Wednesday, 23 June 2021

agnishikha manch laghu Katha Oakley mein sar dena tum munh sar se kya darna doctor Alka Pandey sabhi ki rachnaen yahan par hain aap sab_padhen



अग्निशिखा मॉच 
22/6/2021
विषय -ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना ।

लघुकथा 


शीर्षक- तैयार रहो मूसल खाने को …?

जैसे ही खबर मिली की कुसुम के रति का कार एक्सीडेंट् में मृत्यु हो गई है ..मीना का रो रो कर बुरा हाल दो साल पहले ही बहुत मुश्किल से शादी की थी और कुसुम के साथ यह घटना घट गई मीना ने अपने पति को बहुत जोर  दे कर कहाँ आप कुसुम को साथ लेते आना , आपकी बहन है वहाँ अब कौन देँखेगा उसे विनोद ने मीना को कहाँ क्यो *ओखली में सर दे रही हो जानती नहीं की कुसुम ने तुम्हारा जीना मुश्किल किया था , उसकी शादी के बाद चैन से रह रही हो पास रहकर रोज सर *पर मूसल ही पड़ेंगे , * मैं नहीं लाने वाला जीना मुश्किल कर देती हैं रोज किसी न किसी बात पर हंगामा , नहीं मीना मेरी बहन है पर मैं नहीं ….दो चार दिन ठीक है पर , हमेंशा के लिये नहीं रखूगा  , तुम्हारी भी तबियत ठीक नहीं रहती है , 
मीना आप सोचे जवान विधवा का जीवन कैसे काटेगी ससुराल वाले उसे पंसद नहीं करते हैं । 
मेरा क्या है ले कर आ जाऊँगा तुम को *अोखली में सिर देने की बहुत आदत है तो खाते रहना मूसल * मैं तो बहार रहूँगा तुम ही झेलना मूसलों का दर्द ….
मीना शायद अब कुछ  सालों में समझदार हो गई होगी इतना बड़ा दुख से तो टूट गई होगी , कुछ भी हो मैं सहन करुगी पर उसे रोने के लिये अकेला नहीं छोड़ूँगी , ननद है तो क्या …? 
मेरी बेटी ही तो है , 
विनोद , मीना में तुम्हारे इन्हीं गुणों के कारण तुम्हारी पूजा करता हूँ रिश्तों को सहेजना संवारना तुम्हें बहुत आता हैं । 
मैं नासमझ हूँ । 
तुम्हारी मुसिबत नहीं नहीं तुम्हारी  *ओखली को लेने जा रहाँ हूँ मूसल खाने की तैयारी रखना ..   *
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई



वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन, 
विषय  *** ओखली में  सिर दिया  है तो मूसलों से क्या  डरना  *****
   
रामलाल जी सिर पर हाथ रखे चिन्ता  में  बैठे थे , पास ही उनकी पत्नी  भी चिन्ता ग्रसित  लग रही थी ।रामलाल जी ने धीरे से कहा ,बेटी शोभा का हमने अपने से बड़े घर में  विवाह  तो तय किया है,  परन्तु  दहेज को लेकर उनकी मांगे बढ़ती  ही जा रही  हैं  ।सारी जमा पूंजी तो दहेज  का सामान  जुटाने  में  लगा दी, अब उन्होने कार की मांग  की है ,कहाँ  से लाऊँ,  रामलाल जी  रूआँसे होकर बोले । पत्नी  ने कहा मांग तो पूरी करनी  पड़ेगी ,।नहीँ  करेंगे तो शादी टूटने का डर है ।वैसे  सगाई के  बाद शोभा  और दामाद जी एक साथ बाहर घूमने जाते रहते हैं,  शादी टूटने से बदनामी होगी ।दोनों  चिन्ता  में  बैठे थे, तभी रामलाल जी   धीरे से बोले  एक यह मकान  बचा है इसे  गिरवी रख शोभा की शादी अच्छे से  कर देंगे,  बाद में  देखा जाएगा, पत्नी  बोल पड़ी ये मकान  गिरवी रखेंगे ,और पैसे  न चुका सके तो कहां जायेंगे ।एक ये घर ही तो है हमारे पास।रामलाल  जी बोले अब क्या  करें  बड़े  घर में  शादी  कर रहे हैं,   अब ओखली में सिर दिया है तो मूसल से क्या  डरना  ।।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
मंगल वार - 22/6/2021
विषय -ओंखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना:-
जब आफत को निमंत्रण दे ही दिया है तो फिर डरने से क्या फायदा.
विधा - लघुकथा 
भयंकर एक्सीडेंट हुआ था और हरीश की दोनों टांगों में भयंकर चोट आई थी। लोगों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया था। वहां एक टांग में प्लेट पड़ी थी मगर दूसरे पैर की हालत बहुत खराब थी। रखने के ऊपर की 90 प्रतिशत हड्डी चूर चूर हो गई थी। टांग को काटने की स्थिति थी। 
उसके तथाकथित अपनों ने हाथ खड़े कर दिए थे। उसके मामा जिनकी सेवा में हरीश ने अपने जीवन के प्रारंभ के 25 वर्ष गुजार दिए थे, वो भी पीछे हट गए थे। उन्होंने ही बड़ी निर्लज्जता का परिचय देते हुए अपने एक दोस्त से हरीश के बहनोई को फोन करवाया था कि वह तुम्हारा साला है तुम नहीं देखोगे तो कौन देखेगा। 
क्षण भर के लिए बहनोई को आश्चर्य हुआ था क्योंकि जिस आदमी की सेवा में उसने इतने वर्ष गुजारे, वही ऐसा बोल रहा था। फिर भी बहनोई जी ने भेजने की स्वीकृति दे दी थी। 
दो दिन बाद ही हरीश आ गया था। हालत बहुत खराब थी। घाव सड़ गया था, उसमें से दुर्गंध आ रही थी। 
बहनोई साहब दूसरे दिन से ही एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल घूमते रहे। अंत में एक अस्पताल भर्ती करवा दिया। एक के बाद एक 10 ऑपरेशन हुए। कई बार तो स्थिति ऐसी भी आ गई कि घर में खर्च करने के लिए पैसे नहीं होते थे। किंतु यही सोचा कि ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर। और जैसे तैसे पैसे का इंतजाम किया जाता। अंततः हरीश ठीक होकर अस्पताल से निकला। 
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड,  कोलकाता

आज का विषय
 *सिर दिया ओखली में तो मुसलो से क्या डरना*


,,मोहित जी का एक हंसता खेलता सामाजिक प्रतिष्ठित परिवार थाl उनका इकलौता बेटा राहुल पढ़ाई में बहुत ही अव्वल दर्जे का विद्यार्थी रहा lअच्छी कंपनी ने उसको उठाया और कई लाखों का पैकेज ऑफर कियाl विदेश में उसके लिए नौकरी सुरक्षित अब राहुल विदेश जाने के लिए बेताब हो गया। माता पिता को छोड़कर, विदेश में जाकर रहने लगा खूब कमाने लगा और अपने माता-पिता के लिए पैसा भी समय-समय पर पहुंचाता  थाl

वहीं पर मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हुए वह अपनी सहकर्मी मोनिका की तरफ आकर्षित होता है और धीरे-धीरे यह आकर्षण प्रेम में परिवर्तित हो जाता है और वह शादी कर लेता हैl
मोनिका का विदेश में ही उसका जन्म स्थान ,वही पली-बढ़ी और खूब ऐसो आराम में रही।

हिंदुस्तान में अपने पति के साथ आकर कुछ टाइम तो सब ठीक-ठाक चलता रहाl 
पर बुजुर्ग सास-ससुर के साथ उसको रहना रास नहीं आयाl राहुल माता पिता और पत्नी के बीच में पिसता रहाl
नतीजन माता पिता जैसा कि होता है अपने बच्चे की खुशी ही चाहते हैं, उन्होंने कह दिया कि भाई वह अलग रह सकता है l
इस तरह से मजबूरन उसको बिना मर्जी के बिना  इच्छा के दूसरा घर लेकर रहना पड़ा,
* *सिर दिया ओखली में तो मुसल से क्या डरना जीवन का सामना तो करना ही पड़ेगा* इस प्रकार से राहुल ने निर्णय लेकर दूसरा मकान तो ले लिया किंतु बहुत संस्कारवान होने के कारण माता-पिता की हर पल हर घड़ी का उसने ध्यान रखाl उनका साथ दिया l

किंतु आज उसकी पत्नी मोनिका उसके साथ जरूर है, पर पारिवारिक दृष्टि से उसका साथ नहीं हुई

*अब कुछ नहीं हो सकता,, सिर ओखली में दिया तो मुसल से क्या डरना झेलते रहो*


स्वरचित लघु कथा सुषमा शुक्ला इंदौर🕉️✒️

आज का विषय--ओखली में सर देना

निधि  अमीर घर की लड़की थी। वह पढ़ने में भी बहुत होशियार थी।उसे गाने का  बहुत शौक था।
उसके  कॉलेज का एक लड़का था रमन। वह भी बहुत अच्छा  गाना गाता था ।
कॉलेज के एक कार्यक्रम के दौरान दोनों की मुलाक़ात हुई।वे एक दूसरे को पसंद करने लगे।
बाद में यह मुलाकातें प्यार में बदल गईं। कालेज पूरा करने के बाद निधि को एक अच्छी नौकरी मिल गई।
 रमन सिविल सर्विस की तैयारी करने को कहता है। निधि के घर वाले उसके विवाह की बात चलाते हैं तो वह अपने घर में रमन के बारे में बताती है ।उसके घरवाले  इस शादी से मना करते हैं क्योंकि रमन अभी बेरोजगार है लेकिन दोनों कोर्ट में जाकर शादी कर लेते हैं।  कुछ दिन  तो बहुत अच्छे से बीतता  है । बाद में रमन अपनी तैयारी के प्रति लापरवाह हो जाता है।अपना सारा समय घूमने में और इधर उधर की बातों में लगा देता था । दोस्तों के साथ ड्रिंक भी करने लगा।
इसी तरह कई साल बीत गए ।वह  कहीं छोटी मोटी नौकरी पकड़ लेता कुछ दिन करता फिर घर  में बैठ जाता ।
अब तो वह बहुत दिनों से घर में ही बैठा रहता है,कोई काम नहीं करता। 
कुछ बोलने पर निधि पर पति होने की अकड़ दिखाता है।
निधि सब बर्दाश्त कर रही है। अपनी और बच्चों की सबकी जिम्मेदारी उसी  पर है।अब क्या करे वह जब परिवार वालों के मना करने के बावज़ूद उसने खुद ही ओखली में सर दे दिया तो मूसर से क्यों डरना।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'


ओखली में सिर दिया मूसल से क्या डरना
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 नमिता के लिए जब जीवनलाल के यहां से शादी का प्रस्ताव आया, तो  माता राधा और पिता रामशरण जी को लगा ,...कि यह हमारे पूर्व जन्म का फल है,.. जो बेटी का रिश्ता घर बैठे और इतने बड़े परिवार में हो रहा है। नमिता ने कहा पिताजी मैं अभी शादी नहीं करना चाहती ।मैं अभी पढ़ना चाहती हूं । पिताजी ने कहा बैटी हम पढ़ाई के लिए कहां मना कर रहे हैं? शादी के बाद भी  तुम पढ़ना ।जीवन लाल का लड़का बहुत ही सुशील है। मैं जानता हूं  उसे ...कुछ लोगों ने रामशरण को समझाने की कोशिश की, कि जीवनलाल बहुत लालची है,.. वहां रिश्ता मत करिए ।रामशरण को लगा कि बेटी की शादी इतने बड़े घर में हो रही है.. तो लोग जल रहे हैं। राम शरण ने किसी की बात नहीं मानी ,...और बेटी की शादी धूमधाम से कर दी। बेटी ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया.... और खुशी-खुशी ससुराल चली गई। कुछ दिन तो ठीक रहा उसके बाद ससुराल वालों ने रंग दिखाना शुरू कर दिया । नमिता तुम्हारे पिताजी ने ढंग से दहेज नहीं दिया, हमें तो कार चाहिए । बेटे को बिजनेस के लिए दस लाख रुपए चाहिए ।लेकर आओ वर्ना माता-पिता के यहां रहना। नमिता के  साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था। पिता रामशरण के पास  जितना भी रूपया था ,...बेटी के ससुराल में दे चुका था ...केवल एक मकान ही बचा था। जीवन लाल की नीयत मकान पर खराब हो रही थी , उसने कहा कि मकान बेचकर रुपए दे दो ,तो हम एक अच्छा बिजनेस शुरू करेंगे ,..और तुम्हारी बेटी के लिए वहां मकान खरीद देंगे, जिसमें वह आराम से रहेगी ।रामशरण ने सोचा कि आज मैं लोगों की और नमिता की बात मान लेता  तो ये दिन न देखने पड़ते।**आखिर ओखली में सिर दिया तो  मूसल से  क्या डरना** वह मकान बेचकर पूरा रुपए जीवनलाल को दे दिया । रामशरण को लगने लगा था कि, ""मैं बकरा ह

मकान बेच कर पूरा पैसा जीवन लाल को दे दिया ,  और अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें जाते हुए देखता रहा।


 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 
इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 8989409210


नमस्ते में ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु मैं मेरी लघु कथा प्रस्तुत करती हूं।
विषय - ओखली में सिर देना ।

    महेश और संदेश और उनकी टीम सब बाहर टहलने के लिए गए/घूमने के लिए गए। जाते समय उनको एक पहाड़ दिखाई गया और उन सबको ट्रैकिंग करने की बहुत शौक था। 
     पर यह पहाड़ चढ़ने के लिए/ ट्रैकिंग करने के लिए बहुत ही मुश्किल था। सब ट्रैकिंग करने के लिए अपने अपने सुरक्षित तैयारी के साथ निकले , पर उसमें संदेश को यह मालूम था की यह पहाड़ चढ़ने को मुश्किल है उसने सबको रोका , मत जाओ चढ़ने के लिए यह नहीं हो सकता, पर अब सब जोश में आए और कहने लगे हम चढ़ाकर दिखाएंगे तुम्हें। 
      संदेश कहने लगा अपने मित्रों को ,क्यों भाई अपने हाथों से मुसीबत में पढ़ रहे हो मेरा सुनो और पीछे हट जाओ, पर किसी ने भी संदेश की बात को नहीं सुना, नजर-अंदाज करके वह पहाड़ चढ़ने लगे, थोड़ा-थोड़ा चढ़कर आगे गए और चढ़ते समय उनको इतनी मुसीबत आने लगी, एक-एक करके सबको संदेश की बात याद आने लगी, पर अब कुछ  कर भी नहीं सकते थे , खुद "ओखली में सर दिया तो फिर मुसल से क्या डरना" आए हुए हर एक संकट का सामना तो करना ही पड़ेगा। 
     अनेक मुश्किलों से उन्होंने ट्रैकिंग की, उसमें उनको चोट भी आई पर वह ट्रैकिंग करके धीरे धीरे नीचे आए तब वह सब, संदेश को कहने लगे, भाई तुमने सच कहा था ,ट्रैकिंग करने के लिए यह पहाड बिल्कुल अच्छा नहीं है । हमें बहुत सारी मुश्किलें आ गई ,हम बहुत संभल संभल कर नीचे आए, हमें भी पता नहीं चला हमें तो लगा बस हमारी अभ जान ही जाएगी, पर क्या करें हमने खुद ही "ओखली में सर दिया"  था । मुश्किलों का सामना तो करना ही पड़ा। 

धन्यवाद
पुणे


आदरणीय मंच को नमन
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बिषय--ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर"
(कहानी)
आदित्य और सौरभ दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे। सोनू ने तय किया हम उन दोनों को साथ लेकर नैनीताल जाएंगे। यात्रा के निश्चित दिन अपना अपना टिकट लेकर वाराणसी से काठगोदाम पहुंचे। काठगोदाम से नैनीताल की दूरी कम अवश्य है, किंतु पहाड़ों की ऊंचाई पर चढ़ते समय जब बस से नीचे देखा जाता है, तो आंखें बंद हो जाती हैं। भय का आभास होता है, कहीं ऐसा ना हो कि बस जरा सा डगमगाए और हम 3000 फीट नीचे चले जाएं। हमारे परिवार का क्या होगा?"
सोनू आदित्य और सौरभ  टिकट लेकर छोटी सी पहाड़ी बस में बैठ गए। ड्राइवर आया। उसने बस स्टार्ट किया और धीरे धीरे यात्रा शुरू हुई। एक तरफ हरियाली से ढका हुआ बड़े-बड़े वृक्षों को संभाले हुए उन्नत पर्वत श्रृंखला तो दूसरी ओर कई हजार फिट गहरी खाइयां। सौरभ ने अपनी आंखें बंद कर ली सोनू और आदित्य सुंदर टसुंदर दृश्यों को देख रहे थे। वह बोलते जाते थे, सोनू सुनता जाता था।  पलकें बंद रहने पर वह दृश्य नहीं देख पा रहा था। बहुत साहस दिलाया। सोनू ने  थोड़ी देर के लिए अपनी आंख खोल लिया, किंतु चील चक्र के पास, जहां एक ही गाड़ी आती है थोड़ी दूर पर रूकती है तो दूसरी वहां से रास्ता पा के आगे चलती है। मैं ऐसा भी आया जब लगा कि बस लड़खड़ाए और यात्री संकट में आ गए। चिंटू ड्राइवर चतुर था ।उसने संभाल लिया। सोनू ने कहा--" चाहे जैसे भी हो जल्दी से नीचे उतर चलिए, मुझे नहीं जाना है और ना ही पहाड़ों को देखना है "।आदित्य ने बार-बार उसे दिलासा दिलाया--", इतनी दूर आए हैं, तो कैसे लौट जाए? चलो धैर्य रखो ।वहां बहुत ही अच्छा स्थान है। होटल में रुकेंगे। नैना देवी के मंदिर में दर्शन करेंगे ।नैना झील में नौकायन करेंगे। चाइना पीक पर जाकर सुंदर फूलों की घाटी, कौसानी, अल्मोड़ा, सब को देखेंगे। टेकड़ी पर हनुमान जी का मंदिर है ।वहां बहुत ही अच्छा लगता है। प्रसन्न हो जाओगे। मल्लीताल में विश्वविद्यालय और कई एक बिल्डिंग हैं। अच्छा लगेगा"। किंतु सोनू की एक ही रट थी-- "जल्दी से वापस चलो।" आदित्य ने कहा--" भाई अब इतनी दूर आए हैं, तो चाहे जो भी हो जाए बिना देखे नहीं लौटेंगे।" ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर।"
तीनों मित्र धीरे-धीरे आश्वस्त हुए ।नैनीताल के सारे दृश्यों महत्वपूर्ण स्थानों, झील  तथा मंदिर देखें।
धीरे धीरे लौटने का दिन आया ।
टिकट लेकर बस में बैठे। नैनीताल से काठगोदाम, काठगोदाम से वाराणसी आ गए।
स्टेशन पहुंचते ही सोनू ने कहा--" अब जाकर जान में जान आई है, मैं अपने घर आ गया।"
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश वाराणसी



* अग्नि शिखा काव्य मंच *
* विद्मा - लघुकथा 
* बिषय - ओखली में सर दिया है तो मूसलों से करता डरना ! *

रमा जी एक सुघड़ घरेलू महिला हैं ! वे पाककला में पूर्णत: निर्पूणं एवम् व्यव्हार कुशल महिला हैं! वो अपनां घर बहुत किफायत ओर सुझबुझ से चलाती थी ! अपनी दोनों बेटियों को उन्होनें पढ़ाई के साथ-साथ गृह कार्य में निर्पूणं बनया था ! सलोनी ओर शालीनी दोनों बहने गृह कार्य में सदैव 
अपनी माँ का हाथ बटाती थी !
इधर करोना के कारण उनके पति काम  
धंधा मंदा हो गया !घर के खर्चा चलानें में मुश्किल आनें लगी !
एक दिन शालिनी सलोनी बोली मम्मी कर्मों ना हम टिफिन र्सविस शुरू करे 
आप इतनां अच्छा खाना बनाते हो ! अभी आम की सीजन है हम सब मिलकर आचार मुरब्बे बनायें ! सभी घर वालों को ये बात जच गई !
रमा जी नें बेसिक जरूरत का सामान खरीदा और टीफीन बनानें लगी ! उनके
पति और दोनों बेटियां उनकी मदद करनें लगी ! उनका बनाया खानां लोगों को पसंद आने लगा था ! उत्साहित हो रमा जी ने अपनें पति को को कहा की वो होलसेल र्माकेट से आम ले आये तो अचार बन सकता है ! बाजार से आम अचार गये ! रमा जी और उनकी बेटीयों ने रात को  आम काटकर नमक हल्दी लगा कर रख दिया !  सोचा सुबह धूप दिखा कर अचार बना लूंगी !
        जेठ का महीना कड़ी धूप थी !
देखते ही देखते आसमान में काले बादल छा गये ओर मूसलाधार बारिश होने लगी  ! रमा जी की बेटीयां चिन्तित स्वर में बोली मम्मी अब क्या होगा ?रमा जी हंस कर बोली बेटा 
" ओखली में सर दिया तो मूसलों से करता डरनां ! 
कहनें का तात्पर्य यह है की कोई काम करो चुनोतियाँ तो आंँयेंगी ! होंसला रखनें से मंजिल मिल ही जाती है !!

सरोज दुगड़
खारुपेटिया , गुवाहाटी
असम 
🙏🙏🙏



ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना --- ओमप्रकाश पाण्डेय
गाड़ी काफी लेट हो गयी, कहने को यह एक्सप्रेस गाड़ी है और बहुत तेज़ चलती है और बहुत कम जगहों पर ही रूकती है, लेकिन पता नहीं आज क्यों यह बीच बीच में काफी रुक रही है. सुनयना मन ही मन घबरा रही थी. सुनयना बहुत दिनों बाद अपनी सहेली उमा के यहाँ जा रही थी. उमा  बभनान  से लगभग 5 किमी दूर देहात में रहती है. गाड़ी का बभनान  पहुंचने का  सही समय शाम को चार बजे ही था और उस समय उमा के गाँव जाने के लिए साधन आराम से मिल जाते हैं.
लेकिन लेट होने की वजह से गाड़ी रात में 11 बजे पहुंची. स्टेशन के बाहर कोई भी साधन, रात हो जाने की वजह से उपलब्ध नहीं थे. बभनान स्टेशन छोटा स्टेशन था, वहाँ कोई वेटिंग रुम या ऐसी कोई जगह जहाँ रात में रुका जा सके, नहीं था. सुनयना के सामने अजीब स्थित थी. यद्यपि उसे गाँव का रास्ता पता था और चांदनी रात भी थी , उसके पास एक छोटा बैग ही था जिसे वह आराम से ले कर जा सकती थी.
सुनयना ने सोंचा कि उमा का गाँव शहर के बगल का ही गाँव है, चलते हैं कोई न कोई सवारी रास्ते में मिल ही जायेगी. कुछ दूर चलने के बाद उसे कोई सवारी क्या किसी आदमी के चिन्ह तक नज़र नहीं आ रहे थे. अब उसके मन में थोड़ा डर होने लगा. वापस स्टेशन भी जाना सम्भव नहीं था. उसके सामने आगे  कुआँ पीछे खाई की हालत थी. सुनयना को वैसे अकेले यात्रा करने का काफी अनुभव था, लेकिन आज स्थित बिल्कुल अलग थी.
सुनयना ने ईश्वर का ध्यान किया और सोंचा कि जब ओखली में सर दे ही दिया है तो मूसल का क्या भय. उसने अपनी चाल तेज कर दी और करीब बारह साढ़े बारह बजे वह उमा के गाँव पहुंची. गाँव में पूरा सन्नाटा था. उमा के दरवाजे पर पहुँच कर उसने आवाज दी.  उमा इतनी रात उसे अपने दरवाजे पर देखकर आश्चर्य से भर गयी और उसने सुनयना को बांहों में भर कर गले से लगा लिया.
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)

अग्निशिखा मंच 
दिन : मंगलवार 
दिनांक : 22/6/21 
विषय : _*ओखली में सिर दिया तो मुसल से क्या डरना*_ (लघु कथा)

बारिश के दिनों की बात है ।रमेश और सुरेश दोनों दोस्त थे ।दोनों ही घर से बाहर खेलने जाना चाहते थे ,परंतु रमेश की मांँ ने कहा कि बाहर न जाओ घर में ही खेलो , क्योंकि बारिश का मौसम है बाहर जाओगे तो बारिश में फस जाओगे। घर आने में विलंब हो जाएगा ,पर दोनों ने खेलने की जिद के आगे मांँ की बात न मानी और घर से निकल गए घर से करीब 1 किलोमीटर की दूरी पर एक मैदान था । वहीं सभी खेलने जाया करते थे। वहांँ जाकर अभी खेलना शुरू ही किया था, कि अचानक मौसम खराब होने लगा सुरेश ने रमेश से कहा रमेश घर चलते हैं। मौसम खराब हो रहा है। रमेश ने कहा कुछ नहीं होगा यार रुको ना, थोड़ी देर में चलते हैं। खेलने में मजा आ रहा है। और दोनों खेल में लग गए ।थोड़ी देर उपरांत ही अचानक से मौसम बहुत तेजी से खराब होने लगा। आंधी तूफान के साथ तेज बारिश भी आने लगी । 

आसपास जिन बच्चों के घर थे वह अपने घर को भाग गए रमेश और सुरेश एक पेड़ के नीचे जा छिपे सुरेश ने रमेश से कहा मैंने कहा था ना घर चलो लेकिन तुम मेरी बात नहीं मानते हो तभी रमेश ने कहा कहा तो मां ने भी था कि बारिश का मौसम है बाहर खेलने मत जाओ पर फिर भी हम दोनों सेट करके आ ही गए थे ना तो चिंता किस बात की करते हो यार अब _*ओखली में सर दिया तो मुसल से क्या डरना*_ बारिश रुकने के उपरांत ही हम 
घर के लिए जा सकेंगे । तब तक यहीं कहीं आसरा देखकर रुकते हैं ।आंधी तूफान ठहरने का इंतजार करते हैं।

कहकर रमेश और सुरेश आण में बैठ गए परंतु रमेश को बार-बार मांँ की कही हुई बात याद आ रही थी और वह मन ही मन सोच रहा था कि अगर मांँ की बात मान ली होती तो शायद आज पछताना नहीं पड़ता मांँ की बात न मानने की वजह से आज हम मुसीबत में फंस गए हैं।


©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️


‌ मंगलवार दिनांक २२/६/२१
विधा***** लघु कथा
विषय***# ओखली में सर डाल 
                   दिया तो मूसलोंसे 
                             क्यों डरना #

      शिवलाल एक साधारण काश्तकार है । जिन्हें दो बेटे हैं ।
एक है निरंजन और दूसरा आलोक । दोनों बच्चे पढ़ाई में होशियार हैं । निरंजन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उसे  पुणे की एक बड़ी कंपनी मे नौकरी भी लगी । दूसरा आलोक पढ़ रहा है ।
      दो-तीन साल के बाद उसके मन में यह ख्या़ल आया कि मैं गुलाम की तरह नौकरी करने के बजाय अगर खुद का व्यवसाय करूं तो ज्यादा पैसे कमा सकता हूं । उसने यह विचार अपने पिताजी को बताया तो पिताजी ने उसे समझाया कि बेटा इतनी अच्छी नौकरी को छोड़ व्यवसाय शुरू करना खतरे से खाली नहीं है । उन्होंने कहा कि हर महीने हाथ में  एक निश्चित ( रकम ) तनख्वाह आ जाती है पैसे की चिंता नहीं रहती । मगर धंधे में ऐसा नहीं है ।व्यवसाय कभी चलता है कभी नहीं ,किसी महीने में कम तो किसी में  ज्या़दा । आज १००००/मिलेंगे तो कल 500 रू भी नहीं मिलते । धंधे की कमाई अनिश्चित रहती है । इसमें बहुत बड़ा धोखा रहता है । कभी ऐसा भी होता है कि किसी कारण धंधा भी नहीं चलाता । उस समय व्यवसायिक मानसिक और शारीरिक तौर से तनावग्रस्त हो जाता है । सपने भी टूटते हैं ।
     इसलिए मेरा यह मानना है कि नौकरी पर कायम रहो । उसे ना छोड़ो  । फिर तुम्हारी मर्जी , क्योंकि जीवन तुम्हारा है । बेटा अंतिम फैसला लेने से पहले  हजार बारह सोचो , फिर आगे बढ़ो ।
       नया खून ,नई सोच , नया जोश , नई उड़ान भरने वाला परिंदा कहां मानता है । वह तो और आसमान की ऊंचाई छूने तैयार रहता है ।
          शिवलाल ने कार रिपेयरिंग का कारखाना डाला । ईश्वर की कृपा से  वह बहुत चलने लगा । क्योंकि वह मैकेनिकल इंजीनियर है । उसने अपने पिताजी की बात को माना के धंधे में कम ज्यादा पैसा मिलता है । भविष्य के बारे में कोई नहीं जानता कब क्या होगा । विश्व में कोरोना वायरस का ऐसा तूफान आए कि सब की जिंदगी तहस-नहस हो गई । 
         शिवलाल के धंधे पर भी असर पड़ा । धंदे में  मंदी आई । वह निराश जरूर हुआ मगर हार नहीं मानी ।
         वह कहता है कि ,
जब ओखली में सर डाल ही दिया तो मूसलों से क्यूं डरना । कभी कभी सुख की बारिश होती है तो दुख की बिजली गिरती है । उस से भय कैसा ?
          धीरे-धीरे उसका व्यवसाय अब  जोर पकड़ने लगा है । और उसे यकीन है कि वह आगे बढ़ेगा । वह अपने  निर्णय से बहुत खुश है ।

प्रा रविशंकर कोलते
       नागपुर 
           महाराष्ट्र ।


ओखली में सिर दिया तो मुसल से क्या डरना
लघु कथा का शीर्षक 

अरमान

रेखा और श्याम दोनों भाई बहन पढ़ने लिखने में बहुत ही कुशल अपने माता पिता के साथ अच्छी परवरिश मे सभी की जिंदगी चल रही थी रेखा मां-बाप की बड़ी बेटी रही मां-बाप दोनों के बड़े अरमान बेटी को आत्मनिर्भर बनाना है अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाना है किसी अरमान के साथ दोनों पति पत्नी अपने बच्चों की परवरिश में परिश्रम कर रहे थे किस्मत भी उनका साथ दिया और बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज के दाखिला के लिए चयनित कर ली गई अब समस्या उठ खड़ी हुई एडमिशन में जो रकम लगेगी उसकी जुगाड़ कहां से की जाए।  लोन की सुविधा अवश्य थी पर उसके लिए जितनी जरूरी कागजातों की आवश्यकता थी वह दोनों माता पिता के पास उपलब्ध नहीं था क्योंकि दोनों किसी भी सरकारी नौकरी में नहीं थे और नहीं कोई बैलेंस शीट यहां सैलेरी शीट उन्हें उपलब्ध था काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा फिर भी हिम्मत नहीं हारी। दोनों अपने अरमानों को पूरा करने के लिए हर वक्त ली एक दूसरे को कहा करते अब तो ओखली में सिर दिया है मुसल से डर कर क्या करेंगे और कुछ अपने गहने को गिरवी रखकर उस समय तो पैसों का इंतजाम कर लिए और अपनी बेटी को इंजीनियरिंग में दाखिला करवा दिया पर 5 साल की पढ़ाई मैं हर महीने जो रकम भेजनी होती उनके लिए आसमान से तारे तोड़ने वाली बात हो रही थी लेकिन जहां हिम्मत और साहस मन में होता है कोई ना कोई जुगाड़ लग ही जाता है अभी उसकी पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई थी कि बेटे ने भी प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया। माता-पिता दोनों की कमर टूट चुकी थी फिर भी मन में हिम्मत और साहस बना हुआ था यह सोचकर दो-तीन साल की बात है उसके बाद परिस्थिति सुधर जाएगी फिर भी लोगों ने ऐसा कैसे सोच रहे हैं बिटिया पढ़ाई करके उसकी शादी भी तो करनी है। अब तो घर में गहने भी नहीं थे जिसे बेचकर दाखिला दिलवाया जाए पर देखिए भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं अचानक उन्हें एक अच्छी सी पार्ट टाइम नौकरी मिल गई जिसमें उन्हें अच्छा पैसा मिलने लगा और अपनी हालातों से परिचय कराने पर एडवांस के तौर पर उन्हें दाखिला के पैसे भी दिए गये।
ओखली में सर डाल दिए थे तो मुसल से क्या डरना यही सोच कर आगे कदम बढ़ाते गए रास्ता निकलते चला गया और दोनों बच्चों की अच्छी पढ़ाई परवरिश हो गई

कुमकुम वेद सेन

अग्नि शिखा मंच
दिनांक 22.6.2021
मंगलवार
लघुकथा
ओखली मे सिर दिया तो मूसल से क्या डरना।
एक सरकारी स्कुल मे मदन लाल जी गांव मे अध्यापक थे तथा करीब बीस वर्षो से एक ही गांव पढा़ने के कारण गांव में उनकी अच्छी खासी इज्ज्त होने लगी थी वे समय से स्कुल आते व समय पर जाते थे व बच्चों को पढाने का काम भी बहुत अच्छा करने के कारण रिजल्ट भी सो प्रतिशत आता था इसी गांव मे पंचायत के चुनाव होने वाले थे अध्यापक महोदय मदन लाल की सेवा भावना को देखते हुए गांव वालो ने मदन लाल जी अध्यापक जी से पंचायत के सरपंच के चुनाव लड़ने हेतु आग्रह कर दिया गांव वालो के आग्रह को स्वीकार करते हुए अध्यापक जी ने शासकीय सेवा से त्याग पत्र दे दिया व सरपंच का चुनाव लड़ लिया तथा चुनाव मे भी गांव के ठाकुर साहब के पुत्र को हराकर सरपंच के पद पर जीत हासिल कर ली।

दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाइल 9425350174


मंच को नमन
विषय:-- *कहानी*:-- *ओखली में सिर दिया तुम उसमें का डर क्यों*

गीता मेहनती लड़की पढ़ने में तेज भी ९९ प्रतिशत मार्क्स लेकर सेंट्रल बोर्ड एग्जामिनेशन पास की। करने के बाद अपने अभिभावक से मेडिकल में जाने का इच्छा जाहिर की उसके लिए कोचिंग के लिए कोटा राजस्थान में जा कर तैयारी की। जिसके कारण प्रथम प्रयास में ही एमबीबीएस में दाखिला मिल गई। सभी लोग खुश थे। पढ़ाई के बीच में ही उसके पिताजी स्वर्गवास कर गए। घर की पूरी जिम्मेवारी ताऊजी पर हो गई। गीता के पढ़ाई के बीच में ही ताऊ जी को गीता की शादी के लिए चिंतित रहने लगे इसी बीच में एक होनाहार लड़का  की जानकारी मिली। तब ताऊ जी उस लड़के के पिताश्री से शादी के बारे में बातचीत करने लेंगे। बातचीत के दौरान लड़के के पिता और गीता के पिता बचपन के दोस्त निकले ।जब यह जानकारी हुई तो लड़के के पिता तो रिश्ता तय कर दिए उनका एक ही शर्त था 15 दिन के अंदर शादी कर दे, क्योंकि मेरा बेटा यूएसए में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और जाना है ।मुझे साथ में  दहेज के रूप में कुछ भी नहीं चाहिए सिर्फ गीता विवाह के वस्त्र में आएगी उसका जितना भी जरूरत के सामान होगी हम लोग पूरा करेंगे। इस पर ताऊ जी बहुत खुश हुए। गले मिलकर स्वीकार कर लिए।यह बात अपनी भाभी  को जानकारी दीए। अब मां का काम था प्यार से गीता को समझाना और तैयार कराना। घर की परिस्थिति देखते हुए गीता भी तैयार हो गई और 15 दिन के अंदर शादी भी हो गई। जब ससुराल पहुंची घर मे बड़ी बहू होने के कारण जिम्मेवारी हो गई, परिवार के हर सदस्य देखभाल करना। 
घर में सभी लोग अनजान थे और पति से भी मुलाकात नहीं हुई है। रूम में उदास होकर बैठी हुई थी इसी बीच में उसके पति आए गीता को देखकर  बोला क्यों  उदास बैठी है? गीता बोली पढ़ाई की धुन में घर का कोई काम सीख नहीं पाय। कैसे में करूंगा। पति बहुत खुश मिजाज व्यक्ति होने के कारण बोला जी लो तुम इस खास पल को आगे चिंता क्या करना है। *ओखली में सिर दी है तो मूसली से क्या डरना*! 
राही हमारी बन जाए मोड़कर अपनी राहै। मेरी साथी बन जाओ छोड़कर सब आहे। पग-पग मिलेंगे तुम्हें दमकते हुए दोराहे। चमकती हुई धूप में चमकते हुए चौराहे। छोड़ दो सब चिंताए तुम, क्या जीना और क्या मरना। 
कौन अपना कौन पराया जान लो अब तुम। 
तुम मे है मनमीत मेरा यह सब मान लो। तुम डर को अपने डराना है, हर पल जीते जाना है। 
 हर हाल मैं मुश्किल से हमें मिलकर खुद को बचाना है। 
जो मुश्किल अभी आई ही नहीं उसकी चिंता क्या करना। 
करने वाले तो वो है उसी पर यकीन रखो, और साथ दूंगा हर पल तुम्हारा मुझ पर इतना यकीन रखो। 
जिंदगी की तकलीफों से इतना भी क्या डरना।
*ओखली मे जब सिर दे  ही दिया है तो मूसली से क्या डरना*।
 इतना कहने के बाद गीता अपने पति के साथ आलिंगन में बंद गई ।सर को अपने पतिदेव के सीने पर रखकर प्रफुल्लित हो गई।

विजयेन्द्र मोहन।

अग्निशिखा मंच
तिथि -२२-६-२०२१
विषय-ओखली में सर दिया ‌तो‌ मूसल से क्या डर‌ना

          मूसल
‌‌‌ 
‌राहुल  साइंस का विद्यार्थी है पर उसके नंबर कम ही रहते हैं। उसे 
इंजीनियर बन‌ने का बहुत बहुत शौक है।उसकीअपने पापा से प्यार से ही पर बहस हो र‌ही ‌थी कि
राहुल-आप‌ तो इंजीनियरिंग काॅलेज के  ट्रस्टी हैं,आप के कोशिश करने पर इंजीनियरिंग में एडमीशन मिल जायेगा।
‌पापा-रा‌हुल नंबर के ‌हिसाब से तुम्हे  आर्टस पढ़ना चाहिए पर राहुल नहीं माना और ‌पापा ने इंजीनियरिंग में एडमीशन करवा दिया।
जब राहुल क्लास  में गया तब समझ में आया  कि इंजीनयरिंग के विषय बहुत कठिन हैं। 
फिर राहुल ने सोचा ओखली में सिर ‌दिया है तो मूसल ‌तो पड़नी ही है। अब मुझे बहुत मेहनत कर‌नी है और रा‌‌हुल बहुत मेहनत कर‌ने‌  लगा।

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र
अग्निशिखा मंच 
दिनाँक :-22-06-2021
।जब ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरना-लघुकथा। 
मोहन जिस सोसायटी में रहता था,उस सोसायटी की आम सभा थी।आम सभा में सोसायटी के महासचिव का चुनाव होना था। सोसायटी की इस सभा में सर्वसहमति से मोहन को महासचिव चुन लिया गया।पद की जिम्मेदारी संभालते ही उसे मालूम हुआ कि सोसायटी में एक विधवा मेम्बर सकीना रहती है ,जिसके ऊपर सोसायटी का करीब दस लाख रूपया बकाया है। सोसायटी ने सकीना के ऊपर केस कर दिया है,जिसकी पेशी अदालत में हर महीने होती है। मोहन के महासचिव बनने के बाद यह काम की जिम्मेदारी महासचिव मोहन के ऊपर आ गई है। मोहन ने मीटिंग में कहा कि सकीना केस के लिए अदालत में हल करने की जिम्मेदारी मै लेता हूँ। उसने आगे कहा कि जब ओखली में सर दिया है तो मूसलों से क्या डरना।
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।


ओखली में सिर देना तो मूसल से फिर क्या डरना ।
एवरेस्ट पर चढ़ने की तमन्ना
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नेहा गांव में रहती थी वहां इतनी मूलभूत सुविधाएं शहर जैसे नहीं थी । फिर भी नेहा में कुछ कर दिखाने का जूनून हमेशा मन में रहता
अपनी पढ़ाई के साथ साथ वह खेल कूद में भी भाग लेने लगी 
उसके माता पिता इतने सक्षम नहीं थे कि उसकी आवश्यकता ओ को पूरा कर सके
लेकिन नेहा ने मन में जब ठान लिया था तो आगे बढ़ना ही था एक जूनून की मुझे कुछ करके दिखाना है
अपनी हिम्मत से ओ गांव की लड़की धीरे धीरे पहाड़ियों में अपने कदम आगे बढाने लगी फिर क्या था उसकी हिम्मत देख शासन प्रशासन सब मदद करने आगे बढ़कर आये
ओ भी पर्वता रोही की दल में शामिल हो गयी ।
और गांव से कहा नेपाल के एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने के लिए दल के साथ आगे बढ़ने लगी नेहा ने मन में सोचा जब ओखली में सिर दे दिया है तो मूसल से फिर क्या डरना
उसकी हिम्मत काम आई ओ गांव  की लड़की एवरेस्ट शिखर पर अपने कामयाबी के झंडे गाड़ कर आई ।
चारों ओर उसकी वाही वाही हुई 
परिवार के साथ साथ सभी को उस पर फक्र महसूस होने लगा
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा लाल बाग सिविल लाइन जगदलपुर छत्तीसगढ़


$$ ओखली मे सिर दिया तो मूसल से क्या डरना $$

बहुत पुरानी बात है जब शादी-विवाह मे सब काम हाथ से किया जाता था । टेंट हाउस,केटरिंग, रेस्टोरेंट्स इन सभी के बारे मे कोई नही जानता था ।
मेरी  रिश्ते की दो भुआ की शादी थी ,उसमें बरातियों के चाय की व्यवस्था मेरे ऊपर थी मैं कुल 15 वर्ष की थी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उस पर बाराती कुछ न कुछ तमाशा करते रहते है । डर को दूर फेंक मैने ये काम स्वीकार कर लिया । जब चाय सर्व कर रही थी कुछ लड़के फब्तिया कसने लगे चाय मे चाय पत्ति तो डाली है मैं भी कहाँ कम बोली चाय पीकर देखो 
दूसरी बार नहीं मांगोगे बस ओखली मे सिर डाला तो मूसल से क्या डरना ।

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

लघु कथा 

किसी  भी काम  की जिम्मेदारी लेना बड़ी बात नहीं  पर उस जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभाना एक चुनौती भरा कार्य होता है | मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ  मैंने संस्था का सांस्कृतिक कार्यकर्म करने की जिम्मेदारी ली |कार्य अनेक थे बच्चों को तैयार करना  थीम के  हिसाब से  गाने तैयार करना ,मंच के और भी बहुत सारे काम  काफी अड़चने आयी , लोगो की बातें  मन में  सफलता का एक डर 
अपने कार्य छोड़ कर काफी समय देना पड़ता है ,पर हिम्मत नहीं हारी  और दिन वो आया  ,कार्यक्रम सफलता के चरम सीमा पर था ,मेरे  कुशल सञ्चालन और बच्चो के नृत्य देखकर  पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा  |सच  हौसला रखे और सोच ले ओखल में सर दिया तो मुशल  से क्या डरना तो जरूर सफलता हासिल होती है |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड


ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?

 मेरे पति का स्थानांतरण मुंबई से आसाम जोरहाट 1982 में हो गया था। हम सब परिवार सहित वहां चले गए। वहां का वातावरण बहुत अच्छा ना था। लड़ाई दंगे होते रहते थे। मेरे पति 15- 15 दिन कभी नागालैंड, कभी अपर आसाम और कभी अरुणाँचल में रहते। टेलिफोंस व्यवस्था भी ना के बराबर थी उन दिनों। बच्चे बहुत छोटे थे, अक्सर मुझे अकेले रहना पड़ता था। 
किसी तरह नागालैंड फोन मिला और पति से बात हुई, उन्होंने बताया नागा लोग ak-47 लेकर घूमते रहते हैं।
मैंने कहा-"आप जल्दी जोरहाट आ जाइए।"वह तपाक से बोले-"जब ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना।काम खत्म करके ही आ पाऊंगा"।      
सरकारी काम को इतनी तवज्जो देना सोचकर मुझे पति की कर्तव्य निष्ठा पर अभिमान भी हुआ, पर तुरंत खतरे को सोच कर दिल भी दहल गया।

डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"
22-6-21


लघु कथा-
शीर्षक-"ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना"

रीमा एक समाज सुधारिका है। उसने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बहुत प्रशंसनीय कार्य किए हैं। कोई भी महिला संबंधित समस्या होती है वह अपने ग्रुप के साथ तुरंत वहां पहुंचकर समस्या का समाधान कर देती है। इस बार रीमा और उसके ग्रुप ने आदिवासी क्षेत्र चुना। जहां पहुंच कर बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा ।एक तो भाषा की समस्या। दूसरा उनका रहन-सहन खानपान रीति रिवाज सब बहुत अद्भुत थी, और बार-बार समझाने पर भी नहीं समझतीऔर झगड़ने लगती कभी इनसे तो कभी आपस में ।यहां तक की मारा पीटी की नौबत तक पहुंच जाती है। कई बार इच्छा होती है कि यह छेत्र छोड़ दें। जबकि आदिवासी महिलाओं की हर तरह से मदद की लेकिन आदिवासी तो आदिवासी थी। साफ सफाई के लिए साबुन सर्फ ,कपड़े और गुसल घर भी बनवा कर दिए। झोपड़ियों को पक्का मकान बनवा दिया। काफी डोनेशन इकट्ठा करके उनकी सुविधाओं के साधन और कई छोटे-छोटे उद्योग धंधे भी स्थापित किए ।पर उनका तो वही ढाक के तीन पत्तों जैसा हाल ।लेकिन रीमा ने हिम्मत नहीं हारी ।उसने उस परिस्थितियों का एकजुट होकर सामना किया और ग्रुप को समझाते हुए कहा जब ओखली में सिर दिया है तो मूसलों से क्या डरना ।आखिरकार 3 वर्ष में उनकी विजय पताका फहराई ।वह आदिवासी बस्ती चमचमा उठी ।99% महिलाएं जागृत हो गई पढ़ाई ,लिखाई , सफाई बच्चों के लालन-पालन, उद्योग धंधे सब में काफी निपुण हो गई अब। रीमा और उसका ग्रुप बहुत खुश था ।उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया, और अधिक से अधिक सरकारी मदद  भी मिली ।ताकि वे अपना काम सुचारू रूप से चला सके। सही कहा है  कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

स्वरचित लघु कथा रजनी अग्रवाल जोधपुर



अग्नि शिखामंच 
विषय---ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना दिनांक 22-6-2021 

        जिंदगी भी बहुत अजीब होती है। कैसे-कैसे मोड़ आ जाते हैं जीवन में । प्रकाश और सुरेश दोनों दोस्त हैं और दोनों व्यापारी है । उनका व्यापार भी एक साल, एक जैसा चल रहा था । प्रकाश को कभी-कभी थोड़ा ज़्यादा मुनाफ़ा हो जाता है । दोनों अच्छे दोस्त  जिस कारण एक दूसरे के घर आना जाना लगा रहता । दोनों परिवारिक मित्र है ।
        अभी लॉकडाउन की वजह से परेशानियाँ आई तो सुरेश को व्यापार में नुकसान हुआ । और वे गृहस्थी चलाने के लिए परेशान होने लगा । उसने प्रकाश जी से पैसों की मदद मांगी।  सुरेश को उनका स्वभाव मालूम था कि वे बहुत संवेदनशील है और रिश्तो को बहुत अहमियत देते हैं ।मना नहीं करेंगे।   
           लॉकडाउन के कारण परेशानियाँ तो प्रकाश को
भी आई और वह सोच रहे थे के हालात तो मेरे भी उसके जैसे ही हैं ।   दोस्त की परेशानी देख उन्होंने यही सोचा मदद तो करना ही है। तुरंत सुरेश को फोन किया, दोस्त, व्यापार में गरम नरम चलता है। ओखली में सर दिया है तो मूसल से क्या डरना । दोनों मिलकर सब संभाल लेंगे। तनावमुक्त ठहाके गूंज गये।
          रानी नारंग


नमन अग्नि शिखा मंच 
आज का विषय -ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना 
लघुकथा 
*आरोही* 

दादी ऐनक से निहारते कहती -लगता हैं ? कोई नयी मुसीबत साथ लेकर आरव आ रहा है ।
आरव ने कहा -दादी ये आरोही है  ,इसकी ख़ूबसूरती देख कहा था मूलधन ब्याज प्यारा अमूल्य निधि  है ,
फिर अभी ये रूप देख दादी के होश ही उड़ गये ,बालों के कलर ,फटी जीन्स चुड़ैल और भूतनी हैलोईन डे , कंपिटिशन पर्वतारोही का दस लाख का चेक लेकर आई थी ।
आरोही को फ़्रेस होते जाते देख 
आरव ने चुहल करते कहा - ऐसे ऐसे आधुनिक शौक़ पाल रखी की है । 
अब तूने सर दिया ओखली में तो मूसल से क्या डरना ?
हमें किस बात का डर  हमें कितने दिन रहना , हमारी बहुरानी ही झेलेगी , इस नौटंकी को अरे दादी सुन तो लो पूरी बातें अभी अपना मेकअप उतार बहु रूप में आयेगी ,तब देखना ?
आरोही चाय नाश्ता लेकर आई दादी को प्रणाम किया ,और दस लाख का चेक दादी को देते हुये कहा -घर में आप सबसे बड़ी है ये लक्ष्मी तो आपके के पास होनी चाहिये । 
आरव दादी की चुटकी लेते कहा - लाइये आपके एकाउंट में जमा कर देता हूँ ।
मूलधन से ब्याज प्यारा है ।और दादी ने आरोही को गले से लगा लिया ।
अनिता शरद झा मुंबई


जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच
 दिन- मंगलवार 
दिनांक- 22/6/ 2021 लघु कथा 
प्रदत्त विषय - *ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना*

देश में चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। विदेशी सेना ने युद्ध छेड़ दिया है। कभी बंदूकों की, तोपों की कभी गोलो की आवाज आती है ।सिंह साहब के यहां सभी उदास है। मां का रो-रो कर बुरा हाल है ।सभी बहुत परेशान है ।सिंह साहब चुपचाप बैठे हुए हैं। उनके चेहरे में कोई हाव-भाव नहीं आ रहे। तभी पड़ोस के गुप्ता जी ने पूछा ! क्या बात है? आप क्या सोच रहे हैं? आपका बेटा भी तो इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डर तो है ही पता नहीं कब क्या हो जाए। तब सिंह साहब बोले-  हां मैं जानता हूं कि मेरा बेटा एक सैनिक है और वह भी इस समय इस युद्ध में  अपनी भूमिका निभा रहा है। नहीं मुझे किसी बात का डर नहीं है ;क्योंकि जब मैंने उसको देश हित में भेजा था, तभी सब कुछ सोच लिया था।  फिर जब *ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना* मै हर परिणाम के लिए तैयार हूं। 

रागिनी मित्तल
 कटनी, मध्य प्रदेश


अग्निशिखा मंच को नमन
आज का विषय*लघुकथा*
*ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?*

     आज रामलाल जी को मालिक के बेटे अमित ने ऐसी डांट पिलाई की उनकी आंखें छल छला आई। किसी पार्टी का आर्डर डिलीवर नहीं हो पाया था। अमित ने  कहां फोकट के पच्चीस हज़ार रुपए   महिना लेते हो क्या? बाहर कौन देता सेवानिवृत्त आदमी को,इतने पैसे, उसने उम्र का भी ख्याल नहीं रखा,न कहनी वाली खरी-खोटी सुनाकर वह अपने केबिन चला गया।
     रामलालजी  रेलवे  विभाग में बड़े बाबू से सेवानिवृत्त हुए थे।
रामलालजी की उम्र भले ही साठ साल की हुयी किंतु लगते  थे पच्चपन साल के," पापा अब आप घर में रहकर क्या करेंगे  बेटा  रोशन ने  पूछा ?"कुछ नहीं 
मुझे चार धाम की यात्रा करना है,।" अच्छा बेटे रोशन ने कहा, पापा अवश्य करो", यात्रा से आने के बाद, मेरे दोस्त अमित के फैक्ट्री में लेखापाल की नौकरी है , फिर आप ,कार्यभार संभाल लेना,
आप का समय भी अच्छा कटेगा,
"ठीक है, बेटा धीरे स्वर में पापा ने कहा", मां का देहावसान हुआ तो,बेटा रोशन दस साल का था,
     क्या सोचकर , फैक्ट्री ज्वाइन की थी, क्या करें बेचारे एक क्षण के लिए लगा अमित की केबिन में
जांकर बोलु" यह नौकरी तुम को मुबारक तीस हजार तो पेंशन आती है। फिर बेटे रोशन का चेहरा सामने आये, पापा फैक्ट्री में चार महीने भी टिक नहीं पाये
      जब वापिस घर आये तो उदास चेहरा, आंखों में पानी देखकर बेटे रोशन ने कहा,"पापा तबियत तो ठीक है?  नहीं नहीं सब ठीक, है आज तेरे दोस्त अमित ने सब के सामने डाटा, फटकारा भला बुरा कहा, अमित से ऐसी उम्मीद नहीं थी"।
       "पापा प्राइवेट नौकरी में तो यह सब चलता है, रोशन ने हंसते हंसते ज्ञान दिया,। अगर मालिक कुछ नहीं कहेगा तो उसे मालिक कौन कहेगा?"आप चुपचाप सुना करो, रामलालजी को तो यह ज्ञान से काटो तो खून नहीं निकले अपने ही औलाद ने ऐसा कहने    की उम्मीद नहीं थी, नौकरी का निर्णय उनका ही था,*इसको बोलते, ओखली में सिर दिया तो मुसल से क्या डरना*
      "पापा, सेवानिवृत्त आदमी को  आजकाल कौन पूछता,?पच्चीस हज़ार रुपए कौन देता वह तो मेरा दोस्त है इसलिए,
   रात को अपने कमरे में रामलालजी सोने गये अमित की डांट बेटे  रोशन बोलवचन से नींद तो काफुर हो गयी  थी
*अब सर दिया ओखली में तो मुसल  से क्या डरना*,यह कहकर ,अगली सुबह भरे मन से फैक्ट्री के और चल दिए।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक:- 22/06/2021


💐 ओखली में सिर दिया तो फिर मूसल क्या डर रावण ने बहुत विकट परिस्थितियों में अपना जीवन जीवन जिया अर्थात कहने का तात्पर्य है कि वह दाने दाने को खाने के लिए बचपन से मोहताज था ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसकी मां ने पिता के ना होने पर भी उसे पढ़ने के लिए सुख सुविधाएं ना देते हुए भी एक आदर्श दिया एक उद्देश्य दिया एक लक्ष्य दिया कि बेटा तुम्हें पढ़कर आगे बढ़ना है और वह अथक परिश्रम करते हुए एक उच्च पद को पा जाता है किंतु वह एक गरीब परिवार से आया हुआ था उसकी कोई शान शौकत नहीं थी तो वह हर जगह उपेक्षित होता था एक समय ऐसा भी आया कि उसे जो पद मिला था उसके आधार पर उसे अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ा एक दिन वह हताश होकर घर बैठ जाता है तो मां कहती है बेटा तुम्हें हताश नहीं होना चाहिए क्योंकि जब तुमने अपने सिर को ओखली में डाल ही दिया है तो फिर मुसल से डर नहीं वह मां की वाक्यों को शिरोधार्य करके कर्तव्यनिष्ठ ईमानदारी और अपनी सहनशीलता से आगे कार्य करने लगता है और वह अन्य लोगों को भी यह सलाह देता है कि भविष्य में अपने कार्य को करते रहना आगे बढ़ते रहना अपने कर्तव्य से कभी युवक नहीं होना जब तुमने यह बीड़ा उठा ही लिया है अर्थात ओखली में सिर दे ही दिया है तो मुसल से मत डालना



कुमारी चंदा देवी स्वर्णकार जबलपुर मध्य प्रदेश


सत्यता पे आधारित लघु कथा


ओखली मे सर दिया तो मूसल से क्या डरना
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हमारे इलाके के समिप ही बसी बस्ती इलाके एक चर्चित अपराधी रहता था हमेशा दबंगई दिखा बस्ती मे रहने वालों को सताता था औरतों को परेशान करता था कुल मिलाकर पूरा बस्ती इलाका ही उससे परेशान था ओर तो ओर उसकी दबंगई दिन पर दिन बड़ती ही जा रही थी एक बार जब वो किसी सजा को काट जेल से छुटा तो फिर से उसने अपने गलत हथकंडे अपनाऐ परंतु इस बार बस्ती के लोगों ने तय कर रखा था की अब ना सहेंगे और उन्होंने गुप्त मिटिंग कर किस तरह और क्या करना है ये तय कर लिया कुछ लोग ऐसे थे जो सिर्फ़ दिखावे के लिये जुड़े थे मिटिंग मे ।एक दिन सभी ने मिल दबंगई की हरकतों की अति होने पर उसे बहुत ही बुरी सजा की और उस सजा को खुले आम दिया जिसके चलते दबंगई बुरी तरह जख्मी हो गया।बस्ती के सभी लिया लोगों पर पुलिस केस हुआ कानून अपने हाथ मे लेने के लिये।पुलिस ने उन सभी को गिरफ्तार किया जो मिटिंग मे शामिल हुए थे ऐसे मे जो बिना मन के जुड़े थे मिटिंग मे वो बोलने लगे अपने पैरों पे हमनें खुद कुल्हाड़ी मारी अब जो हो गया सो भुगतना तो पड़ेगा ही सबको और अब ओखली मे सर दिया तो अब मूसल से क्या डरना।।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
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नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
दिनाँक -22 /6/ 2021
विषय- लघुकथा ओखली में सर दिया तो मूसली से क्या डरना

सानू और पानू दोनों की दोस्ती पक्की थी!  इन दोनों ने मिलकर एक ब्यूटी पार्लर खोला!  कभी कस्टमर ज्यादा आती और कभी आती ही नहीं! सानू थोड़ा निराश होने लगती! उनके ब्यूटी पार्लर के सामने एक और ब्यूटी पार्लर था, उसमे हमेशा भीड़ लगी रहती! यह देख सानू निराश होने लगती,  तब  पानू उसे संभालती ! उसे समझाती कहती जब ओखली में सर दिया है तो मूसली से क्या डरना!! देखो यार इस तरह निराश मत हो  कभी हमारे  पार्लर मैं इतनी भीड़ होगी हमसे संभाले नहीं संभालेगा !  सानू की भाभी उसे हमेशा ताना मारती रहती तुम हमेशा निकम्मी ही रहोगी कभी तुम्हारा पार्लर नहीं चलेगा! सानू की आँखों में आँसू आ जाते यह सोच कर क्या सच में मेरा पार्लर नहीं चलेगा! पर फिर उसे अपने भीतर आग सुलगती हुई महसूस होती और वह अपनी मुठिया भींच कह उठती की एक दिन मेरा भी पार्लर ऊँचाइयों पड़ जाएगा और फिर खूब मेहनत करने लगती! उसके अच्छे गुण साभाव से उसके पार्लर में जो कस्टमर आती उससे खुश होकर जाती, धीरे-धीरे उसके ब्यूटी पार्लर का नाम होने लगा और उसका ब्यूटी पार्लर  खूब तरक्की करने लगा! आज सानू एंड पानू नाम की ऐसी तूची बोलने लगी उसके यहाँ एक बार जो कस्टमर आ जाती वह फिर दूसरी जगह नहीं जाती! तो दोस्तों कुछ पाने के लिए ओखली में सर देना ही पड़ता हैं।। 

     🙋‍♀️🌹तो मित्रों कैसी लगी मेरी लघुकथा मुझे जरूर बताना कमेंट करके फिर मिलते हैं चलते-चलते किसी मोड़ पर किसी लघु कथा या कहानी के साथ🌹🙋‍♀️

      🙏🏻🌹 समाप्त 🌹🙏🏻

 रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार


लघुकथा-"ओखली पे सर दिया तो मूसल से क्या डरना"
द्रोपती साहू "सरसिज"महासमुन्द, छत्तीसगढ़
विधा-लघुकथा
      *****
       बड़े बड़े वादे के साथ सत्ता सुख लोभी सरकारें।
        वादा-"सत्ता में आते ही दस दिनों के भीतर सब किसानों का पूरा कर्जा माफ।"

    मनचाही धान खरीदी कीमत वगैरह-वगैरह…...

     फिर वही, बस टोपियाँ बदली जा रही है।

      नेताओं, मंत्रियों के वेतन भत्तों में भारी इजाफा।

       तब देश के कोष पर अतिरिक्त भार तनिक भी नहीं पड़ता।

     चुनाव के चार साल सरकार अपनी सुनायेगी।

     पाँचवे साल पीड़ित जनता का हाल पूछना,
फिर से स्वप्नलोक की सैर कराने की तैयारी।
      जनता को गिने चुने नगण्य वादों का लॉलीपॉप थमाना इस शर्त के साथ कि बाकी वादे आने वाली पंचवर्षी में अवश्य पूरे करेंगे।
     
      आखिर "ओखली पे सर जो रख दिया तो मूसल से क्या डरना" हमने जो उनको सत्ता थमाया है।
         
      अच्छा करे या….…............।
             *****
पिन-493445
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लघु कथा 

किसी  भी काम  की जिम्मेदारी लेना बड़ी बात नहीं  पर उस जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभाना एक चुनौती भरा कार्य होता है | मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ  मैंने संस्था का सांस्कृतिक कार्यकर्म करने की जिम्मेदारी ली |कार्य अनेक थे बच्चों को तैयार करना  थीम के  हिसाब से  गाने तैयार करना ,मंच के और भी बहुत सारे काम  काफी अड़चने आयी , लोगो की बातें  मन में  सफलता का एक डर 
अपने कार्य छोड़ कर काफी समय देना पड़ता है ,पर हिम्मत नहीं हारी  और दिन वो आया  ,कार्यक्रम सफलता के चरम सीमा पर था ,मेरे  कुशल सञ्चालन और बच्चो के नृत्य देखकर  पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा  |सच  हौसला रखे और सोच ले ओखल में सर दिया तो मुशल  से क्या डरना तो जरूर सफलता हासिल होती है |

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड


ओखली में सिर दिया तो मूसल का क्या डरना


सुधा अपने बेटे के पास मुंबई गई ।उसका बेटा दीपक अमेरिका की डिलोईट कंपनी में मैनेजर था। दीपक की अच्छी सर्विस थी सुधा बहुत खुश थी और उसका बेटा भीबहुत खुश था ।तभी उसकी बेटे की उसके ही ऑफिस में एक इंजीनियर अरुण से दोस्ती हो गई और इंजीनियर अरुण रविशंकर के आर्ट आफ लिविंग के सत्संग में जाता था तो वह सुधा के बेटे दीपक क भी अपने साथ ले जाने लगा। दीपक को वहां बहुत अच्छा लगने लगा और वह हर पूर्णमासी को सत्संग में जाने लगा ।एक दिन अचानक दीपक से अरुण इंजीनियर बोला" दीपक मैं तो यह डिलोईट कंपनी की नौकरी छोड़ रहा हूं और अब रविशंकर के सत्संग में जुड़ जाऊंगा"। दीपक बोला "अरे यार इतनी अच्छी नौकरी है, तुम आर्ट आफ लिविंग ज्वाइन करो पर नौकरी मत छोड़ो"। लेकिन अरुण कहने लगा मेरा एक दोस्त बहुत अच्छा बिजनेस करता है और उसने एक साल में ही इतना कमा लिया है कि उसने मुंबई में दो करोड़ का शानदार मकान ले लिया है तो मैं कुछ पैसा उसके साथ लगाकर उसके बिजनेस में पार्टनरशिप कर लूंगा
 दीपक बोला" ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा". अरुण बोला " यार तू भी नौकरी छोड़ दे और अपन दोनों मिलकर बिजनेस करेंगे। 1 साल में ही उसने दो करोड़ का मकान खरीद लिया है और तू अभी किराए के मकान में ही है इसलिए तू भी अपनी नौकरी छोड़।"
 जब सुधा को मालूम हुआ वह दीपक को भी बार-बार नौकरी छोड़ने के लिए कह रहा है तो सुधा ने दीपक को समझाया" बेटा किसीके कहने में नौकरी बिल्कुल मत छोड़ना बेशक रविशंकर के art of living में जाना, समाज सेवा भी करना पर नौकरी बिल्कुल नहीं छोड़ना ।
दीपक ने कहा हां मां मैं नौकरी नहीं छोडूंगा, और दीपक अपनी नौकरी करता रहा और उसके दोस्ती अरुण से बनी रही। वह उसके घर आता रहा।
 एक दिन अचानक अरुण ने फोन किया अरे मैं मेरा दोस्त के साथ जो बिजनेस कर रहा था आज उसकी डेथ हो गई है। यह तो बहुत बुरा हुआ। 
दीपक बोला ठीक है चलो अभी तो मैं भी उसके यहां चलता हूं लेकिन अब तू क्या करेगा अब तू उसका बिजनेस संभाल लेना। अरुण बोला हां देखता हूं लेकिन मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि वह करता क्या था दीपक बोला तू तो मुझे भी कह रहा था नौकरी छोड़ने के लिए अगर मैं भी छोड़ देता तो क्या होता। तेरी वाइफ तो नौकरी करती है तुझे इतनी परेशानी नहीं होगी।
  अरुण की ऐसी हालत हो गई उन्हें जल्दी से घर बेचना पड़ा और एक छोटा सा दो बेडरूम का घर किराए पर लिया।जब दीपक उसके घर गया तो उसने कहा और उनकी वाइफ से "भाभी इतना सारा सामान था वह कहां गया" तो उसने कहा कि भाई साहब मैंने बेच दिया "अब क्या करें ओखली में सर दिया है तो मूसलों से क्या डरना" काफी सामान बेच दिया है ।अब छोटे मकान में ही रहेंगे , मेरी नौकरी है जैसे तैसे अपना घर चला लूंगी।।"
आशा जाकड़

लघुकथा_"ओखली में सिर....."
अ.भा. अग्निशिखा मंच
लघुकथा ,विषय"ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना।"
मिस्टर छगनलाल लंबे कद के,गोरे_चिट्टे, चौड़े कंधो वाले,
अप्टूडेट रहनेवाले,रिटायर्ड मिलिट्री कमांडर थे।व्यायाम,टहलना,पोष्टिक खाना,योग उनकी दिनचर्या में शामिल थे।मतलब कि उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था।
     एक दिन अचानक उनके सीने में दर्द उठा,उनका इकलौता बेटा उन्हें डॉक्टर के पास ले गया।जिसने उन्हें अस्पताल ले जाने सलाह दी।वे अस्पताल पहुंचे। मोटी कंसल्टिंग फीस एडवांस में जमा करवाई।डॉक्टर ने चेकअप को बाद कहा_इन्हे हार्ट अटैक आया है,लगता है ब्लॉकेज हैं। एन जी ओ ग्राफी करवानी पड़ेगी तभी सही कंडीशन पता चलेगी।साथ कई प्रकार के मेडिकल रिपोर्ट करने की चिट्ठी लिख दी।खर्चों का अंदाज लगाकर बाप_बेटे के चेहरे पर घबराहट छा गई।सोचा चलो, ये तो इंतजाम हो जाएगा।
     सारी रिपोर्ट्स कराकर वे डॉक्टर को दिखाने गए।देखते ही डॉक्टर ने सीरियस मुद्रा में कहा_जल्द से जल्द ऑपरेशन करना पड़ेगा नहीं तो हालत बिगड़ जाएगी, लगभग सात लाख रुपए का खर्चा आएगा ।दोनों के मुंह पे हवाइयां उड़ने लगीं।
     बाप रे!इतना पैसा कहां से लायेंगे?बेटा बोला "पिताजी अब ओखली में सिर दिया है तो मूसलों से क्या डरना"?आपका जीवन मेरे लिए सब कुछ है।मैं मेहनत करके धन कमा लूंगा,आपका अच्छे से अच्छा इलाज करवाऊंगा,आप निश्चिंत रहें।सुनकर पिता का दिल भर आया,आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने संतोष की सांस ली।बेटा बोला_"आपके इलाज के लिए मैं परिश्रम की ओखली में सिर दे दूंगा और मूसलों से भी नहीं डरूंगा"।
"वाह रे बेटा! वाह रे पिता!
ये हमारे देश की चिकित्सा पद्धति है जहां डॉक्टर्स पैसे की खातिर जरूरी_ गैर जरूरी टेस्ट,दवाइयां, ऑपरेशन लिखकर दे देते हैं चाहे मरीज पर कुछ भी गुजरे।
स्वरचित मौलिक लघुकथा_
रानी अग्रवाल,मुंबई द्वारा लिखी गई।२२_६_२०२१.


अग्नि शिखा 
नमन मंच
दिनांक --: 22/6/2021
विषय --: जब ओखल में सिर दिया तो मुसल से क्या डरना 

तपन तुम कहीं होस्टल में नहीं रहोगे पिता शुभेन्दु चटर्जी ने कहा! तपन रायपुर से धमतरी पालिटेकनिक कॉलेज में पढ़ने जा रहा था ! शुभेंदु जी ने कहा वहां मेरे मित्र दयाशंकर रहते हैं तुम उनकी देखरेख में उनके घर रहोगे ! तपन को उसके पिता धमतरी अपने मित्र के यहां यह कह कर रख गये कि अब यह तुम्हारा बेटा है तुम्हें ही सम्भालना है! आज से यह तुम्हारी जिम्मेदारी है! तपन को कुछ हिदायतों के पश्चात शुभेंदु जी चले गये! तपन को धमतरी की कॉलेज में ही पढ़ना था! 

दयाशंकर जी बहुत ही कड़क स्वभाव के साथ साथ अनुशासन प्रिय थे! नियम था सात बजे तक घर आ जाना, दोस्तों को घर पर नहीं लाना! महीने में एक बार घूमने अथवा सिनेमा देखने की छूट थी! परीक्षा की तैयारी में बराबर निगरानी रखते थे! उनके दोस्तों ने कहा यार ये तो बहुत हो गया.... शाम सात बजे तक घर पहुंचने का यानी कॉलेज के बाद सीधे घर का रुख, खाना घर में खाना ! कैसे रहता है ?

तपन ने कहा वैसे बापूजी बहुत अच्छे हैं! मेरी पढ़ाई में भी मदद कर देते हैं.... सिविल लाइन में है ना! (बिल्डिंग कान्टैक्टर) हां इंगलिस नहीं आती पर मैं समझ जाता हूं.....फिर भी यार तु तीन साल कैसे निकालेगा? 

तपन ने धीरे से कहा छोड़ न यार मुझे ही इस कॉलेज में पढ़ना था! 
और अब जब " ओखल में सिर दे ही दिया है तो मुसल से क्या डरना"     
यही कह रहा था तभी दयाशंकर जी की आवाज आई ! तपन बेटा घर जा रहे हो? 
हां बापुजी !

ठीक है यह सब्जी का थैला मां को दे देना... बैंगन भाजा तुम्हें बहुत पसंद है ना ....हंसते हुए कहा वही है इसमे! 

दयाशंकर जी के कठोर अनुशासन के बीच पिता का प्यार भरा दिल देख सबकी बोलती बंद हो गई !

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई


अग्निशिखा मंच को नमन🙏
विषय: ओखली में सिर देना, मुसलो से क्या डरना।
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रामु बड़ा जमींदार था। गांव में सभी उनकी बहुत इज्जत करते थे। बड़ा दयालु था। गरीबों की सेवा करता था। बेरोजगारों को रोजगार दिया गांव में स्कूल तथा शौचालय भी बनाया था। वे चाहते थे कि उनका बेटा अपने जैसे बड़ा जमींदार बने मगर बेटे को खेती में काम करना रुचि नहीं थी। इसीलिए राजेश शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लगा । शहर की चमक-दमक से मोहित होकर वह शहरी ला हो गया था। जिस गांव में उसका जन्म हुआ था, उस गांव को ही भूल रहा था । दोस्तों के सामने गांव का नाम बताने के लिए भी बहुत ही अपमानजनक महसूस करता था। अचानक पिताजी को दिल का दौरा पड़ता है और उनकी मृत्यु हो जाती है। राजेश, पिता की मृत्यु की खबर सुनते ही पैरों तले जमीन खिसक जाती है। गांव में आने के बाद कुछ दिन तक वहां पर रहता है फिर अपनी अधूरी पढ़ाई को पूर्ण करने के लिए शहर चला जाता है। गांव वाले लाख समझाने पर भी वह खेती बाड़ी का काम के लिए तैयार नहीं होता है। अकेली मां को पर छोड़ कर चला जाता है। शहर आने पर उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था । मां की चिंता खाए जा रही थी। ना चाहते हुए भी राजेश अपनी पढ़ाई को छोड़कर, अपनी इच्छाओं का गला घोट कर अपने घर आता है। दो-तीन महीने के उपरांत मां कहती है कि अब तुम ही हो इस घर का चिराग। इसीलिए अब से सारी खेती बाड़ी जमीन दारी का काम तुमको ही संभालना है। रात भर सोचता है कि जो सपना देखा था ।उसे याद करते हुए कहता है " मैं बहुत बड़ा इंजीनियर बनूंगा। बड़ी कंपनी में अच्छे औधे पर कार्यरत रहूंगा। विदेशों में जाकर खूब पैसा कमाऊंगा। ऐशो आराम की जिंदगी जीयुंगा।"मेरा सपना सपना ही रह गया। अब वह जिस काम के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है और उसका मन भी नहीं है ऐसा काम करने के लिए निकल पड़ता है। इसकी अरुचि को देखकर कई लोग उसे धोखा देते हैं तथा आधी कि आधी जमीन खो देता है। लोग और मां मिलकर उसे ताने देने लगते है। खोई हुई जमीन तथा इज्जत फिर से पाने के लिए वह निश्चय करता है । खेती बाड़ी की जानकारी लेकर काम शुरू करने लगता है। 6 महीने के बाद फिर उसे हार का सामना करना पड़ता है। जिससे जीवन में निराशा आती है और वह तय करता है कि शहर में जाकर काम करूंगा। तभी गांव के सरपंच राजेश को समझाते हैं कि तुमने तो अब ओखली में सिर दे दिया है मूसूलों से क्या डरना। अब तक तुमने दुनियादारी के बारे में जान लिया है।अब से तुम मन से काम करना। उनकी प्रेरणा भरी बातों से प्रभावित होकर आधुनिक तकनीक के द्वारा खेती-बाड़ी का काम शुरू करता है तथा देश विदेश में ख्याति पाने लगता है।


 डॉ गायत्री खंडाटे
हुबली कर्नाटक

नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
दिनाँक -22 /6/ 2021
विषय- लघुकथा ओखली में सर दिया तो मूसली से क्या डरना?

मालती की शादी में मुझे चार दिन पहले ही छुट्टि डालके जाना पडा। मालती और मैं सातवीं कक्षा में साथ में पढाई की थीं।दोस्ती इतनी गहरी हो गयी थी कि उस परिवार में मैं भी बेटी बन गयी थी। बाद में मैं आगे की पढाई के लिए शहर आई थी पर उस परिवार के कोई भी कार्यक्रम हो मुझे बुलाव आती थी। मालती सिर्फ दसवीं कक्षा तक पढी थी। आगे उसकी शादी की तयारी होने लगी ।लडका पदवी तक शिक्षा प्राप्त किया था। उसकी खुद की बिजनेस थी।उसके भाई और वह दो लोग थे। बहन की शादी हो चुकी थी। खुद का मकान और थोडी जमीन भी थी।ये सब देख कर मालती के दोनो भाई मालती की शादी पक्की कर दी थी।
  परिजन सभी आ गये और सब संप्रदाय की रीति -रिवाज को पालते विवाह शुभ हो गया। मैं भी विवाह कार्यक्रम के बाद लौट गयी।
  करीब एक साल बाद मुझे समाचार मिला मालती गर्भवति बन गयी थी।पर डाक्टर के पास जाँच कराने गयी थी ,डाक्टर ने बताय रिपोर्ट में एड्स पाजिटिव आया। मैं भी उसे मिलने घर आयी ,वह मायके में ही थी। उस परिवार में बहुत बडा सद्मा लग गया था। डाक्टर ने पति की भी जाँच करनी चाहिए बोले ।पति की भी जाँच हो गयी तो उसका भी एड्स पासिटव आगया। मालती के घर में स्मशान मौन छा गया ।बच्ची को जन्म देने सभी लोग ने मना किया उसे खत्म करने की दबाव डालने लगा। पर मालती और भाभी दोनो बताय 'जो भी हो जाये बच्ची को जन्म देगी मालती ।' मालती भी वही बोली ओखली में सर दिया है तो मूसली से क्या डरना ,मैं मेरी बच्ची को जन्म दूगी। मालती आँखी के आँसू पोछते हुए दृढनिश्चय से बोली।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय।


अ. भा. अग्निशिखा मंच
मंगल वार - 22/ 6/2021
विषय -ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना

विधा - लघुकथा 



बबली का विवाह बहुत अच्छे घराने में हुआ था। पैसों की रेल-ठेल थी। कहते हैं ना लक्ष्मी के साथ कुछ बुराइयाँ भी घर कर लेती हैं। ऐसा यहाँ भी हुआ। 

बबली का पति शेयर मार्केट में अपना पैसा लगाने लगा। एक होटल पहले से ही था और दो होटल खरीद लिए। लक्ष्मी बरसने लगी और लत बढ़ने लगी। सट्टा लगाते पैसे आते और वह खुश। बिना मेहनत के पैसा मिल रहा था। जब उनको इसकी लत लग गई तब किस्मत ने अपना खेल दिखाना शुरू किया। फिर उन्हें घाटा होने लगा। धीरे-धीरे प्रॉपर्टी बिकने लगी। बस फिर क्या था वह टूटते गए। पैसे डूबते गए।
उन्होंने ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना। कर्ज में डूबते-डूबते उनकी यह हालत हो गई थी कि घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया। होटल, घर, सामान, सब बिक गया लेकिन खर्चा कम नहीं हुआ। ख़ुद किराए के मकान में आ गए, लेकिन फिर भी कर्ज़ा खत्म नहीं हुआ। अपने रिश्तेदारों, पहचान वालों से पैसे माँग-माँग कर अपना खर्चा चलाने लगे। उसके बाद जब उनकी सारी प्रॉपर्टी बिक गई तो सबने पैसा देना बंद कर दिया और अपना पैसा माँगना शुरू कर दिया। 

पैसे माँगने ना आ जाएँ इस कारण उन्होंने अपना घर कहीं और किराए पर ले लिया, लेकिन वहाँ पर भी कर्ज़दारों ने नहीं छोड़ा। लोगों से मार खाने की नौबत आ गई। एक दिन पूरा परिवार कुछ सामान लेकर वहाँ से ग़ायब हो गया। आज तक नहीं पता वह कहाँ है। 
सच कहा है ज़्यादा और अनावश्यक पैसा भी दुर्भाग्य को बुलाता है।

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर

🙏🌹अग्नि शिखा मंच 🌹🙏
    🌿विषय:" ओखल मे दिया सिर, तो मूसल से क्या डरना "
  🌿शीर्षक: " बिटिया की शादी "
  🌹लघुकथा
       चंपा की माँ आजकल बहुत सबेरे आ, जा रही है, मालकिन को आश्चर्य हो 
रहा है कि कौनसा चमत्कार हो गया है कि
इतना सुबह-सुबह कामवाली आ गयी ।
       आज सभी कामों से निपटकर , वह
अपनी मालकिन के पास आकर बैठ गई ,
और मालकिन को चाय थमाते हुए कहा--
" आज हमें पंद्रह हजार रुपये की जरूरत है, चंपा की शादी तय हो गई है, आज ही मंदिर में शादी होने वाली है,हमारे औकात से ज्यादा ही अच्छा है ,ऊपर से तीन- तीन बेटियाँ है।"इतना कहकर वह थोड़ा गंभीर हो गई ।
           मालकिन ने कहा कि दो घंटे के बाद आओ,तबतक पैसा बैंक से मँगा लेती हूँ ।वह अपने घर तैयार होने चली गयी ।
तबतक रमेश बाबू ने पंद्रह हजार रूपये 
लाकर पत्नी को दे दिए । दो - ढाई घंटे बाद चंपा की माँ तैयारी के साथ आई, और कहने लगी कि --" चंपा की मामा ने
अपने ढंग से समझ बूझकर इसकी शादी तय कर दी है,आज ही इसकी शादी है,,,,,
बचपन,मे ही इसका बाप मर गया ,,,तब से घर के काम- काज करके बच्चों की परवरिश कर रही हूँ,ये पंद्रह हजार रूपये मैं आपके काम करके चुका दूँगी,अरे अब
ओखल मे सिर रखें हैं, तो मूसल से क्या डरना ।
        मालकिन मन ही मन उसकी वफादारी और समझदारी पर रीझ रही थी।
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार-- डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार--



ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना
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"अरे लिया क्या तुम मुझे शिवाला मोड़ तक लिफ्ट देगी..?देखो ना मेरी स्कूटी खराब हो गई है और मुझे आज घर जल्दी पहुंचना है।"
लीना ने कहा-"हां क्यों नहीं। रिया और लीना एक ही आंफिस में काम करती थीं और अक्सर एक दूसरे की गाड़ी में लिफ्ट लिया करती थी। रिया शांत और सरल स्वभाव की थी वहीं लीना शरारती और बड़बोले स्वभाव की थी, या यूं कह सकते हैं बिना सोचे -ही ओखली में सिर देने की आदत थी और लीना अपने इसी स्वभाव की वजह से कई बार परेशानियों में फंसे चुकी थी।
   जल्दी से काम खत्म कर शाम को दोनों आंफिस से निकल पड़ीं। रिया ने लीना से पूछा,"तुम्हारे पास गाड़ी के सारे पेपर तो हैं ना साथ में, याद है पिछली बार चलाने कटते-कटते बचा था।"लीना ने कहा-"वो तो गलती से कागज घर पर छूट गये थे, हमेशा थोड़े ना ऐसा होगा। आज समय पर घर पहुंचाने की जिम्मेदारी मेरी"गाड़ी में बैठ दोनों ने अपनी सीट बेल्ट लगाई और चल पड़ी......अभी दो सिग्नल ही क्रांस की थी कि देखा तीसरे सिग्नल पर तगड़ी जांच चल रही है"। ये पेपर चेकिंग के चक्कर में कहीं हमें देर ना हो जाए।"लीना बोली"मैं हूं ना, सारे पेपर दिखाकर हमें पहले छोड़ने के लिए बोलेंगे। लड़कियों को ना नहीं करेगी पुलिस।"
    गाड़ी जैसे ही सिग्नल के करीब पहुंची, ट्रैफिक पुलिस ने गाड़ी रोकने को कहा-फिर जांच पड़ताल करने लगा। सारे कागज देखकर वापस करते समय तंज कहते हुए बोला,"वाह लड़कियों के पास सारे कागज भी सही हैं और सीटबेल्ट भी पहनी है।"लिया के चुप कराते-कराते भी लीना पेपर लेते हुए अपने बड़बोलेपन कुछ आदत से मजबूर बोल ही बैठी,"आपको क्या लगता है लड़कियों को गाड़ी चलाना और उससे जुड़े नियमों का पालन करना नहीं आता...? इंश्योरेंस के पेपर तो आपने देखना ही नहीं चाहे। वो भी है मेरे पास"।
   पुलिस ने कहा.-"तो फिर लगे हाथों वो भी पेपर दिखा दो।"लीना गाड़ी में पेपर ढूंढने लगी। अचानक उसे याद आया कि इन्श्योरेन्स पेपर तो रिन्यूअल के लिए जमा किए थे जिन्हें वो लेना भूल ग‌‌ई थी।
    अब तो उसके चेहरे की उड़ी रंगत देख पुलिस ने अपने सहकर्मी को आवाज लगाई मुस्कुराते हुए कहा,"गाड़ी एक तरफ करवाकर इन लड़कियों का चालान बनाओ,ये लड़कियां बिना इन्श्योरेन्स पेपर के गाड़ी लिए शहर की सड़कों पर घूम रही हैं।
  रिया ने गुस्से से लीना को देखा और चालान कटवाने वाली लाइन में लग ग‌ई। आज फिर लीना के बड़बोलेपन की वजह से दोनों फंस चुकी थी।अब करती भी क्या...?इसे कहते हैं जान बूझकर मुसीबत को गले लगाना। जब ओखली में सर डाल दिया है तो मूसल से क्या डरना...?

डॉ मीना कुमारी परिहार



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