Type Here to Get Search Results !

लघुकथा प्रतियोगिता दिनांक 30 मई_dr Alka

अग्निशिखा मंच 
लघुकथा प्रतियोगिता 
30/5//2021
विषय - गंगा नहाना 
शीर्षक- 

चाय का कप डॉ शिवदत्त शुक्ल" को पकड़ा कर पास में रखा मोढ़ा सींच कर बैठते हुयें ऋषिकुमारी बोली कहाँ ध्यान रहता है आप का , दुनियाँ की लड़कियों की फ़िक्र हैं , घर में पाँच पाँच लड़कियाँ बडी हो रही है ...लड़का ढूँढना शुरु करो एक एक को निपटायेंगे तभी तो "गंगा नहायेंगे " 
पड़ोस की कमला ने एक लड़का बताया आप देख लेते तो ...
डॉ शिवदत् शुक्ल चाय का कप नीचे रख कर बोले सुनो "बड़की की माँ "मैं कोई लड़का नहीं देख रहा , मेरी फूल सी बच्चीयां हैं पहले खूब पढ़ाऊँगा फिर शादी की बात ...लड़कियाँ पढ़ जायेगी अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी समझो मैं "गंगा नहाया "शादी का क्या भरोसा ससुराल में क्या हो उनके साथ , पढ़ लिख जायेगी अपने पैरों पर खड़ी होगीं , समझदार बनेगी , तो ससुराल में सब सम्भाल लेगी "ये लड़कों की फ़ेहरिस्त लाना बंद करो और हाँ , कल गंगा नहाने की तैयारी करो तुम्हारी बेटी अनामिका का "एम बी. बी , एस ." में दाखला मिल गया , दूसरी अर्चना को आयुर्वेद मे, 
और अलका , अंजना टेबल टेनिस में सिलेक्ट हो गई नेशनल खेलने जा रही है अरुणा बी. ए . में फस्ट आई है "ये क्या शादी से कम है । 
तुम "गंगा नहाना "मेरी तो ये लक्ष्मी साक्षात "गंगा "है घर में 
मुझे कहीं जाने की जरुरत नहीं इनकी क़ाबिलियत देख लड़के वाले स्वयं हाथ माँगने आयेंगे । 
"ऋषि कुमारी ..आप लड़कियों को बिगाड़ रहे हैं , हम लड़की वाले है इतना घंमड ठीक नहीं ..
डॉ शिवदत्त शुक्ल , जाओ काम करो अपना मुझे कालेज जाने दो मैंने जो कहाँ वही होगा तुम शांत रहो बस ...
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

गंगा नहाना - अपना उत्तरदायित्व वहन करना 

लघुकथा

राधा रमनजी अपने शहर के एक मशहूर मिठाई वाले थे। उनके स्वयं के पांँच बेटे व एक बेटी थी और उनके छोटे भाई की आठ बेटियाँ और दो बेटे थे। राधा रमन जीऔर  छोटे भाई हरि कृष्ण दोनों मिलकर एक मिठाई की दुकान चलाते थे। हरिकृष्ण देवी की पूजा करते थे और उनके जब भी बेटी होती थी तो वे खुश होकर कहते  कि मेरे यहांँ तो लक्ष्मी मैया आ गई है । पाँच बेटी होने के बाद फिर एक बेटे का जन्म हुआ। हरि कृष्ण जी की पत्नी  ने कहा कि ऑपरेशन करवा लो पर हरि कृष्णने अपनी पत्नी की बात को टाल दिया। बेटे के बाद  तीन बेटियांँ और एक  बेटे का जन्म हुआ जब उनका छोटा बेटा  1 साल का था तब अचानक एक कार एक्सीडेंट में हरिकृष्ण जी की दोनों आंखें चली गई और वह चलने फिरने से भी लाचार हो गए। राधारमण जी ने उनका बहुत इलाज कराया पर हरि कृष्ण जी  के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ और अपने भाई के भरोसे हरे -भरे संसार को छोड़कर चले गए।
हरि कृष्ण  जब बीमार थे तब हरि कृष्ण की बड़ी बेटी की सगाई हो चुकी थी।  हरि कृष्ण के निधन के 2 महीने पश्चात राधारमण जी ने उनकी बड़ी बेटी की शादी की और एक साल बाद दूसरी बेटी की शादी की।  राधा रमन जी ने 3 बड़े बेटों की शादी के बाद मिठाई की एक दुकान और एक  रेस्टोरेंट खोल लिया। राधा रमन जी हर 2 साल या डेड़ साल में बच्चों की शादी करते रहे।
  जब  राधा रमनजी ने  अपनी सबसे छोटी बेटी की शादी की तो राधा रमन जी के साले साहब  बोले "जीजाजी अब तो आपने गंगा नहा ली "
राधा रमन जी बोले अभी कहांँ, जब तक मैं अपने छोटे भाई की सभी बेटियों की शादी नहीं कर.लूँगा।तब तक मैं गंगा कैसे नहा सकता हूंँ। राधा रमन जी अपने उत्तरदायित्व के प्रति ईमानदार रहे और वे दो- एक साल के बाद सभी बेटियों की शादी खुश होकर सुयोग्य घर -वर  देखकर करते रहे। राधा रमन जी की दो बड़े बेटे अपने पिताजी का बड़ा ध्यान रखते थे और  चचेरी बहनों की शादी में पूरा सहयोग करते  थे ।जब  राधारमण जी ने छोटे भाई की सबसे छोटी बिटिया की शादी की तो उस दिन वे बड़े खुश होकर बोले " आज मैंने सचमुच गंगा नहा ली है," कहते -कहते  उनकी आँखों में आँसू आ गए। राधारमन जी हरिकृष्ण की फोटो के सामने जाकर बोले हरे कृष्ण मेरे भाई मैंने अपनी पूरी जिम्मेदारी निभादी कछु  गलती हो गई हो तो माफ करना।। 


आशा जाकड़

अग्निशिखा मंच
 आज की प्रतियोगिता  गंगा नहाना

मोहन सरकारी स्कूल में शिक्षक था । उनकी एक बेटी मीना थी।उनकी पत्नी हाउस वाइफ थी।  मीन पढ़ने में बहुत होशियार थी, अच्छे नंबरों से पास होती थी ।मोहन जी मध्यम परिवार से थे, उनकी आय सीमित थी, इसलिए वे स्कूल के बाद बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे।
 मोहन जी मितव्यी थे ,और हर मां कुछ न कुछ रुपए बचाकर बैंक में जमा करते थे, ताकि बेटी के शादी के समय काम आ सके। मीना भी पढ़ लिख कर एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करने लगी। 

अब  माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी ।पता नहीं कैसा रिश्ता मिलेगा? कहां शादी जमेगी? कितना खर्च करना पड़ेगा? कैसा परिवार होगा? हमारी बेटी बहुत गुणी  है, उसके गुणों की ससुराल में सम्मान होगा या नहीं...।

 मोहन का दोस्त दीनानाथ अक्सर  मोहन के घर आता था ,उसका बेटा अनिल भी  इंजीनियर था। दीनानाथ को  मोहन की बेटी मीना बहुत पसंद थी, वह उसे अपने घर की बहू बनाना चाहता था। दीनानाथ ने मोहन से शादी की बात की, कि अगर आपको एतराज ना हो, तो मैं मीना को अपने घर की बहू बनाना चाहता हूं । मोहन यह सुनकर खुशी से उछल गया, क्योंकि  मोहन भी दीनानाथ जी के बेटे से परिचित था, अनिल  मिलनसार स्वभाव था ।""अंधा क्या चाहे दो आंख"" मोहन ने अपनी बेटी से राय लेनी चाही, तो मीना  शर्मा गई।इसका मतलब तो यह था कि मीना शादी के लिए तैयार थी। 
 मोहन जी ने सरिता से कहा ...हमने पिछले जन्म में जरुर कोई अच्छा काम किया होगा जो हमारी बेटी का रिश्ता घर बैठे बैठे हो गया । शुभ मुहूर्त देखकर बेटी की शादी कर दी। सभ्यता का व्यवहार, संस्कार का गहना ,और कर्तव्य का चादर ओढ़ाकर बेटी को विदा कर दिया। पति पत्नी दोनों दोनों एक दूसरे को इशारे से कह रहे थे,कि हमने तो गंगा नहा लिया ,और पति- पत्नी दोनों के आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210

🙏🌹अग्नि शिखा मंच को नमन🌹🙏
             🌲विधा - लघुकथा 🌲
       🌹विषय: गंगा नहाना --(अभिप्राय:दायित्व  से मुक्ति पाना)🌹
🌲
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता, मुजफ्फरपुर बिहार ~
        शीला आज बहुत खुश है,बहुत मन से सब काम काज कर रही है ,,,जीवन भर 
तो दुःख ही झेलती आ रही  थी,  जब से उसका पति गुजरा ,वह अपने  बच्चों  के साथ किसी तरह गुजर- वसर कर रही थी।
उसका पति सुरेश एक किराने की दुकान पर, सेल्स मैन था ,छोटी सी  आय थी ,
उसकी मौत भी सडक दुर्घटना में  हुई थी,  तभी से वह घर से बाहर निकलने  लगी थी,आखिर  तीन  बच्चे की परवरिश  कैसे कर पाती ? 
          अपने पड़ोस के  दो  घरों में  चौका- बरतन ,झाड़ू - पोछा का काम  पकड़  ली थी, दूसरा करती भी क्या ?
अपने दोनो बेटों को  सरकारी  स्कूल में 
 डाल रखी थी , लेकिन  दोनो मटर गश्ती करते। हमेशा आपस में  लड़ते - झगड़ते रहते  ।शीला इनसे बहुत परेशान रहती ,
किन्तु ,बेटी सुमन उतनी ही सुशील और काम-काजी ।वह अपने माँ के काम में भी 
हाथ बँटाती  ,दोनों  भाईयो से बड़ी भी तो थी ।अधिकांश लड़कियां  स्वभाव से  नेक 
होती है । 
       समय  बीतते देर  न लगी , सुमन अब सयानी हो रही थी, शीला को यह चिन्ता सता रही  थी ,कि कैसे इसकी शादी हो पाएगी,  घर मे तो फूटी कौड़ी  बचती ही नहीं है ।लेकिन भाग्य को किसने है,,,? 
     पिता के मरने के बाद बेचारी  पढ़ भी न सकी, लेकिन बाकी कामो में  निपुण थी, सुशील और सुन्दर  भी ।जिसके यहाँ 
शीला काम करती थी ,उसकी बहन आई 
गरमी की छुट्टियों में ,उसका बेटा भी साथ मे आया था ,अपनी मौसी घर ।  इनलोगो को सुमन का व्यवहार बहुत पसंद आ  रहा था, एक दिन आखिर बात  छिड़  गई ।शीला ने अपन मालकिन से चर्चा की,कोई गरीब का लड़का मिले तो इसकी शादी  कर दें, घर में सयानी लड़की  है! और फिर कौन सी कमाई है कि......उसकी आखों से आँसू निकल पड़े,,,, । मालकिन  की बहन ने रात में  इसके संबंध में अपने बेटे 
रोहन और बहन से  चर्चा की।  बात बन गयी ,जब बेटे ने हामी भर दी ।
     सुबह मे  जब शीला आई तो मालकिन  
ने रात वाली बात उसे बतलायी ,शीला को खुशी का ठिकाना न रहा , मालकिन   ने कहा जाओ , तुमने तो आज गंगा नहा लिया ,  झटपट काम से निपटकर  सुमन
को तैयार करो,,,आज उसकी मँगनी होनी है,,,,,इधर बहन भी अपने बेटे के साथ होने - वाली बहू के लिए  कपड़े- अंगूठी  लाने बाजार चली ।
🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏_________________________
स्वरचित एवं मौलिक रचना 
रचनाकार -डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार ---'
===========================
🙏 अग्निशिखा मंच की प्रस्तुत
विषय--- गंगा नहान ( लघु कथा )
अपने दायित्व से छुटकारा पाना।।

रामदेव  एक बहुत ही गरीब किसान था। उसके दो लड़के  और एक लड़की थी।
रामदेव मेहनत मजदूरी करके अपना परिवार का भरण पोषण करता था ।
दोनों लड़के एकदम निकम्मा कोई काम धाम नहीं था । उन दोनों के पास , राम दिन बहुत परेशान था। बिटिया की शादी करनी है । कैसे होगी दिन पर दिन बिटिया जवान होती जा रही थी । उसके सर पर एक बोझ था  कि इसके हाथ पीले कैसे किया जाए ।
बहुत सोच विचार करने पर किसी तरह व्यवस्था हुआ शादी विवाह  हो गया । ससुराल जाने के बाद एक वर्ष के पश्चात उसको बच्ची पैदा हुई , उसी समय रामदेव की बिटिया स्वर्ग सिधार गई । और इधर बच्ची अभी छोटी थी ।
उसके ससुराल के लोग  बच्ची को  रामदेव के पास छोड़ कर चले गए। रामदेव की पत्नी दो बरस पहले स्वर्ग सिधार गई थी।

उसका लालन-पालन रामदेव के उपर आ गया। धीरे धीरे वह भी जवान होती गई। एक अतिरिक्त बोझ रामदेव को संभालना पड़ गया। 
यही सोचता रहता है कि किसी तरह इस बिटिया का  भी मैं शादी करके गंगा नहा लूं  लेकिन भगवान को कुछ और मंजूर था। इसी चिंता में रामदेव स्वर्ग सिधार गया । उसका सपना अधूरा रह गया।
लेकिन इन दोनों निकम्मो ने किसी तरह भीख मांग कर उस बच्ची का शादी  विवाह किया और आज वह बिटिया सुख पूर्वक अपने परिवार में रह रही है ।
और इन दोनों जाहिलो को छुटकारा मिल गया। उस बच्ची की वजह से कि चलो मेरा दायित्व अब  समाप्त हो गया । क्योंकि मेरे बाप ने इस बच्ची को छोड़कर चला गया । अपना बोझ हम लोगों के उपर छोड़ कर।
अब हम दोनों भाई गंगा नहा लिए अपने दायित्व से छुटकारा पा गए।

उपेंद्र अजनबी 
गाजीपुर उत्तर प्रदेश

जय मां शारदे
************
 अग्निशिखा मंच 
दिन -रविवार 
दिनांक- 30/5 /2021 प्रस्तुत विषय *गंगा नहाना* पर लघु कथा
गरीबी से परेशान रामू बिटिया की शादी के लिए सभी से मदद मांग रहा था ।बड़ी मुश्किल उसने शादी का बंदोबस्त किया। शादी करके सोचने लगा अब तो मैंने *गंगा नहा ली* और वो बहुत खुश था। सभी मेहमान भी चले गए। कुछ ही दिनों बाद वो बेटी को लेने पहुंचा। उसे वहां बिटिया नहीं मिली। पुलिस का सहारा लेने पर पता चला कि दहेज कम देने की वजह से उन लोगों ने उसको घर से निकाल दिया ।रामू सोचने लगा इससे तो मैंने *गंगा ना नहाई*  होती तो अच्छा रहता ।

रागिनी मित्तल
कटनी मध्य प्रदेश

अग्नि शिखा मंच
३०/५/२१
लघु कथा प्रतियोगिता
विषय - गंगा नहाना 

गोपेश और लीला का जीवन काफी कठिनाइयों भरा रहा । तीन लड़कियां और एक लड़का । लड़का शुरू में तो पढ़ने लिखने में अच्छा था। उन्हें उससे से बड़ी उम्मीदें थी। संयुक्त परिवार में रहते हुए जैसे तैसे करके उन्होंने अपने दो लड़कियों की शादी कर दी । गोपेश कोई नौकरी धंधा नहीं करते थे ।केवल खेती बारी करते थे, जिसके कारण उनके पास आमदनी का कोई और जरिया नहीं था। लड़कियों की शादी करने के लिए उन्होंने  अपना खेत गिरवी रखा। जब एक बार खेत गिरवी रखना शुरू किया तो उसको भी छुड़ा ही नहीं पाए और लड़के की पढ़ाई और दूसरी बेटी की शादी के चक्कर में आधे से ज्यादा खेत गिरवी रखा गया। जो थोड़ा बहुत बचा उसमें जो अनाज हो जाता उसे खाने भर को ही पूरा नहीं पड़ता तो बाकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता। जो कि एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा लेते इस तरह से कर्जे में डूबी उनकी जिंदगी गाड़ी चल रही थी । लड़के का विवाह कर दिया उन्होंने। लेकिन एक साल के अंदर ही एक बेटे को जन्म देकर उनकी बहू गुजर गई ।अब उस छोटे से बच्चे की  पूरी जिम्मेदारी लीला पर आ गई । वह किसी तरह से छोटे से बच्चे को पाल पोस रही थी। बच्चा काफी बीमार भी रहता था । उसके लालन-पालन में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा, उनका बेटा भी ध्यान नहीं देता था। बाहर गया कमाने तो लौट के ही नहीं आया। कभी माता पिता की और बच्चे की सुधि नहीं ली। लीला हमेशा कहा करती थी बच्चा बड़ा हो जाए पढ़ लिख जाए तो मैं *गंगा नहा लूं* भगवान ने इसकी जिम्मेदारी दी है, तो पूरी भी करूं। उनकी छोटी बेटी भी विवाह योग्य हो गई थी ।  उस के विवाह की चिंता में ही कर्ज का बोझ छोड़कर गोपेश गुजर गए। अब लीला अपने गृहस्थी कैसे चलाएं ,बच्चे का पालन पोषण कैसे करें ? बेटी का  विवाह कैसे करें ?लेकिन फिर भी उन्होंने किसी भी तरह से अपना पेट काटकर बच्चे को बड़ा किया और अपने पढ़ाया लिखाया। वह  हाई स्कूल करने के बाद  एक मेडिकल स्टोर पर काम करने लग गया और साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी पूरे करने लगा। धीरे-धीरे पैसे जोड़ते हुए उसने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया अब घर की स्थिति थोड़ी ठीक होने लग गई थी । वह अपनी दादी को कहता था कि बस अब चिंता ना करो सब ठीक हो जाएगा , मैं पैसे इकट्ठा कर रहा हूं घर भी बनवा लूंगा जिससे बरसात में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी । उसने पाई पाई जोड़ कर अपना छोटा सा  घर भी बना लिया । लेकिन भाग्य की विडंबना देखिए लीला जो हमेशा उसकी तरक्की के सपने देखती थी और कहती थी कि तू नौकरी करने लग जाए तो *मैं गंगा नहा लूंगी*। उन्होंने आंखें बंद कर ली। अब वह एकदम अकेला हो गया। दादी को देख कर के रोने लगा कि आप तो कहती थी कि तू पढ़ लिखकर नौकरी करने लगेगा तो *मैं गंगा नहा लूंगी* यह क्या आप तो मुझे छोड़ कर चली गई। अब तो आपके आराम करने का दिन आया था। जीवन भर आपने काम किया था ।लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।

नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश





*मंच को सादर नमन* 
*विषय  गंगा नहाना - दायत्व से मुक्त होना*
*विधा    लघुकथा*
*दिनांक 30 / 5 / 2021*
 *दिन    रविवार*

स्मिता पढ़ाई में काफी तेज थी और वह मेडिकल की तैयारी बहुत ही जोश और लगन के साथ कर रही थी यद्यपि घर में भी सभी चाहते थे की वह एक अच्छी और सफल डॉक्टर बने।पर जब स्मिता लगातार 3 वर्षों तक मेडिकल की परीक्षा क्लियर नहीं कर पाई तो उसके मां पापा बाबा दादी सब को उसके बढ़ती उम्र के साथ उसके विवाह की चिंता सताने लगी।फिर उन्होंने तय किया कि स्मिता की शादी एक अच्छा घर-वर देखकर कर दिया जाए। परंतु जब भी कभी कोई विवाह का रिश्ता आता स्मिता उसे सख्ती के साथ मना कर देती और कहती कि जब तक उसका मेडिकल में सिलेक्शन नहीं हो जाता वह शादी नहीं करेगी। मां पिताजी सभी उसके लिए अब परेशान होने लगे और सोचने लगी कि क्या बिटिया मेडिकल नहीं कर पाई तो क्या सारी उम्र कुंवारी रहेगी? यह सोच सोच कर वे सब परेशान होते रहे परंतु स्मिता के लगन और मेहनत ने आखिरकार रंग दिखाया और वह मेडिकल की परीक्षा में अपने प्रांत में अच्छे नंबरों से सेलेक्ट हुई। अब स्मिता एक अच्छे मेडिकल कॉलेज में अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई को कंप्लीट कर रही थी।मेडिकल के अंतिम परीक्षा के बाद उसने अपने विवाह के लिए अपने पिता से वर ढूढ़ने की बात कही।यह सुनकर परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। और उन्होंने एक अच्छा डॉक्टर खोज कर अपनी बिटिया की शादी कर दी ।बिटिया को अपनी आंखों के सामने दुल्हन बना देखकर दादी की  खुशी का पारावार ना था । जहां मां पिता एक अच्छा वर पाकर प्रफुल्लित थे वहीं दादी यह सोचकर प्रफुल्लित थी कि अब उन्होंने गंगा नहा लिया।

*मीना गोपाल त्रिपाठी*
*अनुपपुर (मध्यप्रदेश )*

* अग्निशिखा मंच को नमन*🙏
  विषय-" गंगा नहाना"लघुकथा
##################
       बहू हो तो ऐसी
    *****************
करीब पैंसठ की उम्र जीते हुए दयानंद मिश्र  और उनकु पत्नी अनुराधा, "अपनी बहू वन्दना की तारीफ करते नहीं थकते".........
जब भी कभी उनसे मिलने कोई रिश्तेदार  या पड़ोसी  आ जाए.....तो "वन्दना की तारीफों की झड़ी लग जाती। आगंतुक भी रस लेकर वन्दना की खूब बड़ाई करते,और साथ ही अपनी पढ़ी-लिखु बहूओं का रोना रोते , कोसते.........
दयानन्द मिश्र सान्त्वना देते और कहते-"अरे भाई जमाने के साथ चलना सीख लो।बहू को बेटी सिर्फ कहो नहीं, उसे बेटी मानों भी। फिर देखना आपकी बहूएं भी वन्दना की तरह सेवा करेंगी।" "हां.... बिल्कुल.. स्वभाव तो अब हमको ही अपना बदलना होगा .....?"
 आज दयानन्द के एक मित्र सक्सेना उनसे मिलने आए थे।
आते ही बोले-"भाई दयानन्द! कहां ग‌ई वन्दना बिटिया......?आज तो उसने मुझे बेसन का हलवा खाने के लिए बुलाया था। कहीं दिख नहीं रही....? तभी अनुराधा अंदर से-बेसन का हलवा और नमकीन लेकर आती हुई बोलीं--"अरे  भाई साहब वन्दना ने आंफिस जाने से पहले ही बना लिए थे और कह कर ग‌ई है- .....कि अंकल को जी भर के गीला देना मांजी। तो लीजिए अपनी प्यारी बिटिया के हाथों का बेसन का हलवा..।" वन्दना आंफिस से आती ही होगी।अभी सब स्वादिष्ट हलुआ का आनन्द ही ले रहे थे तभी वन्दना भी आ गई। अंकल को चरण स्पर्श  किया और बोली-बाबूजी पहले आंखों में ड्राप डलवा लीजिए,यह कहते हुए वन्दना ड्रापर उठा ला‌ई। दयानन्द और उनके मित्र सक्सेना की आंखों में सजलता साफ दिख रही थी-वन्दना के कर्तव्य पालन से......."तभी अनुराधा बोली-बेटी धन्य हो ग‌ई तुझे पाकर मैं गंगा नहा ली"जा पहले  मुंह हाथ तो    धो लें,आते ही सबकी फिक्र करने लगती है...."।

डॉ मीना कुमारी परिहार

गंगा नहाना (अपने दायित्व से मुक्ति पाना) 

वर्मा जी के परिवार में दो बेटियां थी । जिस कारण सब उन्हें कहते कि तुम कैसे इनकी शादी करोगे। आजकल तो दहेज बहुत मांगते हैं और आपकी आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक ही है, जिस कारण वर्मा जी और मिसेज़ वर्मा को सदा अपनी बेटियों के भविष्य की चिंता रहती थी, क्योंकि वह मध्यम परिवार के थे । 
वर्मा जी अपनी दोनों बेटियों वर्षा और कुसुम को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे, और चाहते थे कि उनकी शादी अच्छे परिवार में हो जाए । जो ना सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम हो, जिसमें संस्कार भी हों । उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को अच्छे संस्कार दिए थे । 
आज के माहौल के हिसाब से उनका चिंतित होना जायज भी था । उनकी बड़ी बेटी वर्षा ग्याहरवीं मेंऔर कुसुम नौवीं में पढ़ रही थी । बड़ी बेटी डॉक्टर बनना चाहती थी और उसने ग्याहरवीं में बायलॉजी विषय लिया । वह पढ़ने में होशियार भी थी । वर्मा जी का संघर्ष और मेहनत रंग लाई और उनकी बेटी ने स्कॉलरशिप के साथ डॉक्टर की डिग्री हासिल कर ली । और फिर उसका अच्छे घर से रिश्ता भी आ गया ।उसकी शादी कर दी ।
छोटी बेटी कुसुम भी पढ़ाई में तेज़ थी । उसने बी.ए.सी.., एम.ए.सी.. किया और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गई । उसको भी एक अच्छे कंपनी में नौकरी मिल गई । जिससे वर्मा जी की चिंता कम हुई । कुसुम को अपने ही कंपनी में काम करने वाले एक साथी से प्यार हो गया और उसने अपने पिताजी से बात की । अच्छा लड़का और अच्छा घर मिलने के उन दोनों की भी शादी हो गई ।और वर्मा जी और मिसेज़ वर्मा जी को लगा कि आज उन्होंने गंगा नहा लिया क्योंकि दोनों को अच्छा घर परिवार मिला था । दोनों अपने परिवार में खुश थीं ।

रानी नारंग 
30-5-2021

जय मां शारदे
************
 अग्निशिखा मंच 
दिन -रविवार 
दिनांक- 30/5 /2021 प्रस्तुत विषय *गंगा नहाना* पर लघु कथा
गरीबी से परेशान रामू बिटिया की शादी के लिए सभी से मदद मांग रहा था ।बड़ी मुश्किल उसने शादी का बंदोबस्त किया। शादी करके सोचने लगा अब तो मैंने *गंगा नहा ली* और वो बहुत खुश था। सभी मेहमान भी चले गए। कुछ ही दिनों बाद वो बेटी को लेने पहुंचा। उसे वहां बिटिया नहीं मिली। पुलिस का सहारा लेने पर पता चला कि दहेज कम देने की वजह से उन लोगों ने उसको घर से निकाल दिया ।रामू सोचने लगा इससे तो मैंने *गंगा ना नहाई*  होती तो अच्छा रहता ।

रागिनी मित्तल
कटनी मध्य प्रदेश



*गंगा नहाना*

 'कितनी बार बोलना है इन लोगों को क्या हमारी भी इच्छाएँ हैं या नहीं ,जिंदगी भर इनकी बातें सुनतें बैठना  क्या ?' निशा ने अपने पति सुमित से अपनी नाराजगी जता रही थी।उत्तर में सुमित ने पत्नी को समझाते हुए कहा 'अरे, तू भी कैसी बात करती है ? अम्मा और बाबूजी को छोड़ के जाना अज्छा लगेगा ? और थोडे दिन सब्र करो , सब अच्छा हो जाएगा।शादी हो के दो साल ही बीतें हैं न।' निशा पति की बात को अनसुना कर दिया। जिद् करने लगी।उसे जायदाद लेकर शीघ्र ही अलग  घर में रहने का था। हर बात में परिवार के अन्य सदस्यों की तृटियाँ ढुंढ -ढूंढ कर झगडा करती थी।कभी किसी के साथ मिलकर बातें नहीं करती थी।सुमित भी समझा -समझाकर थक गया था। 
  सुमित के माता -पिता भी इन सब मगझमारी से मुक्ति चाहते थे।उन्होंने उस दिन  बहुत सोचा। और एक निर्णय लेने मजबूर हो गये।सुमित का बडा़ भाई अमित था स्वभाव से भोला था।उससे  बात करके दृढ निश्चय कर लिया।सुमित को एक छोटा बेटा था । अमित को बच्चे  नही थे । निशा इसका फायदा उठाने प्रयास कर रही थी।सासु माँ को यह सब पता चला । एक दिन बडे बेटे अमित से कुछ बातें की।दोनो एक अच्छा निर्णय ले लिया। कुछ दिन के बाद अमित भी अनाथाश्रम से एक  बच्ची को गोद लिया। नाम करण के दिन सब को निमंत्रण दे दिया।सब रस्में होते ही रात को सुमित की माँ ने सब को बुलाया।सास -ससूर ,अमित और उसकी पत्नी ,जो बच्ची को गोद में बिठा के बैठी, सुमित और उसकी पत्नी भी आये। सब में एक प्रश्न था कि क्यों बुलाया होगा? ' देखो बच्चों आप दोनो को मैं और आपकी बाबूजी बहुत प्रेम करते हैं। एक आँख को  चूना दूसरे को माखन नहीं लगा सकते हैं, और हम भी किसी पर अवलंबित नहीं होना चाहते।इसलिए वसियत नामा कराए हैं । उसमें दोने बेटे के बच्चों के नाम पर जमीन-जायदाद लिखाया है।और एक हिस्सा हमने भी रखा है,जो हमरी देखबाल करेगा उसे वह मिलेगा ।' सासु माँ की बात अभी पुर्ण  नहीं हुई थी, निशा का चेहरे का रंग बदल गया। माँ जी हम भी आपके साथ ही रहेंगे! है न सुमित ,पति के तरफ देखते बोली। सुमित का आश्चर्य का ठीकाना न रहा । वह फूला ना समाया। सास -ससुर मुस्काते बोलें 'आप की इच्छा । 'दोनो गंगा में नहा लिया अपनी जिम्मेदारियों से,अपने कमरे में चले और उस रात सुकून की नींद सोयें।

डाॅ सरोजा मेटी लोडाय

लघुकथा
विषय -गंगा नहाना
 शीर्षक - विश्वास
¥¥¥¥¥©©©©©©©

 अमावस्या के दिन गंगा नदी किनारे बहुत भीड़ थी | कोई नहा रहा था, कोई बच्चे को नहला रहा था, कोई पूजा आरती कर रहा था|
                  तभी अचानक किसी महिला के रोने की आवाज आई | वह रो रो कर कह रही थी मेरा पति डूब रहा है उसे बचाओ, पर यह क्या उसके पति इस धारा में डूब रहे थे | वहां जाने पर कोई खुद भी डूब सकता था
 इतने में एक युवा जाने लगा तभी उस मा ने रोका कहां नहीं
 मेरे पति को वही बचा सकता है इसमें कभी कोई पाप ना किया हो| यह सुनकर जो बचाने जाता वह भी लौट आता |
 इतने में एक आदमी ने आव देखा ना ताव वह तुरंत कूद गया और बूढ़ी मां के पति को बचा लाया
 इस पर बूढ़ी मां ने कहा तुम कैसे मेरे पति को बचा लाये |
 मेरे पति को तो वही बचा सकता था जिसने कभी कोई आप ना किया हो | वह आदमी जोर से बोला और हंसा कहने लगा अरे माई जो गंगा नदी में जाएगा तो वह तो वैसे भी पाप से मुक्त हो जाएगा तो मैं तुम्हारे पति को बचा लाया

 ऐसा विश्वास देखकर सभी अचंभित रह गए | वाकई यह सत्य है विश्वास
 ही हमें पापों से मुक्त करता है

¥¥©©©©©©©©©©

 कल्पना भदौरिया "स्वप्निल "
उत्तरप्रदेश

गंगा नहाना (दायित्व का निर्वाह करना)

 रामकुमार के दो बेटे और एक बेटी थी।
 बच्चे पढ़ाई में अच्छे तथा सुसंस्कृत थे जीवन ठीक से चल रहा था पर उनकी माली हालत ठीक नहीं थी, जैसे तैसे बमुश्किल ही उनका खर्च चल रहा था।
 रामकुमार जी हमेशा सोचा करते बच्चों को पढ़ा लिखा कर शान बनाकर उनका ब्याह कर दो तो मैं गंगा नहा लूं।
  समय बीतता गया पढ़ लिख कर उच्च पदों पर आसीन हो गया बहुत खुश थे रामकुमार जी ।आधी जिम्मेदारी से तो मुक्त हो चुके थे, पर उन्होंने अभी आधी जिम्मेदारी ही निभाई थी,  बच्चोंका शादी ब्याह करना बाकी था। कुछ ही दिनों बाद उनकी बेटी के लिए एक बहुत ही बड़े घर से रिश्ता आया काफी छानबीन के बाद उन्होंने बेटी का रिश्ता पक्का कर दिया बेटों के लिए भी बहुत अच्छे खानदान से संस्कारी बहू को ले आए। बच्चों को खुश देखकर मैं खुशी-खुशी कहते कि बच्चों को पढ़ा लिखा कर शादी ब्याह कर दिया अब तो मैंने गंगा नहा लिया, चैन की बंसी बजा सकता हूं।
 सोचता था कि इनकी मां के जाने के बाद मैं यह जिम्मेदारी कैसे निभा पाऊंगा की मदद से बहुत अच्छे से हो गया।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना




सभी की लघुकथा बहुत ही अच्छी है... कोई ना कोई संदेश देती हुई कथा में अपना कर्तव्य निभाया है ! समय ले आनंद से एक एक की पढ़ रही हूं! संचालन अच्छा रहा... आदरणीय हरडे़ जी एवं आदरणीय वल्लभजी ने समय सीमा में ही कड़ी को बांध अग्निशिखा मंच के साप्ताहिक कार्यक्रम (लघुकथा प्रतियोगिता) में सभी की लघुकथा की समीक्षा देते हुए जिस तरह प्रोत्साहित कर साहित्य प्रेमियों की लेखनी को गौरव दे शक्ति प्रदान की है तारिफे  काबिल है !

रानी अग्रवाल  का आभार व्यक्तव्य उनकी लेखनी और व्यक्तित्व को दर्शाता है ...बहुत सुंदर बधाई🌹👌👌👍🌹

अलका जी आपने मंच दे सभी की प्रतिभा को निखारने  का जो कार्य किया है, कर रही हैं, आशा है आगे भी करती रहेंगी... इसके लिए  मैं क्या हम सभी आपको नमन करते हैं! 
धन्यवाद 🙏

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई



Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.