Tuesday, 19 October 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 19 2021 को लघु कथा लेखन में अंबर के तारे गिनना विषय पर सभी रचनाकारों के शानदार लघु कथाएं पढ़ें डॉ अलका पांडे मुंबई



अंबर के तारे गिनना ।।
लघु कथा

सुशीला को सारी रात नींद नही आई । वहां अम्बर के तारे गिनती रही । 
आज उसका दिल बहुत बेचैन था क्योंकि आज के ही दिन उसके पति तरुण का कार एक्सीडेंट में मौत हो गई थी । सुशीला इस दिन को कभी भुला नहीं पाती है । दिन यूं ही उसके गुजरते चले जाते हैं बहुत ही मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला था , और एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करने लगी और अपना समय किसी तरह गुजार रही थी । पर यह मनहूस दिन आते ही उसे वहीं दुर्घटना याद आ जाती है और वह सारी रात बैठे हुए आकाश के तारे गिनते हुए काट देती है । यह सिलसिला यूं ही चला आ रहा हैं । सुशीला की सहेली कमला ने उसे बहुत ही सहारा दिया उसके हर मुश्किल दौर में साया की तरह उसके साथ रही और उसे समझाती हैं । होनी को कोई टाल नहीं सकता है । तुम्हें हिम्मत रखनी होगी , भूतकाल को भूल कर वर्तमान में जीना होगा भविष्य का सोचना होगा , पूरानी बाते भूलकर जिंदगी में आगे बढ़ना होगा । अभी लंबी जिंदगी पड़ी है ।तुम कोई अच्छा साथी चुन कर शादी कर लो , परंतु सुशीला तरुण को भूल नहीं पाती है । और वह उसे मना कर देती है । उसका कहना है कि तरुण की यादें उसे जिंदगी काटने के लिए बहुत है , इतना प्यार तरुण ने दिया है कि मैं दूसरी शादी के बारे में सोच भी नहीं सकते , कमला ने बहुत समझाया और कहा तुम नकारात्मक विचार मन से निकाल दो साकारत्मक  सोच अपनाओं हो सकता है तुम्हें तरुण जैसा ही कोई दूसरा साथी मिल जाए तो तुम्हारी जिंदगी आसान हो जाएगी , बहुत समझाने के बाद कमला ने कहा तुम सोचना मैं जा रही हूं पर तुम सोचना जरूर , इस बार  सुशीला ने कमला का हाथ पकड़ा और कहा मैं तुम्हारी बातों पर विचार करूंगी , तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो मेरे बारे में सोचती हो कमला को विदा करके सुशीला विचारों में मग्न हो गई , शायद कमला सही कह रही है वह सोच रही थी , तभी हवा का एक झोंका आया और उसके कानों में कुछ कह गया , सुशीला मुस्करा उठी 
अलका पांडे

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[19/10, 8:07 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺मंगल वार - 19/10 /2021
विषय : अम्बर के तारे गिनना-नींद न आना।
🌺विधा - लघुकथा 

बात उस जमाने की है जब टीवी, कंप्यूटर मोबाइल भविष्य के गर्भ में थे। तब इनकी कल्पना की कहानियां कही जाती थीं। और लोग बड़े आश्चर्य चकित हो होकर सुनते थे। लोगो को विश्वास ही नहीं होता था कि ऐसा कभी हो सकता है।
तब तो व्यक्तियों के मध्य सूचना आदान प्रदान का साधन मात्र चिट्ठी होती थी। 
चिट्ठी जाने और उसका जवाब आने में महीने लग जाते थे। 
तब दूर दराज नौकरी करने वाले लोग अपने पत्नी बच्चों को साथ न ले जाकर घर पर मां बाप के पास छोड़ देते थे। साल छः महीन में घर लौटते थे।
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साहब, श्रीराम का बेटा था। उसकी मां बीमारी में चल बसी थी। श्रीराम संपन्न व्यक्ति था अतः उसकी दूसरी शादी हो गई। साहब को नई मां तो मिल गई किंतु नई मां उसे फूटी आंखों पसंद नहीं करती थी। कुछ दिनों बाद उसके भी बाल बच्चे होने लगे। अब तो साहब की कठिनाइयां और भी बढ़ने लगी थीं। 
श्रीराम को अच्छा तो नहीं लगता था किंतु करे तो क्या करे। उसने कम उम्र में ही साहब की शादी कर दी और उसे अलग कर दिया। 
कुछ दिनों बाद साहब का भी परिवार बढ़ने लगा। खर्चे बढ़ने लगे। पिताजी ने खेत दिया था उससे गुजारा नहीं हो पा रहा था। 
मजबूर होकर उसे नौकरी की तलाश में कलकत्ता जाना पड़ा। वहां वह मिठाई का खोमचा लगाने लगा। वह 10 किलो दूध रोज खरीदता, उसकी मिल्क केक बनाता और एक स्कूल के सामने खड़ा हो जाता। जब बच्चों की छुट्टी होती तो उसकी मिठाई झटपट बिक जाती। कमाई के चक्कर में घर नहीं जा पाता।
इधर उसकी पत्नी चंद्रा विरह में तपती रहती। वह एक एक रात अंबर के तारे गिन गिन कर काटती। जब नहीं सहन होता तो किसी पढ़ने वाले बच्चे से निहोरे करती कि उसके पति को पत्र लिख दे। 
वह पत्र में लिखवाती खाना वहां खाओ तो पानी यहां पीना। थोड़ा लिखना बहुत समझना। तुम तो खुद अकल के मालिक हो। 
पति उसके पत्र का रहस्य समझकर घर वापस आ जाता। और वह खुश हो जाती। सारे कष्ट भूल जाती।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[19/10, 10:01 am] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: मंच अग्निशिखा 
विषय अंबर के तारे गिनना नींद ना आना 
कहानी 
उसका ये हर रोज का काम था चौखट पपर बिस्तर लगा कर रोज तारे गिनता 
गिनता क्या उन तारों में ढूढ़ता कोई अपना जो आकर उसे गले से लगाएगा और पूछेगा, खाना पेटभर खाया, 
सौतेली माँ गाली दे कर चली जाती कहती मा क़ो मरे समय हो गया मगर ये जोधन अब्ब भी उस कलमुही क़ो 
तारों में खोजता फिरता है, जोधन क़ो अब्ब हर तिरस्कार की आदत पड़ गई थी, रोटी मिले ना मिले उसे अब्ब पढ़ना थाउसकी मा माँ का सपना था की जिस बीमारी से वह मरी कोई और ना मरे, 
हा टीबी हो गई थी जोधन की माँ क़ो, 
जोधन क़ो नींद नहीं आती थी वह किताबें पढ़ता और ज़ब थक जाता तारों में माँ क़ो ढूढ़ता, 
समय बीतता गया.. और इस तरह से 
जोधन बड़ा हो गया और उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह डॉक्टर बन गया था. उसकी माँ का सपना पूरा हो गया था. आज ज़ब उसे नींद नहीं आ रही थी तारे ही गिन रहा था की एक तारा टूट कर उसके पास आया तारे की रौशनी से जोधन चकाचौध हो गया 
वो कोई और नहीं मा थी जोधन की जो उसे आशीष देने आयी थी... 
इशिता सिंह 
शिक्षिका
[19/10, 12:13 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* अम्बर के तारे गिनना *
* लघु - कथा *

बात उस ज़मानें की है जब राजस्थान के लोग व्यापारर्थ असम -बंगाल जाया करते थे ! उनके परिवार पीछे गाँव में ही रहते थे ! उस जमाने में संचार के माध्यम सीमित थे ! आपसी संवाद का जरिया चिठ्ठी पत्री ही होता था !
आज की तरह इंटरनेट , मोबाइल नहीं था की जब मन हुआ अपनों से संवाद हो गया ! 
माँताऐं अपनें पूत्र विरह में व्यथित रहती और उनकी सलामती की प्रतिपल कामना करती ! 
जिन युवतियों के पति परदेश कमाने जाते उनकी मनोदशा बहुत व्याकुल होती ! वे दिन में बेसब्री से डाकिये का इंतजार करती की शायद पिया की पाती आ जाए !
रात उनकी विरह में जलकर तारे "अंबर के तारे गिन गिन बितती !
सुबह अपनी हम उम्र ननद से अपनी व्यथा कहती !
उस ज़मानें में संयुक्त परिवार होते थे सो हम उम्र देवरानी - जेठानी एक दूसरे की राजदार सहेली होती थी और अपना सुख- दुख बाँटती थी !
वे उनके साथ अपने प्रियतम की बातें कर आत्मिक सुख का अनुभव करती थी ! कौन कहता है कि विवाह के बाद प्रेम मर जाता है?अरे वह तो काल के परिपाक के बाद प्रेम की चाशनी में पड़ कर और मीठा हो जाता था ! एक दुसरे से दूर रहते तो प्रेम में आर्कषण था ! रिश्तों में कहीं कोई बासीपन न था ! 
रूपया - पैसा भौतिक सुख सुविधा सब कुछ नगण्य था ! था तो बस सुखद अनुभूतियों वाला प्यार .....!
उन रिश्तों में में ही मित्रता का और विश्वास का रिश्ता पनपता था !
जब रात को खुली छत पर विविध भारती पर लता जी का कोई सुरीला विरह गीत बजता तो उन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति असंम्भव होती थी !
तकिया आँसुओं से गीला और रातें " "अंबर के तारे गिन- गिन " कटती थी ?

सरोज दुगड़
खारुपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[19/10, 12:37 pm] वीना अडवानी 👩: लघुकथा

नींद ना आना
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आज न जाने क्यों मन फिर उन्हीं पुरानी यादों में खो चला है जिसके चलते मां मेरा मन उदास है और मुझे नींद नहीं आ रही है, सविता भरे कंठ से अपनी मां को बोली। मां सविता को समझाते हुए बोली बेटी भूल जा उस बुरी यादों को और जी फिर से एक नई जिंदगी, मेरी लाडो। सविता जो की बहुत ही होनहार थी हर काम में चाहे वो पढ़ाई हो या घर का काम, सिलाई बुनाई क्या नहीं हुनर था सविता के पास निपुण दक्ष अपने मां बाप की इकलौती संतान थी सविता उसके बाबा उसे हर एक सुख देते थे। सविता की बुलंदियों को देख उसकी ही कुछ सखियां उससे द्वेष रखती और हर पल सविता को कुछ न कुछ कर सताने की युक्ति भी बनाती पर सविता सदैव सावधान होकर एसी लड़कीयों से दूर रहने में ही अपना हित समझने लगी। एक बार द्वेष में भरी एक सखी ने अपने ही परिचित मित्र संग मिल सविता को नुक्सान पहुंचाने की योजना बनाई और बातों ही बातों में सविता से दोस्ती कर घूमने के बहाने एक सुनसान इलाके में ले गयी सविता उसकी करतूत से बिल्कुल अंजान थी वो दोनों बाते करती हुई बस चली जा रही थी। पहले से ही घात लगाए सविता की सखी के मित्र सविता को नजदीक आते देख जो छुप के बैठे थे, बाहर निकल सविता और उसकी सखी को घेर बैठे। सविता की सखी मन में तो द्वेष के कारण खुश थी परंतु ऊपरी तौर से भय का नाटक करने लगी और मौका देख भाग निकली सविता सखी के मित्र की शिकार हुई और जो सविता के साथ हुआ जो हमारे देश की ना जाने कितनी बच्चियों, औरतों के साथ होता है जो ताउम्र जिंदगी में एक काल जैसा ग्रहण बन ना जीने देता और ना ही मरने देता है। ना जाने कितनी सविता होंगी जिनकी रातो की नींद आंखों से ओझल हो वेदना भरी कराहना के साथ घनी अंधेरी रातों में सिसकियां भर रही होती हैं ‌। बस खत्म कर देती कभी-कभी किसी की द्वेष भावना किसी के जीवन को। 

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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[19/10, 12:43 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विधा:-- *लघुकथा*
विषय:--- *अंबर के तारे गिनना (नींद ना आना)*

मेरे मित्र विजय के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद उसे रात में नींद नहीं आता रात भर आकाश में तारे गिनते रहता था। सुबह-सुबह टहलने के समय मित्र होने के नाते हमे बताया ।चुकी काफी कम उम्र से ही सेवा में आ गये है,कारण परिवारिक जिम्मेवारी उसके कंधे पर था इसलिए करीब 40 वर्ष तक सेवाकाल अपनी स्नेहिल पत्नी के साथ बच्चों को ध्यान में रखते हुए अपने पैरों पर खड़ा कर नइ जिंदगी के शुरुआत करा कर उनलोग को भी अपने अपने कर्म क्षेत्र की भूमि पर बिदाइ कर दिये।अब उसे लगता है की कोई काम ही नहीं है। 
मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने के बाद बाहर के कमरे में एक दफ्तर ऐसा बना दिया गया जहां 10:00 बजे अपने नित्य कर्म करके टिफिन लेकर बैठ जाये ।यहां पर कॉलोनी में करीब-करीब सभी सेवानिवृत्त लोग रहते हैं लोग आयेंगे ही आकर अपना समस्या पर बात विचार करके समाधान खोजेगे ।जैसे :-बिजली बिल, मोबाइल रिचार्ज, मेडिक्लेम फॉर्म भरना बहुत अन्य कार्य में सहायक आप बन सकते हैं चाहे शुल्क ले या निशुल्क सेवा दे। बाहर एक सेवा सदन का बोर्ड लगा दे।
यह काम करने से रात में नींद भी अच्छी आने लगी अगर आपको साहित्य रुचि है उसे अपना इसी समय निपटा लें। मनोवैज्ञानिक परामर्श इसके अनुसरण करने के बाद मेरे मित्र विजय को रात में तारे गिरने नहीं पड़ते। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति के गिनती में आने लगे।

विजयेन्द्र मोहन।
[19/10, 1:55 pm] निहारिका 🍇झा: नमनअग्निशिखा मंच 
विषय;-
"अम्बर के तारे गिनना""
दिनाँक;-19/10/2021
विधा;-लघु कथा
श्यामली के विवाह को साल भर ही हुआ था कि नक्सलियों ने मुखबिर के शक में उसके पति व सास श्वसुर की हत्या कर दी।श्यामली मायके में डिलीवरी के लिए आई थी तो उसकी जान बच गयी।।एक रात में ही उसका हरा भरा संसार उजड़ गया।। चन्द दिनों में ही बेटा हुआ।वह उसे सीने से लगाये अपने घर वापस आ गयी।माता पिता व सभी ने बहुत समझाया पर वह नहीं मानी,कि बेटे को उसके घर मे ही रखूंगी।।वह ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी केवल सिलाई व कुछ हस्तकला भर आती थी उसको।उसने इसी को अपनी आजीविका बना लिया।लगातार मेहनत करके बेटे की परवरिश की। बेटा भी समझदार था व मां के संघर्ष व पिता व परिवार के बलिदान से वाकिफ था अतः मेहनत कर के पढ़ता रहाआज बेटे की प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम आने वाला था।।मां बेटा दोनो रात भर इसी सोच में अम्बर के तारे गिनते रहे कि क्या होगा ईश्वर उनपर मेहरबान होगा या नहीं?कि इस बार भी किस्मत साथ नहीं देगी।सुबह हुई कि बेटे के दोस्त जो आनलाइन सेंटर चलाता था का फोन आया बधाई हो तुम्हारी व मां की परीक्षा सफल हुई।।सुनते ही दोनो की आँखें बह चली आखिर अब वह पुलिस अधिकारी जो बन गया था।।इसी संकल्प के साथ कि वह अपने क्षेत्र से भय व आतंक के साये को खत्म करके ही रहेगा व जैसी उन पर बीती किसी औऱ पर नहीं गुजरेगी।। धैर्य तपस्या का फल मधुर ही होता है।।
निहारिका झा
खैरागढ राज.(36 गढ़)
🙏🙏
[19/10, 2:48 pm] रवि शंकर कोलते क: मंगलवार दिनांक **१९/१०/२१ 
विधा ***लघु कथा
विषय ***
#****रात में तारे गिनना***#
          { नींद नहीं आना }
                °°°°°°°°°
      मित्रों, मेरे सहयोगी प्राध्यापक
श्री गंगाधर जी बड़े साहस के साथ पिछले 5 बरस से अकेले ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं । उनकी पत्नी का मामूली बीमारी से देहांत हो गया वे बहुत दुखी हुए । हालांकि कि घर की सब जिम्मेदारी से वह मुक्त है । ,बच्चों की शादियां हुई । चिंता की कोई बात नहीं । ,मगर जब किसी की पत्नी यूं ही बहुत दूर चली जाती है तो उस व्यक्ति पर क्या गुजरती है यह कोई नहीं जान सकता । वे गजानन महाराज के परम भक्त हैं शायद महाराज ने हीं उनको जीने का बल दिया है । उन्होंने अपने आप को संभाला । हम सब लोगों ने उन्हें मानसिक बल आधार दिया । आज भी वह जीवन जी रहे लेकिन फिर भी अकेलापन , खालीपन , विरह का दर्द क्या होता है वही जाने । 
           मैं जानता हूं । मित्रों, आप सभी जानते हैं कि, पिछले 6 सितंबर को मेरे भी पत्नी का देहांत हो गया। अचानक वह भी हमसे बहुत दूर चली गई जहां से कोई नहीं लोटता । उदास हो गई है मेरी जिंदगी । रात को नींद नहीं आती । कभी कभी मुझ पर भी तारे गिननेकी नौबत आती है। 
         साधु संतों के वचन प्रवचन याद कर अपने आप को समझाने की कोशिश करता हूं।
 इंसान अकेला और खाली आया है ,और वो अकेला और खाली ही जाएगा यह जीवन का सिद्धांत मानकर जी रहा हू ।
         जब अपना कोई प्रिय साथी दूर चला जाए , या जीवन साथी बिछड़ जाए तो रात में तारे गिनना पड़ता है । 
          मेरे सहयोगी प्राध्यापक आज भी रात में तारे गिनते हैं। मेरी भी स्थिति उनके जैसी है । मतलब हम दोनोंही एक ही नांव के प्रवासी हैं ।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर ३०
[19/10, 3:00 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: अंबर के तारे गिनना (लघुकथा)
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रमा का दिल बैठा जा रहा था ,उसे न तो भूख लग रही थी ,ना प्यास और ना ही आंखों में नींद थी, क्योंकि उसके पति राम को कोरोना हो गया था ।वह अस्पताल में भर्ती था। उसकी स्थिति ठीक नहीं थी ।ऑक्सीजन और दवाइयों के ना मिलने के कारण कल उसके ससुर शांत हो गए थे। वह बहुत घबरा रही थी ।उसने राम से कहा था, कि आप बाहर मत जाइए.. अरे! रमा तुम तो फालतू चिंता करती हो। मैं तो अपने दोस्तों से मिल कर आता हूं ।सुनिए अभी अपने घर से कोई नहीं निकल रहे हैं कुछ दिनों के बाद चले जाजिएगा ।नहीं ...मुझे अभी जाना है राम के स्वर में गुस्सा था । रमा उसे बार-बार न जाने के लिए कहती रही,पर राम न माना।आखिर में रमा ने कहा ....कि अगर घर से बाहर जा ही रहे हो तो मास्क लगाकर और सेनीटाइजर लेकर जाइए, मुझे कुछ नहीं होगा ..कहकर राम चला गया ,और जब से दोस्त के यहां से मिलकर आया है,तब से सर्दी ,बुखार हैं, पिताजी को भी हो गया और उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। बहुत प्रयत्न के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। वह भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि, राम को बचा लीजिए मेरे मंगलसूत्र की रक्षा कीजिए भगवन ।रमा का मन बहुत घबरा रहा था ।नींद नहीं आ रही थी।सारी रात अम्बर के तारे गिन कर काट रही थी आखिर उसे नींद आएगी भी कैसे ?

 श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210
[19/10, 3:11 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक"अंबर के तारे गिनना"

रात भर नींद ना आना और आसमान तकते रहना। ऐसा बहुतों के साथ होता है ।पर अक्सर टीनएज में और किसी से आंखें चार हो जाए तब ही ऐसी स्तिथि होती है। अगर कोई चिंता हो जाए तब भी रात तारे गिनते हुए बीतती है । पता ही नहीं चलता कि कब दिन निकला और एक-एक करके तारा डूबता चला गया। अंत में भोर का तारा भी विदा लेकर जा चुका। अब आंखों में नींद धीरे-धीरे आने लगती है ।फिर पता नहीं कब लग जाती है आंख। सारी रात तो तारे गिनते हुए बीत जाती है। सारा अंबर टटोलते टटोलते आंखें निरीह सी हो जाती हैं।
याद करो अपनी-अपनी जवानी। किस-किस ने अंबर के तारे गिने हैं।

   स्वरचित लेख
     रजनी अग्रवाल 
      जोधपुर
[19/10, 3:12 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक"अंबर के तारे गिनना"

रात भर नींद ना आना और आसमान तकते रहना। ऐसा बहुतों के साथ होता है ।पर अक्सर टीनएज में और किसी से आंखें चार हो जाए तब ही ऐसी स्तिथि होती है। अगर कोई चिंता हो जाए तब भी रात तारे गिनते हुए बीतती है । पता ही नहीं चलता कि कब दिन निकला और एक-एक करके तारा डूबता चला गया। अंत में भोर का तारा भी विदा लेकर जा चुका। अब आंखों में नींद धीरे-धीरे आने लगती है ।फिर पता नहीं कब लग जाती है आंख। सारी रात तो तारे गिनते हुए बीत जाती है। सारा अंबर टटोलते टटोलते आंखें निरीह सी हो जाती हैं।
याद करो अपनी-अपनी जवानी। किस-किस ने अंबर के तारे गिने हैं।

   स्वरचित लेख
     रजनी अग्रवाल 
      जोधपुर
[19/10, 3:26 pm] प्रेरणा सेन्द्रे इंदौर साझा: शीर्षक-" किसे दोष दें"

 आज श्राद्ध का चौथा दिन था और रूही का कलेजा मुंह को आ रहा था।सुबह से बेटे को कभी प्यार कर रही कभी जोर से चिल्ला रही थी।लग रहा था जैसे जोर -जोर ईश्वर से लड़ना चाह रही थी । यह सब देख कर माँ का मन विचलित हों रहा था।
    समझ नहीं पा रही थी कि बेटी को कैसे समझाएं कि पांच साल ही सही तेरा पति तुझे सारे सुख दे गया एक बेटा भी।किसे दोष दें किस्मत को या फिर कोरोना को जो सारी खुशियां छीन कर ले गया।तीस साल की उम्र में पति को छीन कर ले गया। या फिर ईश्वर को जिसने तेरी किस्मत में यह गम लिखा।ऊपर से ससुराल में सौतेली सास की बेरुखी जो बहू और पोते को अपना नहीं रही।
    रुचि आज की समझदार बेटी है। मां की दुविधा भाँप कर उठ कर खड़ी हुई।और ग्यारह थाली खीर पूरी सब्जी की लेकर निकल पड़ी।और रास्ते में जो भी मिला गरीब उसे देती गई।
     लौट कर आई तो कुछ मन हल्का हुआ।बेटे को प्यार करने लगी। मां का भी मन रूचि को देखकर शांत हुआ। मन ही मन बोली हे ईश्वर अगर रूचि के जीवन मैं अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा भी कट जायगा बस हिम्मत देना उसे।


         प्रेरणा सेन्द्रे
[19/10, 3:42 pm] चंदा 👏डांगी: $$ अंबर के तारे गिनना $$

मौसम बहुत सुहाना था । बरसात भी बन्द हो गई थी ,आसमान मे तारे टिमटिमा रहे थे ।सुधा अपना कमरे मे उदास बैठी रो रही थी और आसमान को निहारे जा रही थी ।उसका बेटा अमेरिका मे नौकरी कर रहा था पिछले तीन साल से आया ही नही था अब जब भारत आने का टिकट बनवाया वीजा भी बन गया पर अचानक लाकडाऊन लग गया जो कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । अब इन्तज़ार करते करते दो साल और निकल गए। अभी भी कोई आसार नही ।सुधा सोच रही पता नही अपने बेटे को कभी देख भी पाऊँगी या नही ।तभी सुधा के पति राजेश ने आवाज लगाई क्या ऐसे बैठे बैठे तारे ही गिनती रहोगी या मुझे चाय भी बनाकर दोगी ।

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[19/10, 3:44 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: आदरणीय मंच को नमन
लघुकथा अपना अपना भाग्य
---------+
श्वेता और सनी दोनों ने ही एक ही मां के कोख से जन्म लिया था। साथ-साथ पले बढ़े। उन्होंने ही गरीबी और संघर्ष को देखा था ।पिता कैसे कष्ट सहकर खेत में अनाज पैदा करते और उसी से पूरे घर की व्यवस्था करते थे। बच्चों के लिए वस्त्र पढ़ने के लिए ,पुस्तकें विद्यालय की हर मांग को पूरा करते हुए बच्चों को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाता था।
दोनों ही अपनी उम्र पर पहुंची पिता ने जगह-जगह दौड़कर दोनों के लिए संबंध निश्चित कर दिया ।
ऊपर से देखने में दोनों ही परिवार खाते पीते सामान्य ठंड के लग रहे थे। पिता ने दोनों ही बेटियों का समय पर विवाह कर दिया दोनों अपने अपने घर गई। भाग्य को क्या मंजूर था ।श्वेता का पति, एक अच्छा अध्यापक इंटर कॉलेज में उसे पढ़ाने का मौका मिला। सम्मान मिला। उत्तम वेतन मिला और उसका जीवन अच्छी तरह से बीतने लगा।
सनी का पति देखने में सुंदर खेतिहर था। पिता के जाने के बाद उसके पति देव नाथ पर ही घर का सारा बोझ पड़ा था वह अपनी खेती गृहस्ती में श्रम और उत्पादन करके संतुष्ट था ,किंतु शनि असंतुष्ट थी उसने पिता से कहा-" मुझे आपने कहां डाल दिया। जीवन का कोई सुख में नहीं ले पाती।"पिता ने कहा-" बेटा मैंने तो अच्छा ही देख कर सब कुछ किया था ,अपना अपना भाग्य।"
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी🌷🌷🌷🌷
[19/10, 3:49 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन🙏

आज की विधा:-लघुकथा

विषय:- *अंबर*के तारे गिनना*
अर्थ:- रात को नींद नहीं आना

     गांधी फिल्म देखकर मैं और मेरे बड़े भैया घर आए, बड़े भैया राजन ने कहा,"सुरेंन तू खाना खा मैं भी खाना खा रहा हूं", मैंने कहा,"मुझे भूख नहीं है ऐसा नहीं है सुरेन भूखे पेट सोते नहीं बडे भैय्या राजन ने कहा", अरे कल जो होगा वह होगा, चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं मेरी बारहवीं कक्षा का बोर्ड का परिणाम निकलने वाला था सोच रहा था क्या होगा पास होगा,या फेल चिंता सता रही थी।
     बड़े अधूरे मन से बडी मुश्किल से एक रोटी खायी पानी पीकर अपने कमरे में सोने चला गया लेकिन नींद तो कब की काफूर हो चुकी थी बेड पर करवटें बदलते गया इतने में रात के तीन बजे मेरे बड़े भैया है देखा तो बोले", अरे सुरेन तू अंबर के तारे गिन रहा क्या?,"
नहीं ,नहीं मैंने रोते हुए कहा भैया,रात रोते को रोते क्या पगले कहा सो जा चुपचाप ज्यादा सोच मत", जो होगा वो कल देखेंगे
     दूसरे दिन सुबह समाचार पत्र ईश्वर का नाम लेकर देखा तो अपना अनुक्रमांक देखा का खुशी के मारे फुले नहीं समा पाया कारण कि मुझे अठ्ठावन प्रतिशत अंक प्राप्त हो गये मैं बारहवी पास हो गया था माता-पिता बड़े खुश हुए और मेरे आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे इसलिए रात को कभी भी *अंबर के तारे नहीं गिनना चाहिए* और चिंता नहीं करना चाहिए।

सुरेंद्र हरड़े लघुकथाकार
नागपुर
दिनांक :- १९/१०/२०२१
[19/10, 3:50 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
विषय **अम्बर के तारे गिनना ***
           नींद न आना ***लघुकथा **
मालती जैसे कमरे में दाखिल हुई, उसने देखा रामलाल जी आँखे खोले छत की तरफ देख रहे थे, उन्हें एसे देख मालती बोली --अरे अभी तक आप सोये नही, क्या बात है, तब रामलाल जी उदास होकर बोले, नींद नही आ रही है,।शुभि की चिंता हो रही है।कितना अच्छा घर और लड़का देख कर शादी करवाई थी, यही सोच कर शुभि उसके साथ विदेश जाएगी खुश रहेगी, परन्तु ......इसी बीच मालती बोली, आपको तो शुभि के विवाह की बहुत ही जल्दी थी,बस लड़के के व्यक्तित्व और व्यवहार पर ध्यान दिया, ये नहीं देखा लड़का विदेश में क्या करता है, उसका चरित्र कैसा है।
               शुभि जो इनकी इकलौती बेटी है, उसका विवाह आलोक से करवा दिया जो विदेश में किसी कम्पनी में नौकरी करता था ।विवाह के कुछ समय बाद विदेश चला गया, यह कह कर कि कुछ इन्तज़ाम करके शुभि को जल्दी बुलवा लेगा।वह चला गया, कुछ समय तक तो रोज़ उसके फोन आते रहे,फिर धीरे धीरे आना बन्द हो गए, सम्पर्क टूट गया । बाद में कुछ सूत्रों से पता चला आलोक की विदेश मे पत्नी है ,वह पहले से ही विवाहित है। यह बात उसने सबसे छिपा रखी थी । पता लगने पर ससुराल वालों ने शुभि को घर से निकाल दिया, और अब वह अपने मायके रह रही थी । हर समय उदास, अपने कमरे में बन्द, किसी से बात नहीं करती।इसी समस्या को लेकर मालती और रामलाल जी चिन्तित रहते, अब शुभि का क्या होगा। चिन्ता में सारी रात नींद नहीं आती, अम्बर के तारे गिनते रहते।।।
स्वरचित मौलिक, 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[19/10, 3:52 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: अम्बर के तारे गिनना(नींद न आना) - लघुकथा।
राजीव की नयी नयी शादी हुई है। पूरे घर में रौनक आ गई है। नयी बहू (निशा) के स्वागत के लिए मेहमानों से घर अटा पड़ा है। चौथी का समय आ गया है। बहू का भाई अपनी बहन को अपने घर लेने आ गये है। बहू अपने मैइके पहुंच गयी है। इधर राजीव बहू(निशा) के जाने के बाद घर में खाली खाली महसूस कर रहा है।
दिन तो किसी प्रकार कट जाता है, रात को निशा की याद में राजीव, अम्बर के तारे गिैनकर काटता है।। 
स्वरचित,
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता
[19/10, 3:55 pm] 💃वंदना: अंबर के तारे गिनना
नींद ना आना

शर्माजी की बिटिया की शादी को दो महीने बाकी थे। कोरोना के चलते कुछ तैयारी भी नहीं हो पाई थी आंखों से नींद उड़ी हुई थी बस वे दिन-रात अंबर के तारे गिना करते थे। हालांकि उन्हें सभी लोग समझाते हैं कि सब ठीक हो जाएगा और
अब तो लगभग कोरोना भी खत्म हो चुका है पर शर्मा जी कोरोना के डर से अंदर तक इतना हिल चुके थे कि वह हाथ में सेनेटाइज और मूंह पर मास्क के बगैरघर से कदम बाहर ही नहीं रखते थे। कोई कुछ भी कहें सुनो सबकी करो मन की शर्मा जी ने यह अच्छी तरह अपने मन में धारण कर लिया था न वह घर में पत्नी की सुनते न हीं बच्चों की। उन्हें  हमेशा यही डर लगा रहता कि कहीं कोई चूक न हो। बस सावधानी बरतो और बस सावधानी
सावधानी सावधानी अच्छी है पर इस डर से आदमी जीना छोड़ यह कैसी सावधानी घर के सभी लोग बहुत परेशान हो चुके थे। हार कर सब यही सोचने लगे थे जैसा चल रहा है चलने दो जैसे तैसे शादी करना है सब अपनी तरह से कोशिश में लगे हुए हैं नींद सभी की उड़ी हुई थी कौन सबसे ज्यादा अंबर के तारे गिनता है
जैसे तारे गिनने की प्रतियोगिता हो इसी तरह बीच-बीच में हल्की-फुल्की मौज मस्ती का माहौल बना रहता था। अब शर्मा जी भी अपने डर को कभी कबार दरकिनार करने लगे थे। लगता था धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश
[19/10, 3:59 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: (लघुकथा)
🌷अम्बर के तारे गिनना🌷 
 । सूर्यबाला ने इस वर्ष 12वीं की परीक्षा दी थी। पेपर तो उसके बहुत अच्छे गए थे। पास होने की कोई समस्या नहीं, उत्तीर्ण तो वह आसानी से हो जाएगी, पर उसे तो टॉपर में अपना नाम दर्ज कराना है। इसके लिए उसने भी जी जान मेहनत की है। रात दिन एक कर उसने अपनी पढ़ाई की। कहते हैं ,मेहनत का फल मीठा होता है। उसे मीठे फल की पूरी आशा है।
            कल उसका रिजल्ट निकलने वाला है। आज वह बहुत बेचैन है। उसका दिल जोरों से धड़क रहा है ।वह जानती है ,वह पास तो हो ही जाएगी , पर उसे आशा अनुसार फल की अभिलाषा है ।दिन तो काम काज व बातों बातों में बीत ही गया ,पर रात बिताना उसके लिए बड़ा कठिन हो गया ।सारी रात उसने अम्बर के तारे गिनते गिनते ही गुजार दिए। ईश्वर ने उसकी सुन ली । उसकी मेहनत रंग लाई। पेपर में उसका नाम ब्लॉक लेटर्स में सबसे पहले ऊपर छपा था।
उसकी खुशी का ठिकाना न था।उसके घर में माऩों उत्सव मनाया जा रहा था।सब बहुत खुश थे।वह ईश्वर को धन्यवाद देते थकती न थी।
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स्वरचित मौलिक रचना
डाॅ . आशालता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
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[19/10, 4:01 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय अंबर के तारे गिनना

बुधना गांव में तिहारी मजदूरी का काम करता उसकी पत्नी भी साथ में काम करती दोनों पति पत्नी पैसे कमाते और घर की जिम्मेदारी को उठाए रहते उसके परिवार में 14 आदमी थे सभी के हिस्से का बटा हुआ था खर्चा। बुधना गांव के स्कूल में थोड़ी पढ़ाई लिखाई किया था लेकिन पैसों के अभाव में आठवीं क्लास के बाद उसकी पढ़ाई बंद हो गई थी इस बात से उसे हमेशा मन में तकलीफ होती रहती थी उसकी पत्नी भी पढ़ने लिखने में होशियार थी पर गांव के माहौल में वह भी सातवीं क्लास तक ही पढ़ पाई दोनों का हौसला पढ़ने का बहुत था पर पारिवारिक झंझट जिम्मेदारियों के कारण इस ओर वह कदम नहीं उठा पा रहा था हर रात घर के छत पर जब वह सोता पति पत्नी दोनों आसमान के तारों को निहारते रहते और गिनते रहते। हर तारों को देख कर अपने आप से एक निर्णय लेते मैं पढ़ाई करूंगा जब भी वह घर में अपने पढ़ने की बात को करता घर के सभी लोग यह कह कर उसे समझा देते पढ़ने के बाद भी तुम क्या करोगे पैसा कमाओगे आज भी पैसा कमा रहे हो बात जो दोनों एक ही है पैसा कमाना फिर वह चुप हो जाता फिर रात जब होती तारों को जब गिनने लगता फिर वह अपने संकल्प को मैं पढ़ाई करूंगा दूर आता मन में ऐसा करते-करते कुछ दिनों के बाद उसकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हो गई जो पढ़े लिखे इंसान अच्छी नौकरी करते थे वह गांव में आए थे और गांव में एक ऐसे स्कूल की स्थापना किए जो नाईट स्कूल कहलाता था और उस गांव के वैसे लोगों का दाखिला करवाया जिसमें पढ़ने की चाहत हो और दिन भर पैसे कमाओ और रात में पढ़ाई करो। बुधना अपना दाखिला उस नाईट स्कूल में करवा लिया 2 महीनों के बाद स्कूल के प्रबंधन समिति से बात किया कि क्या यहां महिलाएं भी पढ़ सकती हैं प्रबंधन समिति इस बात की स्वीकृति दे दी कि महिलाएं भी पढ़ सकती हैं अब तो बुधना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा वह अपनी पत्नी का भी दाखिला उस नाइट स्कूल में करवा दिया और 2 वर्षों के भीतर दोनों दसवीं क्लास पास कर गए अब आगे पढ़ाई के लिए हौसला तो पहले से था अब हिम्मत भी बढ़ गई परिवार में थोड़ी नोकझोंक अवश्य हुई लड़ाई झगड़े भी हुए फिर भी दोनों पति-पत्नी आगे पढ़ने के लिए तैयार हो गए और नाइट स्कूल के प्रबंधन समिति ने नेशनल ओपन स्कूल की ओर से परमिशन लेकर 12वीं का क्लास भी शुरू करा दिया धीरे धीरे वह नाइट स्कूल टेक्निकल क्षेत्र में भी पढ़ाई की शुरुआत की जिससे उस गांव के युवा वर्ग के साथ-साथ व्यस्को की भी पढ़ाई अच्छी तरह होने लगी और गांव की सोच रहन सहन में बहुत हद तक परिवर्तन आ गया कहां गया कि यह गांव विकसित हो गया। अंबर के तारों को गिनते गिनते तारों के सामने संकल्प लेते लेते बुधना और उसकी पत्नी एक पढ़े-लिखे दंपत्ति बन गए और शहर में नौकरी करने लगे

कुमकुम वेद सेन
[19/10, 4:10 pm] वैष्णवी Khatri वेदिका: अ. भा. अग्निशिखा मंच 
मंगल वार - 19/10 /2021
विषय_अम्बर के तारे गिनना-नींद न आना।
विधा - लघुकथा 

"मैडम हमारी बुक चोरी हो गई है। मैडम हमारी कॉपी चोरी हो गई है।" ऐसा बोलते हुए बच्चे मेडम के पास आए और मेम को ले गए। 

मैडम क्लास में आई और सब बच्चों के बैग टटोलने लगी। जिस लड़की का बच्चे बार-बार नाम ले रहे थे जब उसका बैग टटोला गया तो उसमें से बच्चों की किताब और कॉपी बाहर निकल आई।

बाद में पता चला वह कई बार अच्छे बच्चों की कॉपी या क़िताब चुरा लेती थी। जब मैडम उसका बैग तलाश रही थी, उसी समय एक सर दूसरी क्लास में जा रहे थे वह भी रुक गए। पूछने लगे 'मैडम क्या हुआ?" मैडम ने सारी बात बता दी।

लड़की को प्यार से सर और मेडम दोनों ने समझाया कि बेटा ऐसा नहीं करते। आइंदा के लिए ऐसा मत करना। ये कह कर दोनों अपनी-अपनी क्लास में चले गए। दूसरे दिन पुलिस पकड़ने आ गई। मेडम और सर और प्राचार्य किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ?

बाद में पता लगा कि लड़की ने ज़हर खा लिया था। इल्ज़ाम सर और मैडम पर लगा दिया कि इन दोनों ने मुझे प्रताड़ित किया इसीलिए मैंने ज़हर खाया है।
मैडम बहुत ख़राब है उन्होंने सर के साथ मिलकर के मेरी तलाशी भी ली। सर के ऊपर ग़लत धाराओं के केस भी चला।

उसके पिता नहीं थे लेकिन माँ किसी दल की नेता थी। इस कारण सुनवाई उन्हीं की हो रही थी। जब चाहे पुलिस आ जाती और सर और मैडम ज़मानत ले कर अपने आप को बचाते रहे। अम्बर के तारे गिन-गिन रातें कट रही थीं। रातों की नींद गायब हो चुकी थी। पूरा घर परेशान था।

ऐसे करते करते चार साल हो गए। उसी समय एक नए जज आए उन्होंने बारीकी से जांच की तब पता चला कि उन दोनों का कोई कसूर नहीं था। मैडम तो बाइज्ज़त बरी हो गईं और कुछ वर्षों बाद सर भी बाइज्ज़त बरी हो गए।

वैष्णो खत्री वेदिका
[19/10, 4:29 pm] 💃rani: अग्निशिखा मंच 
विषय--अंबर के तारे गिनना 
विधा---लघुकथा 
दिनांक ---19-10-2021 
                मीनू जो कि पढ़ने में बहुत होशियार थी ।उसके माता-पिता सदा उसे प्रोत्साहित करते थे । जिससे वह पढ़ने के साथ-साथ,कई खेलों में भी प्रवीण हो गई थी । वह बैडमिंटन,कैरम,क्रिकेट में अपने कॉलेज का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी थी । तभी अचानक एक दिन कॉलेज से आते वक्त एक गाड़ी वाले ने टक्कर मार दी,
और वह गिरकर बेहोश हो गई । जब उसे होश आया तो उसने खुद को अस्पताल में पाया । एक बार तो उसे लगा सब कुछ खत्म हो गया । वह तनाव में रहने लगी और इसी तनाव में उसकी रातें अबर के तारे गिन-गिन कर कटने लगी । 
       मीनू के माता-पिता भी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी व परेशान थे । फिर भी उन्होंने खुद को संभाला और बेटी को भी हौंसला दिया । उसे हिम्मत दी कि सब ठीक हो जाएगा,चिंता मत करो । धीरे धीरे माता-पिता का साथ और सकारात्मक विचार उसमें नई ऊर्जा का संचार करने लगे और मीनू ने भी ठान लिया था कि वह हिम्मत नहीं 
हारेगी और छ: महीने की अवधि पश्चात वे बिल्कुल ठीक हो गई और उसने अपने माता पिता के साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद दिया कि वह अपनी जिंदगी में जरूर कुछ अच्छा कर पाएगी ।
                        रानी नारंग
[19/10, 5:20 pm] Anita 👅झा: विषय *-अम्बर के तारे गिनना* 
*भोर के उजालें में अम्मा *
भोर के उजाले अम्मा आज तारे गिनते रह गई ,कब आँख लगी पता ही नही चला ?
चंपा ने कहा - अम्मा अभी सुबह का ९ बजा हैं ! आपका तरह तरह का खाना इतने जल्दी कैसे बन गया ! आपका नाती पोते आने वाले है ! अम्मा आप भी भोरे भोरे एकदम झकास तैयार हो जाती थी ! काम में दुगने उत्साह से जुट जाती थी ! 
हाँ चंपा - अलसाई अम्मा अपनी अतीत के दिन याद करते ताजगी का अनुभव करते कहने लगी आज ही के दिन मेरी सासु माँ इस दुनिया से विदा हुई ! फिर तो आप की सासु माँ लक्ष्मी थी । आज भी गुरुवार हैं ! 
अम्माँ ने कहाँ - पुरे आठ साल हो गये ! हमारा पूरा परिवार एक ही छत के नीचे दो विशाल काय वृक्ष नीम और पीपल के साथ साथ फलते फुलते नज़र आ रहे थे ! आदेश और निर्देश ब्रम्य वाक् की तरह होते ! जब कोई परिजन घर से दूर अलग घर जाने की बातें करता मना नही करते ! कहते इस नीम की हवा के नीचे जीवन है ! ये पीपल का पेड़ जहाँ देवता निवास करते हैं कुछ दिनो के मन बदलने गये ! आ जायेंगे ! हम यदि रोकते है !
जिसे मानना परिजनों का कर्तव्य होगा ? 
 तुमने सच कहा चंपा वो लक्ष्मी और नारायण की तरह थे ! परिजनों पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा ! इन आठ सालों में परिवार बिखर चुका और घर खंडहर में बदल गया !  
इस बहुमंज़िल इमारत में आ भोर का उजाला देखने आँखें तरस गई 
है । अब अम्बर के तारे गिनना ही बाक़ी है चम्पा ???
अनिता शरद झा रायपुर
[19/10, 5:29 pm] 😇ब्रीज किशोर: अग्नि शिखा मंच
दिनांक १९/१०/२०२१
बिषय अम्बर के तारे गिनना
विधा लघुकथा
हमारे गाँव मे उन दिनो लडकियों को कम पढा़या जाता था।लड़के पढ़ कै बाहर
कमाने चले जाते थे वहा से.चिठ्ठी भेजते जीसको माँ बाप बीवि को भेजते।वे किसी पढवा लेती।
ऐसा मौका हमे भी मिला जो हमारे यहाँ काम धाम करती थी उसका मर्द कलकत्ता कमाता था वह पढ़ा लिखा उसने सब हाल लिखा और लिखा था *गाँँव मे तारे के छाँव मे सोते थे *अब रात मे तारे गिनते है*। सुकउआ (शुक्रग्रह)उग जाला लेकिन
नींद नही आता है।
तूम अपना ध्यान देना।वह बोली बुआ आप हमारी चिठ्ठी 
लिख दे ।उसमे लिख दिजीएगा कि हमे हमेसा आप की चिन्ता लगी रहती है मै तारे नही गिनती मै देखती हूं भोर का तारा सुन्दर होता है। बृजकिशोरी त्रिपाठी
       भानुजा गोरखपुर।
[19/10, 6:20 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: विषय_ अंबर के तारे गिन गिनकर रात गुजारना 

शीर्षक_ शादी 

     पलकों पर सुनहरे सपने सजाकर कामिनी ने ससुराल मैं प्रवेश किया, संयुक्त परिवार था ननद देवर सभी हँसी मजाक कर रहें थे , ननदोई जी हम उम्र होने की वजह से हम दोनों को परेशान करने मै लगे हुए थे सास ससुर जेठ जेठानी सभी चुहलबाज़ी देख मुस्कुरा रहें थे कुल मिलाकर खुश नुमा माहौल था । लेकिन पतिदेव के चेहरे पर उदासी विराजमान थी । समझ नही आ रहा था कारण क्या है ? पर एक दिन मेने सासू जी से कहते हुए सुना ," मैं तो शादी करके और भी दुखी हो गया 
कामिनी बेचारी सुनकर चकित हो गई पतिदेव ऐसा क्यों बोल रहे हैं?
धीरे धीरे पति का स्वभाव पता चलने लगा चिड़चिड़े, गुस्सैल, मानसिक अवसाद से पीड़ित हैं ,।
सोचने लगी मुझे अपने पति को 
स्वस्थ रखना होगा किसी अच्छे 
मनोचिकित्सक को दिखाना होगा
पति के अनुचित विचार सोच की वजह से कामिनी कुछ भी नही कर पा रही थी उल्टे उसी को सभी वरिष्ठ जन दोष देने लगे थे 
ऐसी विषम परिस्थिती में कामिनी बीमार रहने लगीं थी , रात रात भर नींद नहीं आती अंबर के तारे गिन गिनकर रात गुजारने लगी ।
दिनभर घर का काम , रात आंखों में ही कट ने लगी ।
इस बीच दो बच्चें हुए पति घर वालों की लापरवाही से वो भी नही रहे । गंभीरता से कामिनी ने सोचा ऐसे में तो मुझे तलाक ले लेना चाहिए । उसने यह बात सास ससुर को कही तो कोहराम मच गया , भाईयो को भी सुनकर अच्छा नही लगा माँ भी कहने लगी थोड़ा तो सहन करना ही पड़ेगा , लेकीन छोटे भाई को लगा की बात गंभीर हैं , उसने समस्या का निदान करना सही लगा दोनों पक्षों को बिठाकर बात की सभी सहमत हायर आज कमल का इलाज चल रहा हैं पहले से स्थिति काफी अच्छी है । दोनों का एक बेटा व एक बेटी है। 


आज समाज मनोरोग चिकित्सक को दिखाना नहीं चाहतें मानसिक बीमारी को समझना भी एक समस्या है सोच बदलने की बहुत बहुत जरूरी है।

सुनीता अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश स्वरचित धन्यवाद 🙏🙏
[19/10, 6:26 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: शीर्षक-चिंतन- मनन 

कुछ बच्चे स्कूल के टीचर के साथ विजयादशमी पर्व पर मेला देखने गए।वहां दशानन को जलाने की तैयारी चल रही थी। एक बच्चे ने टीचर से पूछा-" सर यह दशानन को हर साल क्यों जलाते हैं?"
टीचर बोले-" देखो श्याम, वह बुराई का प्रतीक है, और उसने सीता मैया का अपहरण किया था"
    श्याम तुरंत बोला-" सर जी, दुर्योधन और दुशासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया था, भरी सभा में। उनका पुतला तो नहीं जलाते, हम लोग।"
    टीचर जी सोचने लगे, हाँ,श्याम ठीक ही तो कह रहा है, हम लोग हर साल रावण और कुंभकर्ण का पुतला जलाते हैं, क्या एक बार जलाकर यह किस्सा खत्म नहीं किया जा सकता?
     अब रात में टीचर जी तारे गिनने लगे और सोचने लगे, ठीक है, यह विषय भी गंभीर है, इसका चिंतन- मनन करना अति आवश्यक है।

 डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
19-10-21
[19/10, 6:43 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
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 अग्निशिखा मंच 
दिन -मंगलवार 
दिनांक -19/10/2021 

विधा -लघु कथा 
प्रदत्त विषय- *अंबर में तारे गिनना* मतलब नींद ना आना

 सीता पिछले 2 घंटे से काफी परेशान हैं वो कभी मोहल्ले में किसी के यहां जाती है ,कभी किसी के यहां जाती और पूछती कि उसका बेटा संयम तो नहीं आया है। सब जगह से निराशा हाथ लगने पर उसने अपने पति को फोन लगाया और बताया कि संयम अभी तक घर नहीं आया है। मुझे चिंता हो रही है। उसके पति सौरभ तुरंत घर आए और उन्होंने भी जहां- जहां हो सकता था ,वहां- वहां संयम का पता लगाया। लेकिन कहीं भी उसका पता नहीं लग पाया। काफी परेशान हुए सभी लोग अलग-अलग दिशाओं में भागने लगे और उसकी खोज करने लगे ।जब वो कहीं भी नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस में भी रिपोर्ट लिखाई ।पुलिस ने कहा; अब जो भी होगा सुबह ही होगा। सभी लोग घर में हताश होकर बैठ गए और परेशान होते रहे ।उसकी मां का बहन का तो रो-रो कर बुरा हाल था ।किसी तरह से सुबह हुई तब सौरभ अपने बेटे को देखने के लिए और उसका पता लगाने के लिए थाने के लिए निकला ही था, कि देखा संयम आ रहा है ।सभी ने दौड़कर उसे गले लगाया और पूछा कि तुम सारी रात कहां थे? क्या हुआ था? वह कहने लगा कि मैं एक दोस्त के यहां था ।उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं थी तो उसने मुझे रोक लिया था। मेरा फोन चार्ज नहीं था ,इसलिए मैं फोन नहीं कर पाया और मैं भूल भी गया था। सभी खुश थे लेकिन उन्होंने उसको डांटा भी कि तुम्हारी इस लापरवाही से हम सभी कितने परेशान रहे, इसका तुम्हें अंदाजा भी नहीं है। पूरा परिवार रात भर बैठ कर *अंबर में तारे गिनता रहा* और तुम कह रहे हो कि मैं भूल गया था। लापरवाही की भी हद होती है। 

रागिनी मित्तल
 कटनी, मध्य प्रदेश
[19/10, 6:53 pm] रानी अग्रवाल: तारे गिनना
१९_१०_२०२१,मंगलवार।
विधा_ लघुकथा।
विषय_तारे गिनना।
"संघर्ष की जीत"
मोहन पांच साल का था जब उसके पिता चल बसे। मां ने औरों के घर में कामकाज करके मोहन को पाला पोसा।बड़ी मुश्किल से मोहन बी कॉम तक पढ़ पाया।
    अब उसे एक अच्छी सी नौकरी की तलाश थी।उससे मां की तकलीफ देखी नहीं जाती थी।वो उसे आराम देना चाहता था।अपनी इसी फिक्र में वह" तारे गिन_गिनकर" रात गुजारता था।
उसे चैन की नींद नहीं आती थी।हर रोज कहीं न कहीं नौकरी की तलाश में जाता,साक्षात्कार देता पर अभी तक कहीं काम नहीं बना था।आरक्षण भी आड़े आता था।रातें यूं ही तारे गिन गिन कर गुजर रही थीं।
      आज उसे एक बड़ी कंपनी से बुलावा आया था।उसे पूरी उम्मीद थी कि ये नौकरी उसे मिल जायेगी।उसका साक्षात्कार अच्छा हुआ,उसने सारे सवालों के जवाब सही दिए थे।शाम को उसे फोन पर खुशखबरी मिली कि उसे नौकरी मिल गई है,कल से ज्वाइन कर सकता है।मोहन खुशी के मारे मां के गले से लग गया, मां की आंखों में भी आंसू झलक आए,उसकी मुराद पूरी हो गई।मोहन ने मां से कहा "मां अब बस तुझे काम नहीं करना,बहुत संघर्ष कर लिया,अब आराम करना,मैं कमा कर लाऊंगा।"आज उसे रात तारे गिन गिनकर नहीं गुजारनी पड़ी,उसे चैन की नींद आ गई।
    सुबह जल्दी उठकर तैयार होकर ऑफिस की ओर चल दिया।जीवन में नई मंजिल की ओर कदम बढ़ गए।संघर्ष करने से सफलता अवश्य मिलती है।
स्वरचित मौलिक लघुकथा___
रानी अग्रवाल,मुंबई,१९.१०.२१.
[19/10, 8:59 pm] अंजली👏 तिवारी - जगदलपुर: अम्बर में तारे गिनना
लघुकथा
शिवानी बचपन से हर काम में अच्छी थी । 10वी कक्षा में पढ़ती थी । अपनी मां को अपना साथी समझती थी इसलिए अपने मां के हर काम में हाथ बंटाती थी । शिवानी धीरे धीरे हर क्लास पार कर 12.वी भी पार कर ली।
अब शिवानी की माता रमा को शिवानी की शादी की चिंता होने लगी । शिवानी आगे पढ़ना चाहती थी पर उसके पिता भी आगे पढ़ाने से मना कर दिया ।ओ भी अपनी पत्नी की बात से सहमत थे । घर में पूजा थी गांव से भी सभी रिश्तेदार आये थे । शिवानी को घर के काम में दौड़ दौड़ कर करना देख सभी आये रिश्तेदारों में तारिफ पाने लगी ।
और वही उसे पसंद कर लिया लेकिन लड़के लड़की एक दूसरे से मिले नहीं थे । ना ही एक दूसरे को अच्छे से जाने थे । शादी तय हो गयी । शिवानी बिदा होकर गांव चली गई। एक दूसरे को देखें बातें हुई शरद पुर्णिमा थी ।चांदनी रात आंगन में बिखेरी हुई थी ।आंगन में शिवानी और उसके पति बैठकर एक दूसरे को समझने के लिए हाथों में हाथ डालकर चांदनी रात में हंसते हुए असमान के तारे गिनने लगे 🙏
रचनाकार
अंजली तिवारी मिश्रा जगदलपुर ।छत्तीसगढ़।
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Monday, 18 October 2021

अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच के ब्लॉक पर आज दिनांक 18 2021 को बालवीर विषय गोलगप्पे पर रचनाकारों की रचनाएं पढ़ें अलका पांडे मुंबई


बाल गीत 
गोलगप्पे

मेले की सैर में खाते गोलगप्पे 
आओ चून्नु आओ मुन्नू 
चलते है मेले की सैर करने
खाते हैं गोलगप्पे , पानी पूरी 
 अरे ऽऽऽऽऽऽऽऽ
ज़रा सा नाम लिया मूँह में पानी आया 
बहुत पंसद है गोलगप्पा पुचका 
नाम लेते ही कुछ कुछ होता है !
गोल गप्पा खाते  हैं पूरा मूंह खोलते हैं । पानी भी माँग कर पी जाते हैं । 
एक दो चार प्लेट से भी पेट नहीं भरता है सूखी पूरी चट करते 
मीठा तीखा मिला कर हाथो को डूबकी लगा कर आता है मज़ा 
ठेले वाले चाचा खोमचे वाले मामा सबकी खायेंगे पानी बतासे 
आत्मा तृप्त करेगे !!
माँग कर पानी पीने का मज़ा ही बहुत है ।
भैया उस सूखी पूरी का तड़का हाय हाय क्या कहने .....
दम निकल जायेगा चल 
मुन्नू जल्दी कर मेले में होगी भीड 
गोलगप्पे सब ख़त्म न हो जाए 
क्या मज़ा थाभईया
 गलियों में खाने का 
हाय कोरोना सब बंद करवाया 
गोलगप्पे को तरसाया 
एक बार खा लेता कोरोना फिर कहीं नहीं जाता इसी पानी में डूबकी लगाता और .....
दम तोड़ देता ....
किया कमाल गोल गप्पें ने कोरोना को भगाया मिर्ज़ा लगी तेज कोरोना भागा तेज चीन पर जा  गिरा जय बेलो गोलगप्पे की 
पुचेके महाराज की पानी पुरी रानी की जय....
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई ौौ
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[18/10, 8:55 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺सोमवार 18/10/ 2021
🌺समय - सुबह ८ से शाम ७ बजे तक 
🌺 आज का विषय_  गोलगप्पे
🌺 बाल गीत 

गोल गोल और फूले फूले 
लगते ज्यों छोटे कुप्पे।
पानी पूड़ी,पुचका अथवा
कहते इन्हें गोलगप्पे।

आलू चोखा, इमली पानी
इनके साथ में आते हैं।
खट्टे मीठे और चटपटे
मिलकर स्वाद बढ़ाते हैं।

तरह तरह का चोखा बनता
तरह तरह का पानी है।
धनिया और पुदीना पानी
इनका कोई न शानी है।

छेद अंगूठे से करते हैं
उसमें चोखा भर देते।
फिर पानी में इसे डूबा कर
झट दौना में रख देते।

चटकारे ले ले सब खाते
सारे स्वर हैं खुल जाते ।
इसके आगे सभी मिठाई
व्यंजन फीके पड़ जाते।

सुन पुचका वाले का स्वर
महिलाएं तुरत निकल पड़ती।
पकड़ पकड़ हाथों में दौने
वे खाने पर पिल पड़ती।

भले उन्हें नुकसान करे
पर नहीं छोड़ती हैं खाना।
होवे पेट खराब भले
मंजूर हॉस्पिटल जाना।

पुचका वाला गंदे हाथों
पुचका खूब खिलाता है।
नहीं जानता वह घर घर में
बीमारी फैलता है।

हमें चाहिए मित्रो, इनको 
खाना जल्दी बंद करें।
अगर शौक हो खाने का
तो घर पर ही तैयार करें।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, कोलकाता
[18/10, 8:58 am] 😇ब्रीज किशोर: अग्नि शिखा मंच
 को नमन है
१८/१०/२०२१
विधा बाल कविता
 बिषय    गोल गप्पे
 दशहरा का मेला लगा आज रावण मरेगा।
*********************
रामू  श्यामु दोनो भाई
आज गये मेला देखने।
रामू बोला भाई चलो 
हम तुम रावण चलके
देखे।


रावण है बुराई का पुतला
उसको आज जलायेगें
इससे भैया. सीख मिलती
बुरा काम कभी नहीं करेगें

इतने मे गोल गप्पे पडा़
दिखाई ।
रामू के मुँह मे पानी आई
बोला गोल गप्पे खाओ
 भाई।
  श्यामु बोला पापा से बता
   आये तब  गोल गप्पेभाई
   पापा बोले चलो मेरे भी
   मुँह मे पानी आई।


पापा को चटनी वाला
मम्मी खाती तीखा तीखा
रामू बोला हम बच्चो मत
देना तुम फिका फिका।
हम चटपटे गोल गप्पे
खाँयेगें मुन्नी को खिलायेगें।

नही भाई हमे गोल गप्पे नही
 हम आलु की टिक्की खाँयेगे।
 मुझे पसंद है मटर की चाँट
 उपर से मीठी चटनी डालेगें
 रामु बोला चलो अब घर
 अभी दुर्गा भसान देखने जायेगें।
स्वरचित
बृजकिशोरी त्रिपाठी उर्फ
  भानुजा गोरखपुर
[18/10, 9:23 am] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: अग्नि शिखा मंच 18.10.21विधा बाल कविता 
विषय.. रसगुल्ले 
अम्मा दे दो रसगुल्ले, 
काले काले भरभरे 
मीठा मीठा रस भरा है, 
लगते बड़े रसीले, 
लाल नहीं पीले नहीं है 
है वो काले काले, 
जैसे खाये जामुन 
वइसे ही है मन भावन, 
करना कोई भेद नहीं, 
एक मुझे मुन्नी क़ो भी देना एक ही, 
मिल कर हम खायेंगे 
खूब धूम मचायेगे,  
स्वरचित इशिता सिंह शिक्षिका
[18/10, 9:44 am] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी 
विषय*** गोलगप्पे  बाल कविता ***
कितने ही फास्ट फूड आए
पर गोलगप्पे का मुकाबला 
नहीँ  कर पाए
गोलगप्पे  का नशा  सब
पर छाएअगर तीखा हो तो
मज़ा बहुत  आए
जब मन को कुछ न भाए
तो पानी  पूरी  खाऐं
हर उम्र के लोगों को भाए
कितने नाम है तेरे
पानी पूरी, गोलगप्पे, 
बताशा,  फुचका, गुपचुप
जितने नाम है उतने ही
पानी तेरे में  समाए
खट्टा पानी, मीठापानी, 
तीखापानी, पुदीना
जलजीरा और आलू
बूँदी तेरा स्वाद बढ़ाए
तेरे अन्दर  आलू चटनी
भर बड़ा सा मुँह 
खोल के खाते
अगर बाद मे न मिले
सूखी पपड़ी तो 
गोलगप्पे  जैसा मुँह फुलाते।।।।
स्वरचित मौलिक 
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।।
[18/10, 10:16 am] आशा 🌺नायडू बोरीबली: ‌‌     
 ( बाल गीत )
************
🌹 गोल गप्पे 🌹
****************

जी को ललचाते हैं ,
ये गोल-गप्पे
देख देख कर
इन गोलगप्पों को
लार टपकाते हैं बच्चे।

 कितनी ही खा लो      मन नहीं भर पाता है        और, और खाने का मन होता जाता है ।       

बच्चा हो या बूढ़ा गोलगप्पे खाने से अपने को रोक नहीं पाता है। 

शादी ब्याह, समारोह की शान है ये गोलगप्पे     सारी भीड़ अपनी ओर खींच लेता है ,               
ये गोलगप्पे।              

अच्छा चलता है   गोलगप्पे  का व्यवसाय गोलगप्पे वाला ठेला एक लगाता है ।                  

 अटारिया पर रहता है अपने बच्चों को कान्वेंट में पढ़ाता है              कार में घूमता है।        

सारे सपने पूरे करता है और सुकून की जिंदगी जीता है ।                  जय हो गोलगप्पे की  ‌ जय हो ,जय हो!
*******************
स्वरचित मौलिक रचना
डाॅ .आशा‌लता नायडू .
भिलाई . छत्तीसगढ़ .
*******************
[18/10, 11:29 am] वैष्णवी khatri वेदिका: अ. भा. अग्निशिखा मंच 
सोमवार 18/10/ 2021
गोलगप्पे बाल गीत

 नाम है इसका गोल गप्पा
फूला फूला पूरा कुप्पा।
पानी पूरी भी कहलाता।
सबके मन को है यह भाता।।

इसको सभी मज़े से खाते।
बच्चे बूढ़े सब को भाते।
सूजी आटे का यह बनता।
चकले बेलन से यह ढलता।।

तेल में जाकर नाच करता।
फूल फूल कर कुप्पा होता।
अंदर इसके आलू भरदो।
सँग में मीठी चटनी कर दो।।

तीखा खट्टा पानी डालो।
मुँह को खोल गप्प से खा लो।
जलजीरा भी सबको भाता।
असल मजा ठेलों पर आता।।

भैया सूखी पूरी देता।
इसका पानी मन को सेता।
सबका दिल आतुर हो जाता।
फुल्की देख फिसल है जाता।।

वैष्णो खत्री वेदिका
[18/10, 11:36 am] 💃वंदना: गोलगप्पे

गोल मटोल गोल गोल गप्पे
बच्चे बूढ़े सबको लगते अच्छे।

खट्टे मीठे तीखे तीखे
आंखों में पानी भर लाते ।

गोल मटोल गोल गोल गप्पे
देख के मुंह में पानी आए

दिख भर जाए गोलगप्पे
बाकी सब फीके पड़ जाए

पूरा की पूरा मुंह खोलो
खाओ गटकों मजे उड़ाओ।

जैसे ही आया गोलगप्पे वाला
सब लोगों का मन भर माया

चाय पर चर्चा बहुत हुई
अब गोलगप्पे का नंबर आया।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश
[18/10, 11:48 am] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: गोलगप्पा

सोनू, मोनू ,जल्दी आओ,
गोलगप्पे वाला भैया आया,
 सुंदर-सुंदर गोलगप्पे लाया,
खट्टा-मीठा पानी  भी लाया ।

 आओ हम सब मिलकर  खाएं,
गोलगप्पा खाकर मौज मनाएं,
तीखा मीठा, खट्टा-मीठा पानी ,
गोलगप्पे में भरकर हम का जाएं।

 पानीपूरी खाने का  असली मजा ,
ठेलों पर ही खाने में ही  आता है,
गोलगप्पे का  नाम सुनकर ही ,
 सबके मुंह में पानी आ जाता है।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी इन्दौर
[18/10, 12:18 pm] निहारिका 🍇झा: नमन अग्निशिखा मंच 
विषय;-गोलगप्पे
बाल गीत।।
दिनाँक18/10/2021
गोलगप्पे !गोलगप्पे !
नाम अनेक व स्वाद निराले
कोई कहता गुपचुप इनको 
कोई कहे पानी पूरी
खट्टे मीठे स्वाद के होते
 इनकी है दुनिया दीवानी।
जब सुनते नाम जो इनका
आये मुंह मे पानी।।।
ज्यों ही घर से बाहर निकले
जिद करती है बिटिया रानी
मुझे खिला दो गोल गप्पे
ठुनक रही है मुनिया रानी
मुनिया के सँग मम्मी पापा 
सबकी  भाते गोलगप्पे।
मार्केट, मेला की शान बने
ये प्यारे गोल गप्पे।।
जो खाये ललचाये 
जो नहीं खाये वो भी ललचाये।
होते ऐसे गोलगप्पे।।
मीठा तीखा पानी 
ला देता मुंह मे है पानी।।
दुनिया इसकी दीवानी।।
निहारिका झा।🙏🙏
[18/10, 12:25 pm] 👑पदमाकाक्षी शुक्ला: 🙏🌹 *नमन मंच* 🌹🙏
🙏🌹 *जय अम्बे* 🌹१८/१०/२१,🌹🙏
🙏🌹बालकविताः *गोलगप्पे* 🌹🙏


पुचका वाला आया है ।
गोल-गप्पा खिलाया है।।
चटपटा खट्टा मीठा पानी। 
मुन्नू ने दौड लगाया है।। 

मस्त गोल गप्पे खाना है। 
भैय्याजी यह पैसा लेलो। 
आलू भी पूरी में डालो । 
खट्टा मीठा पानी भरलो।। 

मीठा थोडा कम डालना ।
धनिया फूदिना का पानी।। 
खट्टा, मीठा, तीखा पुचका।
आने लगा मुँह में भी पानी।। 

भैय्याजी मनमें मुस्काए। 
गंदा हाथों पकड़ा पूरी ।।
अंगूठा से छेद लगाया। 
 पानी में डूबा है पूरी ।।

हाथ में कटोरी पकडाया। 
झटपट पुचका उसमें डाला।। 
मुन्ना ने मुँह बडा कर दिया। 
पुचका का स्वाद है निराला।। 

ओह !! यह तो ज़्यादा मीठा। 
तीखा पानी ज़्यादा डालो।। 
तीखा पानी नाक में गया। 
थोडा मीठा चटनी डालो ।।

तीखा मीठा खट्टा पानी ।
मुँह खोल गप्पे खा रहे हम।। 
चटकारा लेकर खाते है। 
ज्यादा खाने को तरसे मन।। 

घरमें बनाते गोल गप्पे। 
भैय्याजी जैसा स्वाद कहां।। 
चटकारे ले खाते  रहते ।
गंदा पानी सोचते कहां?।। 

🙏🌹स्वरचित रचना 🌹🙏
🙏🌹पद्माक्षि शुक्ल 🌹🙏
[18/10, 1:04 pm] श्रीवल्लभ अम्बर: नमन मंच,
  विषय गोलगप्पे,,
   
     ये गोलगप्पे है गोलमोल।
     ऊपर से गोलमटोल,
      अंदर पूरी पोल्मपोल।
      फिर भी यह,अपने अंदर,
      आलू, बूंदी,खट्टा पानी,
       सब भर लाता है,,।
       अपने अंदर पा कर दर्द,
       सबको स्वाद दिलाता है।
        सबका आनंद उसका जीवन है।
         स्वयं कुर्बान हो कर,
         सबको आनंद दे जाता है।
          फिर भी गोलगप्पा,
          अजर, अमर, कहलाता है।

    🙏 श्रीवल्लभ अम्बर🙏
[18/10, 1:14 pm] विजेन्द्र मोहन बोकारो: मंच को नमन
विषय:-- *बाल कविता गोलगप्पे*

*बनारसी गोलगप्पे खा* 
*लो चुन्नू मुन्नू मैं आ गया हूं*!!

उठो दादू उठो गोलगप्पे चाचा आ गये है।
उठो दादू उठो रुको चाचा दादू आ रहे हैं।।

आओ चुन्नू मुन्नू अपने अपने हाथों में दोना 
लेकर खड़े हो जाओ खट्टा मीठा पानी पुदीना पानी जलजीरा पानी सबको एक तरह के दूंगा तब चाचा खट्टा पानी दो।
जी भर कर खाओ पैसा का चिंता ना करो
अंत में तुम्हारे दादू खा कर पैसा देखें।।

ले ले बेटा बेटी सूखी पूरी चटपटा खा ले।
जाके मम्मी से पूछो,मै आंगन में आकर खिला दूंगा मेरी तो चाची है शर्माए नहीं, जाओ चाचा अंदर आंगन में।

अंदर जाकर गुपचुप खिलाने के बाद दादू खाया वोले कल भी आना बच्चों जब तक रहेंगे रोज आकर खिला देना चुन्नू मुन्नू सुनकर खुश होकर दादू के गले लग गए।

शादी विवाह समारोह की शान है गोलगप्पे बच्चा हो या बुढे खाने में अपने को रोक नहीं पाते।

विजयेन्द्र मोहन।



गोलगप्पे का नशा सब उम्र पर को भाए।
इसके कितने नाम है गुपचुप, पानी पुरी।।
[18/10, 1:26 pm] रवि शंकर कोलते क: सोमवार दिनांक १८/१०/२१
विधा*****बाल गीत
विषय***#°°°°गोल गप्पे°°°#
                       ^^^^^^

आओ चुन्नू मुन्नू हम खाएंगे गोलगप्पे ।
खाते-खाते गोल गप्पे  मारते हैं गप्पे ।।
खट्टे मीठे गुपचुपके बच्चे सब दीवाने । 
बूढ़े भी जवान  बने खाकर गोलगप्पे ।।१

गोलगप्पे खानेका मजाही कुछ और है ।
खाने के लिए करते  सारे मस्ती शोर है ।।
कोई नहीं कहता कि ये मुझे नहीं पसंद ।
हरेक  खाने वाला हो जाता  सराबोर है ।।२

हम  जब  भी  शादी  ब्याह में जाते हैं ।
अक्सर  मेगी  गोल  गप्पे ही  खाते हैं ।।
मुंह में  पानी  आता  है देख गोलगप्पे ।
गर्दी के मारे हम बच्चे खा नहीं पाते हैं ।।‌३

जब जब  गांव  हमारे  लगता है मेला ।
पांडे तिवारी का  याद आए हमें ठेला ।। 
घेर लेते  हैं  बच्चे  सब खोंचेवाले को ।
कभी धक्कामुक्की  कभी हो झमेला ।।४ 

सुन गोलू तू पहले से ही है गोल मटोल ।
ज्यादा खाके तू और न बन जाना गोल ।।
सभी कहने लगे न जादा खा गोलगप्पे ।
वरना   गोलू  तू   बन  जाएगा  रे ढोल ।।

प्रा रविशंकर कोलते
     नागपुर
[18/10, 1:37 pm] वीना अडवानी 👩: गोलगप्पे
*******

अरे हम रह गये तब हक्के बक्के
जब देखा खा रही महिला गोलगप्पे
भूल गई लबों की लिपिस्टिक मेकअप
गिरा मुंह से पानी ले हुए भौंचक्के।।

अरे हम रह गये तब हक्के बक्के
जब देखा खा रही महिला गोलगप्पे

शादी ब्याह में भी टूट पड़ती ये भुखड़
जैसे इन महिलाओं ने कभी ना चखे।
धक्का मुक्की एसे करती जैसे हो
कहीं फ्री की कोई सेल लगी हटके।।

अरे हम रह गये तब हक्के बक्के
जब देखा खा रही महिला गोलगप्पे

जितना देती ना लिफाफे में नेक
उससे अधिक वसूल करना चाहती
चाट पर चाट कटोरी कितना ये
गटके, फिर भी गोलगप्पे चाहती।।

अरे महिलाओं भरे बाजार में 
मुंह फाड़ी शर्म ना आती ।।
महिलाएं बोली हक हमारा ही 
गोलगप्पों पर तुम्हें ये समझ ना आती।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************😋😋😋😋
[18/10, 1:57 pm] हेमा जैन 👩: विषय :- *गोल गप्पे *


गोल- गोल गोलगप्पे
    लगते है ये कितने अच्छे,

खट्टे -मीठे से ये लगते
       सबको ये अच्छे लगते,

खा कर बचपना लौट आता
        जैसे ही ये जाते मुँह में

छोटे-बड़े से ये गोलगप्पे
     लगते है हमेशा से अपने

उदासी दूर भगाये पल में
      मुँह में पानी लाते पल में


अमीर -गरीब सब चाव से खाते
ऐसे है ये प्यारे गोलगप्पे

हेमा जैन (स्वरचित )
[18/10, 2:03 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक "गोलगप्पे"

आओ आओ गोलगप्पे खाएं, 
गोल गोल देख जी ललचाए , 
मन भरमाए , 
मुंह में पानी भर भर जाए , 
आओ आओ गोलगप्पे खाए,,,,,
खट्टा मीठा तीखा पानी,
 याद करें तो मुंह में आए , 
पिचके भी गप्पे हमको भायें ,
सौंठ, चटनी, दही से, मिलाकर चाट बनाएं, आओ आओ गोलगप्पे खाएं,,,,, 
मौज मनाएं मिलकर खाएं , 
ठेले की घंटी पर भागे,  एक दूजे से निकले आगे ,
 गोल-गोल देख मन ललचाए ,
 आओ आओ गोलगप्पे खाएं  , ,,,,,
हर प्रांत में इसको खाते , 
शादी ब्याह और पार्टी में भी, 
 गोलगप्पे भी होते ,
भीड़ भाड़ में होते बड़े-बड़े लोग भी दिखते, 
 कहीं इसे पानीपूरी कहते , 
कहीं कहते पानी बताशे , 
देखो भाई गोलगप्पे के तमाशे , 
 जिसने ना खाए वह भी ललचाए , 
खाकर भी खाते जाए
आओ आओ गोलगप्पे खाएं,,,,,,

स्वरचित बालगीत रजनी अग्रवाल
  जोधपुर
[18/10, 2:10 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: गोलगप्पे (बालगीत) ----- ओमप्रकाश पाण्डेय
चाटवाले चाचा रोज शाम को
मेरे गली में लेकर ठेला आते
चाट पकौड़ी टिकिया और
गोलगप्पे भी वह लेकर आते
हम सब बच्चे बड़े चाव से खाते....... 1
सबसे बढ़िया गोलगप्पे होते
खट्टी मीठी चटनी होती
खट्टा  मीठा पानी इसका होता
भीतर इसके आलू मटर भी भरता
बड़े प्रेम से सबको खिलाता........ 2
पांच रूपए के पांच गोलगप्पे
खट्टे मीठे गोलगप्पे खाओ
दीदी भाभी माता जी आओ
साथ में अपने बच्चों को लाओ
जोर जोर से वह आवाज लगाता ...... 3
गोलगप्पा है बड़ा निराला
जो खाता इसको उसे मजा आता
नहीं खाता तो मुंह से लार टपकता
जितना खाओ उतना ही मन करता
गोलगप्पे का पानी मैं मांग मांग कर पीता....... 4
जब भी जाओ गोलगप्पे के  ठेले पर
मोहल्ले की चाची दीदी भाभी
सभी घेरे रहती हैं उसको
खाती हैं  चाट पकौड़ी गोलगप्पे
खाने से ज्यादा सब शोर मचाती........ 5
( यह मेरी मौलिक रचना है ----- ओमप्रकाश पाण्डेय)
[18/10, 2:10 pm] 👑सुषमा शुक्ला: गोलगप्पे ,,,

बचपन से अभी तक गोलगप्पे खाते आ रहे,,,,, खट्टी-मीठे पानी से चटकारे लेते जा रहे।।

कभी गोलगप्पे में बूंदी भरें कभी आलू,,
चाव से खाते गोलू मोलू और लालू।।
  
पूरा मुंह खोल कर गोलगप्पे गप्प कर जाते,,,,,,
आखिरी में दही पापड़ी चाट का,,,,,  गोलगप्पा भी मांगने से बाज नहीं आते।😁
चटकारे लेकर खा जाते😁

गोलगप्पे वाले को हर महिला भैया कहती"""
उसकी पत्नी के लिए खतरा टल जाता,,,,
 और वह सुख से रहती।।


सुषमा शुक्ला 

स्वरचित
[18/10, 2:53 pm] रामेश्वर गुप्ता के के: ।गोलगप्पे। 
गोलगप्पे यह गोल गोल, 
खाने में कितने है अच्छे। 
देखते ही मुंह में पानी आये,
कोई कहता पानी के बतासे।।
गोलगप्पे...................... 1 
चाट का ये राजा कहलाता,
स्वाद में होते यह बेमिसाल। 
किसी भी चौराहे चले जाये,
नुक्कड़ की दुकान में दिखते।। 
गोलगप्पे..................... 2. 
कोई इन्हें पानी पूरी कहता, 
एक पत्ते में छै नग मिलते। 
एक पत्ते से शुरूआत करते, 
दो पत्ते तक जरूर पहुंचते।। 
गोलगप्पे...................... 3
शादी में पहला स्टाल लगता, 
पहले पानी पूरी से पेट भरते। 
चाट का स्वाद यह बढा देता, 
पनपसंद चाट यह गोलगप्पे।। 
गोलगप्पे...................... . 
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[18/10, 3:44 pm] कुम कुम वेद सेन: विषय गोलगप्पे

गोलगप्पे की दुकान
से हो रही मेले की पहचान

जो मेले घूमने जाता
पहले गोलगप्पे खाता

हरी चटनी लाल चटनी
खट्टा पानी मीठा पानी

दही गोलगप्पे पानी गोलगप्पे
जी भर कर खाओ गोलगप्पे

उम्र चाहे कोई भी हो
सब के मुंह में आ जाते पानी

चाची हो या भाभी
दादी हो या नानी

सबकी पसंद है गोलगप्पे
गली-गली लगती है ठेलें

ठेले पर लगती है मेले
सब की गिनती अपनी-अपनी है

हाथ में दोना मुंह में पानी
कितना कह लो है गंदे पानी

फिर भी भर जाते मुंह में पानी
बड़े चटपटे लगते हैं गोलगप्पे

खाते जाओ खाते जाओ
गोलगप्पे का आनंद उठाते जाओ

गोलगप्पे की ठेले की कभी
बंद होती नहीं दुकान

सदा चलती रहती है
गली का ठेला हो या मॉल की सजी-धजी दुकान

कुमकुम वेद सेन
[18/10, 3:47 pm] सरोज दुगड गोहाटी: * अग्नि शिखा काव्य मंच *
* बाल गीत - गोलगप्पे *
* सोमवार - १८/१०/२०२१/

गोलगप्पे का ठेला गली में आया ,
टन- टन घंटी बजाए 
बच्चे गोलगप्पे खाने को ललचाए !
बड़ों बुढ़ो के भी मुंह में पानी आए !
खूब करारे फूले -फूले सबको भाए ,
 इमली वाला पानी मूंँह में पानी लाए!
धनिया ,पुदिना , हरी मिर्च, अदरक ,
बीसों मसाले पानी चटपटा बनाए !
आलू का चोखा , घुघनी ,बुंदी भर-भर ,
सी सी कर सब दोने  चट कर कर जाए !
बच्चे, युवतियां महिलाएं बुढ़ो का भी मन ललचाए ?
जब दोना ले लेते हाथ में फिर धिरज नहीं रख पाए ,
सारे पकवान मिठाई भैया पानी पुरी सब पर भारी भैया!
पानी बताशे ,पुचका , पानी पूरी गोलगप्पे ,
खाते खाते मुँह फूल के हो जाते  कूप्पे !
एक मसाला पूरी भैया खूब निम्बू निचौड़ के देना ,
थोड़ी पापड़ी मीठी सौंठ दही डाल कर देना !
दौना चाट- चाट के सखियाँ स्वर्गिक सुख का आनंद लेना !!

सरोज दुगड़
खारुपेटिया 
असम 
🙏🙏🙏
[18/10, 3:54 pm] 💃rani: अग्निशिखा मंच
विषय---गोलगप्पे 
विधा---कविता 
दिनांक----18-10-2021 

गोलगप्पे 

पानी पतासे, पानी पुरी, पुचकी या कहो गोलगप्पे,
छोटे-बड़े सभी की पसंद सदा रहे हैं गोलगप्पे ।
मीना,शीना,राजू,दीपू सब मिलकर बाजार जाते हैं, गोलगप्पे के ठेले पर सबसे पहले खड़े हो जाते हैं ।

खट्टा मीठा पानी इसका सबको बहुत ही भाता है,
आलू,बूंदी का मसाला, इसका स्वाद बड़ा जाता है ।
कहीं पुदीने,इमली का खट्टा मीठा पानी तो,
कहीं हींग का, नींबू का पानी भी मिलता है ।
जल जीरे का पानी, लहसुन का पानी भी मिलता है ।
अलग-अलग हर पानी का आता जब स्वाद,
तब इसकी कीमत बढ़ जाती है । 

गोल गोल आकार है जिस कारण गोलगप्पा कहलाए,
जब भी कोई घूमने जाए यह सबके मन को ललचाए ।जहाँ खड़े हों गोलगप्पे के ठेले 'रानी'
                           भीड़ वहाँ लग जाती है,
और  खड़े  इंतजार में कब अपनी  बारी आती है ।
 ठेले वाले से कोई मीठा कोई तीखा की फरमाइश बताएं, बच्चे हो या बड़े सब खा कर गोलगप्पे खुश हो जाएं ।

                            रानी नारंग
[18/10, 4:08 pm] रागनि मित्तल: जय मां शारदे
*********
 अग्निशिखा मंच 
दिन-सोमवार 
दिनांक -18/10 /2021 प्रदत्त विषय- गोलगप्पे बाल गीत

छोटे बड़े सभी खाते हैं बूढ़े हो या बच्चे। 
गोलगप्पे सबको बहुत स्वादिष्ट लगते,सबको लगते अच्छे।
 ₹2 मां से लेकर भागे पानीपुरी के ठेले में।
लड़कियां ढूंढ रही है गोलगप्पे का ठेला सावन के इस मेले में। 
चटकारे ले ले कर खाती पानी और मांगती हैं ।
खट्टी मीठी चटनी उसमें ऊपर से वो डालती हैं। 
गोल गोल गोलगप्पा  सबके मनको भाता है।
खुद पेट फोड़ता अपना और सब को ललचाता है। 
इसकी भी देखो अलग कहानी,
खट्टा तीखा खुद सहता,
 पर सब की भूख मिटाता है।

रागिनी मित्तल
 कटनी ,मध्य प्रदेश
[18/10, 4:18 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: मंच को नमन
+++++++++
गोलगप्पे (बाल कविता)

वह आया गोलगप्पे वाला
ठेलिया पर रखे हैं थाला
उसमें सजा हुआ गोलगप्पा
ड्रम में भरा है खारा पानी नमक मिर्चा धनिया जीरा से बना हुआ स्वादिष्ट है व्यंजन
एक भगोन ने में रखे हैं
मसल मसल कर पक्का आलू
एक भगोने  ने में रखे हैं।
छोला उबला हुआ मटर का अलग से रखी है ।
बर्तन में नमक मिर्च और धनिया बुक्का ।
खाएंगे हम सब गोलगप्पा।
सबसे छोटे  नाती ने आ
दरवाजे पर उसको रोका ।
सब बच्चों ने एक साथ मिल खाया खट्टा मीठा गोलगप्पा। और तालियां बजा बजाकर अच्छा है ,उस पर लगाया ठप्पा।।
यद्यपि उसमें तीखा पानी था बच्चों की भी मनमानी जमकर खूब खाए गोलगप्पा बोले आकर पैसा दे दो पप्पा।।
सो रुपए का खाया हमने, बहुत मजा ही आया हमको, अब जब जब वह सामने घर के सामने आएगा
हमें से हर कोई खाएगा पापा बोले नहीं देंगे पैसा,
बच्चे बोले--" भला होगा कैसे ऐसा बच्चों की बात आप मानेंगे हमारी खुशी के लिए सब कुछ करेंगे।।"
---------
डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी
[18/10, 4:31 pm] +91 70708 00416: मंच को नमन 🙏
विषय-गोलगप्पे
बाल कविता
18/10/21

        गोलगप्पे वाला
*********************
देखो  जल्दी -जल्दी आओ
गोलगप्पे वाला है आया
देख सबका मन ललचाया
गोलू आओ सोनू आओ
चलो उसे बुलाते हैं
कहीं और न चला जाये
गोलगप्पे का है स्वाद निराला
जो है खाता हो जाता  उसका दीवाना
ये गोलगप्पे हैं गोल-गोल
 मुंह में डालो हो जाते घोल-घोल
आलू, मटर,इमली का पानी
जब भर जाता इसके अन्दर
बड़े चाव से खाते बूढ़े और बच्चे
गोलू ने कहा-ऐ गोलगप्पे वाले भैया पहले मुझे खिलाओ
फिर मुझसे पैसे पाओ
अब  हाथ में दोना थमाया
गोलगप्पे उसमें झट से डाला
गोलू-मोलू ने गाल फुलाया
 वाह इसका स्वाद है चटपटा
थोड़ा खट्टा और मीठा और डाल दो भैया
पुदीना का  मसालेदार पानी भी डालो भैया
अब तो गोलगप्पे घर में भी  बनाते हैं
पर गोलगप्पे वाले भैया जैसा स्वाद कहां

 डॉ मीना कुमारी परिहार

पहले
[18/10, 4:32 pm] +91 70708 00416: मंच को नमन 🙏
विषय-गोलगप्पे
बाल कविता
18/10/21

        गोलगप्पे वाला
*********************
देखो  जल्दी -जल्दी आओ
गोलगप्पे वाला है आया
देख सबका मन ललचाया
गोलू आओ सोनू आओ
चलो उसे बुलाते हैं
कहीं और न चला जाये
गोलगप्पे का है स्वाद निराला
जो है खाता हो जाता  उसका दीवाना
ये गोलगप्पे हैं गोल-गोल
 मुंह में डालो हो जाते घोल-घोल
आलू, मटर,इमली का पानी
जब भर जाता इसके अन्दर
बड़े चाव से खाते बूढ़े और बच्चे
गोलू ने कहा-ऐ गोलगप्पे वाले भैया पहले मुझे खिलाओ
फिर मुझसे पैसे पाओ
अब  हाथ में दोना थमाया
गोलगप्पे उसमें झट से डाला
गोलू-मोलू ने गाल फुलाया
 वाह इसका स्वाद है चटपटा
थोड़ा खट्टा और मीठा और डाल दो भैया
पुदीना का  मसालेदार पानी भी डालो भैया
अब तो गोलगप्पे घर में भी  बनाते हैं
पर गोलगप्पे वाले भैया जैसा स्वाद कहां

 डॉ मीना कुमारी परिहार
[18/10, 4:43 pm] चंदा 👏डांगी: $$ गोलगप्पे $$  

पापा अब तो मुझे खिलादो आप
गोलगप्पे बड़े मजेदार 
कितने अच्छे लगते 
कुरकुरे गोल गप्पे 
इमली का स्वादिष्ट पानी
भरा है उसमे आलु का मसाला 
पानी मे हिंग लगती मजेदार
पापा आज चलो बाजार 
अब तो कोरोना दिखता नही 
कब तक घर मे बन्द रहेंगे 
और कितना हम सहेंगे 
पापा मुझको गोलगप्पे खिलादो 

चन्दा डांगी रेकी ग्रैंडमास्टर 
रामटेकरी मंदसौर मध्यप्रदेश
[18/10, 4:49 pm] सुरेन्द्र हरडे: अग्निशिखा मंच को नमन

आज की विधा :- बालकविता

विषय:-  *गोलगप्पे*
           0️⃣0️⃣0️⃣0️⃣0️⃣

बारह महीने मेरी पूछ रही थी
यह दुनिया मुझे प्यार से कहते गोलगप्पे, खट्टे मीठे गोलगप्पे बच्चों से बूढ़े तक खाते जाते।१।

पिंकी का जन्मदिन था ड्रेस खरीदने बाजार गए, खरीदारी हुई
फिर दिखा तिवारी का गोलगप्पे का ठेला, गोलगप्पे खाने गए।२।

 पिंकी चिंटू को पसंद के गोलगप्पे तिवारी भैया ने के हाथ में प्लेट दी शुद्ध पानी में दिए गोलगप्पे, खट्टे मीठ्ठे गोलगप्पे , सबने खाए।।३।।

इसको बोलते गोलगप्पे या पानी पूरी या पुचका  कोलकाता में खाते थे अमिताभ बच्चन गोलगप्पे गरीब हो अमीर  सबको भाते।४।

खट्टी मीठी  पानी पुरी बड़ी लगती स्वादिष्ट देखने से ही मुंह में आता पानी मुंह खोलो अंदर जाती सीधी
कितना भी खाओ नहीं भरता मन
यह हमारे गोलगप्पे, गोलगप्पे।५।

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर
दिनांक १८/१०/२०२१
[18/10, 4:52 pm] जनार्दन शर्मा: *दास्तान-ऐ-गोलगप्पे* 😊😊 हास्य रचना 
एक दिन स्कूल  कि छोरियों ने मिलकर,
*बाहर गोलगप्पे खाने का मन बनाया*
मानो पुरा स्कूल  ठेले के आसपास आया 

रंग बिरंगे परिधानों से सजी वो नवयौवनायें 
उस चाटवाले को घैरकर,मन,ही मन ललचाये,
मानो जैसे भोजन देख,कौवे, कांवकांव चिल्लाए
  
ठेले वाला भी उन्हें  देखकर पहले तो चकराया,
रख के संयम उसने फिर,सबको दौना पकडाया,
पर सब कि एक साथ चिल्लाहट से वो घबराया,

हर बार एक नई तरुणी,कोमल हाथ को बढ़ाती,
वही दुजी कोई,नये स्वाद कि फरमाइशी बताती,
तो तिसरी सी,सी,कर बहुत मिर्ची है चिल्लाती
एसेही सब मिल,गोलगप्पे वाले का बैंड बजाती,

सब ने मिलकर पेट भर, खूब गोलगप्पे दबायें,
पर खाने का बिल देख,सब के सिर चकरायें
बिल के पैसे कम पड़ गये,उधार न किया जाये,

ठेलेवाला नगद पर अड़ गया,नगद ही दे के जाये
नहीं तो अपने सब मोबाइल वहां धर के जाये, 
सभी के चेहरे पे उड़ी हवाईयां पैसे के पड़े लाले, 

तभी वहां से गुजरी प्रिंसीपल,सबके पैसे चुकाये
नाक कटादी स्कूल कि,सबको वो सजा सुनाए,
खड़ी हो गई बिचारी, *जैसे लौट के बुद्धू घर को आये*    😄😄😄😊
स्वरचित 
*जनार्दन शर्मा*
( अध्यक्ष मनपसंद कला साहित्य मंच इंदौर  )
[18/10, 4:57 pm] पूनम सिंह कवयित्र� � इशिता स� �डीला: अग्नि शिखा मंच 
विधा बाल कविता 
विषय गोलगप्पे 
कल तो बड़े लगाए थे गप्पे, 
बड़े बड़े थे वीर किस्से 
आज खिलाओ गोल गप्पे 
कहा लेते हो कितना तीखा 
जरा सा कड़वा, फिर क्यों चीखा, 
खट्टे पे  मंन चल गया सबका 
खिला दो गोल गप्पे हमका, 
थोड़ा रखना जीरा पानी, 
थोड़ी अमचूर रसीली हो,. 
हा बड़े पतीले से खिलाना, 
जिसमें हींग भी बड़ी हो, 
आखिर में मीठी  चटनी का 
खाऊगी कर के मुँह, बड़े बड़े 
अब्ब्ब ना वादे से हटो  पीछे 
खिलl दो  मुझे आज गोलगप्पे, 
इशिता सिंह, शिक्षिका
[18/10, 5:50 pm] रानी अग्रवाल: गोलगप्पे
१८.१०.२०२१.सोमवार।
विधा_बालगीत।
शीर्षक_गोलगप्पे।
मुन्नू आओ,चुन्नू आओ,
मुनिया रानी, तुम भी आओ,
आकर गोल गप्पे खाओ,
खाकर सी_सी शोर मचाओ।
बीच छेद कर इसे फोड़ते,
मीठी चटनी,मूंग,आलू भरते ,
फिर तीखे पानी में डुबोते,
बड़ा मुंह खोलकर इसको धरते।
जैसा जी चाहे कर लो,
जो रुचे वो अंदर भर लो,
आलू, उबली मूंग या रगड़ा,
खाकर कभी न करो झगड़ा।
खुशबू इसकी दूर से आए,
देख के मुंह में पानी आए,
होते कितने मीठे,तीखे,खट्टे,
लगते बड़े ही मजेदार चटपटे।
जी करता और_ और खाएं,
ज्यादा खाकर तो पछताएं,
सो भैया, थोड़ी में मनाओ मोज,
और चार_छह बस खाओ रोज।
स्वरचित मौलिक बालगीत____
रानी अग्रवाल,मुंबई,१८.१०.२१.
[18/10, 6:13 pm] anita 👅झा: बाल गीत -गोलगप्पें 
गोलगप्पें सा मुँह फुलायें हों
हर सवाल का जवाब तुम हों 
तुमने ही सिखाया मुझे है 
माता दुनिया की पहली गुरू हों 

मुस्कानो से भर जवाब मुझे दे दो 
जब फटे नोट चल सकते है
फटी जींस चल सकते है । 
ममत्व ज्ञान दीप सिखाती है ।

मन से बड़ा ना कोय गीत सुन 
बऊआ को गले लगाती है 
मुस्कानो से भर कहती है 
मेरे गोलगप्पें सा प्यारा बऊआ है 
अनिता शरद झा
[18/10, 6:34 pm] डा. अंजूल कंसल इन्दौर: गोलगप्पे- बाल कविता 

चलो आज गांधी हाल के मेले चलेँ
भर-भर गोल- गोल गोलगप्पे खाने 
नाम सुनते ही मुंह में आ गया पानी
ज्यादा मिर्च से याद आएगी नानी।

चिंटू मिंटू चुनिया मुनिया बेबी शेबी
गोल-गप्पे वाले को घेर कर बोलीँ-
शर्मा भैया, जल्दी खिलाओ गोलगप्पे 
एक दो तीन चार,अब रुक नहीं सकते।

उधर से प्रिंसिपल मैडम आ गुजरीँ 
पास बुलाकर बच्चों से प्यार से बोलीं-
"बेटा इससे कोरोना फैलने का डर है
देखो इसके हाथ-नाखून साफ नहीं है।

सुनो  रे  गोल- गप्पे  वाले  भैया 
हाथों में दस्ताने पहन लो रे भैया 
इन  मटकियों को भी  ढ़क लो  रे 
बच्चों को साफ जलजीरा पिलाओ रे।

हां मैडम जी!कह,उसने झट दस्ताने पहने 
सोशल डिस्टेंसिंग बना बच्चों को खिलाए
सब बच्चोँ ने खूब खुश होकर भर-भर खाए
खाने के बाद मास्क लगाकर घर को भागे। 

डॉक्टर अंजुल कंसल "कनुप्रिया"
18-10-21
[18/10, 7:00 pm] आशा 🏆🏆जाकड इन्दौर: गोलगप्पे अरे भई गोलगप्पे 
खाकर होते फूल के  कुप्पे 
सब मुंह फाड़ के उन्हें खाते
पर मुझे बिल्कुल नहीं भाते

 पहले उसमें इक छेद करते
 फिर उसमें आलू छोले भरते
 खट्टे -मीठे जल में उसे डुबोते 
 दोने में रख फिर प्रेम से खाते 
 पर  मुझे बिल्कुल नहीं भाते 


लोग बाजार दौड़  खाने जाते 
हर्षित होकर वे शान से जाते 
जैसे बड़ा काम करने को जाते
खुश गोलगप्पे ठेले पर पहुंचते 
पर मुझे वे बिल्कुल नहीं भाते

मैं जब भी खाती हूं गोलगप्पे 
घर पर करती हूं तैयारी पहले
हरे धनिया पुदीना की चटनी
बनाती हूँ खट्टी- मीठी चटनी 
फिर पानी में प्रेम से मिलाती 
तब मैं गोलगप्पे प्रेम से खाती 


आप भी कभी मेरे घर आएँगे 
आपको गोलगप्पे खिलाऊंगी 
अपने हाथों से बनाकर चटनी 
प्रेम से  गोलगप्पे  खिलाऊंगी
आप सभी का स्वागत है आइए
 गोलगप्पे खाइए और खिलाइए


आशा जाकड़
[18/10, 8:10 pm] 💃💃sunitaअग्रवाल: शीर्षक__ गोल गोल  गप्पे


  जायकेदार रसदार मजेदार 
गोल गोल, गोल गप्पे 
आओ आओ बच्चो  ,
मैं लाया , अनेकों स्वाद  में गोल गप्पे, 
खट्टा मीठा, तीखा, पुदीना हींग
जलजीरा, 
सोनू आओ, मोनू आओ, गोलगप्पे खाओ,

जायकेदार ,रसदार, मजेदार, स्वाददार 
प्यारे बच्चों रखो स्लेट, ये पकड़ों प्लेट, 
आओ आओ  बच्चों मजे से खाओ ,
कैसा लोगे खट्टा मीठा, तीखा पुदीना , जलजीरा 

बच्चों तीखा पानी  लो , नमकीन लो, नही नही खट्टा मीठा लो , अरे अरे हींग जीरा पानी वाला गोलगप्पे लो ,
देखो देखो आया ना मजा ,
सी सी करते जा रहे हो , और और दो कहते जा रहें हो,  
रसदार मजेदार स्वाददार  बच्चों। और लो और लो  , 
माँ  ,बस यही एक ऐसी डिश है जो हाथ में पकड़े सामने कर और भये एक और देना , एक गोलगप्पा, और और_______
जायकेदार रसदार मजेदार स्वाद दार ।

सुनीता अग्रवाल इंदौर 🙏🙏

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Friday, 15 October 2021

Akhil Bharati agnishikha Manch ke block per Aaj dinank 15/10/2021 ko vijaydashmi per rachnakar unki rachnaen padhe aur unka hosla afzai Karen Alka Pande Mumbai


: शीर्षक- विजयादशमी

विजय दशमी दशहरा । 
सत्य की कहानी बतलाता ।।
झूठ का होता मूंह काला
जन -जन को बतलाता ।।

मर्यादा पुरुषोत्तम का गान ।
रावण के पापा का अवसान ।।
प्रभु राम की लीला अपरम्पार ।
दशहरा राम ,विजय की शान ।।

भारत है  कई धर्मों का देश 
संस्कार संस्कृतियों का देश 
सर्व धर्म सम भाव का होता मान 
पुनीत पर्व दशहरा परम्पराओं का गान ।।

आज नीलकंठ पक्षी के दर्शन सुख समृद्धि लाता 
मनभावन मंगलकारी , सब विपदा हरता ।।
पावन पर्व दशहरा , ख़ुशियाँ ले कर आता । 
पापपीओ का विनाश सजा यह संदेश देता ।।

सब मिलकर करे प्रतिज्ञा 
नहीं करेंगे अपनें बढो की अवेज्ञा 
धर्म के अस्तित्व को मिटने न देंगे
घर घर में राम विराजे राम का जाप होगा ।।
दंशहरे पर करे प्रतिज्ञा 
दशहरे का मान बढ़ायें ।।
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई
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: दशानन क्यों नहीं मरता हैं । 

दशानन क्यों नहीं मरता है । 
बार बार विचारे आता है ।।
हर वर्ष जलाया जाता हैं 
पर अंहकारी क्योनही मरता हैं ।।

दुष्ट पापी अधर्मी से सब कोई हारा था ।
राम ने रावण को अपने हाथों मारा था ।।
करके अंत बुराई की अच्छाई की विजय पाई थी ।
सच का बोलबाला हुआ जयकारा लगाया था ।।

मिलकर सबने खुशियां मनाई ।
घर घर में आनंद मनाया था ।।
पापी का वध हुआ था ।
दशानन कभी नहीं मरता हैं ।।

दुष्ट रावण को पापों की 
सजा मिल गई थी ।
बडा ज्ञानी था और चतुर था ।।
उसने सोचा राम के हाथों मरूंगा तो मोक्ष पा जाऊंगा ।
और अमर भी हो जाऊंगा ।।

हर साल हम विजयादशमी मनाते हैं ।रावण को हर साल जलाते हैं बुराई का अंत इसी तरह मनाते हैं।।
रावण तो आज भी जगह जगह मिलते हैं ।
इसीलिए तो दशानन कभी नहीं मरता है ।।

जिसके अंदर पाप पनपता वही रावण होता है ।
जिसकी आत्मा दूषित होती वही रावण होता है ।।
अमानवीय जिसका व्यवहार होता वही रावण होता है 
नारी की जो अवहेलना करता वही रावण होता है ।।

जो सब पर अपना रौब चलाता वही रावण कहलाता हैं
दशानन तभी तो कभी नहीं मरता है ।।
जो संतों का अपमान करता उसके अंदर रावण बसता हैं । 
राक्षसी जिस की प्रवृत्ति उसे रावण ही कहा जाता ।।

असुर जैसा रहता है 
वह राक्षसों के जैसा खाता पीता उसको रावण कहते हैं ।।
जो अपना स्वार्थ सिद्धि के लिए पूजा करता है ।
वही तो रावण का वंशज होता है ।।

इसीलिए तो दशाननकभी नहीं मरता है दशहरा पर उसको सब याद करते हैं ।उसकी बुराई को आग में जलाया करते हैं ।।
लंकेश था वह लंकापति उसका भी अंत हुआ 
10 मुख का वह दशानन कहलाया ।।

रावण को यदि मारना है ।
तो बुराई को खत्म करना होगा ।।
सत्य कर्मों को अपनाकर रावण को भगाना होगा ।
अपने अंदर बैठे रावण का हमें वध करना होगा ।।

तभी दशानन मारा जाएगा 
नहीं तो रावण रोज जिंदा होगा ।।
और समाज में बुराई ही बुराई होगी 
मन में पैदा करो अच्छाई दया धर्म परोपकार की भावना ।।

सभी रावण का वध होगा ।
रावण को मारना है हमें अपने आप को बदलना होगा ।।
हमें मर्यादा में रहना होगा ।
सत कर्मों को अपनाना होगा ।।

दीन दुखियों की सुनना होगा ।
तभी हम अपने अंदर के रावण को मारेंगे ।।
और उस दिन सच में दशानन मारा जाएगा ।
वरना दशानन कभी नहीं मरता है ।
वह तो हर मानव के अंदर जिंदा ही होता है ।।

अलका पाण्डेय मुम्बई
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[15/10, 8:55 am] 💃इंद्राणी साहू: *साँची-सुरभि*
              *दशहरा*
*आल्हा छंद गीत*

पर्व दशहरा पावन आया ,
      दंशहरन का यह त्योहार ।
बैर भाव को दूर भगाएँ ,
    खुशियाँ तब ही मिले अपार ।।

सुनो दशहरा पावन गाथा ,
       सागर मंथन हुआ अपार ।
तभी गरल बाहर है आया ,
      शिव ने कण्ठ लिया है धार ।
दंशहरन(विष का हरण)कर धरा बचाया ,
         यही दशहरा का है सार ।
पर्व दशहरा पावन आया ,
            दंशहरन का है त्योहार ।।

अति बलशाली योद्धा रावण ,
        अहंकार वश सुध बिसराय ।
सीता माता हरकर लाया ,
        रावण कुल का नाश कराय ।
पतिव्रता को बंधक रखकर ,
        देता अतुलित कष्ट अपार ।
पर्व दशहरा पावन आया ,
          दंशहरन का है त्योहार ।।

नवदिन देवी सेवा करके ,
      पाए शक्ति अतुल श्री राम ।
माँ सीता को चले बचाने ,
        हुआ भयंकर तब संग्राम ।
अहंकार का अंत हुआ फिर ,
          जीता धर्म अधर्मी हार ।
पर्व दशहरा पावन आया ,
         दंशहरन का है त्योहार ।।

सीता माता मुक्त हो गई ,
       खुशियाँ छाई धरा अपार ।
हम भी यह संकल्प उठाएँ ,
       बुरे कर्म को देंगे मार ।
वही दशहरा सच्चा होगा ,
       तभी मिटे धरती से भार ।
पर्व दशहरा पावन आया ,
        दंशहरन का है त्योहार ।।

     *इन्द्राणी साहू "साँची"*
   भाटापारा (छत्तीसगढ़)
[15/10, 9:50 am] 👑सुषमा शुक्ला: *दशहरा यानी अपराध के विरुद्ध खड़े होने का पर्व*

🥦दर्शन और संस्कृति,,,
 आज जारी है,,, श्री राम के रहते रावण पर भारी है ,,,,
संयम की विजय,,,
 आत्म बल की विजय,,,, 
यही तो जीवन,,,, जिसकी करें जय जय।

जिज्ञासा ,उन्मुक्त प्रतीक्षा ,,
तलाशती हर पल ,,,
 राम नदिया बहे कलकल,,,
 आज नैतिकता घटती जा रही,,,, रावण की दावेदारी,,, 
देखो मुस्कुरा रही।।

लोकतंत्र में एक रावण नहीं,,, मन के रावण को मारना है,,
 लक्ष्य भेदकर राम राज्य,,,, आदर्श गढ़ना है,,,, 
शूचिता लक्षिता से हर पल बढ़ना है।

अपराध के दशानन को,,,
 पनपने नहीं देना,,,
 संयुक्त संकल्प से खाद ,,
उर्वरा नहीं देना,,,, 
इस दंश से जुर्म से,,,
 संयमित होकर लड़ना,,, 
इस पर्व परंपरा को ,,,
नैतिक नया अर्थ देना।।।

तार्किक, जागरूक होकर,,,,
 मूल्यों को स्थापित करना हैl
 आधुनिकता अंधानुकरन पर लक्ष्य भेदना है,,,,
 आज भी रावण जलकर,,,
 बड़ा होता जा रहा है।
 जुर्म अपराध में खड़ा ,,
बलशाली होता जा रहा है।


दशहरे को वैश्विक सोहदार्य बनाए,,,
 मंगल कामनाओं के साथ आगे बढ़ाए। 
मनरूपी रावण पहले कुचल डालें,,,
 फिर राम की स्तुति गाते जाय

 जय श्री राम, जय जय श्री राम


स्वरचित रचना सुषमा शुक्ला
[15/10, 10:01 am] डा. सुधा😡🥶 चौहान - इंदौर: *दशहरे की शुभकामनाएं* 

🌹🌹🌹🌹🌹

 दशहरे का पर्व हम सबको याद दिलाता है
 आतंकवाद का अंत एक दिन होता ही है
रावण तो बीस भुजा और 10 सिर का मालिक था 
उसकी नाभि में अमृत कुंड था 
 धरा से लेकर स्वर्ग तक उसका राज्य था 
सब कुछ उसके हाथ में था ।
कब सोचा था रावण ने
 इक दिन में मारा जाऊंगा 
वह भी एक बनवासी के हाथों
 जिसके पास बंदर भालू की सेना होगी
 जो दिखने में एक साधारण मानव होगा
 परंतु वह भूल गया था सत्य की ताकत 
त्याग तपस्या की ताकत बहुत अधिक होती है।
जो व्यक्ति गलत कार्य करता है 
वह भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है
 और फिर स्वता ही अपने विनाश को
 आमंत्रित करता है
 यह दशहरा पर्व हमें बार-बार यही शिक्षा देता है ।
सत्य सनातन और अजर अमर है
 अच्छाई की ताकत बुराई से बहुत बड़ी होती है 
 एक दिन सच्चाई की अच्छाई की जीत होती है।
 
🌷🌷🌷🌷🌷
डॉ सुधा चौहान राज इंदौर
[15/10, 10:02 am] कुंवर वीर सिंह मार्तंड कोलकाता: 🌺शुक्रवार -14//10/3021
🌺विषय -भक्ती गीत /विजयादशमी

जय विजया, जय बिजया
आज विजय दशमी की
सबको जय विजया।

महिषासुर उत्पात मचाया
स्वर्ग लोग पर धाक जमाया
सब देवों ने शक्ति सृजन कर
दुर्गा का नव रूप बनाया।
नौ दिन तक संग्राम चला था
तब असुरों को बहुत ख़ला था
नौवें दिन देवी दुर्गा ने
महिषासुर बध किया
जय विजया, जय बिजया
आज विजय दशमी की
सबको जय विजया।

त्रेता युग में रावण हुआ अहंकारी
शक्ति सृजन कर बना बहुत अत्याचारी
तब धरती पर विष्णु राम बनकर जन्मे
रावण बध कर उसकी सारी लंक उजारी
राम राज्य स्स्थापित करके
जन को सुखी किया।
जय विजया, जय बिजया
आज विजय दशमी की
सबको जय विजया।

© कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड
[15/10, 11:00 am] विजेन्द्र मोहन बोकारो: *मंच को नमन*

*विजयदशमी*
----------------------------
*वि*- विजयादशमी का पुनीत त्यौहार है।
*ज*-जय पायें इन्द्रियों पर अपनी जिनका अहम व्यौहार है।
*या*-याद दिलाता यह मानव को दसों इन्द्रियों को जीते।
*द*-दसों इन्द्रियां ही दस सिर हैं संयम से इनको जीते।।
*स*-सत्य,अहिंसा की रक्षा हित अस्त्र-शस्त्र कर मे धारें।
*मी*-मीत बने मानवता के सब मानवता को स्वीकारें ।।

विजयेन्द्र मोहन।

*सभी को विजयादशमी की आत्मीय शुभकामनाएं* 💐

*विजयेन्द्र मोहन*
[15/10, 12:01 pm] 😇ब्रीज किशोर: बिजय दशमी पर कविता
********************
नील कंठ पक्षी अति सुन्दर
कई रंग के पंख सुहाने शिव
स्वरूप मान के दर्शन करे
सयाने।
शिव भक्त है राम दुनिया भी
यह जाने ,समुन्द्र तट पर राम
ने शिव स्थापित करके पूजन
किया भक्ती से फिर राम जी
वर पाये शक्ति से।
रूद्राणी ही है शक्ति स्वरूपा 
राम ने शिव और शिवा सेआशीश
पाया।
बिजय दशमी पर नील कंठ को
शिव स्वरूप ही माने।
जय श्रीराम जय हनुमान हर हर
महादेव। बृकिशोरीत्रिपाठी
🌹🌳🌷🌴🌹🌳🌷🌴🌹🌳
[15/10, 12:03 pm] निहारिका 🍇झा: नमन मंच
दिनाँक 15/10/2021
विषय;-दशानन/दशहरा
रावण /दशानन

वो कहता था मैं रावण हूँ।
मिला अभय महादेव से मुझको
मैं सबसे ऊपर हूँ।
है सोने की लंका मेरी
तीन लोक का विजेता हूँ।
टिका नहीं कोई मेरे आगे 
 गन्धर्व मुनि या देव कोई।
ना कोई इतना बलशाली
जो मुझको दे मात यहाँ।
कट जाऊं पर झुकूं नहीं  
हाँ मैं ऐसा रावण हूँ।
बस यही तो अवगुण मेरा 
दम्भ भरा मुझमे बहुतेरा
जिसकी ऐसी सजा मिली
सदियों से जला रहे हो मुझको 
क्या इतनी बड़ी खता मेरी।
जोर शोर करें तैयारी 
पुतले को ही जलाने की ।
इक पल भी ना सोचे कोई 
क्या तुम सब मे राम रहा 
जो मुझको तुम जला रहे।।
एक बार तो झांको अपने अंदर 
क्या तुम सबमें ना मैं हूँ!!
निहारिका झा🙏🙏🌹🌹
[15/10, 1:19 pm] साधना तोमर: आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! 

विजयादशमी

विजयी रहें दैवीय शक्तियाँ, 
आसुरी शक्ति का नाश हो। 
रावण हटे सभी के मन से, 
हिय में राम का वास हो। 

धर्म की ही फहरे पताका, 
अधर्म भाव सभी दूर रहे। 
आत्मविश्वास सच्चाई का, 
चेहरे पर सदा ही नूर रहे। 

काम, क्रोध, मद, लोभ के, 
व्यसनों को सभी छोड़ दें। 
दुर्भावों की माला को अब, 
आओ हम सब तोड़ दें। 

राम के जीवन से हम सब, 
सत्य और संयम अपनायें। 
मर्यादित हो जीवन अपना, 
खुशियों के ही दीप जलायें। 

धर्म की विजय का सन्देश, 
देता विजयादशमी पर्व है। 
अपनी भारतीय संस्कृति, 
पर हम सब को ही गर्व है। 


डा. साधना तोमर
बड़ौत (बागपत) 
उत्तर प्रदेश
[15/10, 1:45 pm] रवि शंकर कोलते क: शुक्रवार***१५/१०/२१
 विधा****काव्य
 विषय ***विजयादशमी पर्व 
                    
      #**** भक्ति गीत****#
                   ^^^^^^

आओ विजयादशमी पर्व मनाए हम ।
     अभिमान को तजकर 
          प्रेम-भाव अपनाएं हम ।।धृ

श्री राम जीते रावण की पराजय हो गई ।
असत्यपर सत्य की देखो विजय हो गई ।।
राम राज का उदय हो गया भारत में ।
गर्व हारा प्रीतकी हर तरफ जय हो गई ।।
     आओ साथी प्रेम से          
          सबको गले लगाए हम ।।१

मां से ले आशीष रघुवर ने की चढ़ाई ।।
लंकाधिश को रामने खूब धूल चटाई ।।
विजयोत्सव का पर्व मनाए लोग हर्षमें ।
नृत्य गायनमें बजे ढोल झांज शहनाई ।।
  चारों दिशामें आज धूप
                   दीप जलाएं हम ।।२

विजयदशमी को रावण गर्व का जले ।।
सोनेकी लंका लूटी फूल से लोग खिले ।।
लोग घरघर जाके शमी पर्ण दे बड़ों को ।
निगर्वी होंके सब लोग एक दूजेसे मिले ।।
    भारत मां खुश हुई
      ध्वज रामराजका लहराए ।।३

प्रा रविशंकर कोलते 
     नागपुर
[15/10, 1:55 pm] वीना अडवानी 👩: विजयदशमी
***********

विजयदशमी मना रहे 
देखो खुश सब आज
वो भी खुश है इंसा
जिसके मन पर रावण राज।।

जला रहा वो वहशी दरिंदा
रावण का पुतला आज
देख मन मे उसके कपट भरा
कब जलाएगा मन भीतर का पाप।।

अरे कल युग में रावण गलत बोलता
पहले खुद को देख हवस भरी है आज
ये ना देख कल युग का मानव हर
महिला में बसी एक सीता खास।।

विजयदशमी पर ले प्रतिज्ञा 
ना होने देगा फिर किसी निर्भया
जैसा किसी बच्ची का हाल।।

विजयदशमी मना रहा कलयुग
का मानव सच आज।।
खुद के मन में बसा रखा रावण
जैसा एक साज।।

वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
*******************
[15/10, 2:08 pm] वीना अचतानी 🧑🏿‍🦽: वीना अचतानी, 
विषय ***विजयादशमी ****
दशहरा का तात्पर्य 
सदा सत्य की जीत
राम चिंरतन चेतना
राम सनातन सत्य 
रावण वैर विकार है
रावण है दुष्कृत्य 
अपनी ही करनी
से सोने की लंका
जलावाई है रावण
था दम्भी अभिमानी
उसने छल बल 
दिखलाया बीस भुजा
दस शीश कटाये
अपनी ही करनी से
सोने की लंका जलवाई
रावण के जब बढ़ गए
अत्याचार लंका में 
जाकर राम ने 
उसे दिया मार
अच्छाई के सामने
बुराई गई हार
आ गया दशहरा 
फिर सन्देश देने 
संकटों का हो घनेरा
हो न व्याकुल मन तेरा
द्वेष हो कितना भी गहरा 
हो न कलुषित मन तेरा ।।।।।
वीना अचतानी 
जोधपुर ।।।
[15/10, 2:15 pm] 💃rani:                          विजय दशमी 
उस रावण को तो जलाते हर साल 
                         जिसने सीता हरण किया 
पर इस रावण का क्या करें जो आज भी जिंदा है
उस रावण ने तो फिर भी मर्यादा निभाई
परस्त्री सीता जी को न हाथ लगाया उसने 
पर आज मानव का मन रावण बन 
                       रिश्तों को तार-तार कर रहा 
अपने मन को वश में ना कर पाए 
                             नन्हीं कलियों को ही रौंद रहा
माँ,बहन,बेटी किसी रिश्ते की अहमियत नहीं 
                 बस अपनी हवस के आगे अपना संयम खो रहा
उस रावण की बात क्या करें वह वेदों का ज्ञाता था
अहंकारी था पर पश्चाताप का इरादा था
आज का मानव अहंकारी बन खुद को भगवान समझ रहा अपने कर्मों का फल खुद ही भोगना इतना भी ना ज्ञान रहा
वह रावण भी राजा था अहंकार का पर्दा था आंखों पर 
न बच सका वे भी कर्मों से अपने 
आखिर राज भी गया और राम द्वारा अंत भी हुआ 
तो ए मानव तू--- कहाँ बच पाएगा 
              आज नहीं तो कल तेरा भी अंत होना है 
उस रावण को तो हम हर साल जलाकर 
                            विजयदशमी मनाते हैं 
जिस दिन अपने मन के रावण को मारेंगे 'रानी'
असली विजयदशमी तो उस दिन कह लाएगी ।

                                   रानी नारंग
[15/10, 2:53 pm] ♦️तारा प्रजापति - जोधपुर: अग्निशिखा मंच
15/10/2021 शुक्रवार
विषय-भक्ति गीत

विश्वास

बीत न जाये कहीं ये पल,
फूलों सा मुस्कराता चल।

नेक कर्म तू करता चल,
मिलेगा तुम्हें इसका फल।

पानी को न व्यर्थ बहाना,
जीवन का आधार है जल।

समय की है क़ीमत करना,
हाथ से ना ये जाये निकल।

मनुष्य जन्म अति दुर्लभ है,
प्रभु भक्ति से करले सफ़ल।

साहस से जो करे सामना,
बुरा वक़्त भी जाएगा टल।

मिलेगी उसी को मंज़िल,
प्रभु पर है विश्वास अटल।

करना है जो आज करले,
आयेगा ना कभी ये कल।

धीरज से तुम काम लेना
मिल जायेगा शीघ्र ही हल।
                         तारा "प्रीत"
                     जोधपुर (राज०)
[15/10, 2:57 pm] रजनी अग्रवाल जोधपुर: शीर्षक-भक्ति गीत

1. देवी मां हम तुझे मनाते , 
शीश नवाते आते- जाते , 
जय माता की जय माता की ,,,,,

2.आज जन जन को वर दो माता , 
प्यार स्नेह से भर दो माता , 
 जय माता की जय माता की ,,,,
 3.हम अज्ञानी बच्चे तेरे,  
आओ सवारों भाव भी मेरे ,
 जय माता की जय माता की ,,,,,
4.अर्चना पूजा कुछ ना जानू , 
मैं तो बस तुझे अपना मानू , 
जय माता की जय माता की ,,,,,,
5.देश पर अशांति दर्द भरी छाई , 
  उससे मां सबको उबारो , 
जय माता की जय माता,,,,

स्वरचित भक्ति गीत रजनी अग्रवाल
 जोधपुर
[15/10, 3:15 pm] 💃वंदना: ।।।।।।।।। मां।।।।।।।।

कभी तो यह मैया माझी बन जाती
कभी तो यह मैया साहिल बन जाती
उंगली पकड़ के मेरी रास्ता दिखाती है
उंगली पकड़ के मेरी रास्ता दिखाती है
तो बोलो ना मैया ओ मेरी मैया।

ठोकर लगी मुझको पत्थर नुकीला था
ठोकर लगी मुझको पत्थर नुकीला था
पर चोट ना आई मैया ने संभाला था
पर चोट ना आई मैया ने संभाला था
तो बोलो ना भैया ओ मेरी मैया।

जो दुखड़ा दिया हमको हम किसको बोलेंगे
जो दुखड़ा दिया हमको हम किसको बोलेंगे
दर तेरे खड़े होकर छुप छुप कर रो लेंगे
दर तेरे खड़े होकर छुप छुप कर रो लेंगे
तो बोलो ना मैया ओ मेरी मैया।

कोई सुख से सोता है कोई दुख में रोता है
कोई सुख से सोता है कोई भूख से रोता है
किसी का भी दोष नहीं सब कर्मों का लेखा है
किसी का भी दोष नहीं सब कर्मों का लेखा है
तो बोलो ना मैया ओ मेरी मैया।

मेरे इस जीवन की बस एक तमन्ना है 
मेरे इस जीवन की बस एक तमन्ना है
तुम सामने हो मेरे और प्राण निकल जाए
तुम सामने हो मेरे और प्राण निकल जाए
तो बोलो ना मैया ओ मेरी मैया।

कभी तो यह मैया माझी बन जाती है
कभी तो यह मैया साहिल बन जाती है
उंगली पकड़ के मेरी रास्ता दिखाती है
उंगली पकड़ के मेरी रास्ता दिखाती है
तो बोलो ना मैया ओ मेरी मैया।

वंदना शर्मा बिंदु देवास मध्य प्रदेश।
[15/10, 3:50 pm] सुरेन्द्र हरडे: 🌹अग्निशिखा मंच को नमन🙏

आज की विधा:- भक्ती-गीत

  विषय:- * *विजयादशमी*

दुष्ट रावण ने किया जानकी का हरण तब राम-लक्ष्मण पग जब पाला घंमींडी रावण हारा युद्ध में 
हो गया उसका मुंह काला।१।।

विजयादशमी ये सत्य के विजय
का पावन पर्व अधर्म की हार है
अंहकार की हार हुईं
और वो खडा बनके लाचार है।२।

हम भी अपने गर्व को
आज हम मारे जीवन 
अपना अच्छाई से संवारे।
दशानंद के बुरे कर्म को त्यागे।३।

आज खुशीकें मौके पर हम
भी बडो का आदर करें
गले लगाएं सत्य को अपनाकर विजयादशमी मनाएं।।४।।

सुरेंद्र हरड़े
नागपुर
दिनांक:- १५/१०/२०२१
[15/10, 3:52 pm] शेभारानी✔️ तिवारी इंदौर: राम का चरित्र 

ओ राम जी ,हम तुम्हरे गुण गाते हैं ,
चारों दिशा में राम की ,जय कारे लगवाते हैं ।
 राम -राम सुबह शाम में, केवट के विश्वास में, हनुमान के दिल में है ,धड़कन की हर श्वास में, जन्म और मृत्यु में राम ,दुख -सुख के एहसास में, सृष्टि के कण-कण में राम ,धरती और आकाश में, राम के नाम से पत्थर भी तिर जाते हैं ।
वो राम जी हम तुम्हारे गुण गाते हैं ।
राम है ईश्वर का स्वरूप, प्रगति का आधार है आदि अंत में राम -राम ,राम की महिमा अपरंपार है ,
शिला बनीअहिल्या का ,राम ने किया उद्धार है, राम की शक्ति से चलता, यह सारा संसार है,
राम के चरित्र में डूब हम ,राममय में हो जाते हैं,
 वो राम जी हम तुम्हारे गुण गाते हैं ।

श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश मोबाइल 89894 09210
[15/10, 3:53 pm] ओम 👅प्रकाश पाण्डेय -: जय जय हे मां दुर्गा भवानी --- ओमप्रकाश पाण्डेय
दुष्टों के तुम हो संहारक
सब देवों के तुम ही रक्षक
राक्षस चाहें हों बलशाली जितने
अस्त्र शस्त्र चाहें हो जितने
पर हो तुम मां सब पर भारी
जय जय हे मां दुर्गा भवानी ..........१
महिषासुर था बड़ा बलशाली
एक ही असुर था सब देवों पर भारी
देव व मानव का था संकट में जीवन
त्राहि त्राहि मची थी तीनो लोकों में
तब सब मिल तुम्हारी शरण में आए
जय जय हे मां दुर्गा भावानी .......२
हांथ जोड़ सब देव मनुज मिल
प्रार्थना की त्रिदेवों से सबने
रक्षा हमरी करो हे शंकर
हे ब्रह्मा बिष्णु हे भोले शंकर
त्रस्त हैं हम सेवक तुम्हारे
जय जय हे मां दुर्गा भवानी .......३
सब देवों ने बड़ा जतन लगाया
महिषासुर को कोई मार  न पाया
महिषासुर था बड़ा बलशाली
त्रस्त थे उससे सब नर नारी
कोई राह नहीं दिखता था
जय जय हे मां दुर्गा भवानी ........४
सब देवों ने मिल की तप भारी
प्रार्थना की अपनी रक्षा की
फिर प्रसन्न हुईं मां  भक्तो पर
प्रगट हुईं ले सब शक्ति को
भष्मासुर का संहार किया माता ने
जय जय हे मां दुर्गा भवानी .........५
तुम संहारक हो मां दुष्टों की
पर रक्षक हो तुम मां भक्तों की
हम सब  तो तेरे ही बेटे हैं मां
निशदिन तुम्हारी आरती गांवें
हमरी रक्षा करो हे मां जगदम्बे
जय जय हे मां दुर्गा भवानी .........६
( यह मेरी मौलिक रचना है -- ओमप्रकाश पाण्डेय )

 
[15/10, 4:13 pm] डा. बैजेन्द्र नारायण द्िवेदी शैलेश🌲🌲 - वाराणसी - साझा: एक रचना 
प्रतीक्षा में वर्ष बीता ।
विजय का यह पर्व आया ।।

तमस ने काया बढ़ाकर जब उजाले को हराया 
सूर्य ने प्राची दिशा में स्वयं आ उसको बताया
 हो सबल पर यह न समझो राज्य है केवल तुम्हारा
 अंततः स्वीकार कर ,उसने पराजय ,सिर झुकाया।।
विजय का यह पर्व आया।।

 सिंधु लहरों ने किया निश्चय गगन से होड लेंगे
 फलक ऊंचा है बहुत नाता उसी से जोड़ लेंगे 
किंतु यह संभव कहां था शीर्ष नभ का स्पर्श पाना
 शान्त रह कर एक अविजीत ने उसे भी तो हराया।।
 विजय का यह पर्व आया।।

राम का अभियान लंका विजय करना था नहीं
 जानकी के मिस नवल संदेश देना था कहीं
 रक्ष संस्कृति ने स्वयं को कहा था सबसे प्रबल
 राज्य त्यागा, बन गए, अन्याय को पग में झुकाया।।
विजय का यह पर्व आया।।

धूमकेतु उदय हुआ था एक पाटलिपुत्र में 
वह महा घनानंद डूबा रहता था नित इत्र में, मौर्यवंशी चंद्रगुप्त ने कर दिया संहार उसका ,
दुष्टों का उच्छेदन कर,
 संवत नया नृप ने चलाया ।।
विजय का यह पर्व आया ।।

न्याय जब अन्याय के पथ पर चरण रखने लगे ,
महात्मा भी सत्य पथ से दूर जब हटने लगे ,
नवल चिंतन
 डॉ हेडगेवार का तब स्वरित 🙏🙏🌻🌻जागा आज के दिन राष्ट्र ने
 नव संगठन का मंत्र पाया।।
 विजय का यह पर्व आया।।
 डॉ बृजेंद्र बृजेंद्र शैलेश वाराणसी उत्तर प्रदेश।
[15/10, 4:58 pm] Anshu Tiwari Patna: मां की विदाई
------------------
 मन बड़ा व्यथित है आज
    विदाई है तुम्हारी आज
 कैसे विदा करूं मैं मां
 पर यह तो विधान है
 द्वारा ही बनाई विधि का।
 वादा करो मां
 जल्दी ही आना तुम
 हम नादान बच्चे 
कैसे रहेंगे तेरे बिन।
 9 दिन
 उत्सव था मा घर पर
 सब सुना करके आप चली
 आशीर्वाद देती जाना मां
 सब मिलजुल कर 
प्यार से रहे।
 घर में बिटिया भी है तुम्हारा रूप
 उसको भी खुश रखना मां
 माता-पिता सास-ससुर हैं बुजुर्ग
 उनका साथ बनाए रखना।
 अपनी बेटियों की लाज बचाने
 दुष्टों का संहार करो।
 कोरोना से निजात दिलाओ।
 इस बार बहुत सुनी नवरात्रि थी,
 अगली बार धूमधाम से आओ मां।
 धन्यवाद
 अंशु तिवारी पटना
[15/10, 5:04 pm] आशा 🌺नायडू बोरीबली: 🌹🌷🌹🌷🌹🌷
 विजयादशमी की अनेक शुभकामनाएं समस्त अग्निशिखा मंच के परिवार के प्रत्येक सदस्य को सहृदय स्वीकार हो।
🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹👏👏👏👏👏

🌹 आइए मनाए दशहरा
*****************🌹
 वर्ष में आता है एक बार , खुशियां समेट लाता है हर बार, होती है अधर्म पर धर्म की विजय ‌‌। होती है असत्य पर सत्य की विजय । होती है बुराई पर अच्छाई की विजय। होती है पाप पर पुण्य की विजय । होती है अत्याचार पर सदाचार की विजय । होती है क्रोध पर दया की विजय , होती है क्षमा कीजय और होती है अज्ञान पर ज्ञान की विजय। विजयदशमी पर इन सब पर विजय जो हमें देती है सुख, समृद्धि ,शांतिमय, मंगलमय विजयी जीवन।
****************
स्वरचितवमौलिकरचना
डाॅ .आशालतानायडू .भिलाई . छत्तीसगढ़ .
****************
[15/10, 5:33 pm] रानी अग्रवाल: विजया दशमी
१५.१०.२०२१,शुक्रवार।
विधा _भक्तिगीत,
विषय_दशहरा।
राम रमाकर दुई जन्ना,
एक क्षत्रिय,एक ब्राह्मन्ना,
एक धर्म का प्रतीक,
एक अधर्म का सटीक।
एक पिता का आज्ञाकारी,
एक पुरुष दुष्ट दुराचारी,
राम अवतार लिन्हा,
परोपकार हेतू।
रावण जीवन जिया,
अत्याचार हेतू।
राम सदा सुख_शांति दीन्हा,
रावण दुख_अशांति दीन्हा,
राम चले सत्य की राह पर,
रावण मरा असत्य की राह पर।
राम ने फूंक डारी लंका,
रावण मरा, मिटी सब संका,
वनवास पूर्ण कर लौटे रघुराई,
अवधपुरी सब दिवाली मनाई।
जो रूप धरे राम का,
नाम बड़ा सबके काम का,
ज्यों रूप धरोगे रावण,
वाही गति पावोगे मरण।
नवदुर्गा पूजन पूर्ण हो,
     आए खुशियों भरा दशहरा,
कोई घाव मिले न दिल को,
     दिल हो जाय,दस,दस हरा।
हम कहते बोलो "जय श्री राम"
राम बनाए सबके सब काम,
सियावर रामचंद्र की जय,
अवधपति रामचंद्र की जय।
स्वरचित मौलिक भक्तिगीत___
रानी अग्रवाल,मुंबई,१५.१०.२१.
[15/10, 6:18 pm] रामेश्वर गुप्ता के के:       ।विजय पर्व। 
विजयपर्व संदेश यही है,
शक्ति का संदेश यही है।,
गलत कार्य कभी मत कीजै,
इसकी सजा बड़ी भारी है।।
विजय पर्व................... 1 
राम जी ने आज रावण मारा,
उसका वंश नाश हुआ सारा, 
चलो यह पर्व मनाये धूम से, 
विश्व कल्याण कर्म हो नारा।। 
विजय पर्व................... 2 
यह जीवन मानव दुर्लभ है, 
शुभ कर्म करो अपने बस है। 
प्रीति की रीति निभाओ जग, 
इसमे पुण्य छुपा बरबस है।। 
विजय पर्व....................3
प्यार बिना जीवन धूमिल है, 
इसकी धारा बहती नित है। 
दशहरा पर्व खुशहाली मनाये,  
भारत करता सबका हित है।। 
विजय पर्व.................... 4
स्वरचित, 
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ।
[15/10, 6:29 pm] कुम कुम वेद सेन: भक्ति गीत

विजयादशमी विजय पर्व
पावन त्यौहार का है सबको गर्व

असत्य पर सत्य का विजय
अधर्म पर धर्म का जय

दैत्य असुरों का हुआ नाश
शांति विजय का फैला उल्लास

काम क्रोध लोभ ईर्ष्या अहंकार
मानव मन का है या असुर वृत्ति

पाओ इन वृत्तियो पर विजय
मन में सुख शांति का होगा जय

आज दुर्गा मां की विदाई का बेला है
पंडाल में सिंदूर का है खेला

आशीर्वाद पाने की लगी है मेला
फिर भी मन में है एक दुख का बेला

कुमकुम वेद सेन





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