सीमा पार तो हमारे दुश्मन है, फिर उनसे हमारी हमदर्दी क्यो।
अमृता आधुनिक विचारधारा की लड़की है। उसका सोचना है कि समस्या चाहे किसी भी देश की हो वास्तव में पूरे समाज की समस्या है। आज स्थानीय समस्या वैश्विक समस्या भी है। ग्लोबलाइजेसन का जमाना है।
वह बताती है कि आतंकवाद एक बीमारी की तरह है यह अज्ञानता और धर्मान्धता के वायरस से समाज में फैलती है। इसे रोकना बहुत जरूरी है।
अगर हम अपना कूड़ा पड़ौसी के दरवाजे पर डालेंगे तो वह अपने द्वार पर ही उड़कर आता है। अर्थात पड़ौसी का घर साफ नहीं है तो हमारा घर कैसे साफ रह सकता है।
तभी दूरदर्शन पर पकड़े गये आतंकी को दिखाया जाता है। आतंकी बताता है कि उसे आतंकवादी शिविर में कहा गया था कि यदि वह हमले करेगा तो उसे जन्नत मिलेगी और वहाँ की कुंवारी लड़कियों से विवाह होगा। उसके परिवार को 5 हजार डॉलर भी मिलेंगे।
कौशल्या बोलती है- अपनी मां को अनाथ और अपनी पत्नी को विधवा बनाकर स्वर्ग जाएगा। मारूंगी दो सोटी। ये लोग क्या जाने माँ का दर्द. अपने दो बेटे खोकर मैंने कैसे जीवन विताया है, मुझसे पूछो।
इन्हें चाहिए कि मेहनत मजदूरी करके इज्जत की जिन्दगी जिएँ। वैसे ही आम आदमी के लिए गुजारा करना कठिन है। ये अधर्मी लोग भोले भाले बच्चों को फुसलाते हैं। ये फुसलाने वाले अधर्मी हैं, पाखंडी हैं, आदमी की शक्ल में चंडाल हैं। ये अधर्मी इन आवारा, कामचोर युवाओं को सब्जबाग दिखाकर आम जनता का खून चूसने के लिए छोड़ देते हैं। और ये अपने ही भाई बहनों का खून करने में नहीं हिचकते। कौशल्या को बहुत गुस्सा आता है।
अमृता ने दादी को बताया कि सीमाओं पर सेनाओं की हलचल होने लगी है। कौशल्या कहती है- कहीं युद्ध न छिड़ जाए। फिर हमारे मुल्क हथियार खरीदेंगे। देश की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा। आधी जनता तो पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव झेल रही है। वही पैसा अब युद्ध में लगेगा। कौशल्या बुद्धि जीवियों की तरह बात करती है।
अमृता हंसते हुए चुटकी लेती है- दादी तुम्हें तो नेता होना चाहिए। दादी बोलती है- सभी नेता बन जाएंगे तो घर कौन संभालेगा। बड़ी मुश्किल से तो दिल्ली में यह घरोंदा तैयार किया है.
कमला को लाहौर की बातों में कोई रुचि नहीं है। वह कहती है हमारी दिल्ली...हमारा चाँदनी चौक सबसे अच्छा है। हम मरते दम तक यहाँ रहेंगे।
कौशल्या भी यही कहती है- लाहौर छूट गया पर अब दिल्ली नहीं छोड़ूँगी।
अंत में अमृता कमला से सरसों का साग और मक्की की रोटी खाने का अनुरोध करती है। इसमें दादी के लाहौरी हाथों की गंध है।
इस कहानी में बंटवारे का दर्द, आतंकबाद की समस्या, युद्ध की समस्या, आदि पर चर्चा है। बहस भी है। नई पुरानी पीढ़ी का संघर्ष भी है। //जहाँ रहो सोई सुंदर देशू // की बात भी है. मातृ भूमि से प्यार की बात भी है, अपनी संस्कृति अपने खान पान का भी जिक्र है। तथाकथित धर्मांधों के प्रति रोष भी है। युद्ध से होने वाली हानि की ओर संकेत भी है। आतंकवादियों के प्रति रोष और दया भी है।
कहानी अंत तक जाते जाते शीर्षक पर जा टिकती है। लेखक ने पंजाबी भाषा का पुट भी बहुत अच्छा दिया है। पात्रों के अनुकूल भाषा है। कुल मिलाकर यह एक सफल कहानी है।
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© डा. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
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