Tuesday, 1 June 2021

लघुकथा अग्निशिखा मंच पर आयोजित लघु कथाओं को एक साथ देखिये_alka pandey





अग्निशिखा 
१/६/२०२१
लघुकथा 
विषय - खूँटे के बल कूदना 

कृष्ण कांत हमेशा आंफिस में 
सब पर रोब जमाते , बॉस उनका अभिन्न मित्र था । 
लोग पीछे से कहते , कृष्णकांत काम तो करते नहीं बस खूँटे के बल कूदा करते हैं ।कृष्णकांत हमेशा अकड़ में रहते आज मिसेज़ गुप्ता को छुट्टी चाहिये थी वो कृष्णकांत के पास जाकर बोली सर आज मुझे छुट्टी चाहिये बेटी को डॉ . के पास ले जाना हैं , तबियत ख़राब हैं , 
कृष्णकांत भड़क गये यहाँ काम कौन करेगा तुम्हे हमेंशा छुट्टी की पड़ी रहती हैं । 
मिसेज़ गुप्ता शालिनता से बोली सर मैं रोज़ छुट्टी नहीं लेती जरुरी है आप यह मत भूलो आपके घर भी बिमारी हारी कभी न कभी आती है आज बॉस के बल जो आप अकड़ देखाते हो कल नया बांस आयेगा तब ( किस खूटें के बल कूदेंगे ) सब के दिन एक जैसे नहीं रहते । 
कृष्णकांत बडे शर्मीदा हुये अपनी हरकत पर और छुट्टी मंज़ूर कर दी । 
मिसेज़ गुप्ता धन्यवाद किया और क्षमा मांगते हुये बोली सर मेरी बच्ची बहुत बिमार है , इसीलिये कुछ सख़्त बोल गई माफ़ करना ...
कृष्णकांत नहीं मिसेज़ गुप्ता तुमने आईना दिखाया है मैं तुम्हारा आभारी हूँ । 
खूँटे के बल कब तक आदमी कूद सकता है । 
अपनी क़ाबलियत पर ही कूदना चाहिये , क्यों ठीक कह रहा हूँ । 
मिसेज़ गुप्ता हंस कर आंफिस से निकल गई घर की तरफ ..
कृष्णकांत में केबिन से बहार आकर चाय मंगाई सबके लिये और साथ में पीने बैठ गये , सब आश्चर्य चकित की यह क्या ...? 
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई


अग्निशिखा मंच 
दिनांक 1 जून 2021
विधा *खूँटे के बल कूदना* (लघु कथा)

माँ रमेश कहांँ है? जब देखो तब घर से बाहर ही घूमता रहता है। कहते हुए सीता ने रमेश का पता पूछा।
रमेश अपनी पढ़ाई लिखाई कभी भी ठीक ढंग से नहीं किया करता था । वह अपना सारा काम अपनी छोटी बहन से करवाया करता था। वह नोट्स बनाने के काम हो या चित्र।  सारा काम सीता किया करती थी ।रमेश बस सारा दिन मस्ती में लगा रहता था ।
सीता पढ़ने में होशियार थी। इसलिए वह अपने बड़े भाई का कार्य भी कर दिया करती थी ,परंतु रमेश उसके इस उपलब्धि का फायदा उठाया करता था । मांँ ने कई बार रमेश को डांँटा। लेकिन रमेश सुधारने का नाम ही नहीं ले रहा था ।इंटर के बाद रमेश ने पढ़ाई छोड़ दी पर सीता अपनी पढ़ाई जारी रखी और पढ़ते-पढ़ते वह एक आई ए एस ऑफिसर बन चुकी है और रमेश आज भी यूंँ ही घूमा करता है । पर कुछ भी बात होने पर रमेश सीता का हवाला देने लगता है ।सबको धमकी देता है कि मेरी बहन आई है। यह कहकर लोगों को अक्सर डराया करता था। खुद तो कुछ करता नहीं था, पर सीता के बदौलत वह *खूंँटे के बल कूदा* करता था।  माँ इन सभी बात से भलीभांति परिचित थी। एक दिन माँ ने रमेश को कहा अब तो सुधर जा।  ब्याह कर ये अपने घर चली जाएगी फिर देखती हूंँ किसकी बदौलत *खूँटे के बल कूदता* है। इसके जाने के बाद तुझे *आटे दाल का भाव पता चलेगा* बेमतलब में दूसरे की उपलब्धि पर *खूंँटे के बल कूदना* बंद कर दे।।

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️

. **अग्नि शिखा मंच**
    *जय माँ सरस्वती**
    **१/०६/२०२१**
**बिषय खूँटे के बल कूदना**।
  **दुसरे के बल पर जोर**            **आजमाईश करना**।
लघुकथा 
       शीर्षक -  अभिमान 
 चीत्कार पुकार त्राहि माम , त्राहि माम 
जय भोले शंकर त्रिनेत्र खोले । देवी पार्वती अपने पिता के घर आपका अपमान किये जाने पर हवन कुंड में समाहित हों गई ।
कष्ट हर ले जाओ  प्रभु तीनो लोक के विधाता हो ।।
भग़वन शंकर का त्रिनेत्र खुलेते ही शिव - तांडव शुरु ,पृथ्वी आकाश में हाहाकर मच गया ।
हूँकारते हुए कहा - मय दानव दैत्य की तरह हो राजा दक्ष ,खूँटे के बल कूदने वाले का यही हश्र होना चाहिए । जिस थाली में खाया उसी में छेद किया  ।
राजा दक्ष का सर धड़ से अलग कर  बकरे का सिर लगा ।अपनी ग़लतियों का पश्चाताप करने चारों दिशाओं में तीर्थ यात्रा कर ,इंसानियत से मानवता संचार जगाया ।
मनुष्य जाति में जन्म ले अब तक कितने अपराध किये है । राजा बन मद में चूर कितने अत्याचार किये मेरी पत्नी को सती बनने हवन कुंड में झोंक दिया । 
अपने सर का पाप उसके सर मढ़ दिया ।
 तुम्हारी वमाँगि की छाया हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी । 
भोली कन्या को प्रकृति सामाजिक मोह मोहजाल दोहन कर  यज्ञ स्थल पर अपमानित किया पिता कहलाने योग्य नही हो । बात की मर्दानी दिखाई । 
कन्या हत्या का पाप कर ,स्वयं की नजरो में लज्जित हो । सर झटक कर वक्त की रफ़्तार साथ चलना । इंसानी हौसले की फ़ितरत होती है । कष्ट वही सह आगे बढ़ता है ।जिसे कष्ट सहने की आदत है ।
इंसानियत दुआ सलामती फ़ासले से दिन गुजरना होगा ।येशक्सियत तो तेरी थी ।बस नज़रे उठा देखने की देरी हैं ।कल फिर सूरज चाँद आयेगा ।
और भग़वन अंतरध्यान हो गये । 
अनिता शरद झा मुंबई


तिथि १/६/२०२१
मंगलवार
विद्या *खूंटे के बल कूदना* (लघु कथा)

झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी की सरकार है, जो कांग्रेस एवं राजद के बल पर सरकार चला रही है। इनकी कोई सिद्धांत नहीं है। बस सत्ता में बने रहे। जिसके कारण राज्य का विकास रुक गया है,नेता अपने अपने फायदा उठा रहे हैं।
जिस दिन कांग्रेस या राजद चाहेंगे तो सरकार गिरा दी जाएगी।  यह सरकार बाहरी-भीतरी का नफरत फैला रहा है। जिस दिन कांग्रेस को समझ में आ जाएगी उसी दिन, सरकार गिरा देंगी।
हेमंत सोरेन की सरकार *खुटें के बल पर कुद  रहे हैं*। कांग्रेस की नीति है की गठबंधन की सरकार से जब तक फायदा होगा तब तक साथ देंगे नहीं तो रास्ते में छोड़ देंगे।
इसका हर्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी पर भी पड़ेगा ।जनता मूर्ख नहीं है इन्हें कभी भी  बहुमत नहीं देगी।

हेमंत सोरेन को दूरदर्शी होने की आवश्यकता है।

विजयेन्द्र मोहन।

लघु कथा दिनांक ,२/6/ 2021 दिन मंगलवार
मंच को नमन 🙏
विषय
 *खूंटे के बल*

दिनेश अपने माता पिता पिता का एकलौता बेटा  था। उसके पिताजी श्री मोहनलाल जी बहुत बड़े स्कूल के ट्रस्टी और डायरेक्टर थे।  उनको किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं थी किंतु, दिनेश की लापरवाही से वे मैं बहुत परेशान रहते थे ।बहुत शानदार स्कूल जिसमें कम से कम 2000 विद्यार्थी शिक्षण ग्रहण कर रहे थे उसमें उनका बेटा दिनेश भी कक्षा पहली से लगाकर ग्यारहवीं तक उसी स्कूल में पढ़ रहा था। परंतु बहुत बड़े पिता का बेटा होने के कारण उसको लगता था कि वही सर्वोपरि है और वह अपने मित्र गणों से स्कूल के टीचरों से किसी से भी सही व्यवहार नहीं करता था ।जिसके कारण सब दुखी रहते थे। यहां तक तो ठीक है  उसने जैसे तैसे टीचर्स के ऊपर रोब झाड़ कर नकल करके 11वीं तक पढ़ाई कर ली, टीचर्स उसके कहने में चलते थे, क्योंकि उनकी भी नौकरी का सवाल था।
 11 वीं पास होने के बाद 12वीं की परीक्षा में जो की बोर्ड की थी,  दिनेश की हालत बहुत खस्ता होती जा रही थी डर के कारण बहुत घबराने लगा था ,क्योंकि अब यहां पर उसकी एक नहीं चलने वाली थी कोई भी टीचर उसकी मदद नहीं कर सकता था। बोर्ड के पेपर थे,  जो दिल्ली से  बनकर आने वाले थे,,,l
जिसपिता का जिस पैसे का, उसको इतना घमंड था वह उसको चकनाचूर होते हुए दिखाई दिया ,और हो भी क्यों ना उसने अपना सारा ध्यान नकारात्मक सोच पर लगा जो रखा था। अब समय आता है 12वीं की बोर्ड की परीक्षा का ना तो पेपर्स किसी टीचर ने बनाए ना उसके पिताजी को यह पेपर पता थे। बोर्ड के पेपर हाथ में आते ही दिनेश को पसीने छूट जाते हैं और जैसे तैसे करके वह पेपर देकर हॉल से बाहर आता है और जब उसका रिजल्ट परिणाम सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से अच्छा परिणाम तो होगा नहीं ,वह फेल हो जाता है ,यहां पर जिस पिता के पैसे का जिस पिता के रॉब का उसको घमंड था चकनाचूर हो जाता है ।

*संदेश* 
मनुष्य को सिर्फ अपने मेहनत कर्मठता पर ही विश्वास करना चाहिए ना की किसी और के बल पर! जिस प्रकार से दिनेश फेल हो जाता है /। यहां हम कह सकते हैं कि *खूटे के बल पर किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता है*
*आपकी मेहनत कर्मठता और सच्चाई ही जीवन में काम आती है और आगे को बढ़ाती है*

स्वरचित 
सुषमा शुक्ला💐✒️

लघुकथा-"खूँटे के बल कूदना"(मुहावरा)
(अर्थ-दूसरे के बल पर जोर देना)
द्रोपती साहू "सरसिज"महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक:"खूँटे के बल कूदना"
विधा-लघुकथा
       *****
अरे भई, नाश्ता तैयार हो गया हो तो ले भी आओ। ड्यूटी के लिए लेट हो जाऊँगा। कल CMO सर का सख्त निर्देश आया है कि लेट लतीफी बर्दाश्त नहीं की जायेगी। मुकुंद ने अपना शर्ट पहनते हुए कहा।

"जी, समय तो लगता ही है। जब देखो जल्दबाजी में रहते हो।" कल्याणी ने झल्लाकर कहा।

मुकुंद ने कहा-"घर के काम में भी तो तुम्हारा हाथ बंटाता हूँ।"
थोड़ी देर पहले ही मैंने बर्तन मांजकर तुम्हारा काम हल्का जो कर दिया।

तो क्या हुआ।कब से कह रही हूँ-एक काम वाली का इंतजाम कर दो। तुम सुनते कहाँ हो।
कल्याणी ने नाश्ते का प्लेट मुकुंद को थमाते हुए कहा।

  ठीक है जी, तुम्हारा भी कहना। पर मैं अस्पताल में कंपाउँडर के पद हूँ। जितना भी वेतन है उसी से पूरा खर्चा चलाना होता है। आखिर अपने घर का काम है, वो भी हम तीन सदस्य ही हैं। काम मिल कर कर लेते हैं। काम वाली को जो रूपये देते,उसे अपने लिए खर्च कर लेते हैं। मुकुंद ने शांति से कहते हुए नाश्ता खत्म कर ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार होने लगे।
कल्याणी अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहने लगी-"मैंने अपने मायके में इतना काम नहीं किया है।"
और हमारी सुख सुविधा के लिए सारा सामान भी तो वहीं से आया है। मेरे मामा भी आपकी सर्विस को पक्का करवाई। तुम्हे मेरी परवाह बिल्कुल भी नहीं है

मुकुंद ने अपने आप को संभालते हुए कहा-मैं काबिल था तभी मेरी सर्विस लगी। भले ही स्वास्थ्यकर्मी के रूप में ही सही।
        हमेशा "खूँटे के बल कूदती हो।" खुद को भी तो कुछ करने लायक बना सकती हो, कहते हुए मुकुंद कुछ भारी मन से चला गया।

कल्याणी भी बचे हुए काम पूरा करने में लग गई।
                  *******
                  पिन-493445
Email: dropdisahu75@gmail.com

अग्निशिखा मंच
तिथि-1-6-2021
विषय- खूँटे के बल पर उछलना( दूसरे के बल पर उछलना)

खूँटे का बल

छूटभैये नेता जी जैसे गाँव के भस्मासुर थे ,मुख्यमंत्री के बल पर उछलते थे।उनके कारण गाँव में कोई भी सुरक्षित नहीं था। सब परेशान हो गये थे। रामू की सुंदर पत्नी को घर के पास ही अपने गेस्ट हाउस में बुलवाया था।
भस्मासुर ने शिव जी की घोर तपस्या की ,
अंतत: शिव जी को दर्शन देना ही पड़ा । भस्मासुर ने शिव जी से कहा- हे! शिव मुझे वरदान दो कि मैं जिसके सर पर हाथ रखूँ ,वह मर जाये। 
शिव जी- शिव जी ने वरदान तो दिया पर भस्मासुर को समझाया भी, भस्मासुर तुम एक अटल बात जान लो कि जीवन में अपनी शक्ति और अपना बल ही काम आता है। इस वरदान को तुम अच्छे कामों में लगाना। तभी तुम्हे सदगति प्राप्त होगी।
भस्मासुर को वरदान रुपी खूँटे में उछलने में बहुत मज़ा आ रहा था । वह आते जाते जिस के भी सिर पर हाथ रखता वह जल जाता।सब तरफ हाहाकार मच गया। अंत में भगवान विष्णु को ही मोहिनी अवतार ले कर आना पड़ा।
सुंदर सी मोहिनी स्त्री ने जब नृत्य आरंभ किया तब वरदान के मद में चूर भस्मासुर ,सुंदर स्त्री के मोह जाल में फंस कर नृत्य करने लगा और नाचते नाचते स्त्री के समान ही अपने सिर पर हाथ रख कर नाचने लगा और भस्म हो गया।
दूसरे दिन पेपर में छपा ,नेताजी रात को गेस्ट हाऊस से घर पैदल आ रहे थे , कुछ लोगों ने पीछे से उन पर कंबल डाल कर उन्हें इतना मारा कि उनकी मृत्यु हो गई।

नीरजा ठाकुर नीर 
पलावा डोंबीवली
महाराष्ट्र

*खूंटे के बल कूदना- किसी के भरोसे पर जोश या बल दिखाना (लघुकथा )*

 *मंच को सादर नमन*
*विषय  खूंटे के बल कूदना ( लघुकथा )*
*दिनांक  1 / 6 / 2021*
*दिन    मंगलवार*

रीना की सासू मां ( मिसेज दास )ने अपने घर कीर्तन और भंडारे का प्रोग्राम रखा था। रीना ने अपनी सासू मां से कहा भी कि ,आज उसकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है आप अगले महीने अपने घर भंडारा और कीर्तन रखवा लें वरना कल अगर ज्यादा खराब हो गई तो सब का खाना पीना वह कैसे बना पाएगी। परंतु सासू मां ने कहा कि उनकी तो काफी दिनों से अच्छा थी इस कीर्तन और भंडारा की। वह तो कल का निमंत्रण भी मोहल्ले वालों को  दे आई हैं। 'मरती क्या ना करती' बहु रीना ने भी चुपचाप सहमति देते हुए कल के काम की रूपरेखा तैयार करनी  शुरू कर दी। । मिसेज दास की सभी किटी की सहेलियां इसी तरह हर महीने किसी न किसी के घर कीर्तन और भंडारा किया करती थी । परंतु दूसरे दिन, जिस दिन मिसेज दास के घर कीर्तन था,सासुमां तो सुबह से ही उठ गईं थीं पर बहु अभी तक अपने कमरे से बाहर नही आई  थी। यह सोचकर  सासुमां बहु के कमरे में आवाज लगाती हुई गईं की वह यह जानते हुए भी के आज बहुत काम है अभी तक सो रही है।
परन्तु यह देखकर उन्हें और भी आश्चर्य हुआ कि रीना तो अभी तक बिस्तर पर ही है।माथा छूकर देखा तो अवाक रह गईं..बहु को तो काफी तेज ज्वर था।यह देखकर सासुमां की दशा खराब हो गई। वह तो बहु के मना करने के वावजूद भी बहु के बल पर ही खूंटे के बल कूद रही थीं। तुरंत उन्होंने निर्णय लिया और फोन उठाकर सबसे पहले आज का सारा कार्यक्रम स्थगित करवाया।बहु को उन्होंने चाय बिस्किट देकर दवा दी।और बहु को आराम करने का कहकर भोजन की तैयारी करने किचन की ओर बढ़ गईं। 

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*अनुपपुर ( मध्यप्रदेश )*

खूटें के बल कूदना --- ओमप्रकाश पाण्डेय

सुशील एक सामान्य घर का  लड़का था, उसके पिता बाबूराम  ने परिवार के खर्चे को कम करके, पैसे बचा कर, सुशील को शहर में रख कर पढाया. सुशील भी बड़ी मेहनत और लगन से पढता था. पढाई पूरी करने के एक वर्ष के भीतर ही सुशील को रेलवे में एक अच्छी नौकरी मिल गई. 
जैसा कि मध्यमवर्गीय परिवारों में होता है , नौकरी लगने के तुरन्त बाद ही सुशील के शादी के लिए सम्बन्ध आने लगे. एक जान पहचान के परिवार में सुशील की शादी तय हो गई और उसी साल शादी हो भी गई. 
सुशील की पत्नी शोभा अपने माता पिता की एकलौती संतान थी, अतः सुशील को अक्सर अपने  ससुराल से पैसे मिलते रहते थे. सुशील के रहन सहन का ढंग बदल गया, उसके खर्चे बढ़ गये, वह देश विदेश अपनी पत्नी के साथ अक्सर घूमने जाने लगा. बाबूराम ने कई बार सुशील को समझाने का प्रयास किया कि ससुराल के पैसे के बल पर अनावश्यक अपनी आदतें खराब मत करो और अपने खर्चे को अपनी आय तक ही सीमित रक्खो, पर सुशील पर इन बातों का कोई असर नहीं हुआ और उसके खर्चे पहले की ही तरह जारी रहे.
इधर बेटी की शादी के बाद सुशील के साश ससुर बहुत ही अकेला अनुभव करने लगे. उन्होंने आपस में विचार करके और अपनी बेटी शोभा की भी राय लेकर अपने एक सम्बन्धी के बेटे को गोद ले लिया.
अब सुशील को अपने ससुराल से पैसे मिलने एकदम बन्द हो गया. सुशील के खर्चे तो कम हो नहीं पाया. धीरे धीरे उसके उपर कर्ज बढने लगा. सुशील काफी परेशान रहने लगा.  एकदिन बाबूराम ने सुशील को बुलाया और कहा कि बेटा मैंने बहुत ही पहले चेताया था कि खूंटे के बल पर बिना मतलब नहीं कूदते हैं, क्योंकि खूंटा टूट जाने पर  आदमी मुंह के बल गिरता है. लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी, आज परेशान हो रहे हो न. 
सुशील कुछ देर चुप रहा, फिर बोला हां बाबूजी मुझसे गलती हो गई. बाबूराम बोला कोई बात नहीं बेटा, अब मुझे सही सही  यह बताओ कि तुम्हारे सिर पर कितना कर्जे का बोझ है. सुशील बोला बाबूजी पांच लाख. बाबूराम बोला कोई बात नहीं, मुझसे यह पांच लाख लो और पूरा कर्जा चुका दो. लेकिन एक बात याद रखना कि  जिन्दगी में भूखा रह लेन परन्तु किसी से उधार मत लेना.
( यह मेरी मौलिक रचना है -- ओमप्रकाश पाण्डेय)

नमन मंच 
लघु कथा ...


अरे  ओ फूलमती ....अब  कल से तेरी छुट्टी , कमला बाई ..अपनी  कामवाली से कह रही थी |
अब  बहु जो आ  गयी है ..पड़ोसन  से कह रही थी अब तो मैं  आराम करुँगी और घर में दो  पैसे बचे  इसलिए कामवाली की छुट्टी कर  दी |
राधा जो कल ही इस घर में बहु बनकर आई थी ......घर  में अपना ये  स्थान सुनकर उसकी आंख भर आई |
बहु रूपी खूटे को देखकर सास कूद  रही थी

स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड

वीना अचतानी, 
अग्नि शिखा मंच को नमन, 
विषय **खूंटे के बल कूदना **
राघव को बचपन से ही ऐक्टिंग  का गाने का बहुत  शौक था ।हर समय किसी  न किसी  अभिनेता  की नकल करता  था ।अखबार में या मैगज़ीन में  किसी  अभिनेता  की फोटो देखता  तो सोचता  काश मेरी  भी एक फोटो अखबार में  छप जाए । उन दिनो चौधरी रामकिशोर का बेटा सुनील गांव  आया हुआ था , वह मुम्बई में  नौकरी करता था,उसकी दोस्ती  राघव से हो गई, राघव ने उसे अपने मन की बात बताई,  वह फिल्म  लाईन में  जाना  चाहता है,  अखबार  में  अपनी फोटो  छपवाना चाहता है  ।तब सुनील ने उसे अपने साथ मुम्बई  चलने को कहा ।राघव अपने घर की जमापूँजी और माँ  के ज़ेवर चुरा कर सुनील  के साथ मुम्बई  आ गया ।सुनील ने उसे अपने कुछ दोस्तों  से मिलवाया । सुनील और उसके दोस्त  कभी  इन्टरव्यू  के बहाने  ,कभी किसी  अभिनेता  से मिलवाने के बहाने   राघव से पैसे  लेते रहते । खाने  पीने का खर्च,  कमरे का किराया  देने में  उसकी जमापूँजी समाप्त हो गई, धीरे धीरे माँ  के गहने भी बिक गए पर  अखबार में  फोटो छपवाने वाली उसकी  इच्छा  पूरी नहीं  हुई ।एक दिन वो सुनील पर चिल्ला  पड़ा, तुम्हारे  भरोसे  जोश में  आकर मैं  घर से पैसे  और ज़ेवर चुरा लाया,
और तुम मेरे लिये कुछ भी नहीं  कर रहे।सुनील ने कहा  इस काम में  थोड़ा समय तो लगता है । बहुत  कहने पर सुनील ने उसकी फोटो  छपवा कर राघव को दिखाई।राघव फोटो  देख कर  हैरान हो  गया  ।उसकी  फोटो
" शोक सन्देश काॅलम "  में  छपी हुई  थी ।वह सोचने लगा सच में  मेरे अन्दर  की संवेदनाएं  मर चुकी हैं,  मर गया अपने माता-पिता  का इकलौता  पुत्र राघव । भ्रष्ट हो गई थी मेरी बुद्धि  जो मैंने  खूंटे के बल कूद आया  ।काश जोश में  आकर मैं  भरोसा  नहीँ  करता ।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)..

अग्नि शिखा मंच
दिनांक01.06.2021
वार मंगलवार
विषय लघु कथा
खूटे के बल कूदना

अजय नगर पालिका विभाग मे उप यंत्री के पद पर कार्यरत थे.तथा चचेरे भाई स्थानीय विधायक थे अजय कार्य के प्रति उत्तरदायी भी कम रहते थेसाथ ही आर्थिक अनियमितता मे भी माहिर होने के कारण चर्चित भी थे कई  उनके कारनामो के कारण निलंबन भी हुआ तथा विभागीय जांच भी अधिरोपित हुई परंतु चचरे भाई के विधायक होने का राजनीतिक लाभ का फायदा उठाते हुए अपने कारनामों से  दोषमुक्त होते रहे और अपनी नौकरी से सेवानिवृति  तक का समय पुरा कर लिया।

दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाइल9425350174

खूंटे के बल पर कूदना

""रीना "बहुत ही सरल स्वभाव की  लड़की थी।दिखने में बहुत सुंदर थी।सबकी मदद करती थी। वह कक्षा में पूरी लगन से पढ़ाई करती थी। सभी सर और मैडम की चहेती थी। सर और मैडम आपस में बातें किया करते थे कि एक दिन रीना अवश्य कुछ बनकर दिखाएगी।

 कक्षा के में कुछ सहेलियां तो उसके गुण गाती थीं, पर कुछ उससे चिढ़ती थीं।  सहेलियों को जो समझ में नहीं आता था , तो रीना  उन्हें समझा देती थी। कभी-कभी वह सर मैडम की गल्तियां भी बता देती थी ।
परीक्षा के कुछ दिन पहले उसको कोरोना हो गया,वह हास्पिटल  में भर्ती थी । ईश्वर की कृपा से ठीक तो हो गई, परंतु वह कमजोर हो गई थी। परीक्षा के पहले रिविजन नहीं कर पाई थी। परीक्षा के समय उसे सबसे अलग प्रिंसिपल के रूम में बिठाया गया ,उसकी हालत को देखते हुए सर ने कुछ मदद करने  की बात कही। बताओ रीना किस प्रश्न का उत्तर तुम्हें नहीं आ रहा है ,मैं तुम्हारी मदद कर देता हूं ।इस पर रीना ने कहा कि सर मुझे खूंटे के बल पर कूदने की आदत नहीं है। मैंने पूरे वर्ष पढ़ाई की है इसलिए मुझे सारे प्रश्नों के उत्तर आ रहे हैं ,उसके  उत्तर को सुनकर सर  चुप हो गए। जब परीक्षा का परिणाम आया तो, उसका नाम मेरिट लिस्ट में था। रीना ने मेरिट में प्रथम स्थान प्राप्त किया था ।विद्यालय के सभी लोग उस पर गर्व कर रहे थे ।बिटिया का साक्षात्कार लिया गया, तब उसने कहा कि मेरी सफलता का श्रेय मेरे टीचर्स को तो जाता ही है, लेकिन इसका श्रेय मैं अपने आप को भी देती हूं।  मुझे स्वयं पर विश्वास था ।मैं हमेशा अपने बलबूते पर आगे बढ़ना चाहती  हूं ,खूंटे के बल पर नहीं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश

लघु कथा

शीर्षक -"खूंटे के बल कूदना"

प्रकाश अपने मोहल्ले का एक आवारा लड़का था ।पूरे शहर में उसने तहलका मचाया हुआ था ।लड़कियां तो उसके नाम से ही डरती थी ।समय-असमय अकेले कोई नहीं निकलती थी ।सभी झुंड बनाकर निकलती थी। ताकि एक दूसरे की मदद कर सकें। प्रकाश किसी भी राह चलती लड़की को छेड़ देता ।दुकानदार भी उससे खौफ खाते थे। किसी भी दुकान से मनमाना सामान खरीद कर पैसा नहीं देता। किसी भी रेस्टोरेंट में मुफ्त में खा कर आराम से निकल जाता। पुलिस में शिकायत करते भी लोग डरते थे, और पुलिस वाले भी इस केस में हाथ नहीं डालते थे ।सोचते क्यों उड़ते तीर ले। डर के मारे कोई उससे पैसे नहीं मांगता ।एक तो वह एम .एल. ए का बेटा था ।दूसरे उसका शारीरिक गठन पहलवानों सरीका था। और एक दो गुंडे दोस्तों को साथ रखता था। जिस पर उसके चेहरे से गुंडागर्दी भी टपकती थी। वह पिता के बल पर खूंटे के
 बल कूदता था। इस बार उसके पिता चुनाव में बुरी तरह से हार गए। उनकी जमानत भी जब्त हो गई। पर उसकी गुंडागर्दी नहीं खत्म हुई थी। अब तो पुलिस भी हरकत में आ गई ।हमेशा की तरह उसने इस बार कलेक्टर की बिटिया दीक्षा को छेड़ दिया ।वह भला कहां चुप रहने वाली थी। उसने तुरंत अपने पिताजी से शिकायत करके पुलिस केस बनवा दिया और भी कई व्यवसायियों ने उसी के दम पर शिकायतें लेकर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी ।अब तो पुलिस उसे एक होटल से मारपीट करते हुए केस में पकड़कर थाने ले आई। उसकी शिकायतों पर डीआईजी ने उसे 3 दिन के रिमांड पर रखा जहां उसकी अच्छी खासी धुनाई हुई सारा जोम उतर गया। जब तक उसके पिता एमएलए साहब को पता पड़ा तब तक तो प्रकाश समझ चुका था अपनी औकात। अब उसके पास वह सहारा नहीं बचा कि वह जिस खूंटे के बल कूदता था। क्योंकि उसके पिता के पास अब कोई पद भी नहीं था ।

स्वरचित लघु कथा रजनी अग्रवाल जोधपुर

अग्निशिखा
 मंच को नमन
विषय --: खूंटे के बल कूदना
दिनांक --: 1/6/2021

सुनिता और राजू  दोनों बचपन से एक ही स्कूल में पढाई कर रहे हैं ! दोनों साथ ही पढा़ई करते....  वैसे सुनिता अपेक्षाकृत पढ़ने में अच्छी थी! राजू कम पढा़ई करने की वजह से पीछे ही रहता था! 

कुछ समय पहले उनके पड़ोस में कुंदन नाम का लड़का आया जिसके पिता शिक्षा विभाग में कार्यरत थे! राजू का मित्र बना! कुंदन पढ़ने में वैसे ठीक ही था किंतु बोर्ड परीक्षा का उसे जरा भी डर नहीं था! राजू ने बताया उसे पेपर पहले ही मिल जायेंगे चूंकि उसके पिता शिक्षा विभाग में  हैं इसलिए! 

सुनिता  पहले से ज्यादा मेहनत करने लगी! सभी टीचर भी कुंदन की तरफ खास ध्यान देती थी !क्लास टेस्ट में भी उसे अच्छे नंबर आते थे! राजू तो दिन रात उसी के साथ रहता था! 

कुंदन पिता के खूंटे के बल पर था और राजू कुंदन के...! सुनिता ने कहा मां मैं कितनी भी मेहनत करती हूं पर क्लास में राजू और कुंदन ही अच्छे मार्क ले जाते हैं 

मां ने कहा तुम मेहनत करो.... धीरज रखो मेहनत का फल मीठा होता है! मेहनत अपना रंग जरूर दिखाती है! 

दसवीं के बोर्ड परीक्षा में साइंस और गडित पेपर के लिक होने पर उसकी परीक्षा फिर से होने की घोषणा हुई! कुंदन और राजू के तो होश ही उड़ गये! 

रिज़ल्ट आने पर सुनिता प्रथम डिवीजन में डिस्टिंक्शन के साथ 88 परशेंट लेकर आई.... राजू और कुंदन तो उसके पिता के खूंटे  के बल पर कूद रहे थे ! दोनों पास तो हो गये किंतु द्वितीय श्रेणी में! 

सुनिता बहुत खुश थी  88 परशेंट पाकर....

 सुनिता ने कहा मां आप सही कहती थी.... कि मेहनत अपना रंग अवश्य दिखाती  है....

 मां ने कहा बेटा हमें दूसरे के खूंटे के बल पर नहीं कूदना चाहिए चोट लग सकती है ....

अपने बलबुते पर मेहनत और आत्म-विश्वास से कितनी भी उंचाई हो नापी जा सकती है! 

 सुनिता खुश होती हुई मां कहते हुए मां के गले लग जाती है !

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई

खूंटी के बल कूदना
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राम के पिता एक प्रतिष्ठित स्कूल मे प्रिंसिपल थे।राम भी उसी स्कूल मे कक्षा सात मे पड़ता था परंतु राम बहुत कमजोर था वो अपने पिता की तरह होनहार नहीं था।मास्टर जी जब भी उसे समझाते पढ़ने के लिये तो राम सुना अनसुना कर देता था आखिर राम अपने पिता की खूंटी के बल ही तो कूदता था।उसे पता था की उसके पिता हैं तो उसे कोई मास्टर जी फैल नहीं कर सकते हैं।नवीं तक तो जैसे-तैसे उसे खींचतान के मास्टर पास करते चले आऐ परंतु दसवीं तो बोर्ड की परीक्षा थी जब दसवीं की परीक्षा दी तो वो उस परीक्षा मे उपट फैल हो गया जिसके चलते उसकी पूरी अकड़ निकल गई और तो और दोस्तों ने भी उसका मजाक उड़ाया पिता ने भी फटकार लगाई साथ ही मास्टर जी कहते रहे और करो बड़ो की बातों को अनसुना आ गये ना तुम आसमान से धरा पे राम बस गर्दन झुका मुंह छुपाता फिरता सबसे और उसी दसवीं कक्षा मे फिर पड़ता।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
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खूंटे के बल पर कूदना

सुनसान सड़क है सड़कों पर कुछ महिलाएं अपनी अर्जी लेकर बैठी हैं सुबह से बैठी है चार-पांच घंटे लगातार बैठी रही फिर भी मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हो पाई हर समय यह कहा जा रहा है थोड़ी देर में आप लोग को बुलाया जाएगा इसी बीच एक लड़की गाड़ी से आती है और हाथ में एक शरीर रखी हुई है लगातार यह कहे जा रही है यहां पर से हट जाइए हट जाइए यहां पर से हट जाइए हट जाएंगे और तेजी से गाड़ी को सड़क के इस ओर से दूसरी ओर ले जा रही है इंतजार करती हुई महिलाएं यह देख कर अचंभित है कि यह सुंदर सी कन्या कौन है और किस के बलबूते पर इस तरह से सभी महिलाओं के साथ पेश कर रही है महिलाओं को यह बात समझ में नहीं आ रही थी अचानक गेट के पास एक बूढ़ा व्यक्ति कुछ काम कर रहा था घास काट रहा था उसने कहा यह मुख्यमंत्री की बेटी हैं उन्हीं के बल पर यह पूरे शहर को अपनी उंगली पर नचा कर रखी हैं तो तरह-तरह की कहानियां सुनने को उससे मिली मार्केट में जाती हैं और गहनों के दुकान से गहने पसंद कर उठा कर चली जाती हैं और यह कहा जाता है बिल घर भेज दीजिएगा और अपने पिताजी का कार्ड उसे थमा देती है उनके पिताजी की ऐसी दहशत फैली हुई थी कि व्यापारी क्या अन्य कोई भी लोग बहुत ही घबराता था हर दुकान वाले लोग मुख्यमंत्री के भाई भतीजे को देखकर इस डर से चुप हो जाते थे अब पता नहीं कौन सा सामान उठाकर ले जाएंगे और पैसा नहीं मिलेगा सभी व्यापारी आपस में बात कर रहे हैं यह अपने पिताजी के के बल पर इस प्रकार की हरकतें कर रहे हैं। ज्यादा दिन नहीं है बहुत जल्दी ही यह खूंटा गिरने वाला है चुनाव आ रहा है इस बार चुनाव में तो इनकी हार निश्चित है फिर देखेंगे इनकी रुतबा।
अधिकतर नेता के भाई भतीजे अपने रतवा दिखाते रहते हैं यह उनका अपना नहीं होता है।

ठीक इसी तरह की एक पारिवारिक घटना है।

शकुंतला जिस महाविद्यालय में पढ़ती थी पढ़ने में ठीक-ठाक साधारण विद्यार्थी थे लेकिन बोलचाल की भाषा में एक विशेष प्रकार का अकड़ या घमंड भरा रहता था अपनी सहेलियों के साथ यदि कहीं जाती तो अकड़ दिखाती हुई सबसे अलग रहती खाने पीने में भी अपना स्टाइल मारती रहती
बातों बातों में ही उसने कहा मैं अपना कोई भी ड्रेस तीन से चार बार ही पहनती हूं उसके बाद उसे हम किसी दूसरे को दे देती हूं पैसों का गुमान भरा हुआ था और दूसरी उसकी सहपाठी उसे बार-बार इस बात के लिए सचेत करती थी की पढ़ाई में ध्यान दो नहीं तो अटेंडेंस कम होगा तो एग्जामिनेशन में बैठने नहीं मिलेगा पर शकुंतला सुनने वाली नहीं थी जब ऐसी बात होती थी तो उसका यह वाक्य रहता था इसकी चिंता तुम नहीं करो वह मेरा सब हो जाएगा और अमूमन हो भी जाता था इस बार उसकी कुछ सहपाठी ने इसे चुनौती के रूप में ले लिया और जब उसका अटेंडेंस कम हुआ फिर भी उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई तो उसकी सहपाठी एक लिखित आवेदन पत्र प्राचार्य और चेयरमैन को दी उसमें यह साफ जाहिर किया यद्यपि कि हम लोग किसी जज की बेटी नहीं है फिर भी महाविद्यालय में आपकी नजरों में सब को एक समान होना चाहिए और इस प्रकार का नाइंसाफी क्यों किया जा रहा है अगर शकुंतला को परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलेगी तो अन्य सभी विद्यार्थियों को भी मिलना उचित है उसके बाद शकुंतला को परीक्षा में बैठने की अनुमति जो मिली थी उसे रद्द कर दिया गया।
शकुंतला जो अपने पिता के पद पर चलती रहती थी उसकी बोलती बंद हो गई उस दिन के बाद उसे समझ में आया कि दूसरे के बल पर सभी जगह फायदा नहीं उठाया जा सकता है अपने बल पर ही काम करना चाहिए

कुमकुम वेद सेन
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