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Thursday, 17 June 2021

अखिल भारती अग्निशिखा मंच पटल पर चित्र पर कविता दिनांक 17 6 2021 प्रेषित है Alka Pandey



अग्निशिखा मंच 
१७/६/२९२१
चित्र पर कविता 

चिडीया

दाना लाये चोंच में माँ 
बच्चों का उदर भरती माँ 
देख देख बच्चों को होती है निहाल ।
दाना पाकर बच्चे होते हैं खुशहाल ।।
बारिश की तैयारी है , घोंसला न्यारा है ।
हंसते हंसते सबको पालती 
कष्ट अनगिनत वह सहती
उड़ उड़ थक जाती गौरैया 
बच्चों को देख सब कष्ट भूलती 

माँ का बच्चों से रिश्ता बड़ा प्यारा है ।।
दूर दूर जाकर दाना ले कर आती ।
अपने सभी बच्चों का पेट मेहनत से भरती ।।
तभी तो वह जननी कहलाती हैं ।

चोंच है छोटी बच्चे कई सोच में पडती 
किसको खिलाऊँ , कैसे सबको शांत करु ।
बच्चे माँ को देख चू चू कर तिल्लाते सबके मूंह है खुले दाना पाने ।।
माँ ने जतन किया सबसे पहले छोटे को दाना दिया बारि बारि सबका पेट भरती 
दाना लाती चोंच में माँ 


बच्चों को उड़ना सिखलाती 
बच्चे जब उड़ जाते ख़ुश होती 
कर्त्तव्य पूरा कर मोह हटाती 
जीवन चक्र यू ही चलता सिखलाती 


चू चू कर सबको जगाती 
सूरज दादा से मुलाक़ात कराती 
काम पर चलो यही सिखलाती 
मेहनत से न डरो कभी बतलाती ।।
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷😺😺

चित्र देख कविता

रोजाना चिड़िया दूर - दूर तक उड़ कर जाती
ऊपर उड़ती ,नीचे उड़ती , नदी,पहाड़ लाँघती 
दाना चुगती  , नदी में पानी पी प्यास बुझाती।
,खुश होकर कुछ दाने वह मुंह में लेकर आती 

फिर आकर अपने बच्चों को प्यार से खिलाती।
बच्चे गौरेया को देख मुंह खोलते चीं -चीं करते
चिड़िया खुश होकर दाना उनके मुख में रखती।
चिड़िया फिर उड़ जाती और दाना लेकर आती।।


गौरेया हो या इन्साँ, मांँ तो आखिर मांँ होती है,
पक्षी हो या इंसाँ,ममता सभी में बराबर होती है।
सभी माताएँ अपने बच्चों को प्यार से खिलाती हैं
इन्साँ मेहनत कर अपने बच्चों का पालन करता है।

गौरैया भी उड़- उड़ कर बच्चों हेतु दाना लाती है 
नन्हें बच्चों को खिलाकर फिर उड़ना सिखाती है।
ऊपर - नीचे उड़- उड़कर दाना चुगना सिखाती है।।
नदी  में पानी पीना और पानी मे नहाना सिखाती है।

आशा जाकड़
,🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌷🌷🌷

आज का विषय और विधा : चित्राधारित कविता
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प्राक्कथन:  आज का चित्र कुछ ऐसा है कि मुझे बाल कविता शैली में लिखना ही श्रेयस्कर लगा। किंतु कविता में बड़ों के लिए भी संदेश है। समीक्षक महोदय अंत तक कविता अवश्य पढ़ें।
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शीर्षक : चिड़िया
🐦🐦🐦🐦🐦🐦🐦🐦
एक एक तिनका ला लाकर
छोटा गेह बनाती चिड़िया।
🐦
चंद दिनों के बाद घोंसले में
अंडे रख जाती चिड़िया। 
🐦
जब तक अंडों को सेती है
कम ही बाहर जाती चिड़िया।
🐦
जब बच्चे बाहर आ जाते 
तब सक्रिय हो जाती चिड़िया।
🐦
बार बार उड़ जाती चिड़िया।
चुन चुन दाना लाती चिड़िया।
🐦
बच्चे चोंच खोल देते हैं
उनमें भोज्य गिराती चिड़िया।
🐦
अपनी उसको फिक्र नहीं है
खुद भूखी रह जाती चिड़िया। 
🐦
सूरज के उगने से पहले 
रोज सुबह जग जाती चिड़िया। 
🐦
चूं चूं चूं चूं शोर मचाकर
हमको नित्य जगाती चिड़िया।।
🐦
बच्चों से ममता कैसी हो
सबको यह सिखलाती चिड़िया।
🐦
ज्योहीं बच्चे उड़ने लगते
उनसे मोह हटाती चिड़िया।
🐦
बच्चों से लगाव हो कब तक
यह शिक्षा दे जाती चिड़िया।
🐦
जीवन की परिभाषा क्या है
सबको बतला जाती चिड़िया।
🐦

डा. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

चित्र पर आधारित
गौरैया
मां तो मां होती उसकी
बच्चों में जान बसती है

हर दुख हंसते-हंसते झेले
बच्चों पे वारी जाती है

नन्ही गौरैया को देखो
दिनभर फिरती मारी मारी।

शाम पड़े जब घर आती
देख के मुखड़ा बच्चों का।

सारी थकान को भूल के फिर से
नन्हे बच्चों में रम जाती।

चुन-चुन कर मुंह में दाना देती
जी भर के प्यार लुटाती है।

नन्हे बच्चे जब बड़े हुए
ऊंची उड़ान भर जाते हैं।

देश तरक्की बच्चों की
मां मंद मंद मुस्काती है

वो दूर बुलंदी को छूते
मां एक टक तकती रहती है

ये जीवन का चक्र निरंतर
यूं ही चलता रहता है।

बिना किसी आशा के मां
अपना कर्तव्य निभाते हैं

मां तो मां होती है उसकी
बच्चों में जा बसती है।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश।

*गौरैया, चिड़िया* 
दुनिया कहती मेरी मां को गौरैया ।
पर हम सब कि है,वो प्यारी मैया।

रोज सवेरे वो,उठकर वो कही जाती,
चोंच मे दबाकर हमारा भोजन लाती।
फिर प्यार से वो, हम सब को खिलाती,
फिर,फिर उड़ जाती,फिर वो दाने लाती।

यही सिलसिला मां का जब तक है चलता,
तब तक हमसे हर कोई उड़ना नहीं सीखता,
ईश्वर ने भी दुनिया में,  मां को क्या है बनाया 
इंसान होया हो चिडिया,सब जगह एकही माया,
*जनार्दन शर्मा*
(संस्थापक अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य )

मांँ की सीख
************

मेरे प्यारो , आओ तुम्हें ,
मैं दुनिया से मिलवाती हूंँ।

संघर्ष इस जीवन के ,
मैं आज तुम्हें बतलाती हूंँ।

पंख फैला इन हवाओं में,
 उड़ना तुम्हें सिखाती हूंँ।

घर के बाहर की थोड़ी-सी,
 दुनिया आज दिखाती हूंँ।

हांँ मैं मांँ हूंँ फिर भी अक़्सर, 
पत्थर-सी बन जाती हूंँ।

ठेस न खाओ  इस जग में,
इसीलिए सख़्ती दिखलाती हूंँ।

आज जो संँग मैं हूंँ तुम सबके,
 तो दाना चुग कर लाती हूंँ।

 उन दानों से मेरे प्यारो ,
भूख तुम्हारी मिटाती हूंँ।

हाथ तुम्हारा थाम के मैं ,
ये विश्वास दिलाती हूँ।

हिम्मत से तुम जग जीतोगे,
 आज तुम्हें समझाती हूंँ।

रह न सकूंँगी हर पल संँग मैं,
 इसलिए पाठ पढ़ाती हूँ।

संघर्षों से लड़ना प्यारों ,
इसीलिए सिखलाती हूंँ।

ममता है भीतर  मेरे,
 पर मैं उसे छिपाती हूंँ।

देख के तुमको सक्षम-सा ,
मैं मन ही मन ख़ुश हो जाती हूंँ।।


©️®️ पूनम शर्मा स्नेहिल☯️
उत्तरप्रदेश गोरखपुर एमएम

विधा                                 कविता
____________________________
शीर्षक                चिड़िया का जीवन
🙏🏻_______💥✍💥______🙏🏻
कवि                   नरेन्द्र कुमार शर्मा
                          भाषा अध्यापक 
                      हि0प्र0शिक्षा विभाग
✍----------❤️🙏🏻❤️ ----------✍


------------चिड़िया का जीवन---------


तिनका- तिनका जोड़ के वो,
                   चिड़िया घोंसला बनाए।
कल को होंगे नन्हें बच्चे,
                    ये चिंता उसे सताए ।

छोटे-छोटे बच्चे उसके,
                     चीं-चीं कर चहचाए।
नहीं समझते नन्हें बच्चे,
                    माँ दान कहां से लाए।

बच्चों की खातिर दर-दर उड़ती,
                      चोंच में भोजन लाए।
बुढ़े-घने जंगल में चिड़िया,
                       मधुर गीत वो गाए।

मानव ने काटे जंगल आज,
                   वो आश्रय कहां बनाए।
प्रकृति से लगाव उसका,
                     प्रकृति उसको भाए।

बच्चो की खातिर मेहनत करके,
                   वो माँ का फर्ज़ निभाए।
पशु-पक्षी भी इतना समझे,
                 ये संदेश हमको बतलाए।
✍____नरेन्द्र कुमार शर्मा ____✍
🙏🏻❤️---हिमाचल प्रदेश---❤️🙏🏻

नमन अग्निशिखा मंच
विषय;-चित्राभिव्यक्ति
दिन ;-गुरुवार *(17/6/2021)
मैं माँ  हूँ तुम सबकी   बच्चों

तुममें जान मेरी है बच्चों
तुमसे ही तो लाड़ लड़ाऊं।
कभी प्यार से सहलाती हूँ 
कभी बोलना तुम्हें सिखाऊं।।
जन्म दिया तुमको है मैने
अपना सब कुछ वारि जाऊं।
तिनका तिनका जोड़ा मेनो 
किया घरौंदा ये तैयार ।
जिसमे रहे सदा सुरक्षित 
बच्चे मेरे हैं होशियार।
ढूंढ ढूंढ कर लाती दाना
क्षुधा तुम्हारी मैं मिटाऊं।
जब होंगे तुम कुछ तैयार।
पंखों फैला उड़ना सिखलाऊँ।
जन्म दिया तुमको है मैने
अपना सब कुछ वारि जाऊँ।।
निहारिका झा।।🌹🌹🙏🏼🙏🏼

9264108266       prof.pushpa Gupta
---------------------------------------------------
🌹🙏अग्नि शिखा मंच 🙏🌹
    🌳चित्र आधारित रचना 🌳
         ❤विधा:कविता ❤
      🌿  दिनांक :17-6-2021🌿
गौरैया की जोड़ी ने, बगान के
एक क्रोटन के पेड़ पर -
तिनका- तिनका जोड़कर
बना लिया है घोंसला 
यह घोंसला ऊपर से
उतना ही सुन्दर, सुघड़- घर जैसा 
भीतर से उतना ही,नरम और गुलगुल
अरे, इसके अंदर तो रूई भी पड़ी  है।
मैने अपनी प्यार  भरी आँखों से- 
देखा है यह सब,बचपन की नादानी थी।
जब माँ को बताया, घोंसले के बारे में, तो
माँ  अंदर से तिलमिला  गयीं
परन्तु प्यार से कहा- बेटा,
नहीं झाँका करते- घोंसले के अंदर
वह चिड़ियों का घर है-
कुछ दिनो के बाद देखा,
दो नन्हीं गौरैया,,चीं- चीं कर रही है
धीरे-धीरे  उसके पंख भी निकल रहे हैं 
जैसे ही दाना लेकर, आता है गौरैया
 नन्हीं - सी चोंच खोलती है,
नन्ही- नन्ही  गौरैया *
दाना खिलाता है पिता गौरैया 
माँ  गौरैया भी गई है ,दाना पानी लाने
वह भी डालेगी ,
अपने बच्चों के मुँह मे दाने.......×2
-------------------------------------------------
स्वरचित एवं मौलिक 
रचनाकार-डॉ पुष्पा गुप्ता मुजफ्फरपुर बिहार -

🙏🌹अग्नि शिखा मंच,🌹🙏 
     🙏🌹 जय अम्बे, १७/६/२१🌹🙏,
      🙏🌹 चित्र पर आधारित रचना, 🌹🙏

भूखे हो गये छोटे बच्चे,मां को याद करते है, 
चोंच मे दाना लाई मां, बच्चों के मुँह में देती है, 
पहले मुझे देना कहकर, हर बच्चे चिल्लाते है, 
चीं, चीं, चीं की सुर सुनकर, मां मन में हर्षित है, 

धैर्य रखना मेरे बच्चे, सबको खाना देना है,
दूर से में लेकर लाई, दाना तुम्हें खिलाना है, 
मिलता नहीं दाना बेटा, दरवाजा सब के बंध है,
कोविड की महामारी में, घर में मानव कैद है, 

प्यार से रहना बाते करना,सब को खाना देना है, 
हिम्मत और धैर्य से, मुश्किल में खुश रहना है, 
मां हूं में तुम्हारी बच्चों, रक्षा की जिम्मेदारी है, 
देखो बहूत दाने मेरे, मुंह में भरकर लाई है, 

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल🌹🙏

चिड़िया मां
चूं चूं कर लाई दाना
बच्चों को खिलाई दाना
अभी उड़ नहीं सकते 
इनके पंख नहीं है बढ़े
अभी तुम  बच्चे हो 
 दुनिया के हिसाब से बहुत छोटे हो
 अभी तुम्हारी परवरिश मुझे करनी है
बड़े होने तक तुम्हारी  जिम्मेदारी मुझे लेनी  है
दुनिया में जीने लायक तुम्हे बनाना है
इंसानों के बीच कैसे रहना है
ये बताना है
मां हूं कैसे छोड़ दूं तुम्हें अकेला
मां पर तो बच्चे का‌ अधिकार
सदियों से है
फिर चाहे ओ भगवान हो,
चाहे इंसान ‌हो
या फिर चाहे पशु
या फिर हम पक्षी हो
सभी मांओं में ममता एक जैसी होती है
क्योंकि सभी मांओं को भगवान ने एक जैसे बनाया है
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर छत्तीसगढ़

जय मां शारदे
***********
 अग्निशिखा मंच 
दिन -गुरुवार
 दिनांक- 17/ 6/ 2021 चित्र आधारित रचना

 इंसान हो, जानवर हो या हो पशु पक्षी,सब में मां जैसा नहीं कोई सानी।
देखो तो कैसे अपने बच्चों को दाना खिला रही है चिड़िया रानी।
आसपास में घूम-घूम कर चोंच में दाना लाती ।
भूखे ना रह जाए बच्चे मेरे प्यार से उन्हें खिलाती।
बच्चे भी राह तक रहे हैं, मां मेरी आएगी ।
हम भूखे नहीं सोएंगे,मां कुछ तो दाना लाएगी ।
जब आई चिड़िया, बच्चों ने मुंह खोला।
खिला रही है मां उनको और प्यार से ये बोला। 
पालूंगी पोसूंगीं उड़ना भी मैं सिखाऊंगी ।
बच्चों इस गगन में राज्य करना सिखाऊंगीं।

रागिनी मित्तल 
कटनी ,मध्य प्रदेश


नमस्ते मैं ऐश्वर्या जोशी अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु मैं मेरी कविता प्रस्तुत करती हूं।
विषय- चिड़िया रानी

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
एक एक तिनकी से 
बनाती अपना सारा घर
घर भी बड़ा प्यारा लगे हमें।

चिडिया रानी चिड़िया रानी
नन्हें नन्हें पाओं से 
घर का हर एक कोना 
सपने जैसे सजाती।

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
एक-एक दाना संभाल कर
लाती तू घर 
बड़े प्यार से खिलाती 
अपने बच्चों को 
उसी में आपको आनंद आता।

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
बहुत अच्छा जीवन तेरा
ना आज की चिंता ना कल की
सिर्फ मुक्त आकाश में 
उड़ती सदा।

चिड़िया रानी चिड़िया रानी 
हम मनुष्य को आकाश में
छलांग लगाना सिखाती हैं
और तो और चू चू आवाजों 
से हमारा दिन बनाती है। 

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
बड़े ढंग से रहती सदा 
हम मनुष्य को पसंद है
तेरी हर एक अदा।

धन्यवाद
पुणे

$$ उदास चिड़िया $$

उदास चिड़िया सोच रही
देख रही चूजों की ओर 
दिनभर मैने भरी खूब उड़ान 
ला पाई मे सिर्फ एक दाना
भूख सभी को लग रही 
तीनो हो रहे बेहाल
किसको दूं ये एक दाना 
सोचकर यही हूं परेशान 
जंगल कट गये बचे नहीं पेड़
वातावरण बिगड़ रहा
इंसान कर रहे पाॅलीथीन का
खूब उपयोग 
हवा अशुद्ध, पानी मे जहर है
धरती के कण कण मे कहर है
सोच रही क्यों जन्म दिया तुमको
किया मैने  विवश रहने को 
दूषित वातावरण मे जीने को
भर नही सकती जब पेट तुम्हारा 
तो हो जाती मैं बैचेन यहाँ
अब हम मिलकर करेंगे 
धरती को सुंदर मनोरम
समझाएंगे मानव को
पर्यावरण की रक्षा के बारे में
अभी तुम काम इसी से लो चलाय
हम बचाएंगे पेड़ और जीवन सबके
हम बचाएंगे पेड़ और जीवन सबके

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
चित्तौड़गढ़ राजस्थान

मंच को नमन 🙏
17/6/21
चित्र पर आधारित रचना
*********************
गौर चिरैया
*********
ओ री पंछी प्यारी गौर चिरैया
 तू कितनी भोली -भाली
चीन -चीं करती चुग रही
मेरी भोर की गौर चिरैया
अपने बच्चों को उड़ना सिखाती गौर चिरैया
उसके बच्चों की चीं-चीं
चहकती फुदकती गौरैया
फुदकती फिरती यहां वहां
और फुर से उड़कर
जा बैठती बच्चों संग
तिनका-तिनका जोड़कर
बरसाती उसमें अपना घोंसला
बच्चों को चोंच से चुग्गा खिलाती गौरैया
अपने बच्चों को खूब भाती गौरैया
चाहे जैसे नाच-नाचकर
चाहे जैसे चुहचुहाती हो अपने घोंसले में
ओ री गौरेया क्यों नहीं गाती अब तुम मौसम के गीत
अपने बच्चों को भी सिखा देना संग -संग चहचहाना और  नाचना
तूने बखूबी निभाया है अपने बच्चों के प्रति  कर्तव्य
सदा तू रहे आबाद ओ री गौरेया!

डॉ मीना कुमारी परिहार

गौरैया सोच रही 

गौरैया चोंच में दबाकर लाई
घास  का  तिनका  हरा- हरा 
बच्चे उछल- उछल मुंह खोलें
मम्मा हमको दे दो पहले पहले।

गौरैया गहन सोच में  डूब गई
धैर्य से खाओ बच्चों जल्दी से
मुझे काम  बहुत  सारे  हैं और 
क्या जाने कब छिन जाए ठौर।

आज  मानव को  देखा आते  हुए
हाथ  में  कुल्हाड़ी को  पकडे़  हुए
कब यह वृक्ष धराशायी  हो जाएगा
मुझे बनाना है इक,आशियाना नया। 

मेरे  पास कुछ,खजाना जायदाद  नहीं
मैं हूँ इक पंछी, मेरी कोई औकात नहीं
चलो मैं  एक  प्यारी लोरी गुनगुनाती हूं 
नन्हे-मुन्ने सो जाओ, तुम्हें मैं सुलाती हूं।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
17-6-21

     ।अग्नि शिखा मंच ।
चित्र पर आधारित कविता।
यह चिड़िया भी खूब है,
कैसे बच्चों को खिलाती है।
कहां कहां से दाना लेकर,
इन छोटे बच्चों को चुगाती है।।
यह चिड़िया.............…. 1 
जैसे बच्चे थोड़े बड़े होते है,
चिड़िया उड़ना सिखाती है।
तेज हवा पानी के थपेड़ों से,
दुख सहकर उनको बचाती है।।
यह चिड़िया.................. 2 
मां का यह पवित्र स्वरूप,
जीवन की राह दिखाती है। 
अनजाने मां को हम भूलकर, 
क्या नहीं करते ज्यादती है।। 
यह चिड़िया................. 3
मां सेवा कर भूल जाती है, 
अपना कर्तव्य खूब निभाती है। 
संतान अपना फर्ज भूलकर, 
पाप की बढाये वह थाती है।। 
यह चिड़िया................... 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
कोपरखेराने, नवी मुंबई ।

अग्नि शिखा 
नमन मंच
दिनांक--: 17/6/2021
विषय--: चित्र पर आधारित

बाथरूम की खिड़की से 
हर वक्त सुनु मैं चूं चूं चूं
  उनकी रात दिन की 
    अविरत चूंचूं सुन
सोचा चढ़कर देखूं खिड़की में  
     उठकर देखा तो 
मां की ममता बैठी थी उस पर 
अपने गले से रस निकालकर 
बच्चों को मुख में देती थी !

इधर-उधर जो बच्चा होता 
 तुरंत संभाल लेती थी उनको 
 मां-बाप दोनों सेते थे उनको 
 बढ़कर क्या दे जाते थे वोउनको
पंखों के आ जाने तक ही
 रहता उनका रिश्ता है 
  निःस्वार्थ की भावना लिए
 ये बच्चे फुर्र से उड़ जाते हैं 
पुख्त वय में आते ही
चक्र वही दोहराते हैं और
अपने बच्चों को भी
वहीं निस्वार्थ प्यार दे पाते हैं 

          चंद्रिका व्यास
         खारघर नवी मुंबई

अग्निशिखा मंच को नमन🙏🙏
चित्र पर आधारित कविता

जाना है घर जल्दी
बच्चे भाट देखें मेरी।
दूर दूर तक जाकर आई
चोंच में दाना भर लाई।।
दूर से देख बच्चे खुशी से पुकारे
देखो देखो मां आई
तीनों के लिए दाना लाई,।।
हम सबकी भूख मिटेगी
जब मां खाना खिलाएगी।
दाना देख लड़ते आपस में
पहले तू पहले मैं।
मां कहती सबको मिलेगा  दाना
ना लड़ना कभी आपस में।।
बच्चों का पेट भरती
ध्यान सदा बच्चों की रखती,।।
पानी पीकर अपनी भूख मिटाती
क्योंकि आज मिला है दाना कम।।
गर्मी ,वर्षा ,सर्दी से ना डरती
 बच्चों को देख अपना दर्द भूलती।
 
प्यार से सहलाती पास में बैठती
सुनती उनके किस्से दिनभर की।
चंदा मामा को दिखलाती
लोरी गाकर उन्हें सुलाती।
सोचती औ कहती _--------
कल फिर जाना है काम पर
खाना लाना है पेट भर।।

 डॉ गायत्री खंडाटे
 हुबली कर्नाटक।

चिड़िया माई
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय_चित्र पे कविता_
चिड़िया माई
[Image 396.jpg]
प्यारे बच्चों,मैं तुमरी माई,
चोंच में भरकर चुग्गा लाई।
तुम जन्मे प्रसव_ पीड़ा हुई,
फिर भी उड़कर मिलों गई।
मां हूं ,समझती हूं,तुमरी रुलाई,
भूख की तड़प, मां से जुदाई।
लो मुहूं खोलो,चुग लो दाना,
यहां न कोई तुमरा नानी_नाना।
धीरे_धीरे तुम बड़े होओगे,
अपने पैरों पर खड़े होओगे।
गिरे तो मैं ही संभाल लूंगी,
मैं ही तुम्हें उड़ना सिखाऊंगी।
जब उड़ जाओगे छोड़ मुझे,
मैं पीछे_पीछे न आऊंगी।
न रहेगा तुम्हें मुझसे मोह,
न सताएगा मुझे तुमरा बिछोह।
मानव बस ये एक यही सबक,
हमसे सीख ले,
अपनी औलाद से बिछड़ने पर,
रोना_धोना छोड़ दे।
तुम मुक्त गगन में विचरण करना,
स्वतंत्र घूमना,न इस घोंसले में लौटना।
फिर तुमभी ऐसा घोंसलाबनाओगे
तिनका_तिनका जोड़  सजाओगे।
फिर शुरू सृष्टि का वही चक्कर,
अपनी रह चुनना, ना हो टक्कर।
बस यूं ही सब चलता रहता है,
किसी के लिए ना कोई रुकता है।
है चिड़िया भोली,कोई सयानी है,
है बेईमान,कोई ईमानी"रानी"है।
स्वरचित मौलिक रचना___
रानी अग्रवाल ,मुंबई,१७_६.२१.

अग्निशिखा मंच को नमन
विषय :- *चित्रपर आधारित,रचना*

मां पशु पक्षी की हो या मानव की
वह सबको खिलाती रहती है
उसकी ममता है बहुत प्यारी न्यारी
वो बच्चोंके लिए दुख सहती है।1।

दाना पानी के लिए वो जंगल जाती है दाना,लाकर अपने बच्चों को वह खिलाती है पेड़ों पर बनाती हैं वो  घोंसले अपने बच्चों को सुरक्षित पालती ।।2।।

चोंच में लाकर पानी बच्चों को पिलाती दूर कितनी भी वो जाए मगर शाम को वापस आती 
भूख से व्याकुल बच्चों को शांत कराती, यही है मां  की ममता।3।

कभी-कभी वह अपने बच्चों को गाना गाकर सुलाती,दिनभर माता थककर रात को सो जाती फिर सुबह हुई तो दाना पानी के लिए बाहर निकल जाती।।4।।

जब जाती जंगल में, नन्हे  मुन्ने
को हिदायत देती मत निकालना
घोंसले के बाहर, पेड़ पर है
नागराज यह डर बताती है।।5।।

जब कोई, नहीं मिलता दाना
फिर भी बच्चों के लिए लाती 
दाना, दस बार जाती इस पेड़
से  उस पेड़ फल, के छोटे छोटे लाते टुकड़े खिलाती बच्चों 
फिर वह खाती यही है मां की ममता।।6।।

जब तक बच्चे उड़ न पाते तब तक खिलाती है दाना जब बच्चे को लगती प्यास नीचे आकर अपनी चोंच में एक एक पानी बुंद से प्यास बुझाती यही है प्यार की ममता।।7।।

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर ,महाराष्ट्र
दिनांक 17/06/2021

आदरणीय मंच को नमन
चित्र पर आधारित रचना
*******
अम्मा आई, अम्मा आई।
चोंच में अपने दाना लाई।।
पेट हमारा खाली खाली
करेगी अब उसकी भरपाई
अम्मा आई, अम्मा आई।।
++
जाने कितनी दूर गयी थी
बारिश में भी भींग गई थी
खोज कर चारा भरी चोंच में
धीरे-धीरे उड़ आई थी
कोई और कौर न जीने
जाने कितनी उड़ी उँचाई।
अम्मा आई, अम्मा आई।।
+++
बार बारी देगी हमको
तंग नहीं तुम करना उसको
तुम छोटे हो पहले तुमको
फिर वह चुग्गा देगी मुझको
नहीं हमें आपस में लड़ना
हम-तुम दोनों भाई भाई।।
अम्मा आई, अम्मा आई।।
-------
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी
शैलेश

बच्चे मां को देखकर चूंचंू का शोर करते हैं 
जैसे कहते हो मानो पहले मुझे पहले मुझे पहले मुझ
े किंतु मां देती सब को एक
 साथ और समझात
ी समझदारी की बात 
क्योंकि वह मां है
 मां कितनी भी मुश्किल से क्यों ना लाई दाना
 परदेती सबको बराबर से अपनी चोच से दाना

 मा में ममता बसती है
 बच्चों का कलरव उसे भाता है अपने बच्चों की खातिर वह  आँधी, तूफान,हो पानी धूप बरसा कुछ ना जानती है
 सब सह कर भी
 अपने बच्चे को 
भोजन लाकर खिलाती है
मां की ममता बड़ी महान 
ना जाना कोई इसका राज,
 ी यह तो मां ही मां जाने 
मां की ममता बड़ी महान
🦉🐥🦅🦇🦆
 कुमारी  चन्दादेवी स्वर्णकार जबलपुर मध्यप्रदेश

अग्निशिखा मंच 
विषय---चित्र पर आधारित
शीर्षक----चिड़िया 
दिनांक---17-6-2021

                                चिड़िया 

चिड़िया का चहचहाना मेरे आंगन को सजाना 
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

घर के आलने में वह घोंसला बनाती 
तिनका-तिनका जोड़ घर को वह सजाती
सुबह चीं चीं से उसकी, नींद का खुल जाना
आता है याद मुझको, बीता हुआ जमाना ।

चिड़िया और चिड़ा की प्रेम कहानी 
चुगते थे मिलकर वो सदा  दाना पानी 
फिर उनके घोंसले में छोटे-छोटे बोट मुस्कुराना 
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

चहचहाने में उसके संगीत सुन लेते
  फुदकती थी जब वह हम  मुस्कुरा लेते
कभी पूरे घर में उसका चक्कर लगाना 
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

दाना पानी उसके लिए हम भी रख देते 
आते-जाते उसका अपने बच्चों को खिलाना
फिर बच्चों का भी चीं चीं कर शोर मचाना 
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

बच्चे धीरे-धीरे सीख रहे पंख फैलाना 
हो जाएँ जब बड़े तो उनको है उड़ जाना
उनको अपना अलग आशियाना बनाना
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

अब ऊँची-ऊँची बिल्डिंगों ने उनका आशियाना छीना
शहरों से दूर हो गई रहा उनका ना ठिकाना
चाहता है दिल फिर से उनको ढूँढ लाना
आता है याद मुझको बीता हुआ जमाना ।

                     रानी नारंग


अग्निशिखा मंच
तिथी,, १७,६,२०२१ 

            मां

आज ‌‌सोच में पड़ी है ‌ये मां
‌दाना किस‌को ‌‌खिलाऊं
ती‌नो बच्चे भू‌खे मे‌रे
किसका पेट भराऊं।

चींचीं ‌‌चूंचूं ‌शोर‌ करें ‌वो।
पहला खाना  मुझ‌को ‌‌दे ‌दो।
मां तू खाना कम क्यों लाई
जाने तू, सब ले लेता ‌भाई।
 
बारिश बहुत ही तेज पड़ी है।
किसी को ‌किसी की पड़ी नहींं है।
मुश्क़िल से मिला है एक दा‌ना।
तीनों ने है भूख को जाना।

जब पेट की आग जल उठ‌ती है,
 सबको बस अपनी ‌भूख दिख‌ती है।
भूख ‌से ऐंठती आंतों ने आवाज़ लगाई,
भूख बड़ी है ‌ना छोटा ना बड़ा ‌भाई


समझदारी ‌दिखाई छोटे ने
‌चूं ‌चूं कर ‌के ल‌गा बोलने।
मां तू क्यों रो‌ती है, 
मुझे भूख नहीं लगी है।

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र

वीना अचतानी, 
चित्र  पर आधारित रचना ।
 *******चिड़िया  ******
कविता  की 
रस धार तुम हो
चहकन की मिश्री 
ममता  की धार 
 तुम  हो
 चूं चूं करके 
 चोंच मे दाना 
  भर लाती हो
  बच्चों को खूब
  खिलाती हो
  तिनके चुन चुन कर
  सुन्दर  घर बनाती हो
  धूप  बारिश आँधी से
   छुपा कर अपने पंखो तले
   बच्चों को बचाती हो
   माँ  की ममता है तुम में 
    कलरव की बँसी हो तुम
     चहक चहक कर 
     हर्षाती हो।।।।।।
 वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।

चित्र आधारित कविता

एक चिड़िया के बच्चे चार , 
 घर से निकली पंख पसार ,
 पूरब से पश्चिम में आई उत्तर से दक्षिण में आई घूम घाम जब घर पर आई , 
 बच्चों के लिए चुग्गा लाई  , 
चूं चूं करते बच्चे चहके,
 भूख प्यास से बिलखे बच्चे ,  
चौंच पसारे खाना मांगे ,
 चिड़िया सोचे किसको दूं पहले ,
 सबको देकर शांत करती  , 
आपस में प्रेम भाव है भरती , 
 मिल जुल कर रहना सीखलाती ,  समय-समय पर प्यार दर्शाती , 
 उड़ने की कला भी उन्हें सिखाती ,
पंछी के सब गुण सिखलाती, 
 चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
बच्चों के लिए चुग्गा  लाती,
चूचू करके गीत सुनाती.

स्वरचित कविता
रजनी अग्रवाल जोधपुर

अ. भा. अग्निशिखा मंच
गुरुवार -17/ 6/ 2021
विषय- चित्र पर कविता
चिड़िया रानी


चिड़िया चीं चीं करती है। 
सबका मनोरंजन करती है।

तिनका-तिनका नीड़ बनाती।
बच्चों को वह वहाँ सुलाती।
अपना सारा प्यार लुटाती।
उनको उड़ना भी सिखाती।

चिड़ा भी काम में लग जाता।
वह भी दाना चुनकर लाता।
सुबह सवेरे उड़ जाती है।
दाना चुन कर लाती है।

चिड़ी आती कुछ दबाए।
बच्चे सुख से दाना खाएँ।
छोटे बच्चे मुँह को खोले।
चीं चीं भाषा में माँ बोले।

सुबह सबेरे उठ है जाती।
कलरव कर सबको जगाती।
जब आती है बिल्ली रानी।
तेज होती है उसकी वाणी।

जब चिड़ी का खतरे में होती।
ऊँचे स्वर में सब को बुलाती।
सबसे प्यारी सबसे दुलारी।
सबसे है यह न्यारी न्यारी।

वैष्णो खत्री वेदिका

जीवन की एक  ही‌  रीत,
पक्षी हो या प्राणी मां देती है सीख

घोसला में नन्ही नन्ही चिड़िया
उड़ नहीं सकती प्यारी चिड़िया।

गाना चुग कर लाती मां चिड़िया
नन्हे नन्हे बच्चों को खिलाती चिड़िया

सहयोग करना सिखाती चिड़िया
संघर्ष करना सिखाती चिड़िया

सुबह उड़ जाती है चिड़िया
शाम ढलते दाना लेकर आती चिड़िया

गर्मी सर्दी मे पंखों से बचाती चिड़िया
तिनका चुनकर घोंसला बनाती चिड़िया

अपने घर में दाना पानी रखो
   चिड़िया आएगी शोर मचाएगी
     ची ची कर दाना चुनेगी
‌‌       पानी पीकर प्यास बुझाएगी
बच्चों के लिए दाना ले जाएगी
सबके मन को खुश कर जाएगी


कुमकुम वेद सेन

गुरुवार दिनांक १७/६/२१
विधा ******कविता
विषय***
#**चित्र पर आधारित रचना**#
               ^^^^^^^^^^^

मां  अन्नपूर्णा  है  सबको खिलाए ।
मां  दयालु  है  वो  देवी  कहलाए।। 
खुद भूखी  रह  जाए  माता मगर ।
अपने  बच्चोंको भूखा  ना सुलाएं ।।१

वो  बुलबुल  हो  या   गोरैया  मैना ।
उसे  बच्चोंकी  चिंता  रहे दिनरैना ।।
दिनभर दाने  पानीका जुगाड़ करे ।
बच्चों को खिलाये बिन पड़े न चैना ।।२

वो दयालु शुभचिंतक है हितकारी ।
वो जननी  है  वही  है पालन हारी ।।
इसलिए कह  गए  ज्ञानी मां बिना ।
स्वामी तीनों लोक का  है भिकारी ।।३

बच्चों के लिए वह हर दर्द सहती है ।
जिंदा रख्खे  बच्चोंको खुद मरती है ।।
कामपर तो जाती छोड़कर उनको ।
पर आंख उन पर ही टिकी  रहती है ।‌।४

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
         महाराष्ट्र

अग्निशिखा मंच 
17/6/2021 गुरुवार
विषय-चित्र आधारित रचना

ममता

चुन-चुन कर
तिनका-तिनका,
पंछी ने
नीड़ बनाया।
कपड़ों की चिन्दियों 
उलझे धागों से,
फिर उसे सजाया।
अपने होने
 वाले चूजों की
सुरक्षा के लिए,
अपने जीवन का
पल-पल लुटाया।
अपने ज़िस्म की
गर्मी देकर,
सेती रही अंडे।
और एक दिन
चीं चीं करतें
अंडों से चूजे निकले,
ममता की मारी 
चिड़िया मां
ख़ुशी से
 फूली नहीं समायी।
चोंच में
 चोंच डाल कर,
बच्चों को 
दाना चुगाया।
प्यार से अपने
ममता से,
उन्हें सहलाया।
धीर-धीरे
नन्हें चूजों के,
नन्हें नन्हें पर 
निकल आये।
उनके कमज़ोर
पंखों में अपनी,
आशाओं का
 दम भरा।
उन्हें अपने सपनों का
खुला आसमाँ और,
हौसलों की ऊंची
उड़ान दी।
और आज
समर्थ हुए तो,
उड़ गए
छोड़ कर नीड़।
तोड़ कर
ममता का बन्धन,
भूल कर
 अपना कर्तव्य।
छूने आकाश की
 ऊंचाइयों को,
फिर कभी भी
वापिस न लौट कर
 आने के लिए।
                  तारा "प्रीत"
              जोधपुर(राज०)

छवि विचार 

प्यारी  प्यारी  चिड़ियाँ रानी  
सुबह  होते ही उठ जाती है ,
 उठ कर सबको जगाती है ,
लाकर दाना बच्चो को खिलाती है ,
माँ का फर्ज बखूबी निभाती है 
पाठ  अनुशासन का  पढ़ा रही 
रीत दुनिया का बता रही , 
कैसे इस जग मे रहना है 
यह  बच्चो को समझा रही ,
प्रेम ,विश्वास ,साहस ,धैर्य 
 सफल जीवन के है आधार 
ऐसे नैतिकता के पाठ पढ़ा रही 
गर आये तूफान जीवन में , 
नहीं कभी डरना है ,
रख हौसला हर तूफान से टकराना है 
जब हो जाओगे तुम बड़े ,
पंख फैला कर उड़ना है  ,
आये न कोई दुःख 
मात .पिता के जीवन मे 
यह ध्यान तुम्हे रखना है 

स्मिता धिरासरिया  बरपेटा रोड

🌹चित्र आधारित 🌹


प्रकृति के मेल में
                दुनियां के खेल में,

कई भावना के रंग है
             उसी में रंगा प्रेम रंग है,

किन्तु सबसे हसीन प्रेम रंग
          माँ की ममता का प्रेम रंग,

दृश्य में चिड़िया रानी है
         और उसके 2नन्हें बच्चे है,

चिड़िया चोंच मे दबा के आई 
       भोजन बच्चों के लिए लाई,

दूर -दूर मिलो उड़ान भरती
         तब जाकर खाना ला पाती,

फिर भी नहीं चिड़िया थकती 
    क्योंकि  ममता रग रग में बहती

तिनका -तिनका चुन चुन के ये 
   अपना घोंसला खुद से बनाती ये

कितनी नन्ही सी जान होकर भी
   बहुत कुछ ये सिखलाती हमें भी

हेमा जैन (स्वरचित )

घोंसला ---- ओमप्रकाश पाण्डेय
( आज के चित्र पर आधारित) 
बगिया बगिया डाली डाली
घूम घूम कर एक पक्षी ने
यहाँ से तिनका वहाँ से  तिनका 
बीन कर बीन कर बड़े जतन से
एक प्यारा घोंसला बनाया
पक्षियों का यह ही अपना घर है....... 1
दिन भर चाहे जहाँ भी घूमे
दिन ढले यहीं पर लौट आते 
गर्मी हो बारिश हो  या हो शर्दी
या तूफान तेज चलता हो
इनका यह एकमात्र आश्रय
पक्षियों का यह ही अपना घर है......... 2
दाना चुग चुग कर ये लाते
कुछ खाते कुछ बचा के रखते
अंण्डे अपने यहाँ पर देते 
सेंते उनको बड़े जतन से
रखते बच्चों को भी बड़े जतन से
पक्षियों का यह ही अपना घर है........ 3
दाना चुग चुग  कर ये लाते
प्यार से बच्चों को खिलाते 
रक्षा बच्चों की करते  दिन रात
फिर एक दिन नील गगन में
अपने पंखों से बच्चे  उड़ जाते
पक्षियों का यह ही अपना घर है......... 4
पालते पोस्ते बड़े जतन से
बच्चों को वे बड़ा भी करते
पर मोह ममता से परे हैं ये
बच्चों को ये उड़ने देते
नहीं रोकते उड़ने से उनको
पक्षियों का यह ही अपना घर है......... 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ---- ओमप्रकाश पाण्डेय)

मां/पिता जैसा कोई नहीं
*******************

इसांन हो या जानवर
पंछी हो या जीवजंतु
सबमें जज़्बात समाते
सब अपने बच्चों को बहुत चाहते।।

नन्ही चिडिया के गुण हम गाते
दूर उड़ आसमान मे खाना लाते
अपने घौसलों मे चूजों को चोंच
से खाना खिला ममता बरसाते।।

बारिश सर्दी मे पंख फैला अपने
पंखों के नीचे बच्चों को छुपाते
आऐ वृक्ष पे कोई दुश्मन तो
चोंच से वार कर बच्चों को बचाते।।

इंसान,जानवर यही तो एक गुण
जज़्बात समान हैं पाते।।२।।

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************

बालगीत

चिड़िया रानी

चूं चूं करती चिड़िया रानी, 
सुबह   सवेरे    आती   है। 
देख  मेरे  हाथों में  खाना, 
वह भी  तो  ललचाती  है। 
      
मैं   भी भूखी  बच्चें  भूखे, 
दाना  मुझको   दे   दो ना। 
एक दोने  में पानी रख दो, 
प्यास  हमारी बुझा दो ना। 

मिलते कहाँ घने पेड़ अब, 
जिन  पर  मैं  तो रहती हूँ। 
 ना छीनो आशियां हमारा, 
यही  मैं  तुमसे  कहती  हूँ। 

 निज  लालच  की खातिर 
 पेड़   घने तुम  काट   रहे। 
 अस्तित्व हमारा खतरे  में, 
 हमको दुख क्यों बांट  रहे? 
 
प्रेम  प्रीत से रहना  सीखों, 
हम भी इस जग के प्राणी। 
प्यार  हमें  भी दे दो थोड़ा, 
बोलो   मीठी   सी   वाणी। 

चोंच में  दाना  ले  चिड़िया, 
बच्चों   के   पास  आती है।  
बड़े प्यार से  चिड़िया रानी, 
दाना     उन्हें   खिलाती  है। 

मिलजुल  कर  रहना बच्चों, 
उनको   यह    बतलाती   है। 
कभी  किसी का  न छीनना, 
सबक   यह   सिखलाती  है। 


डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश

*चित्र पर आधारित कविता*

पहले उड़ती- फिरती थी,
ये हर डाली -  डाली पर
कौन - थी  ये चिड़िया प्यारी?
  क्या नाम है इसका,
जरा -पूछो भईया?
अरे ये चिड़िया है - गौरया ।।
  पहले दिखती थी ये,
   हर - घर आंगन में
    परंतु अब है ये।
    पक्षी  संकट में ।।
   इसे बचाने के लिए,
करना पड़ेगा कोई उपाय।
   ताकि ये चिड़िया,
इस धरती पर बच पाए।
थोड़ा- सा दाना और थोड़ा -सा पानी,
   अगर इसे मिल पाए।
   तो इसकी प्रजाति,
इस धरती पर बढ़ जाए।।
यदि नहीं किया अभी ऐसा,
   तो आने वाले वक्त में
    कभी ये खबर आए
एक छोटी- सी चिड़िया थी न्यारी।
नाम था जिसका गौरैया प्यारी।।


विजयेन्द्र मोहन।

*अग्नि शिखा काव्य मंच*
* गुरु वार -१७/६/२०२१ *
* बिषय - चित्र पर कविता *

माँ तो माँ होती है पालनहार ,
चाहे हो पशु,पक्षी ,या इनसान ?
अपने बच्चों की भूख मिटाती ,
गोरैयो माँ हर दिन बार- बार !
एक चोंच ओर बच्चे चार ,
फिर भी नहीं माँ मानती हार  !
चूँ चूँ चीं चीं  की रेल -पेल में ,
दाना चुन लाती बार बार !
मेरे बच्चों धिरज रखो ,
सबको खिलाउँगी बार -बार  !
जब तक मैं हूँ तुम सब पर ,
कोई आंँच कभी ना आयेगी !
अपनें नन्हें पंखों से भर उड़ान  ,
मैं दानाँ पानीं लाउँगी !
अपनें नन्हें बच्चों की ?
हर रोज भूख मिटाऊंगी !!

सादर समीक्षार्थ !

सरोज दुगड़
खारुपेटिया, गुवाहाटी
असम

जय माँ शारदे
चित्र आधारित रचना

मैं तो माँ हूँ  मेरे बच्चों उड़ना तुम्हें सिखलाती हूँ। 
नहीं डरो तुम इस दुनिया से तुझको मैं बतलाती हूँ।।

ची -ची चिड़िया चौच में दाना भरकर में ले आती हैं।
मेरे नन्हे प्यारे चुजो  तुमको मैं खिलाती हूँ।

नहीं गिरने दूँगी जमी पर विश्वास यह दिलाती हूँ। 
नहीं सुनोगे बात मेरी फिर मैं कठोर हो जाती हूँ।।

सर्दी गर्मी बारिश में  भी पंखों से बचाती हूँ। 
  तिनका- तिनका चुन कर घोंसला अपना बनाती हूँ।।

तुम छोटे-छोटे  चूजे हो अभी मैं साथ बतलाती हूँ। 
हर हमेशा नहीं रहूँगी पकड़ना तुम्हें बताती हूँ। ।

हमेशा साथ में नहीं रहेंगे प्रकृति का नियम बताती हूँ। 
नहीं डरो तुम नहीं झुको तुम अभी मैं साथ में रहती हूँ।।

पिता नीचे से पकड़े दाना मैं चौच में देती हूँ। 
माँ की ममता देखकर खुशी के आँसू बहाती हूँ। ।

चित्र आधारित रचना लिख चिड़िया की कहानी बताती हूँ। 
चल 'स्नेहा' उठा ले क़लम नई कविता  रचाती हूँ।। 

श्रीमती रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

नमन मंच
चित्र आधारित कविता


       चिड़िया


देखो कितनी प्यारी चिड़िया,
मन को कितनी भाती चिड़िया।
पंख हैं इसके रंग रंगीले,
काली चोंच बहुत नुकीले।

तिनके चुन घोंसला बनाती,
बच्चों को उसमें सुलाती।
दूर दूर तक उड़ वो जाती।
उनके लिए खाना ले आती।

बच्चों की चिंता सदा करती।
बारिश,और धूप में तपती।
कैसे भी, यत्न  कुछ करके,
दाना पानी एकत्रित करती।

बच्चों को उड़ना सिखाती,
स्वावलंबन का पाठ पढ़ाती।
संघर्ष बहुत है जीवन में,
इससे लड़ना उन्हें सिखाती।

मौसम जब सुहावना होता,
खुश बहुत हो जाती चिड़िया।
सावन की रिमझिम बारिश में,
मीठी धुन सुनाती चिड़िया।

पेड़ काट दिए जब लोगों ने,
तबसे बहुत दुखी है चिड़िया।
ऊंचे ऊंचे टावर बन गए,
कितनी मर जाती है चिड़िया।

चिड़िया है रौनक प्रकृति की,
रौनक  हमारे वातावरण की।
इनकी ची - ची चू-चू सुनकर,
होती अच्छी शुरुआत दिन की।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
नई दिल्ली

ओ ..माँ मेरी,ओ.. प्यारी माँ 
लगी है बहुत भूख.. ..हमें माँ 
भूख हमारी ..माँ मिटाओ,
तेरे चोंच में हैं. दाने खिलाओं,
हम न जानते बाहरी दुनिया,
तू ही हमारी ममता की दुनिया
सुरक्षित हैं हम तेरी गोदी में ,
दूर गगन में माँ तू उड़ती है 
ढूंढकर आहार तू  लाती है,
तू कितनी साहसी ..हो माँ ,
तू कितनी प्यारी.. हो  माँ,
भूखी तू, पर हमें खिलाती है
चीं चीं गा कर हमें सुलाती है।
ओ .. माँ मेरी, ओ.. प्यारी माँ
तेरी ममता की दुप्पट्टा ओढके,
सदा करती रखवाली, नींद त्यज के,
हम न जानते और किसी को,
तेरी दुल्हार में हम भूले हमको।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडाय।

☘️🌴🌲गौरैया🌲🌴☘️🎄

देख प्यारी गौरैया को जीवन समझ आया,

कैसे कैसे जतन से अपने परिवार को पाया।

आरजु से जुझो, फिर जिंदगी की नई राह ढूढ़ो समझाया

हवाओं को मोड़ो, भुजाओं के बल पर, 
गगन आज अपना,धरा आज अपनी,

आरजु ने आज कहा,बैठो न कल पर। 
जिंदादिल जिंदगी  परोपकार सब पर

चिड़िया ने समझाया अभी तो सुबह है
उमंग भरी हैं,हाथ में तकदीर अपनी है

पसीने के रंगो से तसवीर अपनी,
अभी है समय खींच डालो सुहानी। 

सफर ने संदेश दिया,कदम-से-कदम 
मिला बढ़ गए  स्वर्ग धरती बनाएँ हम

उठो, जिंदगी में नई साँस फूँके मिल हम
नव जीवन सुखमय नव तरंग लाएँ हम

गौरैया कह रही ममता समता फले फूले 
सृजन का ही कर्म हो प्रति व्यक्ति ऐसा मन बने

खिल पड़े मन का कमल ऐसी पड़ें रवि राशियाँ

लोक मंगल मे सब बनाओ आरजु से जिंदगी में मंगल। 


डॉक्टर रश्मि शुक्ला
 प्रयागराज

गौरैया
_______
(20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस)


 पेड़ों पर फुदकती हो गौरैया ,
मेरे घर भी आओ तुम ,
मेरे दिल का आंगन सूना है ,
उसमें बाहर कर जाओ तुम ।
दाना खाकर ,पानी पीकर,
 तुम फुर्र से उड़ जाती हो,
 चीं-चीं-चीं-चीं गीत सुनाकर,
 सबका दिल बहलाती हो,
 संस्कृति परिवार का हिस्सा हो,
 सब की यादों में रहती हो ,
बच्चे पकड़ने दौड़ते हैं,
 पर हाथ नहीं तुम आती हो।
 मुंह में दाना लेकर अपने ,
बच्चों को खिलाती हो,
 गौरैया तुम अपना कर्तव्य ,
बखूबी निभाती हो।
 अपने घोसले में रहकर ,
बच्चों को पर प्यार लुटाती हो,
 बड़ी लगती है यह दुनिया जब,
 गगन में उड़ जाती हो ।
अस्तित्व तुम्हारा खतरे में है ,
 संख्या कम होने लगी है,
संकल्प करते हैं गौरैया ,
तुम्हारे आशियाने को,
 फिर से बसाएंगे ,
सुंदर चुलबुली गौरैया को ,
मिलकर हम बचाएंगे।

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी,
 619 अक्षत अपार्टमेंट,
 खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश,
 मोबाइल 89894 09210

मेरी प्यारी चिड़ियाँ रानी है ।
 रोज़ सुबह चीं चीं करती है।
 हमें जगाने चिड़ियाँ रानी आती है 

फुदक फुदक कर राग सुनाती  
बच्चों का मन बहलाती है।
दूर झरोंखे देख पँख फैलाये
संगी साथी संग समय देख चिड़ियाँ रानी आती है 

दाना लेने आई चिड़ियाँ रानी 
देख वही रुक जाती है 
फुदक फुदक कर राग सुनाती है 
अन्न दाने चूज़ों के चोंच में डाल  
घोंसले से उड़ाना उन्हें सिखाती है 

प्रकृति की हरियाली 
जल थल नभ में रम जाती हैं
कर्मक्षेत्र जीवन उड़ाना सिखाती हैं 
नित नये घोंसले चिड़िया बनाती है 
अनिता शरद झा मुंबई

*अग्नि शिखा काव्य मंच*
* गुरु वार -१७/६/२०२१ *
* बिषय - चित्र पर कविता *

माँ तो माँ होती है पालनहार ,
चाहे हो पशु,पक्षी ,या इनसान ?
अपने बच्चों की भूख मिटाती ,
गोरैयो माँ हर दिन बार- बार !
एक चोंच ओर बच्चे चार ,
फिर भी नहीं माँ हार मानती !
चूँ चूँ चीं चीं  की रेल -पेल में ,
दाना चुन लाती बार बार !
मेरे बच्चों धिरज रखो ,
सबकी बारी आयेगी !
जब तक मैं हूँ तुम सब पर ,
कोई आंँच कभी ना आयेगी !
अपनें नन्हें पंखों से भर उड़ान  ,
मैं दानाँ पानीं लाउँगी !
अपनें नन्हें बच्चों की ?
हर रोज भूख मिटाऊंगी !!

सादर समीक्षार्थ !

सरोज दुगड़
खारुपेटिया, गुवाहाटी
असम

चित्र पर आधारित रचना

☘️चिड़ी मां का रूप,,

💐चिड़िया मां के रूप में बच्चों को सहलाती, 
 यही मां की पहचान है ,
पल पल फिक्र जताती।

फुलवारी फुलकारी सी फुदकती,
 अपनी चोंच से बच्चों को दाना दुनका देती।

पूरी लगन से अपना धर्म निभाती,
 बच्चों को खुशी दे खुद को चहकाती।
 ना करती परवाह दुनियादारी की, बनती हर पल हितकारी सीl

दाना दुनका उसका खजाना,
 जननी बनके प्रीत निभाना, 
यही तो उसकी शोभा न्यारी,
 लगती सबको प्यारी प्यारी,l

इस रूप में सर्वोत्तम कृति है,
हे तो मां का ही रूप, ना लाए बच्चों पर धूप,
 पल-पल उनका साथ निभाती,
 उनको ऊंचा नभ दिखलाती।✈️

स्वरचित कविता सुषमा शुक्ला

चित्र आधारित कविता
**अग्नि शिखा मंच**
  **१७/०६/२०२१**
चींचीं करती चिडियांआई।
बच्चों केलिए दाना लाई चिड़ियां।

दूर देश को जाती चिडियां
शाम ढले आती है चिडियां।

निस्वार्थ बच्चो को पालती
असीम प्रेम है बाँटती चिडि़या। 
 
दिन भर चारा चुग कर लाती
जाने अपने कब खाती  है चिडि़या। 

माँ तो सबकी एक जैसी
होती यह हमको बतलाती है
चिडि़या।

अपने बच्चो के लिए सुन्दर
घोसला बनाती चिड़ियां

अपने बच्चो को मेहनत
का पाठ पढ़ाती है चिड़िया।
स्वरचित
  बृजकिशोरी त्रिपाठी
 गोरखपुर यू.पी

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Sunday, 13 June 2021

anshika munchkin dwara aayojit laghu Katha pratiyogita ke parinaam aur samman पत्र

🌺अग्निशिखा मंच द्वारा आयोजित 🌺लघुकथा प्रतियोगिता के परिणाम 
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1) प्रथम-- वीणा अचतानी 
 2) द्वितीय-- कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड 
 3) तृतीय-- आशा जाकङ 
  4) चतुर्थ--  सुरेन्द्र हरङे 
सांत्वना पुरस्कार 
 5) शोभा रानी तिवारी 
  6) पूनम शर्मा 
   7) नरेन्द्र कुमार शर्मा 
   8) नीरजा ठाकुर 
     9) चंदा डांगी 
     10) चंद्रिका व्यास 
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  निर्णायक ---
1) डाॅ पुरुषोत्तम दुबे-- इंदौर 
 2) सेवा सदन प्रसाद-- नवी मुंबई 
सौजन्य--  अग्निशिखा मंच
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आदरणीय डॉ पुरुषोतम दुबे जी और आदरणीय सेवा सदन प्रसाद जी का बहुत बहुत अभार व धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻


🙏🏻समय शाम तीन बजे से  3 बजे से 
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🌺रविवार- 13/6/2021
🌺 लघु कथा प्रतियोगिता 🙏🌹सम्मान समारोह समारोह और काव्य पाठ 
विषय - स्वैच्छिक
🌹कार्यक्रम उद्घाटन आदरणीय राम राय बिहार
🌸सरस्वती वंदना
🌺 मुख्य अतिथि 
🌹डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे इंदौर 
🌺कार्यक्रम समारोह अध्यक्ष 
🌹आदरणीय सेवासदन प्रसाद जी🌹 विशेष अतिथि 
🌺आदरणीय-सतीश शुक्ला मदन
आदरणीय 
🌺आदरणीय-आशा जाकड
🌺आदरणीय डॉ रामस्वरुप साहू 
🌺समय -3 बजे से 

संचालक - डॉ अलका पाण्डेय 
🌺सुरेन्द्र हरड़ें नागपुर 
🌸वल्लभ अंबर  इंदौर

🌺आभार 

🌺चंद्रिका व्यास

🌺प्रति भागी 🌺

१) राम राय जी 
२) कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड 
३) सुनिल मिश्रा 
४) आशा जाकड
५) रानी अग्रवाल 
६) नीरजा ठाकुर 
७) शोभारानी तिवारी 
९) श्रीवल्लभ अम्बर
१०) सुरेन्द्र हरड़ें 
११) अलका पाण्डेय 
१२) वीना आडवाणी"तन्वी"
१३) सुषमा शुक्ला
१४) बृजकिशोरी त्रिपाठी गोरखपुर
१५) प्रो. रविशंकर कोलते नागपुर
१६) रेखा शर्मा स्नेहा मुजफ्फरपुर बिहार
१७) पूनम शर्मा स्नेहिल उत्तर प्रदेश गोरखपुर
१८) हीरा सिंह कौशल हिमाचल प्रदेश 
१९)वीना अचतानी  जोधपुर  
२०)हेमा जैन
21)  ओमप्रकाश पाण्डेय 
22) वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर मध्यप्रदेश
23) डा अँजुल कंसल"कनुप्रिया"इंदौर
24)स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड
25) रजनी अग्रवाल
26) नरेन्द्र कुमार शर्मा हिमांचल प्रदेश
27) दिनेश शर्मा 
28) आशा लता नायडू
29) विजयेंद्र मोहन 
30) कुमकुम वेद सेन 
31) ऐश्वर्या जोशी  कापरे 
32) चंदा डांगी 
33) डॉ रश्मि शुक्ला 
34) डाॅ सरोजा मेटी लोडाय
35) अंशु तिवारी पटना 
36) कल्पना भदौरिया "स्वप्निल "उत्तरप्रदेश 
37) ममता तिवारी 
39) रानी नांरग 
39) अनिता झा 
40) चंद्रिका व्यास 
41) डॉ मीना कुमारी परिहार
42) डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
43) नीलम पाण्डेय गोरखपुर उत्तर प्रदेश
४४ सरोज दुगड़ खारूपेटिया , गुवाहाटी असम
४५) अर्चना पाठक
46.डा.महताब अहमद आज़ाद
उत्तर प्रदेश
47/डा. साधना तोमर---------
48/रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
49) स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह' नई दिल्ली
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच 
संयोजक 
अलका पाण्डेय मुम्बई



विशेष. अतिथि ःउद्बोधन

अग्निशिखा मंच पर उपस्थित अग्निशिखा मंच कीअध्यक्ष डा.अलका पांडे जी  , कार्यक्रम उद्घाटन कर्ता श्री रामराय बिहारी जी, मुख्य अतिथि डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबेजी, विशिष्ट अतिथि सतीश चंद्र जी एवं श्री रामस्वरूप साहू जी संचालक गण सुरेंद्रहरडे व श्रीवल्लभ अम्बर जी एवं  श्रोताओं  का बहुत-बहुत वंदन अभिनंदन।
आदरणीय डा. अलका जी आज आपने लघु कथा सम्मान प्रतियोगिता के सम्मान पत्र दिए हैं यह सभी लघुकथा कारों के लिए एक बहुत बड़े सम्मान की ,गर्व की बात है आपके  मंच ने 1 साल में बहुत लंबी दूरी तय कर दी है ।आपके मंच ने 25 मार्च 2020को शुरुआत की थी और आज आपकी मंच ने बहुत प्राप्त करनी है यह आपके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। आप  कथाओं के अलावा काव्य विधा ,चित्र विधा पर काव्य विधा रखती है और साथ ही मुहावरों पर जो लघु कथाएं रखती है वह अपने आप में एक नई पहल है कि मुहावरों पर भी आपने बहुत अच्छी कलम चलवाई है इस सब का श्रेय आपको ही जाता है।  सभी लोगों ने  मुहावरों पर बहुत अच्छे अच्छे लघु कथाओं की रचना की है । मैं यही शुभकामना देती हूँ सभी खूब अच्छा लिखे हैं आगे बढ़े और आगे बढ़ते ही रहें।आज भी सभी रचनाकारों ने अपनी  स्वैच्छिक रचनाएं शानदार प्रेषित की है मैं अस्वस्थ होने के कारण अभी पटल पर उपस्थित हुई हूँ। आपका अग्नि शिखा मंच दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति के शिखर पर बढ़ता रहे जो युवा कलाकार है वह लेखन क्षेत्र में नए कदम रख रहे हैं  वे भी खूब आगे बढ़ते रहें साहित्य की गद्य पद्य सभी विधाओं में सभी की लेखनी खूब चले और पूरे भारत में अग्नि शिखा मंच की पताका लहराये। जिन रचनाकारों ने प्रशस्ति पत्र प्राप्त किए हैं उन सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं

यह मेरी शुभकामनाएं  हैं
💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌💐👌

 आशा जाकड़
 विशेष  अतिथि

कोरोना को भगाएँ
 
आओ हम सब मिलकर कोरोना को भगाएँ।
धैर्य, संयम ,सहयोग से कोरोना को भगाएँ।।

गले नहीं मिलेंगे , हम हाथ नहीं  मिलाएँगे,
हाथ जोड़के करें नमस्ते हँसके मुस्कराएगे।अपनी पुरानी संस्कृति को फिर से अपनाएँ।।

साफ - सफाई हम रखेंगे हाथ खूब धोएँगे,
भीड़ - भाड़ से दूर रहेंगे ,साथ नहीं बैठेंगें।
एकान्त में विचरणकर शुद्ध हवा अपनाएँ।।


कॉलेज ऑफिस बंद होगए घर से काम करो,
आना -जाना बंद हुआ अब घर विश्राम करो।
घर पर रहकर बच्चों को गीता ज्ञान सिखाएं।।

आशा जाकड़
9754969496





अग्नि शिखा मंच को नमन
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
लघु कथा प्रतियोगिता
13 जून 2021
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
विधा: लघु कथा
शीर्षक : सज्जन
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सज्जन
कोलकाता पुस्तक मेला…. लिटिल मैगजीन पेवेलियन… साहित्य त्रिवेणी पत्रिका का स्टॉल...। संपादक कवि मार्तंड जी सुबह से बैठे मक्खी मार रहे थे। पूरे पेवेलियन में एक मात्र हिंदी पत्रिका… । अधिकतर ग्राहक बांग्ला भाषी...। स्टॉल पर एक सरसरी नज़र डालते हुए आगे बढ़ जाते और आगे बढ़कर बांग्ला पत्रिकाओं के स्टॉल से पत्रिकाएं खरीदते। संपादक जी बैठे बैठे हिंदी पाठकों को कोसते रहते। इसके अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे। 
अचानक एक सज्जन स्टॉल पर पधारे। उलट पलट कर एक एक अंक को देखने लगे और प्रशंसा करने लगे। वाह! मुखपृष्ठ बहुत सुंदर है… रचनाओं का चयन भी समझदारी से किया गया है। संपादकीय भी बहुत विद्वता पूर्ण है। वाह! वाह!! सब एक से बढ़कर एक। 
पत्रिका की इतनी प्रशंसा सुनकर संपादक महोदय फूले न समा रहे थे। पत्रिकाएं इतनी अच्छी हैं ये तो उन्होंने खुद भी कभी नहीं सोचा था। 
उन सज्जन के बारे में अधिक जानने की उत्सुकता जगी। उन्होनें आग्रह पूर्वक उन्हें पास में बैठा लिया। चाय पिलाई। बातचीत से पता चला वे किसी विद्यालय में हिंदी भाषा के प्रोफेसर हैं.. उनकी पत्नी भी किसी विद्यालय में हिंदी की शिक्षिका है..  और उनकी बेटी भी हिंदी विषय लेकर एम ए कर रही है। आशा लगी कि शायद ये कुछ अंक अवश्य खरीदेंगे। 
उन्होंने कई अंक उठा लिए और चलने को हुए। ये अंक मैं ले रहा हूं। संपादक जी ने खुश होते हुए उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर आधा मूल्य बताया। 
उन सज्जन ने कुछ इस तरह ताका जैसे संपादक जी से बहुत बड़ी गलती हो गई हो।
उन्होंने तुरंत पत्रिकाएं टेबल पर फेंकी और खड़े हो गए। अरे छोड़ो किसके पास इतना समय है कि इन्हें पढ़े। बेकार घर में कूड़ा ही बढ़ेगा। 
और हां, आप भी किस चक्कर में पड़े हैं, छोड़िए ये कल्पना की दुनिया.. व्यर्थ समय गंवा रहे हैं। कुछ काम धाम करिए। 
इतना कहकर वे सज्जन सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए भीड़ में खो गए। समादक जी उनकी सज्जनता के बारे में सोचते हुए धम्म से कुर्सी पर बैठ गए। 
*********************************
© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता



"नया सवेरा आएगा"
नया सवेरा  अभी आयेगा,
खुशियां ही खुशियां लायेगा,
आनंद का प्रकाश छायेगा,
हर शख्स खुशी से गाएगा,
और गायेंगे हम ।।१।।
न रहेगा कोरोना का डर,
खुलेंगे सब बंद बाजार _घर,
गाड़ी,हवाईजहाज का सफर,
ले साथ मित्र और हमसफर,
चलेंगे विश्व_भ्रमण पर हम।२।
न लगाना होगा मुंह पर मास्क,
न रखनी होगी दो गज की दूरी
न होगी मिलने से मजबूरी,
हमारे यहां आयेंगे अतिथि,
और अतिथि बनेंगे हम।३।खुलेंगे मंदिर_गुरुद्वारे,
मस्जिद_गिरिजाघर सारे,
खूब होगी सब जगह पूजा,
प्रभू से प्यारा न कोई दूजा,
उसको पुकारेंगे हम।४।
सब होगा,नौकरी धंदा व्यापार,
सब कमाएंगे धन दौलत अपार
हर हाथ को काम"व रोजगार,
 होंगे देश_विदेश खुशहाल,
खुशहाल होंगे हम।५।
आयेगी लाली नवभोर की,
कल्लोल _गुंजन के शोर की,
ईश्वर की लीलाओं का,
             नहीं हमें पूरा ज्ञान,
कौन जाने ये कोरोना,
              सिद्ध हो वरदान।६।
रचयिता___रानी एस.अग्रवाल
उम्र ६५ वर्ष।
ये मेरी स्वरचित मौलिक रचना है।
पता_E_73Rustomjee Regal,J.S.Road.Dahisar West,Mumbai_400068.
mobile_9324342825.



"ग़ज़ल "
मुझसे देखी नहीं जाती किसी की जुदाई ।
शाख़ पै बैठे परिन्दों को उड़ाऊॅ कैसे ।
लोग पढ़ लेते हैं दिल की जुबां नज़रों से ।
एसे आलम में दिल का राज़ छुपाऊॅ कैसे ।
मुझको हर ख्वाब-ए-ताबीर से डर लगता है ।
भीगी पलकों पे कोई ख्वाब सजाऊॅ कैसे ।
खबर है किसे मर्ज़ ए-इश्क लगा है मुझे ।
अपने  आँसुओं का सबब बताऊँ कैसे 
आग सुलगती है दिल में उसकी बेरूखी से ।
इस दिल की तपिश को अश्कों से बुझाऊँ कैसे ।
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)



*कविता**लहू की होली*

टुकड़े टुकड़े हुए मेरे जिस्म के
कोई ,गिरा इधर ,कोई गिरा उधर।
मेरा किसी ने रास्ता रोखा,
मालूम नहीं मुझे क्या हुआ अचानक आंखों के सामने अंधेरा छाया।।१।।

जोर से धमाका हुआ कुछ सुनाई नहीं दिया।
जब आप ही नहीं रही
कैसे देखूं मां तुझे,।।२।।

मां तेरा वजूद ही नहीं रहा,
तेरे कलेजे का  टुकड़ा ही नहीं बचा।
तेरी आंखों का तारा ही बुझ गया,
तो फिर कैसे तुझे मिलता मां?।३।

रोज सुनता था समाचार,
कही,इक्का दुक्काजवान शहीद हुए,किंतु मैं खुद ही आतंकियों के खुद निशाने पर था,।।४।।

जिन्होंने तेरी लाडले बेटे , का वध किया,मां मैं मरा नहीं, बल्कि देश के लिए  मेरा तन कुर्बान हुआ।
मां मैं जिस्म के रूप में नहीं मिल सकूं मगर मेरी आत्मा सदा तुम्हारे पास रहेंगी।।५।।

मां तुझ से मोबाइल पर बात की होली पर जरूर आऊंगा रंगों का त्योहार खूब मौज मस्ती के साथ बनाऊंगा तेरे हाथ की भुजिया खाऊंगा। देश की सुरक्षा के लिए लहू की होली खेली , मां मैंने।।६।

आंखें भर आयी, कविता लिखते,
दिल बैठा जा रहा था।
कलम थरथरा रही थी।
अल्फाज भी निकल नहीं रहे थे।
शायद वह कहीं गुम हुए लगता था।।७।।

*आंखों में नमी थी*
*दर्द की जमी थी*
*सबके तेरे पास*
*बस मेरी यह कमी थी*
*मां तुझे सलाम*
   *जय-हिंद*

सुरेंद्र हरड़े कवि
नागपुर महाराष्ट्र





* हल्दी धाटी *

सिशोदिया कुल वंश मेवाड़ी आन महारणां प्रताप पौरूष की पहचान
अकबर महाराणां  से घबराता था रणंभूमि में प्रताप  का सामना करने से डरता था !
हल्दी घाटी में युद्ध हुआ अकबर ने बहलोल खां को भेज दिया ,
हाथी जैसा बदन था जिसका जिसके सामने न घोड़े भी छोटे लगते थे ?
हल्दी घाटी में युद्ध हुआ वीरों की तलवारें चमकी- खनकी !
 नर पिचाश बहलोल खां को देख सामने  राणां की भुजाऐं फड़कीं  ,
बहलोल खां की अफीम के नशे में डूबी आंखें , राणां की तेजोदिप्त आंखों से टकराई !
महाराणां प्रताप का पोरुष देख- देख समर भवानीं भी  थरथराई ?
 महाराणां प्रताप  की आंखों में रक्त उतर आयाऔर हल्दी घाटी में भीषण संग्राम हुआ 
कुछ देर महाराणां प्रताप  नें खेला खेल ....बहलोल खान
बिलाव को खूब छकाया था ,  
फिर अपनीं तलवार से एक ही वार से बहलोल खां को चीर दिया ?
ऐसा फाड़ा बहलोल खां को आधा इधर आधा उधर गिरा ?
हल्दी घाटी में महाराणां प्रताप  के साथ ८५,०००  भील सैनिक थे ,
अकबर के ८५,०००पर बिजली बन कर के टूटे थे !
हल्दी घाटी की मांटी में अब भी तलवारें पाई जाती है ,
गली-  गली कूचे- कूचे प्रताप की गाथाएं गाई जाती है !
जब एब्राहँम लिंकन भारत में आने वाले  था ?
माँ भारत से तुम्हारे लिए क्या तोहफा लाऊं ?
ला सको गर मेरे लाल उस महान देश से  हल्दी घाटी की पावन मिट्टी ले आनां !
माँ की मांग सुनकर एब्राहम लिंकन भी चकराया था ,
धन्य- धन्य मेवाड़ राजवंश ,धन्य - धन्य सिसोदिया कूल दीपक !
जिसके हाथी रामप्रसाद  नें नहीं खाया
अकबर का दाना पानी ,
एक अकेले हाथी को काबु करने को  आताताई हारे थे !
रामप्रसाद को काबु करनें में कितनें हथकंडे अपनाए थे , 
जिसके हाथी - धोड़े भी नाम अमर कर जाते हैं !
अकबर का सपना सच ना हुआ हम याद करते रामप्रसाद चेतक की स्वामिभक्ति !
जिसकी वीरता के किस्से कहते हल्दी घाटी की पावन माटी !!

सरोज दुगड़ 
खारूपेटिया, गुवाहाटी
असम
 🙏🙏🙏


“अग्नि शिखा मंच का अभिवादन अभिनंदन करते मै अनिता शरद झा अपनी हिंदी और छत्तीसगड़ी में रचना प्रस्तुत है 

लघुकथा 
थोथा चना बाजे घना “
   प्रकृति हरियाली नव रूप शृंगार किया है 
शबरी की कुटिया का रूप निखर आया है 
गाँव में सोनी, मोनी के नृत्य, गीत की बहार थी। उनके बिना गाँव का कोई भी मंगल उत्सव निरर्थक लगता,भले ही उनकी गिनती 'नाच ना आये आँगन टेंढ़ा में होती।' 
शगुन में उन्हें जो भी मिलता जीवन यापन चलता।
 सोनी मोनी हिजड़े जो थे, पर नायक नायिका का रोल बखूबी करते।
एक दिन गाँव में 'थोथा चना बाजे घना' फ़िल्म की सूटिग़ हो रही थी। फिल्म के निर्माता, निर्देशक ने सोनी, मोनी के नाच- गम्मत देख उन्हें अपने साथ ले जाने का विचार बना लिया। 
"अब हमें ना कहना -नाच ना आये आगंन टेढ़ा, देखो हमें हीरो- हीरोईन का रोल दे रहे हैं।" 
तभी गाँव के वृद्ध ने कहा - “घुरवाँ के दिन बहुर गे।" 
अनिता शरद झा मुम्बई
"ग़

*विषय- मेरा मन ( कविता )*

मन मेरा था जो सच्चा था
सुनता सबकी रहा सदा...
मेरा मन,बस मेरा न होकर
सबका होकर रहा सदा...

मेरे अंतर्मन में जाने
कितने भाव उमड़ते है
कितने सपने जिंदा हैं ...
कितने सपने अधूरे हैं...

पर,मन को इतनी फुर्सत कहां
जो अंतर्मन से पूछे मन...
सबकी खुशयों में वो खुश 
सबके मन सा रहता मन...

कभी ढोता शब्दों की गरिमा
कभी शब्दों से ही बिंधता रहा
पर, कहने से सकुचाता ऐसे
जैसे हो किसी दुल्हन का मन...

मन की व्यथा ,मन ही जाने
मन पीर पराई कहता रहा सदा
मेरा मन, बस मेरा न होकर
सबका होकर रहा सदा..

         *मीना गोपाल त्रिपाठी*
        *कोतमा, अनुपपुर,(मध्यप्रदेश)*
         *स्वरचित*


कैसे 



गीत प्रीत के गाऊँ मैं

श्रृंगार रस की धारा कैसे, हृदय में बहाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी कैसे गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
               समय नहीं मधु गीतों का, 
               जब आग लगी हो सीने में। 
               भारत माँ अपनी रोती हो, 
               कैसे सूझे मधु पीने में? 
चूड़ी, कंगन, महावर के फिर, कैसे गीत सुनाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                जब महामारी ने आकर, 
                अपना जाल बिछाया हो। 
                 डरा-डरा सा सहमा सहमा, 
                 हर मन जब भरमाया हो। 
कैसे सूझे आलिंगन की, कैसे प्राण रिझाऊं मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                जब फूल टूटते उपवन से, 
                आंखे नम हो ही जाती है? 
                प्राणों से प्राण बिछुड़ते जब
                 सुध- बुध खो ही जाती है। 
बसन्त बहारें मलय पवन में, आंचल कैसे लहराऊं मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 
                  मधुर मधुर संगीत सुहाना, 
                  मुझको भी तो भाता है। 
                  पर जब माटी सिसके अपनी, 
                   दिल मेरा भर आता है
फिर भी तुम कहते हो मुझसे, गीत खुशी के गाऊँ मैं? 
चलती नहीं लेखनी मेरी, गीत प्रीत के गाऊँ मैं? 

      
डा. साधना तोमर   
 बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश


'बहार '
बहार बन के आयी तू मेरी जिंदगी में 
अनदेखे सपने पल्लवित हुये मुझ में 

मन में अनोखा आनंदानुभव 
अनुयायी हूँ अनुरक्त तुझ में 

प्रेम राग गाया पपिहा तेरेलिए 
पयोद देगा प्रेय -पयाम तुझे

परेवा देगा पन्नी में लिखा प्रेम खत 
पलिका अंबर में बैठ के आ जा 

मिलेंगे दोनों शशि किरण में 
चहल -पहल, करते अगल -बगल में 

चारु -चंद् की शीतल रश्मि बुला रही है 
ओ मेरे चंद्रिका हो जाये जलवा! 

डा सरोज मेटी लोडाया 'आश्विन '
ज़ल "
मुझसे देखी नहीं जाती किसी की जुदाई ।
शाख़ पै बैठे परिन्दों को उड़ाऊॅ कैसे ।
लोग पढ़ लेते हैं दिल की जुबां नज़रों से ।
एसे आलम में दिल का राज़ छुपाऊॅ कैसे ।
मुझको हर ख्वाब-ए-ताबीर से डर लगता है ।
भीगी पलकों पे कोई ख्वाब सजाऊॅ कैसे ।
खबर है किसे मर्ज़ ए-इश्क लगा है मुझे ।
अपने  आँसुओं का सबब बताऊँ कैसे 
आग सुलगती है दिल में उसकी बेरूखी से ।
इस दिल की तपिश को अश्कों से बुझाऊँ कैसे ।
वीना अचतानी, 
जोधपुर (राजस्थान)



मैं गीत खुशी के गाती हूं 
************************************
मैं गीत खुशी के गाती हूं,
चाहे जैसा भी मौसम हो ,
हर मौसम को सह जाती हूं,
 हूं मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

हमेशा कष्टों से बचाता ,
हमारा यह परिवार है ,
बट वृक्ष ही परिवार के ,
मूल का आधार है ,
प्यार पनपता है जहां ,
मिलता हमें संस्कार है ,
कुम्हार हाथों से देता ,
घड़ों को आकार है ,
सबके सपनों को साकार करने ,
आशा के दीप जलाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

माला के बिखरे मोती को ,
एक सूत्र में मैं बांधूंगी,
 प्रेम की माटी से नफ़रत की,
 खाई को मैं पाटूंगी ,
  उगी हुई है बेल विषैली ,
उनको भी मैं छांटूंगी ,
औरों के ग़म को लेकर मैं,
 अपनी खुशियां बाटूंगी ,
मर्यादा की चादर ओढ़े,
अपना फर्ज निभाती हूं ,
मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

संकल्पों के पंख लगाकर ,
हम नई चेतना लाएंगे ,
चुनौतियों को लक्ष्य बना ,
आगे ही बढ़ते जाएंगे ,
स्वर्ण रश्मियों के संग,
हम नया सवेरा लाएंगे,
 समय की साक्षी बनाकर,
 नया इतिहास रचाएंगे ,
मन की वीणा में सरगम की,
 झंकार भरती जाती हूं,
 मैं गीत खुशी के गाती हूं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी
619अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक,
 इंदौर म.प्र. मोबाइल 8989409210



अग्निशिखा 
नमन मंच
दिनांक --13/6/2021

इंद्रधनुष (हर रंगों की अपनी कहानी)
******* 

रवि की किरणे पड़ती अंबर पर
 विचरते पानी के छल्लो पर जब
 छल्लो से विचरता रवि का प्रकाश
 सप्त रंगों में बट जाता है तब 
 सात रंगों की माला में गुथ
अंबर में इंद्रधनुष बन जाता है !

    समीर नीर अंतरिक्ष
      सब होते रंगहीन   
      जीवन में प्रकाश 
     करता है हमें रंगीन !

  इंद्रधनुष की कथा पुरानी 
  सुनने में लगती प्यारी 
एक माला में गुथी हुई पर
 हर रंगों की अपनी कहानी!
जीवन में रंगों का प्रभाव 
    इस कदर है छाया 
    हर जीवो के अंदर 
   उत्साह और उमंग लाया !

    उमंग की हवा में बहकर
     सपनों को है सजाता 
  तीज त्योहार का आनंद ले
 खुशीयों को है रंगीन बनाता !

     होली के हुड़दंग में 
    लाल पीले रंगों के संग 
   खुशियां देता और बटोरता
   भावनाओं के रंग में बहता! 

   लाल रंग खतरे की घंटी
    लाल रंग उर्जा भी देता
    दोनों गुण संग लेकर भी
   जीवन को है रंगीन बनाता! 

  पीली पीली सरसों जब खिलती      
   प्रकृति भी खिलकर उठती
  पीली हल्दी का महत्व है अपना
       हर कार्य में पवित्र 
       और शुभ कहलाती !

    मन को शीतलता दे जाता
         रंग हरा ऋंगार दे
   सौभाग्यवती नारी का सौंदर्य बढ़ा
   ऋंगारित कर नारी मन को 
       आनंदित करता ! 

   नीले रंग का अपना महत्व है

  रत्नाकर और अंबर भी नीला
   नयनों को सुख देता है जब
   नीर भी लगता है नीला मानो
     अंबर आया है धरा पर! 
  
श्वेत रंग शांति का प्रतीक 
 सहज सरल विचार है लाता
 मन को हमारे शांत करके
 सात्विकता हममे भरता! 

था गोकुल का कान्हा काला 
बरसाने की राधा गोरी 
भावनाओं का रंग सच्चा हो तो
  प्रेम पुष्प खिल आते हैं फिर,
  
अपशकुन कैसे कहलाए रंग काला !

 रंगो का महत्व लिखने बैठूं तो
      कई रंग मिल जाते हैं
    शब्दों के रंग, भावों के रंग
   मेरी कविता में बस जाते हैं! 

            चंद्रिका व्यास
          खारघर नवी मुंबई




हाल ए दिल (मेरा गीत)

मुस्का रहे हैं लव ये,
फिर आंँखें नम सी क्यों है ।
लगती हर खुशी अब ,
ना जाने कम सी क्यों है ।

कोई यहांँ है अपना ,
ये तो बस भरम है ।
कर ले जतन कोई भी ,
दर्द होता नहीं ये कम है ।

लगता है मानो अब तो,
सांँसे रही ये थम है ।
खुले राज न लबों से ,
तुझको मेरी कसम है ।

चुभती है रोशनी ये,
भाता मुझे तो तय है ।

शिकवा ना तुझझे कोई ,
न गिला कोई सनम है ।
मिलता है सबको वो ही ,
जिसका भी जो कर्म है ।

कोई यहांँ है अपना ,
ये तो बस भरम है ।
मुस्कान रहे हैं लब ये ,
यह फिर आंँखें नम सी क्यों है।

लगता हर खुशी अब ,
न जाने कम सी क्यों है।
लगता हर खुशी अब ,
न जाने कब से क्यों है।।

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल☯️


विषय... जिंदगी
दिनांक...13/6/2021

जब से रहा न साथ तेरा जिंदगी के साथ।
दिल का सुकूँ भी खो गया लब हँसी के साथ।।

जो चल रहा था साथ कभी साये की तरह।
कल वो मिला है मुझको किसी अजनबी के साथ।।

झूठी मुहब्बतों के उजाले न दो मुझे।
मैं खुश बहुत हूँ अपनी इसी तीरगी के साथ।।

तुमको तो रास आ गयी महलों की रोनकें।
मैं जी रहा हूँ अब भी मगर बेबसी के साथ।।

आज़ाद जिसके वास्ते सब कुछ गंवा दिया
मुझसे मिला है वो भी बडी बेरुखी के साथ।।
*डा.महताब अहमद आज़ाद*
उत्तर प्रदेश


🌸🌸🌸🌸 एक रचना
******  
बेटी नहीं मात्रकाया है ,
वह ममता का दृश्य रूप है।।
 कठिन सर्द की ठिठुरन में वह 
सुखदाई कुनकुनी धूप है।। बेटी नहीं मात्रकाया है।।***

 मां के वक्षस्थल से लगकर दुख उसका वह हर लेती है झांक पिता के विवश नयन में,
 सारी स्थितियां पढ़ लेती है,
 अंतर्मन की पीर समझती 
करुणा का पावन स्वरूप है ।।
बेटी नहीं मात्र काया है 
वह ममता का दृश्य रूप है।।1
 बप्पा मां के लिए दौड़ कर पीहर से मैं के आती है 
आना जाना कठिन काम है,
 फिर भी अनुपम सुख पाती है 
उसे पता है प्यार बिना यह मानव जीवन अंधकूप है।। बेटी नहीं मात्र का आया है वह ममता का दृश्य रूप है।।2
 पूजा घर में जली धूप सी, घर आंगन महका जाती है कैसे हैं व्यतीत करना दिन माता को समझा जाती है सुन लेती दोशब्द नेह के पा जाती थाती अनूप है।।
 बेटी नहीं मात्रकाया है ।।3
पति के मां को मां कहती है बाबा को बाबा कहती है सरस नदी की तरह कगारों बीच नित्य कलकल बहती है ,
जीवन की वह सेतु सुघर है,
 कहीं नहीं कुछ भी कुरूप है।।
 बेटी नहीं मात्रकाया है।।4
🌸




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Friday, 11 June 2021

11/6/2021/ हाइकु पर अग्निशिखा मंच की कार्यशाला_dr alka pandey


होली - हाइकु 

फागुन आया 
धरा रगों में डूबी 
यौवन छाया 

फगुआ रंग 
करते हुड़दंग 
रंगते अंग 

होली के रंग 
बरजोरी संग 
मलते रंग 

होली गुलाल 
मस्तक पे विराजे 
गाल गुलाबी 

आज सजन 
संग होली की मस्ती 
रंगे मिज़ाज 

होली उल्लास 
संजना संग खेले 
आस पुरानी 

हवा उड़ाएँ 
गगन पे गुलाल 
धरा नहाएँ 

श्याम बिहारी 
बरसाने की होली 
राधा से खेले 

राँधे गोपाल 
गोपियों संग होली 
मन से खेले 

राँधा के कन्हा 
पकड़े है कलाई 
रंगते तन 

फगुआ रंग 
जन जन पे चढ़ा 
बैरी है मीत 

ढोल मंजीरा 
तन मन थिरके 
रंग पे भंग 

गली मोहल्ले 
ढोल तासे बजते 
नाचते प्रेमी 

होली के रंग 
भीगा तन बदन 
बिन बारिश 

भांग चढ़ाई 
झूमने जग लगा 
मन है ख़ुश 

ठंडाई भांग 
सबको है पिलाते 
चढ़ता रंग 

सखियो संग 
करते है हुड़दंग 
होली मनाते 

रंगों की वर्षा 
पिया को  है भिगोती 
मन झूमता 

होली रंगों में 
हमजोली के संग 
भिगोते तन 

होली की छबी 
रंगों में डूबा मुख 
रंगा है तन 

डॉ अलका पाण्डेय

मंच को नमन🙏

दिनांक 11/  6/21
दिन शुक्रवार

 हाइकु,

सावन आया
मनभावन छाया
ऐसा लुभाया

गोरी का मन
हे मन में मुस्काती
झूमती गाती

प्रेमील जोड़े
झूमते गाते जाते
हे मुस्कुराते

राधा मुरारी
गिरिवर  धारी है
प्रेम पुजारी

सावन आया 
प्रकृति पर छाया
बयार लाया

स्वरचित
 सुषमा शुक्ला,
 इंदौर

आज की विधा - हाइकु

नमन मंच

सावनी घटा
चमकती बिजली
बालक डरा

 बरसे  पानी
छानी टप  टपके 
भीगे किसान

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

मंच को नमन
हाइकु:--- होली

रंग फुहार
पिचकारी की धार
भींगे हैं तन।

उड़ा गुलाल
फागुन सराबोर
होली के रंग।

रंग उड़ाता
फागुन मन भाता
होली की धूम।

फाग के गीत
गुजिया की मिठास
सखियों के साथ।

होली के रंग
फागुन बरसाता
द्वेष मिटाता ।

प्रीत में रंग
मानव का जीवन
होली संदेश।

विजयेन्द्र मोहन।

शुक्रवार 11/6/ 2021

विधा : हाइकू
विषय : सावन

1
सावन बरसे
प्रिय बिन एकाकी
मन तरसे
2
चले पवन
शीतलता लेकर
हर्षित मन।
3
गरजे घन
कजरारे घुमड़े
भगे तपन।
4
पीऊ पुकारे
तड़पे बिरहन
पिया कहां रे।
5
ऊंच अटारी
हवा मधुर जिमि
स्वर्ग दुआरी।
6
उमड़े घन
झर झर बरसे
भीगे आंगन
7
बांधे पायल
छम छम नचती
गोरी पागल।
8
मोर पुकारे
घन गर्जन सुन
सांझ सकारे।
9
दादुर बोलें
कामसूत्र के सारे
परदे खोलें।
10
झिल्ली झंकारे
छनकते घुंघरू
यूं लगता रे।
11
प्यासी धरती
पीकर जल मीठा
खूब सिहरती
12
पानी बरसे
फसल उगे तब
धरती हरसे।
13
ऋतु की रानी
जब जब बरसे
हंसे जवानी।
14
हे ऋतु रानी
वर्ष वर्ष तू आना
लेकर पानी।
15
सुखा पड़ता
तेरे बिन संसार
भूखा मरता।
16
मेरे ईश्वर
धरती है हंसती
पानी पीकर।
**********
कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

आज की विधा - हाइकु

सावन आया,
हरियाली है लाया,
फूल खिलाया।

मन हर्षाया
टिप टिप बूंदो से
प्यास बुझाया।

याद दिलाया
बचपन वाला वो
सावन आया।

©️®️पूनम शर्मा स्नेहिल ☯️

नमन मंच 

हाइकु 
आया सावन ,
साजन याद आये ,
नयन भीगे 

भीगे सावन ,
दुल्हन शरमाये ,
साजन आये 

धरती पर ,
उगाती नई फसल ,
सावन झड़ी 

सावन
*****

सावन आया
बदरा कारे छाऐ
मोर नाचे है

हरियाली है
पेड़ों पर कितनी 
मन लुभाती

कोयल कूके
मधुर आवाज़ है
अंबूआ डारी।।

पानी बरसा
शीतलता है भाती
राहत मिली

सावन आयो
झूले बंधे पेड़ो पे
साजन आओ

वीना आडवानी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र
******************

विषय : हायकू

चल आहें भर

चल, आहें भर,
जिंदगी भरपूर जीता चल,
चल आहें भर।

चाहे रोटी या  
रजाई ,पूरा करता चल,
चल आहें भर।

दूर रह साकी ,
देख ,मेरा भी है घर,
चल आहें भर।

अच्छी सी हो ,
एक लुगाई ,प्यार देते चल,
चल आहें भर।

जिंदगी में हो ,
बहुत कमाई ,दर्द थोड़ा कम,
चल आहें भर।

खुशियां सारी ,
भरी पडाई ,गम नहीं मचल,
चल आहें भर।

भक्ति में हो 
लगन लगाई ,पाप दूर से टल
चल आहें भर।

खाए तगड़ा सेठ 
मलाई, कहीं निवाले कम
चल आहें भर।

राजनीति में है कमाई,
बदुआएं भी, नहीं हैं कम,
चल आहें भर।

लालचों की बाढ़ ,
है आई, यहा जिंदगी कम
चल आहें भर।

शेखर रामकृष्ण तिवारी
आबू धाबी/मुंबई
00971552243968
ब्लॉग  : इंसानियत की आवाज
          SHEKHAR R TIWARI, 
           SHEKHU

विधा                       कविता(हाइकू)

विषय                       सावन आया 

रचना                   नरेन्द्र कुमार शर्मा 
✍ ---------------------------------✍
                      हि0प्र0शिक्षा विभाग
------------------------------------------

उमड़ घुमड़ कर सावन आया,
बादल छाए कौंधी बिजली,
वो ऐसा मौसम बारिश लाया।


रिमझिम रिमझिम बारिश आई,
किसानों के चेहरे पे खुशियाँ छाई,
ये मौसम सबको भाया।


चरों ओर अब कीचड़ हुआ 
भर गया वो सूखा कुआँ 
मौसम ये झाग लेकर आया।


इस मौसम में नाचे मोर,
धुंध फैली चारों ओर 
ये मौसम राधा को भाया।


उमड़ घुमड़ कर सावन आया 
बादल छाए कौंधी बिजली 
वो ऐसा मौसम बारिश लाया 


✍------------🙏🏻-----------✍

हाइकु ःसावन



सावन आया
 खुशियाँ भर लाया
त्यौहार लाया


सावन आया
मैके की याद आई
 राखी बनाई

सावन आये
बेटियाँ याद करे
 बाबुल आये

 सावन लायो
मनभावन  रंग
 खुशी के संग

सावन आया
झूम झूम के लाया
  बरखा लाया

पेड़ो पे  झूले
 सखियाँ खूब झूलें
गीत भी गायें

 सावन में ही
 बालाएँ पहनती
हरी चूड़ियाँ
    

 आओ सखियाँ
पेड़ो पे झूला डालें
 साजन.झूलें


आशा जाकड़

🌹🌹हाइकू🌹🌹
🌹विषय -सावन 🌹

सावन आया
संग यादें लाया
मन हर्षाया

बारिश लाई 
सौंधी महक आई 
खुशियाँ लाई

भुट्टा खीरा 
संग अपने लाई
मौसम प्यारा

संग प्रीत के 
झूले भी याद आये
संग प्रीतम

हरा भरा है
प्रकृति का मौसम
ख़ुशी भरा है

हेमा जैन (स्वरचित )

अग्नि शिखा मंच
११/६/२०२१
सावन पर हायकू
     सावन आया
 मेरे को मन भाया
   वरसा पानी

   कोयल कूकी
झूला पडा अमवा
 .के डार पर 

   सखिया आई
   कजरी गीत गाई
   बकुला उडा

   भाभी सावन
  में मेहदी लगाई
  .अपने हाथ


   धरती धानी
चुनर ओढ ली है
  नाचता मोर

   दादुर बोले
पपीहा पी बुलाये
   घटा घेरती
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरपूर यू.पी

हाइकु

विषय सावन

सावन रे
बरसों झम झम
सूखा खेत

बोए बीज
फसल उग जाए
मन हर्षे

गाए गीत
ओढे चुनरी
छायी खुशियां

मन तरसे
पी  के वास्ते
निहारु डगर

कुमकुम वेद सेन

सावन हाइकू
अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच
विषय_सावन पर हाइकू
शुक्रवार,११_६_२०२१.
आया सावन,
पिया मनभावन,
होए मिलन।१।
तुमरे बिन,
समस्त रात_दिन,
हैं गमगीन।२।
आप आइए,
मत भरमाइए,
फरमाइए।३।
चाहत पूरी,
न रहेगी अधूरी,
अति जरूरी।४।
तुम आओ तो,
जो चाहो वो पाओ तो,
मन भाओ तो।५।
एक मिलन,
इस भीगे सावन,
मिलो साजन।६।
आप आइए,
औ, ना कुछ चाहिए,
रुक जाइए।७।
स्वरचित मौलिक हाईकू
रानी अग्रवाल,मुंबई,११_६_२१.

अग्निशिखा मंच 🙏
विधा- हाइकु
विषय -सावन
दिनांक-11/6/21

सावन आया
बरसा रिमझिम
सौगात लाया
************
पानी बरसा
झमझम करती
बरसे मन
**************
फूल खिलते
भंवरा मंडराते
खुशियां लाते
***************
खिली धरती
बसुधा गीत गाये
मधुर राग
****************
कारे बदरा
बरसा टिप-टिप
आग लगाया
*****************
सावन मास
घर आयो सजना
नयना लड़ी
******************
मोर नाचते
बिजुरिया चमके
पपीहा गाते
*******************

डॉ मीना कुमारी परिहार


अग्नि शिखा
नमन मंच
विषय --: सावन
विधा--हाइकु
दिनांक--: 11/6/2021

बनी दीवाली
खेतों की हरियाली 
सावन आया !

  मेघ बनते
किसान खुश होते
  सावन आया !

 बोले कोयल
 कुहु कुहु करती
  गीत सुनाती !

सावन आया
बनती महारानी
बरखा रानी

 श्रृंगार कर 
दुल्हन बनी धरा 
  सावन आया! 

भीगे है मन
भिगोता तन मन 
सावन आया !

मेघ तडित
आलिंगन करते 
 एक दूजे से !

 भरी जवानी
 देखे प्रियतम की
 राह नवेली !

  कर ऋंगार 
पति के आवन की
  राह निहारे !

  भीगे है गोरी
साजन के आने से
   
  बारिश होती
 गोरी सकुचाती 
 भीगे वस्त्र में !

   सावन झूला
साजन झूलावे है
   मीत झूले है !

  सावन आया
हर त्योहार लाया
 खुशीयां आई !

  ताप गिरता
दे पानी की बौछारें
 जीवन देता !

 दादुर नाचे
सावन के आने से
  मेघा बरसे !

चंद्रिका व्यास
खारघर नवी मुंबई


अग्निशिखा मंच 
विशेष---सावन 
विधि---हाइकु 
दिनांक---11-6-2021 

बरखा रानी
खुशीयाँ है लाई
अग्न बुझाई  ।

सावन देख
हर मन हर्षाया
फूल मुस्काया  ।

मन उदास
सजन बिछोह में
अश्रु आँखों में 

याद जो आई 
दिल मचल उठा
टीस जगाई  ।

मनमोहक
फूल खिला प्यारा
सुंदर नज़ारा  ।


रानी नारंग

अग्निशिखा मंच को नमन🙏
आज का विषय :-*हायुकू*
  *सावन हायुकू*

मन    भावन
तन मन भिगोए 
आया सावन  ।।‌१

इंद्रधनुष्य
छाया आसमान में
देख मनुष्य ।। २

भृंगों की टोली 
पराग की झोलियां
किये है खाली ।।४

झूले पलना
राधा संग सखियां
तट   जमुना ।।‌५

कवि ==सुरेंद्र हरडे
             नागपुर
दिनांक:-11/06/2021

अग्निशिखा मच को नमन
विषय  :सावन
विधा   :हाइकु

सावन आया
हरा भरा प्रकृति
आनंदमय।।

रिमझिम सा
राग नया गा रही
वर्षा आज।।
मोरनी  खुशी
घुंघरू पहनती
नाचती आज,।।
किसान झूमा
लहराया फसल
देख सावन।।
पिया मिलन
 वेदना में तड़पे
देख सावन।

डॉ गायत्री खंडाटे
 हुबली,कर्नाटक।



उठे उमंग 
मन को  हरषाये ,
सावन आये 


स्मिता धिरासरिया ,बरपेटा रोड


शीर्षक-
हायकु सावन पर-

1. सखी लागे न

 जियरा मेरा आज 
  
मन उदास

2. आग जैसी  री
सावन में लगी है
   है बेहिसाब 

3 रात न बीते  , 
दिन हुए व्याकुल  
पिया की आस

4. बारिश  बूंदे 
कांपे मेरा जियरा 
      कैसे बचे जां 

5. आम्बुआ डाली 
  झूले पड़े री सखी
  आए वो याद

स्वरचित हाईकु
रजनी अग्रवाल जोधपुर

नमस्ते में ऐश्वर्या जोशी
अग्निशिखा परिवार को मेरा नमन प्रतियोगिता हेतु सावन विषय पर मैं मेरा हायकू प्रस्तुत करती हूं।

विषय- सावन

सावन माह
हरियाली फैलता
दिल गीत गाता।

सावन माह 
हर्षित करें मन
दिल को ठंड़।

सावन आया
मिलकर हम सब
सपने सजे।

सावन आया
मन चकोर हुए 
नाचती बैठी।

सावन आया
रिमझिम धुन सी
यादें पिया की।

सावन आया
तालाब नदी बहे
सुंदर लगे।

धन्यवाद
पुणे

हायकु सावन 

  नाचे कन्हैया 
बजाए बांसुरिया 
  मनमोहक 

  राधिका रानी 
चम्पा कुंज विहार
  सखियां आवें 

  कान्हा मुरली 
मोर पंख सजत 
  पीत वसन 

  श्याम बादल 
मेघालय अंबर 
   रे बरसत 

  सावन ऋतु 
हरियाली चुनरी 
 उड़ती जाए 

  धरा मुस्काए 
खेत खलिहान
   हँसते जाएं 

  पानी बरसे 
वर्षा अठखेलियाँ 
  जिया हर्षाए

  वृक्षारोपण 
आम पेड़ लगाओ 
  जन्म उत्सव

  हिंडोला झूलें
लहरिया चुंदडि़
  उड़ती जाए

  बिजुरी दिखे
घनघोर घटाएँ
  कड़की जाए

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
11-6-21

हायकू - सावन

सावन आया 
मन मयूर नाचे 
मन प्रसन्न

हिय में मेरे 
उठे रंग तरंग 
डोले रे मन 

बरसे मेघ 
रिमझिम सी बूंदे
मनमोहक 

आओ सखियां 
अरी ओ झूले झूला 
जाएं बहक 

छूं लूं घटाएं
उड़ू पवन संग 
हो मदहोश

ना रोको-टोको
झूम झूम के अब
आया सावन

सुमंगला सुमन


आया  सावन
मानते हैं पावन
हर्षित जन।

किसान देखा
आसमान की ओर
आया सावन।

मेंढक ,मोर 
चातक इंतजार,
आया  आवन।

भरी हरियां
खेत -खलियानों में
रंगा सावन।

हुलास यौवन 
तोता -तोती मिलाप
सिंचा सावन।

प्रकृति माँ
की गोदी भरादिया
हरा सावन।

डाॅ.सरोजा मेटी लोडाय।


शुक्रवार दिनांक***११/६/२१
विधा******हाइकु
विषय****#""सावन***#
                    ^^^^^

आया सावन ।
   जन हुए हर्षित ।।
मन     भावन ।।१

बहे   पवन ।।
     हरे   वन   जंगल ।
प्रसन्न   मन ।।२

कलियन   पे ।।
      जल बिंदु लगते ।
मुतियन    से ।।३

पावस  धारा ।।
      ताल नदी झरने ।
हसीं  नजारा ।।४

घटा है  छाई ।।
     बन राधा , सावन ।
लगे   कन्हाई ।।५

गोरी   सजके ।।
   चली  पी  से  मिलने ।
चोरी    चुपके ।।६

खींचे    आंचल ।।
      कलियों के भंवरे ।
 होके      पागल ।।७

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर 
        महाराष्ट्र


11 जून 2021
हाइकू 

बिन पानी 

मानव का
जीवन होता पूर्ण
वर्षा सावन

फसलों में है
हरियाली भरती
वर्षा सावन

कुएँ, तालाब
सब हैं भर जाते 
वर्षा सावन।

धरा तल में
छिपे हैं जीव जंतु
वर्षा सावन।

मेंढ़क गाएँ
टर्र-टर्र की धुन
वर्षा सावन।

काले बादल
आकाश आच्छादित
वर्षा सावन।

झूलों पर हैं
युवतियाँ झूलती
वर्षा सावन।

त्योहार आते
रक्षा बंधन, तीज
वर्षा सावन।

वर्षा जल को 
करो तुम संचित
वर्षा सावन।
🙏🌹 अग्नि शिखा मंच🌹🙏
🙏🌹जय अम्बे🌹११/६/२१🌹🙏
       🙏🌹हाइकु ,सावन🌹🙏


छाया अंधेरा, 
जोर से हवा चली, 
है हरियाली, 

घर से आए, 
सखा संग खेलने, 
नाव चलाए, 

सावन आया, 
बच्चों ने फेंका छाता, 
कीचड हुआ, 

मधुर हास्य,
भीगा पानी में तन,
प्रसन्न मन, 

वर्षा में खेले, 
करते कलशोर, 
नाचे रे मोर, 

कान्हा की बंसी, 
नाद ब्रम्ह जगाए, 
खुशीयाँ छाए, 

🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल, 🌹🙏


अग्नि शिखा मंच
दिनांक 11.062021
शुक्रवार
विषय सावन हायकू
1 .सावन का नाम
बरसात से काम
यही पैगाम ।
2 .बरसात मे
सुखे का क्या काम
सावन नाम।
3 .हरियाली है
हर  दिन सुहाना
सावन आना।
4. सावन माह 
नदियां लबालब
है लाजवाब।
5. सावन माह
बरसा की फुहार
सभी को प्यार।
6 . ठण्डा मौसम
बरसा का मौसम
हर कदम।
7 .फसल देख
किसान खुशहाल
बर्षा कमाल।

दिनेश शर्मा इंदौर
मोबाइल 9425350174


अरणीय मंच को नमन
हाइकु ( त्रिपदी)सावन
+++++++++
बादल आए 
नील गगन पर 
जिया लुभाए।
***
सावन आया 
नव रस बरसा
मुदित धरा। 
****
नदी तलइया
जल भर उमड़े
हिय डरपे ।
***
जल की बूँदें
टुप टुप गिरतीं
भीगी धरती ।
***
बरसा पानी
मन में अति खुश
परी सयानी ।
***
घास उगी है
जल गिरने पर
आश है जगी  ।
****
नदिया नाले
कल कल रव में
गीत सुनाते
***
नाविक आना
अपनी नौका लाना
हमें जाना है ।
***
नदी के पार
उस छोटे गांव में
मेरा घर है ।
***
नदी के बीच
लेकर पतवार 
चलें धारा में ।
***
झांकते वृक्ष
लगते हैं सुंदर
जलधारा में ।*
**
मित्र की बात
भला कैसे टाल दें
अच्छा नहीं है ।
-----------
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी

*"माँ शारदा को नमन"*

                *"सावन"*
                  *हायकू* 

कैसे कहूँ मैं
सावन आने वाला
भरी गर्मी में

आंधी आयी थी
बरसाया था पानी
सावन जैसा 

सावन आया
वन मे नाचा मोर
हरे  है पेड़


नदिया बही
बादल झुमे गाए
सावन आया
*चन्दा डांगी*

जय मां शारदे
***********
अग्नि शिखा मंच
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दिन- शुक्रवार
 दिनांक- 11/6/ 2021 
विषय- सावन 
विधा- *हाइकु* में प्रस्तुत रचना 

आ गए मीत।
मन मेरा गा रहा ।
सावनी गीत। 

घटा है घोर ।
सावन में यौवन।
नाचता मोर ।

सखी सुन री।
पुरवाई है आई ।
ओढ़ें चुनरी ।

दरख़्त कम। 
हरियाली खतम।
सूखा सावन ।

बरखा आई ।
रिमझिम फुहारे ।
मन को भाई ।

रागिनी मित्तल 
कटनी ,मध्य प्रदेश


नमन  अग्नि शिखा मंच 
विषय;-सावन
विधा;-हाइकू
दिनाँक;-11/6/2021
बरसे मेघा
सावन का महीना
मन हर्षाता।।1।।
सावन ऋतु
हरियाली है छायी
 मन को भायी।।2।।
सावन झड़ी
आरंभ हो किसानी
 लगे है भली।।3।।
तप्त धरा पे
सावन की फुहारें
  मन हरषे।।4।।
निहारिका झा🌹🌹🙏🙏
सावन पर हाइकु

सावन आया
हर्षित तन मन
सब को भाया। 

पड़े फुहार
बरसत बदरी
हर्ष अपार। 

वन में डोले
मोर पपीहा अब
कोयल बोले। 

प्रकृति रानी
आंचल लहराये
चूनर धानी। 

बागों में झूले
झूल रही सखियाँ
 गम  को भूले। 

डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत)



पेड़ लगाओ
परिवेश हो स्वच्छ
इस सावन

वैष्णो खत्री वेदिका
जबलपुर

अग्निशिखा मंच
तिथी ,,११,६,२०२१
विषय,, सावन


 १)  आया सावन
    ठंडा मौसम हुआ
      मनभावन

२) मेघ हैं छाए
 बिजली चमकती
 साजन आए

३) मन तरसाए
कहता है सावन
पिया बुलाए

नीरजा ठाकुर नीर
पलावा डोम्बिवली
महाराष्ट्र


नमन अग्निशिखा मंच
जय माँ शारदे
 प्रतियोगिता हेतु
दिनाँक - 11/6 /2021
विषय- सावन हाइकु

सुन सजना,
सावन आया सुन,
कोयल कुके।

बरखा देख
नाचे मन मयूर,
बहके मन।

आया सावन,
मेरे मन  भावन,
बरसे बूंद।

सुन सजना,
ला हरी- हरी चूड़ी,
पहनूंगी मैं।।

खनके चूड़ी,
करो मनसा  पूरी,
सुन सजना।।

रेखा शर्मा 'स्नेहा' मुजफ्फरपुर बिहार

मंच को सादर नमन
दिनांक  11 /  6 / 2021
दिन       शुक्रवार
*विषय      हायकू ( सावन )*

1) बरखा रानी
     लाई नई उम्मीदें
     खेतों में पानी

2) नैनों का पानी
     रिमझिम बरसा
     मेघ तरसा

3) है समाहित
      कान्हा की मुरली में
      छवि राधा की

  *मीना गोपाल त्रिपाठी*

      🙏सीखने की दिशा में कार्यरत हूं🙏


🌹 आया सावन🌹
         (हायकु) ‌

आ रे सावन
ओ रे मन भावन
आया सावन

आया सावन 
पिया मन भावन
आजा साजन

आ जा आकर
देजा अपना प्यार
छाए बहार

सजनी कहे 
मेरा भी मन चाहे
शर्माऊं काहे

बाहें पसारे
प्रियतम प्यारे
खड़ी हूं द्वारे 

आस लगाए 
हूं नयन बिछाए
क्यूं शरमाए

अब तो आजा
मेरी तृष्णा बुझा जा
गले लगा जा

आ रे सावन 
ओ रे मन भावन
आया सावन
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स्वरचित व मौलिक
डाॅ . आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़.
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सावन ( हाइकू) --- ओमप्रकाश पाण्डेय
1. झूमती हवा
चले ठंडी ठंडी
 सावन आयो

2. बहके मन
बहके नयनवा 
सवनवा में

3. मेघा गरजे
चमके बिजुरिया
मन हरसे

4. लगे कि ऐसे
बौराइल बा मन
बदरिया में

5. झूला पड़ल
गोरी मारे पेगंवा
सखिंया संग

6.ठंडी फुहार
जब गिरे धरा पे
खिले दिशायें

7.उगले सोना
फिर मोरे खेतवा
मनवा नाचे
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)

आया सावन
आई ठंडी फुहार
छाई बहार

बरसा पानी
ऋतु आई सुहानी
चूनर धानी

प्यारी धरती
ओढ़े चूनर धानी
वर्षा का पानी

महका वन
पुलकित है मन
खुशी जीवन

पपीहा गाते
भंवरे मंडराते
प्यास बुझाते


शोभा रानी तिवारी इन्दौर


वीना अचतानी, 
अग्निशिखा मंच को नमन, 
विषय**सावन  ** हाइकू ****
1)  सावन आया 
      वसुधा का ह्रदय 
      खिलखिलाया   ।

2)   है रिमझिम 
       सावन की बारिश 
       शायद तू है  ।

3)    हमें  लगता
        रोया करती शाख
       सावन बिना    ।

3)    पात पात में 
        तरू तरू बोलता
        प्रीत के बोल   ।

4)    वसंती वय
        मंडराते भ्रमर 
       अतृप्त चाह   ।

5)     फूलों  फूलों की 
          खुशबु  से चमन
          झोली भर दे  ।

6)      कटे जब से
          हरे भरे जंगल
          उदास  है सावन   ।

7)       पेड़ों के पते
          झूम झूम डोलते
           हवा से बोलते ।

 8)      वर्षा उदास 
           झूमती झालर सी
            बिन बरसे ।।

9)        नहीं  मनता
            कोई  उत्सव
            सावन के बिना  ।

10)      आया  सावन
            बुलबुल  गाती है
             शायद तू है ।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर (राजस्थान)....


अग्निशिखा
11/6/2021 शुक्रवार
विषय-हाइकु (सावन)

बरसे बूंदे
बरसता सावन
मेरे अंगना

सावन सूखा
बिन प्रियतम के
याद सताये

काली घटाएं
रिमझिम बरसे
सावन आया

बरसे पानी
महिना सावन का
ऋतु सुहानी

पिया परदेश
झूला कौन झुलाये
सूना सावन

कोयल बोले
हरियाला सावन
अम्बुवा डाली

फूल खिले है
महका उपवन
सावन आया

धरती गाये
ठुमकता सावन
झूमे गगन

भीगा सावन
धरती जल-थल
मनभावन

सावनी रात
चमकती बिजली
साजन दूर

                  तारा "प्रीत"
              जोधपुर (राज०)


* अग्नि शिखा काव्य मंच*
* शुक्रवार - १०/६/२०२१ 
* विधा - हाइकू 
* विषय- सावन  
* माँ शारदे को वंदन*

सावन ऋतु 
मन भावन आई 
बरसी बूँदे 

आया सावन 
बूंदों की छम-छम
मीठा संगीत 

उमड़ी घटायें 
घनघोर अंधेरा 
झूमाँ सावन 

घरती प्यासी
टूट कर बरसो 
प्रिय सावन 

जीव जगत 
पाता नव जीवन 
आता सावन 

भरी तलैया 
छलक गये ताल 
आया सावन

भाई की आस
बहनों को रहती 
सावन मास 

 सजी है सेज 
पिया मिलन रात 
आया सावन 

सरोज दुगड़
खारूपेटिया , गुवाहाटी
असम
🙏🙏🙏

अग्निशिखा मंच 
विषय -सावन हाइकू 
सावन -हाइकू 

कारी बदरी 
झक झोर बारिस 
मचायें शोर 

सावन भादो 
घन घोर घटायें 
बरसा पानी 

नाचे मोर
उपवन बहार 
 मन मतंग 

कोयल कुक 
पिया मनुहार है  
रास रंग 

 सावन झूम 
मधु मस्त बयार 
कारी बदरी 

सावन आया 
झक झोर बारिस 
शोर मचायें 

आम्र कुँज 
पिहु पिहु बोले रे 
पपिहरा रे 
अनिता शरद झा मुंबई




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