Thursday, 10 June 2021

0 अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच, चित्र पर कविता_alka pandey

*


चित्र पर लघुकथा 

शीर्षक-बेज़ुबान 

बुढी लाचार अम्मा आज अपनी दुकान पर सब्ज़ी बेच रही ।
हरि हरि मिर्ज़ी को देख एक वानर आया
 पेट की भूख मिटाने दौड़ा आया 
 अम्मा की जर्र जर्र काया और बेहाली देख सहम ।
 अम्मा बहुत गरीब व लाचार
वह थोड़ी देर बैठता है 
और अम्मा के कंधों पर प्यार से हाथ रख देता है 
, अम्मा भी ख़ुश हो कर पूछती है क्या चाहिए...बोल भूख लगी है ..
समझ सकती हूँ बच्चे आज पेड़ रहे नहीं तुम्हारा आसरा ...घर सब मानव छिनते जा रहे हैं 
कहाँ से पेट भरोगे जंगल बगीचे , सब कंक्रीट के जंगलो में बदल गये है । 
तू घबराना नहीं रोज़ मेरे साथ मेरे घर पर रहना हम दोनों मिल बांट कर खा लेंगे ..
अम्मा ने बंदर तरफ़ प्यार से देखकर कहाँ । 
बंदर ने अम्मा के हाथ चूम लिये और बोला आज से मैं तेरा बोझ ले कर घर से आऊगा ले कर जाऊँगा तुम यहाँ बैठ कर सिर्फ़ बेचना ...
अम्मा ख़ुश कोई उनके जीवन में आया और सहारा बन गया 
अम्मा ने कहाँ तू बेज़ुबान ने मेर अंतस की पीड़ा को समझ लिया पर इंसानों ने नहीं समझा , 
बंदर का कंँधे पर रखा हाथ माँ के तन मन में ऊर्जा भर गया 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

चित्र पर आधारित*
*मंच को सादर नमन*
*9/ 6 / 2021*

बैठी अम्मा लेकर आज, फिर मिर्च  बाजार!
सोच रही थी कोई न मिला फिर आज खरीददार!
कैसे जलेगा चूल्हा घर में ..कैसे होगा बेड़ा पार!

इतन में आया एक वानर , पूछने उसका हाल!
क्यों हो इतना परेशान अम्मा, क्यों हो बेहाल!
देखकर अपना एक हितैषी, अम्मा हुई निहाल!

बोली अम्मा..क्या मैं बोलूं, नही है कोई आसरा!
मंहगाई की मार में , होगा कैसे ..बोलो गुजारा!
सुनकर वानर भी चुप,बोले क्या भला वह बेचारा!


बन सखा अम्मा का वानर देता रहा ढांढस- आस!
आज नही है तो क्या हुआ, कल होगा सब तेरे पास!
कर याद प्रभु को, मत हो अम्मा तू इतनी  उदास!!
    *मीना गोपाल त्रिपाठी*


**अंग्निशिखा मंच**
     **जय माँशारदे**
   **१०/६/२०२१**
**चित्रआधारित रचना**
महाबीर से बुढी़ माता कर रही है बात।
सारी उमर सबकी सेवा की शिथिल हो गये गात।
बच्चो ने मेरे छोड़ दिया अब क्या बताऊँ तात।
मैने सब को पाला प्यार से सब मिल कर किये  घात।
कमर मेरी झुक गई  सारे पक गये बाल।
क्या पता था मुझको ऐसे छोडे़गे मेरे लाल।
अब तुम्ही बताओ हनुमान जी किससे कहूं मै हाल।
मै बुढी़ कमजोर औरत भूख  प्यास से हूं बेहाल।
**स्वरचित** 
         **बृजकिशोरी त्रिपाठी**
   **गोरखपुर यू.पी*

( चित्र पर आधारित )
        ‌  लघुकथा
       ----++++-----
     🌹रिश्ते नाते 🌹

     लगता है पिछले जन्म का तुम्हारा मेरा नाता है, तभी तो तुम रोज आते हो ,मेरी रोटियां खा जाते हो। मुझे भी बहुत अच्छा लगता है ।कम से कम तुम तो मेरी खबर लेते हो । मैं बूढी हूं, असहाय हूं । इन मिर्चियों को बोरियों में भरकर पैसा कमाती हूं और अपना पेट पालती हूं । मेरी रोटियों में तुम्हारी भी दो रोटियों का हिस्सा है। पर तुम क्यों रोज आते हो। क्या हनुमान जी तुम्हें मेरी मदद के लिए भेजते हैं। भगवान जी को मेरी कितनी चिंता है ,जो तुम्हें मेरे पास भेज देते हैं ।आज के जमाने में कोई किसी को नहीं पूछता । यह बड़ा मतलबी जमाना है। यहां सब मतलब के साथी हैं ।  पता नहीं तुमसे मेरा क्या नाता है। मुझे तुम से डर नहीं लगता बल्कि तुम्हारा आना मुझे बहुत अच्छा लगता है। क्या करूं ,जो अपनापन मुझे अपने बेटे से मिलाना चाहिए था, वह तुमसे मिलता है । खिलाकर रोटी तुम्हें मैं आत्मशांति पाती हूं। जहां अपनापन होता है वहीं प्यार मिलता है। हम दोनों प्यार ही के तो भूखे हैं । 
********************स्वरचित मौलिक रचना
डॉ आशा लता नायडू .
भिलाई छत्तीसगढ़.
********************

अग्निशिखा मंच नमन
10/6/2021 गुरुवार
विषय-चित्र के आधार पर रचना

नारी की त्रासदी

मनुष्य से अच्छे तो
ये पशु-पक्षी है,
जिन्हें पहचान है
सही ग़लत की।
वानर कुल में
 जन्में वीर हनुमान ने,
रावण की लंका में
माता सीता का
पता लगाया।
रीछ कुल में उत्प्न्न
जावन्त ने,
राम-रावण युद्ध में
राम सेना की
अगवानी की।
खग जटायु ने 
माता सीता की,
लाज बचाने के लिए
निडरता से,
लड़ते हुए अपने
प्राण न्योछावर कर दिए।
नन्दी हर क़दम पर
शिव के साथ थे।
विष्णु भगवान
सवार थे गरुड़ पर।
मूषकराज ने
कई बार,
गणपति को
संकट से उभारा।
पर आज आदमी,
आदमी के पतन का
कारण बन गया है।
हर युग में
पुरुष समाज ने
औरत को,
कमज़ोर समझकर
उसे प्रताड़ित किया है।
त्रेतायुग में 
रावण ने,
माता सीता का
छल से हरण किया,
पवित्र सीता को भी
अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी।
द्वापरयुग में
पांच पतियों द्वारा,
द्रौपदी को
वस्तु समझ कर,
जुएँ में दाँव पर
लगाया गया।
और आज
कलयुग में तो,
हद ही हो गयी
क़दम-क़दम पर,
नारी की अस्मत के साथ
खिलवाड़ किया जा रहा है।
दुधमुंही बच्ची को
नहीं छोड़ा,
 इन वासना के 
हैवानों ने।
अब तो इंसानों से
उम्मीद की 
उम्मीद भी टूट गयी है।
हमें स्वयं
लड़नी होगी,
अपनी लड़ाई।
शायद एक बार
फिर से ये अनबोले
पशु-पक्षी ही
हमारे जीवन का
सहारा बनें।।
                तारा "प्रीत"
             जोधपुर (राज०)

अम्मा बैठी है कर्म करते,
 निरत तन सब्जी तोलते।
 न है उम्र का फिक्र तुझे,
अम्मा तुझ पर फक्र मुझे।
 अकेली है भाजी मंडी मे,
 अपना कोई ,अकेली घर में।
 हनुमान अम्मा को दर्शन देता है,
 जब भी अम्मा याद करती है।
 आँखों से पानी छलकते हैं,
 लंगूर उसके आँसू पोंछता है।
 दोनो मिलकर खाना खाते हैं,
भरोसा देता वह उसके साथ है।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय

$$ चित्र पर कविता $$

$$  बुजुर्ग और बन्दर  $$

अकेली हूँ तो क्या हुआ 
तुम जो हो मेरे साथ 
पेट तो मैं भर ही लुंगी
बेचकर सब्जी भाजी
मन बैचेन था करना चाहता था
किसी से बात 
देखकर तुमको खुश हो गई मैं आज
नहीं हूँ असहाय आज
क्योंकि तुमने रखा 
मेरे कांधे पर हाथ 
हमदर्द तुम मेरे
आना रोज ही मेरे पास 
कुछ तुम्हे भी खिलाऊंगी 
बनाकर खाना अपने साथ 
स्वार्थी हो सकता है इंसान 
पर तुम तो मेरे साथी
अब सुख दुख सब 
बाटुंगी तुम्हारे साथ 
बाटुंगी तुम्हारे साथ 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान


अम्मा देख इतने बुढ़ापे में  भी 
 बाजार मिर्ची बेचने आना पड़ा
  तुम्हारे आराम करने के दिन थे
 काम करने को आना पड़ा 

 इंसान में संवेदनाएं खो चुकी है
 पर जानवर में अभी भी दया है
 ममता है, करुणा का सागर है
 संवेदनाएं.बची हैअभी  मन में


 देखो बन्दर कितना समझदार है ?
अम्माँ के हाल चाल पूछ रहा है ।
 क्या हुआ अम्मा  क्यों दुखी है?
वह सहायता करना चाह रहा है।

 घर कोई अपना पूछने वाला नहीं
 बच्चे हैं पर वे  ध्यान रखते नहीं
 क्या करें पापी पेट का सवाल  है
 बेटा आना पड़ा मुझे  बाजार में।

वानर की बातें सुन अम्माँ मुस्काई
बेटा तुझमें दया भावना जगमगाई
इंसान से तो अच्छा तू वानर ही है
तू मेरा बेटा होता तो अच्छा होता

ले तू तो मिर्ची खा ले
अपनी भूख मिटा ले
मेरा आशीर्वाद  ले ले
अरे यह तो मिर्ची है।

आशा जाकड़

चित्र आधारित रचना 
शीर्षक - वानर की समझदारी 

अम्मा वानर से बतिया रही 
सुना रही अपनी रामकहानी 
आज बिकी नहीं रे,हरी मिर्ची 
हाथ पर हाथ धरे बजाएं ताली।

वानर हँसता हुआ बोला-- 
उदास मत हो मेरी अम्मा-- 
जल्दी बिक जाएगी मिर्ची 
फिर करेंगे खूब मौज-मस्ती।

वानर कूदा जल्दी से,ले आया 
ताजे,पके केलों से भरा टोकरा, 
अम्मा भूल गई,सारी दुकानदारी 
दोनों ने पेट की,जमकर आग बुझाई।

वानर अम्मा की खूब जम रही
दोनों हंसे,अम्मा दिखाये उँगली
अम्मा बोली,अरे सुन रे तू वानर
तू है इंसान से,ज्यादा समझदार।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
10-6-21

नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
दिनाँक- 10/ 6/2021
चित्र आधारित रचना

अम्मा- अम्मा क्या करती हो बैठो मेरे पास।
आया बंदर उचल कूदता  वह जानवर खास।।

इंसानों का जैसा चेहरा पर नहीं बदमाश।
इंसानों ने चेहरे पर लगा लिया अब मास्क।।

कैसे मिर्ची बिकेगी भैया यह तो मुझे बताओ।
प्यारी- प्यारी अम्मा मेरी चिंता में मत देह जलाओ।।

जो मिलेगा अब खा लेंगे मिल बांट कर मैया।
मैं जंगल का राजा था करता था ता- ता थैया। ।

 इंसानों ने पेड़ काटकर जंगल किए वीरान।
तेरी जर्जर काया देख अम्मा मैं भी हूँ  हैरान। ।

इस उम्र में भी तू कर्म पथ से नहीं डिगती।
पड़ी हुई है तेरी मिर्ची आज क्यों नहीं बिकती।।

हे ईश्वर हे अल्लाह मालिक कोई तो भेजो बंदा।
बिक जाए थोड़ी सी मिर्ची बंद हुआ क्यों धंधा।।

भूख हम सभी को लगती तूने बनाए जीव।
पेट पर हम कैसे पट्टी  बांधे हम नहीं निर्जीव।।

छोड़ो अम्मा चिंता करना ईश्वर रहा है देख।
तेरे भीतर पावन आत्मा तू मेरी अम्मा  नेक।।

चित्र आधारित रचना 'स्नेहा' लिखने बैठी लेख।
मानव और बंदर की कहानी कहती किस्सा अनेक।।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

अग्नि शिखा 
नमन मंच
विषय -: चित्राभिव्यक्ति
दिनांक --: 9/6/2021

अम्मा और वानर पुत्र
*****************

बैठी अम्मा आस लगाए
मिर्ची बिके तो कुछ मिल जाए
आज बिकी न बिल्कुल मिर्ची
 कैसे चलेगी अपनी खर्ची! 

बंदर प्यार से देने को आया चुम्मा
चिंतित बैठी थी बूढी अम्मा
कैसे खिला पाऊंगी मैं तुझको 
चिंता हो रही है अब मुझको !

आज मिर्ची बिकी नहीं 
अपनी रोटी सिकी नहीं 
चिंता मत कर मेरी अम्मा 
मुझे लगी है कोई भूख नहीं !

बोली अम्मा, 
ईश्वर ने क्या खेल खेला
आज नहीं मिलेगा तुझे केला 
अम्मा समय नहीं होता हरदम एक सा
मन को दुख से तू मत कर मैला !

अम्मा जीवन एक तमाशा है 
कभी तोला कभी माशा है सुख-दुख के झूले में से ही तो
  निकलती एक आशा है !

अम्मा को धीरज देता
जोर-जोर से वानर बोला 
मिर्ची तेज तरार है 
आज नगद कल उधार है !

भोजन स्वादिष्ट बनाने में 
  मिर्ची का कमाल है
 मिर्ची बड़ी असरदार है 
   मिर्ची  लाजवाब है !

बिकने लगी अम्मा की मिर्ची 
मिल गई उसको आज की खर्ची    
     मिर्ची सारी बिक गई 
    अम्मा की रोटी सीक गई !

           चंद्रिका व्यास 
         खारघर नवी मुंबई

🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
     🌿विषय:चित्र-आधारित 🌿
      🌲दिनांक :10-6-2021🌲
रचनाकार~ डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार ~
🌴
बूढ़ा  बंदर  आ  पहुँचा, 
एक बूढ़ी  माँ  के  पास ।
'दुखी बहुत दिखती है तू,
ऐसा , क्या   है   हाल ?'
आँखे पोछकर बोली बूढ़ी- 
'अभी गया नहीं कोरोना काल!
दाने- दाने को तरस रही हूँ -
भूख   से   हूँ  , बदहाल !
बंद पड़े  सबके दरबाजे,
और कहाँ  अब जाऊँ  मैं ?
अपना कोई नहीं  ठिकाना!
क्या ? तुझको बतलाऊँ  मैं !!
मिर्ची   लेकर   बैठी   हूँ  ,
कुछ भी अगर जो बिक जाए-
ले   लूँगी  मै  रोटी- सब्जी ,
किसी  तरह  दिन  कट  जाए !!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार ~डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार ~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

दुखियारी अम्मा और बंदर
************************
दुखियारी अम्मा दिन-रात रोती 
अपने ही अश्कों से दामन भिंगोती है
अब उसका कोई नहीं सहारा न कोई अपने
क्या जुल्म करते हैं उस पर उसके अपने
जो बेचना पड़ रहा अकेले बाजार में मिर्ची
हो ग्रे चूर उसके जितने भी बजे सपने
अब अपना ही बोझ वो तन्हा ढोती है
दुखियारी अम्मा हर दुःख सह लेती है
कैसे कहें किसको कुछ
किसे दर्द सुनाते वो
ज़ख्म मिले जो अपनों से
किसे दिखाये
आज एक बंदर  बूढ़ी अम्मा का सहारा बना
बेटि बन बंदर कंधे पर हाथ रख
आश्वासन देता
अपनी प्यारी अम्मा को ठेले से ला केला खिलाया
अम्मा ने युग-युग जियो का आशीर्वाद दिया
घोर कलयुग दिखाता यह चित्र
मन को संतप्त, व्याकुल करता है चित्र

डॉ मीना कुमारी परिहार

चित्र पर 
देख वृंदा को परिश्रम करते
आये सहायता करने हनुमान जी बंदर बनके
निसहाय का कोई नहीं सहारा
अकेली जी रही‌ है
उपर वाले पर करके भरोसा
जिसने पालन सबको
दिया सहारा हर किसी को
आज कोई नही है उसका सहारा
आख़िरी तक देख ली
कोई बढ़ाया नहीं हाथ उसकी जिम्मेदारी उठाने
अब जब तक जीयेगी
उठायेगी अपनी जिम्मेदारी
जो कोशिश अपनी मेहनत खुद करते
उसकी सहायता भगवान भी करते
इसलिए बंदर बन आते हैं हनुमान जी बूढ़ी मांकी सहायता करने
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़।

🌷🌷🙏🏻🙏🏻🙏🏻


 चित्र आधारित अभिव्यक्ति


 एक मानव की दुर्दशा 
एक जानवर की हमदर्दी
 करती है बयां 
हां कि तू क्यों समझे
 अपने आप को अकेला
 मैं हूं तेरे साथ 
सदा मैं हूं तेरे साथ सदा
 यह मानव स्वार्थ के बंदे 
तुम को इस तरह छोड़ें
 किंतु मैं न छोडूंगा 
रखूंगा हरदम ध्यान तेरा
 मैं स्वार्थ बस ना आया हूं 
निस्वार्थ बस में आया हूं 
मैं ईश्वर के संग सदा 
वैसे ही संग तुम्हारी 
हूं मैं हूं ना फिर चिंता क्यों 
किस बात की
चंदा कुमारी
💐💐💐💐💐💐💐💐

"मैं हूं ना"
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय _चित्र पर कविता
"मैं हूं ना"
ये वाक्य प्यारा कितना!
गिरते हुए को संभाल ले,
किसी रोते हुए को हंसा दे,
कमजोर को करे पहलवान,
लगे जैसे आन मिले भगवान,
बोलो सही है ना?
कहना कि"मैं हूं ना"।१।
बस यही कहने आया बंदर,
जाना क्या है मां के मन के अंदर,
कहा, कंधे पर रखकर हाथ,
अकेली नहीं,"मैं हूं ना"तुमरे साथ,
घबराओ मत,बेफिक्र रहो,
अपनी बात दिल खोलकर कहो,
उमर से थकी हो,
अनुभवों से पकी हो,
और मिर्ची नहीं बेचनी अब,
ये बेटा काम आयेगा कब?२।
चलो,अपनी कुटिया,अपने घर,
वहीं रहेंगे दोनों प्रेम से मिलकर,
मैं करूंगा काम,तुम करना आराम
मैं हूं रामदूत, समझो मुझे सपूत,
मैं हूं लंगूर, लाऊंगा आम _अंगूर,
खूब फल, पकवान खिलाऊंगा,
थपकी दे,लोरी गा, सुलाऊंगा।३।
मजे से कटेगी  ज़िंदगी,
करेंगे श्रीराम जी की वंदगी,
रामजी से मिलवाकर,
नैया पार लगा दूंगा,
मैया तुझे मोक्ष दिलवाकर,
भव सागर पार करा दूंगा,
मैंने कह दिया ना,
"मैं हूं ना"।
      "बोलो जय श्री राम"
स्वरचित मौलिक रचना______
रानी अग्रवाल,मुंबई१०_६_२१.

विधा                        लघुकथा 

प्रदत्त विषय          चित्र पर आधारित

विषय               बेजुबां हमदर्द 
----------------------------------------
लेखक             नरेन्द्र कुमार शर्मा 
                      भाषा अध्यापक               
                        हि0प्र0शिक्षा 
                            विभाग
🙏🏻-----------------------------------🙏🏻


यूँ तो सभी बेजुबानों को या तो पशु कहा जाता है या फिर जानवर।लेकिन आज शिक्षा के प्रसार ने मनुष्य को भौतिकवादी युग में ला खड़ा किया है।आज एक सुशिक्षित व्यक्ति की मानसिकता इतनी अत्याधुनिक है कि जिससे मतलब न हो उसका जीवन में कोई स्थान नहीं।ये चाहे समाज में हो या परिवार में।
आज यही कारण है कि कई माता-पिता को अपनी संतानों पर लाखों व्यय करने के बाद जब वह अपनी टांगों पर खड़े हो जाते हैं तो माँ- बाप की टांगों से ग्रीस खत्म हो जाता है।अर्थात-------------।
   आप इसे हमारी उन्नत सोच कहें या फिर हमारे संस्कारों की कमी।ऐसे में जब वो बुजुर्ग लाचार हो जाते हैं तो या वृद्ध आश्रमों में स्थान मिलता है या फुटपाथ पर।
आज वृद्ध आश्रमों में तो सम्पत्ति के कारण वृद्धों को नहीं भेजा जाता।यही कारण है कि आज बहुत से लाचार और बेबस माँ- बाप पागल का भेष बनाकर सड़कों के किनारे शहर के किसी ऐसे स्थान पर पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए भीख मांगते नज़र आते हैं।
वो मानव जो आज सृष्टि के हर जीव को पशु समझता है अगर आध्यात्मिक चिंतन करें तो वो स्वयं पशु से कम नहीं।पशु की प्रवृत्ति यह मानी जाती है कि वो या तो सींग मार सकता है या दाँत या नाखून।लेकिन इन सब से बड़ी मार है हमारी भौतिकवादी पीढ़ी की।
द्वापर,त्रेता या सतयुग को देखें तो उस   समय का जीवन पूर्ण वैज्ञानिक था।वनस्पति में देवता का निवास,पक्षी में देवता का निवास और पशुओं में भी देवताओं का वास माना जाता था।रामायण के युद्ध के लिए श्री राम जी की सैना में पशु अथवा जानवर ही तो थे।न्याय के देवता शनि महाराज के वाहन को ही देख लीजिए।माता के नौ रुपों में माँ अपने अलग-अलग वाहनों की सवारी करते दर्शाई गई है या यूँ कहें कि ऐसा उल्लेख मिलता है।
        आज अगर गौर किया जाए तो आज केवल मनुष्य ही बदला है जानवर नहीं।आज भी बेजुबां की हमदर्दी और भावुकता देखते ही बनती है।आज इन बेजुबानों ने भी मानव के बदलते स्वरूप को देखकर इतनी शिक्षा अर्जित कर ली है जिसका अंदाजा मनुष्य या तो तस्वीरों से लगा सकता है या काई बार शहर के उस चौराहे पर देखा जा सकता है जब काई होटल अथवा ढाबे वाला उस लाचार और बेबस को दिन भर की झूठन देता है।
उस झूठन के लिए अक्सर कुत्ते,कौवे या बन्दर तथा आवारा पशु दौड़ते है परन्तु जहां कोई ऐसा लाचार,बेबस और अपनी भौतिकवादी सन्तान का सताया कोई मानव होता है वहां ये बेजुबान उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि वो शायद इस जन्म में नहीं लेकिन किसी न किसी जन्म में उनकी माँ रही हो या बाप।
    आज हमें इन बेजुबान जानवरों से शिक्षा ग्रहण करनी होगी कि भविष्य में जुबां वाले जानवरों से कैसे बर्ताव किया जाए।अन्यथा ये कलयुग कलंक युग साबित न हो।
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        (समाज को इंगित करती रचना)

अग्निशिखा मंच को नमन🙏

*चित्रपर आधारित रचना*
कल सभी मेरे साथ थे,
आज मुंह मोड़ लिया सबने
जीने के लिए सब्जी बेच रही मै,
आज पराये हो गये अपने।।1।।

है वानरराज तुझको मेरी,
दया आई,अपना समझा
मगर अपनोंने  ठुकराया
फेंका बाहर, कचरा समझा।।2।।

इस स्वार्थी जगमे,अब
किसी पे भरोसा करे,आज
जिनकों समझा अपना वो ही,
आज ठोकर मार रहा आज।।3।।

मानव से प्राणी अच्छा है
जिनमें मानवता है आज,
मानव बन गया, हैवान ,
जिनमें पशुता है,आज।।4।।

हे! प्रभु तुमने वानरराज को भेजा
एक दुखियारी  का हाल पूछा ,
मेरा सारा दुख हरण हो गया, 
मुझे राम और दूत के रुप में,
प्रभु राम का दर्शन हो गया।।5।।
 

सुरेंद्र हरड़े कवि
नागपुर महाराष्ट्र
दिनांक:-१०/०६/२०२१

वृद्ध अम्मा मिर्ची बेच रही है
अपने को व्यस्त रखी है
लगता है घर वालों ने
इस हालत में पहुचायी है

एक हनुमान वृद्धम्मा के पास
बैठा ऐसे हैं जैसे उसका भक्त
कंधे पर हाथ रख अम्मा से पूछ रहा
क्यों तुम बीच रही है मिर्ची
तेरा मन करता है या है कोई मजबूरी
मैं तेरे साथ हूं तेरा ख्याल मैं करूं
मैं भी तेरे साथ बैठ मिर्ची बेचूं
हनुमान की भावना से वृद्धम्मा
चेहरे पर हंसी आ गई
दोनों की भावनाओं मैं दोस्ती दिखे
वृद्धम्मा को मिर्ची बेचने अच्छा लगा हनुमान जो उसके पास बैठा रहा
ऐसा लग रहा है राम भक्त हनुमान है
सबरी की मिर्ची है
कहने को मिर्ची है पर दोनों में
अच्छी मिठास है

कुमकुम वेद सेन

गुरुवार ****10 जून 21
विधा *****कविता
विषय***
#**चित्र पर आधारित रचना**#
             ^^^^^^^^^^^^^

कहां गए अपने  जिन्होने वृद्धाको।
दर्दो गम की  खाई   में  डाल दिया ।।
इतने   कैसे  मोह   माया  में  फंसे ।
अपनी माताको ही बदहाल किया।।१

वाह री किस्मत  इस बुढ़ापे में भी ।
मंडी  में  सब्जी  बेचनी   पड़  रही ।।
जिंदा रहनेके लिए एक दुखियारी।
अपनी बेबसी बदहालीसे लड़  रही।।२

प्रेम से  हाल  पूछने  आया  मां से ।
भक्त  श्री राम दूत को  दया आई ।।
अपनों  ने  तो  छोड़  दिया  मरने ।
खुदगर्जो  को जरा  ना हया आई ।।३

मां  किसने  तेरा ये  हाल  किया ।
इस बदहालीका इंसाफ कर दूंगा ।।
रावणसा होगा कोई बेटा जिसकी ।
सोने की लंका  में  राख कर दूंगा ।।४

हे  कपीराज जा कह दो श्रीरामसे ।
पास  बुलाए  मुझे  अब  है मरना ।।
इस निकम्मी स्वार्थी ढोंगी जहां में ।
एक पल  भी नहीं  है  मुझे रहना ।।५

इस महामारी  में सब  दूर हो गए ।
ये कैसा रिश्तो  में  है अंतर आया ।।
एक बूढ़ी बेबस मांका हाल पूछने ।
बस केवल  राम दूत  बंदर  आया।।६

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
        महाराष्ट्र ।

अग्निशिखा मंच 
विषय---चित्र पर आधारित 
शीर्षक--- माँ का दर्द
विधा---कविता 
दिनांक---10-6-2021

 दर्द बाँटने अम्मा का जब पास कोई ना आया 
तो वानर ने आकर एक माँ का दर्द बँटाया ।
जैसे उसको व्यथा सुना रही अपने बीते पल की 
और कष्टों को बताती आने वाले पल की ।
अपनों का संग ढूँढ रही कोई तो हो जो सुने दिल की आँखों की गहराई में जो उदासी है 
कहती है तन्हाई उसके दिल की ।
कहाँ गए सब मिलजुल कर सब रहते थे 
एक दूजे के सुख-दुख में हाथ पकड़ के रहते थे ।

 पेट भरने को अब मिर्ची है बेच रही
 जीवन के मीठे पल पर मिर्ची भारी पड़ रही ।
 जब तक है साँस पेट तो आखिर भरना है
 जिंदा रहने की ख़ातिर खुद ही मेहनत करना है ।
 रह गई अकेली, खुशियों का मेला पीछे छूटा 
अब लगे उसे यह जीवन इक सपना झूठा ।
ना चाहे सोना चाँदी ना धन दौलत की चाह रही
 बस अपनों का साथ मिले 'रानी' बस इतनी ही 
तो आस रही ।
                  रानी नारंग

अग्निशिखा मंच को नमन 
दिनाँक 10/6/2021
विषय -चित्र लेखन
उम्र भर के तप का 
कैसा सिला आज मिला 
जिसको था जन्म दिया 
भटकने यूँ छोड़ दिया।
आग पेट की बुझे ना
काम करना लाजिमी 
मिर्च को ही बेच कर
पेट वह है पालती।
खत्म है संवेदना जब मनुज की
आज यहाँ
बेजुबान जीव करे 
उससे संवेदना।
लगता है महावीर 
स्व प्रकट हो गए 
दुखिया केदुःख को हरने 
काम उसका बांट रहे।
दे रहे दिलासा 
चिंता मत  करो तुम माँ 
मैं तेरा बेटा हूँ
बहुत रोयी अब न रो
मेरे सहारे तुम 
अपने दिन गुजारना।।
निहारिका झा।

* अग्नि शिखा काव्य मंच*
* चित्र - रचनां *
*दिनांँक १० / ६ २०२१ 
* वृहस्पति वार *

 मैं हूं एक वक्त मारी दुखियारी ,
अपनें जीवन का सब कुछ हारी !
खाली हाथ ओर  निराश हैं आँखें,
थकता तन और काँपते हाथ हैं!
जठराग्नि से तन -मन....जलता ?   
खाली  बैठ कर कैसे मेरा पेट भरता?
अपनों का तिरस्कार मन नहीं सहता ,
अपनी हिम्मत से दो पैसे कमा लूंगी ! 
मेरा ओर मेरे वानर का पेट भर लूंगी ,
मैं हूं और मेरा साथी है ये वानर है !
हर पल मेरा साथ निभाया है ,
सुख -दुख इसको सब कहती हूं !
मन को हल्का कर लेती हूँ ,
मुक है फिर भी देता सहारा !
 सब जगह मेरा साथ निभाता ,
 अपनों से मिले गहरे जख्मो पर!
  अपनें प्रेम का मलहम लगाता !!

सरोज दुगड़
खारूपेटिया , गुवाहाटी
असम 
🙏🙏🙏

अग्नि. शिखा मंच
दिनांक 10.6.2021
गुरुवार
विषय  चित्र पर आधारित
सीख.लघु कथा
 एक गांव के आगे मंदिर  के पास बुढिया अम्मा हरी मिर्ची लेकर बेचने हेतु बेठी है ताकि आने जाने वाले उससे खरीद ले ,अम्मा रोजाना बंदर को कुछ खाने को देती रहती है वह रोजाना अम्माजी के पास आता है खाने  को मिल भी जाता है ऐसे उसका अम्माजी से अपनापन हो गया  शायद इंसान को इस चित्र को देखकर कुछ अपने की सीख मिल सकती है ताकि कोई किसी को अकेले पन कि अहसास न हो।


दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाइल 9425350174

ॐ हनूँमनताय नमः जनमन संचार जगाओ “
जन मन की अद्भुत सुन्दर कहानी
मौन ही शब्द मौन ही वाणी 
दिल से दिल की मौन कहानी 
संकेतों से हल होती कहानी 

माई मन अनुरागी प्यार बसा है
हनुमंत दिल स्नेहिल अभिव्यक्ति है 
हाथ बढ़ा दे रहा सांत्वना है 
देख मानवता दिल भर आया है 

दुखियारी मन प्यास बुझाओ 
अपने सतकर्मो से पुण्य कमाओ 
मानव ज़न मन संचार जगाओ 
पवन सूत का सुन्दर रूप दिखाओ 
अनिता शरद झा मुंबई


"बोलो अम्मा! आज तुम, 
 इतनी   क्यों  उदास  हो? 
 मिर्ची  नहीं  बिक  पायी, 
 इसीलिए तुम हताश हो।"

"मिर्ची नहीं  मैं बेच पायी, 
 खाली हाथ घर जाऊँगी। 
 खाने को  भी  कुछ नहीं, 
 खाली पेट  सो  जाऊँगी। 

केले  दो  खरीद तुम्हें भी, 
खिला नहीं  अब पाऊँगी। 
किस्मत की  मारी  हूँ  मैं, 
कुछ भी  नहीं  खाऊँगी।"

"कहो मैया तो उस ठेले से
 मैं  केले चार  उठा  लाऊँ
 दो तुम  खा  लेना अम्मा! 
 दो से मैं भी भूख मिटाऊं।"

"देखो वानर! मेहनत  का, 
मैं   तो   हमेशा  पाती  हूँ। 
नहीं  चाहिए   किसी  का, 
परिश्रम का  ही खाती हूँ।"

डा. साधना तोमर

नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु चित्र पर आधारित रचना करती हूं।

 विषय-वानर राज अब तेरा ही सहारा

  वानर राज वानर राज
  अब तू ही साथी मेरा
   कितने दिनों के बाद
  कोई इतने पास बैठा मेरे।

वानर राज वानर राज
अब तू ही बन जा बेटा मेरा
बेटे ने तो छोड़ दिया
पर तू ही आया पास 
मेरे हालात पूछने।

वानर राज वानर राज
अब बन जा तू अपना सगा मेरा
मुझ जैसी बूढ़ी को ना दौलत की जरूरत है ।
मुझे तो बस अब एक साथ रहने वाला सजीव जीव ही काफी है।

वानर राज वानर राज
हरी मिर्च बाटकर मिले कुछ 
चंद पैसों से यूही दोनों साथ रहे
बस यही ख्वाहिश अब बचीं मेरी।

वानर राज वानर राज
मुझ जैसी बूढ़ी अकेली 
मां की जिंदगी में 
भगवान के रूप में आकर 
अब तू ही मेरा मरते दम तक सहारा बना।
 अब तू ही मेरा सहारा बना।

धन्यवाद
पुणे

वीना अचतानी, 
अग्निशिखा मंच को नमन, 
चित्र पर आधारित  कविता ****
 अम्मा  के आँगन
 गिरा एक ज़ख्मी बन्दर
अम्मा  ने उसका
इलाज  कराया 
 बड़े  प्यार से 
 उसको पाला
 सबको कहती ये है
  मेरा  हनुमन्त लाला
  दोनों  का था
  अद्भुत  नाता
  अम्मा  कहलाती थी
  उसकी माता 
  प्यार  से उसे
   हनु कह कर बुलाती
   एक दिन
    अम्मा  बैठी उदास
    खाने को नहीं  था
     कुछ  भी पास
     काँधे पर रख हाथ
     हनु ने ढांढस बंधाया
     पास के खेतों  से
     मिर्ची तोड़  लाया
      हनु ने रखी 
       काँधे पर गठरी 
       दोनों  गए बाज़ार
       अम्मा  मोलभाव  करती
       हनु तोलता रहता सब्ज़ी।  ।।।
   स्वरचित मौलिक 
    वीना अचतानी 
  जोधपुर (राजस्थान)....
🌹🌹चित्र आधारित🌹🌹

🙏अग्निशिखा मंच 🙏

लाचारी और बेबसी
               क्या कुछ नी करवाती

अपनों को अपनों से भी
                  जुदा ये करवा देती

सपनों को दफन करवाती
              खामोश मंजर दे जाती

ये बूढ़ी अम्मा इसी का आज 
      जीवन्त उदाहरण बनी आज

अपनों ने बेघर किया
           सपनों को चूर चूर किया

पल भर में सब अपने है
                   का भरम टूट गया

पर नहीं टूटने देगी खुद को कभी 
सब्जी बेच गुजारा करने लगी तभी

इंसान सवेन्दना हीन हो रहा
पर बंदर रूपी जीव दया कर रहा

सच कलयुग को दर्शाती ये चित्र
कितनी मार्मिक लगे दिल को ये चित्र


हेमा जैन (स्वरचित )

जय मां शारदे अग्निशिखा मंच दिन गुरुवार दिनांक 10 6 2021 चित्र आधारित रचना 

सोच रही है बूढ़ी काकी कैसी विपदा आई। 
इस पड़ाव में मिर्ची ने घेरा, जीवन भर रही मिठाई ।
मिर्ची में नहीं कड़वाहट इतनी, जो अपनों में हैं।
रहता था खुशहाल जीवन, अब तो सपनों में है। 
रिश्तेदारों,दोस्तों, बेच्चों ने मुंह फेर लिया ।
जर्जर काया हो गई मेरी बुढ़ापे ने घेर लिया ।
इंसान होकर भी सबने हाथ छुड़ाया। 
एक बेजुबान वानर ने, आकर ढांढस बंधाया। हाथ हिलाकर काकी पूछे वानर से ये सवाल ।
क्या तुम जानवरों का भी होता है यही हाल ।

रागिनी मित्तल 
कटनी, मध्य प्रदेश

मंच को नमन
विषय :-- चित्र पर आधारित रचना
              *लघु कथा*

अम्मा रोज अपने गांव के हनुमान मंदिर मे माता टेक कर मिर्ची की बोरी लेकर हाट  जाती है। शाम तक मिर्च बाजार में बिक जाती । शाम को लौटते समय बाजार से फल खरीद कर हनुमान मंदिर में देती है।
एक दिन हॉट में शाम तक कोई नहीं खरीददार मिला। अम्मा सोच रही थीं। कैसे होगा मंदिर का प्रसाद, कैसे जलेगा चुल्हा घर में...... कैसे होगें जीवन नैया पार चिंतित होकर सोच रही थी इतने में हनुमान जी बानर के रूप में एक हितैषी बनकर पुछे :-- अम्मा क्यों हो उदास? क्या करूं कोई खरीदार अब तक नहीं आया कैसे चढ़ाऊ मंदिर में प्रसाद, कैसे रोटी खाऊंगा। नहीं है कोई आसरा महंगाई की मार अलग से यह सुनकर वानर बोले मत हो उदास अम्मा को देता रहा ढांढस। प्रभु राम की कृपादृष्टि से बेड़ा पार लगेगा यह कहकर कंधे पर हाथ रखकर सफेद बालों से खेलते रहे। इसी बीच एक व्यापारी आया मुंह मांगा दाम दे कर पूरी मिर्ची की बोरी ले गए।
बांनर बोलें यह सब *राम प्रभु*  के कृपा है। रोज करो नित्य प्रभु राम की सेवा मां मत रहो उदास।
*प्रभु राम पर विश्वास करें वही है सब के रखवाला*।

विजयेन्द्र मोहन।

छवि विचार 

लगा कर हरी मिर्च का बाजार ,
 अम्मा कर रही ग्राहक का इंतजार ,
बेचकर जब पैसे दो आएंगे , 
पेट की आग बुझाएगी ,
सुबह से शाम भई ,
न कोई आमदनी हुई ,
होकर मायूस बैठी है ,
बेबस और लाचार ,
इतने में हनु रूपी एक बन्दर आया ,
शायद खुदा ने अपना दूत पठाया ,
अम्मा को ढांढस बंधाया ,
अच्छे दिन शीघ्र आएंगे ,
कोरोना को जल्दी भगाएंगे |

स्मिता धिरासरिया  बारपेटा रोड

चित्र पर आधारित रचना
#######
अपनों ने  छोड़ दिया साथ
किन्तु एक जानवर जिस की भाषा भी हम नहीं समझ पाते हैं दुर्दिन में आकर मेरा पकड़ लिया हाथ।
मूक भाषा में ही समझाता है माताजी 
मैं भी तो आपका ही अपना बेटा हूं
क्या हुआ ?म
बस करो हां नीना पहुंच जाऊंगा करूंगा सहयोग ही जितना कर पाऊंगा मानव की नियत आज बहुत खोटी है,
सोच उसके जीवन में बैठी बहुत छोटी है
आपका छूने पाएगा 
न कोई सामान
इतनी का ही मैं
रख पाऊंगा ध्यान
 आपने परिश्रम से मिर्चा उपजाया है 
मैंने तो हरदम ही मीठा फल खाया है
। आप करो बिक्री 
पाओ चार पैसे
जिंदगी बिताओ अपनी आप जैसे तैसे कष्ट नहीं दूंगा कुछ 
रखूंगा मान।
इतना तो मानो आदमी से ठीक है जानवर की जान पहचान
आपने दिया है मुझे प्यार बनूंगा मैं आपका रखवार।
+++++
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी




कौन सुने व्यथा इसकी ------ओमप्रकाश पाण्डेय

उम्र गुजार दी इसने सबकी 
सब  मांग पूरी करते करते
कभी अपने कोख में रखा किसी को
 नौ माह संभाल कर बड़े जतन से
कितने कष्टों को भी झेला खुशी से
पर आज जीवन के अन्तिम समय में
कौन सुने व्यथा इसकी......... 1
कितनी मनौतियां मानी इसने
मन्दिरों के चौखट पर मत्था भी टेका
पूजा अर्चना बहुत किया था इसने भी
कितनी रातें गुजारीं जाग कर
रोली गानें भी खूब सुनाया था
पर आज जीवन के अन्तिम समय में
कौन सुने व्यथा इसकी........ 2
अपना काट काट कर जीवन
जीवन दिया था  किसी को इसने
अपना ही दूध पिला पिला कर इसने
पाला पोसा था कभी किसी को इसने
एक एक कर सब अब बड़े हो गये
पर आज जीवन के अन्तिम समय में
कौन सुने व्यथा इसकी......... 3
महल दुमहले भी इसके थे
कभी तूती बोलती थी इसकी
ये भी किसी की पत्नी भाभी
माँ बेटी भी हुआ करती थी कभी
पता नहीं सब कैसे इतना  बदला
पर आज जीवन के अन्तिम समय में
कौन सुने व्यथा इसकी......... 4
नेताओं की लम्बी लम्बी बातें में
सरकारों की योजनाओं में भी
बार बार जिक्र होता है इसका
विधवा पेंशन वृद्धा पेंशन का
पैसा कौन कहाँ खा जाता है
पर जीवन के अन्तिम समय में
कौन सुने व्यथा इसकी........ 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)

10/06/2021
चित्राधारित कविता

स्वाभिमानी माई

कोरोना में मची तबाही।
कुटुंब मरा बची थी माई।।

भरा पूरा कुटुंब था इसका।
रिक्त हो गया अब यह रिश्ता।

करती क्या कुछ समझ न पाई। 
सब्जी लेके बैठी माई।।

इस उम्र में सहारा चाहिए।
अपनत्व तो मिलना चाहिए।।

रोज ज़रा सी सब्जी लाती।
तन में शक्ति कहाँ से लाती।।

स्वाभिमानी भूख की मारी।
बेच रही थी यह तरकारी।।

मानव में आई है पशुता।
मूक पशु है मानता प्रभुता।

कागजों पर मत लिखो भाई।
कर मदद पार होगी माई।

दबे उनके घाव न कुरेदो।
दे सको तो प्यार ही दे दो।। 

वैष्णो खत्री वेदिका 
जबलपुर मध्यप्रदेश

 नमन पटल
आज का विषय- चित्र आधारित रचना


बूढ़ी अम्मा बेच रही हैं,सड़क किनारे बैठ कर मिर्ची।
अपनों ने कर दिया पराया,व्यथा न देखी जाती उनकी।

जब तक चलता था हाथ पाँव, पति का सिर पर साया था।
माँ सबको अच्छी लगती थी, जबतक उड़ना न आया था।

कर दिए पंख मज़बूत माँ ने, उड़ने के काबिल हो गए।
माँ अब अनचाही वस्तु हुई, उसे घर से बेघर कर दिए।

अम्मा भी है स्वाभिमानी ,वो भीख कभी न  मांगेगी।
भले ही बेंचकर मिर्ची , वह जीवन अपना गुजारेगी।

अम्माँ के कंधे पर रखकर हाथ, हाल पूछता है बंदर।
माँ क्यों उदास हो रही, स्वाभिमान भरा तेरे अंदर।

बच्चों से भला तो ये बन्दर, जो माँ का हाल पूछता है।
माँ मैं हूँ  तेरा बेटा ! साथ, चिंता न करो ये कहता है।

मैं अपने कंधे पर बिठाकर ,तुझे यहाँ तक ले आऊँगा।
तुम बेचना बैठकर मिर्ची ,में फल तेरे लिए ले आऊँगा।

अम्मा बोली मेरे प्यारे बच्चे! तू ख्याल मेरा कितना रखता।
लोगों ने पेड़ काट दिए ,अब तू भी तो अक्सर भूखा रहता।

कोई बात नहीं बच्चे !अब मैं फल भी लेकर बेचूँगी।
पर तेरे लिए अलग से मैं, कुछ फल बचाकर रखूंगी।

मैं बनाऊँगी खाना ,अपने और इस प्यारे बच्चे के लिए।
दोनों दुनियाँ के ठुकराए ,इक दूजे के दिल को जान लिए।

स्नेहलता पाण्डेय  'स्नेह'
नई दिल्ली

चित्र पर आधारित  *कविता*

 जीवन के अंतिम पड़ाव में भी,
नहीं मिला  कभी मुझे आराम,
 मिर्ची बेच रही हूं  भगवान,
 कर रही हूं  अपना काम ।

मैंने बच्चे पाल दिए पर ,
उन्होंने घर से निकाल दिया ,
घोर कलयुग आया है  देखो,
इस उम्र में मुझे बेहाल किया।

 वानर राज मुझसे मिलकर,
 जागा है  मन में विश्वास ,
  तुम ही कुछ मदद करो,
 मेरा मन है बहुत  उदास ।

आखिर ऐसा क्यों होता है ?
जिनको अपना बसंत देते हैं,
वही  लोग हमारे जीवन को,
पतझड़  से  भर देते हैं ।

शोभा रानी तिवारी इंदौर मध्य प्रदेश

पावन मंच को प्रणाम मां शारदे को नमन🙏

चित्र पर आधारित रचना

तन से दीन ही पर मेहनत प्रभु कृपा बनी रहे,
 आस्था तुझ में ase ही  सजी रहे✒️

मन चंदन है मेहनत से करती अभिनंदन है ,
आंतरिक हौसला है यही तू कला है l
*पास में कपि वृंदा है यही सुख कंधा है*

ना समझो बेचारी यह दुधारी तलवार है जीवन अनुभावी है जो मन पर हावी है✒️

झुर्रियां भले आई है यह तो एक सच्चाई है l
इसका क्या सोग मनाऊं,
 यह न कोई आताताई है।
ना यह हरजाई है✒️

अंतिम सांस तक कर्म करना है, ऐसे ही जीवन को सजाना है,
 जीवन एक संग्राम है ,
ना यहां विश्राम है।
✒️✒️✒️✒️✒️
 स्वरचित कविता सुषमा शुक्ला

सत्य युग मे राम 
ने शबरी के झूठे
फल भी थे खाऐ।।

कल युग मे एक 
शबरी राम की 
राह तकी बस जाऐ।।

राम न आऐ तो 
अपना दूत भिजवाऐ
वानर रुप मे आ दूत
शबरी मां को समझाऐ।।

राम ना सही वानर
हनुमंत रुप मे तुम
ही कुछ फलफूल खाऐ।।

देख ये चित्र हम भी 
श्रीराम दूत को देख
नतमस्तक हो शीश झुकाऐ।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************

जय श्रीराम🙏🏻
जय-जय हनुमान🙏🏻

अग्निशिखा मंच नमन
10/6/2021 गुरुवार
विषय-चित्र के आधार पर रचना

नारी की त्रासदी

मनुष्य से अच्छे तो
ये पशु-पक्षी है,
जिन्हें पहचान है
सही ग़लत की।
वानर कुल में
 जन्में वीर हनुमान ने,
रावण की लंका में
माता सीता का
पता लगाया।
रीछ कुल में उत्प्न्न
जावन्त ने,
राम-रावण युद्ध में
राम सेना की
अगवानी की।
खग जटायु ने 
माता सीता की,
लाज बचाने के लिए
निडरता से,
लड़ते हुए अपने
प्राण न्योछावर कर दिए।
नन्दी हर क़दम पर
शिव के साथ थे।
विष्णु भगवान
सवार थे गरुड़ पर।
मूषकराज ने
कई बार,
गणपति को
संकट से उभारा।
पर आज आदमी,
आदमी के पतन का
कारण बन गया है।
हर युग में
पुरुष समाज ने
औरत को,
कमज़ोर समझकर
उसे प्रताड़ित किया है।
त्रेतायुग में 
रावण ने,
माता सीता का
छल से हरण किया,
पवित्र सीता को भी
अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी।
द्वापरयुग में
पांच पतियों द्वारा,
द्रौपदी को
वस्तु समझ कर,
जुएँ में दाँव पर
लगाया गया।
और आज
कलयुग में तो,
हद ही हो गयी
क़दम-क़दम पर,
नारी की अस्मत के साथ
खिलवाड़ किया जा रहा है।
दुधमुंही बच्ची को
नहीं छोड़ा,
 इन वासना के 
हैवानों ने।
अब तो इंसानों से
उम्मीद की 
उम्मीद भी टूट गयी है।
हमें स्वयं
लड़नी होगी,
अपनी लड़ाई।
शायद एक बार
फिर से ये अनबोले
पशु-पक्षी ही
हमारे जीवन का
सहारा बनें।।
                तारा "प्रीत"
             जोधपुर (राज०)

( चित्र पर आधारित )
        ‌  लघुकथा
       ----++++-----
     🌹रिश्ते नाते 🌹

     लगता है पिछले जन्म का तुम्हारा मेरा नाता है, तभी तो तुम रोज आते हो ,मेरी रोटियां खा जाते हो। मुझे भी बहुत अच्छा लगता है ।कम से कम तुम तो मेरी खबर लेते हो । मैं बूढी हूं, असहाय हूं । इन मिर्चियों को बोरियों में भरकर पैसा कमाती हूं और अपना पेट पालती हूं । मेरी रोटियों में तुम्हारी भी दो रोटियों का हिस्सा है। पर तुम क्यों रोज आते हो। क्या हनुमान जी तुम्हें मेरी मदद के लिए भेजते हैं। भगवान जी को मेरी कितनी चिंता है ,जो तुम्हें मेरे पास भेज देते हैं ।आज के जमाने में कोई किसी को नहीं पूछता । यह बड़ा मतलबी जमाना है। यहां सब मतलब के साथी हैं ।  पता नहीं तुमसे मेरा क्या नाता है। मुझे तुम से डर नहीं लगता बल्कि तुम्हारा आना मुझे बहुत अच्छा लगता है। क्या करूं ,जो अपनापन मुझे अपने बेटे से मिलाना चाहिए था, वह तुमसे मिलता है । खिलाकर रोटी तुम्हें मैं आत्मशांति पाती हूं। जहां अपनापन होता है वहीं प्यार मिलता है। हम दोनों प्यार ही के तो भूखे हैं । 
********************स्वरचित मौलिक रचना
डॉ आशा लता नायडू .
भिलाई छत्तीसगढ़.
********************


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